ABP के साथ मेरी कभी न खत्म होने वाली यादें हैं: दीपांकर दास पुरकायस्थ

एबीपी के पूर्व सीईओ और एमडी ने नेटवर्क के साथ अपनी लंबी पारी और भविष्य की योजनाओं समेत कई मुद्दों पर रखी अपनी बात

Last Modified:
Thursday, 25 March, 2021
Dipankar Das Purkayastha

‘एबीपी प्राइवेट लिमिटेड’ (ABP Pvt Ltd)  में अपनी चार दशक से ज्यादा पुरानी पारी को विराम देते हुए दीपांकर दास पुरकायस्थ (Dipankar Das Purkayastha) ने हाल ही में सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर के पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया है। इस नेटवर्क में अपनी इतनी लंबी पारी, पुरानी यादों और भविष्य की योजनाओं को लेकर डीडी पुरकायस्थ ने ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

: एबीपी नेटवर्क के साथ आप चार दशक से ज्यादा समय से जुड़े रहे हैं। इतनी लंबी पारी की अपनी कुछ बेहतरीन यादों के बारे में कुछ बताएं? 

एबीपी के साथ मेरी कभी न खत्म होने वाली यादें हैं। चार दशक पुरानी बात करें तो पूर्व में हमारे पास तकनीकी कम थी। ज्यादातर लोगों का झुकाव अखबार पढ़ने पर था। विज्ञापनों को लेकर ज्यादा स्थिरता नहीं थी और टेलिविजन बहुत ज्यादा आम नहीं था। समय गुजरने के साथ सभी चीजें बदल गईं। प्रतिस्पर्धा बढ़ गई, मीडिया के तमाम माध्यम विकसित हो गए, डिजिटल और मोबाइल टेक्नोलॉजी की शुरुआत हो गई और मैंने इन चार दशकों में अपने सामने इन सब परिवर्तनों को होते हुए देखा है। इस दौरान कंपनी एक छोटे क्षेत्रीय समाचार पत्र से बड़े राष्ट्रीय समूह में विकसित हुई है और टेलिविजन, मैगजींस, न्यूजपेपर्स और डिजिटल क्षेत्र में बहुत मजबूती से अपनी जगह बनाई है। मैं खुश हूं कि मेरे इस्तीफे के समय तक एबीपी देश का एक प्रमुख न्यूज मीडिया ग्रुप बन चुका है।

: बीस-तीस साल पहले राजनीतिक घटनाक्रमों की कवरेज बिल्कुल अलग तरीके से होती थी। आपकी नजर में इस दिशा में क्या बदलाव आया है?

लोग अब सभी चीजें जल्दी से जल्दी जान लेना चाहते हैं। मीडिया का काम समाज में घट रही अच्छी-बुरी घटनाओं को सामने लाना है, लेकिन लोग अच्छे पक्ष को देखना चाहते हैं। इन हालातों में सही तथ्यों को सामने रखना काफी दुविधाजनक होता है। लेकिन एबीपी ने हमेशा से एक साहसिक दृष्टिकोण अपनाया है और समाज के लिए जो सही है, वही पब्लिश करता है।

: जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं कि कैसे एबीपी न्यूज नेटवर्क अब एबीपी ब्रैंड बन गया है, तो आपको कैसा लगता है?

एबीपी न्यूज को पहले स्टार न्यूज के नाम से जाना जाता था। इससे पहले कि हम इसे पूरी तरह से खरीद लें, यह सीखने का एक अच्छा अनुभव रहा। स्टार न्यूज रातों रात एबीपी न्यूज बन गया, लेकिन इसके लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया गया, क्योंकि लोगों के दिमाग में किसी की छवि को बदलना इतना आसान नहीं है और बहुत लंबे समय तक इसे स्टार न्यूज कहा जाता था। स्टार ग्रुप से सीखी गईं तकनीकी की बारीकियां और कंटेंट को लेकर एबीपी की तैयारियां ही इसे खास बनाती हैं। यह सहयोग सफल रहा। शुरू से ही हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट रहा है कि हम एक प्रमुख स्थान चाहते थे। हम जानते थे कि हमें क्या ब्रॉडकास्ट करना है। हम अपने रीडर्स और व्युअर्स को गंभीर न्यूज और गंभीर पत्रकारिता देना चाहते थे। एबीपी न्यूज ने बंगाली भाषा में अपना चैनल शुरू किया, जो काफी सफल रहा। इसके बाद मराठी और गुजराती भाषा में चैनल शुरू किए गए। महाराष्ट्र में एबीपी माझा नंबर वन न्यूज चैनल बन गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड पर आधारित हिंदी न्यूज चैनल ‘एबीपी गंगा’ (ABP Ganga) की शुरुआत की गई। इसे अभी एक साल ही हुआ है। एबीपी पूरे देश का नंबर वन रीजनल न्यूज मीडिया बनना चाहता है। हम पूरे देश में अपनी मौजूदगी की तैयारी कर रहे हैं और जल्द ही दक्षिणी क्षेत्रों में अपने कदम बढ़ाएंगे और देश का नंबर वन न्यूजपेपर प्लेयर बनने का प्रयास करेंगे।

: निजी और प्रोफेशनल तौर पर पिछले 12 महीने आपके लिए कैसे रहे हैं। चुनौतियों का सामना करने और भविष्य की तैयारी के लिए एबीपी ने क्या किया?

पिछले 12 महीनों की बात करें तो यह काफी अनिश्चितता भरा दौर रहा। हर कोई भोजन और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति को लेकर पूरी तरह निश्चित नहीं था। अखबारों का डिस्ट्रीब्यूशन जीरो हो गया था, विज्ञापन बंद हो गए थे और एक मीडिया कंपनी के रूप में हमारे लिए काफी मुश्किल हो गई। इन चुनौतियों से निपटने और स्ट्रैटेजी के निर्माण के लिए हमने लोगों की एक टीम बनाई। सीमित रेवेन्यू के कारण कंपनी सभी को भुगतान करने में सक्षम नहीं थी, इसलिए छंटनी की गई। लागत को कम करना पड़ा। कुछ बड़े मीडिया संस्थानों ने मुझे फोन कर सुझाव दिया कि रेवेन्यू गिरने के कारण न्यूजपेपर्स की प्रिंटिंग बंद कर देनी चाहिए, लेकिन मैंने इससे यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इससे लोग हमें पूरी तरह भूल सकते हैं। 

इससे बाद एक जागरूकता कैंपेन शुरू किया गया कि अखबार सुरक्षित हैं और इससे कोरोना का संक्रमण फैलने का खतरा नहीं है, क्यों प्रॉडक्शन के सभी स्तरों पर तमाम जरूरी सावधानियां बरती जा रही हैं। धीरे-धीरे सेल्स और रेवेन्यू में सुधार आना शुरू हुआ। विज्ञापन रेवेन्यू बढ़ गया। मुझे खुशी है कि मैं ऐसे समय पर इस्तीफा दे रहा हूं और मैंने कंपनी की ग्रोथ में खासकर इस मुश्किल समय में बहुत योगदान दिया है।

: अवीक सरकार और अरुप सरकार के साथ काम करने का आपका कैसा अनुभव रहा है और उनके पेशेवर दृष्टिकोण क्या हैं? 

दोनों बिल्कुल अलग हैं। कई मायनों में वे एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन व्यक्तित्व में वे थोड़े अलग हैं। अवीक सरकार बहिर्मुखी हैं और लोगों से मिलना-जुलना पसंद करते हैं, दूसरी ओर अरुप सरकार थोड़े अंतर्मुखी हैं, लेकिन दोनों ही बहुत बौद्धिक हैं और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। वे एम्प्लॉयीज को काम करने की पूरी आजादी देते हैं। उनके साथ काफी अच्छा सफर रहा है।

: अतिदेब सरकार एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। कंपनी के भीतर से लीडर्स तैयार करने के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

संस्थान में काफी सक्षम व्यक्ति हैं और एबीपी उन्हें अपने कौशल का प्रदर्शन करने का अवसर देने में विश्वास करता है। अतिदेब को सीईओ के पद पर प्रमोट किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि परिवार के सदस्य को उस भूमिका में नहीं आना चाहिए। चुने हुए सीईओ अतिदेब को रिपोर्ट करेंगे, जो सभी कार्यों की देखरेख करेंगे क्योंकि वह खुद एक बहुत ही सक्षम पत्रकार हैं। परिवार एक शेयरधारक के रूप में मौजूद हो सकता है लेकिन सीईओ को एक स्वतंत्र व्यक्ति होना चाहिए, जिसका परिवार के साथ कोई सीधा संबंध नहीं हो।

: ऑस्ट्रेलिया में, हाल ही में लिए गए एक फैसले से वहां सोशल मीडिया दिग्गज अब न्यूज दिखाने के बदले अखबारों को भुगतान करेंगे और यदि भारत में भी ऐसा कुछ होता है तो यह अखबार मालिकों को कैसे प्रभावित करेगा?

ऑस्ट्रेलिया में इसे कानूनी मान्यता दे दी गई है और मेरा मानना है कि अन्य देशों की मीडिया इंडस्ट्री में भी इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेंगे और उम्मीद है कि भारत और ब्राजील भी इसे फॉलो करेंगे। गूगल और फेसबुक भी इस आर्थिक कदम को नजरंदाज नहीं करेंगे। गूगल ने गूगल शोकेस बनाया है, जो अखबार कंपनियों को प्रति वर्ष एकमुश्त राशि का भुगतान करता है। इस तरह के फैसले से प्रकाशकों को उनकी मेहनत का उचित हिस्सा मिलेगा, जो अभी तक उन्हें नहीं मिलता है।

: एक कंटेंट कंपनी के तौर पर एबीपी ने डिजिटल बेस का विस्तार देखा है। लिहाजा यह अपने डिजिटल फुटप्रिंट पर कैसे काम कर रहा है और इसमें क्या सफलताएं मिल रही हैं?

डिजिटल भविष्य है और विशेष रूप से महामारी के बाद तो चीजें काफी बदल गई हैं। एबीपी में हमारी दो डिवीजन (divisions) हैं, पहली एबीपी लाइव (ABP Live) है, जो वास्तव में बहुत अच्छा कर रही है। दूसरी- एबीपी डिजिटल (ABP Digital), जो आने वाली कई थीम्स के साथ बेहतर कर रही है। टेक्नोलॉजी एक बेहतरीन सुविधा (facilitator) है और इसे समय के साथ हमें स्वीकार करना है, क्योंकि आने वाला समय इसी का है।

: आपको क्या लगता है कि भारतीय मीडिया मालिकों और अखबार मालिकों को प्रासंगिक बने रहने के लिए क्या करना चाहिए?

विश्वसनीयता से कभी समझौता नहीं किया जाना चाहिए। संपादकीय (एडिटोरियल) वास्तविक ताकत है और सही लोगों के लिए गेम-चेंजर है। इसके अलावा, हजारों सालों की तरह यह नई पीढ़ी भी और अधिक जानना चाहती है। सोशल मीडिया के भंवर में बहुत सारे ऐसे तथ्य हैं, जिनकी सच्चाई छिप जाती है। ऐसे कई ब्रैंड से जुड़े अखबार हैं, जो विश्वसनीय जानकारी प्रकाशित करने की हिम्मत रखते हैं। प्रासंगिक और व्यक्तिगत अनुभव केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से ही संभव है। डिजिटल और प्रिंट मीडिया एक दूसरे के पूरक हैं और मुझे लगता है कि इन्हे अलग से नहीं देखा जाना चाहिए। प्रासंगिक रहने के लिए, नए विषयों (themes) के साथ आना जरूरी है। न्यूयॉर्क टाइम्स (New York Times) ने अपने एक पत्रकार को पर्वतारोहियों के साथ रहने के लिए भेजा, जिसे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना पड़ा, ताकि वह उनकी दैनिक दिनचर्या और चोटी पर चढ़ने वाले प्रेरक कारकों के बारे में उनके विचार जान सके। इस खबर ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि भारत के मीडिया घरानों को भी इसी तरह की परिपाटी को अपनाना चाहिए।

: इतनी दूर आने के बाद, क्या आपको अभी भी लगता है कि कुछ ऐसे काम बाकी रह गए हों, जिन्हें आप पूरा करना चाहते हैं?

बिल्कुल, दुनियाभर में यात्रा करना मेरी तीव्र इच्छा है। महामारी के दौरान, मैंने स्पैनिश सीखी और वेलेंसिया विश्वविद्यालय (University of Valencia) से सीखने के कई लेवल्स को पूरा किया। मैं अब हल्की-फुल्की स्पैनिश बोल सकता हूं और इसे समझ भी सकता हूं। लैटिन अमेरिका की यात्रा करना मेरी दिली इच्छा है और अगले दो सालों में जब सब चीजें थोड़ी सामान्य हो जाएंगी, तो मैं बहुत सी यात्राएं करना चाहूंगा। मैं अलग-अलग व्यंजनों का लुत्फ उठाना चाहता हूं। मैं निकट भविष्य में एक किताब भी लिखना पसंद करूंगा।

इंटरव्यू का पूरा वीडियो फॉर्मेट यहां देखें:

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India Ahead के इन सवालों पर योगी आदित्यनाथ ने कुछ यूं रखी ‘मन की बात’

‘इंडिया अहेड’ के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला ने एक खास कार्यक्रम के जरिये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ संवाद किया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 08 September, 2021
Last Modified:
Wednesday, 08 September, 2021
Interview

उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव में अब छह महीने से भी कम का समय बचा है और ऐसे में सबकी निगाहें सीएम योगी आदित्यनाथ पर टिकी हुई हैं कि कैसे वह इतने प्रचंड बहुमत को बरकरार रख पाएंगे। ‘इंडिया अहेड’ (India-Aheadd) के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब लेने के लिए सीएम योगी से मिलने पहुंचे और एक खास कार्यक्रम के जरिये उनके साथ संवाद किया। यह इंटरव्यू अपने आप में इसलिए भी खास रहा, क्यूंकि इसमें व्यापर जगत की बड़ी हस्तियां भी शामिल हुईं और सीएम योगी से विकास के रोडमैप पर उन्होंने चर्चा की। अपने इस इंटरव्यू में सीएम योगी ने लगभग सभी बड़े मुद्दों पर बेबाकी से जवाब दिए। भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला ने यूपी की राजनीति से जुड़े सभी अहम सवाल तो उनसे पूछे ही, इसके अलावा भी देश-विदेश के मुद्दों पर भी उनकी राय जानी। आइये जानते हैं कि इस इंटरव्यू की बड़ी बातें क्या रहीं-

कोरोना नियंत्रण: आज यूपी वैक्सीन लगाने के मामले में टॉप पर बना हुआ है और कोरोना के नियंत्रण में भी सफलता प्राप्त की है। वहीं, केरल जैसे राज्यों में आज भी 30 हजार से अधिक केस आ रहे हैं। सीएम योगी ने कहा कि जब देश ने स्वदेशी वैक्सीन का उत्पादन किया तो विपक्ष ने दुष्प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसे बीजेपी की वैक्सीन का नाम दे दिया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उन लोगों की बातों में आकर कई लोगों ने वैक्सीन से दूरी बनाई और दूसरी लहर की चपेट में आ गए। योगी ने कहा कि इस पाप का जवाब जनता विपक्ष से लेगी। उन्होंने कहा कि आज 24 करोड़ की आबादी में सिर्फ 22 केस आए हैं। हमारे 28 जनपद कोरोना मुक्त हैं और इसके साथ-साथ समय-समय पर हम सैनिटाइजेशन का कार्य कर रहे हैं।

अर्थव्यवस्था: इस बारे में सवाल पूछे जाने पर सीएम योगी ने कहा कि जब हम वर्ष 2017 में आए थे, तब उत्तर प्रदेश देश की छठी अर्थव्यवस्था था और आज नंबर दो पर है। इसके लिए हमने बेहतर कानून व्यवस्था को आधार बनाया और फिर निवेशकों के लिए निवेश करने का माहौल बनाया, हमने इंफ्रास्ट्रक्चर पर कार्य किया। पहले प्रदेश की पहचान थी कि जहां से गड्ढे शुरू हों वो उत्तर प्रदेश, लेकिन आज जहां से फोरलेन शुरू हों, वो उत्तर प्रदेश है। चाहे आप दिल्ली से आइये, हरियाणा से आइये, बिहार से आइये, उत्तराखंड से आइये, राजस्थान से आइये, मध्यप्रदेश से आइये.. हमने अलग पहचान बनाई। इसके साथ साथ परंपरागत उद्यम को प्रोत्साहन दिया, एक डिस्ट्रिक एक उत्पाद इसका उदाहरण है।

ओबीसी फैक्टर: राष्ट्रीय जनगणना और जातीय जनगणना को लेकर भी राजनीति तेज हो रही है तो यह कैसे चुनाव को प्रभावित कर सकती है? यह पूछने पर सीएम योगी ने कहा कि जातिगत राजनीति ने उत्तर प्रदेश और बिहार को बदहाल कर दिया था। दलित, पिछड़ा वंचित समाज को कहीं का नहीं छोड़ा था। कोई भी पार्टी नहीं कह सकती कि उन्हें मौका नही मिला, कांग्रेस ने सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में राज किया और क्या किया उन्होंने यहां के लिए? यूपी का नौजवान, महिला और किसान सब कुछ जानते हैं और वो भारतीय जनता पार्टी के ही साथ हैं।

गुंडाराज का खात्मा और विपक्ष के आरोप: जब सीएम योगी से यह पूछा गया कि पूर्व सीएम अखिलेश यादव कह रहे हैं कि वो 400 सीट लाएंगे और जनता आपसे खुश नहीं है तो उसके जवाब में सीएम योगी ने कुछ आकंड़े दिए। उन्होंने कहा कि सपा, बसपा और कांग्रेस के संबंध माफिया मुख्तार से थे, उसे कुचलने का काम हमने किया है। हम महिलाओं के लिए मिशन शक्ति अभियान चला रहे हैं। थानों में महिला सहायता डेस्क और तहसीलों में अलग से महिलाओं की सुनवाई के कार्य हो रहे हैं वहीं पुलिस भर्ती में 20 फीसदी बालिकाओं की भर्ती की गई। बुंदेलखंड में पहले भीषण जल संकट था। हम सुनिश्चित कर रहे हैं कि लोगों को अब साफ पानी मिले, हम आरओ प्लांट लगा रहे हैं। बुंदेलखंड में पर्यटन रफ्तार पकड़ रहा है। चित्रकूट आज बिल्कुल अलग दिखता है, पिछली सरकारों ने राजनीतिक कारणों से बुंदेलखंड को समृद्ध नहीं होने दिया और अब हम उसे बदल रहे हैं।

‘इंडिया अहेड’ के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला का सीएम योगी के साथ यह इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं।

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छोटे OTT प्लेटफॉर्म्स को एग्रीगेटर सर्विस का हिस्सा बनने से ये होगा फायदा: कुणाल दासगुप्ता

यूएस और यूके के स्ट्रीमिंग एग्रीगेटर ‘स्क्रीनहिट्स टीवी’ (ScreenHits TV) ने अपनी पहली जॉइंट वेचर पार्टनरशिप ‘वायल कंटेंट टेक’ (Vial Content Tech) कंपनी के साथ की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 07 September, 2021
Last Modified:
Tuesday, 07 September, 2021
kunal Dasgupta

यूएस और यूके के स्ट्रीमिंग एग्रीगेटर ‘स्क्रीनहिट्स टीवी’ (ScreenHits TV) ने अपनी पहली जॉइंट वेचर पार्टनरशिप ‘सोनी टीवी’ (Sony TV) इंडिया के पूर्व सीईओ कुणाल दासगुप्ता और विवेक गुप्ता की कंपनी ‘वायल कंटेंट टेक’ (Vial Content Tech) के साथ की है। यह जॉइंट वेंचर भारत में SVOD/AVOD (Subscription video on demand/Advertising-based video on demand) कंटेंट क्यूरेटर के विस्तार का नेतृत्व करेगा। इस पार्टनरशिप के जरिये ‘स्क्रीनहिट्स टीवी’ ऐप के द्वारा सबस्क्राइबर्स अपने मौजूदा स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को इंटीग्रेट कर सकेंगे।

अपने आईओएस (iOS) टैबलेट ऐप के साथ-साथ यह मोबाइल ऐप  ‘क्रोमकास्ट‘ (Chromecast) और ‘फायर टीवी‘ (Fire TV) के माध्यम से एंड्रॉयड टीवी के लिए भी अनुकूल होगा। ओटीटी एग्रीगेशन बिजनेस के बारे में दासगुप्ता ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

ScreenHits TV के साथ इस पार्टनरशिप को लेकर आपका क्या मानना है?

हम भारत में ScreenHits TV टेक्नोलॉजी लेकर आ रहे हैं। बहुत सारे ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं और ओटीटी प्लेटफॉर्म की औसत खरीद प्रति व्यक्ति 2.5 है, जिसका मतलब है कि लोग सबस्क्राइब कर रहे हैं, लेकिन इनकी संख्या कम है और यह औसतन दो या तीन प्लेटफॉर्म है। लोग सात-आठ प्लेटफॉर्म्स सबस्क्राइब नहीं कर रहे हैं। ऐसे में एक ओटीटी एग्रीगेटर के लिए काफी अवसर हैं और इससे एक ही साइन अप अथवा आईडी के माध्यम से कई स्ट्रीमिंग सेवाओं का लाभ उठाया जा सकता है। ScreenHits TV पहले से ही यूएस और यूके में ओटीटी कंटेंट को एग्रीगेट कर रहा है और यह काफी अच्छा काम कर रहा है। भारत में भी हमारे पास तमाम ओटीटी प्लेटफॉर्म्स हैं और यहां वास्तव में एग्रीगेटर की काफी जरूरत है। 

क्या आपको लगता है कि बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म्स एग्रीगेटर सर्विस का हिस्सा बनने के लिए तैयार होंगे?

‘डिज्नी+हॉटस्टार’ (Disney+ Hotstar) जैसे बड़े नाम न कह सकते हैं। यूएस में ‘नेटफ्लिक्स’ (Netflix) को एग्रीगेशन से ऐतराज नहीं है और ‘स्क्रीनहिट्स‘ के पास पहले से ही विश्व स्तर पर उनके साथ एक डील है। ‘नेटफ्लिक्स‘ हमें वैसे भी मिल सकता है, लेकिन हो सकता है कि वे कोई छूट न दें। छूट का हिस्सा बनने के लिए अन्य प्लेटफॉर्म्स ठीक हैं। ALTBalaji, Eros Now और Shemaroo जैसे प्लेटफॉर्म्स इसके लिए ठीक हैं, क्योंकि इन्हें उस तरह का आकर्षण नहीं मिल रहा है। 

‘टाटा स्काई’ और ‘जियो फाइबर’ जैसे कुछ प्लेयर्स ने ओटीटी कंटेंट को एग्रीगेट करना शुरू कर दिया है। मार्केट के लिए आप किस तरह की पेशकश कर रहे हैं? 

टाटा स्काई ने बिंजे+सेट-टॉप बॉक्स (एसटीबी) लॉन्च किया है, जो ओटीटी सेवाओं की एक श्रृंखला प्रदान करता है। लेकिन ऐसा करने के लिए आपको टाटा स्काई कनेक्शन की आवश्यकता होगी। हम केवल Apple के iOS पर ही सेवा की पेशकश करेंगे। हम एंड्रॉयड  पर इसे भविष्य में लॉन्च करेंगे। हमें लगता है कि iOS के पास ऐसे ऑडियंस ज्यादा हैं जो इस तरह के प्रयोग करने के इच्छुक हैं। यूजर्स प्लेटफॉर्म को बदले बिना एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर आसानी से जा सकते हैं। हम आईओएस (iOS) के साथ शुरुआत करेंगे और फिर समय के साथ एंड्रॉयड को शामिल करेंगे। चुनौती यह है कि ये प्लेयर्स हमें एंड्रॉयड प्लेटफॉर्म के लिए कंटेंट नहीं देना चाहते, क्योंकि ये सभी उस बड़े बाजार में लड़ रहे हैं।

इस तरह की सर्विस के लिए क्या बाजार तैयार है?

इस सॉफ्टवेयर की एक खासियत है और लोग इसे उपयोगी पाएंगे। यह ‘क्रेड’ (Cred) की तरह है। हम हमेशा अलग-अलग बैंकों में अपने क्रेडिट कार्ड के बिलों का भुगतान करते रहे हैं, लेकिन अब ‘क्रेड’ ने एक ही प्लेटफॉर्म से बिलों का भुगतान करना आसान बना दिया है। हम ‘क्रेड’ कॉन्सेप्ट को अपनाने का प्रयास कर रहे हैं और हम एक छोटा सा कमीशन लेंगे, जिसे चुकाने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। आगे चलकर बाजार में और 20 प्लेटफॉर्म आने वाले हैं तो वे क्या करेंगे? बहुत सारे रीजनल ओटीटी प्लेटफॉर्म्स मार्केट में लॉन्च हो रहे हैं। उनके लिए हमारे पास अलग-अलग क्षेत्रीय बंडल हो सकते हैं। यह एक केबल ऑपरेटर के समान है, जो विभिन्न ब्रॉडकास्टर्स से कंटेंट एकत्र करता है।

आपकी मार्केट स्ट्रैटेजी क्या है?

हम फोन या हैंडहेल्ड डिवाइस के लिए तकनीक बनाने जा रहे हैं। हमने हाल ही में ScreenHits TV के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा हम इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं, जिसमें हमें कुछ समय लगेगा। इसके बाद हम सभी प्लेयर्स के साथ चर्चा शुरू करेंगे। ScreenHits TV पश्चिमी बाजारों में कारगर साबित हुआ है। सोनी ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए ScreenHits TV को अपना हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल (Hindi GEC) पहले ही दे दिया है। नेटफ्लिक्स ने पुष्टि की है कि वे हमारे साथ आएंगे, क्योंकि उनकी एक अंतरराष्ट्रीय साझेदारी है।

छोटे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को एग्रीगेटर सर्विस का हिस्सा बनने से क्या फायदा होगा?

एक बंडल के रूप में ओटीटी प्लेटफार्मों को निश्चित रूप से रेवेन्यू का कुछ प्रतिशत मिलेगा जब भी कोई कस्टमर जुड़ेगा। शुरुआत में हम सभी प्लेटफॉर्म्स को बंडल के हिस्से के रूप में नहीं बेचेंगे। यूजर्स मौजूदा नेटफ्लिक्स या एमेजॉन प्राइम वीडियो सब्सक्रिप्शन जोड़ सकते हैं और इसके अलावा वे एचबीओ मैक्स और एएलटीबालाजी आदि जोड़ सकते हैं।

तो क्या छोटे प्लेटफॉर्म्स नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो का सहारा ले सकते हैं?

हां, लेकिन नेटफ्लिक्स या एमेजॉन प्राइम वीडियो पर कोई डिस्काउंट नहीं देना होगा। जिस व्यक्ति के पास नेटफ्लिक्स या एमेजॉन है, उसके पास पहले से ही सब्सक्रिप्शन है। यह कोई नई सदस्यता नहीं होगी। यूजर्स मेरे जरिए नेटफ्लिक्स या एमेजॉन नहीं खरीदेंगे। स्क्रीनहिट्स टीवी में नेटफ्लिक्स या एमेजॉन खाता जोड़ने पर वे अन्य प्लेटफार्मों तक पहुंच सकेंगे। अन्य प्लेटफॉर्म्स पहले तीन महीनों के लिए मुफ्त हो सकते हैं  और फिर इसके लिए भुगतान करना होगा। मान लीजिए कि आज Lionsgate Play या HBO Max जैसे बंडल हैं, कुछ दर्शक ऐसे सकते हैं जो उन सेवाओं को देखना चाहते हैं, लेकिन वे इसके लिए अलग से भुगतान नहीं करेंगे। हमारे द्वारा लोग नेटफ्लिक्स या एमेजॉन कंटेंट जोड़ सकते हैं और उन प्लेटफार्म्स को छह महीने तक देख सकते हैं और फिर वे भुगतान करना शुरू कर सकते हैं।

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कंटेंट और पहुंच दोनों के मामले में बड़े हिट साबित होंगे ये प्लेटफॉर्म्स: अविनाश पांडेय

एबीपी नेटवर्क के सीईओ अविनाश पांडेय के अनुसार, स्थानीय अर्थव्यवस्था के उदय होने से पिछले कुछ वर्षों में रीजनल न्यूज में काफी बढ़ोतरी हुई है और इस क्षेत्र में निवेश का यह सबसे सही समय है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 August, 2021
Last Modified:
Thursday, 26 August, 2021
Avinash Pandey

‘एबीपी नेटवर्क’ (ABP Network) ने अपने विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाते हुए इस साल अप्रैल में तमिल बोलने और समझने वालों के लिए तमिल भाषा में 'एबीपी नाडु' (ABP Nadu) नाम से डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया था। इसके बाद पिछले दिनों दक्षिण के मार्केट में अपना विस्तार करते हुए नेटवर्क ने तेलुगु बोलने और समझने वालों के लिए तेलुगु भाषा में ‘एबीपी देसम‘ (ABP Desam) नाम से डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया।

इस बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘एबीपी नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडेय ने बताया कि दक्षिण के मार्केट में इंटरनेट की पहुंच ज्यादा है, जिससे डिजिटल की ओर बदलाव हो रहा है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि कैसे अपनी डिजिटल न्यूज पेशकशों के साथ नेटवर्क इसका अधिकतम लाभ उठा रहा है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

‘एबीपी देसम‘ के बारे में कुछ बताएं। क्या यह महज एक और विस्तार है या फिर यह मजबूत विकास से प्रेरित है, जिसे आपने ‘एबीपी नाडु‘ के लॉन्च के बाद देखा है?

‘एबीपी देसम‘ एक आधुनिक ब्रांड है जो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की स्थानीय सच्चाई को दर्शाता है। न्यूज को इस तरह के फॉर्मेट में पहले कभी नहीं दिया गया है। इसका उद्देश्य युवा, आधुनिक और प्रगतिशील तेलुगु मानसिकता को आकर्षित करना है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था के आगे आने से पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय समाचारों में तेजी से वृद्धि हुई है। इसलिए दक्षिण के मार्केट में काफी अवसर हैं, क्योंकि लोग जानना चाहते हैं कि उनके आस-पास क्या हो रहा है। इसलिए, निश्चित रूप से डिजिटल कंटेंट का बिजनेस स्थानीय भाषा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

वास्तव में, हाल ही में लॉन्च हुआ हमारा प्लेटफॉर्म ‘एबीपी नाडु‘ अपने आगमन के बाद से केवल दो महीनों में ही तमिल दर्शकों को आकर्षित करने में कामयाब रहा है और इसके 3.2 मिलियन यूजर्स हो गए हैं। डिजिटल के क्षेत्र में बढ़ती संभावनाओं को देखते हुए ही हमने ‘एबीपी देसम‘ को लॉन्च करने का फैसला लिया। इससे दक्षिण के मार्केट में हमारी मौजूदगी का विस्तार हुआ है और मुझे विश्वास है कि निकट भविष्य में ‘एबीपी नाडु‘ और ‘एबीपी देसम‘ जैसे प्लेटफॉर्म्स कंटेंट और पहुंच दोनों के मामले में काफी बड़े हिट साबित होंगे।

कंटेंट प्लान के बारे में थोड़ा बताएं, इस प्लेटफॉर्म के लिए आपने किन्हें लक्षित किया है यानी आपके टार्गेट ऑडियंस कौन हैं?

स्थानीय भाषा में कंटेंट उपलब्ध के उद्देश्य से ‘एबीपी देसम‘ ने दक्षिण के मार्केट में कदम रखा है। इसकी टैगलाइन 'मन वार्तालु, मन ऊरी भाषालो!" रखी गई है, जिसका हिंदी में मतलब 'हमारी खबर, हमारे शहर की भाषा में' है। इसका मतलब साफ है इस प्लेटफॉर्म का उद्देश्य तेलुगु रीडर्स को उनकी भाषा में न्यूज उपलब्ध कराना है।

जैसा कि मैंने पहले बताया कि ‘एबीपी देसम‘ का उद्देश्य युवा, आधुनिक और प्रगतिशील तेलुगु मानसिकता को आकर्षित करना है। हम तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों के कोने-कोने से विशुद्ध स्थानीय न्यूज को कवर करने पर फोकस कर रहे हैं। हम व्यापक न्यूज पैकेज देते हैं, जिसमें स्थानीय मुद्दों से लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरें और विभिन्न जॉनर्स जैसे-खेल, मनोरंजन, राजनीति व अर्थव्यवस्था की खबरें शामिल होती हैं। कंटेंट की गुणवत्ता और विश्वसनीयता के साथ-साथ हमने यूजर एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाने पर भी फोकस किया है।

‘एबीपी नाडु’ के बाद अब आपने दक्षिण मार्केट पोर्टफोलियो में ‘एबीपी देसम’ को शामिल किया है। इस मार्केट को लेकर आपका अगला बड़ा प्लान क्या है?

हम वर्तमान में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मार्केट्स में लगातार विकास सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। दक्षिण के मार्केट में विस्तार करने की फिलहाल हमारी और कोई योजना नहीं है।

इनमें से आपकी अधिकांश पेशकश डिजिटल को लेकर क्यों हैं?  क्या समानांतर न्यूज चैनल्स चलाने की भी कोई योजना है?

कोविड के दौर में, हर तरह से डिजिटल मीडिया ने अपनी क्षमता दिखाई है। कोविड के सामने आने से पहले ही डिजिटल आगे बढ़ रहा था। महामारी के कारण जब लॉकडाउन लगाया गया तो डिजिटल मीडिया की ग्रोथ में और तेजी आ गई। इसके साथ ही यदि हम दक्षिण के मार्केट की बात करें तो यहां इंटरनेट की पहुंच काफी ज्यादा है। जिसने डिजिटल की ओर बदलाव करने में काफी अहम भूमिका निभाई है।

हम वर्तमान में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में डिजिटल में अपना विस्तार करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं क्योंकि इन बाजारों में विकास की अपार संभावनाएं हैं। और यह अभी के लिए हमारी प्राथमिकता बनी हुई है।

इन प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापनदाताओं के प्रोफाइल के बारे में कुछ बताएं। ये आपके रेगुलर न्यूज चैनल एडवर्टाइजर्स से किस तरह समान अथवा अलग हैं? एक ब्रैंड के रूप में क्या आप अपने क्लाइंट्स को एकीकृत सौदे (integrated deals) की पेशकश कर रहे हैं?

इन प्लेटफार्म्स पर ब्रॉडकास्ट किए जाने वाले कंटेंट से सिर्फ कंटेंट अलग होता है। विज्ञापनदाताओं का प्रोफाइल कमोबेश एक जैसा ही है। बिल्कुल, हम अपने क्लाइंट्स को एकीकृत सौदे (integrated deals) की पेशकश कर रहे हैं। ये सौदे ब्रैंड्स के मीडिया प्लान को आगे बढ़ाने में काफी लाभकारी होते हैं। इसके साथ ही इस तरह के सौदे छोटे/नए विज्ञापनदाताओं को इस डर के बिना कि वे बड़े बजट का जोखिम उठा रहे हैं, धीरे-धीरे डिजिटल स्पेस में आने में मदद करते हैं।

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वर्तमान में मुझे न्यूज रूम में बौद्धिक विमर्श की कमी नजर आती है: विनोद अग्निहोत्री

‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री को मीडिया जगत में तीन दशकों से भी अधिक का अनुभव है। अपनी इस यात्रा के बारे में विनोद अग्निहोत्री ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है

Last Modified:
Tuesday, 24 August, 2021
Vinod Agnihotri

‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री को मीडिया जगत में तीन दशकों से भी अधिक का अनुभव है। उन्होंने 'नवभारत टाइम्स', 'अमर उजाला', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'इन टीवी', 'जी न्यूज' के मंच से देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास के सवालों को सशक्त ढंग से उठाया है। अपनी इस यात्रा के बारे में विनोद अग्निहोत्री ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताएं, क्या आप शुरू से ही पत्रकार बनना चाहते थे? पहली नौकरी कैसे मिली?

मेरा जन्म कानुपर के निकट एक गांव में हुआ और पालन कानपुर में हुआ है। मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे। मैंने राजनीति शास्त्र में एम.ए तक की पढ़ाई कानपुर से की है। मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं सिविल सेवा अधिकारी बनकर देश की सेवा करूं, लेकिन मेरा मन उधर नहीं था। शुरू से ही पढ़ना, लिखना, चिंतन, बौद्धिक विमर्श करना ये सब मुझे अच्छा लगता था, मुझे ऐसा लगता था कि मैं किसी बड़े कॉलेज में पढ़ाऊं। उसके बाद मैं ‘जेएनयू‘ दिल्ली आ गया और एमफिल की। स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में ‘चीन के सामाजिक और राजनीतिक अध्ययन‘ विषय को चुना।

उस समय तक तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं पत्रकार बन जाऊंगा। वैसे ‘दैनिक जागरण‘ से मेरा जुड़ाव था, मैं लेख भेज देता था और सब एडिटर का इम्तिहान भी पास किया था लेकिन मैं फिर दिल्ली आ गया था। उसी दौरान हॉस्टल में मेरे एक पड़ोसी थे, जिनका नाम गिरीश मिश्रा था। वो पीएचडी के साथ-साथ ‘एनबीटी‘ में नौकरी भी कर रहे थे और उन दिनों ‘टाइम्स ग्रुप‘ में जॉब करना बड़ी बात थी। अब हम दोनों गांधीवादी और समाजवादी थे तो अच्छी बनती थी,

एक बार मैंने उनसे कहा कि आपकी नौकरी बड़ी अच्छी है और ऐसी नौकरी मुझे मिल जाए तो मेरा काम हो जाए। उन्होंने मुझे प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित किया। कई जगह कोशिश की लेकिन कुछ खास हाथ आया नहीं। अब कुछ ऐसा हुआ कि ‘एनबीटी‘ में ही नौकरी निकली और मैं टेस्ट पास कर गया। इंटरव्यू लेने कई लोग बैठे हुए थे, जिनमें प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर जी भी थे। उन्होंने मेरा सीवी देखा और मुझसे विदेश नीति पर ही प्रश्न किए और जर्नलिज्म पर तो कुछ नहीं पूछा। एक हफ्ते बाद मिश्रा जी आए और मुझसे कहा कि लिस्ट निकलने वाली है और आपको इस नौकरी के लिए चयनित कर लिया गया है।

इसके बाद मुझे लखनऊ जाने को कहा गया, जिसमें मुझे कोई परेशानी नहीं थी लेकिन समस्या पढ़ाई की थी। जब मैंने मेरी नौकरी की बात प्रोफेसर दास को बताई तो वो बेहद खुश हुए और मिठाई खिलाई। समस्या बताने पर उन्होंने मुझसे कहा कि तुम अपने ऑफिस से चार-पांच दिन की छुट्टी लेकर आना और जो भी बाकी काम है, उसमें मैं तुम्हारी मदद कर दिया करूंगा। उसी दौरान मेरे पहले संपादक रामलाल जी भी बड़े सज्जन व्यक्ति थे। पूरा मामला जानने के बाद उन्होंने मुझे छुट्टी देने की हां कही और इस तरह से मेरी पहली नौकरी मुझे मिली और मेरी एमफिल भी पूरी हुई। 

पहली नौकरी मिलने का किस्सा तो दिलचस्प रहा, अब आगे की यात्रा के बारे में कुछ बताएं।

‘एनबीटी‘ में मैंने लगभग 14 साल तक काम किया है। लखनऊ के बाद मैं दिल्ली आया और बाद में मुझे फील्ड करेसपॉन्डेंट हेड बनाकर मेरठ भेजा गया। वो मेरी पहली फील्ड पोस्टिंग थी और रिपोर्टिंग भी मेरी वहीं से शुरू हुई। पूरे तीन साल तक मैंने काम किया और कई बड़ी घटनाओं को कवर किया, जिसमें टिकैत का आंदोलन और मेरठ, मुजफ्फरनगर के दंगे शामिल थे। उसके बाद नंदन जी ने ‘इन टीवी‘ शुरू किया था तो मैं उनसे जुड़ा और टीवी का वो मेरा पहला अनुभव रहा।

इसके बाद उदयन शर्मा जी मुझे ‘अमर उजाला‘ लेकर आए और मुझे दिल्ली की जिम्मेदारी दी। उसके बाद मैं ‘जी न्यूज‘ में चला गया और वहां काम किया। जब आलोक मेहता जी ‘आउटलुक‘ के संपादक हुए तो वो मुझे अपने साथ ले आए, वो यात्रा पांच साल तक चली। साल 2008 में जब ‘नई दुनिया‘ दिल्ली से निकला तो मुझे फिर वहां का राजनीतिक संपादक बना दिया गया था। इसके बाद एक साल तक ‘नेशनल दुनिया‘ भी रहा और साल 2013 में एक बार फिर ‘अमर उजाला‘ में मेरी वापसी हुई और बतौर सलाहकार संपादक मुझे बुलाया गया और यात्रा अभी भी जारी है।

जैसा कि आपने बताया कि आपने महान कहे जाने वाले संपादकों के साथ काम किया। आप उनके व्यक्तित्व के बारे में हमें कुछ बताइए।

राजेंद्र माथुर जी-मैं उन्हें इस फील्ड का हिमालय कहता हूं। न कोई पूर्वाग्रह, ना घमंड, नए लोगों को आगे करने की इच्छा शक्ति और अपनी आलोचना सहन करने की क्षमता। एक बार उनकी एक पत्रिका में आलोचना हुई तो उन्होंने न सिर्फ उसे नोटिस पर लगवा दिया, बल्कि यह भी लिख दिया कि सभी साथी पढ़ें। इसके अलावा लेखनी तो अद्भुत थी और सभी युवाओं को उनके लेख पढ़ने चाहिए।

एसपी सिंह जी -इन्होंने और राजेंद्र माथुर जी ने पीढ़ियां तैयार कीं और मुझे गर्व हुआ जब इनके साथ काम किया। सामाजिक सरोकारों को लेकर उनके जबरदस्त आग्रह थे। उनकी जो टीम थी, उसमें उन्होंने सबको स्थान दिया हुआ था। आरएसएस से लेकर वामपंथी तक सबको वो साथ लेकर चलने में सक्षम थे। 

उदयन जी-वो तो अपने सहयोगियों को दोस्त बनाकर चला करते थे। अपने साथियों के साथ हंसी-मजाक करना उनकी आदत थी। चूंकि वो मेरे पड़ोसी रहे तो एक तरह से हम दोनों सुबह साथ घूमने जाते थे। मीडिया, राजनीति और खबरों को लेकर उनकी समझ को तो मैं आज भी सलाम करता हूं। उनका तो बस यही कहना था कि एक रिपोर्टर सिपाही की तरह होता है। उन्होंने कई ऐसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग की है, जिनके बारे में वो कभी सोचकर नहीं जाते थे। जैसे ही उन्हें कोई खबर मिलती, रिपोर्टिंग करना शुरू कर देते।

नंदन जी-ये तो साहित्य और कविता के बड़े शौकीन थे। देखा जाए तो एक बेहतरीन इंसान मैं कहूंगा। जब मैंने उनके साथ काम किया तो मुझे उन्होंने कहा कि विनोद मैं तुम्हे अगाध स्नेह करता हूँ और विश्वास भी, तुम्हे काम करने की पूरी आजादी है। मैंने भी उनसे यही कहा कि इस स्नेह और विश्वास की मैं रक्षा करूंगा। मेरे और उनके संबंध सदैव पुत्रवत रहे। आनंद स्वरूप वर्मा ने उस समय नंदन जी को लेकर काफी तल्ख लिखा लेकिन उन्ही आनंद स्वरूप वर्मा को जब एक पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो उन्हीं नंदन जी ने कहा कि इस खबर को प्रमुखता से चलाया जाए ये बड़ी खबर है। ऐसा शालीन हृदय व्यक्ति आपको कहां मिलेगा?

आलोक मेहता जी-इन्होंने पहले मुझे ‘एनबीटी‘ में मौका दिया, फिर ‘आउटलुक‘ और उसके बाद ‘नई दुनिया‘ में मुझे लेकर आए। एसपी सिंह और माथुर जी ने मुझे जहां तक पहुंचाया, वहां से आलोक जी ने मुझे संवारा है और यहां तक लेकर आए। एसपी सिंह, उदयन जी, आलोक मेहता मुझे लगता है कि इनसे बेहतर खबरों की समझ शायद ही किसी को हो, आप जब उनके पास कोई न्यूज लेकर जाएंगे तो ये आगे क्या होगा वो आपको बता देंगे! आलोक जी को खाने और खिलाने का बड़ा शौक है। आलोक जी इतने बड़े इंसान हैं कि वो लेख लिखते थे तो उस लेख को मेरे पास भेज देते थे, मैं आश्चर्य करता था कि वो अपना लेख मेरे पास क्यों भेज रहे हैं, लेकिन वो हमेशा मुझसे कहते थे कि एक बार तुम देख लो! कुछ एडिट करना हो तो बता देना।

रामपाल सिंह जी-ये मेरे पहले संपादक रहे, जब मैं लखनऊ गया तो उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम रहोगे किधर? मैनें कहा की सर अभी तो कोई व्यवस्था नहीं है। वो बोले कि कोई बात नहीं, मैं इंतजाम करता हूं और उन्होंने मेरा दस दिनों का रहने का इंतजाम करवाया और उसके बाद फिर मैंने अपने रहने की व्यवस्था की। आज के समय में किसको इतनी चिंता रहती है? उन्होंने मुझे डेस्क से रिपोर्टिंग करवाई और मेरे इंटरव्यू खूब छापे।

आपने कहा कि आप एसपी सिंह को या आलोक मेहता जी को भाईसाहब कहकर बुलाते थे, क्या वर्तमान में ऐसा संभव है? क्या बदलाव आप देखते हैं?

देखिए, कम से कम मीडिया के पेशे में तो मुझे किसी को ‘सर‘ बोलना अच्छा नहीं लगता है। मुझे लगता है कि ये हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। आज के समय में न्यूज रूम की संस्कृति बदल गई है। कॉरपोरेट कल्चर कहीं न कहीं दिखाई देता है। वर्तमान में एक बौद्धिक विमर्श की कमी मुझे न्यूज रूम में नजर आती है। दूसरा, आज हर पद में एडिटर लग गया है, एक समय था कि जब एडिटर एक ही होता था लेकिन आज तरक्की बड़े कम समय में मिल जाती है।

इसके अलावा पीढ़ी दर पीढ़ी जो ज्ञान स्थानांतरित होता था, अब उसकी कमी दिखाई देती है। आज के युवा के लिए तो बस ये ये सरकारी नौकरी की तरह हो गया है, वो काम करता है और जब उसके जाने का समय होता है तो वो ऑफिस में आकर कहता है कि नमस्ते सर, मैं जा रहा हूं। जब इस प्रकार का माहौल बन जाएगा तो कैसे आप अपने ज्ञान और बुद्धि का विकास कर पाएंगे? वर्तमान में संपादक तो एक मैनेजर हो गया है, पहले जो संपादक थे वो न सिर्फ अपने आप में ज्ञान का खजाना थे, बल्कि समाज में भी उनका पूर्ण सम्मान होता था।

समाचार4मीडिया के साथ विनोद अग्निहोत्री की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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जब तक कंटेंट लिखने का तरीका नहीं बदलेगा, पाठकों के दिल को नहीं छू सकते: अजय उपाध्याय

पत्रकारिता के क्षेत्र में कई दशकों से सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार अजय उपाध्याय ने अपने जीवन की इस यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 18 August, 2021
Last Modified:
Wednesday, 18 August, 2021
Ajay Upadhyay

वरिष्ठ पत्रकार अजय उपाध्याय ने अपने जीवन में हमेशा अपनी शर्तों के साथ काम किया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में कई दशकों से सक्रिय अजय उपाध्याय को प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों का लंबा अनुभव है। उन्होंने अपने जीवन की इस यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के मुख्य अंश-

अपने शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताइए। मीडिया और समाचार पत्रों में रुचि कैसे पनपी?

मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर था। दरअसल, समाचार पत्रों में तो रुचि हमेशा से ही थी। पढ़ाई के दौरान ही ये चीज समझ आ गई थी कि मुझे तो मीडिया की दुनिया में ही जाना है। मैं उस वक्त अपनी नौकरी छोड़कर बनारस में चला गया था और सोचा कि अब कोई काम देखा जाएगा। उस समय काशी के साहित्यकार मनु शर्मा जी ने ‘आज‘ अखबार के संपादक शार्दुल विक्रम गुप्ता जी के पास मुझे भेजा था। वो मेरी पहली नौकरी थी। उस समय उस अखबार में काम करके बहुत कुछ सीखने को मिला, लेकिन एक समय बाद मुझे काशी की पत्रकारिता में एक ठहराव सा दिखाई दिया तो मैंने दिल्ली जाने का निर्णय किया। हालांकि यहां कुछ तकलीफ झेलनी पड़ी, लेकिन एक समय के बाद अच्छा काम मिला।

जैसा कि आपने बताया कि आप दिल्ली आ गए थे तो उसके बाद दिल्ली में आपको सबसे पहली नौकरी कैसे मिली और उसके बाद के अनुभव बताएं।

जैसा कि मैंने आपको कहा कि शुरू में कुछ तकलीफ हुई। एक सज्जन के साथ हमारी बात हुई थी कि वो मुझे एक ग्रुप जॉइन करवाने वाले हैं, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं तो साल भर बड़ी कठिनाई से गुजरा, लेकिन मैं तय करके आया था कि दिल्ली से वापस नहीं जाऊंगा। उसी दौरान डालमिया समूह द्वारा ‘संडे मेल‘ निकलता था तो मैंने वहां काम करना शुरू कर दिया था। उसके बाद मेरी यात्रा ठीक रही। इसके बाद मुझे ‘माया‘ पत्रिका में भी काम करने का मौका मिला और उसके बाद मुझे ‘दैनिक जागरण‘ का राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख बना दिया गया। ‘नवभारत‘ जब मुंबई में लॉन्च हुआ तो मैं उसका पहला संपादक था। मुझे ‘आजतक‘ में भी काम करने का मौका मिला और फिर मैं ‘हिंदुस्तान‘ चला गया।

वर्तमान समय और 90 के दशक की जब आप तुलना करते हैं तो क्या आपको लगता है कि उस समय काम करना अधिक कठिन था?

मेरा मानना है कि इस प्रकार की तुलना ठीक नहीं है। दरअसल, समय कैसा भी हो, चुनौती बनी रहती है। हम ये कभी भी नहीं कह सकते हैं कि उस समय के लोग काम नहीं किया करते थे या काम का बोझ आज नहीं है। काम तो हमेशा रहता है और जो इस चुनौती का डटकर सामना करता है, वो सफल होता है। मानव सभ्यता में ऐसी कई घटनाएं हैं, जिन्होंने मनुष्य को डरा दिया लेकिन उनका सामना डटकर किया गया। जब मैं ‘हिंदुस्तान‘ में था मैंने वहां भी मल्टीएडीशन न्यूज पेपर का प्रयोग किया। इसके अलावा पटना, दिल्ली और भागलपुर जैसी जगह में हमने अखबार को रिलॉन्च किया।

आप ‘हिंदुस्तान‘ के संपादक रहे। उन दिनों की क्या कोई ऐसी घटना याद आती है, जिसका प्रभाव कई दिनों तक जहन पर रहा हो?

मुझे ऐसा लगता है कि अमेरिका में 9/11 का हमला एक ऐतिहासिक घटना थी। उस समय किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक हवाई जहाज से भी आतंकी हमला करवाया जा सकता है। वो अपने आप में एक अलग तरह की घटना थी और देखा जाए तो उस घटना ने दुनिया को बताया कि कैसे तकनीक पर मानव की निर्भरता उस पर खतरा बनकर भी वापस आ सकती है। ये सोचा नहीं जा सकता था कि एक देश के प्रेजिडेंट को कुछ दिनों के लिए गायब ही कर दिया जाए।

वर्तमान समय में क्या आपको ऐसा लगता है कि पाठक सिर्फ अब लेख पढ़ने भर तक ही सीमित रह गया है और उसका बौद्धिक विकास नहीं हो रहा है?

देखिए, आम आदमी की भागीदारी से किसी भी समाचार पत्र की लोकप्रियता में इजाफा होता है और उसके हिसाब से बदलाव होने चाहिए लेकिन मैं आज भी ये मानता हूं कि बेस्ट कंटेंट वही है जो पाठक के दिलो दिमाग पर सवार होता है, उसके मन में जगह बना लेता है और उसको प्रभावित करता है। इस प्रकार के कंटेंट की रचना करने के लिए मनुष्य का अत्यंत बुद्धिमान होना जरूरी है। कई ऐसे समाचार पत्र थे जो 50 से अधिक पेज तक चले गए थे, लेकिन एक समय के बाद उन्हें भी संख्या कम करनी पड़ी है। पिछले 50 साल के इतिहास को आप अगर देखे तो कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन पर अधिक काम नहीं कर पाए। आज भी सरकारी योजनाओं पर पेज नहीं हैं, स्वास्थ्य पर अच्छे लेख नहीं हैं। कोरोना काल में हम सबने इस कमी को महसूस किया है। रोजगार एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर आज भी बहुत कम पढ़ने को मिलता है। रिसर्च करने का मतलब किसी अखबार को पढ़कर कुछ लिखने भर तक सीमित नहीं है, वो बुद्धि से जुड़ा है।

क्या वर्तमान में ग्राउंड रिपोर्टिंग की कमी महसूस होती है? क्या आपको ऐसा लगता है कि मीडिया राजनीति और ग्लैमर में खो गया है?

आज की पत्रकारिता में ऐसे कई काम हैं जो बड़े अच्छे हैं। हम जब काम करते थे तो कई काम अधूरे रह जाते थे लेकिन आज वो काम पूरे हैं। जैसे कि अगर उस वक्त कहीं कोई आग लग जाती थी तो हमें घटनाक्रम के लिए किसी और पर निर्भर होना पड़ता था क्योंकि उतनी तेजी से हमारे पास सूचना आना असंभव थी, लेकिन आज ऐसा नहीं है। वर्तमान में कहीं भी हो रही घटना का विश्लेषण आप मिनटों में कर सकने में कामयाब हुए हैं। हमारे समय में रिपोर्टर ग्राउंड पर जाता था और सुविधाओं के अभाव के बाद भी जो स्टोरी फाइल करता था और उसमें जो कथानक होता था, मैं उसे याद करता हूं। आज के समय में किसी भी घटना को समझाने के लिए जो कथानक है, वो ठीक नहीं है। कथा एक अलग चीज है और उसे कथानक में कहना एक अलग चीज, उसे इस प्रकार से कहना कि वो पाठक के दिल में घर कर जाए, उसकी कमी आज मैं महसूस करता हूँ। जब तक कंटेंट लिखने का तरीका नहीं बदलता, तब तक पाठक के दिल को छू नहीं सकते।

क्या आपको कभी ऐसा कोई किस्सा याद आता है, जिसे आप भूलते नहीं हैं?

जी बिल्कुल, दरअसल एक सैटेलाइट का लॉन्च था। पीएम के साथ हम सबको इसरो सेंटर जाना था और दोपहर को हम सब पुडुचेरि पहुंच गए। मुझे मेरे कुछ साथियों ने कहा कि अब प्रेसवार्ता है और हमें लगता है कि हमारे तमिल साथी कुछ उनके राज्य के बारे में सवाल करेंगे तो इधर अभी रुकने का कोई फायदा नहीं है लेकिन मैं रुका रहा। मेरे मन में कारगिल को लेकर कुछ सवाल थे। दरअसल, हमारा जम्मू का आदमी रोज घुसपैठ की खबर भेज रहा था और मैंने उसी पर सवाल किया। उन्होंने जवाब दिया की ये गंभीर घटना है और देश कड़ी कार्यवाही करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। उन्होंने हवाई हमले करने तक की बात उस प्रेस वार्ता में मेरे सवाल के जवाब में कहीं। उसके बाद अगले दिन जैसे ही हम श्रीहरिकोटा उस रॉकेट लॉन्च की कवरेज के लिए उतरे, हमें खबर मिलती है कि कारगिल में भारत ने घुसपैठियों पर हवाई हमले कर दिए हैं। ये घटना बड़ी रोचक है और इसलिए आपसे इसका जिक्र मैंने किया। नमस्कार।

समाचार4मीडिया के साथ अजय उपाध्याय की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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प्रो. सुरभि दहिया से जानें, प्रादेशिक भाषाओं के बीच कैसा है इंग्लिश जर्नलिज्म का भविष्य

प्रोफेसर सुरभि दहिया ने समाचार4मीडिया से बातचीत में अपने जीवन, परिवार और आने वाली किताब को लेकर चर्चा की है।

Last Modified:
Friday, 13 August, 2021
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देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) की प्रोफेसर  सुरभि दहिया यहां अंग्रेजी पत्रकारिता विभाग की डायरेक्टर हैं। इस पद तक पहुंचने के लिए उन्होंने न सिर्फ संघर्ष किया बल्कि अथक प्रयासों से सफल भी हुईं। डॉक्टर सुरभि एक लेखक भी हैं। समाचार4मीडिया से बातचीत में उन्होंने अपने जीवन, परिवार और आने वाली किताब को लेकर चर्चा की है।

अपने शुरुआती जीवन के बारे में कुछ बताएं। मीडिया और उसके बाद शिक्षा के क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

मेरा जन्म लुधियाना के एक साधारण परिवार में हुआ है। पिता बैंक में सीनियर अधिकारी रह चुके हैं और मां शिक्षिका। मेरा एक छोटा भाई है, जो अपना खुद का बिजनेस करता है। पिता के बार-बार तबादले के कारण मेरा अलग 2 जगह पढ़ना हुआ और कई लोगों से बहुत कुछ सीखने को भी मिला जिसे मैं अपने लिए अच्छा मानती हूं।

लुधियाना, शिमला, चंडीगढ़, ऊना और हिसार जैसी जगह पर मैनें पढ़ाई की है। मीडिया में मुझे बचपन से ही रुचि थी और जब मैं दसवीं कक्षा में थी, तो मेरी इंग्लिश की टीचर ने मुझसे कहा कि तुम बड़ी होकर एंकर बनना। तभी से मुझे समझ आ गया था कि मुझे जर्नलिज्म पढ़ना है।

आपने बीएससी, एमएससी के बाद कहां काम किया? उस यात्रा के बारे में बताएं?

मैंने अपनी एमएससी करने के बाद इंटर्नशिप के लिए ‘द ट्रिब्यून’ (The Tribune) को चुना, जोकि चंडीगढ़ मीडिया में जाना पहचाना नाम है। इसके बाद मेरे काम से प्रभावित होकर उन्होंने मुझे एक फुल टाइम नौकरी दे दी। इसके बाद मैनें लगभग दो साल तक वहां काम किया। इस दौरान मैनें शिक्षा, कृषि जैसे मुद्दों को बड़ी नजदीकी और बारीकी से समझा। मेरी 500 से अधिक स्टोरी वहां पब्लिश हुई। बीच में मेरा रुझान खोजी पत्रकारिता की ओर भी आया और मैनें कई घोटाले भी उजागर किए।

आपने अपनी पीएचडी भी मीडिया मैनेजमेंट पर की है। उस अनुभव के बारे में हमारे दर्शकों को कुछ बताएं?

बिल्कुल, मैंने अपनी पीएचडी मीडिया मैनेजमेंट में हिसार से की है और मीडिया इंडस्ट्री में मेरी हमेशा से रुचि रही है। हमेशा से मेरी इसमें गहराइयों से अध्ययन करने की इच्छा रही है और आगे भी करती रहूंगी। साल 2015 से ही मैं भारत के मीडिया घरानों पर कुछ लिखना चाह रही थी और साल 2017 में शिकागो में एक कॉन्फ्रेंस थी और उसमें इसी प्रकार की एक बुक का लॉन्च हुई थी। वहीं से मेरे मन की इच्छा और मजबूत हो गई और उसी का परिणाम है कि ‘जी ग्रुप’ के ऊपर लिखी हुई मेरी पहली किताब मार्केट में आ गई है। इसके अलावा अलग-अलग मीडिया घरानों की कार्यप्रणाली को लेकर भी मेरी एक 800 पेज की किताब जल्द बाजार में उपलब्ध होने वाली है। 

आपने अपने इस कामयाबी के सफर में दिल्ली यूनिवर्सिटी के साथ भी लंबे समय तक काम किया है। इसके बारे में कुछ बताएं?

देखिए, बड़ा रोचक किस्सा है। मैं आपको बताऊं कि जीवन की ये यात्रा हर किसी के लिए आसान नहीं होती है। अगर आप सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ रहे है तो कई चीजें आसान हो जाती है। इंसान को हर दिन जीवन को बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए। दरअसल जब साल 2001 में मेरी शादी हुई, तो मुझे लगा कि क्यों न अब एक नई यात्रा शुरू की जाए। मैं साल 2003 से मीडिया शिक्षा में आई और साल 2006 तक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाया। साल 2006 तक वो यात्रा जारी रही और उसी साल दिल्ली यूनिवर्सिटी के फॉर्म निकले थे। जिस दिन मैं उस फॉर्म को देने गई संयोग से उस दिन अंतिम तिथि थी। उस दिन गॉर्ड मुझे कुछ कारणों से अंदर नहीं जाने दे रहा था और आखिरकार उसी गॉर्ड पर विश्वास करके मैनें उसे अपना फॉर्म दे दिया। 20 नवंबर को मेरा जन्मदिन था और उसी दिन मुझे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। 9 लोग पैनल में थे और आखिरकार कई सवालों के बाद मुझे उन्होंने फाइनल किया और इस प्रकार एक प्रोफेसर के तौर पर मेरी यात्रा शुरू हुई। साल 2006 से साल 2014 तक मैनें वहां काम किया और वह मेरा बहुत अच्छा अनुभव था।

दिल्ली यूनिवर्सिटी से आप आईआईएमसी आईं और यहां आप कोर्स डायरेक्टर बनाई गईं। इस यात्रा के बारे में कुछ बताएं?

दरअसल, मेरा आठ साल का अनुभव हो गया था और मैं सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर थीं। जब मैंने आवेदन किया तो उस समय मेरे पास फील्ड का भी अनुभव था और आठ साल पढ़ाने का भी अनुभव था और आईआईएमसी शायद ऐसे ही किसी उम्मीदवार की तलाश में था, तो मुझे चुना गया।

जुलाई 2014 में मेरी यात्रा शुरू हुई और आज भी जारी है। मैनें देखा कि यहां का माहौल डीयू से अलग था और यहां सीखने के लिए कई अलग चीजें थीं। शुरू के 3 साल तक मैं एसोसिएट प्रोफेसर रही, फिर प्रोफेसर और बाद में मुझे कोर्स डायरेक्टर बना दिया गया। 

वर्तमान में हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं में दर्शक बढ़ रहे हैं, ऐसे में इंग्लिश जर्नलिज्म का क्या भविष्य देखती हैं?

देखिए, और भाषाओं में दर्शक तो बढ़ रहे हैं, लेकिन हम भी उसी हिसाब से अपने कोर्स में बदलाव भी कर रहे हैं। हम भी अपने छात्रों और उनके भविष्य को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रहे हैं। हमारा ध्यान सिर्फ प्रिंट पर ही नहीं है, बल्कि हम हर उस दिशा में काम कर रहे हैं, जिससे छात्र हर फील्ड में गुणी हों। हमनें यह भी तय किया है कि रिपोर्टिंग की ट्रेनिंग देते समय बच्चे को हर बीट पर काम करने का हुनर हो। इसके लिए हम समय-समय पर तमाम संस्थाओं के साथ मिलकर ट्रेनिंग भी देते हैं।  

इसके अलावा ‘यूनिसेफ’ जैसी संस्था के साथ मिलकर भी हम काम कर रहे हैं। इसके अलावा मोबाइल जर्नलिज्म के बाद हमनें ड्रोन जर्नलिज्म पर भी काम करना शुरू कर दिया है। अगर आप पूरे कोर्स को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि आने वाले समय को ध्यान में रखकर ही हम आगे बढ़ रहे हैं।

आप एक लेखिका भी हैं और आपकी नई किताब ‘The House That Zee Built’ को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। किताब लिखने का विचार कैसे आया?

देखिए, शुरू में मेरा विचार 14 मीडिया संस्थानों के बारे में लिखने का था, जिनमें प्रिंट से लेकर टीवी तक शामिल थे। लेकिन जब मैनें उसे लिखना शुरू किया तो समझ आया कि ये तो बड़ा मुश्किल और बड़ा हो रहा है। इसी बीच 3 साल गुजर गए और इसके अलावा जब आप किसी मीडिया घराने के बारे में कुछ लिख रहे हैं तो आपको एक-एक फैक्ट्स देखने होते हैं।

एक मीडिया हाउस तो ऐसा था जिसमें 100 पन्नों का फैक्ट चेक होने में काफी समय लगा। उस समय मुझे अहसास हुआ कि इतने मीडिया घरानों पर आप एक किताब में नहीं लिख सकते हैं। इसी के बाद मैनें निर्णय लिया कि मैं सबसे पहले ‘Zee ग्रुप’ के बारे में लिखूंगी और इस तरह से इस किताब की रूपरेखा बनी।

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जीवन में बहुत काम कर लिया, अब मन की इच्छाएं पूरी करने का समय है: आलोक जोशी

‘नेटवर्क18’ के बिजनेस न्यूज चैनल ‘सीएनबीसी’ आवाज के संपादक रहे और वरिष्ठ पत्रकार आलोक जोशी ने अपने कामयाबी के सफर पर समाचार4मीडिया के साथ विस्तार से बातचीत की।

Last Modified:
Tuesday, 10 August, 2021
Alok Joshi

‘नेटवर्क18’ के बिजनेस न्यूज चैनल ‘सीएनबीसी’ आवाज के संपादक रहे और वरिष्ठ पत्रकार आलोक जोशी ने अपने कामयाबी के सफर पर समाचार4मीडिया के साथ विस्तार से बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने अपनी पढ़ाई, नौकरी और तमाम चीजों पर खुलकर चर्चा की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

अपने प्रारंभिक जीवन यात्रा के बारे में कुछ बताएं। पत्रकार कैसे बन गए?

मेरा जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में हुआ है। उस समय वह यूपी का हिस्सा हुआ करता था। पिता की नौकरी के कारण जगह बदलती रहती थी तो इसी नाते बचपन में ही वह जगह छूट गई। जीवन का एक हिस्सा लखनऊ में भी बीता, जिसकी झलक आज भी मेरे व्यक्तित्व में दिखाई देती है। बात अगर पत्रकार बनने की होगी तो मुझे आज भी याद है कि मैं क्या बनूंगा, ये मुझे नहीं पता था लेकिन क्या नहीं बनूंगा, ये जानता था।

सरकारी नौकरी करने की इच्छा नहीं थी, कुछ दोस्तों के साथ लखनऊ में ही विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ करता था और आप देखिए कि उस समूह के कुछ मित्र तो आज संपादक जैसे बड़े पदों पर कार्य कर रहे हैं।

जनवरी 1985 आते-आते मैं अखबारों में लिखने लगा था। ‘अमृत प्रभात‘ नाम के उस अखबार में मैंने इतना लिखा कि मुझे वर्ष 1987 में उसी अखबार में नौकरी मिल गई। इसका अलावा सैलरी से अधिक तो मैं लेख लिखकर ही कमा लेता था।

मुझे अपने पहले बॉस राम सागर जी से बहुत कुछ सीखने को मिला। इसके बाद ‘नवभारत टाइम्स‘ में भी काम किया लेकिन गलत बात ये हुई कि दोनों अखबार तीन साल से कम के अंतराल में ही बंद हो गए।

एक तरह से मैं कई बार ये भी कहता हूं कि निराशा का स्वाद मैंने करियर के शुरुआती दिनों में ही चख लिया था। इसके बाद मैंने कुछ समय फिर लखनऊ ‘दैनिक जागरण‘ में काम किया था। उस समय विनोद शुक्ला जी के बारे में काफी गलत बातें कही जाती थीं, लेकिन उनके साथ मैंने ये सीखा कि अखबार आखिर चलता कैसे है। 

लखनऊ में फिर अधिक मन लगा नहीं तो सोचा कि दिल्ली चलें, एक मशहूर पत्रकार से बात हुई थी कि वह नौकरी दिला रहे हैं, लेकिन वह मुकर गए। उसी दौरान ‘आजतक‘ शुरू हो रहा था और एसपी सिंह बस जुड़ने ही वाले थे। अब एसपी नवभारत के संपादक रहे और लखनऊ में राम कृपाल जी मेरे संपादक रहे तो उस नाते मैं उनसे मिलने गया था।

उन्होंने जो जगह मुझे बताई, वहां कोई बात नहीं बनी तो आखिरकार उन्होंने ही मुझे ‘आजतक‘ में तीन महीने ट्रायल पर रख लिया। हम जितने भी प्रिंट के लोग थे, उन्हें शुरू में दिक्कत तो आई, लेकिन धीरे-धीरे हमने काम सीखा। इसके बाद एक दिन एसपी सिंह ने मुझे बिजनेस की खबरें करने को बोला और इस तरह मैं बिजनेस रिपोर्टर बन गया।

मैं आपको यहां एक चीज बताना चाहूंगा कि एसपी सिंह ने स्वयं को हिंदी पत्रकारिता में इतना स्थापित किया हुआ था कि हम सब उन्हें ‘महामानव‘ के तौर पर देखते थे।

जब उनके साथ काम किया तो महसूस हुआ कि वह अपने साथ काम करने वाले लोगों से कितना स्नेह करते थे। आप अगर उनके किसी लेख में कोई बदलाव करवाना चाहते थे तो वह सहर्ष उस बदलाव को स्वीकार करते थे। नियति ने बड़ी जल्दी उन्हें हमसे छीन लिया, लेकिन वह हमेशा कहते थे कि काम चलता रहे।

आपने ‘बीबीसी‘ और उसके बाद ‘सीएनबीसी‘ के साथ भी काम किया। उस यात्रा के बारे में बताएं।

‘बीबीसी‘ के साथ मैं साल 2000 में जुड़ा था। उस समय उदय शंकर जो कि ‘आजतक‘ के हेड हुए नहीं थे लेकिन होने वाले थे तो उन्होंने मुझसे पूछा कि ‘आजतक‘ को छोड़कर रेडियो में जाना कोई समझदारी का काम है?

वैसे मेरी नियुक्ति वेबसाइट के लिए हुई थी, लेकिन मेरा मन तो दुनिया घूमने का था। अब उस तीन साल के अनुबंध के तहत घूमने वाले लोग तो बहुत घूमे, लेकिन मैं जितना घूमना चाहता था, उतना घूम ही नहीं पाया।

जब आने का मन हुआ तो मेरे पुराने मित्र संजय पुगलिया ने मुझे ‘सीएनबीसी‘ में काम करने का ऑफर दिया था। उनसे बात करने के बाद मैंने ‘बीबीसी‘ को छोड़ दिया। इसके बाद का किस्सा बड़ा रोचक है। दरअसल, मैं जब अपने परिवार के साथ मुंबई आया तो मैंने अपने आप को खूब लानतें भेजीं।

मैंने अपने प्रिय मित्र संजय से कहा कि अगर आप मुझे पहले काम के सिलसिले में या इंटरव्यू के कारण मुंबई बुला लेते तो मैं उस समय ही आपको विनम्रता पूर्वक मना कर देता। उस समय मुंबई बड़ी गंदी थी, लेकिन आज मैं बदलाव देख रहा हूं। खैर उसके बाद काम शुरू हुआ, एक यात्रा शुरू हुई और वो पूरे 16 साल तक चली और काम करने में बड़ा मजा आया।

आपके शो ‘आवाज अड्डा‘ को बड़ी लोकप्रियता हासिल हुई। आपने उस शो के लिए अवॉर्ड भी जीता। उस शो की रूपरेखा कैसे बनी?

उस शो की शुरुआत का क्रेडिट हमारे मित्र और मशहूर एंकर अमिश देवगन को जाता है। दरअसल, हुआ ऐसा कि वह उस समय ‘जी बिजनेस‘ के संपादक हुआ करते थे और रात को आठ बजे उन्होंने एक डिबेट शो शुरू कर दिया था।

अब उस शो के कारण हमारी टीआरपी कम होने लगी। लोग ‘जी बिजनेस‘ को अधिक देखने लगे। इसके बाद उस वक्त तत्कालीन संपादक संजय पुगलिया ने टीम के साथ चर्चा करके ये निर्णय लिया कि अब हमें भी ऐसा एक डिबेट शो करना होगा।

उस समय इस शो को शुरू में संजय और तमन्ना किया करते थे। इसके बाद एक समय ऐसा आया कि संजय ने अपने आप को इस शो से अलग कर लिया। इसके बाद तमन्ना ने इस शो को आगे बढ़ाया। इसके बाद इन दोनों ने नौकरी छोड़ दी और एक बार फिर ये संकट आ खड़ा हुआ कि कौन शो करेगा?

उस समय मेरे दिमाग में एक आइडिया आया कि अगर लोगों को एक ऐसा शो देखने को मिले, जिसमें वो सबकी बात बड़ी आसानी और सरलता से सुनें तो कैसा रहे? ये आइडिया मैंने अपने सहयोगी धर्मेंद्र जी के साथ साझा किया। उसके बाद तय हुआ कि ये शो हम करेंगे और इसकी एंकरिंग भी मैं करूंगा।

मैंने अपने शो में कोई शोर शराबा नहीं होने दिया, शुरू में सबके बोलने का समय फिक्स किया जो कि 90 सेकंड का था और जितना हो सके विषय के जानकारों को आमंत्रित किया। मुझे इस बात का आज भी फख्र है कि हमने न सिर्फ अच्छा काम किया बल्कि दर्शकों के भरोसे और विश्वास को भी बनाए रखा।

इसका परिमाण यह हुआ कि न सिर्फ उस शो को अच्छी रेटिंग मिली बल्कि बाकी कई एंकर ने उस कांसेप्ट को फॉलो किया। ‘सीएनबीसी आवाज‘ ने ‘आवाज अड्डा‘ के लिए ‘इनबा‘ (ENBA) अवार्ड भी अपने नाम किया है। 

वर्तमान में हम देख रहे हैं कि आप अपने खुद के डिजिटल चैनल पर काम कर रहे हैं, वहीं ‘सत्य हिंदी‘ के लिए भी लेख लिख रहे हैं। भविष्य के क्या प्लान हैं?

ईमानदारी से कहूं तो मुझे अब बहुत कुछ करना नहीं है। कोई मित्र लोग पैनल में बुला लेते हैं तो चला जाता हूं, लेकिन आम तौर पर कम ही दिखाई देता हूं। इसके अलावा अब जीवन में बहुत कुछ काम कर लिया है, अब मन की इच्छाएं पूरी करने का समय है। अब पहाड़ों में जाकर एक कॉटेज बनवाना चाहता हूं।

जब मैं पांच साल का था तो पौड़ी गढ़वाल छूट गया था तो एक बार फिर वापसी की उम्मीद दिखाई दे रही है। ‘सत्य हिंदी‘ एक बड़ा प्लेटफार्म है और वहां मेरा एक शो होता है और उसमें अपना एक मजा है। इसके अलावा बहुत कम संभावना है कि कोई किताब लिखने की योजना बने। कभी सोचा नहीं था, लेकिन कुछ सालों से सोच रहा हूं।

अब देखिए बच्चे भी अपने आजाद हैं और वो भी अपना-अपना काम कर ही रहे हैं तो अब हमें मौके मिले हुए हैं घूमने फिरने के तो अब बस उसका लुत्फ लिया जाए। नमस्कार।

समाचार4मीडिया के साथ आलोक जोशी की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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मालिक ईमानदार है, तो वह नहीं चाहेगा कि उसका अखबार किसी की ओर झुका दिखाई दे: राम कृपाल सिंह

राम कृपाल सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। इन्होंने 40 साल से भी अधिक का समय मीडिया को दिया है। वहीं ‘टाइम्स ग्रुप’ के साथ इन्होंने करीब 24 साल काम किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 05 August, 2021
Last Modified:
Thursday, 05 August, 2021
Ram Kripal Singh

राम कृपाल सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। इन्होंने 40 साल से भी अधिक का समय मीडिया को दिया है। वहीं ‘टाइम्स ग्रुप’ के साथ इन्होंने करीब 24 साल काम किया है। समाचार4 मीडिया से खास बातचीत में राम कृपाल सिंह ने न सिर्फ अपनी जीवन यात्रा को साझा किया बल्कि वर्तमान मीडिया पर भी खुलकर अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आप तो कानून की पढ़ाई कर रहे थे, फिर पत्रकार कैसे बन गए?

मैं ‘बीएचयू‘ से कानून की पढ़ाई कर रहा था और मेरी इच्छा न्यायपालिका में ही जाने की थी। वर्तमान में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश राय जी और मैं साथ ही पढ़ा करते थे। जेपी आंदोलन के समय मैं और हरिवंश जी दोनों एक साथ उससे जुड़े हुए थे। हरिवंश जी ने ही मुझसे कहा कि एक पत्रकार का कोर्स होता है और आपको वो करना चाहिए।

मैंने उनकी बात मानी और कोर्स पूरा होने के बाद मुझे ‘आज‘ अखबार के चंद्रकांत जी ने बुलाया। उन्होंने मुझे वहां काम करने का ऑफर दिया और मैंने तकरीबन छह महीने वहां काम किया। इसके बाद मुझे ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ से जुड़ने का मौका मिला और वर्ष 1978 में मुझे मुंबई जाने का मौका मिला और इसी के साथ ‘टाइम्स ग्रुप‘ के साथ मेरा रिश्ता शुरू हुआ।

आपने जिस दौर में अपना काम शुरू किया वो एक राजनीतिक अस्थिरता का दौर था, कुछ उस दौर के बारे में बताए।

गुजरात के एक कॉलेज की कैंटीन का बिल बढ़ा दिया गया था और इसके बाद वहां एक असंतोष पैदा हुआ। फिर वो लोग जेपी से मिले और उन्होंने भी छात्रों का समर्थन किया। हरिवंश जी ने ही कोशिश करके जेपी को ‘राजा राम मोहन राय‘ हॉस्टल में बुलाया था। देखते ही देखते वो आंदोलन ‘चिमन भाई पटेल हटाओ‘ से ‘अब्दुल गफूर हटाओ‘ तक जा पहुंचा था।

उसी दौर में मेरे पत्रकार जीवन की शुरुआत हो रही थी। इसके बाद जैसा कि मैंने आपको बताया कि मैं मुंबई गया, लेकिन मैं लखनऊ आना चाहता था। उस समय तक राजेंद्र माथुर जी ‘नवभारत टाइम्स‘ जॉइन कर चुके थे और 1980 के शुरुआती समय में मैं लखनऊ ‘नवभारत टाइम्स‘ चला आया।

इसके बाद इंदिरा गांधी जी की हत्या हुई और बाद में राजीव गांधी जी को पीएम बना दिया गया। उस दौर की लगभग सभी घटनाओं को  मैंने कवर किया है। उसी दौर में संतोष भारतीय जी मेरे पास आए और ‘रविवार‘ में काम करने का ऑफर वो लाए थे। उस समय नकवी जी और मैं साथ ही रहते थे और हम दोनों फिर ‘रविवार‘ में चले गए।

मैं उस समय सहायक संपादक और नकवी जी बतौर समाचार संपादक ‘रविवार‘ से जुड़े और 1985 के आसपास वो समय था, जब हम ‘चौथी दुनिया‘ नाम के अखबार से जुड़ गए। एक समय के बाद वापस लखनऊ जाने का मौका मिला, क्योंकि एसपी सिंह और राजेंद्र माथुर चाहते थे कि मैं वापस ‘नवभारत टाइम्स‘ में आ जाऊं और मैं और नकवी जी एक बार फिर लखनऊ की ओर चल दिए।

इसी के बाद राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत होती है। 1990 में जो गोलीकांड हुआ और उसके बाद 1992 में बाबरी मस्जिद के उस ढांचे को गिराया गया, वो सब घटनाएं मैंने एक पत्रकार के तौर पर देखीं और अनुभव की हैं।

एक दौर शाहबानो केस का भी आया, जब मैं ‘रविवार‘ में था। कभी किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक चुनी हुई सरकार अपने प्रचंड बहुमत का इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बदलने के लिए कर सकती है।

उस घटना के बाद भारत की राजनीति में एक अभूतपूर्व बदलाव आया। उस एक्शन के रिएक्शन में राजीव गांधी को राम मंदिर का ताला खुलवाना पड़ा। मुझे ऐसा लगता है कि जेपी आंदोलन से लेकर बाबरी मस्जिद के विध्वंस तक का दौर एक ऐसा दौर था, जिसमें पत्रकारिता करना और निष्पक्ष काम करना बड़ी चुनौती थी।

शाहबनो के साथ जो हुआ, वो गलत था। क्या आप बताना चाहेंगे कि उस समय समाचार पत्रों ने इस घटनाक्रम को लेकर कैसे कवरेज की?

आजादी के बाद के समय को देखें तो देश में कई जगह छोटे-मोटे विवाद देखने को मिले, लेकिन राजीव गांधी ने कोर्ट के निर्णय के साथ जो छेड़छाड़ की, उसका व्यापक असर देखने को मिला।

दरअसल, आप इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि एक सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत उसी दौर के बाद देश में शुरू हुई। दरअसल, राजीव गांधी राजनीति के उन दांवपेचों से अवगत नहीं थे, जो कि अपने जीवनकाल में हर नेता को झेलने होते हैं।

इसके विपरीत अगर आप इंदिरा गांधी को देखें तो वो हर विचारधारा के लोगों को अपने पास रखती थीं, जगह देती थीं और सुनती भी थीं, लेकिन करती वही थीं, जो उनके मन को अच्छा लगता था। राजीव गांधी की इसी गलती का परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर दंगों के रूप में देखा गया और उस समय ऐसी घटनाओं की कवरेज करना इतना आसान नहीं होता है।

1990 से 1992 के बीच जो घटनाएं हुईं, उनका निष्पक्ष तरीके से विश्लेषण करना बेहद कठिन कार्य था, ये सब संवेदनशील घटनाएं थीं, जिन्होंने देश की राजनीति को एक नए आयाम दिए।

बाबरी मस्जिद के गुंबद को जब तोड़ा गया तो वो तस्वीर सबसे पहले ‘टाइम्स नेटवर्क‘ के अखबारों में छापी गई थी। इसके अलावा दंगों में मरने वाले लोगों की कभी हमने गलत रिपोर्टिंग नहीं की। उस दौर में कई ऐसे अखबार और पत्रिकाएं थे, जो बढ़ा-चढ़ाकर आकंड़ा दिखा रहे थे, लेकिन हम लोगों ने कभी ऐसा कुछ नहीं किया।

एक अखबार को चलाने के लिए तमाम संसाधन और पैसा चाहिए। क्या संपादक होने के नाते कभी आपने कॉर्पोरेट का दबाब झेला है?

मैंने अरुण पुरी जी के साथ भी काम किया, अशोक जैन और उनके बच्चे विनीत और समीर जैन के साथ भी काम किया है। ‘टाइम्स ग्रुप‘ के साथ मेरी यात्रा 24 साल से भी अधिक समय तक रही है। मुझे एक बार विनीत जैन ने साफ कहा था कि अगर कोई विज्ञापनदाता किसी भी खबर के लिए अगर आप पर दबाब डाले तो आप सीधे मुझे कॉल कर सकते हैं।

मैं आपको ये दावे के साथ कह सकता हूं कि मैंने आज तक किसी के भी दबाब में कोई न्यूज नहीं छापी है। इतना जरूर है कि अगर किसी दिन अमुक कंपनी का परिणाम जारी हो रहा हो तो उसका मालिक अनुरोध जरूर करता था।

इस प्रकार के अनुरोधों पर मैं एक ही जवाब देता था कि अगर परिणाम आएगा तो वो वैसे भी छपने ही वाला है। इसमें संपादक से कहने की कोई जरूरत नहीं है।

आपको बता दूं कि अरुण पुरी जी हमेशा एक बात कहते थे कि आप किसी भी व्यक्ति के चरित्र हनन की खबर को पूरी पड़ताल करने के बाद ही छापें ! अगर वो गलत हुई तो  माफी मांगने की नौबत भी आएगी, लेकिन तब तक बड़ी देर हो जाएगी। मुझे अपने अनुभव से ऐसा लगता है कि अगर आप ईमानदार हैं और अपनी जिम्मेदारी समझते हैं तो कोई भी व्यक्ति नहीं चाहेगा कि उसका अखबार किसी की ओर झुका हुआ दिखाई दे।

वर्तमान में टीवी और टीआरपी के खेल में हो रहे शोर शराबे को कैसे देख रहे हैं ?

टीवी, रेडियो और अखबार ये तीनों माध्यम अपने आप में एक अलग तरह से काम करते हैं। इनकी कुछ ताकतें हैं तो कुछ कमजोरी भी हैं। अगर किसी दिन खबरें अधिक हैं तो अखबार में पेजों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, लेकिन टीवी के पास तो सिर्फ तय समय है। उसमे भी आपको विज्ञापन दिखाने हैं।

अब इसी का आप दूसरा पहलू देखिए।अगर आज सुबह दस बजे कोई घटना हुई तो अखबार में तो कल सुबह ही आएगी, लेकिन टीवी में आप उसको तुरंत देख सकते हैं वो भी वीडियो के साथ। मुझे ऐसा लगता है कि दर्शकों/पाठकों को बनाए रखने की हर माध्यम की अपनी मजबूरी होती है। इसके लिए कई बार कुछ अलग करने के चक्कर में नाग- नागिन जैसी चीज होती हैं।

जिस हिंदुस्तान को लोग सिर्फ किताबों में पढ़ते थे और सुनते थे, उस हिंदुस्तान से टीवी ने लोगों को रूबरू करवाया और मुझे लगता है कि वो दौर अब खत्म हो गया है और अब आने वाले समय में चीजें बेहतर होंगी।

वर्तमान में कई लोग कहते हैं कि टीवी डिबेट खत्म कर देनी चाहिए, सोशल मीडिया पर भी तमाम द्वेष फैला हुआ है! इससे कितने सहमत हैं?

देखिए, जो पीड़ा आपके प्रश्न में है, वो दर्शक की भी है और मेरी भी है, लेकिन मैं आशावादी इंसान हूं। श्री कृष्ण को भी पता था कि ये जो हो रहा है वो ठीक नहीं हो रहा है, लेकिन आगे का रास्ता भी यहीं से होकर निकलेगा।

ऑपरेशन ‘ब्लू स्टार‘ के बाद भी इंदिरा गांधी जी को ये कहना पड़ा था कि ये जरूरी हो गया था, इसलिए करना पड़ा। इस दौर में भी ऐसे कई चैनल्स हैं, जो अब साफ सुथरे ढंग से अपनी बात कहने लगे हैं। आज जिस तरह से शोर हो रहा है और मेहमानों की आवाज सुनाई ही नहीं देती है तो जो भी एंकर ये कर रहे हैं, उन्हें उनका दर्शक ही आने वाले समय में कुछ अच्छा करने के लिए मजबूर कर देगा।

समाचार4मीडिया के साथ राम कृपाल सिंह की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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पत्रकार का लक्ष्य सिर्फ खबर देना हो, न कि अपनी राय थोपने का: राहुल महाजन

समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में राहुल महाजन ने तमाम मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात राय रखी है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

Last Modified:
Saturday, 31 July, 2021
Rahul Mahajan

राहुल महाजन को मीडिया के क्षेत्र में काम करने का करीब 28 साल का अनुभव है। इनमें से 25 साल उन्होंने अलग-अलग मीडिया संस्थानों में काम किया है। वह ‘प्रसार भारती’ में कंसल्टिंग एडिटर भी रह चुके हैं। वर्तमान में 'दूरदर्शन' में कंटेंट ऑपरेशंस हेड के तौर पर अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे राहुल महाजन ने समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में तमाम मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात राय रखी है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन और शिक्षा के बारे में कुछ बताइए! पत्रकार बनने का ख्याल कैसे आया?

मेरी स्कूली शिक्षा शिमला में हुई और बचपन भी वहीं गुजरा है। मेरे पिता ऑल इंडिया रेडियो (AIR) में थे और वहीं से डायरेक्टर पद से वह रिटायर हुए। मेरे मन पर जो सबसे पहला प्रभाव था, वो मेरे पिता का ही था। मेरे पिता न सिर्फ बहुत पढ़ते थे, बल्कि उन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान था। उनके लेख भी नियमित तौर पर छपते थे और मैं अपनी बहन के साथ बचपन में वो खूब पढ़ता था।

वेद, पुराण और हिंदू धर्म पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी तो वो सब मेरे मन पर गहरा प्रभाव डालते थे। वैसे मैं आपको बता दूं कि मेरी कॉलेज की पढ़ाई विज्ञान विषय में हुई थी लेकिन मेरी बड़ी बहन के पत्रकार बन जाने के बाद अब मुझे भी पत्रकार बनने की इच्छा सताने लगी थी।

उसके बाद वहीं रहकर मैंने एक पत्रिका में लिखना शुरू कर दिया था। उसके बाद मैंने भी पत्रकारिता की पढ़ाई की और दिल्ली आ गया। यहां आने के बाद भी मुझे मेरी बहन ने बड़ा सहयोग किया।

पढ़ाई के दौरान मेरी पहली इंटर्नशिप ‘द स्टेट्समैन‘ में हुई। उसके बाद मुझे पहली नौकरी ‘जनसत्ता‘ में मिली, जहां राहुल देव एडिटर थे। उसी दौरान प्राइवेट टीवी चैनल्स  मार्केट में आने लगे थे तो मेरे एक पुराने सहयोगी की मदद से ‘जी न्यूज‘ में नौकरी मिली और वहां राधिका कौल बत्रा जी से मैंने बहुत कुछ सीखा।

दरअसल, मुझे न्यूज में नहीं, बल्कि टीवी प्रोग्रामिंग में नौकरी मिली थी तो कैसे प्रोग्राम बनता है और क्या उसकी बारीकियां होती हैं, ये सब मुझे ‘जी न्यूज‘ में काफी अच्छे से सीखने को मिला। उसके बाद मुझे न्यूज में शिफ्ट किया गया और उसके बाद चीजें आगे बढ़ती गईं और सफर आगे बढ़ता रहा।

आपने लगभग 12 साल तक संसद को कवर किया है। उस सफर के बारे में कुछ बताइए।

ये बड़ा रोचक सफर रहा है। आप देखिए कि आज जो पीढ़ी मीडिया में आ रही है उनमें से अधिकतर की सोच यही है कि वो ग्लैमर वर्ल्ड को कवर करें, फेमस हो जाएं, उनका चेहरा सबको दिखाई दे लेकिन मेरी सोच उससे अलग थी।

शुरू में मुझे फैशन कवर करने को ही मिला था। इसके बाद मुझे क्राइम, स्पोर्ट्स जैसी बीट भी कवर करने को मिलीं। मुझे राजनीतिक पत्रकारिता करने का मौका देर से मिला, लेकिन मिल गया था। मुझे वामपंथी दलों को कवर करने का मौका मिला था। उस समय की राजनीति को आप देखें तो बड़ी हलचल रहती थी, तो मेरी कई स्टोरी छपती थीं।

उसके बाद धीरे-धीरे मुझे सत्ताधारी दलों को कवर करने का मौका मिल गया और आखिरकार मुझे संसद कवर करने का मौका मिला, जहां मैंने काफी कुछ सीखा।

वैसे कई लोग यह भी सोचते हैं कि अगर हम राजनीतिक पत्रकारिता करेंगे तो हमारे बड़े-बड़े लोगों से संबंध बन जाएंगे तो ये ठीक नहीं है, बल्कि देश की राजनीति की समझ रखने के लिए ऐसा करना चाहिए, ताकि आप लोगों को सही और गलत का मतलब समझा सकें।

संसद कवर करने के दौरान का अनुभव कैसा रहा? कोई घटना या किस्सा हमें बताना चाहेंगे?

अनुभव और किस्से तो ढेर सारे हैं। जब मैं आजतक’ में रहते हुए संसद कवर करता था तो आपस में ही प्रतिस्पर्धा होती थी कि कौन सबसे पहले खबर लेकर आएगा। एक किस्सा मुझे याद आता है कि एक केंद्रीय मंत्री को हटाने की बात चल रही थी तो ’आजतक ’ में मेरे सहयोगी ने कहा कि उन्हें नहीं हटाया जाएगा और मेरा कहना था कि उन्हें हटाया जाएगा।

हालांकि बाद में उन्हें हटा दिया गया था। इसके बाद एक और दिलचस्प बात मैं आपको बताऊं कि सांसद कई बार जब अच्छा भाषण देते थे तो प्रेस गैलरी की तरफ हाथ हिलाकर और मुस्कराहट के साथ देखते थे।

 ये वो दौर था, जब तमाम सांसदों को टीवी पर दिखने का बड़ा शौक था। इसके अलावा नेताओं से मिलना, सांसदों से मिलना उनकी बातों को समझना, ये सब अनुभव वाकई में दिलचस्प रहे।

इसके अलावा जब संसद पर हमला हुआ था उसको कवर करने वाले जानते हैं कि कितनी पीड़ा और दर्द के साथ वो कवर किया गया। कई ऐसे लोकसभा स्पीकर भी हुए, जिनसे बड़े अच्छे संबंध बन गए थे और आज भी स्मृति पटल पर वो अंकित हैं।

आज 24 घंटे के टीवी चैनल का दौर है, कई बार गलत चीजें भी चल जाती हैं तो क्या आपको लगता है कि वर्तमान समय में टीवी की विश्वसनीयता में कमी आ रही है?

टेलीविजन के बारे में आप कह सकते हैं कि टीवी ने बड़े दौर देखे हैं। एक दौर वो भी था, जब सिर्फ न्यूज पर ही फोकस किया जाता था। उसके बाद ’भूत-प्रेत’ जैसी चीजें भी लोग दिखाने लगे और हर न्यूज को जरूरत से अधिक खींचा जाने लगा और ऐसे पहलू भी दिखाए जाने लगे, जो कि आवश्यक नहीं थे।

इसके बाद वापस एक बार खबरों का दौर आया है। उसे अच्छे ढंग से पेश करने का दौर आया है, लेकिन एक चीज की कमी मुझे दिखाई देती है और वो है पत्रकारिता, आज टीवी पत्रकारिता उस दौर वाली नहीं रह गई है, जिसे हम सुनहरा दौर कहते हैं। मुझे आज जूनून कम और स्वार्थ अधिक दिखाई देता है और मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में ये चीजें बदलेंगी।

राज्यसभा टीवी की अलग पहचान है और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे युवा भी उसे देखते हैं, आप तो वहां संपादक रहे तो कैसे ये सब संभव हुआ?

राज्यसभा टीवी अपने आप में एक यूनिक प्लेटफार्म है और अगर ये जिंदा रहता है तो कंटेंट के मामले में ये बहुत आगे जाएगा। आप देखिए कि जितने भी युवा हैं वो सब नॉलेज के लिए राज्यसभा टीवी को देखना पसंद करते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि ये सूचना का एक ऐसा माध्यम है, जो देश ही नहीं बल्कि विदेशी मामलों में भी आगे रहता है। कोई भी ऐसा विषय नहीं होगा, जिस पर राज्यसभा टीवी विशेष कार्यक्रम न करता हो।

एक और खास बात मैं आपको बता दूं कि राज्यसभा टीवी के यूट्यूब चैनल पर टीवी से अधिक विजिटर हैं और पांच मिलियन सबस्क्राइबर्स का आकंड़ा मेरे ही कार्यकाल में पूरा हुआ था। इससे एक चीज और साबित होती है कि अगर आप दर्शकों को सही फॉर्मेट में सही जानकारी देते हैं, वो उसे हाथों हाथ लेता है।

वैसे इस बात पर जरूर बहस हो सकती है कि कैसे एक व्यक्ति अच्छा कंटेंट देख रहा है और कैसे कोई डिबेट का शोर या नाग नागिन का नाच देख रहा है। दरअसल, सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है और हर व्यक्ति उसी हिसाब से चीजों को देखना पसंद करता है।

देश में जब भी न्यूज की बात आती है तो जहन में ’दूरदर्शन ’ का ही नाम आता है। भविष्य में इसके विस्तार के लिए क्या योजना बन रही है?

हाल में न्यूज एजेंसी ’रायटर्स ’ के सर्वे में भी ये साबित हो गया है कि खबरों की प्रामाणिकता की जब बात आती है तो बाकी चैनल्स दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते हैं। वहीं ’प्रसार भारती’ के सीईओ भी लगातार अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से नई-नई अपडेट देते रहते हैं। ’दूरदर्शन ’ एक बड़ा मंच है और इसके खुद कई प्रादेशिक चैनल्स भी हैं।

इसी कड़ी में अब एक इंटरनेशनल चैनल लाने की तैयारी है, वहीं जो प्रादेशिक चैनल्स है, उन्हें भी बढ़ाने की बात की जा रही है। इसके अलावा ’दूरदर्शन ’ अपने सारे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को बड़ी तेजी से आगे बढ़ा रहा है। ’प्रसार भारती’ न्यूज सर्विस ने हाल ही में एक मिलियन सबस्क्राइबर्स का आकंड़ा पार किया है।

वर्तमान समय में गोदी मीडिया और एजेंडा पत्रकारिता जैसे शब्द इस्तेमाल हो रहे हैं। क्या आप इन सब चीजों को सही मानते हैं?

पत्रकार को सिर्फ एक पत्रकार की तरह लिया जाना चाहिए और इस प्रकार के शब्द ठीक नहीं हैं। ये तो हमें विचार करना होगा कि हम किस तरह का काम करना चाहते हैं। पहला, या तो हम अपनी राय को न्यूज में ले आएं और दर्शक की राय बना दें या फिर अपनी राय को अलग रखकर सिर्फ दर्शक को खबर दिखाएं और उसे तय करने दें कि क्या सही है और क्या गलत है?

मेरा मत यह है कि एक पत्रकार को कभी भी न्यूज के अंदर अपनी राय नहीं देनी चाहिए। एक पत्रकार का लक्ष्य सिर्फ इतना होना चाहिए कि कैसे उसके यूजर की जानकारी बढ़े और कैसे वो न्यूज को समझे, बाकी उसी न्यूज के अंदर अपनी राय को डाल देना मैं ठीक नहीं मानता हूं। आप जनता को न्यूज दीजिए और उसके फैक्ट्स दीजिए, बाकी जनता खुद समझदार है यह तय करने के लिए कि सही क्या है और गलत क्या है।

इसके अलावा आज के मीडिया में फैक्ट चैक की कमी को मैं बड़ी समस्या मानता हूं, दरअसल हमें ये तय करना होगा कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल हम कैसे करें? सोशल मीडिया का इस्तेमाल किसी की छवि को बिगाड़ने के लिए फेक न्यूज के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि ये तय करना चाहिए कि कैसे लोगों तक सही और सटीक जानकारी पहुंचे।

समाचार4मीडिया के साथ राहुल महाजन की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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आप चाहे पत्रकार हों या संपादक, कभी मूल्यों से समझौता नहीं होना चाहिए: आलोक मेहता

वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष आलोक मेहता (पदमश्री) ने समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में अपने अनुभव साझा किए हैं।

Last Modified:
Wednesday, 28 July, 2021
Alok Mehta

वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष आलोक मेहता (पदमश्री) किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्हें मीडिया जगत में काम करने का 50 वर्षों से भी अधिक का अनुभव है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में उन्होंने अपने अनुभव साझा किए हैं। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश

आपका मीडिया में इतना लंबा अनुभव रहा है, अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए।

सफर तो लंबा रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन आज भी युवाओं से कुछ न कुछ सीखता रहता हूं। अपने शुरुआती दिनों की बात करूं तो मैं एक छोटे से गांव में पैदा हुआ और वहां कोई सुख सुविधा नहीं थी।

पिता शिक्षक थे तो उसी कमरे में सोते थे, जहां कक्षा लगती थी। एक छोटा सा कमरा था. जिसमें मेरी मां खाना बनाती थीं। मेरे दादाजी 1952 में निर्दलीय चुनाव लड़े थे और उनकी अच्छी खासी खेती भी थी।

उसके बाद उज्जैन आने का मौका मिला और कॉलेज में ड्रामा और डिबेट के माहौल से पत्रकारिता में रुचि जाग्रत हुई। उसके बाद मैं ‘हिन्दुस्तान‘ और ‘नई दुनिया‘ का स्ट्रिंगर बना। उसके बाद ‘नई दुनिया‘ में नौकरी भी मिल गई लेकिन दिल्ली जाने की मन में थी। साल 1971 में दिल्ली आना हुआ और इस तरह दिल्ली में मेरा सफर शुरू हुआ।

आपने बताया कि वर्ष 1971 में आप दिल्ली आ गए थे तो यहां किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?

जब मैं ‘नई दुनिया‘ जैसे अखबार की नौकरी छोड़कर आया तो ये सोचकर आया था कि जो संघर्ष भी करना होगा, उसे करेंगे। दिन में एक वक्त रोटी से गुजारा करना पड़े तो भी करेंगे, उस उम्र में एक अलग तरह का स्वाभिमान होता है।

मैंने उस समय कई एजेंसियों में काम किया और पत्रिकाओं में भी नियमित तौर से लिखता रहा। उसी दौर में काफी कम उम्र में न सिर्फ बड़े-बड़े नेताओं को कवर करने का मौका मिला बल्कि संसदीय रिपोर्टिंग करने का मौका भी मिला। 1973 का वो साल था जब ‘धर्मयुग‘ में सीबीआई को लेकर पहली कवर स्टोरी मैंने लिखी थी, जो आज भी मेरे पास रखी हुई है। इसके अलावा शुरू से ये अच्छी चीज ये रही कि मेरे किसी भी लेख को लेकर अगर संपादक को या किसी और को ये लगता था कि इसमें कोई कमी है तो मैं फिर से लिखता था।

कामचोरी मेरे जीवन में कभी नहीं रही, इसलिए काफी कम उम्र में ही तमाम संपादक मुझे पसंद करने लगे थे। पत्रकार का सबसे बड़ा गुण यही होता है कि वो अपने लेख पर मोहित नहीं हो।

आपने कम उम्र में ही पत्रकारिता में कदम रखे और बाद में संपादक भी बने, एक पत्रकार के संपादक बनने के बाद क्या अंतर आता है?

जैसा कि मैंने आपको बताया कि कम उम्र में ही मैं संपादकों का प्रिय हो गया था। इसके अलावा अखबार के मालिकों से भी अच्छे संबंध थे। आपातकाल के दौरान ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ के साथ भी काम किया, जिनसे सरकार नाराज थी।

‘हिंदुस्तान‘ में जब था तो उस समय मनोहर श्याम जोशी जी ने विदेश घूमने की छूट दी। उसके बाद जर्मनी रेडियो की हिंदी सेवा में संपादक बनने का मौका मिला था।

करीब तीन साल वहां काम करने के बाद 1988 में ‘नवभारत टाइम्स‘ पटना संस्करण में संपादक बनने का मौका मिला। उसके बाद दिल्ली एडिशन की भी जिम्मेदारी मिली। उसके बाद ‘हिंदुस्तान‘ का संपादक बनने का मौका मिला। आप चाहे पत्रकार हों या संपादक हों, कभी भी मूल्यों से समझौता नहीं होना चाहिए।

मैंने हर पीएम की आलोचना भी लिखी है और उनसे मिलता भी रहा हूं, कई से तो सम्मान भी प्राप्त किए हैं। पूर्व पीएम मनमोहन जी के समय में कैसे अनिल अंबानी जैसे लोग साउथ ब्लॉक जाते रहे, उसकी खबरें भी छापी हैं।

आप लालू यादव जी का उदाहरण ले लीजिए कि जब चारा कांड हुआ तो सबसे पहले ‘नवभारत‘ ने उसको छापा। संपादक का लक्ष्य किसी को हटाना नहीं होना चाहिए बल्कि जनता के सरोकार से जुड़कर और बिना किसी पूर्वाग्रह के न्यूज देनी चाहिए। 

मैंने अटल जी के साथ खूब यात्राएं कीं, लेकिन गोविंदाचार्य की डायरी भी मैंने ही उजागर की थी। संपादक बनाए जाने को मैं एक गौरव की तरह लेता हूं और अपने पूर्वजों के प्रति भी मैं अनुग्रहीत हूं कि उन्होंने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं उनकी उम्मीदों को पूरा कर सका।

मेरे पास हो सकता है कि बड़ी गाड़ी नहीं है, बंगले नहीं हैं, लेकिन अपने काम के प्रति ईमानदारी रही है। जब आप पीएम से मिलने जाते हैं या ओबामा से मिलने जाते हैं तो कोई ये नहीं देखता कि आप कितने धनी है! संपादक अपने काम के प्रति ईमानदार रहे, यही मेरा मत है।

अक्सर देखा जाता है कि संपादक पर नेताओं और कॉरपोरेट्स का दबाब रहता है। क्या आपने कभी कोई ऐसा दबाब महसूस किया?

इंसान जब इस दुनिया में आता है तो खाली हाथ आता है और जाता भी खाली हाथ है। इसे आप मेरा सौभाग्य कह लीजिए या मेरी ईमानदारी कि मैंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

पटना की शुगर मिल हो या चंद्रास्वामी पर मेरी स्टोरी हो, इन पर कभी भी संस्थान की ओर से मुझ पर दबाब नहीं आया। मेरे बीजेपी और कांग्रेस के सभी नेताओं से अच्छे संबंध रहे, लेकिन मैंने लगभग सबके बारे में कुछ न कुछ लिखा।

नरसिम्हा राव हों या अटल जी, कभी भी उस दौर में मेरे ऊपर किसी भी प्रकार का कोई दबाब नहीं बनाया गया। विनोद मेहता जी हों या कोई और हो, मुझे स्वतंत्र रूप से कार्य करने का मौका मिला है। हालांकि कई बार यह दबाब होता है। विनोद मेहता जी को नेताओं के दबाब के कारण ही मुंबई छोड़कर दिल्ली आना पड़ा था।

सरकार का दबाब भी कई बार आता है, पेड न्यूज पहले भी थी और आज भी है। बस ये हो सकता है कि पहले पैसा कम मिलता था और अब पैसा अधिक मिल रहा है। 

आपने मीडिया में पेड न्यूज को लेकर हमेशा आवाज उठाई है। आपको ऐसा क्यों लगता है कि मीडिया और राजनीति का यह गठजोड़ समाज के लिए ठीक नहीं है?

इसे आप ऐसे समझें कि आप नॉनवेज नहीं खाते हैं लेकिन आपके बगल में ही बैठकर अगर कोई खा रहा है तो उसका अर्थ यह तो नहीं है कि आप उसे देखते रहें। मैं तो ऐसे कई नेताओं को जानता हूं जो उनके पक्ष में रिपोर्टिंग करने के लिए बढ़िया कीमत देते थे, लेकिन आप अपने आप को उससे बचाए रखें तो बेहतर है। वैसे अच्छी चीज ये है कि आज की जनता ये सब जानने और समझने लगी है।

आप दोनों विरोधी लोगों की जब तारीफ़ लिखते हैं तो जनता समझ जाती है कि सही क्या है और गलत क्या है! मैं प्रेस काउंसिल में रहा और एडिटर्स गिल्ड में अध्यक्ष पद पर कार्य किया और उस समय भी इस बात को बड़ी प्रमुखता से मैंने उठाया था।

संपादक हो या पत्रकार, सबको अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी चाहिए। अगर आपकी कमाई 50 हजार रुपये महीना है तो करोड़ों के बंगले कहां से आए? पारिवारिक संपत्ति है तो वो भी सामने आए। कुछ नियम होना जरूरी है।

आपने मीडिया में इतने लंबे समय तक काम किया है और कई खुलासे किए हैं। क्या कभी आपको कोई धमकी मिली है?

देखिए, ये तो पेशा ही ऐसा है, जिसमें जान हथेली पर रखकर चलना होता है। अगर याद करूं तो जीवन में ऐसे अवसर आए हैं। जब मेरे मीडिया के सफर की शुरुआत ही हुई थी तो उस समय ‘नई दुनिया‘ में रहते हुए एक संस्कृत स्कूल पर मैंने स्टोरी की थी। दरअसल, उस स्कूल में अखबार पढ़ने पर रोक थी और उस पर काफी हंगामा हुआ था।

जब ‘नवभारत‘ में था तो एक स्टोरी करने पर एक नेता ने इतना तक कह दिया था कि ट्रक से कुचलवा देंगे। उस समय सिंधिया जी ने मुझसे कहा था कि आप घबराइए मत, ऐसा कुछ होने नहीं देंगे।

एक बार तो लालू यादव पर कुछ छाप दिया तो पता चला कि आधी रात को हिरासत में लेने की तैयारी हो चुकी थी। एक नेता का और मौका आया जिनका नाम तपेश्वर सिंह था। कुछ आर्थिक मामलों की खबर छापी थी तो उनके बेटे पिस्तौल लेकर घर आ गए थे। जब मैंने उनको पूरा मामला समझाया तो वो फिर चले गए थे।

क्या आपको लगता है कि वर्तमान में मीडिया स्वतंत्र नहीं है? नए आईटी नियमों पर आपकी क्या राय है ?

नियम अगर आए हैं तो सबसे पहले यह देखना होगा कि गड़बड़ कहां है? जैसे पत्रकारों पर राजद्रोह के मामले पर हमने खुलकर कहा कि ये ठीक नहीं है। हां,  जहां तक नियम की बात है तो हर पेशे की कोई न कोई लक्ष्मण रेखा होती है, जिसे खींचना जरूरी है। अगर आप कोई गलत काम नहीं करते हैं या कहीं से फंडिंग लेकर गलत नहीं कर रहे हैं तो नियम से समस्या क्यों हो?

मेरा तो यह भी कहना है कि प्रेस काउंसिल के पास भी कुछ अधिकार होने चाहिए। मैं आपको बताऊं कि जब मैं 26 साल का था तो विदेश गया था, उसके पीछे कारण ये था कि मुझे लगता था देश में सेना का अधिकार हो जाएगा।

उस वक्त जनता पार्टी टूट के कगार पर थी और पड़ोसी मुल्कों का हाल हम देख ही रहे थे। इसलिए मेरा मत है कि एक सीमा के बाद अधिकार तय होने चाहिए।

आप सरकार की कमी बताइए और सरकार से सवाल पूछिए लेकिन अच्छी चीज भी दिखाइए। आज अगर किसानों को खाद-बीज का पैसा मिल रहा है, एक गांव की महिला को सिलेंडर मिल रहा है तो उसकी तारीफ़ करने से आप मोदी समर्थक कैसे हो गए?

‘एनडीटीवी‘ एक बड़ा चैनल है, रवीश जी सरकार की खूब आलोचना करते हैं तो क्या उन्हें कुछ हुआ? क्या उन्हें बोलने से रोका गया?  आज भी हिंदी इंग्लिश दोनों चैनल चल रहे हैं तो आपातकाल कैसे हुआ? गुजरात के दो बड़े अखबार ‘गुजरात समाचार‘ और ‘संदेश‘ जैसे अखबारों में सरकार के खिलाफ तीखी हेडलाइन लिखी जा रही हैं। अगर तानाशाही होती तो क्या आप ये कर पाते?

प्रेस के प्रति पूर्वाग्रह तो हर पीएम का रहा है। मेरे पास तो इंदिरा जी के भाषण आज भी रखे हुए हैं। इसके अलावा ‘नेशनल हेराल्ड‘ तो गांधी परिवार का अखबार है वो तो पीएम मोदी नियंत्रित नहीं कर रहे है ना?

नोटिस तो मेरे पास, विनोद मेहता, राजेंद्र माथुर के पास न जाने कितने आए हैं। आप ये नहीं कह सकते कि ये आज से शुरू हुआ है। इतना जरूर मैं कह सकता हूं कि आज राज्यों में दबाब है, चाहे वो बीजेपी हो कांग्रेस हो या लेफ्ट हो, सभी राज्यों की सरकारें दबाब बना रही हैं।

इसके अलावा अगर नए आईटी नियमों की बात है तो ये भी लोगों को ज्ञात होना चाहिए कि बड़े-बड़े संस्थानों के संपादकों और प्रकाशकों ने ही सरकार को चिट्ठी भेजी थी कि आप ये नियम बनाएं।

अगर मैं ये कह रहा हूं कि पहले पेज पर जलती हुई लाशें मत दिखाइए, लाखों संवेदनशील लोग हैं और बच्चे हैं, जो उसे देखकर दहशत में आ सकते हैं, लेकिन उसके विरोध में आप अगर ये कहें कि आलोक मेहता जी तो मोदी के पक्ष में बोल रहे हैं तो ये तर्क ठीक नहीं है।

समाचार4मीडिया के साथ आलोक मेहता की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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