अमर उजाला के डिजिटल एडिटर जयदीप कर्णिक ने रेवेन्यू बढ़ाने के लिए इस मॉडल पर दिया जोर

देश-दुनिया में कहर बरपा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में इन दिनों लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है

Last Modified:
Saturday, 23 May, 2020
Jaydeep154

देश-दुनिया में कहर बरपा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में इन दिनों लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। ऐसे में पहले ही तमाम परेशानियों से जूझ रही इस इंडस्ट्री के सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन भी काफी प्रभावित हुआ है। लोग अब डिजिटली अखबार पढ़ रहे हैं। तमाम पब्लिकेशंस भी इन दिनों डिजिटल पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। क्या डिजिटल में आई यह वृद्धि बरकरार रहेगी और विज्ञापनदाता फिर से इंडस्ट्री की ओर रुख करेंगे? इन्हीं तमाम सवालों को लेकर हमने ‘अमर उजाला’ डिजिटल के एडिटर जयदीप कर्णिक से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

लॉकडाउन के दौरान जिस तरह टीवी की व्युअरशिप बढ़ी है, वहीं डिजिटल की व्युअरशिप में भी काफी इजाफा हुआ है। टीवी में सबसे बड़ी तब्दीली ये आई है कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) की तुलना में शुद्ध रूप से न्यूज ज्यादा देखी गई है। टेलिविजन एंटरटेनमेंट में ‘दूरदर्शन’ की व्युअरशिप काफी बढ़ी है। इस चैनल पर पिछले दिनों प्रसारित ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ काफी देखी गई हैं। जहां तक डिजिटल मीडिया की बात करें तो न्यूज वेबसाइट्स में तकरीबन सभी की 30 से 50 प्रतिशत तक रीडरशिप बढ़ी है। दरअसल, लॉकडाउन के चलते तमाम लोग घरों पर हैं। इनमें बच्चे और युवा भी हैं, जो कहीं बाहर खेलने और घूमने नहीं जा पा रहे। ऐसे में डिजिटल में ऑनलाइन गेमिंग में भी काफी इजाफा हुआ है। जो लोग घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) कर रहे हैं, उनके लिए तो ठीक है, लेकिन जिन लोगों का काम घर से बाहर निकलकर ही संभव होता है, जैसे दुकानदार आदि, ऐसे लोगों के लिए घर पर समय काटना काफी मुश्किल है, तो इनमें से ज्यादातर लोग घर पर टीवी देखकर, ऑनलाइन गेमिंग के जरिये या अन्य माध्यमों से अपना समय बिता रहे हैं।

तीसरी बात ये रही कि लॉकडाउन और कोरोनावायरस के खौफ के चलते तमाम सोसायटियों में शुरुआती दौर में अखबार नहीं पहुंच पा रहा था, तो लोगों ने ई-पेपर का सहारा लिया। ऐसे में ई-पेपर की रीडरशिप भी बढ़ी है। इसका कारण यही है कि मान लीजिए कि सुबह किसी ने अखबार पढ़ भी लिया तो भी वह पूरे दिन टीवी के सामने बैठकर समाचार नहीं देख सकता है, लेकिन उसके हाथ में अधिकांश समय मोबाइल होता है। फिर चाहे उसका दफ्तर का काम चल रहा हो या परिवार के साथ बैठा हो, तो मोबाइल पर जब भी नोटिफिकेशन आता है, कोई महत्वपूर्ण सूचना आती है अथवा वॉट्सऐप पर कोई लिंक आ जाता है तो वह उसे क्लिक करता है। हम कह सकते हैं कि कोरोना काल में डिजिटल के पाठकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

कोरोना का डिजिटल मीडिया पर भी काफी फर्क पड़ा है और यहां भी विज्ञापन घटे हैं। देखिए, विज्ञापनदाता कोई भी प्रॉडक्ट बनाता है और उसे मार्केट में बेचता है, जिसके लिए वह विज्ञापन का सहारा लेता है। लेकिन, लॉकडाउन की वजह से कहीं प्रॉडक्शन ही नहीं हो रहा है, तमाम उद्योग-धंधे बंद पड़े हुए हैं। हालांकि, कुछ प्रॉडक्ट्स हैं, जिनकी बिक्री बढ़ी है। किराने के सामान की बिक्री नहीं रुकी है। इसके अलावा पर्सनल हाइजीन की चीजें जैसे-साबुन आदि की मांग भी बढ़ी है। लेकिन उपभोक्ता वस्तुओं (FMCG), जिनके विज्ञापन टीवी, अखबार और डिजिटल में ज्यादा देखने को मिलते हैं, उनका उत्पादन न होने की वजह से उसका प्रभाव सभी जगह दिखाई दे रहा है। डिजिटल का संकट उससे भी आगे का है, क्योंकि टेलिविजन और अखबार के पास तो फिर भी सीधे विज्ञापन आते थे और विज्ञापन से उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा आता था, लेकिन डिजिटल में ऐसा नहीं है। डिजिटल में पाठकों की संख्या तो बहुत ज्यादा रही है, पाठक अभी भी बढ़े हैं, कहने का मतलब है कि डिजिटल के लिए पाठकों की संख्या कभी संकट का विषय नहीं रहा, डिजिटल के लिए रेवेन्यू का ही संकट रहा है। कोरोना काल के दौरान यह संकट और गहरा हुआ है। हालांकि, इस दिशा में कुछ नई पहल की गई हैं। कुछ के सबस्क्रिप्शन मॉडल शुरू हुए हैं। बड़े-बड़े कई अखबार जो कभी सबस्क्रिप्शन मॉडल (Paywall) के पीछे नहीं गए, वे भी अब ‘पेवॉल’ के पीछे चले गए हैं। हम कह सकते हैं कि विज्ञापन के लिहाज से इस महामारी का प्रभाव सभी मीडिया माध्यमों पर पड़ा है और सभी इससे अपने-अपने हिसाब से निपटने की कोशिश कर रहे हैं। डिजिटल के लिए यह प्रभाव ज्यादा गहरा इसलिए है क्योंकि डिजिटल के लिए रेवेन्यू की कमी हमेशा से रही है। डिजिटल में एक बड़ी दिक्कत ये है कि इस प्लेटफॉर्म के रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा गूगल और फेसबुक जैसे बड़े प्लेयर लेकर चले जाते हैं, नहीं तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और काफी आगे बढ़ जाते। कोरोना काल में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए रेवेन्यू की कमी का मुद्दा और गहरा हुआ है।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

जैसा कि मैंने पहले बताया कि महामारी के इस दौर में भी पाठक संख्या के मामले में डिजिटल मीडिया को कोई नुकसान नहीं हुआ है। पाठक संख्या तो और बेहतर ही हुई है। अब ज्यादा लोग डिजिटल पर खबरें पढ़ रहे हैं। हालांकि, कोरोना के दौर में तमाम अफवाहें भी चली हैं। यह भी देखने में आया है कि कुछ लोगों ने झूठे और दो-दो साल पुराने विडियो चलाए हैं, खबरें चलाई हैं। लेकिन कहीं न कहीं कोरोना संकट ने लोगों को ये भी समझने-समझाने पर मजबूर किया है कि जो बड़े मीडिया हाउस हैं, उनकी उपस्थिति का क्या महत्व है। उनके पास जो संपादकीय व्यवस्था है, जिससे छनकर खबरें आती हैं, वो इसलिए जरूरी है कि कुछ लोग आप तक झूठी खबरें न पहुंचाएं। देश में जो तथाकथित ‘वॉट्सऐप और फेसबुक यूनिवर्सिटी’ चल रही हैं और जिन पर पिछले कुछ सालों में झूठ का प्रसार तेजी से बढ़ा है, उस पर भी कहीं न कहीं अंकुश लगा है, क्योंकि लोगों को इस कोरोना के समय में सही और शुद्ध खबरें चाहिए। जो बड़े मीडिया हाउसेज हैं, उनकी जो मेहनत थी, उपस्थिति थी, वह मजबूती से दर्ज की गई। लोगों को ट्विटर पर आधिकारिक हैंडल और फेसबुक पर आधिकारिक पेजों का महत्व क्या है, ये समझ में आया। ऐसे में डिजिटल की पाठक संख्या में इजाफा हुआ है।

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

देखिए, खतरे की घंटी तो नहीं कहूंगा मैं इसे, ये सिर्फ कुछ वक्त की बात है, क्योंकि अभी जहां पर कई जगह स्थितियां थोड़ी बेहतर हुई हैं, ग्रीन जोन बढ़े हैं, वहां लोगों के घरों में अखबार फिर पहुंचना शुरू हुआ है। हां, ये जरूर है कि इस दौर में डिजिटल का एक नया पाठक वर्ग जुड़ा है। खास बात ये है कि जो पीढ़ी अखबार के साथ बड़ी हुई है, वो तो अखबार पढ़ने की आदत नहीं छोड़ेगी। नई पीढ़ी ने भी कहीं न कहीं अखबार को अपनाया है। अखबार उन लोगों के लिए भी है जो दिन भर नोटिफिकेशन देखते हैं, वॉट्सऐप देखते हैं, टेलिविजन भी थोड़ा-थोड़ा देखते हैं, लेकिन यदि उन्हें पूरे 24 घंटे का एक समग्र रूप में खबर पढ़ने के लिए प्लेटफॉर्म चाहिए तो वह अखबार ही दे पाता है। कहने का मतलब है कि समग्र रूप में लोगों की खबर पढ़ने की जो प्रवृत्ति है, वह अखबार ही दे पाता है। कहने को तो हम भी दिन भर खबरों के साथ जीते हैं, लेकिन फिर भी सुबह अखबार जरूर पढ़ते हैं। कोई भी आदमी दिन भर की सैकड़ों खबरों को लगातार न देख सकता है, न सुन सकता है और न पढ़ सकता है, फिर चाहे वह इस पेशे में ही क्यों न हो। लेकिन जो लोग इस पेशे में नहीं है, जैसे-मान लीजिए उनके ऑफिस में टीवी नहीं लगा हुआ है, मोबाइल पर भी उन्होंने बीच-बीच में विभिन्न साइट्स पर जाकर जो जरूरी चीजें देखनी थीं, वो देख लीं, लेकिन 24 घंटे में एक बार उन सारी खबरों पर एक बार नजर दौड़ाने की जो आदत बनी हुई है, और उसका अपना महत्व भी है, वो अखबार के अस्तित्व को न केवल जिंदा रहेगी, बल्कि उसको आगे भी बढ़ाएगी। फिलहाल जरूर इसमें कुछ दिक्कत आई है, कमी आई है, लेकिन इसके बावजूद अखबार इसी तरह बने रहेंगे। 24 घंटे में एक बार खबर को प्राप्त करने की जो व्यक्ति की आदत है अथवा मानसिकता है, वह बनी रहेगी। इस बीच डिजिटल में नए पाठक जुड़ेंगे जो शायद अखबारों से ज्यादा जुड़े रहते थे, वे भी अब डिजिटल पर आए हैं। वो नया पाठक वर्ग डिजिटल के साथ बहुत हद तक बना हुआ है।

पाठक को ये समझ आ गया है कि यदि सुबह मैं अखबार पढ़ूंगा और उसके बाद दिन भर के जो अपडेट हैं, उन्हें टीवी पर या मोबाइल पर देख लूंगा तो पर्याप्त है। दरअसल, सुबह आपने कुछ खबरें देख लीं, उसके बाद शाम को भी टीवी पर थोड़ी देर खबरें देख लीं, सुबह फिर अखबार पढ़ लिया तो जिस व्यक्ति को बहुत ज्यादा खबरें ग्रहण नहीं करनी हैं, उस व्यक्ति के लिए इतना पर्याप्त है। कोरोना ने लोगों को डिजिटल की तरफ इसलिए ज्यादा मोड़ा है, क्योंकि हरेक घंटे में क्या हो जाए, पता नहीं। लोगों को लगता है कि कहीं कोरोना का नया मामला निकल आया, तो वह उनकी बिल्डिंग में या आसपास तो नहीं है। नए रेड जोन जारी हो रहे हैं. नई गाइडलाइंस जारी हो रही हैं। कोई नई अधिसूचना आ रही है, वॉट्सऐप पर तमाम इससे जुड़ीं खबरें आ रही हैं, तो इन चीजों ने डिजिटल को और मजबूत किया है। लोगों को भी यह समझ में आया है कि लगातार उन्हें यदि किसी खबर के बारे में अपडेट चाहिए तो उन्हें डिजिटल से जुड़ना पड़ेगा और यदि खबर का सार चाहिए या किसी खबर का महत्वपूर्ण हिस्सा पढ़ना है या किसी खबर के बारे में 400-500 या हजार शब्दों में जानकारी चाहिए तो अगले दिन अखबार में पढ़ सकता है। लेकिन लगातार यदि किसी को खबर पढ़नी है या कोरोना को लेकर कोई बड़ा शोध प्रकाशित हुआ है और यदि उसे वह पढ़ना हो तो वह इस प्लेटफॉर्म पर पढ़ सकता है। दूसरी बात ये कि डिजिटल तीनों माध्यमों का समागम है, यानी यहां पर आपको टेक्स्ट पढ़ने को मिल जाता है, फोटो भी मिल जाते हैं और विडियो भी मिल जाते हैं। यह सुविधा अखबार में नहीं मिलती। टीवी पर भी विजुअल ज्यादा होता है और टेक्स्ट कम होता है। डिजिटल माध्यम की खूबसूरती यही है कि यहां पर टेक्स्ट के साथ फोटो गैलरी भी मिलती है, जिसमें आप एक ही घटना की कई तस्वीरें देख सकते हैं। तो कहीं न कहीं, ये सारे मीडियम एक-दूसरे को कॉम्पलिमेंट करते हुए नजर आते हैं।

इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, हमने एक तो सबसे पहले इस खतरे को भांपते हुए कई एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए। उस दौरान यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जैसे चीन और सिंगापुर में तब तक फैल चुका था, इटली में भी यह पहुंच चुका था। ऐसे में वहां के न्यूजरूम्स ने क्या किया, हम इससे भी लगातार जुड़े रहे। हम इस बारे में लगातार जानकारी लेते रहे। इन सबको देखते हुए अमर उजाला ऐसे शुरुआती चुनिंदा मीडिया हाउसेज में शामिल था, जिन्होंने बहुत जल्दी ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) अपना लिया था और कई साथी वर्क फ्रॉम होम पर चले गए थे। हम लोगों ने 14-15 मार्च से ही उन लोगों को वर्क फ्रॉम होम देना शुरू कर दिया था, जो पब्लिक ट्रांसपोर्ट से या काफी दूर से आते थे। जब तक जनता कर्फ्यू लागू हुआ था, हमारी टीम के बहुत सारे सदस्य घर से काम करना शुरू कर चुके थे। हालांकि, अभी भी कुछ लोग हैं जो ऑफिस आते हैं और ये वो लोग हैं, जिनका काम घर से नहीं हो सकता है, लेकिन इनकी संख्या काफी कम है। हमारे लिए वर्क फ्रॉम होम आसान इसलिए रहा कि ऑनलाइन सीएमएस है और हमारी हाइपर लोकल की टीम कानपुर, लखनऊ व आगरा आदि जगहों से काम करती है और उनकी वर्किंग पूरी सेट है तो हमें वर्क फ्रॉम होम से बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं आई। हां, एक जो न्यूज रूम का स्पंदन होता है, न्यूजरूम की आदत होती है, पत्रकारिता में न्यूज रूम का एक जो वाइब्रेशन होता है, ऊर्जा होती है, वो जरूर बहुत से लोगों ने शुरुआत में मिस की, लेकिन धीरे-धीरे ये आदत पड़ गई और ये भी समझ में आ गया कि इस तरह भी आप बड़ी खबरों से, ब्रेकिंग खबरों से जुड़े रह सकते हैं।

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

मेरा मानना है कि निश्चित तौर पर बदलाव आएगा। बहुत सारे लोग ऐसे भी विचार कर रहे हैं कि इस वर्क फ्रॉम होम को और कुछ समय तक चलाया जाए। केवल डिजिटल के लोग ही नहीं, बल्कि प्रिंट के लोग भी धीरे-धीरे घर से काम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दरअसल, लोगों को समझ आ गया है कि कोरोना इतनी जल्दी खत्म होने वाला है नहीं। ऐसे में ये जो कार्य संस्कृति पनपी है, इसे लोग चलाएंगे। ऐसे भी कई लोग हैं, जिनके पास अपनी बिल्डिंग नहीं है और वे किराए के दफ्तरों से काम चला रहे हैं, इनमें से कुछ तो इस किराए को बचाने की कोशिश करेंगे। मेरा मानना है कि कार्य संस्कृति में तो क्रांतिकारी तब्दीलियां आने वाली हैं और कोरोना से पहले की मीडिया की दुनिया और कोरोना के बाद की मीडिया की दुनिया निश्चित ही अलग होने वाली है।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

भरपाई हो न हो, लेकिन सबस्क्रिप्शन मॉडल को सफल होना पड़ेगा, क्योंकि डिजिटल में रेवेन्यू की कमी पहले से ही बहुत ज्यादा चुनौती बनी हुई थी। आज से दो-तीन साल पहले तक जिस बैनर के इम्प्रेशंस के लिए आपको 150-200 रुपए मिल जाया करते थे, उसके अब 20,25 या फिर 50 रुपए मिलने लगे हैं, तो आप ज्यादा पेजव्यू लाकर भी उतना पैसा नहीं कमा पाते हैं, जितना आप पहले कमा लिया करते थे और ये धीरे-धीरे खराब ही हो रहा है, क्योंकि डिजिटल में एंट्री लेवल बहुत ही आसान है। आज कोई भी व्यक्ति दो लैपटॉप लेकर एक वेबसाइट शुरू कर सकता है। एंट्री लेवल की आसानी होने और बहुत सारे प्लेयर्स होने से और बड़ा पैसे का हिस्सा फेसबुक और गूगल के पास जाने से दिक्कतें काफी समय से थीं। जो विदेशों में मॉडल अपनाया गया, जिसकी चर्चा बार-बार होती है। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का जो अधिकतर पैसा आ रहा है, वो डिजिटल के सबस्क्रिप्शन से आ रहा है। कई संस्करण को बंद करके उन्होंने डिजिटल कर दिया। भारत में भी पैसे देकर आलेख पढ़ने की संस्कृति विकसित नहीं हुई थी, लेकिन इसके प्रयोग पिछले दो साल से बहुत तेजी से होने लगे थे। खासतौर से मैं कहूंगा कि पिछले साल भर के देश के तमाम पब्लिशर्स सबस्क्रिप्शन मॉडल के बारे में विचार कर रहे थे। लेकिन उस पर काम करने में संकोच कर रहे थे। अमर उजाला ही ऐसा चुनिंदा मीडिया हाउस है, जिसने अपने ई-पेपर को आज से पांच-छह महीने पहले ही सबस्क्रिप्शन मॉडल (पेवॉल) के पीछे डाल दिया था। हम उससे आगे बढ़े हैं। अंग्रेजी में ‘द हिन्दू’ जैसे कुछ एक प्रकाशकों ने पहले ऐसा किया था, लेकिन हम हिंदी के पहले ऐसे डिजिटल मीडिया हाउस हैं, जिसने अपने कंटेंट को पेवॉल) के पीछे डाला है। अगर आप अमर उजाला की वेबसाइट देखेंगे तो अमर उजाला प्रीमियम करके हमने नया सबस्क्रिप्शन मॉडल तैयार किया है। उसको लेने पर आपको वेबसाइट पर दिखाई देने वाले विज्ञापन नहीं दिखेंगे। दरअसल, डिजिटल के रेवेन्यू का सोर्स ही यही विज्ञापन हैं और कई पाठकों की दिक्कत होती है कि उन्हें ये विज्ञापन बोझिल लगते हैं। इसलिए अमर उजाला प्रीमियम से पाठकों को ऐसा अनुभव मिलेगा, जिसमें कोई विज्ञापन नहीं होगा। तो पाठकों को शुद्ध रूप से सामग्री पढ़ने को मिलेगी। समाचार पढ़ने को मिलेंगे, वीडियो देखने को मिलेंगे।

दूसरा, अमर उजाला प्रीमियम के सबस्क्राइबर्स को हम उसी मेंबरशिप में अपना ई-पेपर, जिसे हमने पेड कर रखा है, उपलब्ध कराएंगे और तीसरा, हम कुछ शो आधारित आलेख तैयार करवा रहे हैं, ऐसे आर्टिकल तैयार करवा रहे हैं, जो सिर्फ उन पाठकों को मिलेंगे, जो हमारे अमर उजाला प्रीमियम के सदस्य बनेंगे। तो ये बड़ी पहल हमने एक मीडिया समूह के रूप में की है, जिसको हम लॉन्च कर चुके हैं और इसका रिस्पॉन्स भी हमें बहुत अच्छा मिला है। तो जब आपके पास विज्ञापन से पैसा नहीं आएगा, तो कहीं न कहीं पाठकों को पैसा तो देना पड़ेगा ही।

देखिए, मीडिया इंडस्ट्री की सबसे बड़ी दिक्कत यही रही है कि इसकी जो इकनॉमिक है, आर्थिक गुणाभाग है, वो खराब रही है, फिर चाहे टेलिविनज चैनल हों, या फिर अखबार हों। दुनिया में ऐसा कौन सा उत्पाद होगा, जो भला अपनी लागत मूल्य से बहुत कम में बिकता हो। आज एक अखबार की कीमत 20-22 रुपए बैठती है, वो 5-6 रुपए में बाजार में बिकता है। टेलिविजन चैनलों के लिए उपभोक्ता सीधे-सीधे पैसे नहीं देते, वो तो बीच में जो डिस्ट्रीब्यूटर्स हैं, उनका पैसा देते हैं, फिर चाहे, टाटा स्काई हो या फिर एयरटेल हो। इसी तरह से डिजिटल पर भी व्यक्ति कंटेंट को पढ़ने का कोई पैसा नहीं दे रहा है। पैसा तो विज्ञापनों से ही मिल रहा था। आखिरकार कहीं न कहीं आप अच्छी सामग्री पढ़ना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पैसा देना पड़ेगा और जब पैसा देंगे तो जो कंटेंट आपको मिलेगा, उसकी गुणवत्ता बेहतर होगी। निरंतर अच्छी सामग्री आपको मिलेगी। क्योंकि उपभोक्ता पैसे देगा तो निश्चित ही न्यूजरूम्स की जवाबदेही बढ़ेगी और लगातार उसको बेहतर कंटेंट उपलब्ध कराना होगा। इसलिए यही मॉडल है, जिसके माध्यम से भविष्य में डिजिटल मालिकों का पैसा बन सकता है। इसलिए अन्य प्रकाशक भी पेवॉल के पीछे गए हैं और अमर उजाला ने भी ये प्रयोग किया है। सबसे पहले प्रयोग करने वाला अमर उजाला ही है। हिंदी प्रकाशन माध्यमों में तो पूरे कंटेंट को पेवॉल के पीछे ले जाने की जो सबस्क्रिप्शन  की, मेंबरशिप की व्यवस्था शुरू की गई है, उसमें अमर उजाला ने पहल की है, जिसका हमें रिस्पॉन्स भी अच्छा मिल रहा है। हमें लगता है कि अगर विज्ञापन से आय घट रही है तो आपको आय के नए तरीके खोजने पड़ेंगे, जिससे आपकी आय हो सके।   

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

देखिए, कुछ उपाय तो चलन में आ चुके हैं। जैसे कि मैं शुरू में जिक्र कर रहा था लोगों को ये समझना पड़ेगा कि जो एक पारंपरिक मीडिया संस्थान है, उसका महत्व क्या है? वहां पर जो संपादकीय व्यवस्था की छलनी लगी है, वो क्यों लगी है। तो बता दूं कि वो इसलिए ही लगी है, कि इस तरह की झूठी खबरें और अफवाहें बाजार में न फैलें। उससे होने वाले नुकसान बहुत घातक हैं। लड़ाइयां होती हैं, दंगे होते हैं। कहा जाता है कि झूठ के पैर नहीं होते हैं और यह बहुत तेजी से फैलता है। लिहाजा हर कोई व्यक्ति अब फैक्ट चेक भी करने लगा है क्योंकि झूठी खबरों का बाजार इतना गर्म है और इतनी तेजी से फैलता है कि अच्छे-बड़े मीडिया संस्थानों के न्यूजरूम में कई बार गफलत हो जाती है और गलत न्यूज प्रकाशित कर बैठते हैं। तो इसी को लेकर सभी को सामूहिक रूप से प्रयत्न करने पड़ेंगे। हमारी जो पत्रकारिता की बुनियादी शिक्षा है कि आप जब तक उस खबर को एक दो स्रोत से कंफर्म नहीं करेंगे, तब तक प्रकाशित नहीं करेंगे, उसका मजबूती से पालन करना होगा। आपके संवाददाता की भी खबर हो, तो उसे भी क्रॉस चेक कर लिया जाए, एजेंसी की खबरों में भी तथ्यों को जांच लिया जाए। ये जो पुरानी पारम्परिक पत्रकारिता है, उसका माध्यम बदल सकता है। पत्रकारिता के नियम और खबरों की सत्यता जांचने की तकनीक नहीं बदल सकती है। खबर को आपको सत्यापित करके ही प्रकाशित करना होगा, यही काम सारे जवाबदेह मीडिया संस्थानों का होता है और उनको आगे और मजबूती से यह करना होगा, क्योंकि तमाम सोशल मीडिया माध्यमों ने झूठी खबरों को तेजी से फैलाने का काम किया है। जो खबरें आपसी चर्चा में, नुक्कड़ में गप्प बनकर रह जाती थीं, वो अब बहुत तेजी से इधर-उधर फैलने लग जाती हैं। उन पर लगाम लगाने के लिए मीडिया हाउसेज को बेहतर तरीके से व्यवस्था करनी पड़ेगी और लोगों को भी ये जागरूक करना पड़ेगा कि वे किन समाचार माध्यमों पर भरोसा कर सकते हैं और किन पर नहीं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

BBC हिंदी के एडिटर मुकेश शर्मा ने बताया, महामारी ने किस तरह बदली डिजिटल मीडिया की 'दुनिया'

ऐसा होता है कि कभी भी कोई बड़ी घटना होती है तो एक स्पाइक आता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग आते हैं, फिर उसमें से बहुत सारे लोग चले जाते हैं, पर यह दिखता है...

Last Modified:
Tuesday, 26 May, 2020
Mukesh-sharma

इन दिनों कोरोनावायरस (कोविड-19) ने देश-दुनिया में अपना कहर बरपा रखा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। एक तरफ जहां अखबारों का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, वहीं इंडस्ट्री को मिलने वाले विज्ञापनों में काफी कमी आई है। ऐसे में इंडस्ट्री तमाम आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रही है। 

हालांकि, कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में चल रहे लॉकडाउन के बीच टीवी चैनल्स की व्युअरशिप तो बढ़ी है, लेकिन विज्ञापन के मामले में इस व्युअरशिप का लाभ नहीं मिल पा रहा है, वहीं डिजिटल की पहुंच इन दिनों पहले से ज्यादा हुई है। क्या डिजिटल में आई यह वृद्धि बरकरार रहेगी और विज्ञापनदाता फिर से इंडस्ट्री की ओर रुख करेंगे? क्या तमाम अखबारों द्वारा अपने ई-पेपर को सबस्क्रिप्शन मॉडल (पेवॉल) के पीछे ले जाने की रणनीति रेवेन्यू के लिहाज से कारगर साबित होगी, जैसे तमाम सवालों को लेकर समाचार4मीडिया ने ‘बीबीसी हिंदी’ के एडिटर मुकेश शर्मा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

जहां तक मैंने देखा है कि लॉकडाउन के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म की रीडरशिप काफी बढ़ गई है। उसका एक कारण यह भी रहा कि इस दौरान लोगों तक अखबार की उपलब्धता भी बाधित हुई। दूसरी बात ये कि घरों में आमतौर पर एक या दो टीवी सेट होते हैं। घर के तो सभी मेंबर लॉकडाउन में फंसे हुए हैं। कहने का मतलब ये है कि टीवी सेट भले ही एक-दो हों, लेकिन घरों में मोबाइल सेट ज्यादा हैं। इस वजह से डिजिटल का उपभोग यानी खपत (Consumption) बढ़ा है। एक मसला ये है कि पहले जो लोग न्यूज में बहुत ज्यादा रुचि नहीं भी रखते थे,उन लोगों ने भी काफी न्यूज देखी। इसका कारण ये है कि यह मुद्दा (महामारी) सीधे-सीधे स्वास्थ्य से जुड़ा है। ऐसा नहीं है कि यह इलेक्शन का मुद्दा है जिसमें कुछ खास लोगों की रुचि है, या वर्ल्ड कप हो रहा है, जिसका अलग पाठक/दर्शक वर्ग है। चूंकि यह महामारी सभी के स्वास्थ्य से संबंधित है, इसलिए सभी लोग इस बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर कहां पर क्या हो रहा है। हर व्यक्ति इस बारे में अपडेट और इंफॉर्मेशन जानना चाहता है कि आखिर क्या हो रहा है, यह महामारी कंट्रोल में आ रही है अथवा नहीं, संक्रमण कितना फैल रहा है अथवा कोई इलाज मिल पा रहा है अथवा नहीं। ये बातें जानने की सभी में जिज्ञासा थी। इसकी वजह से लोगों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख ज्यादा किया, क्योंकि वे अपडेटेड रहना चाहते हैं। अपडेट्स अथवा नई इंफॉर्मेशन के लिए वे तमाम न्यूज वेबसाइट्स पर जा रहे हैं। कई बार लोगों की किसी खास न्यूज वेबसाइट में रुचि होती है और वह उसी को पढ़ना चाहते हैं, जैसे तमाम लोग किसी एक ही अखबार को ज्यादा पसंद करते हैं और उसी को पढ़ना चाहते हैं। टीवी चैनल्स के बारे में भी आमतौर पर लोग अपनी एक राय बना लेते हैं और उसी के अनुसार अपने पसंदीदा चैनल को ही देखते हैं। लेकिन इस दौरान तमाम लोगों की वह आदत भी बदली और उन्होंने विभिन्न न्यूज प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल किया, क्योंकि वह जगह-जगह जाकर देखना, सुनना और पढ़ना चाह रहे थे। कहने का मतलब है कि डिजिटल का इस्तेमाल कुल मिलाकर काफी बढ़ा है और यह डिजिटल के लिए काफी अच्छी बात है। ऐसे में इसने प्रिंट के लिए काफी चुनौतियां भी पेश की हैं। 

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, बीबीसी विज्ञापनों को उस तरीके से बहुत ज्यादा नहीं लेता है, इसलिए बीबीसी के लिहाज से यह कहना थोड़ा मुश्किल काम है, लेकिन अन्य मीडिया प्रतिष्ठानों के लिहाज से देखें तो मसला इस चीज भी जुड़ा था कि लॉकडाउन के दौरान तमाम बिजनेस पर असर पड़ा। इसका प्रभाव विज्ञापन देने वालों पर भी काफी पड़ा। नकदी का काफी संकट है। इस स्थिति में विज्ञापन देने वालों को अपने पैसे का बैलेंस भी देखना है कि वे कितना खर्च कर सकते हैं। चूंकि इस दौरान डिजिटल की ग्रोथ काफी आगे बढ़ी, उसने इस मार्केट में विज्ञापनदाताओं के सामने तमाम अवसर जरूर पैदा किए हैं। तमाम विज्ञापनदाता जो पहले डिजिटल को लेकर सोचते थे कि एक बंडल पैकेज में साथ में हो जाएगा, मुझे लगता है कि आने वाले समय में अब बंडल पैकेज की जगह डिजिटल अपनी स्वतंत्र पहचान बना पाएगा।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

देखिए, तमाम मीडिया हाउसेज सिंगल मीडिया आउटलेट नहीं हैं। कुछ ही ऐसे हैं जो सिर्फ डिजिटल में काम कर रहे हैं। ज्यादातर मीडिया हाउस ऐसे हैं जो प्रिंट में हैं और साथ में उनका डिजिटल चलता है। टेलिविजन चैनल है और साथ में सपोर्टिंग में डिजिटल चलता है। चूंकि इन जगहों पर असर पड़ा है, इसलिए डिजिटल पर भी असर आने की बात देखी गई है। लेकिन केवल डिजिटल की बात करें तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर महामारी और लॉकडाउन का बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। चूंकि डिजिटल की ग्रोथ काफी हुई है, इसलिए इस पर सबसे कम असर हुआ है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लोग ज्यादा आए, डिजिटल का इस्तेमाल ज्यादा बढ़ा। लोगों ने ज्यादा खबरें पढ़ीं। मीडिया संस्थानों ने भी डिजिटल पर ज्यादा कंटेंट उपलब्ध कराया। कहने का मतलब है कि लॉकडाउन पर डिजिटल का ज्यादा असर नहीं है, लेकिन हर मीडिया हाउस की अपनी जो वित्तीय स्थिति है, वो सब चीजों को प्रभावित करती है। जैसा हमने देखा कि जिस मीडिया हाउस पर इसका जितना प्रभाव पड़ा, उसने उसी हिसाब से अपने यहां अलग-अलग कटौतियां कीं। लेकिन जो सिर्फ डिजिटल के माध्यम हैं, अगर आप उन्हें देखेंगे तो उन्होंने प्रिंट के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन किया है।     

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

दुनिया के बाकी देशों में जब प्रिंट का सर्कुलेशन कम हो रहा था तो भारत में अभी भी वह स्थिति नहीं थी। अब कोविड-19 के कारण जो परिस्थितियां पैदा हुई हैं, उसमें एक ये अलग चीज देखने को मिली है कि हर आयु वर्ग के लोग अब डिजिटल की ओर मुड़े हैं। मुझे लगता है कि लॉकडाउन में प्रिंट पर इसका थोड़ा असर पड़ेगा, क्योंकि पता नहीं कब लॉकडाउन पूरा हटेगा, कब उद्योग-धंधों अथवा विज्ञापनदाताओं की स्थिति थोड़ी बेहतर होगी और कब उनके पास इतना पैसा आएगा कि वे निवेश कर पाएंगे। कहने का मतलब है कि प्रिंट पर थोड़ा असर तो रहने वाला है लेकिन मुझे लगता है कि एक वक्त के बाद जब हालात थोड़े से सामान्य होंगे, तो फिर अखबार और मैगजींस का पुराना समय लौटेगा। लॉकडाउन में जरूर ऐसा हुआ है और स्थिति सामान्य होने में थोड़ा समय जरूर लगेगा, इसके बाद लोगों की प्रिंट की ओर वापसी फिर शुरू होगी।   

इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

इस महामारी के दौरान मीडिया आवश्यक सेवाओं में शामिल रहा है। मुझे लगता है कि मीडिया ने बहुत ही मजबूती के साथ और बहुत ही बहादुरी के साथ काम किया। मीडियाकर्मी लगातार घर से बाहर निकल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उनके परिवार वाले चिंतित नहीं हैं, लेकिन उनका बाहर निकलना जरूरी भी है, क्योंकि लोगों तक सूचनाएं पहुंचना जरूरी हैं। यह काफी काफी चुनौती वाला रहा। बीबीसी की बात करें तो जैसे ही लॉकडाउन के पहले चरण की शुरुआत होने वाली थी बल्कि जब जनता कर्फ्यू लग रहा था, उसी समय हम लोगों को ये अंदाजा हो गया था कि आने वाले समय में ये पाबंदियां बढ़ेंगी। हमने बिल्कुल शुरुआत के दौर में ही यह लागू करना शुरू कर दिया था कि घरों से काम कितना शिफ्ट हो सकता है। एक वक्त ऐसा था जब सामान्य समय में नहीं लगता था कि ऐसा हो सकता है, पर आज ऐसा हो रहा है। डिजिटल का कामकाज वैसे भी घर से करना इसलिए आसान हो जाता है कि यदि कंपनी ने लैपटॉप और जरूरी सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराए हैं तो ज्यादा दिक्कत नहीं आती है और प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनल्स की तुलना में आप डिजिटल का काम घर से आसानी से कर सकते हैं।

हमने उसी स्ट्रैटेजी के तहत शुरू में बैलेंस बनाने की कोशिश की कि मिनिमम और मैक्सिमम कितने लोगों की ऑफिस में रिक्वायरमेंट होगी, जिसे देखकर यहां बाकी सभी लोगों को वर्क फ्रॉम होम करने की इजाजत दे दी गई। हमने यह भी तय किया कि एम्प्लॉयीज हर दिन ना आए, लिहाजा इसके लिए काम के घंटे तय करने की जरूरत पड़ी, तो वह भी किया। बीबीसी में हम लोगों ने पहले तो इस तरह से बैलेंस बनाने की कोशिश की कि कुछ लोग ऑफिस आएं और कुछ लोग घर से ही काम करें और दूसरा यह कि इसमें भी थोड़ा रोटेशन हो सके, तो इसके लिए यह किया कि जो लोग ऑफिस आ रहे हैं, वह कुछ समय बाद घर से काम कर सकें और घर से काम कर रहे एम्प्लॉयीज कुछ समय बाद ऑफिस आ सकें, ताकि सभी में  थोड़ी सी सेंस ऑफ सिक्योरिटी और थोड़ी सी सुरक्षा की भावना रहे। और फिर कार्यालय ने यह भी ध्यान में रखा कि ऑफिस आने के लिए क्या साधन हो सकते हैं, क्या सुविधाएं हो सकती हैं, ताकि एक्सपोजर कम से कम हो सके।

शुरुआती समय में हमने टेक्नोलॉजी को ज्यादा अडॉप्ट किया था। फील्ड में जाना रिपोर्टिंग का एक अहम हिस्सा होता है। पर उस समय हमें यह भी समझ में आया कि एक बैलेंस बनाने की जरूरत थी और पहले वह कुछ इस तरह का होना था, जिसमें हमें अपने जर्नलिस्ट और पूरे ऑपरेशन की सेफ्टी भी देखनी थी, लिहाजा हमने न्यूज गैदरिंग के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा ज्यादा से ज्यादा लिया। लोगों से बात करने व इंटरव्यू करने के किए जूम, स्काइप या फिर अन्य माध्यमों का प्रयोग किया, ताकि जर्नलिस्ट सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर सकें। शुक्रगुजार हैं कि शुरुआती समय में ही हमारे यहां उठाए गए ऐहतियाती कदमों के चलते हमारा कोई भी रिपोर्टर कोरोनावायरस के संक्रमण में नहीं आया और हम अभी भी बचते हुए चल रहे हैं।

फिलहाल अपने पूरे ऑपरेशन के लिए बैलेंस बनाकर चलने की कोशिश करना पहली स्ट्रैटजी थी, जबकि दूसरी स्ट्रैजटी कंटेंट से जुड़ी है। कंटेंट से जुड़े हिस्से में हमको यह समझ में आया कि लोगों को इंफॉर्मेशन जानने की उत्सुकता तो है पर उन्हें क्रेडिबल इंफॉर्मेशन यानी भरोसेमंद सूचनाएं चाहिए। ऐसे समय पर यह बहुत बड़ी रिक्वायरमेंट है और भारत में बीबीसी को लोग एक विश्वसनीय माध्यम की तरह देखते हैं। यदि कोई ऐसी खबर है, जो उसे चेक करनी है तो वह बीबीसी पर चेक करना चाहता है। इसलिए यह जो क्रेडिबिलिटी बीबीसी के साथ जुड़ी हुई है, उसे देखते हुए ही हम चाहते हैं कि ऐसी कोई भी सूचना बीबीसी के जरिए न जाए, जो भरोसेमंद न हो। इसे पहले भी हम ध्यान में रखते थे और अब भी ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं, जब इस समय इसकी जरूरत ज्यादा महसूस की जा रही है। लिहाजा इसके लिए हमने ध्यान रखा कि सिर्फ ग्लोबल लेवल पर एक्सेप्टेड चीजें हो रही हैं, हम उसी को ब्रॉडकास्ट करें। इसके लिए हमने डब्ल्यूएचओ की एडवाइजरी ध्यान में रखी और भी बहुत सारी चीजें ध्यान में रखीं। ऐसा नहीं है कि लोकल गाइडेंस और एडवाइजर्स पर भरोसा नहीं है पर जो चीजें समय की मांग है और ग्लोबल लेवल पर अप्लाई हो रही है, हमने उस पर भरोसा किया ताकि हंड्रेड परसेंट सही सूचनाएं लोगों के पास पहुंचें।

इस पूरे समय में हमने पूरा ध्यान कोरोनावायरस से जुड़े कंटेंट की ओर लगाया ताकि लोगों की जो ज्यादा से ज्यादा जिज्ञासाएं हैं, उन्हें शांत किया जा सके। अन्य भारतीय भाषाओं में, जहां भी बीबीसी काम करता है, हमने सब जगह इसी स्ट्रैटेजी के साथ काम किया है। इस दौरान कोरोना से जुड़ी हुई जितनी भी ऑथेंटिक इंफॉर्मेशन और जितनी जल्दी उन तक सूचनाएं पहुंचाई जा सकें, इस पर कंटेंट के लिहाज से काम किया गया।

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

ऐसा होता है कि कभी भी कोई बड़ी घटना होती है तो एक स्पाइक आता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग आते हैं, फिर उसमें से बहुत सारे लोग चले जाते हैं, पर यह दिखता है कि हर मीडिया संस्थान  उस स्पाइक को मेंटेन कर लेता है। स्पाइक होता है तो मुझे लगता है कि हर संस्थान में पहले के मुकाबले पाठकों और दर्शकों की संख्या बढ़ गई है। निश्चित रूप से इसमें से कुछ लोग अलग-अलग माध्यमों पर चले जाएंगे, लेकिन इनमें से कुछ लोग रिटेन भी हो जाएंगे। मुझे लगता है कि आने वाले समय में मीडिया संस्थान स्वास्थ्य संबंधी खबरों पर भी ध्यान रखेंगे। अभी तक ऐसा दिख रहा था कि जन स्वास्थ्य से जुड़ी खबरें पॉलिटिकल की कवरेज के आगे कहीं पीछे छूट जाती थीं, पर मुझे यह लगता है कि अब मीडिया संस्थान के लिए यह लर्निंग का समय है। पब्लिक हेल्थ को लेकर अब हर मीडिया संस्थान को थोड़ा सा ज्यादा काम करना चाहिए, ज्यादा से ज्यादा लोगों में जागरूकता लानी पड़ेगी, लिहाजा इससे पाठकों में उसके प्रति जागरूकता बढ़ेगी।

मुझे लगता है कोविड-19 के खत्म होने के बाद हेल्थ से जुड़ी खबरों पर मीडिया संस्थान फोकस करेंगे, तो वह और लोगों को अपने साथ रोक पाएंगे। हेल्थ से जुड़ी वेबसाइट्स आगे बढ़ेंगी, लेकिन क्रेडिबिलिटी की बात जरूर आएगी। कई बार क्या होता है कि जो खबर आप पढ़ रहे हैं, उस पर आप कितना भरोसा कर रहे हैं, यह कहीं न कहीं निर्भर करेगा उस प्लेटफॉर्म पर भी, कि वह ऑथेंटिक मीडिया ऑर्गेनाइजेशंस है या नहीं। दरअसल, यहां कहना चाहूंगा कि मीडिया संस्थान जब हेल्थ के ऊपर फोकस करेंगे, तो लोग उनकी ओर ज्यादा जाएंगे, बजाय छोटी जगहों के, क्योंकि छोटी जगहों पर थोड़ा सा भरोसे का संकट बना रहता है। लेकिन मैं यह भी नहीं कहूंगा कि लोगों का आंख मूंदकर के बड़े संस्थानों पर भरोसा हो जाता है, लेकिन हां छोटे संस्थानों के मुकाबले बड़े संस्थानों में भरोसा थोड़ा ज्यादा रहता है।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

देखिए, बीबीसी एक पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर है, लिहाजा इस नाते जनता से जो ब्रिटेन में पैसा आता है उससे बीबीसी को फंड मिलता है और उस फंड से ही बीबीसी ब्रॉडकास्टिंग करता है। तो ऐसे में बीबीसी के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल लागू करना मुश्किल है। और वैसे भी बीबीसी दुनिया की 40 से ज्यादा भाषाओं में ब्रॉडकास्ट करता है, इसलिए अचानक से यह फैसला नहीं हो सकता और फिर यह एक जगह किया हुआ फैसला तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता। बीबीसी के लिए पे मॉडल के पीछे कंटेंट ले जाना एक बहुत ही बड़ा फैसला होगा, जिसके लिए इस समय ऐसी कोई चर्चा करना मुश्किल है क्योंकि इस समय ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ऑथेंटिक सूचनाएं पहुंचाना बीबीसी की प्राथमिकता है।

देखिए, सबस्क्रिप्शन मॉडल का लागू करना मार्केट-टू-मार्केट पर निर्भर करता है। जैसे उन मार्केट्स में जहां लोगों के पास देने के लिए पैसा है। अब यूएस को देखिए, यहां की पब्लिक के पास ऐसी चीजें अफोर्ड करने के पैसे हैं, लिहाजा यह मॉडल यहां पहले शुरू हुआ। भारत जैसे देश में इस मॉडल को लागू करना आसान काम नहीं है। लोग पब्लिक से फंड की अपेक्षा तो कर सकते हैं, लेकिन पेवॉल के पीछे कंटेंट को ले जाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। या फिर बहुत ही छोटा वर्ग होगा, जिसको आप  टारगेट कर पाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि जो अखबार या चैनल है, वे सबस्क्रिप्शन कितने कम पैसे के ऊपर देते हैं, तो ऐसे में डिजिटल को पेवॉल के पीछे ले जाना यह बहुत ही मुश्किल काम होगा और इस समय अर्थव्यवस्था की हालत तो आप देख ही रहे हैं, यह आने वाले समय में शायद और बड़ी चुनौती बन जाए। इसलिए इतना आसान नहीं है इसे लागू कर पाना। लिहाजा बीबीसी भी अभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा, क्योंकि एक तो बीबीसी का इतना बड़ा ऑपरेशन है कि अगर कह भी दें कि वह ऐसा कहीं करना भी चाहे, तो बीबीसी को किसी एक मार्केट में देखना पड़ेगा, क्योंकि यूके जैसी मार्केट, जोकि प्राइमरी मार्केट है, वहां तो पहले से ही पब्लिक पैसा दे रही है, फिर वहां कंटेंट को पेवॉल के पीछे ले जाने से एक विचित्र स्थिति बन जाएगी। बीबीसी के इतने बड़े ऑपरेशन को देखते हुए यह बहुत ही मुश्किल और चुनौती भरा काम होगा। लेकिन पैसे को लेकर जब हर मार्केट में स्थिति एक जैसी है तो, बीबीसी के ऊपर भी प्रेशर होगा, लेकिन पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर होने के नाते बीबीसी के लिए यह इतना आसान नहीं है।

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

आपने देखा होगा कि बीबीसी साइट तो हमेशा से ही फेक न्यूज के खिलाफ पूरी की पूरी रीढ़ है। रियलिटी चेक और फैक्ट चेक के नाम से बीबीसी लगातार चीजें प्रोवाइड कराता है, जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि बीबीसी के साथ एक क्रेडिबिलिटी जुड़ी हुई है, तो हम उसी को और बेहतर कर सकते हैं। पहले भी हम लोगों को गलत खबरों की जांच करके बताते थे, और इस दौरान भी बीबीसी लगातार इस पर ही काम कर रहा है और वह भी दो तरह से। एक तो मेडिकल फील्ड में, जहां आपने देखा होगा कि मेडिकल फील्ड में कुछ ऐसी खबरें आने लगी है कि गर्म पानी पियो तो कोरोनावायरस का प्रभाव नहीं होगा, किसी ने कहा ठंडा पानी पियो तो कोरोना का प्रभाव नहीं होगा, तो किसी ने कहा मौसम बदलेगा तो कोरोना का असर खत्म हो जाएगा। देखिए, हर रोज कभी किसी को लेकर, तो कभी किसी के नाम की फेक चर्चा होने लगती है। बीबीसी ने इस पर बहुत सावधानी से काम किया है। बीबीसी ने लगातार ऐसी हर चीज का फैक्ट चेक करके बताया कि यह सच है या गलत है। आप जो यह बहुत सारे दावे पढ़ रहे हैं यह सच है या गलत। बीबीसी ने इस दौरान खास तौर पर यह काम किया और एक्रॉस द लैंग्वेज किया। इंग्लिश में किया और इन्हीं चीजों को हमने यहां अभी रिप्लिकेट किया। भारत में भी इस दौरान कई तरह की फेक न्यूज फैलीं और हमने उन्हें बस्ट करने का काम किया। वैसे भी बीबीसी फेक न्यूज थोड़ा ज्यादा ही बस्ट करने का काम करता है। इस दौरान भी जिन लोगों के मन में कोई मिथक बन गया है, उसे तोड़ने के लिए बीबीसी ने लगातार खास कंटेंट दिया है।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

TOI के सबस्क्रिप्शन मॉडल के पीछे यह रही बड़ी वजह: शिवकुमार सुंदरम

बीसीसीएल की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन बोले, अधिकतर लोग अखबार के प्रिंट संस्करण को देते हैं प्राथमिकता, जबकि ई-पेपर अंतरिम विकल्प है

Last Modified:
Thursday, 21 May, 2020
Sivakumar Sundaram

देश के प्रमुख अंग्रेजी अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ (The Times of India) ने पिछले हफ्ते अपने ई-पेपर को पढ़ने के लिए इस पर सबस्क्रिप्शन मॉडल लागू किया है। यानी अब इस अखबार का ई-पेपर पढ़ने के लिए पाठकों को इसे सबस्क्राइब करना होगा, जिसके लिए शुल्क भी चुकाना होगा। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ द्वारा यह फैसला लिए जाने के बाद इंडस्ट्री में यह चर्चा जोरों पर उठने लगी है कि क्या अन्य प्रिंट प्लेयर्स भी इसका अनुसरण करेंगे और गिरते रेवेन्यू को बचाने के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाएंगे। अखबार द्वारा उठाए गए कदम और इंडस्ट्री में चल रहीं इस तरह की चर्चाओं के बीच तमाम सवालों को लेकर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड’ (BCCL) की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन शिवकुमार सुंदरम से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने पिछले दिनों सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाने का फैसला लिया है। इसके पीछे क्या कारण रहा, इस बारे में कुछ बताएं

कोरोनावायरस (कोविड-19) ने हमारे जीने के अंदाज और लोगों से संपर्क करने के तरीकों को बदल दिया है। कोरोनावायस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए किए गए लॉकडाउन के कारण लोग इन दिनों अपने घरों पर ही हैं। इस दौरान किए गए तमाम सर्वेक्षणों से पता चला है कि लोगों द्वारा अखबार पढ़ने में बिताए जाने वाले औसत समय में काफी बढ़ोतरी हुई है। हमने नोटिस किया है कि प्रिंट वर्जन को काफी प्राथमिकता मिल रही है, लेकिन महामारी के दौर में कुछ मार्केट्स में डिस्ट्रीब्यूशन संबंधित चुनौतियां सामने आ रही हैं, ऐसे में ई-पेपर/डिजिटल पीडीएफ वर्जन बेहतर विकल्प के रूप में सामने आया है और डिस्ट्रीब्यूशन अस्थायी रूप से उस ओर शिफ्ट हो गया है। महामारी के इस दौर में विश्वसनीय खबरें सिर्फ आवश्यक ही नहीं है, बल्कि इनकी बहुत ज्यादा जरूरत है। लॉकडाउन के कारण हमारे अखबार की डिलीवरी हमारे सभी पाठकों तक सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, ऐसे में हमारी ड्यूटी है कि लोगों तक हम प्रमाणिक खबरें पहुंचाएं। ऐसे में मुफ्त में ई-पेपर उपलब्ध होने पर शरारत करने वाले तत्व समाचारों को डाउनलोड कर उनसे साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं अथवा फेक न्यूज को प्रसारित कर सकते हैं। ई-पेपर के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाकर हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि जो पाठक न्यूज का ऑरिजिनल वर्जन पढ़ना चाहते हैं वे इसकी प्रमाणिकता पर पूरा भरोसा कर सकते हैं।     
इस तरह हम अखबार के डाउनलोड किए गए और फॉरवर्ड किए गए वर्जन की खपत (consumption) को हतोत्साहित करते हैं, क्योंकि इस नाजुक समय में यह हमारे समाज के लिए भ्रामक और खतरनाक हो सकता है। वॉट्सऐप ग्रुप्स पर जो भी मुफ्त में और फॉरवर्ड होकर मिलता है, उसका कोई महत्व नहीं है। कंटेंट को तैयार करने और उसे सहेजने में हम काफी समय, श्रम और पैसा खर्च करते हैं। ऐसे में अपने ई-पेपर के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल को अपनाने के पीछे हमारा मकसद इस प्रयास को प्रदर्शित करना और इसे वह सम्मान देना है, जिसका वह हकदार है।

क्या यह कदम सीधा लॉकडाउन से जुड़ा हुआ है या पहले से ही इसकी तैयारी थी?

यह कदम लॉकडाउन में जरूर उठाया गया है, लेकिन लंबे समय से यह एक अनिवार्यता थी। हमारा मानना है कि अखबार का प्रिंट वर्जन अभी भी सबसे बेहतर है। इसके बाद ई-पेपर का नंबर आता है। अखबारों का प्रिंट संस्करण ऐसी आदत है जो पूरे दिन को एक आकार देती है। यह उन समाचारों का एक क्यूरेटेड फीड है जो हमारे द्वारा रोजाना दुनिया के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी की आवश्यकता को पूरा करता है। हमारा कोई भी मीडिया प्लेटफॉर्म चाहे प्रिंट हो, टीवी हो, आउट ऑफ होम (OOH) हो या रेडियो अथवा डिजिटल हो, उसकी अपनी एक अलग वैल्यू है, अलग अपील है और अपना खुद का बिजनेस मॉडल है। इन सभी प्लेटफॉर्म्स ने ऑडियंस के लिए अपने कंटेंट को बेहतर तरीके से तैयार किया है और उसके द्वारा ऑडियंस के बीच अपना भरोसा स्थापित किया है। बिना सोचे समझे वॉट्सऐप ग्रुप्स पर ई-पेपर्स को फॉरवर्ड किया जा रहा है। यह भी एक कारण है कि इंडस्ट्री अपने अखबार को सबस्क्रिप्शन मॉडल पर रख रही है और वॉट्सऐप पर ई-पेपर्स को फॉरवर्ड करने को गैरकानूनी बता रही है।     

यह फैसला लॉकडाउन खत्म होने के बाद आपके बिजनेस की गतिशीलता (dynamics) को किस प्रकार बदल देगा?

अपने पाठकों की न्यूज पढ़ने की आदतों के बारे में हमारे द्वारा कराए गए शोध के कई हालिया नतीजों से स्पष्ट पता चलता है कि उनमें से 90 प्रतिशत से अधिक पाठक अखबार के प्रिंट वर्जन को प्राथमिकता देते हैं। ई-पेपर अंतरिम विकल्प है और मेरा अनुमान है कि लॉकडाउन के बाद परिदृश्य लॉकडाउन के पहले जैसी स्थिति में वापस आ जाएगा।  

भारतीय बाजार के लिए इस सबस्क्रिप्शन आधारित मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? इस दिशा में मार्केट की गतिशीलता के बारे में आपको क्या उम्मीद है?

अपने देश में अखबारों समेत विभिन्न मीडिया में सबस्क्रिप्शन मॉडल प्रचलन में रहा है। यह नई बात नहीं है। आगे जाकर संभवत: यह इसी दिशा में आगे बढ़ेगा। अधिकांश न्यूज मीडिया रेवेन्यू के मुख्य सोर्स के रूप में एडवर्टाइजिंग पर भरोसा रखना जारी रखेंगे। एडवर्टाइजर्स के नजरिये से देखें तो अखबार उपभोक्ताओं के प्रोफाइल, तत्काल पहुंच का प्रभाव, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता का अनूठा संयोजन है। यह विस्तृत जानकारी देने का अवसर प्रदान करता है। निकट भविष्य में भी अखबार के ये एडवांटेज बने रहेंगे। मुझे मुझे कोविड-19 के वर्तमान दौर में इस तरह के बदलाव की उम्मीद नहीं है।

इस दृष्टिकोण से निकट भविष्य में और लंबे समय के लिए आप कितने प्रतिशत रेवेन्यू प्राप्त होने की उम्मीद कर रहे हैं?

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि यह कवायद रेवेन्यू जुटाने के मकसद से शुरू नहीं की गई है। रही बात रेवेन्यू  की तो मेरा मानना है कि ई-पेपर का रेवेन्यू अभी और भविष्य में भी मामूली ही रहेगा।

क्या आप इंडस्ट्री से उम्मीद करते हैं कि वह इस बिजनेस मॉडल को सर्वसम्मति से अपनाने के लिए मिलकर एक साथ आए?

यह बिजनेस मॉडल में बदलाव नहीं है। हां, सबस्क्रिप्शन मॉडल पर इंडस्ट्री निश्चित रूप से एक साथ है और मुझे पूरा विश्वास है कि प्रत्येक प्रिंट पब्लिकेशन जल्द ही अपनी योजनाओं की घोषणा करेगा। अधिकांश तो ऐसा कर भी चुके हैं।  

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

'जनसत्ता' न्यूज पोर्टल के एडिटर विजय झा ने बताया, COVID -19 के बाद कैसा होगा डिजिटल मीडिया

विज्ञापन की बात करें तो कई सारी कंपनियों की गतिविधियां बंद होने के चलते विज्ञापन के दरवाजे अभी बंद हैं। ऐसे में प्रिंट हो, टीवी हो या डिजिटल, सब जगह विज्ञापन की स्थिति कमोबेश एक जैसी ही है।

Last Modified:
Thursday, 21 May, 2020
VIJAY JHA

कोरोनावायरस (कोविड-19) का मीडिया इंडस्ट्री पर भी काफी असर दिखाई दे रहा है। एक तरफ जहां अखबारों का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, वहीं इंडस्ट्री को मिलने वाले विज्ञापनों में काफी कमी आई है। ऐसे में इंडस्ट्री तमाम आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रही है। हालांकि, कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में चल रहे लॉकडाउन के बीच टीवी चैनल्स की व्युअरशिप तो बढ़ी है, लेकिन विज्ञापन के मामले में इस व्युअरशिप का लाभ नहीं मिल पा रहा है, वहीं डिजिटल की पहुंच इन दिनों पहले से ज्यादा हुई है। क्या डिजिटल में आई यह वृद्धि बरकरार रहेगी और विज्ञापनदाता फिर से इंडस्ट्री की ओर रुख करेंगे? इन्हीं तमाम सवालों को लेकर समाचार4मीडिया ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ समूह के हिंदी न्यूज पोर्टल ‘जनसत्ता .कॉम’(jansatta.com) के एडिटर विजय झा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

वैसे तो टीवी और डिजिटल दोनों की ही व्युअरशिप बढ़ी है। वहीं ओवरऑल देखें, तो डिजिटल की व्युअरशिप ज्यादा बढ़ी है, क्योंकि इसका दायरा यदि व्यापक कर दें यानी इसमें ओटीटी प्लेटफॉर्म को भी शामिल कर लें तो डिजिटल की व्युअरशिप में बहुत ही ज्यादा बढ़त देखने को मिली है और ऐसा इसलिए क्योंकि इसकी पहुंच लोगों तक बाधित नहीं हुई है, लिहाजा इसकी व्युअरशिप बढ़ना स्वभाविक है।

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

विज्ञापन की बात करें तो कई सारी कंपनियों की गतिविधियां बंद होने के चलते विज्ञापन के दरवाजे अभी बंद है। ऐसे में प्रिंट हो, टीवी हो या डिजिटल, सब जगह विज्ञापन की स्थिति कमोबेश एक जैसी ही है। हां, एक बात और कि कुछ विज्ञापनों का स्वरूप बदला है और वह हर माध्यम में बदला है। टीवी, डिजिटल और प्रिंट में अब कुछ ऐसे प्रॉडक्ट्स के विज्ञापन आने लगे हैं, जो शायद पहले कभी नहीं आते थे। इनमें कुछ कंपनियों के प्रॉडक्ट्स ऐसे हैं जिससे लगता है कि कोरोना काल में उनकी उपयोगिता ज्यादा बढ़ सकती है, लिहाजा ऐसी कंपनियों ने अपने प्रॉडक्ट्स के विज्ञापन देने शुरू कर दिए हैं। लिहाजा इस तरह की कंपनियों ने विज्ञापन पर खर्च ज्यादा कम नहीं किया है, बाकी ऐसी कई कंपनियां हैं. जिनका काम और प्रॉडक्शन बंद हो गया है, सप्लाई भी बंद पड़ी है। इसलिए उन्हें विज्ञापन देने का कोई मतलब ही नहीं है। परिणाम स्वरूप इस डिवीजन में भी विज्ञापन की कमी रही है और मुझे लगता है आगे भी यह कमी एक दो-महीने तक रहेगी।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

अखबार या मैगजींस जो भी हैं, शुरू-शुरू में उनके सामने ये चुनौती जरूर रही कि उन्हें व्यापक तौर पर लोगों तक उपलब्ध कैसे कराया जाए और लोगों तक यह बताया कैसे जाए कि हमारा जो अखबार या मैगजीन है वह उसे डिजिटल फॉर्म में पढ़ सकते हैं। दूसरी तरफ चैलेंज यह भी रहा कि कुछ लोग डिजिटल पढ़ने में कम्फर्ट महसूस नहीं करते हैं। लिहाजा इसे मात देने के लिए टेक्नोलॉजी की मदद ली गई। वहीं, लोगों की भी मजबूरी रही क्योंकि  फिजिकल फॉर्मेट में उनके पास कोई अखबार ही नहीं मिल रहा है, जिसके बाद उनके पास कोई चारा ही नहीं बचा। या तो वे पीडीएफ डाउनलोड करके पढ़ें या फिर साइट पर जाकर ई-पेपर पढ़ें। हालांकि ये मजबूरी जरूर रही, लेकिन मेरी राय में कंपनियों को एक अनुमान जरूर मिल गया होगा कि अखबार को डिजिटल फॉर्म में उपलब्ध कराया जाए, तो क्या चुनौतियां होंगी और किस तरह से लोगों तक इसको पहुंचाया जाए। मैं यहां कहना चाहूंगा कि मजबूरी में ही सही पर उनको एक्सपेरीमेंट करने का एक मौका जरूर मिला है।

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

डिजिटल प्रिंट के लिए खतरे की घंटी नहीं है, क्योंकि खतरे की जो बात पहले की जा रही थी, वही आज भी की जा रही है, लेकिन यहां एक नया चैलेंज जरूर आया है, जो कि विज्ञापन में कमी आना है। प्रिंट एडिशन निकालना काफी खर्चे वाला काम है। मौजूदा हालात स्थाई नहीं है। पता नहीं कि यह 3 महीने चलें, 4 महीने या फिर 6 महीने तक चलें, लेकिन मान लीजिए कि हालात 6 महीने तक भी ऐसे रहते हैं तो प्रिंट के लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि इसकी लागत बहुत ही ज्यादा होती है।

जहां तक मुझे लगता है प्रिंट के लिए चैलेंज बढ़ गया है अगर प्रिंट सिकुड़ रहा है, तो डिजिटल को अपने आपको क्रेडिबल बनाना पड़ेगा, क्योंकि डिजिटल के सामने जो सबसे बड़ी समस्या है वह क्रेडिबिलिटी की। अगर कोई बड़ी और प्रभावशाली खबर डिजिटल पर आ जाए तो पाठकों का एक बड़ा वर्ग उस पर भरोसा नहीं करता है, नोटिस नहीं करता या फिर वह खबर चर्चा में नहीं आती है और इसका मुख्य कारण यही है कि डिजिटल अपने आपको उतना क्रेडिबल नहीं बना पाया है। डिजिटल मीडिया को यह जल्द से जल्द करना होगा और यदि वह अपनी क्रेडिबिलिटी नहीं बनाएंगे, तो प्रिंट के सिकुड़ जाने के बावजूद उन्हें उस तरह की स्वीकार्यता नहीं मिल पाएगी, जिस तरह प्रिंट की है। लिहाजा ज्यादातर लोग दूसरी तरफ जाने लगेंगे। जिन्हें लगता है कि सोशल मीडिया पर ऑथेंटिक सोर्स हैं, या यह हमारा परिचित है, या यह विश्वसनीय है जो कि गलत खबर नहीं दे सकता, वे उस ओर भी लोग जाने लग जाएंगे। क्योंकि आजकल सूचनाएं लोकलाइज्ड हो गईं हैं। लोकल इंफॉर्मेशन आज ग्लोबल स्तर तक सर्कुलेट हो रहीं हैं। ऐसे में यदि लोकलाइज्ड इंफॉर्मेशन जिन्हें चाहिए, वे उस लोकल ऑथेंटिक क्रेडिबल सोर्स पर जाने लग जाएंगे। हालांकि वो स्थित सही नहीं होगी, क्यों किसी भी स्थित में लोकल सोर्स होगा वह निष्पक्ष नहीं हो सकता है, वह जनपक्षधर नहीं हो सकता है, तो यह चैलेंज रहेगा। डिजिटल मीडिया को यह चाहिए कि वह क्रेडिबिलिटी के गैप को कितनी जल्दी और कितनी मजबूती से भर सकता है, तो वह उसके लिए बहुत ही फायदेमंद  रहेगा।

वहीं, प्रिंट के सिकुड़ने की चर्चा और इस पर डिबेट काफी समय से हो रही है कि प्रिंट अगर सिकुड़ रहा है तो क्या डिजिटल को इसका फायदा होगा? डिजिटल का अपने पास सबसे बड़ा जो फायदा है वह है उसकी ‘ग्लोबल रीच’ का और यह फायदा हमेशा उसके पास रहेगा। वैसे डिजिटल के लिए यह एक चैलेंज भी है और एक अपॉर्चुनिटी भी है यानी आप वरदान भी कह सकते हैं और अभिशाप भी। यदि कोई गलत इंफॉर्मेशन ऑफ देते हैं, तो आपकी क्रेडिबिलिटी नहीं रहेगी। आपकी डिश-क्रेडिबिलिटी ग्लोबल लेवल पर   जानी जाएगी, पहचानी जाएगी। ये अभिशाप है और वरदान यह है कि यदि क्रेडिबल इंफॉर्मेशन देते हैं तो आप ग्लोबल लेवल पर पहचाने जाएंगे। अखबार की एक सीमा है, इसलिए मेरी राय में इस संकट की वजह से प्रिंट मीडिया के सिकुड़ने की जो बात कही जा रही है, तो उसका डिजिटल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला, क्योंकि डिजिटल के लिए चैलेंज पहले भी थे और आज भी हैं। इस तरह के चैलेंजेस से  डिजिटल जितनी जल्दी निकलेगा, उतना ही उसका फायदा होगा।

इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

मार्च से ही हमारी पूरी डिजिटल टीम वर्क फ्रॉम होम कर रही है, यानी ऐसा करते हुए अब करीब दो महीने हो गए हैं। लेकिन घर से काम करने पर कुछ तो फर्क पड़ता है, जिसका सीधा असर आउटपुट पर होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि घर से काम करने के अपने कुछ चैलेंजेज होते हैं। इंफ्रास्कचर संबंधी चैलेंजेज है। कई बार होता है कि घर की बिजली चली गई, या फिर नेट कनेक्टिविटी में कुछ समस्या उत्पन्न हो गई। हम लोग बस यही ज्यादा से ज्यादा कोशिश करते हैं कि जो चैलेंजेज आ रहे हैं उन्हें कैसे कम किया जाए। इसके लिए पहले हम लोग सेक्शन वाइज मीटिंग करते थे, लेकिन अब हम लोग कम्बाइंड मीटिंग कर लेते हैं, यानी सभी सेक्शन की मीटिंग एक साथ कर लेते हैं। इस तरह से रास्ता निकालकर कॉर्डिनेशन में जो समस्या होती है उसे कम कर लेते हैं।

कोरोना काल के बाद क्या डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में आपको किसी तरह के बदलाव आने की उम्मीद दिखाई देती है?

डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में एक जो बदलाव आने की उम्मीद है, वो है कि प्रिंट मीडिया यदि सिकुड़ रहा है तो इसका इम्पैक्ट टीवी पर तो नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि टीवी का अपना इंफ्रास्टक्चर है, जो उसकी व्युअरशिप है, जो उसके काम करने का तरीका है वो स्थिर ही रहेगा। लेकिन कुछ अखबार मालिक कल को यदि ये तय कर लें कि हमे डिजिटल फॉर्म में ही अखबार को लोगों तक पहुंचाना है, तो डिजिटल मीडिया के लिए अतिरिक्त लाभ और चुनौतियां दोनों ही होंगी। इस तरह का बदलाव यदि आता है तो डिजिटल मीडिया को कैसे अपनी क्रेडिबिलिटी बनानी और बढ़ानी है, ये उसको देखना पड़ेगा। एक चैलेंज ये आएगा कि कैसे उसे अधिकांश पाठकों तक पहुंचाए, जैसा कि मैंने पहले कहा था।

आज हमारे पास मजबूरी है कि हमारे पास अखबार नहीं आ रहे हैं, जिसकी वजह से सूचनाओं के लिए हम टीवी देख रहे हैं, लेकिन यदि एक हफ्ते, दस या पंद्रह दिनों बाद टीवी भी मेरी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा, तो फिर हम अखबार ही मंगवाएंगे और अखबार नहीं मिलेगा, तो हम छोड़ देंगे। टीवी की व्युअरशिप खासकर नए शोज की व्युअरशिप यदि घटी है, तो उसका मुख्य कारण ये रहा है कि हमने टीवी नहीं देखा तो हमें लगता ही नहीं कि हमने कुछ मिस किया है। कुछ साल पहले तक ऐसा होता था कि यदि आज हमने अखबार नहीं पढ़ा, तो लगता था कि आज हमने कुछ मिस किया, लेकिन अब लोग कहते हैं कि ऐसा नहीं लगता, क्योंकि एक तो सूचना का स्रोत बढ़ा है, सूचना का पड़ाव बढ़ा है और सूचना का फैलाव हुआ है। लेकिन इस बीच अखबार ने अपने आपको नहीं बदला। मान लीजिए अभी की जो खबर आई वो हम जान गए, लेकिन कल वही खबर हमको अखबार में पढ़ने को मिलेगी, लिहाजा कल हमने अखबार नहीं पढ़ा तो हमें नहीं लगेगा कि हमने कुछ मिस किया। तो वही चीज है कि अखबार यदि अभी सिमटेगा और उसका लाभ डिजिटल को मिलेगा, तो डिजिटल को उस लाभ को बरकरार रखने के लिए अपनी जिम्मेदारी को और गंभीरता से लेना होगा और वो जिम्मेदारी क्रेडिबल बनने की है। यानी यूजर्स के मतलब की खबर देनी होगी, सही खबर देनी होगी।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

भारत में सबस्क्रिप्शन का मॉडल अब रहा नहीं है और वैसे भी यह मॉडल कोई नया नहीं है। ‘द हिन्दू’ कई सालों से इस मॉडल पर चल रहा है। लिहाजा लंबे समय से इस मॉडल को अपनाए जाने और काफी बड़ी संख्या में सब्सक्राइबर्स जुटा लेने के बावजूद ‘द हिन्दू’ अखबार आज ये नहीं कह सकता है कि वह प्रॉफिट में आ गया है, या उसके सब्सक्राइबर्स की संख्या डिजिटल रीडरशिप जितनी है और उसकी तुलना में वह संतोषजनक है। सबस्क्रिप्शन का मॉडल भारत में अभी तक सफल रहा नहीं है। कोई भी पब्लिकेशन सब्सक्रिप्शन के नाम पर बस यही कर सकता है कि अगर उसका डिजिटल एडिशन लाने में खर्च हो गया और इससे उसका थोड़ा खर्च निकल रहा है, तो वह लागू कर सकता है। ये नहीं कह सकते हैं कि इस मॉडल के आधार पर कोई बिजनेस कर लेगा या फिर सर्वाइव कर लेगा। यहां तक कि इस मॉडल से खर्चा-पानी भी निकालना मुश्किल हो जाएगा।

दूसरा सवाल यहां ये भी है कि अखबार में ऐसा क्या है, ऐसी कौन सी जानकारी है जिसके लिए हम पैसे दें। प्रिंटेड अखबार के लिए हम जो पैसे दे रहे हैं, उसकी वजह ये है कि एक तो हमारी आदत में शुमार है, दूसरी वजह है उसकी क्रेडिबिलिटी, अब है या नहीं ये अलग बात है। पर एक परसेप्शन है कि अखबार क्रेडिबल है। लेकिन हम ई-पेपर के लिए पैसा क्यों दें, इसमें क्या है हमारे लायक जिसके लिए हम पैसे का भुगतान करें। आप कल जो हमको खबर पढ़ाएंगे, वो तो हम आज ही जान चुके हैं। इसलिए मुझे नहीं लग रहा कि सबस्क्रिप्शन का जो मॉडल है वह सफल हो पाएगा। मेरे ख्याल से मॉडल विशेषकर डिजिटल में तभी सफल होगा, जब लॉयल यूजर्स बनाए जाएंगे और वह भी ऐसे यूजर्स, जैसे कि अखबारों के हैं, जो उसके लिए पैसे दे रहे हैं। वैसे ही आपकी खबरों के लिए आपको पैसा दे। इसके लिए सबसे पहले आपको ऐसी क्रेडिबल इंफॉर्मेशन देनी पड़ेगी, जिसके पढ़ने के लिए लोग आपको पैसा देने के लिए तैयार हो सके। डिजिटल के लिए चुनौती ये भी है कि अखबार के मुकाबले यहां रिजेक्शन ज्यादा आसान है।  

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

फेक न्यूज विशेषकर सोशल मीडिया साइट्स और प्रोपेगेंडा फैलाने वाले लोगों के जरिए ही फैलता है। न्यूज रूम में काम करने वाले लोगों का सिक्स सेंस यदि एक्टिव है, तो वे इसके जाल में नहीं फंसेंगे और वे समझ लेगें कि किसी एजेंडा के तहत इस खबर को आगे बढ़ाया जा रहा है। लिहाजा ऐसी खबरों से सिर्फ पाठकों के काम की ही खबर निकाल ली जाए और एजेंडा फैलाने वाली खबरों को छोड़ दिया जाए, तो इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। और यह सब न्यूज रूम में बैठे लोगों के सिक्स सेंस के जरिए ही हो सकता है।

फेक न्यूज जो फैलाता है, उसका तो एक एजेंडा होता है, लेकिन जिसका एजेंडा नहीं है, वो फैलाते हैं, तो वो इमोशनल होकर फैलाते हैं। इसलिए न्यूजरूम में हमें इमोशनल नहीं होना चाहिए और यदि इमोशन है तो सिर्फ जनता के प्रति होना चाहिए। जनता को ये नहीं लगना चाहिए कि लिखने वाला लेफ्ट है या राइट है। इसलिए यदि हमारा जन-पक्षधर नजरिया हो तो हम अपने आप फेक न्यूज को पहचान लेंगे। फिर जब हम लगातार काम करते हैं, लगातार एक्टिव रहते हैं, तो हमें पता होता है कि जो सोर्स है वो कितना ऑथेंटिक है।

वैसे हम लोग न्यूजरूम में हमेशा ये भी बताते रहते हैं कि ओरिजनल सोर्स पर ही खबर जानी चाहिए। यानी जो खबर आपको मिली है, उसका ऑरिजनल सोर्स क्या है। यदि आप ओरिजनल सोर्स तक चले गए, तो आपको पता चल जाएगा कि ये ऑथेंटिक है कि या नहीं है। वैसे आजकल टेक्नोलॉजी भी फेक न्यूज को रोकने में मदद कर रही है। कई सारे टूल्स है, जिनके जरिए वीडियो या फिर फोटो की पहचान की जा सकती है। आप ये देख सकते हैं कि ये वीडियो डॉक्टर्ड है या नहीं है। इस तरह के टेक्नीक की जानकारी है, तो भी आप क्रॉस चेक कर सकते हैं। कई लेवल पर क्रॉस चेक करने की जरूरत होती है, यानी अलग-अलग खबरों में अलग-अलग लेवल पर क्रॉस करने की जरूरत होती है। मान लीजिए किसी गांव से कोई खबर चली, तो आपने वहां के थाना इंचार्ज से बात कर ली, तो भी खबर कंफर्म हो जाएगी। इसलिए आप डिजिटली या फिजिकली तरीके से ऑरिजनल सोर्स तक पहुंच गए तो पता चल जाएगा कि कहीं ये खबर फेक न्यूज तो नहीं है।  

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

NDTV इंडिया के डिजिटल एडिटर विवेक रस्तोगी बोले, कारगर रही कोरोना से 'जंग' में यह रणनीति

एनडीटीवी इंडिया के डिजिटल एडिटर विवेक रस्तोगी का कहना है कि डिजिटल का फैलाव प्रिंट मीडिया के लिए खतरा नहीं बन सकता। हाथ में अखबार लेकर पढ़ने का आनंद मोबाइल फोन या लैपटॉप की स्क्रीन में नहीं आ सकता

Last Modified:
Thursday, 21 May, 2020
Vivek Rastogi

इन दिनों कोरोनावायरस (कोविड-19) ने पूरी दुनिया में अपना कहर बरपा रखा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। पहले ही तमाम परेशानियों से जूझ रही इंडस्ट्री के सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन काफी प्रभावित हुआ है। लोग अब डिजिटली अखबार पढ़ रहे हैं। इसी तरह के तमाम मुद्दों पर हमने 'एनडीटीवी इंडिया' की हिंदी वेबसाइट (khabar.ndtv.com) के एडिटर विवेक रस्तोगी से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

निश्चित रूप से कोरोनावायरस (COVID-19) के चलते लागू किए गए लॉकडाउन की वजह से अधिकतर आबादी घरों में बंद है। इसलिए टीवी की व्युअरशिप का बढ़ना लाज़िमी था। उधर, प्रिंट संस्करणों के वितरण से जुड़ी समस्याओं की वजह से उनका प्रसार शायद घटा होगा, लेकिन डिजिटल मीडिया इस लिहाज से मोटे तौर पर टीवी जैसा है, जिसके पास वितरण की समस्या नहीं है। इसलिए, समाचारों का विश्वसनीय स्रोत होने के नाते एनडीटीवी के पास डिजिटल में भी यूजर्स की संख्या बढ़ी है।

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

इस बारे में फिलहाल मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

लॉकडाउन और आने-जाने की पाबंदियों के अलावा संक्रमण के डर का प्रभाव निश्चित रूप से पड़ा है। प्रिंट के पास वितरण से जुड़ी समस्याएं भी रही हो सकती हैं, लेकिन टीवी और डिजिटल होने के चलते एनडीटीवी  ने कोरोनावायरस से पैदा हुई समस्या का वह विकराल रूप नहीं देखा, जो कुछ अन्य प्रिंट मीडिया संस्थानों को देखना पड़ा। इसके अलावा मीडिया हाउसों में संभवतः सबसे पहले 'वर्क फ्रॉम होम' शुरू करने के कारण भी एनडीटीवी के सामने कोविड-19 की समस्या भयंकर और डरावना रूप नहीं ले पाई। और हां, एनडीटीवी के दर्शक और यूजर्स उसके साथ हमेशा जुड़े रहते है, क्योंकि संकट काल में विश्वसनीय खबरें ज़्यादा पढ़ी जाती हैं।

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

मेरी व्यक्तिगत राय में डिजिटल का फैलाव प्रिंट मीडिया के लिए खतरा नहीं बन सकता, क्योंकि हाथ में अखबार लेकर पढ़ने का आनंद मोबाइल फोन या लैपटॉप की स्क्रीन में नहीं आ सकता। निश्चित रूप से वितरण की समस्या का खात्मा होते ही प्रिंट मीडिया के चाहने वाले अपने-अपने पसंदीदा अखबार की तरफ लौटेंगे। हां, इसके बावजूद डिजिटल मीडिया के लिए यह वक्त फायदेमंद हो सकता है, अगर वह यूजर की नब्ज को पकड़ पाए और उसकी पसंदीदा सामग्री उपलब्ध कराता रह सके।

इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

टीम के सभी सदस्यों द्वारा अपने-अपने घर से बैठकर भी टीम की तरह जुड़कर काम करने के लिए सबसे जरूरी था कि सभी एक-दूसरे को भलीभांति समझते-जानते हों। बस, इसी का लाभ मिला। परिवार जैसा माहौल होने के चलते सभी ने एक-दूसरे का ध्यान रखा और उससे भी ज़्यादा लाभदायक यह रहा कि सभी साथियों ने पूरी प्रतिबद्धता के साथ शिफ्ट के समय और घड़ी की तरफ निगाह नहीं डाली और ज़रूरत पड़ने पर हर समय शिफ्ट पर ही मौजूद नज़र आए।

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

कोविड-19 ज़ल्दी से गुजर जाने वाला नहीं है। जिस रोग का ओर-छोर, कारण और उपचार हमारे हाथ में नहीं है, उसके बारे में कोई भी भविष्यवाणी करना संभव नहीं हो सकता। लॉकडाउन के कारण लोगों के घरों में रहने का डिजिटल मीडिया को कुछ हद तक लाभ मिला और उसके यूजर्स बढ़े हैं। सो, मौजूदा परिस्थितियों के सामान्य हो जाने के बाद भी डिजिटल मीडिया संस्थानों के पास अवसर है कि वे अपने यूजर्स की जरूरतों को पहचानकर उन्हें उनकी पसंद की पठनीय सामग्री बाद में भी उपलब्ध कराते रहें और उन्हें किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर लौटने न दें।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

फिलहाल मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

फेक न्यूज का मुद्दा कतई नया नहीं है और इस पर चर्चा लंबे अरसे से चली आ रही है। संकट काल में इसके फैलाव की आशंका बढ़ जाती है, क्योंकि हमारे समाज का एक काफी बड़ा हिस्सा शोध और सत्यापन की स्थिति में नहीं होता, और न ही उन्हें इसकी आदत रही है। मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता उनके अपने हाथ में होती है। अगर सभी संस्थान एनडीटीवी  की भांति कोई भी समाचार 'सबसे पहले' देने के स्थान पर 'सही समाचार' देने का लक्ष्य बना लें, तो इस समस्या से कुछ हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। रही बात सोशल मीडिया की, तो हमारे-आपके बीच ही, यानी हमारे समाज में ही कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें किसी सत्यापन की जरूरत महसूस नहीं होती, जिसके चलते फेक न्यूज़ ज़ोर पकड़ती है। वैसे, फेक न्यूज़ फैलाने के पीछे लोगों के निहित स्वार्थ भी होते हैं और अज्ञान भी। इसलिए, इसके लिए सभी को मिलजुलकर प्रयास करने होंगे। सोशल मीडिया पर समाचार पढ़ने वालों को जागरूक करना होगा कि वे हर किसी ख़बर पर सत्यापन के बिना भरोसा न करें।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

Viacom 18 के पूर्व COO राज नायक ने बताया,महामारी से कितनी बदल जाएगी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री

हाउस ऑफ चीयर के फाउंडर व मैनेजिंग डायरेक्टर राज नायक ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान से की विशेष बातचीत

Last Modified:
Monday, 18 May, 2020
Raj Nayak

देश दुनिया में इन दिनों कोरोनावायरस (कोविड-19) कहर बरपा रहा है। कोरोनावायरस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए किए गए लॉकडाउन के कारण तमाम उद्योग धंधे प्रभावित हो रहे हैं। मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। लेकिन, इस मुश्किल दौर में ऐसे इंडस्ट्री लीडर्स भी हैं जो तमाम विपरीत परिस्थितियों का मजबूती से सामना कर रहे हैं और मजबूत इरादों के साथ डटे हुए हैं। ‘वायकॉम18’ (Viacom 18) के पूर्व सीओओ और ‘हाउस ऑफ चीयर’ (House Of Cheer) कंपनी के एमडी व फाउंडर राज नायक भी ऐसी ही चुनिंदा शख्सियतों में शामिल हैं। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान ने राज नायक से उनके वेंचर और वर्तमान हालात में मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की हालत समेत तमाम मुद्दों पर बात की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:   

एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री पर इस संकट का क्या प्रभाव पड़ेगा और यह कितनी बदल जाएगी?

मुझे नहीं लगता कि चीजें पहले जैसी होने जा रही हैं, खासकर निकट भविष्य में तो बिल्कुल भी नहीं। लॉन्ग टर्म फ्यूचर के बारे में मैं कुछ कह नहीं सकता, लेकिन यह संकट हर किसी के दिमाग पर किसी न किसी रूप में एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव जरूर डालेगा। यदि हम अपनी इंडस्ट्री की बात करें तो खासकर एडवर्टाइजिंग, मार्केटिंग और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में बिजनेस पूरी तरह से बदलने जा रहा है। आज हमने एक नई फिल्म ‘Gulabo Sitabo’ देखी है, जो सीधे अमेजॉन पर चल रही है। मैंने कई जगह पढ़ा है कि ब्रॉडकास्टर्स पहले ही प्रॉडक्शन हाउसेज से कॉस्ट में कटौती करने की बात कह रहे हैं। मुझे लगता है कि पूरा सेटअप बदलने जा रहा है। एडवर्टाजर्स को महसूस हो गया है कि वे कम कीमत में लोकल कंटेंट प्रड्यूस कर सकते हैं और उन्हें इसके लिए विदेश जाने की आवश्यकता नहीं है। कैश आज एक बड़ी समस्या है और जिसकी वजह से लोग अपनी जेब को ज्यादा ढीली नहीं करेंगे।

एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में कंटेंट का इस्तेमाल अथवा खपत (consumption) बढ़ने वाली है, लेकिन इस दौरान इसकी अर्थव्यवस्था खासकर नकदीकरण काफी चुनौती है। मैं ऐसे कुछ ब्रॉडकास्टर्स को जानता हूं, जिन्होंने कुछ प्रॉडक्शन हाउस को कहा है कि वे ज्यादा कमीशन नहीं देंगे, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि रेवेन्यू किस तरह का मिलने वाला है। मैं एक आशावादी व्यक्ति हूं और मेरा मानना है कि चीजें फिर से किसी तरह सामान्य होंगी, लेकिन इसमें समय लगेगा।  

क्या इस स्थिति में छोटे प्रॉडक्शन हाउसेज को लाभ मिलेगा?

कोविड-19 ने एक चीज की है कि इसने मुझ जैसे कई लोगों को टेक्नोलॉजी सेवी (tech savvy) व्यक्ति बना दिया है। मैं रोजाना कुछ न कुछ सीख रहा हूं। मैंने अब खुद से लाइव चैट करना शुरू कर दिया है। मैं जानता हूं कि पुरानी पीढ़ी अब अपने मोबाइल पर काम कर रही है। वे लोग जूम कॉल्स, फेसटाइम आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं और एक-दूसरे के साथ लूडो आदि खेल रहे हैं। मुझे लगता है कि जो लोग डिजिटल सेवी (digitally savvy) हैं और किफायती लागत पर अच्छी क्वालिटी का प्रॉडक्शन कर रहे हैं, उनका भविष्य काफी विशाल है।  
जिन चीजों के बारे में मैं सोच रहा था, उनमें से एक यह है कि मैं इस स्थिति का लाभ कैसे उठा सकता हूं? ऐसे कौशल वाले लोगों को ब्रैंड मैनेजर्स या कंपनियों के मार्केटिंग डायरेक्टर्स तक पहुंचने के लिए एक पुल (Bridge) अथवा किसी साधन की आवश्यकता होती है और मैं वह हो सकता हूं। एक ब्रॉडकास्ट कंपनी की मार्केटिंग हेड ने मुझे बताया कि किसी व्यक्ति ने उनसे संपर्क कर कहा कि उसने एक फिल्म तैयार की है, क्या वह इसे देखना पसंद करेंगी। इसके बाद उस मार्केटिंग हेड ने 50 हजार रुपए में उस फिल्म को खरीद लिया और उस पर अपना लोगो लगा दिया। मेरा मानना है कि प्रतिभाशाली लोगों के लिए यह एक अवसर है, जो घर बैठे ही इस मौके का फायदा उठा सकते हैं। यदि उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो उन्हें सही खरीदार तक पहुंचा सके तो मुझे लगता है कि यह एक बहुत बड़ा अवसर है।  

आपने हाल ही में प्रॉडक्शन की दुनिया में कदमरखा है। एक प्रड्यूसर के रूप में आप किस तरह का कंटेंट देख रहे हैं?

मैंने ‘हाउस ऑफ चीयर’ (House of Cheer) को खुशिया बांटने वाले बिजनेस (business of happiness) में कुछ नया करने के खास इरादे से शुरू किया था। मैंने कुछ तैयार किया था, लेकिन अब मुझे इसे फिर से डिजायन करना होगा। वर्तमान समय लॉन्च के लिए सही समय नहीं है। मैं इसे अपनी मां के जन्मदिन (22 मार्च) को लॉन्च करने की प्लानिंग कर रहा था, लेकिन तब लॉकडाउन की वजह से यह नहीं हो पाया।  

जहां तक कंटेंट की बात है तो मैंने निर्णय लिया था कि मैं एक प्रॉडक्शन हाउस नहीं बनना चाहता हूं, मैं गुड कंटेंट का क्यूरेटर बनना चाहता हूं। मैं लाइन प्रॉडक्शन को आउटसोर्स करता हूं और कुछ अच्छे प्रोजेक्ट्स को कुछ बड़े ‘ओवर द टॉप’ (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर ले जाता हूं। मैंने इसे होल्ड कर रखा था क्योंकि मैं किसी और चीज पर फोकस कर रहा था। कंटेंट के बिजनेस में बहुत ज्यादा समय लगता है, यह एक रात में नहीं हो सकता। मैं इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट था कि मुझे कुछ ऐसा बिजनेस करना है जिससे मुझे नियमित आधार पर कैश फ्लो मिल सके और तब मैं कंटेंट पर फोकस करूंगा।   

वर्तमान में हम एक निराशा अथवा उदासी भरे माहौल में जी रहे हैं और धीरे-धीरे इससे बाहर आ रहे हैं। ऐसे में सभी को किसी न किसी तरह के खुशी प्रदान करने वाले प्रॉडक्ट (happiness product) की जरूरत होगी। क्या आपको लगता है कि ‘हाउस ऑफ चीयर्स’ अपने समय से कुछ आगे है?

मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं। मेरी चुनौती सिर्फ यह है कि कई कंपनियां मेरा प्रॉडक्ट खरीदना चाहेंगी, लेकिन उतना पैसा खर्च नहीं करना चाहेंगी। इससे पहले मुझे अपने प्रॉडक्ट में कुछ बदलाव करने की जरूरत है। मुझे लगता है कि प्रत्येक विपरीत परिस्थिति में एक अवसर होता है। मैं इसे दो महीने के भीतर लॉन्च कर सकता हूं और हो सकता है कि मैं अगले छह महीने तक इंतजार करूं। मुझे कोई जल्दी नहीं हैं। मैं यहां टिकने के लिए आया हूं

ऐसे कठिन समय में आप खुद को कैसे मॉटिवेट रख रहे हैं और कैसे अपनी टीम को प्रेरित कर रहे हैं?

मेरे पास ज्यादा बड़ी टीम नहीं है। यह अच्छी बात है। मेरे पास बाहर रहकर काम करने वाले लोगों की बड़ी टीम है, जो मेरे साथ काम कर रहे हैं। इनमें मेरे वह पुराने सहयोगी अथवा लोग शामिल हैं, जिनके साथ मैंने पूर्व में विभिन्न संस्थानों में काम किया है। ये लोग मुझे बताते रहते हैं कि क्या हो रहा है और क्या नहीं, मुझे इस तरह काफी फीड बैक मिल रहा है। मैं ऐसे कई लोगों से जुड़ा हुआ हूं, जिनके साथ कई साल से मेरा संपर्क नहीं हो पाया था। इन दिनों व्यक्तिगत और पेशेवर के बीच कोई सीमा रेखा नहीं हैं। हम पहले के मुकाबले ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। मैं पढ़ रहा हूं और तमाम शो देख रहा हूं। अब मैं अपनी लाइव चैट कर रहा हूं और अपने गेस्ट्स पर थोड़ी रिसर्च कर रहा हूं। मैं व्यायाम भी कर रहा हूं जो पहले नहीं करता था। मैं अपने डॉगी के साथ भी समय बिता रहा हूं और इसके अलावा मैं अपनी बहन के साथ लूडो भी खेलता हूं।

राज नायक के साथ इस पूरी बातचीत का विडियो आप यहां देख सकते हैं

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

जानें, IRS के आंकड़े आने के बाद क्या बोले दैनिक भास्कर के प्रमोटर-डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल

दैनिक भास्कर ग्रुप के प्रमोटर- डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल ने ब्रैंड की सफलता की कहानी से लेकर देश में अखबारों की बदलती पठनीयता समेत तमाम मुद्दों पर‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ बातचीत की

Last Modified:
Friday, 15 May, 2020
Girish Agarwal

इसे ‘कोरोनावायरस’ (कोविड-19) का प्रभाव कहें अथवा कमजोर अर्थव्यव्यस्था कि अखबारों की रीडरशिप को लेकर पिछले दिनों जारी हुए इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की चौथी तिमाही (IRS 2019 Q4) के आंकड़े ज्यादा उत्साहजनक नहीं हैं। इसके बावजूद कुछ ऐसे ब्रैंड्स भी हैं, जो तमाम अस्थिरता का सामना करते हुए ऐसे मुश्किल समय में भी सफलता के पथ पर चलने में कामयाब रहे हैं, ‘दैनिक भास्कर’ (Dainik Bhaskar) ग्रुप ऐसा ही एक नाम है।

पिछले दिनों जारी हुए इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की चौथी तिमाही के आंकड़ों को देखें तो दैनिक भास्कर विकास के पथ पर बढ़ता दिखाई दे रहा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान दैनिक भास्कर ग्रुप के प्रमोटर-डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल ने ब्रैंड की सफलता की कहानी से लेकर वर्तमान में देश में अखबारों की बदलती पठनीयता समेत तमाम मुद्दों पर बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

नॉन मेट्रो शहरों के कई मार्केट्स में टोटल रीडरशिप (TR) की लिस्ट में दैनिक भास्कर सबसे आगे है, जबकि विभिन्न शहरों में तमाम ब्रैंड्स की रीडरशिप में कमी देखने को मिली है। आपको क्या लगता है कि इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की तीसरी तिमाही की तुलना में इस भारी गिरावट का कारण क्या है?

पिछले दिनों जारी हुए इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की चौथी तिमाही के परिणामों का हम स्वागत करते हैं। इस समय देश-दुनिया कोरोनावायरस (कोविड-19) की चपेट में है। कोरोना का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए किए गए लॉकडाउन के कारण तमाम बिजनेस बंद पड़े हुए हैं। प्रॉडक्शन रुक गया है। रोजगार खत्म हो गए हैं। गंभीर संकट के कारण प्रवासी मजदूर अपने घरों को वापस लौट रहे हैं। यहां तक कि कई लोगों की जान भी जा चुकी है।

कुल मिलाकर, चौथी तिमाही और तीसरी तिमाही में एवरेज इश्यू रीडरशिप (AIR) और टोटल रीडरशिप (TR) की तुलना से पता चलता है कि अखबारों की रीडरशिप में दो से तीन प्रतिशत की कमी देखने को मिली है। संभवत: मार्च में आई परेशानी के कारण ऐसा हुआ है। प्रत्येक ब्रैंड और मार्केट लेवल पर रिपोर्ट काफी पॉजिटिव और निगेटिव दिखाई देती है, लेकिन कुल मिलाकर देखें तो इन आंकड़ों से हम संतुष्ट हैं।   

पिछले छह-सात सालों से हम अपने एडिटोरियल कंटेंट के संदर्भ में ‘केंद्र में पाठक’ (Kendra me Pathak) के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए हाइपर लोकल, निष्पक्ष और अपडेट खबरें उपलबध करा रहे हैं। दुनिया की बेहतरीन मीडिया के साथ गठबंधन से भी उत्कृष्ट परिणाम आ रहे हैं। यह हमें विभिन्न मार्केट्स में अपने पाठकों के लिए रिसर्च ओरिएंटेड और बेहतर एडिटोरियल काम करने के लिए प्रेरित करना जारी रखे हुए है। मुझे यह बताते हुए काफी खुशी हो रही है कि इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की चौथी तिमाही के अनुसार एवरेज इश्यू रीडरशिप और टोटल रीडरशिप (| AIR / TR – Urban / Rural | Main + Variant) में दैनिक भास्कर एक बार फिर देश का नंबर वन न्यूजपेपर ग्रुप बन गया है।  

बिहार, पंजाब हरियाणा जैसे कई राज्यों में आपके आंकड़ों में काफी वृद्धि देखने को मिली है। आप कैसे अपने आप को सफलता के पथ पर ले जाने में कामयाब रहे हैं, जबकि तमाम न्यूजपेपर्स की एवरेज इश्यू रीडरशिप और टोटल रीडरशिप दोनों में कमी आई है, इस बारे में कुछ बताएं।    

बिहार में दैनिक भास्कर की रीडरशिप शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में लगातार बढ़ी है। बिहार के शहरी इलाकों की बात करें तो हमारी रीडरशिप 8.14 लाख (source: IRS 2019 Q4, AIR, Main + Variant Urban) हो गई है। पहली तिमाही के मुकाबले चौथी तिमाही में शहरी क्षेत्रों में दैनिक भास्कर की रीडरशिप में 20 प्रतिशत से ज्यादा की ग्रोथ दर्ज की गई है। आने वाली तिमाहियों में भी हम आगे बढ़ने में कामयाब रहेंगे। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में भी लगातार हमारी ग्रोथ हो रही है। यहां बता दें कि हमारा प्रमुख फोकस शहरी मार्केट पर रहा है क्योंकि हमारा अधिकांश सर्कुलेशन बिहार के शहरी क्षेत्रों पर केंद्रित है।   

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को छोड़कर चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा के प्रमुख मार्केट्स में दैनिक भास्कर का दबदबा फिर बढ़ा है। पंजाब में यह इकलौता ऐसा अखबार है, जिसकी ग्रोथ लगातार बढ़ रही है। जालंधर, अमृतसर और लुधियाना के प्रमुख मार्केट्स में भी दैनिक भास्कर की रीडरशिप लगातार बढ़ रही है और यह नंबर वन की ओर बढ़ता जा रहा है।  

हरियाणा (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को छोड़कर) में दैनिक भास्कर शहरी और ग्रामीण दोनों मार्केट्स में अपना दबदबा बनाए हुए है। राज्य का यह एकलौता ऐसा अखबार है, जिसकी रीडरशिप लगातार बढ़ रही है। गुजरात में ‘दिव्य भास्कर’ (Divya Bhaskar) अहमदाबाद में अपने निकटमत प्रतिद्वंद्वी से 31 प्रतिशत की बढ़त लेकर निर्विवाद रूप से नंबर वन बना हुआ है। अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत और राजकोट के प्रमुख मार्केट्स को मिलाकर दिव्य भास्कर अपने निकतम प्रतिद्वंद्वी से छह प्रतिशत की बढ़त लिए हुए है। विभिन्न राज्यों में इस तरह के अच्छे परिणामों को देखना काफी अच्छा लग रहा है। पाठक हमें पसंद कर रहे हैं और सपोर्ट कर रहे हैं। यह हमें और अधिक करने की प्रेरणा देता है।

तमाम नए मार्केट्स में प्रवेश करने की योजनाओं ने स्पष्ट रूप से आपकी काफी मदद की है। क्या एडिशनंस की संख्या बढ़ाने अथवा नए मार्केट्स में कोई नया वेंचर लाने की आपकी कोई योजना है?

हम पहले ही 12 राज्यों में मौजूद हैं और इन राज्यों में अपनी स्थिति को मजूबत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

चौथी तिमाही में विज्ञापन राजस्व यानी एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू के बारे में कुछ बताएं। इस वित्तीय वर्ष में आपका लक्ष्य अथवा अपेक्षाएं क्या हैं। एडवर्टाइजर्स के लिए अपने प्रॉडक्ट को और ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए दैनिक भास्कर ग्रुप क्या कर रहा है। यही नहीं, समग्र रीडरशिप को एक स्थिर संख्या पर वापस लाने के लिए आप किस तरह योजना बनाते हैं?

लॉकडाउन के कारण लोग अपने घरों पर हैं। ऐसे में हमें सभी माध्यमों में रीडरशिप, व्युअरशिप, इंगेजमेंट और टाइम स्पेंट में बढ़ोतरी देखने को मिली है। हमारा दृष्टिकोण लगातार अपने कस्टमर्स से जुड़ने का और उन्हें किसी भी तरह का सहयोग और सहायता प्रदान करने का रहा है। प्रॉडक्ट की बात करें तो हम रोजाना दो फ्रंट पेज अपने पाठकों को दे रहे हैं। एक पेज पर अंतरराष्ट्रीय और दूसरे पेज पर राष्ट्रीय व स्थानीय खबरें होती हैं। कोविड-19 के प्रकोप से पहले हमने अपने रिपोर्टर्स को 13 अंतराष्ट्रीय स्थानों पर तैनात कर दिया था। ऐसे में हम अपने पाठकों को दुनिया भर के प्रमुख स्थानों से ताजा अपडेट्स उपलब्ध कराने में सक्षम हैं। जब इस महामारी के दौरान विज्ञापन की कमी के कारण अखबारों के पेजों की संख्या कम हो गई है, हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हमारा कंटेंट काफी मजबूत हो। हम ज्यादा इंफोग्राफ का इस्तेमाल कर रहे हैं और पाठकों को बेहतर रीडिंग अनुभव उपलब्ध करा रहे हैं।

आर्थिक मंदी से लेकर न्यूजप्रिंट की कीमतों में बढ़ोतरी जैसी तमाम वजहों से वर्ष 2019 अखबार इंडस्ट्री के सामने कई परेशानियां रहीं। आपको पिछले साल किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और कैसे आपने उन पर काबू पाया, इस बारे में कुछ बताएं?

वास्तव में, वित्त वर्ष 2019 में दैनिक भास्कर ग्रुप ने सिंगल डिजिट रेवेन्यू ग्रोथ के साथ पूरे प्रिंट मीडिया सेक्टर को पीछे छोड़ दिया था। न्यूजप्रिंट की कीमतों में कमी की वजह से हमें अपनी बॉटम लाइन को सुधारने में मदद मिली। हमने 82 प्रतिशत लाभांश का भुगतान किया और अपने शेयरहोल्डर्स को पुरस्कृत किया।   

हमारा सोचना था कि वॉइस और लैंग्वेज इंटरनेट का भविष्य हैं लेकिन इंडियन रीडरशिप सर्वे की चौथी तिमाही के आंकड़ों से पता चलता है कि विभिन्न भाषाओं में अखबारों की ग्रोथ हुई है। यहां तक कि मार्च में भी, जब अखबारों की प्रिंटिंग कुछ समय के लिए बंद हो गई थी, इसमें ग्रोथ देखी गई है। विभिन्न भाषाओं पर आपका ब्रैंड क्या कहता है और इस सेगमेंट में आपकी क्या योजना है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों आर्थिक पैकेज की घोषणा करते हुए ‘वोकल फॉर लोकल’ (Vocal for Local) पर जोर दिया था। 12 मई को राष्ट्र के नाम संदेश में उन्होंने आत्मनिर्भर बनने और देश में बनी चीजें खरीदने का आह्वान किया था। मेरा मानना है कि एडवर्टाइजर्स को अपने टार्गेट ऑडियंस तक पहुंचने में मदद करने में स्थानीय भाषा के अखबार महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। हाल में बाजारों की मैपिंग के दौरान कि कौन सा मार्केट कितना ग्रीन, ऑरेंज और रेड जोन में है, हमने महसूस किया कि हमारा सिर्फ 17 प्रतिशत मार्केट रेड जोन में था। दूसरी तरफ मुंबई और दिल्ली जैसे मार्केट में, देश के कंज्यूमर मार्केट का बड़ा हिस्सा रेड जोन में है। शायद वह समय आ गया है जब हमें अपनी मार्केट प्राथमिकताओं को ग्रीन और ऑरेंज जोन में लाने के लिए योजना बनानी होगी। मेरा मानना है कि वर्तमान परिस्थिति में नेशनल मीडिया प्लान और यहां तक कि स्टेट मीडिया प्लान नहीं है, सिर्फ ग्रीन और ऑरेंज जोन मीडिया प्लान है। हम पहले से ही हिंदी, गुजराती और मराठी भाषा में उपलब्ध हैं और हम इन क्षेत्रों में अपनी स्थिति को मजबूती देने पर फोकस कर रहे हैं।

राजस्थान में आपकी संख्या अभूतपूर्व है। क्या आप इसे बनाए रखने और मार्केट को आगे बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, जिस राज्य में पहले ही इस अन्य ब्रैंड की बादशाहत है?

वास्तव में यह काफी बड़ा मौका है। बड़े अखबार को उसकी ही जमीं पर पीछे छोड़ते हुए दैनिक भास्कर राजस्थान में एवरेज इश्यू रीडरशिप और टोटल रीडरशिप दोनों में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में नंबर वन है। इस शानदार प्रयास और उपलब्धि के लिए हम पूरी राजस्थान टीम को बधाई देते हैं। दैनिक भास्कर ने न सिर्फ रीडरशिप बेस में ग्रोथ दर्ज की है, बल्कि इस प्रतिद्वंद्विता में 298000 पाठकों की बढ़त भी ली है। इससे पता चलता है कि राजस्थान में प्रत्येक चार में से तीन अखबार पाठक दैनिक भास्कर पढ़ते हैं। दैनिक भास्कर ने 5,45,000 और पाठकों को पंजीकृत करने के साथ शहरी राजस्थान में प्रतिस्पर्धा में बढ़त दर्ज की है। (Source – IRS 2019 Q4 , Urban)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

‘कवरेज के दौरान इस तरह के दृश्यों को मैं भूल नहीं सकता’

फर्स्ट रेस्पॉन्डर्स’ सीरीज के तहत ‘मलयाला मनोरमा’ के चीफ फोटोग्राफर रिजो जोसेफ ने कोविड-19 की कवरेज के दौरान सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में बताया

Last Modified:
Friday, 01 May, 2020
Rijo Joseph

फर्स्ट रेस्पॉन्डर्स’ (First Responders) सीरीज के तहत हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘मलयाला मनोरमा’ (Malayala Manorama) के चीफ फोटोग्राफर रिजो जोसेफ ने बताया कि ड्यूटी के दौरान और ड्यूटी खत्म कर घर लौटने के बाद उन्हें किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस बातचीत के दौरान 41 वर्षीय जोसेफ ने बताया कि किस तरह कभी-कभी उनके पीछे स्ट्रीट डॉग्स लग जाते हैं तो कभी काम के बीच में भोजन तलाशना और कोविड-19 महामारी से संक्रमित लोगों के निकट जाना जैसे तमाम चुनौतियां आती हैं।

बता दें कि इस सीरीज के तहत उन पत्रकारों से बात करने की कोशिश की जाती है, जो इस महामारी को एक योद्धा की तरह कवर कर रहे हैं। इस दौरान उनसे यह जानने की कोशिश की जाती है कि कैसे वे मुश्किल समय में अपने काम को अंजाम दे पा रहे हैं और उनकी राह में किस तरह की चुनौती आ रही हैं। इस सीरीज में ऐसे मीडियाकर्मियों को शामिल किया गया है, जो बहादुरी के साथ अपने मोर्चे पर तैनात हैं और दूसरों के लिए उदाहरण पेश कर रहे हैं।

रिजो जोसेफ ने बताया कि वह इस संस्थान के साथ करीब 18 साल से जुड़े हुए हैं और माता-पिता, पत्नी व तीन बेटियों के साथ रहते हैं। हालांकि, उनके परिवार को भली भांति पता है कि एक प्रेस फोटोग्राफर के रूप में उनकी क्या पेशेवर जिम्मेदारियां हैं, लेकिन महामारी को कवर करने के दौरान लोगों से मिलने-जुलने पर उन्हें लेकर परिवार को लोग काफी नर्वस हो जाते हैं। इस दौरान उन्हें निजी तौर पर किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, इस बारे में जोसेफ का कहना है कि जब वह काम से घर लौटते हैं तो यह सुनिश्चत करना होता है कि बच्चे उनके पास न आएं, यह काफी मुश्किल होता है, खासकर तब, जब छोटे बच्चे पूरा दिन काम कर घर लौटे अपने पिता को देखने के लिए काफी उत्साहित रहते हैं।    

कोविड-19 की कवरेज आप कैसे और कब से कर रहे हैं?

मैंने मार्च में कोविड-19 की कवरेज शुरू कर दी थी। मेरा फोकस एरिया अस्पताल और उनके स्टाफ, हेल्थ वर्कर्स, पुलिस फोर्स और रोजाना उनके सामने आने वाली चुनौतियां हैं। ये लोग इस बात की भी निगरानी करते हैं कि लोग नए नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं और उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके द्वारा दिखाई गई सामाजिक प्रतिबद्धता अद्भुत है। यह काफी अजीब स्थिति है जब सड़कें, मंदिर, चर्च और मस्जिदें लोगों से खाली पड़ी हुई हैं। एक फोटो पत्रकार के तौर पर मुझे यह सब रिकॉर्ड करना होगा।  

ग्राउंड जीरो से इस महामारी को कवर करने के दौरान आपका अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभव क्या रहा है?

एक फोटोग्राफर होने के नाते सोशल डिस्टेंसिंग को कायम रखना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। मैं भी अपने आप को काफी असहाय महसूस करता हूं, क्योंकि मैं मुसीबत के समय साथी लोगों के लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं। काम के दौरान बाहर निकलने पर संकट में घिरे तमाम लोगों से मिलना, खाली पड़ी सड़कें और रात में हमारा पीछा करते स्ट्रीट डॉग्स से निपटना जैसी तमाम चुनौतियां हैं।     

इस महामारी को कवर करने के दौरान किसी ऐसी विशेष घटना अथवा अनुभव के बारे में बताएं, जिसने आपको काफी प्रभावित किया हो?

दैनिक श्रमिकों की दुर्दशा, जिनकी आजीविका इस महामारी के कारण प्रभावित हुई है, ने मुझे अंदर तक हिला दिया है। हालांकि, राज्य सरकारों ने उनकी परेशानी दूर करने के लिए कई योजनाएं तैयार की हैं, लेकिन भोजन व अन्य जरूरी चीजों के लिए लोग लंबी-लंबी कतारों में लगे हुए हैं। इस तरह की स्थिति को मैं नहीं भूल सकता हूं।    

COVID-19 जैसी महामारी के दौरान आपको कंपनी की तरफ से किस तरह का समर्थन मिल रहा है?

मलयाला मनोरमा से हमें जो सहयोग मिल रहा है, वह काफी सराहनीय है। शुरुआत में ही संस्थान के अधिकारियों ने हमें साफ कह दिया था कि फोटो खींचते समय पहले अपनी सेफ्टी का ध्यान रखें। जो लोग घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) कर सकते हैं, कंपनी ने उन्हें इसकी सुविधा दे रखी है। एहतियाती कदम के तौर पर हमें मास्क, हैंड सैनेटाइजर्स आदि उपलब्ध कराए गए हैं। कंपनी ने यह भी सुनिश्चित किया है कि इस स्थिति में सैलरी में कटौती और छंटनी नहीं की जाएगी।   

और अंत में, क्या आप कोई संदेश देना चाहते हैं?

कोविड-19 एक नया वारयस है, जिसे बारे में हमें ज्यादा पता नहीं है और हम अभी जानकारी कर रही रहे हैं। इस मुश्किल दौर में हमें ऐसे लोगों की मदद के लिए रास्ते तलाशने की जरूरत है जो अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हम सब एक-दूसरे से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं और हमें सरकार द्वारा दिए जा रहे दिशा-निर्देशों का पालन करने के साथ ही जरूरतमंदों की मदद करने की जरूरत है, ताकि वे अपने आप को और अपने आसपास के लोगों को भी बेहतर ढंग से सुरक्षित रख सकें। हम साथ मिलकर ही इस वायरस की चेन को तोड़ सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

Mid-Day के दिवाकर शर्मा ने बताया, संकट की घड़ी में क्या रहा सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभव

आज के इस एडिशन में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ने ‘मिड-डे’ (Mid-Day) में क्राइम बीट देख रहे सीनियर कॉरेस्पोंडेंट दिवाकर शर्मा से बातचीत की, जो महामारी के इस दौर में भी अपने कर्तव्य का लगातार पालन कर रहे हैं।

Last Modified:
Thursday, 30 April, 2020
diwakar

हमारी सहयोगी अंग्रेजी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ (First Responders) नाम से एक सीरीज चला रही है, जिसमें उन पत्रकारों से बात करने की कोशिश की जाती है, जो इस महामारी को एक योद्धा की तरह कवर कर रहे हैं। उनसे यह जानने की कोशिश की जाती है कि कैसे वे मुश्किल समय में अपने काम को अंजाम दे पा रहे हैं और उनकी राह में किस तरह की चुनौती आ रही हैं। बता दें कि इस सीरीज में ऐसे मीडियाकर्मियों को शामिल किया गया है, जो बहादुरी के साथ अपने मोर्चे पर तैनात हैं और दूसरों के लिए उदाहरण पेश कर रहे हैं।

आज के इस एडिशन में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ने ‘मिड-डे’ (Mid-Day) में क्राइम बीट देख रहे सीनियर कॉरेस्पोंडेंट दिवाकर शर्मा से बातचीत की, जो महामारी के इस दौर में भी अपने कर्तव्य का लगातार पालन कर रहे हैं। एक पत्रकार के तौर पर उनके लिए ड्यूटी सर्वोपरि है।

वे वसई-विरार क्षेत्र में लगातार अस्पतालों के हालातों, वहां की बुनियादी ढांचों, टेस्टिंग प्रोसेस, हेल्थ स्टाफ की कंडिशन और उन पर कितना वर्कलोड है इस बारे में लगातार लिखते रहे हैं।

 पिछले कुछ हफ्तों से आप ‘मिड-डे’ के लिए क्या विशेष कवर कर रहे हैं?

जब लॉकडाउन की घोषणा हुई, उस दिन यानी 24 मार्च से मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में काम करने वाले अधिकांश श्रमिकों ने अपने घरों-कस्बों की ओर पैदल ही जाना शुरू कर दिया था, क्योंकि सभी ट्रांसपोर्ट सुविधाएं बंद कर दी गईं थीं। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और गुजरात तक लोग पैदल ही जा रहे थे। इस बीच मैंने कुछ लोगों के इंटरव्यू भी किए और उनकी दुर्दशा के बारे में भी बताया। वसई-विरार क्षेत्र तो COVID-19 वायरस का एक बड़ा केंद्र बन गया था और तब मैंने वहां लगातार अस्पतालों के हालातों की कवरेज की, वहां की बुनियादी ढांचों को कवर किया, टेस्टिंग प्रोसेस के बारे में जानकारी दी, यहां तक कि वहां के हेल्थ स्टाफ की कंडिशन और उन पर कितना वर्कलोड है इस बारे में भी लगातार बताया।

आपका अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभव क्या रहा है?

अस्पतालों का दौरा करना और कॉन्फिडेंस के साथ डॉक्टर्स से बात करना आसान नहीं था, क्योंकि वे पहले से ही इस वैश्विक संकट से निपटने की कोशिश कर रहे थे। मुझे कई डॉक्टर्स और अन्य फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मियों को यह जानने के लिए कॉन्फिडेंस में लेना पड़ा कि हो क्या रहा है और वे संकट से कैसे निपट रहे हैं। वे अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए कौन से उपकरण और सुरक्षात्मक सामान का प्रयोग कर रहे हैं। मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि रिपोर्टिंग करते समय मैं खुद को सुरक्षित रखूं, क्योंकि मेरे माता-पिता सीनियर सिटिजन हैं और मुझे यह सुनिश्चित करना होगा कि हम सभी लोग वायरस से सुरक्षित रहें।

इस महामारी को कवर करने के दौरान किसी ऐसी विशेष घटना अथवा अनुभव के बारे में बताएं, जिसने आपको काफी प्रभावित किया हो?

मुझे यह जानकर सच में तब बहुत हैरानी हुई कि पता चला कि डॉक्टर जो सैम्पल एकत्र कर रहे हैं और इस लड़ाई में सबसे आगे खड़े हैं, उनके पास पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) सूट नहीं थे। दूसरी बार तब हैरानी हुई जब पता चला कि  क्षेत्र के अस्पतालों में कोई एम्बुलेंस ही नहीं थी, जोकि अस्पतालों के बुनियादी ढांचे का ही एक हिस्सा होता है। मैंने इस संबंध में कलेक्टर और अन्य वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से भी बात की।

COVID-19 जैसी महामारी की रिपोर्टिंग के दौरान आपको कंपनी की तरफ से किस तरह का समर्थन मिल रहा है?

मेरे सहकर्मी और सीनियर स्टाफ बहुत सपोर्टिव है। हम सभी एक टीम की तरह काम करते हैं और अपनी खबरों के लिए एक दूसरे की मदद भी करते हैं।

और अंत में, क्या आप कोई संदेश देना चाहते हैं?

सभी को सुरक्षित रहना चाहिए और सोशल डिस्टेंसिंग को बढ़ावा देते रहना चाहिए। इस बीमारी से लड़ने की शक्ति बुजुर्गों में सबसे कम है और हमें ऐसे कदम उठाने ही होंगे, ताकि हम उनकी सुरक्षा कर सकें। वैसे भी यह महामारी सोशल डिस्टेंसिंग से ही खत्म हो सकती है। यानी यही ऐसी चीज है जिसके चलते हम COVID-19 वायरस से लड़ सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

CEO बरुण दास ने बताया, लॉकडाउन में TV9 न्यूज नेटवर्क की क्या है खास स्ट्रैटेजी

एक्सचेंज4मीडिया के साथ एक बातचीत में टीवी9 न्यूज नेटवर्क के सीईओ बरुण दास ने तमाम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 29 April, 2020
Last Modified:
Wednesday, 29 April, 2020
Barun Das

इन दिनों कहर बरपा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सरकार ने देश में लॉकडाउन किया हुआ है और लोगों से घरों पर ही रहने की अपील की है। लॉकडाउन के कारण घरों में मौजूद लोग अपना ज्यादातर समय टीवी पर न्यूज देखने में बिता रहे हैं। यही कारण है कि इन दिनों न्यूज के उपभोग (news consumption) में रिकॉर्ड वृद्धि देखी जा रही है। लॉकडाउन के दौरान न्यूज चैनल ‘टीवी9 भारतवर्ष’ (TV9 Bharatvarsh) का मार्केट शेयर दोगुना हो गया है। इस बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) की सिमरन सभरवाल के साथ एक बातचीत में ‘टीवी9 न्यूज नेटवर्क’ (TV9 News Network) के सीईओ बरुण दास ने टीवी9 भारतवर्ष की ग्रोथ के साथ-साथ नेटवर्क के रीजनल चैनल्स टीवी9 कन्नड़, टीवी9 तेलुगू, टीवी9 गुजराती और टीवी9 मराठी के मजबूत प्रदर्शन को लेकर चर्चा की। इसके साथ ही दास ने कंपनी के भविष्य के प्लान और बेंगलुरु के अंग्रेजी न्यूज चैनल न्यूज9 के डिजिटल नेशनल अंग्रेजी प्लेटफॉर्म तक के विस्तार के बारे में भी बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

लॉकडाउन के दौरान आप ‘TV9 Network’ के प्रदर्शन का आकलन किस तरह करेंगे?

लॉकडाउन के दौरान हमारे नेटवर्क का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है। टीवी9 कन्नड़ और टीवी9 तेलुगू हमेशा की तरह प्रतियोगिता में सबसे ऊपर बने हुए हैं जबकि टीवी9 गुजराती और टीवी9 मराठी ने भी अपना दबदबा कायम रखा है। हालांकि टीवी9 भारतवर्ष में हमारी ग्रोथ काफी अच्छी रही है। पिछले पांच हफ्ते में हमारा मार्केट शेयर दोगुने से ज्यादा हो गया है। लॉकडाउन से पहले जहां यह चार प्रतिशत था, वह अब (15वें हफ्ते में) 8.7 प्रतिशत हो गया है और यह टॉप 10 हिंदी चैनल्स की लिस्ट में शामिल है। हम टॉप छह के करीब हैं। यहां मैं आपको यह भी बता दूं कि ‘टीवी9 भारतवर्ष’ को आए अभी लगभग एक साल ही हुआ है, जबकि इस जॉनर में अन्य काफी बड़े ब्रैंड्स हैं।

आपको यह ग्रोथ शहरी (urban) अथवा ग्रामीण (rural) कहां से मिली है?

हमारी ग्रोथ कमोबेश संतुलित है। जब आपका मार्केट शेयर दोगुना होता है, तो ग्रोथ सभी मार्केट्स से आती है। हमें शहरी मार्केट से भी अच्छी ग्रोथ देखने को मिली है। हालांकि हमारे नेशनल चैनल ‘टीवी9 भारतवर्ष’ की ग्रोथ ग्रामीण मार्केट में थोड़ी कम है।

‘टीवी9 भारतवर्ष’ पिछले साल मार्च में लॉन्च हुआ था। चैनल को हाल ही में रीलॉन्च किया गया था। इस बारे में थोड़ा और विस्तार से बताएं

हमने ‘टीवी9 भारतवर्ष’ को रीब्रैंड और रीलॉन्च किया और लॉकडाउन से पहले इसके कंटेंट ओरियंटेशन, लुक और फील को बदल दिया। हमारे पास काफी बेहतर मार्केटिंग प्लान था। लॉकडाउन की वजह से हमें अपने मार्केटिंग प्लान में कुछ बदलाव करना पड़ा। इसे नए लुक, नए कंटेंट और इनोवेटिव मार्केटिंग के साथ रीलॉन्च किया गया। लॉकडाउन के दैरान हमारी ग्रोथ में काफी इजाफा हुआ है।

वर्तमान में कितने लोगों तक आपकी पहुंच है और वे चैनल पर कितना समय व्यतीत कर रहे हैं?

हमारी पहुंच करीब 45-46 मिलियन लोगों तक रही है। अब 13वें हफ्ते में हम 122 मिलियन पर पहुंच गए हैं और टीवी9 भारतवर्ष की पहुंच लगभग 120 मिलियन लोगों तक है, जो पहले के मुकाबले करीब ढाई गुना है। लॉकडाउन के दौरान चैनल पर बिताने वाले समय में भी करीब 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।   

टीवी पर विज्ञापनदाताओं (Advertisers) में कमी आई है। टीवी न्यूज चैनल्स व्युअरशिप में इस बढ़ोतरी का लाभ किस तरह उठा सकते हैं?

यदि विज्ञापनदाताओं के लिहाज से देखें तो व्युअरशिप में हुई इस अभूतपूर्व वृद्धि का लाभ इस जॉनर को नहीं मिल सका है। इस समय मुद्दा यह है कि किसी एडवर्टाइजर्स की तरफ से इस दिशा में कदम नहीं उठाया गया है। एफएमसीजी और ई-कॉमर्स प्रॉडक्ट्स इन दिनों विज्ञापन कर रहे हैं। कोविड-19 के बाद सभी सेक्टर्स की अर्थव्यवस्था बदलेगी और यह कहीं-कहीं पर वर्तमान से करीब 25 प्रतिशत कम होगी। हालांकि, आगे की बात करें तो अन्य टीवी जॉनर और अखबार जैसे अन्य माध्यमों की तुलना में न्यूज जॉनर अपनी बेहतर पोजीशन को बनाए रखने में सफल रहेगा। पारंपरिक रूप से एफएमसीजी टीवी न्यूज को ज्यादा पसंदीदा माध्यम के रूप में नहीं देखते हैं, लेकिन आने वाले समय में वे न्यूज जॉनर में ज्यादा दिलचस्पी दिखाएंगे।     

 चूंकि इन दिनों एडवर्टाइजर्स की संख्या कम है, इसलिए इन्वेंट्री भी कम है, लॉकडाउन खत्म होने के बाद कंपनियों को अपने स्टॉक को निकालना पड़ेगा और पंखे, कूलर्स, एसी आदि के विज्ञापनदाता आगे आएंगे। वे अपना काम शुरू करेंगे और विज्ञापन पर खर्च करेंगे। तब हम अपने नुकसान की कुछ भरपाई कर सकेंगे, जो हमें पिछले दो महीनों के दौरान हुआ है।

तो क्या न्यूज चैनल्स विज्ञापन दरों में वृद्धि करेंगे?  

सामान्य परिस्थितियों में मेरा मानना है कि रेट के बारे में किसी तरह का फैसला लेना किसी एक कंपनी का काम नहीं है। यदि कोई इस तरह का फैसला लेता है और उसे सही कीमत मिल जाती है तो बाकी इंडस्ट्री को भी सही कीमत मिलेगी। वैकल्पिक रूप से इंडस्ट्री को एक साथ आगे आना होगा और कीमतों को बढ़ाने का प्रयास करना होगा। हालांकि, कोविड-19 के बाद लोगों और इंडस्ट्री का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि इस अभूतपूर्व संकट से निपटने के लिए वे किस तरह मिलकर साथ आते हैं। यह फिलॉसफी सहयोग की होगी, न कि प्रतिस्पर्धा की।

टीवी न्यूज इंडस्ट्री के रूप में हम व्युअरशिप में इस ग्रोथ के कारण ज्यादा पंख नहीं फैलाएंगे, बल्कि हमें दोनों पक्षों के फायदे के बारे में सोचना होगा। मुझे पूरा विश्वास है कि विज्ञापनदाता हमें समझेंगे और हमें भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें हम पर किया गया निवेश वापस मिले। मुझे लगता है कि कोविड-19 के बाद ‘टीम’ (TEAM-Together Everyone Achieves More)  का कॉंसेपेट आएगा और यह न सिर्फ हमारी इंडस्ट्री में बल्कि पूरी दुनिया के सभी सेक्टर्स में यही होगा।

आप आने वाली तिमाही और इस साल के रेवेन्यू को किस रूप में देखते हैं?

पूरी दुनिया का भविष्य काफी अनिश्चित है। यह दो फैक्टर्स पर निर्भर करता है। एक तो यह कि हम इस लॉकडाउन से कितनी जल्दी बाहर आते हैं और दूसरा ये कि दुनिया कितनी जल्दी इससे उबरती है। भारत और चीन का अनुमानित जीडीपी ग्रोथ रेट क्रमश: 1.9% और 1.2%  घट गया है जबकि अधिकांश दुनिया की ग्रोथ में भी कमी की संभावना है। ऐसे में एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू पर काफी दबाव होगा, क्योंकि मंदी के दौरान तमाम खर्चों में कटौती होगी। हालांकि, विज्ञापन ज्यादातर खर्च नहीं बल्कि निवेश होता है। विज्ञापन में कमी आएगी, लेकिन हमारे जॉनर में दूसरों के मुकाबले स्थिति थोड़ी बेहतर रहेगी।

आगे की बात करें तो TV9 नेटवर्क से हम किस तरह की उम्मीद कर सकते हैं?

वर्तमान में व्युरअशिप टर्म्स को देखें तो हम देश के नंबर-1  न्यूज नेटवर्क हैं। यदि 15वें हफ्ते के आंकड़ों  पर नजर डालें तो TV9 नेटवर्क ने इस दौरान 654.7 मिलियन इम्प्रेशंस की रेटिंग दर्ज की। इस बीच ZEE नेटवर्क की रेटिंग 579.3 मिलियन इम्प्रेशंस, ABP नेटवर्क की 540.8 मिलियन इम्प्रेशंस, News18 नेटवर्क की रेटिंग 479.8 मिलियन इम्प्रेशंस रही है।

जो भी हमने स्थापित किया है, उसे बनाने के लिए हमारे पास एक बड़ी योजना थी। इस समय पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के संभावित बड़े क्षेत्रीय बाजारों में भी हमने विस्तार करने की  बनाई थी। लेकिन अब हमें पीछे हटना होगा और क्षेत्रीय विस्तार के लिए COVID -19 के बाद उपयुक्त समय देखना पड़ेगा। वैसे मुश्किल घड़ी एक बड़ा भी मौका देती हैं और TV9 नेटवर्क के लिए वह मौका डिजिटल स्पेस में देखने को मिला है। यह बात साफ है कि हम अपने डिजिटल संचालन को और आगे ले जाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं और वह इसलिए क्योंकि डिजिटल ही भविष्य है। इस संकट ने हमें अपनी योजनाओं को अधिक दृढ़ विश्वास के साथ आगे ले जाने का सही मौका दिया है। परिणामस्वरूप, हम पूरे नेटवर्क में अपने डिजिटल का विस्तार पर शुरू कर रहे हैं। हमारे सभी रीजनल चैनल्स और TV9 भारतवर्ष अपनी डिजिटल टीमों को तैयार करेंगी, ताकि वे प्लेटफार्म्स पर अपने रीडर्स के साथ और अधिक गहराई से जुड़ सकें।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

'कई चुनौतीपूर्ण असाइनमेंट करने के बाद भी मेरे लिए बिल्कुल नई है इस तरह की रिपोर्टिंग'

आज के इस एडिशन में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ने ‘सीएनएन-न्यूज18’ (CNN News18) की विशेष संवाददाता रुनजुन शर्मा से बातचीत की, जो महामारी के इस दौर में पूरी दिल्ली-एनसीआर से लगातार रिपोर्टिंग कर रही हैं

Last Modified:
Monday, 27 April, 2020
runjhun

जब से देश में COVID-19 महामारी को लेकर लॉकडाउन हुआ है, तब से अधिकांश भारतीय दिन में ज्यादा से ज्यादा समय तक न्यूज चैनल ही देख रहे हैं। यह समय पत्रकारों को धन्यवाद करने का भी समय है, क्योंकि वे हर दिन और हर घंटे ताजा खबरें दर्शकों तक पहुंचा रहे हैं।

हमारी सहयोगी अंग्रेजी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ (First Responders) नामक सीरीज शुरू की है, जिसमें उन पत्रकारों से बात करने की कोशिश की जाती है, जो इस महामारी को एक योद्धा की तरह कवर कर रहे हैं। उनसे यह जानने की कोशिश की जाती है कि कैसे वे मुश्किल समय में अपने काम को अंजाम दे पा रहे हैं और उनकी राह में किस तरह की चुनौती आ रही हैं। बता दें कि इस सीरीज में ऐसे मीडियाकर्मियों को शामिल किया गया है, जो बहादुरी के साथ अपने मोर्चे पर तैनात हैं और दूसरों के लिए उदाहरण पेश कर रहे हैं।

आज के इस एडिशन में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ने ‘सीएनएन-न्यूज18’ (CNN News18) की विशेष संवाददाता रुनजुन शर्मा से बातचीत की, जो महामारी के इस दौर में पूरी दिल्ली-एनसीआर से लगातार रिपोर्टिंग कर रही हैं। एक पत्रकार के तौर पर उनके लिए ड्यूटी सर्वोपरि है।

कोविड-19 की कवरेज आप कैसे और कब से कर रही हैं?

मैंने करीब नौ साल तक पॉलिटिक्स, हेल्थ और ह्यूमन राइट्स को कवर किया है। कोविड-19 महामारी को कवर करना न सिर्फ कई मायनों में काफी चुनौतीपूर्ण है, बल्कि काफी रिस्की भी है।

वैश्विक स्तर पर यह काफी महत्वपूर्ण स्टोरी है और इसे काफी सावधानी से कवर किए जाने की जरूरत है। कोविड-19 महामारी सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ी स्टोरी नहीं है बल्कि इसमें विभिन्न अन्य बीट जैसे पॉलिटिक्स, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और मानव अधिकार आदि भी शामिल हैं।

आपका अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभव क्या रहा है?

रेडियो और प्रिंट के विपरीत, टेलिविजन न्यूज का एक महत्वपूर्ण पहलू विजुअल्स भी हैं, जिसके लिए एक पत्रकार को उन सभी स्थानों पर जाना पड़ता है, जहां इस महामारी के दौरान आम लोगों से बचने की उम्मीद की जाती है।

लॉकडाउन में, हर कोई अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहता है। लेकिन जब भी मैं बाहर निकलती हूं, मैं घर में अपने प्रियजनों को खुद से दूर कर लेती हूं। यह भावनात्मक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होता है, खासकर तब जब उन लोगों के संक्रमित होना का भय बना रहता है और इस वजह से मैं कमरे में अकेले रहने का प्रयास करती हूं

इस महामारी को कवर करने के दौरान किसी ऐसी विशेष घटना अथवा अनुभव के बारे में बताएं, जिसने आपको काफी प्रभावित किया हो?

कोरोनो वायरस के फैलते संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन से जब मानवीय संकट शुरू हुआ, तब मैंने बिहार और उत्तर प्रदेश के सैकड़ों प्रवासियों की दुर्दशा पर रिपोर्ट की थी और यमुना नदी के किनारे व डीटीसी बसों के भीतर रातें बिताईं थीं। इस दौरान जब मैंनें एक भूखे प्रवासी (सोनू, एक बूढ़ा व्यक्ति) को अपने खाने का एक हिस्सा (एक छोटे से पेपर प्लेट पर चावल और दाल) दिया, तो उसने उस खाने को अपने भूखे कुत्ते के साथ भी शेयर किया, जिसे देखकर मैं बहुत ज्यादा प्रभावित हुईं।

आप अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का किस तरह ध्यान रखते हैं? आपका परिवार आपकी सेफ्टी को लेकर काफी चिंतित रहता होगा?

अतीत में मैंने कई चुनौतीपूर्ण असाइनमेंट्स पर काम किया है। छत्तीसगढ़ के नक्सलीय इलाकों में मैंने रिपोर्टिंग के लिए ऐसे जंगलों में भी यात्राएं की, जहां पर बारूदी सुरंगें होती थीं, कई आंदोलनों को भी कवर किया, यहां तक कि दिल्ली के दंगों को भी कवर किया। लेकिन यह असाइनमेंट मेरे लिए इन सबसे अलग है और वह भी कहीं अधिक खतरनाक और जोखिम भरा। यानी कुछ ऐसा, जो मैंने पहले कभी कवर नहीं किया, क्योंकि हम जिस पर रिपोर्ट कर रहे हैं वह अज्ञात है।

जब मैं कोविड के असाइनमेंट के बाद घर वापस जाती हूं, तो मैं घर पर किसी से बातचीत नहीं करती हूं। बल्कि मैं सीधे नहाने जाती हूं और अपने कपड़े धोती हूं। मैं अपने परिवार से जितना हो सके, दूर रहकर एकांत में रहने की कोशिश करती हूं।

COVID-19 जैसी महामारी की रिपोर्टिंग के दौरान आपको कंपनी की तरफ से किस तरह का समर्थन मिल रहा है?

ऑर्गनाइजेशन ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि फील्ड टीम (रिपोर्टर्स, विडियो जर्नलिस्ट्स और ड्राइवर्स) बिना सेफ्टी किट के बाहर न निकलें, जिनमें शूज कवर्स, ग्लव्स, मास्क्स और सैनिटाइजर्स शामिल हैं।

कोविड-19 के इस दौर में CNN News18 में खबरें जुटाना न केवल बेहद ही सुरक्षित और साफ-सुथरे तरीके से किया जा है,  बल्कि इसके लिए इनोवेटिव तरीका भी यूज किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, हम अस्पतालों और अन्य ऐसे क्षेत्रों, जहां संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा हो, वहां जाने के बजाय मेडिकल स्टाफ के साथ ‘जूम’ (Zoom) के जरिए ही इंटरव्यू करते हैं।

और अंत में, क्या आप कोई संदेश देना चाहते हैं?

घर में रहिए और सुरक्षित रहिए।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए