अमर उजाला के डिजिटल एडिटर जयदीप कर्णिक ने रेवेन्यू बढ़ाने के लिए इस मॉडल पर दिया जोर

देश-दुनिया में कहर बरपा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में इन दिनों लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है

Last Modified:
Saturday, 23 May, 2020
Jaydeep154

देश-दुनिया में कहर बरपा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में इन दिनों लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। ऐसे में पहले ही तमाम परेशानियों से जूझ रही इस इंडस्ट्री के सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन भी काफी प्रभावित हुआ है। लोग अब डिजिटली अखबार पढ़ रहे हैं। तमाम पब्लिकेशंस भी इन दिनों डिजिटल पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। क्या डिजिटल में आई यह वृद्धि बरकरार रहेगी और विज्ञापनदाता फिर से इंडस्ट्री की ओर रुख करेंगे? इन्हीं तमाम सवालों को लेकर हमने ‘अमर उजाला’ डिजिटल के एडिटर जयदीप कर्णिक से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

लॉकडाउन के दौरान जिस तरह टीवी की व्युअरशिप बढ़ी है, वहीं डिजिटल की व्युअरशिप में भी काफी इजाफा हुआ है। टीवी में सबसे बड़ी तब्दीली ये आई है कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) की तुलना में शुद्ध रूप से न्यूज ज्यादा देखी गई है। टेलिविजन एंटरटेनमेंट में ‘दूरदर्शन’ की व्युअरशिप काफी बढ़ी है। इस चैनल पर पिछले दिनों प्रसारित ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ काफी देखी गई हैं। जहां तक डिजिटल मीडिया की बात करें तो न्यूज वेबसाइट्स में तकरीबन सभी की 30 से 50 प्रतिशत तक रीडरशिप बढ़ी है। दरअसल, लॉकडाउन के चलते तमाम लोग घरों पर हैं। इनमें बच्चे और युवा भी हैं, जो कहीं बाहर खेलने और घूमने नहीं जा पा रहे। ऐसे में डिजिटल में ऑनलाइन गेमिंग में भी काफी इजाफा हुआ है। जो लोग घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) कर रहे हैं, उनके लिए तो ठीक है, लेकिन जिन लोगों का काम घर से बाहर निकलकर ही संभव होता है, जैसे दुकानदार आदि, ऐसे लोगों के लिए घर पर समय काटना काफी मुश्किल है, तो इनमें से ज्यादातर लोग घर पर टीवी देखकर, ऑनलाइन गेमिंग के जरिये या अन्य माध्यमों से अपना समय बिता रहे हैं।

तीसरी बात ये रही कि लॉकडाउन और कोरोनावायरस के खौफ के चलते तमाम सोसायटियों में शुरुआती दौर में अखबार नहीं पहुंच पा रहा था, तो लोगों ने ई-पेपर का सहारा लिया। ऐसे में ई-पेपर की रीडरशिप भी बढ़ी है। इसका कारण यही है कि मान लीजिए कि सुबह किसी ने अखबार पढ़ भी लिया तो भी वह पूरे दिन टीवी के सामने बैठकर समाचार नहीं देख सकता है, लेकिन उसके हाथ में अधिकांश समय मोबाइल होता है। फिर चाहे उसका दफ्तर का काम चल रहा हो या परिवार के साथ बैठा हो, तो मोबाइल पर जब भी नोटिफिकेशन आता है, कोई महत्वपूर्ण सूचना आती है अथवा वॉट्सऐप पर कोई लिंक आ जाता है तो वह उसे क्लिक करता है। हम कह सकते हैं कि कोरोना काल में डिजिटल के पाठकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

कोरोना का डिजिटल मीडिया पर भी काफी फर्क पड़ा है और यहां भी विज्ञापन घटे हैं। देखिए, विज्ञापनदाता कोई भी प्रॉडक्ट बनाता है और उसे मार्केट में बेचता है, जिसके लिए वह विज्ञापन का सहारा लेता है। लेकिन, लॉकडाउन की वजह से कहीं प्रॉडक्शन ही नहीं हो रहा है, तमाम उद्योग-धंधे बंद पड़े हुए हैं। हालांकि, कुछ प्रॉडक्ट्स हैं, जिनकी बिक्री बढ़ी है। किराने के सामान की बिक्री नहीं रुकी है। इसके अलावा पर्सनल हाइजीन की चीजें जैसे-साबुन आदि की मांग भी बढ़ी है। लेकिन उपभोक्ता वस्तुओं (FMCG), जिनके विज्ञापन टीवी, अखबार और डिजिटल में ज्यादा देखने को मिलते हैं, उनका उत्पादन न होने की वजह से उसका प्रभाव सभी जगह दिखाई दे रहा है। डिजिटल का संकट उससे भी आगे का है, क्योंकि टेलिविजन और अखबार के पास तो फिर भी सीधे विज्ञापन आते थे और विज्ञापन से उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा आता था, लेकिन डिजिटल में ऐसा नहीं है। डिजिटल में पाठकों की संख्या तो बहुत ज्यादा रही है, पाठक अभी भी बढ़े हैं, कहने का मतलब है कि डिजिटल के लिए पाठकों की संख्या कभी संकट का विषय नहीं रहा, डिजिटल के लिए रेवेन्यू का ही संकट रहा है। कोरोना काल के दौरान यह संकट और गहरा हुआ है। हालांकि, इस दिशा में कुछ नई पहल की गई हैं। कुछ के सबस्क्रिप्शन मॉडल शुरू हुए हैं। बड़े-बड़े कई अखबार जो कभी सबस्क्रिप्शन मॉडल (Paywall) के पीछे नहीं गए, वे भी अब ‘पेवॉल’ के पीछे चले गए हैं। हम कह सकते हैं कि विज्ञापन के लिहाज से इस महामारी का प्रभाव सभी मीडिया माध्यमों पर पड़ा है और सभी इससे अपने-अपने हिसाब से निपटने की कोशिश कर रहे हैं। डिजिटल के लिए यह प्रभाव ज्यादा गहरा इसलिए है क्योंकि डिजिटल के लिए रेवेन्यू की कमी हमेशा से रही है। डिजिटल में एक बड़ी दिक्कत ये है कि इस प्लेटफॉर्म के रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा गूगल और फेसबुक जैसे बड़े प्लेयर लेकर चले जाते हैं, नहीं तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और काफी आगे बढ़ जाते। कोरोना काल में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए रेवेन्यू की कमी का मुद्दा और गहरा हुआ है।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

जैसा कि मैंने पहले बताया कि महामारी के इस दौर में भी पाठक संख्या के मामले में डिजिटल मीडिया को कोई नुकसान नहीं हुआ है। पाठक संख्या तो और बेहतर ही हुई है। अब ज्यादा लोग डिजिटल पर खबरें पढ़ रहे हैं। हालांकि, कोरोना के दौर में तमाम अफवाहें भी चली हैं। यह भी देखने में आया है कि कुछ लोगों ने झूठे और दो-दो साल पुराने विडियो चलाए हैं, खबरें चलाई हैं। लेकिन कहीं न कहीं कोरोना संकट ने लोगों को ये भी समझने-समझाने पर मजबूर किया है कि जो बड़े मीडिया हाउस हैं, उनकी उपस्थिति का क्या महत्व है। उनके पास जो संपादकीय व्यवस्था है, जिससे छनकर खबरें आती हैं, वो इसलिए जरूरी है कि कुछ लोग आप तक झूठी खबरें न पहुंचाएं। देश में जो तथाकथित ‘वॉट्सऐप और फेसबुक यूनिवर्सिटी’ चल रही हैं और जिन पर पिछले कुछ सालों में झूठ का प्रसार तेजी से बढ़ा है, उस पर भी कहीं न कहीं अंकुश लगा है, क्योंकि लोगों को इस कोरोना के समय में सही और शुद्ध खबरें चाहिए। जो बड़े मीडिया हाउसेज हैं, उनकी जो मेहनत थी, उपस्थिति थी, वह मजबूती से दर्ज की गई। लोगों को ट्विटर पर आधिकारिक हैंडल और फेसबुक पर आधिकारिक पेजों का महत्व क्या है, ये समझ में आया। ऐसे में डिजिटल की पाठक संख्या में इजाफा हुआ है।

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

देखिए, खतरे की घंटी तो नहीं कहूंगा मैं इसे, ये सिर्फ कुछ वक्त की बात है, क्योंकि अभी जहां पर कई जगह स्थितियां थोड़ी बेहतर हुई हैं, ग्रीन जोन बढ़े हैं, वहां लोगों के घरों में अखबार फिर पहुंचना शुरू हुआ है। हां, ये जरूर है कि इस दौर में डिजिटल का एक नया पाठक वर्ग जुड़ा है। खास बात ये है कि जो पीढ़ी अखबार के साथ बड़ी हुई है, वो तो अखबार पढ़ने की आदत नहीं छोड़ेगी। नई पीढ़ी ने भी कहीं न कहीं अखबार को अपनाया है। अखबार उन लोगों के लिए भी है जो दिन भर नोटिफिकेशन देखते हैं, वॉट्सऐप देखते हैं, टेलिविजन भी थोड़ा-थोड़ा देखते हैं, लेकिन यदि उन्हें पूरे 24 घंटे का एक समग्र रूप में खबर पढ़ने के लिए प्लेटफॉर्म चाहिए तो वह अखबार ही दे पाता है। कहने का मतलब है कि समग्र रूप में लोगों की खबर पढ़ने की जो प्रवृत्ति है, वह अखबार ही दे पाता है। कहने को तो हम भी दिन भर खबरों के साथ जीते हैं, लेकिन फिर भी सुबह अखबार जरूर पढ़ते हैं। कोई भी आदमी दिन भर की सैकड़ों खबरों को लगातार न देख सकता है, न सुन सकता है और न पढ़ सकता है, फिर चाहे वह इस पेशे में ही क्यों न हो। लेकिन जो लोग इस पेशे में नहीं है, जैसे-मान लीजिए उनके ऑफिस में टीवी नहीं लगा हुआ है, मोबाइल पर भी उन्होंने बीच-बीच में विभिन्न साइट्स पर जाकर जो जरूरी चीजें देखनी थीं, वो देख लीं, लेकिन 24 घंटे में एक बार उन सारी खबरों पर एक बार नजर दौड़ाने की जो आदत बनी हुई है, और उसका अपना महत्व भी है, वो अखबार के अस्तित्व को न केवल जिंदा रहेगी, बल्कि उसको आगे भी बढ़ाएगी। फिलहाल जरूर इसमें कुछ दिक्कत आई है, कमी आई है, लेकिन इसके बावजूद अखबार इसी तरह बने रहेंगे। 24 घंटे में एक बार खबर को प्राप्त करने की जो व्यक्ति की आदत है अथवा मानसिकता है, वह बनी रहेगी। इस बीच डिजिटल में नए पाठक जुड़ेंगे जो शायद अखबारों से ज्यादा जुड़े रहते थे, वे भी अब डिजिटल पर आए हैं। वो नया पाठक वर्ग डिजिटल के साथ बहुत हद तक बना हुआ है।

पाठक को ये समझ आ गया है कि यदि सुबह मैं अखबार पढ़ूंगा और उसके बाद दिन भर के जो अपडेट हैं, उन्हें टीवी पर या मोबाइल पर देख लूंगा तो पर्याप्त है। दरअसल, सुबह आपने कुछ खबरें देख लीं, उसके बाद शाम को भी टीवी पर थोड़ी देर खबरें देख लीं, सुबह फिर अखबार पढ़ लिया तो जिस व्यक्ति को बहुत ज्यादा खबरें ग्रहण नहीं करनी हैं, उस व्यक्ति के लिए इतना पर्याप्त है। कोरोना ने लोगों को डिजिटल की तरफ इसलिए ज्यादा मोड़ा है, क्योंकि हरेक घंटे में क्या हो जाए, पता नहीं। लोगों को लगता है कि कहीं कोरोना का नया मामला निकल आया, तो वह उनकी बिल्डिंग में या आसपास तो नहीं है। नए रेड जोन जारी हो रहे हैं. नई गाइडलाइंस जारी हो रही हैं। कोई नई अधिसूचना आ रही है, वॉट्सऐप पर तमाम इससे जुड़ीं खबरें आ रही हैं, तो इन चीजों ने डिजिटल को और मजबूत किया है। लोगों को भी यह समझ में आया है कि लगातार उन्हें यदि किसी खबर के बारे में अपडेट चाहिए तो उन्हें डिजिटल से जुड़ना पड़ेगा और यदि खबर का सार चाहिए या किसी खबर का महत्वपूर्ण हिस्सा पढ़ना है या किसी खबर के बारे में 400-500 या हजार शब्दों में जानकारी चाहिए तो अगले दिन अखबार में पढ़ सकता है। लेकिन लगातार यदि किसी को खबर पढ़नी है या कोरोना को लेकर कोई बड़ा शोध प्रकाशित हुआ है और यदि उसे वह पढ़ना हो तो वह इस प्लेटफॉर्म पर पढ़ सकता है। दूसरी बात ये कि डिजिटल तीनों माध्यमों का समागम है, यानी यहां पर आपको टेक्स्ट पढ़ने को मिल जाता है, फोटो भी मिल जाते हैं और विडियो भी मिल जाते हैं। यह सुविधा अखबार में नहीं मिलती। टीवी पर भी विजुअल ज्यादा होता है और टेक्स्ट कम होता है। डिजिटल माध्यम की खूबसूरती यही है कि यहां पर टेक्स्ट के साथ फोटो गैलरी भी मिलती है, जिसमें आप एक ही घटना की कई तस्वीरें देख सकते हैं। तो कहीं न कहीं, ये सारे मीडियम एक-दूसरे को कॉम्पलिमेंट करते हुए नजर आते हैं।

इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, हमने एक तो सबसे पहले इस खतरे को भांपते हुए कई एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए। उस दौरान यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जैसे चीन और सिंगापुर में तब तक फैल चुका था, इटली में भी यह पहुंच चुका था। ऐसे में वहां के न्यूजरूम्स ने क्या किया, हम इससे भी लगातार जुड़े रहे। हम इस बारे में लगातार जानकारी लेते रहे। इन सबको देखते हुए अमर उजाला ऐसे शुरुआती चुनिंदा मीडिया हाउसेज में शामिल था, जिन्होंने बहुत जल्दी ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) अपना लिया था और कई साथी वर्क फ्रॉम होम पर चले गए थे। हम लोगों ने 14-15 मार्च से ही उन लोगों को वर्क फ्रॉम होम देना शुरू कर दिया था, जो पब्लिक ट्रांसपोर्ट से या काफी दूर से आते थे। जब तक जनता कर्फ्यू लागू हुआ था, हमारी टीम के बहुत सारे सदस्य घर से काम करना शुरू कर चुके थे। हालांकि, अभी भी कुछ लोग हैं जो ऑफिस आते हैं और ये वो लोग हैं, जिनका काम घर से नहीं हो सकता है, लेकिन इनकी संख्या काफी कम है। हमारे लिए वर्क फ्रॉम होम आसान इसलिए रहा कि ऑनलाइन सीएमएस है और हमारी हाइपर लोकल की टीम कानपुर, लखनऊ व आगरा आदि जगहों से काम करती है और उनकी वर्किंग पूरी सेट है तो हमें वर्क फ्रॉम होम से बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं आई। हां, एक जो न्यूज रूम का स्पंदन होता है, न्यूजरूम की आदत होती है, पत्रकारिता में न्यूज रूम का एक जो वाइब्रेशन होता है, ऊर्जा होती है, वो जरूर बहुत से लोगों ने शुरुआत में मिस की, लेकिन धीरे-धीरे ये आदत पड़ गई और ये भी समझ में आ गया कि इस तरह भी आप बड़ी खबरों से, ब्रेकिंग खबरों से जुड़े रह सकते हैं।

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

मेरा मानना है कि निश्चित तौर पर बदलाव आएगा। बहुत सारे लोग ऐसे भी विचार कर रहे हैं कि इस वर्क फ्रॉम होम को और कुछ समय तक चलाया जाए। केवल डिजिटल के लोग ही नहीं, बल्कि प्रिंट के लोग भी धीरे-धीरे घर से काम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दरअसल, लोगों को समझ आ गया है कि कोरोना इतनी जल्दी खत्म होने वाला है नहीं। ऐसे में ये जो कार्य संस्कृति पनपी है, इसे लोग चलाएंगे। ऐसे भी कई लोग हैं, जिनके पास अपनी बिल्डिंग नहीं है और वे किराए के दफ्तरों से काम चला रहे हैं, इनमें से कुछ तो इस किराए को बचाने की कोशिश करेंगे। मेरा मानना है कि कार्य संस्कृति में तो क्रांतिकारी तब्दीलियां आने वाली हैं और कोरोना से पहले की मीडिया की दुनिया और कोरोना के बाद की मीडिया की दुनिया निश्चित ही अलग होने वाली है।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

भरपाई हो न हो, लेकिन सबस्क्रिप्शन मॉडल को सफल होना पड़ेगा, क्योंकि डिजिटल में रेवेन्यू की कमी पहले से ही बहुत ज्यादा चुनौती बनी हुई थी। आज से दो-तीन साल पहले तक जिस बैनर के इम्प्रेशंस के लिए आपको 150-200 रुपए मिल जाया करते थे, उसके अब 20,25 या फिर 50 रुपए मिलने लगे हैं, तो आप ज्यादा पेजव्यू लाकर भी उतना पैसा नहीं कमा पाते हैं, जितना आप पहले कमा लिया करते थे और ये धीरे-धीरे खराब ही हो रहा है, क्योंकि डिजिटल में एंट्री लेवल बहुत ही आसान है। आज कोई भी व्यक्ति दो लैपटॉप लेकर एक वेबसाइट शुरू कर सकता है। एंट्री लेवल की आसानी होने और बहुत सारे प्लेयर्स होने से और बड़ा पैसे का हिस्सा फेसबुक और गूगल के पास जाने से दिक्कतें काफी समय से थीं। जो विदेशों में मॉडल अपनाया गया, जिसकी चर्चा बार-बार होती है। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का जो अधिकतर पैसा आ रहा है, वो डिजिटल के सबस्क्रिप्शन से आ रहा है। कई संस्करण को बंद करके उन्होंने डिजिटल कर दिया। भारत में भी पैसे देकर आलेख पढ़ने की संस्कृति विकसित नहीं हुई थी, लेकिन इसके प्रयोग पिछले दो साल से बहुत तेजी से होने लगे थे। खासतौर से मैं कहूंगा कि पिछले साल भर के देश के तमाम पब्लिशर्स सबस्क्रिप्शन मॉडल के बारे में विचार कर रहे थे। लेकिन उस पर काम करने में संकोच कर रहे थे। अमर उजाला ही ऐसा चुनिंदा मीडिया हाउस है, जिसने अपने ई-पेपर को आज से पांच-छह महीने पहले ही सबस्क्रिप्शन मॉडल (पेवॉल) के पीछे डाल दिया था। हम उससे आगे बढ़े हैं। अंग्रेजी में ‘द हिन्दू’ जैसे कुछ एक प्रकाशकों ने पहले ऐसा किया था, लेकिन हम हिंदी के पहले ऐसे डिजिटल मीडिया हाउस हैं, जिसने अपने कंटेंट को पेवॉल) के पीछे डाला है। अगर आप अमर उजाला की वेबसाइट देखेंगे तो अमर उजाला प्रीमियम करके हमने नया सबस्क्रिप्शन मॉडल तैयार किया है। उसको लेने पर आपको वेबसाइट पर दिखाई देने वाले विज्ञापन नहीं दिखेंगे। दरअसल, डिजिटल के रेवेन्यू का सोर्स ही यही विज्ञापन हैं और कई पाठकों की दिक्कत होती है कि उन्हें ये विज्ञापन बोझिल लगते हैं। इसलिए अमर उजाला प्रीमियम से पाठकों को ऐसा अनुभव मिलेगा, जिसमें कोई विज्ञापन नहीं होगा। तो पाठकों को शुद्ध रूप से सामग्री पढ़ने को मिलेगी। समाचार पढ़ने को मिलेंगे, वीडियो देखने को मिलेंगे।

दूसरा, अमर उजाला प्रीमियम के सबस्क्राइबर्स को हम उसी मेंबरशिप में अपना ई-पेपर, जिसे हमने पेड कर रखा है, उपलब्ध कराएंगे और तीसरा, हम कुछ शो आधारित आलेख तैयार करवा रहे हैं, ऐसे आर्टिकल तैयार करवा रहे हैं, जो सिर्फ उन पाठकों को मिलेंगे, जो हमारे अमर उजाला प्रीमियम के सदस्य बनेंगे। तो ये बड़ी पहल हमने एक मीडिया समूह के रूप में की है, जिसको हम लॉन्च कर चुके हैं और इसका रिस्पॉन्स भी हमें बहुत अच्छा मिला है। तो जब आपके पास विज्ञापन से पैसा नहीं आएगा, तो कहीं न कहीं पाठकों को पैसा तो देना पड़ेगा ही।

देखिए, मीडिया इंडस्ट्री की सबसे बड़ी दिक्कत यही रही है कि इसकी जो इकनॉमिक है, आर्थिक गुणाभाग है, वो खराब रही है, फिर चाहे टेलिविनज चैनल हों, या फिर अखबार हों। दुनिया में ऐसा कौन सा उत्पाद होगा, जो भला अपनी लागत मूल्य से बहुत कम में बिकता हो। आज एक अखबार की कीमत 20-22 रुपए बैठती है, वो 5-6 रुपए में बाजार में बिकता है। टेलिविजन चैनलों के लिए उपभोक्ता सीधे-सीधे पैसे नहीं देते, वो तो बीच में जो डिस्ट्रीब्यूटर्स हैं, उनका पैसा देते हैं, फिर चाहे, टाटा स्काई हो या फिर एयरटेल हो। इसी तरह से डिजिटल पर भी व्यक्ति कंटेंट को पढ़ने का कोई पैसा नहीं दे रहा है। पैसा तो विज्ञापनों से ही मिल रहा था। आखिरकार कहीं न कहीं आप अच्छी सामग्री पढ़ना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पैसा देना पड़ेगा और जब पैसा देंगे तो जो कंटेंट आपको मिलेगा, उसकी गुणवत्ता बेहतर होगी। निरंतर अच्छी सामग्री आपको मिलेगी। क्योंकि उपभोक्ता पैसे देगा तो निश्चित ही न्यूजरूम्स की जवाबदेही बढ़ेगी और लगातार उसको बेहतर कंटेंट उपलब्ध कराना होगा। इसलिए यही मॉडल है, जिसके माध्यम से भविष्य में डिजिटल मालिकों का पैसा बन सकता है। इसलिए अन्य प्रकाशक भी पेवॉल के पीछे गए हैं और अमर उजाला ने भी ये प्रयोग किया है। सबसे पहले प्रयोग करने वाला अमर उजाला ही है। हिंदी प्रकाशन माध्यमों में तो पूरे कंटेंट को पेवॉल के पीछे ले जाने की जो सबस्क्रिप्शन  की, मेंबरशिप की व्यवस्था शुरू की गई है, उसमें अमर उजाला ने पहल की है, जिसका हमें रिस्पॉन्स भी अच्छा मिल रहा है। हमें लगता है कि अगर विज्ञापन से आय घट रही है तो आपको आय के नए तरीके खोजने पड़ेंगे, जिससे आपकी आय हो सके।   

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

देखिए, कुछ उपाय तो चलन में आ चुके हैं। जैसे कि मैं शुरू में जिक्र कर रहा था लोगों को ये समझना पड़ेगा कि जो एक पारंपरिक मीडिया संस्थान है, उसका महत्व क्या है? वहां पर जो संपादकीय व्यवस्था की छलनी लगी है, वो क्यों लगी है। तो बता दूं कि वो इसलिए ही लगी है, कि इस तरह की झूठी खबरें और अफवाहें बाजार में न फैलें। उससे होने वाले नुकसान बहुत घातक हैं। लड़ाइयां होती हैं, दंगे होते हैं। कहा जाता है कि झूठ के पैर नहीं होते हैं और यह बहुत तेजी से फैलता है। लिहाजा हर कोई व्यक्ति अब फैक्ट चेक भी करने लगा है क्योंकि झूठी खबरों का बाजार इतना गर्म है और इतनी तेजी से फैलता है कि अच्छे-बड़े मीडिया संस्थानों के न्यूजरूम में कई बार गफलत हो जाती है और गलत न्यूज प्रकाशित कर बैठते हैं। तो इसी को लेकर सभी को सामूहिक रूप से प्रयत्न करने पड़ेंगे। हमारी जो पत्रकारिता की बुनियादी शिक्षा है कि आप जब तक उस खबर को एक दो स्रोत से कंफर्म नहीं करेंगे, तब तक प्रकाशित नहीं करेंगे, उसका मजबूती से पालन करना होगा। आपके संवाददाता की भी खबर हो, तो उसे भी क्रॉस चेक कर लिया जाए, एजेंसी की खबरों में भी तथ्यों को जांच लिया जाए। ये जो पुरानी पारम्परिक पत्रकारिता है, उसका माध्यम बदल सकता है। पत्रकारिता के नियम और खबरों की सत्यता जांचने की तकनीक नहीं बदल सकती है। खबर को आपको सत्यापित करके ही प्रकाशित करना होगा, यही काम सारे जवाबदेह मीडिया संस्थानों का होता है और उनको आगे और मजबूती से यह करना होगा, क्योंकि तमाम सोशल मीडिया माध्यमों ने झूठी खबरों को तेजी से फैलाने का काम किया है। जो खबरें आपसी चर्चा में, नुक्कड़ में गप्प बनकर रह जाती थीं, वो अब बहुत तेजी से इधर-उधर फैलने लग जाती हैं। उन पर लगाम लगाने के लिए मीडिया हाउसेज को बेहतर तरीके से व्यवस्था करनी पड़ेगी और लोगों को भी ये जागरूक करना पड़ेगा कि वे किन समाचार माध्यमों पर भरोसा कर सकते हैं और किन पर नहीं।

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जीवन के इस पड़ाव पर मैं टीआरपी की दौड़ से बहुत बाहर हूं: सुशांत सिन्हा

समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिन्हा ने मीडिया में अपनी यात्रा के साथ-साथ तमाम अहम मुद्दों पर अपने विचार साझा किए है।

Last Modified:
Monday, 17 May, 2021
SushantSinha54

वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिन्हा ‘इंडिया टीवी’ को अलविदा कहने के बाद से ही अब सोशल मीडिया के जरिये अपने विचार लोगों तक पहुंचा रहे हैं। यूट्यूब और ट्विटर और उनके लाखों चाहने वाले हैं और उनके वीडियो बहुत अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं। समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में उन्होंने मीडिया में अपनी यात्रा के साथ-साथ तमाम अहम मुद्दों पर अपने विचार साझा किए है। इसके अलावा गोदी मीडिया को लेकर भी उन्होंने अपनी राय रखी है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने पत्रकार बनने का निर्णय कैसे लिया? अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताएं।

मैंने बहुत कम उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। अगर बिहार की बात की जाए तो वहां एक संस्कृति देखने को मिलती है कि अक्सर अपने परिवार की जिम्मेदारी के कारण लोग जल्दी काम करने लग जाते हैं। मैंने बचपन में अपने पिताजी को खो दिया था तो मेरी मां जो कि सरकारी नौकरी में थीं, उन्होंने मुझे और मेरी बहन को बड़ी मुश्किल से पाला है। मुझे बचपन से शौक भी था न्यूज देखने का तो कम उम्र में ही पटना आकर नौकरी की। मेरी मां अक्सर मुझसे कहा करती थीं कि न्यूज का अगर इतना ही शौक है तो जाओ, वहीं नौकरी करो, तो एक वो भी आप कह सकते हैं।

2001 में पटना के एक स्थानीय चैनल के साथ शुरू हुआ सफर अब तक जारी है। कुछ समय बाद मुझे लगा कि अब मुझे पटना से बाहर निकलकर अपने आप को आगे बढ़ाना चाहिए। यही सोचकर मैं दिल्ली आया और ‘जैन टीवी’ से शुरुआत की, उसके बाद ‘जनमत’ में काम किया। ‘जनमत’ में मैंने करीब पांच साल काम किया, जिसमें एक पीरियड ‘लाइव इंडिया’ का भी था। इसके बाद मैं ‘न्यूज 24’ में चला गया और वहां कुछ समय तक काम करने के बाद मैं ‘एनडीटीवी’ चला गया। वहां मैंने पांच साल तक काम किया है। उसके बाद मैंने ‘आईटीवी नेटवर्क’ के साथ काम किया और फिर मैंने ‘इंडिया टीवी’ के साथ भी काम किया। ‘इंडिया टीवी’ को अलविदा कहने के बाद फिर मैंने किसी को जॉइन नहीं किया।

अगर देखा जाए तो आपने ‘एनडीटीवी’ के साथ काफी काम किया है। आप वहां तक कैसे पहुंचे?

दरअसल, मैं जब ‘लाइव इंडिया’ में था तो उस दौरान ही मेरी ‘एनडीटीवी’ में बात चल रही थी। मैनें इंटरव्यू भी दिया था, लेकिन जब कुछ फाइनल नहीं हुआ तो मैं ‘न्यूज 24’ में चला गया था। लेकिन कुछ ही महीनों के बाद मुझे ‘एनडीटीवी‘ से कॉल आया था और उसके बाद मैं वहां चला गया। मुझे काम करने का 10 साल से अधिक का अनुभव हो गया था और मेरी समझ भी अच्छी थी और उसी कारण मुझे जैसा कि आपने कहा कि बहुत कम उम्र में अच्छा पद प्राप्त हो गया था।

जब ‘एनडीटीवी‘ का नाम जहन में आता है तो वहां रवीश कुमार जैसे बड़े चेहरे हैं, यहां आपका पांच साल का अनुभव कैसा रहा?

देखिए, आज भी ‘एनडीटीवी‘ में मेरे कई मित्र हैं। किसी भी संस्थान में अच्छा और बुरा दोनों वक्त होता है। कभी भी ऐसा नहीं हो सकता कि सिर्फ आपका अच्छा ही समय चले। मेरा अनुभव मिला-जुला रहा है। कुछ चीजों को लेकर बहुत अच्छे दोस्त मिले तो कुछ चीजों को लेकर बहुत बंदिशें भी थीं। कई बार मेरे बोलने और कुछ कहने पर टोका जाता था। इसके अलावा अगर कुछ सोशल मीडिया पर लिख दिया, तो धमकी भरी चिट्ठी आ जाती थी। एक तरह से आप कह सकते हैं कि मैं बंधा हुआ सा महसूस करता था।

दूसरा मैंने ये देखा कि वहां का अपना ईको सिस्टम है। अगर आप उसका हिस्सा हैं तो चीजें आपके हिसाब से होंगी, वरना आपको दिक्क्तों का सामना करना पड़ेगा। अंदर जो होता था, मैं उसको लेकर आवाज उठाता ही उठाता था। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि एक-दूसरे के लिए परेशानी खड़ी करने से बेहतर है कि कोई नया विकल्प तलाश लिया जाए।

‘इंडिया टीवी‘ को अलविदा कहने के बाद आपने कहीं जॉब क्यों नहीं की? इतनी कम उम्र में इतना बड़ा निर्णय कैसे लिया?

ऐसा नहीं था कि मैं यूट्यूब पर आने के बारे में सोच रहा था, इसलिए मैंने ‘इंडिया टीवी‘ को छोड़ दिया या इस्तीफा दिया। ऐसा भी नहीं था कि मुझे कोई ऑफर नहीं था, लेकिन कई जगह ऐसी थीं, जहां मैं जाना नहीं चाहता था। मुझे काम करते हुए 18 साल हो गए हैं और जीवन में एक पड़ाव ऐसा आता है कि जब आप खुद को समझने लग जाते हैं। आपका मन समझौते करने से मना करता है और यही कारण था कि मैंने कहीं फिर नौकरी नहीं की। कई बड़े संस्थानों से मुझे ऑफर आया था, लेकिन मैं अब खुद इस चीज को जानता हूं कि मेरे काम करने का स्टाइल ऐसा है कि मैं वहां ढल नहीं पाऊंगा।

मैं आपसे एक बात और कहना चाहूंगा कि मैं खुद उतना यूट्यूब नहीं देखता था। मैं जब घर आता था तो मेरी खुद की ये कोशिश होती थी कि मैं टीवी भी नहीं देखूं। मेरे मित्र और कई परिचित लोग हमेशा मुझसे कहते थे कि मुझे यूट्यूब पर आना चाहिए। इसके बाद मैंने ये सब शुरू किया और मुझे उम्मीद नहीं थी कि लाखों चाहने वाले होंगे और करोड़ों व्यूज होंगे। हाल ही में मेरे पास एक बहुत बड़े संस्थान से ऑफर भी आया था और जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी थी, लेकिन उनकी एक शर्त थी कि मुझे मेरा यूट्यूब बंद करना होगा। मुझे ऐसा लगता है कि मैं जीवन के उस पड़ाव पर हूं, जहां टीआरपी की दौड़ से बहुत बाहर हूं। अब मैं जो बोलना चाहता हूं, वो बोलता हूं और ईश्वर की कृपा से लोग उसे पसंद भी कर रहे हैं। इसलिए फिर मैंने इधर ही रहना जरूरी समझा। मुझे ऐसा लगता है कि अगर देश के 10 लोगों पर भी मैं प्रभाव छोड़ पा रहा हूं तो वही मेरे लिए सफलता है और इसके बाद मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।

सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का जमाना है और इसके अलावा कई बार आपको ट्रोल्स का भी सामना करना पड़ता है। उन चीजों को कैसे देखते हैं?

देखिए, सोशल मीडिया के साथ जो हमारा रिश्ता है, वो दोनों तरह का रहने वाला है। जैसे कोरोना के इस कठिन समय में हम सबने देखा है कि कैसे इसी सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को मदद मिल रही है और उनकी जान बच रही है। इसके साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि कुछ लोग इसे नैरेटिव सेट करने का माध्यम बना देते हैं। कई बार लोग बिना जाने और बिना समझे किसी भी बात को दिमाग में बिठा लेते हैं। इसके अलावा जिन ट्रोल्स की आपने बात की है तो मेरा मत यह है कि इनका काम सिर्फ आपको हतोत्साहित करने का होता है। अगर आप कोई सच दुनिया को बता रहे हैं तो ये आपको ओतना ट्रोल करेंगे की आप हार मान जाएं। लेकिन मैं बिहारी हूं और ऊपर से पत्रकार हूं। यदि डरना होता तो इस काम में आता ही नहीं। आपने नोटिस किया होगा कि मैं कभी ट्विटर पर लड़ाई नहीं लड़ता। मुझे वेरिफाइड अकाउंट से लेकर फेक अकाउंट तक से बहुत कुछ बोला जाता है, लेकिन मैं जीवन में बुद्ध की अवस्था को लेकर चलने वाला इंसान हूं। मुझे लगता है कि ऐसे समय में आप बुद्ध बन जाइए। 

आपने एक बड़े पत्रकार को खुली चिट्ठी लिखी थी और गोदी मीडिया जैसे शब्द पर कड़ी आपत्ति आपको है, दोनों बातें खुलकर समझाए?

मैं हमेशा अपने दर्शकों से कहता रहता हूं कि गोदी मीडिया जैसे शब्द सिर्फ अपने पाप को छिपाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इस देश में सत्ता और पत्रकारिता का गठजोड़ सालों से चला आ रहा है।मेरे चैनल पर पद्मश्री आलोक मेहता जी का भी इंटरव्यू है और बाकी पत्रकारों के भी इंटरव्यू हैं। उन्होंने बताया है कि कैसे बड़े-बड़े पत्रकारों को लिफाफे जाया करते थे। लोगों को सोचना चाहिए कि उनके इतने बड़े-बड़े बंगले कैसे बन गए?

मैंने और अशोक श्रीवास्तव जी ने तो खुलकर इस बात को कहा है कि हर पत्रकार को अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी चाहिए। अगर नेताओं के लिए आप कहते हैं तो इसे पत्रकारों के लिए भी कहिए। आप पूछिए रवीश कुमार से कि क्या वो ऐसा करेंगे? वो तो परेशान हो गए थे जब मैंने सबको उनकी सैलरी बता दी थी। दरअसल जब आप चेहरा बनाते हैं कि आप बहुत बड़े समाजवादी हैं और बिल्कुल ही गरीब हैं लेकिन जब लोगों को पता चले कि आठ लाख रुपये महीना लेकर आदमी गरीबों की बात कर रहा है तो आपकी इमेज खत्म होने का आपको डर रहता है। उनको आपकी मेरी और किसी की चिंता नहीं है। उनको सिर्फ एक लक्ष्य दे दिया गया है कि इस आदमी को कुर्सी को नीचे से उतारो और वो बस अपने इसी काम में लगे हुए हैं। उनके लिए आपकी और मेरी लाश सिर्फ एक सीढ़ी है कि कैसे वो एक कदम और आगे बढ़ें, बस इससे अधिक कुछ नहीं।

आपको जानकार हैरानी होगी कि शीलाजी के समय के 16 हॉस्पिटल लगभग बनकर तैयार हैं, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने उन्हें शुरू तक नहीं किया है। दिल्ली एक ऐसी जगह है, जहां लोग अस्पताल और दवाइयों के अभाव में मर रहे हैं। अब आप रवीश कुमार से कहिए कि आप क्यों नहीं अरविंद केजरीवाल का इंटरव्यू करते? क्यों नहीं आप उनसे सवाल पूछते कि उन्होंने वो 16 अस्पताल क्यों नहीं चलाए?

आज सोशल मीडिया के ज़माने में हर कोई अपने आप को एडिटर समझने लगा है। नई पीढ़ी के लोगों को क्या सलाह देंगे?

मैं आपको इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझाता हूं। मेरा मानना है कि जब आप शादी करते हैं तो इसलिए नहीं करनी चाहिए कि उसके पीछे कुछ पारिवारिक कारण होते हैं बल्कि इसलिए करनी चाहिए कि जीवन का ऐसा कौन सा खाली हिस्सा है, जिसे आप भरना चाहते हैं। किसी भी काम को करते वक्त अपने आप से पूछिए कि आप ये क्यों करना है?  मीडिया में आने से लेकर डॉक्टर बनने तक की भी अगर बात जो पहले दिल से पूछिए कि क्या आप उसे करते वक्त खुश रहेंगे या नहीं?

जैसे कि मैंने अपने बारे में सोच रखा है कि मैं आगे वाले कुछ सालों में पत्रकारिता छोड़ दूंगा। मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ कर लिया है और मैं अब कुछ और आयाम जीवन के अनुभव करना चाहता हूं। ये एक ऐसा पेशा है जो आपका बहुत कुछ लेता है। अगर मैं सिर्फ 2 वीडियो भी दे रहा हूं तो उसके पीछे घंटों की रिसर्च होती है। कई बार जब आपको बुद्ध वाली अवस्था में जाना भी होता है, उस समय भी आपको स्वयं को समय देकर यह समझाना होता है और उसमे भी बहुत अधिक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। हम जलते रहते हैं और सामने वाले को जवाब नहीं देतें क्योंकि आपको अपने आप को बेहतर बनाना है और उस बेहतर बनाने की लड़ाई में बहुत कुछ खपता है।

समाचार4मीडिया के साथ सुशांत सिन्हा की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं-

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पद्मश्री आलोक मेहता की अगली किताब में होंगे बड़े खुलासे, जानिए क्या है खास

अपनी आने वाली किताब (Power Press and Politics) के बारे में पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने बताया की ये बस उनकी लेखनी का विस्तार भर है।

Last Modified:
Wednesday, 12 May, 2021
alokmehta665

पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता की लेखन कला से हर कोई भली भांति परिचित है। एक सिद्धहस्‍त लेखक होने के चलते वे विभिन्‍न पक्षों पर प्रकाश डालते रहे हैं। उन्हें देश की राजनैतिक धारा में होने वाले बदलाव को नजदीक से देखने-समझने और उस पर टिप्पणी करने का कई दशकों का अनुभव है। वहीं, बदलते दौर में पत्रकारिता का मापदंड भी बदला है, लिहाजा पत्रकारिता की विश्वसनीयता को बचाए रखने का लगातार वे प्रयास भी करते रहते हैं। इस बीच आलोक मेहता एक बार फिर अपनी अगली किताब को लेकर लोगों के सामने मुखातिब हैं। तो क्या है इस किताब में खास, इस पर समाचार4मीडिया ने वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता से बातचीत की है।

यह किताब (Power Press and Politics) लिखने का विचार आपको कहां से आया? इस सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि वे अपने अनुभव को लोगों के साथ साझा करना चाहते हैं। उन्होंने आयुर्वेद का उदाहरण देते हुए कहा कि आज के समय में उतने उत्तम आचार्य आपके पास नहीं है और इसके पीछे कारण यही था की उन्होंने अपने ज्ञान और अनुभव को आगे साझा नहीं किया। हालांकि उन्होंने कहा कि स्वामी रामदेव जैसे लोग अच्छा काम भी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा’ और ‘कलम के सेनापति’ जैसी पुस्तकें लिखने के पीछे भी उनका यही उद्देश्य था।

अपनी आने वाली किताब के बारे में उन्होंने बताया की ये बस मेरी लेखनी का विस्तार भर है। मेरे परिवार के लोग और मेरे शुभचिंतक हमेशा मुझसे कहते थे की मुझे अपने अनुभवों को एक पुस्तक के जरिए दुनिया के सामने लाना चाहिए। उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी जी से लेकर पीएम मोदी तक के कार्यकाल को उन्होंने देखा है और वहीं सब अनुभव उन्होंने अपनी आने वाली इस किताब में अपनी कलम के माध्यम से लोगों के साथ साझा करने की कोशिश की है।

उन्होंने बताया कि इस किताब के माध्यम से जो लोग पत्रकारिता कर रहे हैं या पाठक हैं, उनको ये ज्ञात होगा कि उस समय के संपादकों को कितना संघर्ष करना पड़ा, कैसे एक आदमी जिसने 20 रुपए से नौकरी शुरू की और संपादक बना। इस किताब के जरिए लोगों को यह भी पता चलेगा की उस समय हम जैसे संपादकों को कैसे-कैसे दबाब झेलने पड़ते थे। साथ में उन्होंने यह भी बताया कि चूंकि उनकी पुस्तक के पब्लिशर ब्रिटिश हैं, तो सब चीज उन्होंने डॉक्यूमेंट में उन्हें दी है ताकि कोई लीगल समस्या न हो।

उन्होंने कहा कि राजीव गांधी से लेकर पीएम मोदी तक के बारे में उन्होंने लिखा है और समय-समय पर उनकी आलोचना भी की है। जिन लोगों को इस बात का पता नहीं है, उन्हें मेरी किताब को पढ़कर इसकी जानकारी मिलेगी। वैसे मेरी न्यूज रिपोर्ट तो किताब में नहीं छप सकती है, लेकिन फिर भी मेरे कुछ आर्टिकल को किताब में जगह मिली है। कई बार लोग कहते है की आप कांग्रेस के हैं या आप बीजेपी के हैं, तो उन सारे सवालों के जवाब आपको इस पुस्तक में मिल जाएंगे।

उन्होंने कहा कि इस किताब के माध्यम से युवा पीढ़ी के पत्रकारों को पता चलेगा कि उस समय कैसे अखबारों पर दबाब बनाया जाता था। एक अखबार पर तो कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों आरोप लगाते थे और एक समय ऐसा आया कि उस अखबार को निकालने में वही दिक्क्त आने लगी जो आजादी के समय आती थी। इसे आप क्या कहेंगे? आज के समय आपको क्या कोई बोलने से रोक सकता है? क्या आपको कुछ लिखने से रोका जा रहा है? नहीं, तो किस समय को आप को बेहतर कहना चाहेंगे?

उन्होंने ‘द ट्रिब्यून’ के संपादक विजय सहगल का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें तो एक निचली अदालत ने सजा दे दी थी, बाद में उन्हें हाई कोर्ट से रिहा किया गया। उन्होंने बताया कि इस किताब में उन्होंने पूरे जीवन के अनुभव का निचोड़ लिखा है और उन्होंने उम्मीद जताई है कि यह पुस्तक पाठकों और सभी मीडिया के मित्रों को जरूर पसंद आएगी।

समाचार4मीडिया की ओर से आलोक मेहता जी को उनकी इस नई पुस्तक के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं।

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मेरे एंकर बनने में इन तीन-चार लोगों की रही अहम भूमिका: आनंद नरसिम्हन

‘नेटवर्क18’ (network18) के एग्जिक्यूटिव एडिटर आनंद नरसिम्हन ने समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में अपने जीवन के कई पहलुओं पर चर्चा की है।

Last Modified:
Tuesday, 11 May, 2021
Anand Narasimhan

‘नेटवर्क18’ (network18) के एग्जिक्यूटिव एडिटर आनंद नरसिम्हन ने समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में अपने जीवन के कई पहलुओं पर चर्चा की है। उन्होंने बताया कि मीडिया का कोई बैकग्राउंड नहीं होने के बाद भी वह कैसे इस फील्ड में आए और उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के मुख्य अंश:

कोरोना के इस कठिन समय में कैसे चीजें बदली हैं और स्टूडियो में क्या बदलाव देखने को मिल रहे हैं?

इस कोरोना काल ने हमारे जीवन में कई चीजों को बदलकर रख दिया है। किसी ने नहीं सोचा था कि चीजें इतनी बदल जाएंगी। मैंने और आपने दोनों ने अपने घर में ये सेटअप किया है और हम एक-दूसरे से बात कर रहे हैं। ये बदलाव को स्वीकार करने के जैसा ही है। अब आप घर पर काम कर रहे हैं तो कभी भी आप लैपटॉप को ऑन कीजिए और मीटिंग में बैठ जाइए।

इसके अलावा स्टूडियो में भी जितने लोग आपके साथ काम करते हैं वो चाहे मेकअपमैन हो या माइक सेट करने वाला हो, हर चीज पहले सैनेटाइज होती है। इसके बाद भी मेरे साथ काम करने वाले दो सहयोगी कोरोना का शिकार हो गए। दिवाली के बाद मुझे भी संक्रमण हुआ था। मैं समय-समय पर एंटीबाडी टेस्ट करवाता रहता हूं।

अपने जीवन के शुरुआती दिनों के बारे में बताएं, आपने शिक्षा कहां से पूरी की?

आमतौर पर आप पाते हैं कि अधिकतर एंकर्स के परिवार का संबंध कहीं न कहीं राजनीति या सरकारी विभागों से होता है लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था। इसे आप बस नदी का बहाव कह लीजिए कि मैं मीडिया में आ गया।

मैंने बीकॉम की पढ़ाई की है और उसके बाद मैंने जेवियर्स, मुंबई से मासकॉम किया। इसके बाद मैंने अपना डबल एमबीए पूरा किया। मुझे मार्केटिंग और फाइनेंस की अच्छी और गहरी समझ थी। उस समय तक मुझे मीडिया में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय मैं किसी बड़ी एजेंसी के साथ जुड़कर काम करना चाहता था। उसी के साथ साथ मुझे एंकरिंग भी बेहद पसंद थी। मैं उन दिनों थिएटर भी करता था।

उसी दौरान एक दिन वर्ष 1996 में टीचर्स डे पर मुझे एंकरिंग करने को कहा गया था। मुझे कहा गया कि टीचर्स को अंताक्षरी खिलानी है और मैंने उन दोनों क्लोजअप अंताक्षरी में भी भाग लिया था। मुझे सिर्फ 20 मिनट ये करने को कहा गया था, लेकिन वो सिलसिला ढाई घंटे से अधिक चला था।

उस ऑडिटोरियम में उस समय करीब 50 स्टूडेंट थे, लेकिन जब अंताक्षरी खत्म हुई तो स्टूडेंट्स की संख्या 2000 से अधिक हो गई थी। उस दिन मुझसे टीचर्स ने कहा कि आनंद इतना मजा तो जीवन में हमें कहीं नहीं आया। इसके बाद मुंबई में एक काला घोड़ा फेस्टिवल शुरू हुआ था, जिसमें मैंने भाग लिया और वहीं से एंकरिंग का सिलसिला शुरू हुआ था। उस समय मैं काम भी करता था, शो भी करता था और पढ़ाई भी करता था। इसके बाद लगभग पांच साल तक विज्ञापन एजेंसियों के साथ काम किया और उसके बाद ड्रीम जॉब जीता। उसे जीतने के बाद ईएसपीएन स्टार स्पोर्ट्स के साथ एक ब्रैंड मैनेजर के तौर पर सिंगापुर में काम करने का मौका मिला। इसके बाद वर्ष 2007 से 2011 तक मैंने भारत में रहकर टेन स्पोर्ट्स के साथ काम किया।

आप एक स्पोर्ट्स एंकर थे, तो कैसे आप मीडिया में आए? कौन आपको टाइम्स नाउ तक लेकर आया या आपने खुद इधर आने का निर्णय लिया?

देखिए, इसके पीछे तीन महत्वपूर्ण लोग थे। एक मेरी मां जो हमेशा मुझसे कहती थीं कि तुम एक दिन बहुत बड़े एंकर बनोगे और वहीं तुम्हें जाना है। दूसरे थे मेरे एमबीए के डीन जो मेरे कॉरपोरेट सेक्टर में जाने से बेहद नाराज थे और उन्होंने मुझे काफी डांटा भी था।

उन्होंने मुझसे कहा कि आनंद तुम्हे एंकर बनना चाहिए और तीसरे जो इंसान थे वो थे टेन स्पोर्ट्स में मेरे साथ काम कर रहे मजमुदार जी! एक सीरीज के दौरान हमारी मुलाकात हुई थी और उन्होंने मुझसे कहा कि आनंद तुम्हे कुछ अलग करना चाहिए। उन दिनों वह 'टाइम्स नाउ' के साथ काम कर रहे थे तो उन्होंने मुझे अरनब गोस्वामी से मिलवाया। मुझे उस समय अरनब गोस्वामी जी ने मौका दिया और खुलकर मैंने एंकरिंग की। उसके बाद उन्होंने मुझे मुंबई आने को कहा और मैंने उनकी बात मानकर मुंबई डेस्क को जॉइन किया।

वर्ष 2011 में मुझे अरनब गोस्वामी ने कहा कि अब मैं स्पोर्ट्स नहीं करने वाला, तुम क्या करोगे? मैंने उनसे कहा कि ठीक है, मैं भी न्यूज करता हूं। उन्होंने मुझसे कहा कि ठीक है, तुम्हारे पास दो हफ्ते हैं, जितना करना है करो, उसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इन तीन-चार लोगों को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा।

आपने स्पोर्ट्स शो भी किए हैं और अभी पॉलिटिकल शो भी कर रहे हैं, अधिक मेहनत किसमें करनी पड़ती है?

ऐसा कुछ नहीं है और कुछ भी आसान नहीं है। देखिए, ऐसा है कि मेहनत तो हर जगह लगती है। ये सब आपके झुकाव और आपकी समझ पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए-जितने भी स्पोर्ट्स शो में लोग होते हैं या एंकर होते हैं, वो खिलाड़ी होते हैं। मैं तो कभी रणजी भी नहीं खेला हूं, लेकिन मेरा उधर झुकाव है और मुझे समझ है कि मैदान में क्या हो रहा है। बस, यही समझ आपको आगे लेकर जाती है। इसके अलावा मेरी रुचि हर प्रकार के खेल में थी। मैं क्रिकेट के अलावा भी कई खेल खेलता था इसलिए मैदान की मेरी जानकारी और मेरा होमवर्क अच्छा होता था।

जो दूसरे लोगों ने छह साल में सीखा, वो मुझे छह महीने में सीखना पड़ा है। वही चीज मेरे साथ राजनीतिक डिबेट में भी होती है क्योंकि मेरा कोई ऐसा बैकग्राउंड नहीं है। जिस दिन पहली बार मैंने एंकरिंग की, उस दिन मुझे तीन घंटे से भी अधिक एंकरिंग करनी पड़ी।  मैं जितना समय डिबेट करता था, उससे कहीं अधिक समय पढ़ने में जाता था। मैं जितना हो सकता था, लोगों से बात करता था। सीनियर रिपोर्टर्स के साथ बैठता था। कई ऐसे लोग होते हैं, जिनको जब आप पढ़ते हैं तो आपको समझ आता है कि वे कितने गुणी हैं।

सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग और उसके कारण फेक न्यूज की आ रही बाढ़ के बारे में आपका क्या कहना है? सरकार को कोई राय देना चाहेंगे?

देखिए, जब भी आपको फ्रीडम मिलती है तो उसके साथ जिम्मेदारी भी आती है। जैसे कि समाज में कई ऐसे काम हैं, जो नहीं होने चाहिए, लेकिन वो हो रहे हैं। दो चीजे हैं कि एक तो आप गलत कर रहे हैं तो मैं आपको टोककर कहूंगा कि देखिए, आप गलत कर रहे हैं लेकिन अगर प्लेटफॉर्म ही भेदभाव करने लगे तो फिर क्या होगा? अगर एक आदमी जो झूठ बोल रहा है, उसे आप बढ़ावा दे रहे हैं और मैं अगर उसे सही करने की कोशिश कर रहा हूं तो आप मुझे दबा दें, तो ये ठीक नहीं है। इसलिए दिक्क्त प्लेटफॉर्म्स की है।

जब ये लोग नेरेटिव बिल्ड करने लगते हैं तो दिक्क्त वहां आती है। इसलिए इन्हे रेगुलेट करने की  जरूरत है। सरकार को यह तय करना होगा कि देश के 80 करोड़ लोगों का डाटा देश का डाटा है, आप उसे अपने हिसाब से इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। अगर कोई प्लेटफार्म आपकी निजता का उल्लंघन करता है तो उसके बाद आपके पास कोई ऑप्शन नहीं रहता है, क्योंकि वो हमारी सरकार के हाथ में नहीं है। हमारा सारा डाटा देश में नहीं बल्कि उनके पास स्टोर रहता है।

हमारी हर चीज उनके सर्वर पर अपलोड ही रहती है और इसे कंट्रोल करने की जरूरत है। प्लेटफार्म डाटा की ताकत लेकर सरकार को डराने की भी कोशिश करता है। इसलिए इनको लाइन पर लाने की जरूरत है।

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया को लेकर काफी निगेटिव बातें हुई हैं। गोदी मीडिया और टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसे टर्म्स इस्तेमाल किए जा रहे हैं। आप अपने आप को कहां पाते हैं?

देखिए, मैं एक आम भारतीय हूं और खुद को देश के साथ खड़ा पाता हूं। मेरा जुड़ाव किसी राजनीतिक पार्टी के लिए नहीं है। मेरा जुड़ाव देश से है। अगर देश के लिए कोई अच्छा है तो वो मेरे लिए भी अच्छा है। कौन मेरे देश के बारे में सोच रहा है और कौन मेरे भारत को आगे बढ़ाने के बारे में सोच रहा है। अगर किसी के पास भारत की तरक्की का ब्लूप्रिंट है तो आनंद उसके साथ है। जो समाज के हर वर्ग को बढ़ाने की बात करता है, मैं उसके साथ हूं।

अब आपके गोदी मीडिया वाले प्रश्न पर आते हैं। देखिए, एक समय था जब कई पत्रकार मुफ्त का खाते थे, विदेश यात्राओं में जाते थे और घूम-फिरकर वापस आ जाते थे। इसके बदले में जो आपको खिला रहा है, आप उसके खिलाफ मत लिखिए, ऐसी सोच रखने वाले अपने आप को स्वतंत्र पत्रकार कहते हैं। दूसरी ओर जो निस्वार्थ भाव से ये कहे कि ये गलत है और देश के लिए ठीक नहीं है, वो इनके लिए गोदी मीडिया है। मैं जब भी कभी थोड़ा विचलित हो जाता हूं तो भगवतगीता के अध्याय 2, 3 और 4 को पढ़ता हूं, क्योंकि वो कर्म योग से संबंध रखते हैं।

अगर आपको अपने काम में विश्वास है तो आप बस उस काम को पूरी शिद्द्त से कीजिए। अगर आप ये जानते हैं कि ये गलत है और फिर भी आप उसे कर रहे हैं तो फिर आप गलत कर रहे हैं। अगर मैं अपने देश के लिए कुछ अच्छा कर रहा हूं तो मेरा दिमाग उधर क्लियर है और मैं वो करता हूं।

समाचार4मीडिया के साथ आनंद नरसिम्हन की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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जानें, वरिष्ठ पत्रकार पद्मजा जोशी ने कैसे दी कोरोना को मात, पीड़ितों को दी ये सलाह

कोरोनावायरस (कोविड-19) का प्रकोप कम होने का नाम नहीं ले रहा है। इस महामारी की चपेट में आकर आए दिन तमाम लोगों की जान जा रही है, वहीं कई लोग विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन है।

पंकज शर्मा by
Published - Thursday, 06 May, 2021
Last Modified:
Thursday, 06 May, 2021
Padmaja Joshi

कोरोनावायरस (कोविड-19) का प्रकोप कम होने का नाम नहीं ले रहा है। इस महामारी की चपेट में आकर आए दिन तमाम लोगों की जान जा रही है, वहीं कई लोग विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन है। संकट के इस दौर में अपनी जान को जोखिम में डालते हुए तमाम पत्रकार अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं और कोरोना को लेकर रिपोर्टिंग भी कर रहे हैं। ऐसे में कोरोना पीड़ितों में बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी भी शामिल हैं। हालांकि, कई पत्रकार इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘टाइम्स नाउ’ (Times Now) की कंसल्टिंग एडिटर (पॉलिटिक्स) पद्मजा जोशी भी शामिल हैं। अपने बेबाक अंदाज के लिए पहचानी जानी वालीं पद्मजा जोशी ने समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में बताया कि उनके लिए कोरोना से संक्रमण का दौर कैसा रहा और कैसे उन्होंने इस महामारी पर विजय पाई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको कैसे पता चला कि आप कोरोनावायरस से संक्रमित हैं?

मुझे पिछले साल कोरोना का संक्रमण हुआ था। हालांकि उस दौरान कोरोना के लक्षण इतने गंभीर नहीं थे। मुझे हल्का बुखार और खांसी थी। उस समय मौसम में भी बदलाव हो रहा था, इसलिए बुखार-खांसी को मैंने ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद मुझे बदन में बहुत ज्यादा दर्द होने लगा, यह कोरोना का लक्षण था, जिस पर मुझे कुछ शक हुआ। इसके बाद मैंने खुद को आइसोलेट किया और पहला आरटीपीसीआर (कोरोना संक्रमण का पता लगाने के लिए होने वाली जांच) टेस्ट कराया। हालांकि, यह टेस्ट निगेटिव आया तो मुझे लगा कि मैं कोरोना से संक्रमित नहीं हूं। उस समय दिवाली का समय था और ऑफिस में छुट्टी थी, इसके बाद वीकेंड हो गया था। ऐसे में मैं ऑफिस में नहीं थी। इसके बाद मेरे एक परिचित डॉक्टर ने फोन पर सलाह दी कि बेशक मेरा आरटीपीसीआर टेस्ट निगेटिव आया है तो भी इन लक्षणों (काफी खांसी और बदन दर्द) के आधार पर मुझे चेस्ट का सीटी स्कैन करा लेना चाहिए। इसके बाद जांच कराने पर कोरोना की पुष्टि हुई।

पता चलने पर सबसे पहले आपने क्या किया? आप सेल्फ आइसोलेट हुईं या किसी डॉक्टर को दिखाया?

कोरोना का पता चलते ही मैंने सबसे पहले खुद को आइसोलेट कर लिया। इसके बाद मैंने डॉक्टर्स की सलाह पर सभी आवश्यक मेडिसिन लीं और पूरा कोविड प्रोटोकॉल फॉलो किया।

इलाज के दौरान आपने खाने-पीने का किस तरह से ध्यान रखा और अन्य कौन सी सावधानियां बरतीं?

चूंकि मैं 14 दिन तक होम आइसोलेशन में थी। उस दौरान डॉक्टर्स का फोन आता था और उनके बताए अनुसार मैं दवा लेती रही। जहां तक खाने का सवाल है तो मैं खुद खाना पकाती थी। इस दौरान डॉक्टर्स की सलाह पर मैंने ज्यादा प्रोटीनयुक्त भोजन, जूस, आंवला, विटामिन सी और नारियल पानी का भी काफी सेवन किया।

आइसोलेशन के दौरान आपने अपना समय व्यतीत करने के लिए क्या किया?

इस दौरान मैंने टेलिविजन पर न्यूज तो फॉलो की हीं, इसके साथ ही मुझे पढ़ना भी काफी अच्छा लगता है तो मैंने काफी किताबें पढ़ीं। हालांकि, कोविड में कमजोरी बहुत आ जाती है। पहले हफ्ते में मेरे साथ भी ऐसा हुआ। कमजोरी के कारण मुझे सिरदर्द-आंखों में दर्द और चक्कर भी आए। उस समय मैंने सिर्फ आराम किया।  

इस दौरान परिजनों और अन्य करीबियों का व्यवहार कैसा रहा?

मेरे लिए यह काफी अच्छी बात रही कि मुझे तमाम लोगों का काफी सपोर्ट मिला। मैंने एक बार ट्वीट किया था कि मैं कोविड पॉजिटिव हूं, इसके बाद तो तमाम लोगों ने सोशल मीडिया पर मेरे जल्द स्वस्थ होने की कामना की पोस्ट करनी शुरू कर दीं, कई लोगों ने मुझे कॉल किया। बाकी, मेरे परिचितों और दोस्तों ने भी मेरा हरसंभव ख्याल रखा।

आपकी नजर में कोरोना के संक्रमण से किस तरह बचा जा सकता है?

मेरा मानना है कि काम तो कभी रुक नहीं सकता। ऐसे में आपको सतर्क रहना होगा। इसके साथ ही कोविड को लेकर सरकारी गाइडलाइंस का पालन करना चाहिए। डबल फेसमास्क, लोगों से उचित दूरी और बार-बार हाथ धोने से भी संक्रमण का खतरा कम हो जाता है।

संक्रमण से निजात मिलने पर अब कोरोना से जूझ रहे पीड़ितों को क्या कहना चाहती हैं?

मेरा मानना है कि खुद को सकारात्मक बनाए रखना इस दौरान सबसे ज्यादा जरूरी है। आइसोलेशन में जब कोई रहता है तो उस व्यक्ति के दिमाग में काफी सारी चीजें होती हैं। उस दौरान वह काफी कमजोर होता है, परिवार व दोस्तों से दूर होता है। आसपास डराने वाली खबरें आ रही होती हैं। ऐसे में खुद को सकारात्मक बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आप अपनी पसंद का कोई भी काम कर सकते हैं जैसे-किसी को म्यूजिक पसंद होता है, किसी को पेंटिंग बनानी पसंद होती है, किसी को किताबें पढ़ना और किसी को दोस्तों से फोन पर बातें करना। कहने का मतलब यह है कि अपनी सोच का सकारात्मक बनाए रखने के लिए आप खुद को अपने पसंदीदा काम में व्यस्त रखें। आप कमरे में ही हल्का-फुल्का व्यायाम और योग भी कर सकते हैं यानी आप खुद को किसी न किसी रूप में मोटिवेट रखें। 

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वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय ने यूं लड़ी कोरोना से जंग, मीडिया को लेकर कही ये बात

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मीडिया निदेशक व प्रेजिडेंट उमेश उपाध्याय भी शामिल हैं।

विकास सक्सेना by
Published - Wednesday, 05 May, 2021
Last Modified:
Wednesday, 05 May, 2021
Umesh-Upadhyay54

देश में कोरोना की दूसरी लहर बेहद भयावह रूप ले रही है। कोरोना का विकराल रूप नियंत्रण में आने की बजाय अधिक विकराल होता जा रहा है। इस महामारी के खिलाफ पूरे देश में ‘जंग’ जारी है। संकट के इस दौर में अपनी जान को जोखिम में डालते हुए तमाम पत्रकार अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं और कोरोना को लेकर रिपोर्टिंग भी कर रहे हैं। ऐसे में कई पत्रकारों के कोरोनावायरस की चपेट में आने से मौत की खबरें भी सामने आई हैं, जबकि कई लोग विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन है।  हालांकि, कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मीडिया निदेशक व प्रेजिडेंट उमेश उपाध्याय भी शामिल हैं। समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय ने बताया कि उनके लिए कोरोना से संक्रमण का दौर कैसा रहा और कैसे उन्होंने इस महामारी पर विजय पाई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको कैसे पता चला कि आप कोरोनावायरस से संक्रमित हैं?

मुझे पहले बुखार आया, जिसके बाद मैंने खुद को चेक करवाया तो रिपोर्ट पॉजिटिव आई। हालांकि मेरी पत्नी सीमा उपाध्याय, जो कि भारतीय एयरफोर्स में काम करती हैं, पहले ही कोरोना पॉजिटिव हो चुकीं थीं, तब मैं सुरक्षित था, क्योंकि उस समय मैंने अपना टेस्ट करवाया था, जो निगेटिव आया था। लेकिन जब मुझे बुखार आने लगा, तो मैंने चेक किया, जिसका रिजल्ट पॉजिटिव आया। मेरी पत्नी मेरे अस्पताल में भर्ती होने से पहले दस दिन तक अस्पताल में थीं। जिस दिन मैं अस्पताल में भर्ती होने गया, उसी दिन वे घर वापस आयीं थीं।   

पता चलने पर सबसे पहले आपने क्या किया? आप सेल्फ आइसोलेट हुए या किसी डॉक्टर को दिखाया?

एक शाम को अचानक से मेरे गले में खराश होने लगी, आवाज बदलने लगी, इसके बाद मुझे खांसी भी आने लगी, यह सब देखते हुए मैंने तुरंत खुद को आइसोलेट किया। इसके बाद मैंने डॉक्टर से संपर्क किया, तो डॉक्टर ने कहा, ‘यह माइल्ड सा है’, इस पर मैंने डॉक्टर को बताया कि मैंने खुद को आइसोलेट कर लिया है। लेकिन अगले दिन मुझे बुखार भी आने लगा, जिसके बाद मैंने अपना कोरोना टेस्ट करवाया, जो पॉजिटिव आया। इसके बाद डॉक्टर से मेरा लगातार संपर्क बना रहा। डॉक्टर ने फोन पर मेरी बड़ी मदद की। वे हमेशा कॉल और वॉट्सऐप पर उपलब्ध रहते थे। डॉक्टर ने जिस तरह से मुझे सपोर्ट किया है, उसके लिए कोई भी शब्द कहना, कम होगा। लेकिन जब बुखार नहीं उतरा और ऑक्सीजन लेवल भी कम होने लगा, तो डॉक्टर ने मुझे अस्पताल में भर्ती हो जाने की सलाह दी, जिसके बाद मैं दिल्ली के सरिता विहार स्थित अपोलो अस्पताल में भर्ती हो गया, जहां मैं करीब 10 दिनों तक भर्ती रहा। इसके बाद जब मैं घर आया तो मैंने खुद को घर में आइसोलेट कर लिया। यह समय करीब 10 दिनों तक रहा। अस्पताल से पहले भी मैं करीब 4-5 दिनों तक घर में आइसोलेट रहा था, इस तरह से यह समय करीब 25 दिनों का रहा। यहां जानकारी के लिए बता दूं कि अस्पताल आपको रिपोर्ट निगेटिव आने पर ही घर नहीं भेजता है, बल्कि जब आप में कोरोना के लक्षण खत्म हो जाते हैं और आप स्टेबल हो जाते हैं, तभी आपको घर भेजा जाता है।।

इलाज के दौरान आपने खाने-पीने का किस तरह से ध्यान रखा और अन्य कौन सी सावधानियां बरतीं?      

सबसे पहले आइसोलेशन में यह बहुत ही आवश्यक है कि कोई भी कोताही नहीं बरतें। यानी आइसोलेशन का अर्थ होता है एकदम अलग हो जाना। किसी से भी आपका संपर्क न हो। जब पहले मैं 4-5 दिन आइसोलेशन में गया, तो मेरे लिए यह एक तरह से नया जीवन था। मैंने स्वयं से दोबारा अपना काम करना सीखा। यानी जिन अलग बर्तनों का मैं प्रयोग करता था, उन्हें स्वयं साफ करना, जिस कमरे में मैं था, उस कमरे को साफ रखना। उसकी डिसइंफेक्टेंट के साथ सफाई करना और खुद के कपड़ों को साफ रखना और धोना।

देखिए, यह संक्रमण है। यह अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, मालिक-नौकर, उद्योगपति-कर्मचारी, बड़े-छोटे अफसर में फर्क नहीं करता। एक तरह से यह सभी चीजों को समतल करता है और मुझे इस बात का अहसास हुआ और मैंने सोचा कि ये सारे काम स्वयं करने हैं। मुझे इससे कष्ट नहीं हुआ, बल्कि मुझे लगा कि ये सभी काम तो कम से कम करने ही चाहिए।  जब मैं अस्पताल में गया, तो मैं वहां डॉक्टर्स को देखता था, नर्सेज को देखता था, सफाईकर्मियों को देखता था। उनका काम काफी मुश्किल और जीवट भरा है। दिल्ली में गर्मियों के समय पीपीई किट पहनकर 12-12 घंटे नौकरी करना काफी मुश्किल है। जब आप पीपीई किट पहने होते हैं, तो आपको काफी पसीना आता है, आप इसे पहनकर चाय भी नहीं पी सकते, खाना भी नहीं खा सकते। कहने का मतलब है कि इसे पहनकर 12-12 घंटे ड्यूटी करना कोई आसान काम नहीं है।

आइसोलेशन के दौरान आपने अपना समय व्यतीत करने के लिए क्या किया?

इस दौरान काफी पढ़ना हुआ। ऑनलाइन तमाम किताबें उपलब्ध हैं। काफी इंट्रैस्टिंग सीरीज देखीं मैंने, जिन्हें देखने की काफी रुचि थी। इस दौरान मैंने जिन सीरीज को देखा, उनमें थी ‘द क्राउन’ (The Crown),  ‘डेसिगनेटेड सर्वाइवर’ (Designated Survivor), ‘चर्नोबिल’ (Chernobyl), ‘द लास्ट जार’ (The Last Jar)। वहीं मिडिल ईस्ट को लेकर भी मैंने बहुत सीरीज देखीं, जिनमें से एक थी ‘द स्पाई’ (The Spy), जोकि इजरायल के एक असली जासूस की कहानी है। इसके अलावा मैं कमरे में टहलता था। कई बार लोगों को लगता है कि टहलने के लिए जगह चाहिए होती है, लेकिन ऐसा नहीं है। मैंने कमरे के अंदर ही रहते हुए एक दिन में दस-दस हजार स्टेप किए। इसलिए कहना चाहूंगा कि व्यस्त रहने के लिए चीजों की जरूरत नहीं होती है।

वहीं मेरी पत्नी जब बीमार थीं, तो अस्पताल के वार्ड में ही पेंटिंग बनाना शुरू किया। उन्होंने इस बीच बहुत सारी पेंटिंग बनायीं। वे पहले से पेंटर नहीं हैं, लेकिन उन्होंने कलर्स मंगवाए और पेंटिंग करना शुरू किया, ताकि वे पॉजिटिव रह सकें। इस तरह से वह खुद को व्यस्त रख सकीं।   

इस दौरान परिजनों और अन्य करीबियों का व्यवहार कैसा रहा?

हमारा बड़ा परिवार है। कई मित्र हैं। सभी फोन करते थे और लगातार उनसे बात होती रहती थी। परिवार तो सबसे बड़ी ताकत और संबल है। मेरे सहयोगी और ऑफिस में काम करने वाले लोगों ने भी मेरा बहुत सहयोग किया। मेरे लिए यह एक नूतन जन्म था। जीवन में नई चीजों को देखने की एक नई दृष्टि आयी। मुझे इन पच्चीस दिनों में आत्मनिरीक्षण करने का समय मिला। बहुत सोचने का समय मिला। समाज कैसे काम करता है, मीडिया कैसे काम करती है, इसको देखने-सोचने का समय मिला।

संक्रमण से निजात मिलने पर अब कोरोना से जूझ रहे पीड़ितों को क्या कहना चाहते हैं? 

सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहूंगा कि बहुत ज्यादा खबरों को न देखें, क्योंकि हमारे देश में बहुत ज्यादा हताश करने वाली खबरें आती हैं। जीवन में उम्मीद, आशा और आकांक्षा, ये मानव को जिंदा रखते हैं। इसलिए सारी चीजों का नियम से पालन करते हुए उम्मीद बनाए रखें कि आप अच्छे होंगे। विश्वास रखें कि आप दुनिया में अच्छे हैं और आपको लोग ठीक होते देखना चाहते हैं। ये भरोसा रखें कि आपके परिजनों को, आपके पड़ोसियों को, आपके मित्रों को, आपके सहयोगियों को आपकी आवश्यकता और चिंता है। चूंकि मैं मीडिया से हूं, इसलिए इस बात को फिर चिन्हित करना चाहता हूं और बहुत ही संजीदगी और गंभीरता से कहना चाहता हूं कि मीडिया में बहुत ज्यादा नकारात्मक दिखाना कि सब जगह त्राहि-त्राहि है। सबकुछ है, वो ठीक है, लेकिन उसको वस्तुपरक खबरें दिखाना चाहिए, न कि नमक-मिर्च लगाकर, क्योंकि जो आदमी अकेले कमरे में टीवी देख रहा है, उसको आप सिर्फ मौत का मंजर दिखा रहे हैं। यह ठीक नहीं है। आप ये भी दिखाइए कि कितने लोग ठीक हो रहे हैं, आप ये भी दिखाइए कि आशा की किरणें कितनी हैं। ऐसा मत दिखाइए कि सबकुछ तबाह हो गया है, नाश हो गया है, क्योंकि यदि अपने दर्शकों, श्रोताओं और पाठकों से उनके जीवन की उम्मीद ले लेंगे, तो आप अपने साथ भी अन्याय करेंगे। अमेरिका में पांच लाख से ज्यादा लोग मारे गए हैं। मैं रोज अमेरिका के अखबार पढ़ता हूं। कहीं ऐसी रोज रोने वाली तस्वीरें नहीं दिखाई जाती। सत्य को बताते हैं वो, लेकिन सत्य को डराने के लिए नहीं बताते हैं, बल्कि लोगों को उम्मीद देने के लिए बताते हैं। खबरों को छिपाना नहीं है। खबरें और मीडिया रूदाली नहीं बन सकता, उसको जीवन से आशा को नहीं छीन लेना है। अफसोस की बात है कि हमारे देश में ऐसा हो रहा है।           

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वरिष्ठ पत्रकार नविका कुमार ने बताया, कैसे लड़ी उन्होंने कोरोना के खिलाफ जंग

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और ‘टाइम्स नेटवर्क’ की ग्रुप एडिटर नविका कुमार भी शामिल हैं।

पंकज शर्मा by
Published - Tuesday, 04 May, 2021
Last Modified:
Tuesday, 04 May, 2021
NavikaKumar454

कोरोनावायरस (कोविड-19) ने पूरे देश में हाहाकार मचा रखा है। रोजाना तमाम लोगों की इस महामारी की चपेट में आकर मौत हो रही है, जबकि कई लोग विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन है। कोरोना पीड़ितों में बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी भी शामिल हैं। हालांकि, कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और ‘टाइम्स नेटवर्क’ (Times Network) की ग्रुप एडिटर (Politics) नविका कुमार भी शामिल हैं। समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में नविका कुमार ने बताया कि उनके लिए कोरोना से संक्रमण का दौर कैसा रहा और कैसे उन्होंने इस महामारी पर विजय पाई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको कैसे पता चला कि आप कोरोनावायरस से संक्रमित हैं?

बुखार और कफ की समस्या होने पर मैंने कोविड-19 की जांच कराई थी, जिसमें मुझे संक्रमण होने का पता चला।

पता चलने पर सबसे पहले आपने क्या किया? आप सेल्फ आइसोलेट हुईं या किसी डॉक्टर को दिखाया?

सबसे पहले मैंने खुद को आइसोलेट कर लिया। बाद में ऑक्सीजन लेवल कम होने पर मुझे मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में तीन-चार दिन रहने के बाद मैं घर पर आ गई, क्योंकि मेरा संक्रमण ज्यादा नहीं था।   

इलाज के दौरान आपने खाने-पीने का किस तरह से ध्यान रखा और अन्य कौन सी सावधानियां बरतीं?

बस आइसोलेट रही और जो भी डॉक्टरों ने बताया, उसके अनुसार खाने-पीने का ध्यान रखा। मेरे परिजन भी कोविड पॉजिटिव हो गए थे। इस दौरान मैंने खुद व अन्य परिजनों को मोटिवेट किया। ईश्वर की कृपा रही कि हम सब इस मुश्किल समय से बाहर निकल आए।

आइसोलेशन के दौरान आपने अपना समय व्यतीत करने के लिए क्या किया?

मैंने तो पूरा बिहार इलेक्शन अस्पताल से ही कवर किया। दरअसल, मैं अस्पताल में ही अपना लैपटॉप लेकर चली गई थी। मैंने काम भी वहीं से किया और बीच में समय मिलने पर आराम भी किया। मैंने म्यूजिक भी काफी सुना।

इस दौरान परिजनों और अन्य करीबियों का व्यवहार कैसा रहा?

जाहिर सी बात है कि कोविड पॉजिटिव पता चलने पर फिक्र तो होती है, लेकिन यदि संक्रमण बहुत ज्यादा नहीं है तो थोड़ा रिलीफ भी महसूस होता है। हां, इस दौरान हमने मेडिकल रूटीन को पूरी तरह फॉलो किया। वैसे- आमतौर पर होम आइसोलेशन के लिए 17 दिन का समय रखा जाता है, लेकिन हमने परिवार के सभी सदस्यों के लिए यह समय 19 दिन का रखा। बस, इसी तरह से एहतियात बरतते हुए हमने इस महामारी पर जीत हासिल कर ली।   

आपकी नजर में कोरोना के संक्रमण से किस तरह बचा जा सकता है?

कोरोना से बचाव के लिए लोगों को इस दिशा में तय सरकारी गाइडलाइंस का पालन करना चाहिए। चूंकि इस वायरस का संक्रमण पिछली बार से ज्यादा है, इसलिए डबल मास्क पहनना चाहिए। लोगों से उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए। भीड़भाड़ में जाने से बचिए। बहुत जरूरी होने पर ही घर से बाहर निकलिए। यानी पूरी तरह से कोविड प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए। कहा भी जाता है कि Prevention is better than cure।

संक्रमण से निजात मिलने पर अब कोरोना से जूझ रहे पीड़ितों को क्या कहना चाहती हैं?

इस बारे में मैं बस यही कहना चाहती हूं कि बीमारी आप पर उतनी ही हावी होती है, जितनी कम आपकी इच्छाशक्ति (Will Power) होती है। इसलिए, मजबूत इच्छा शक्ति के साथ बीमारी से लड़ना चाहिए। डरने के बजाय यदि थोड़ा साहस और धैर्य से इसका मुकाबला करें और सकारात्मक सोच बनाए रखें तो आप इस बीमारी को मात दे सकते हैं। इस दौरान आप खुद को शांत रखने और सकारात्मक सोच को बनाए रखने के लिए अपने पसंदीदा शौक जैसे म्यूजिक, पेंटिंग या बुक रीडिंग का सहारा ले सकते हैं। इस दौरान म्यूजिक काफी राहत देता है और मुझे यह पसंद भी है, इसलिए मैंने काफी म्यूजिक सुना। बस पॉजिटिव सोच बनाए रखिए कि हम इस बीमारी से बाहर निकल आएंगे। कहने का अभिप्राय यह है कि इस महामारी से लड़ने के लिए मजबूत इच्छा शक्ति और सकारात्मक सोच जरूरी है।

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स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सोशल मीडिया का मजबूत रहना जरूरी है: राणा यशवंत

इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन के तमाम पहलुओं पर चर्चा की है।

Last Modified:
Monday, 26 April, 2021
Rana Yashwant

इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन के तमाम पहलुओं पर चर्चा की है। उन्होंने एक मीडियाकर्मी से अपने लेखक बनने के सफर को भी साझा किया है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपके प्रसिद्द शो ‘अर्धसत्य’ की वापसी हो रही है। इस बारे में कुछ बताइए?

यह शो लगभग ढाई साल के बाद वापस आ रहा है। यह शो वर्ष 2014 में शुरु हुआ था और वर्ष 2019 तक एक शानदार सफर इस कार्यक्रम ने पूरा किया। उसके बाद वापस हम इस शो को लेकर आ रहे हैं। आज के समय में पत्रकारिता तयशुदा लकीर पर चलने वाली चीज हो गई है। सच की अपनी-अपनी व्याख्या होती है, लेकिन सच हमेशा सच ही रहता है।

अगर मैं लकीर के दायीं तरफ हूं तो मुझे ये अहसास है कि मुझे उसी तरफ रहना है और अगर मैं बायीं तरफ हूं तो मुझे पक्का यकीन है कि मुझे वहीं रहना है। अगर आप बीच में राय बनाने की कोशिश करते हैं तो ये दर्शक और देश दोनों के साथ बेईमानी है। कुछ आधा सच छोड़ देते हैं और वो जो आधा छोड़ा हुआ सच जब तक लोगों के सामने नहीं आता, वह पूरा नहीं हो सकता है।

आज आप इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर हैं और यहां तक आना इतना आसान तो रहा नहीं होगा? अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए?

जीवन में जब कभी आप चलते हैं तो आपको अंदाजा नहीं होता है कि आप किधर जाएंगे और कैसे सब होगा। कई बार जो आपने नहीं सोचा होता है, आप उस लाइन में आ जाते हैं और वही जीवन का रास्ता हो जाता है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि जीवन में आज यहां तक पहुंच जाऊंगा।

मैं बिहार के छपरा जिले से हूं, जहां से निकले लोगों ने बहुत नाम कमाया है, जिनमें जयप्रकाश नारायण जैसे लोग शामिल हैं। छपरा जिले के एक गांव रामपुर कलां में पैदा हुआ और वहीं मेरा बचपन बीता। उसके बाद मैं अपने जिला मुख्यालय के कॉलेज में आया और उसके बाद वहां से पटना, बीएचयू होते आईआईएमसी आया और आज आपके बीच हूं।

आज भी जिंदगी वही गांव की है। मसलन, खेतों से होकर स्कूल जाने की, पानी लगे हुए धान की फसल के बीच से दौड़ने की, स्कूल से लौटते समय चना उखाड़कर खाने की, गर्मी के दिनों में आम की केरियां तोड़कर खाने की और मुझे लगता है कि वो एक अलग ही दुनिया थी।

जब आसमान से कोई विमान जाता था तो बस उसे देखकर सोचना कि कौन जा रहा है और ये क्या है? मेरे दादाजी कांग्रेस के नेता थे। गांव में उस समय बहुत कम लोगों के पास कार होती थी तो मेरे दादाजी की कार के पीछे हम भागते थे। इसके सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि जब आप महानगर के समाज देखते हैं तो दोनों की समझ आपको आ जाती है। गांव से संस्कार बनते हैं और वही चीज जीवन में सबसे अधिक काम भी आती है।

आपने ‘जी’ और ‘आजतक’ जैसे बड़े चैनल्स के लिए काम किया है। अपनी पहली नौकरी और शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताइए?

सच कहूं तो वो दिन बहुत ही मुश्किल भरे थे। जैसे कि किसी ने इस फील्ड में आने के बाद यदि पांच साल बाद नौकरी छोड़ दी तो अगर आप उससे पूछेंगे तो वो कहेगा की यार बड़ा भयानक अनुभव रहा। मेरे साथ ये तय नहीं था कि मैं पत्रकार बनूंगा लेकिन जब आईआईएमसी में था तो ‘जी न्यूज’ के लिए इंटर्नशिप करने का मौका मिला।

उस वक्त आलोक वर्मा जी वहां संपादक थे। मुझे हाई बैंड टेप को लॉक करने को कहा गया यानी कि किस टाइमलाइन पर क्या है, वो आपको लिखना होता है। मैं रात-रात भर ये काम करता था और आंखें फट जाती थीं। लगभग एक महीने तक मैं ये करता रहा।

एक किस्सा मुझे याद है, एक शो बन रहा था और उसका नाम था ‘इनसाइड स्टोरी’, उसके जब एक एपिसोड मैंने लॉक किया तो मुझे यह अहसास हुआ कि ऐसी स्क्रिप्ट तो मैं भी लिख सकता हूं। इस बारे में मैंने अपने संपादक से बात की और उन्होंने कहा कि ठीक है आप लिखिए। रात भर मैंने अपना काम किया और सुबह चार बजे मैं स्क्रिप्ट लिखने बैठा।

सुबह के नौ बजे के करीब मैंने वो स्क्रिप्ट उनकी टेबल पर रख दी और एक नोट लिखा, सर मैं घर जा रहा हूं आप स्क्रिप्ट पढ़ लीजिएगा। उस दिन शाम को मेरे पास कॉल आता है कि आलोक जी मुझसे मिलना चाहते हैं।

मैं जब आलोक जी से मिला तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुमने बहुत बढ़िया स्क्रिप्ट लिखी है और इसमें कुछ भी एडिट करने की जरूरत नहीं है। क्रेडिट लाइन में तुम्हारा भी नाम इस बार जाएगा। वो मेरी जिंदगी का सबसे यादगार दिन था कि जब आप पहली बार स्क्रिप्ट लिखें और आपका संपादक कहे कि ये एकदम शानदार है। जब मैंने क्रेडिट लिस्ट में अपना नाम देखा तो वो दिन मेरे लिए यादगार बन गया।

इस घटना के बाद मैंने निर्णय लिया कि पत्रकारिता मेरे लिए सही है लेकिन जीवन इम्तिहान का नाम है। कम उम्र में शादी और मामूली सैलरी, दिल्ली में अपनी पत्नी के साथ रहता था और मुश्किल से घर चलता था। ऐसे समय में जीवन में बड़ी कुंठाएं पैदा हो जाती हैं। कभी कभी लगने लगता है कि हम तो इस लायक ही नहीं हैं। कई बार सोचा कि ये जिंदगी बेमानी है। एक रात यमुना फ्लाईओवर के नीचे खड़ा था। जून-जुलाई के महीने में यमुना लबालब भरी थी। एक पुलिस वाला मेरे पास आया और उसके कहा कि आधी रात है और आप ऐसे खड़े हैं, नीचे नदी है।

मैंने उससे कहा कि नहीं, बस ऐसे ही मैं खड़ा हूं। उसने सोचा कि शायद ये आदमी परेशान है और मैं चला गया तो ये कुछ कर सकता है। उसने मुझसे कहा कि आप मेरी बाइक पर बैठिए मैं आपको छोड़ देता हूं। उसने मुझे सराय काले खां ड्रॉप किया और मैं बस पकड़कर घर आ गया। उस दिन मैं रात को साढ़े बारह बजे घर आया और मैंने निर्णय किया कि जीवन में लड़ना है, हारना नहीं।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद हुई कवरेज पर एक बहुत बड़े वर्ग में नाराजगी देखी गई है। उसके बारे में आपका क्या कहना है?

सुशांत एक नौजवान अभिनेता थे और उनका ऐसे चले जाना एक बेहद ही संजीदा खबर थी। उनमें बहुत अधिक संभावना थी और उनकी मौत पर वाकई सवाल खड़े हुए हैं। एक छोटी सी जगह से आने वाले आदमी ने बॉलिवुड में अपनी जो जगह बनाई। न जाने कितनी पीड़ा से उसे गुजरना होता है और उसे नाकाम करने की कोशिश भी की जाती है।

सुशांत की मौत को लेकर मेरे मन में आज भी कई तरह के संदेह हैं और कई बुनियादी सवाल हैं, मुझे आज भी उनका जवाब नहीं मिला है। किसी भी संपादक के लिए वो एक बड़ी खबर थी और उसकी मौत के बाद जिस तरह से मीडिया खड़ा रहा, वो जरूरी भी था।

हालांकि, कई लोगों ने उसकी मौत के बाद अपने मुद्दों को उसकी मौत से जोड़कर फायदा उठाने की भी कोशिश की थी। इसके अलावा एक चीज और है कि एम्स की रिपोर्ट सीबीआई के पास है और आज भी उन्होंने उसकी मौत से पर्दा उठाने की कोशिश नहीं की है।

मेरा यह मत है कि सुशांत की मौत एक प्रामाणिक स्टोरी थी और उसकी मौत सिर्फ एक कलाकार की मौत नहीं थी, बल्कि उसके पीछे एक बहुत बड़ा गिरोह शामिल था। वो सिर्फ एक केस नहीं है बल्कि इसके अलावा भी कई ऐसे केस हैं, जिनका सच लोगों के सामने आना बेहद जरूरी है।

पिछले कुछ सालों से डिजिटल मीडिया की ताकत बढ़ी है और फेक न्यूज का सिलसिला बन पड़ा है। इस पर आपके क्या विचार हैं?

आपकी बात सही है। किसी भी औजार को अगर बिना इल्म के इस्तेमाल करना शुरू कर देंगे तो बंदर के हाथ में उस्तरे वाली बात हो जाएगी। देश में सबको अपनी बात कहने का हक है और सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां आप अपनी बात रख सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि अगर मैं किसी मसले पर राय रखने की बजाय राय तैयार करने लगा तो वो गलत है। राय रखने में और उसे तैयार करने में बड़ा फर्क है।

अगर आप लोगों की सोच को प्रभावित करने लगें, आकंड़ों में घालमेल करने लगें तो ये साजिश है और ये वाकई गलत बात है। देश की आबादी बहुत है और मेरी अपनी राय है कि सोशल मीडिया लोगों की राय रखने के लिए एक खुला मंच होना चाहिए।

बाकी जगह देखें तो वहां शर्तें हो सकती हैं, लेकिन कम से कम सोशल मीडिया पर वो पाबंदी नहीं है। स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सोशल मीडिया का मजबूत रहना जरूरी है लेकिन एक कायदा होना चाहिए और उसका पालन भी होना चाहिए। देश में कई ऐसे वाहियात लोग हैं, जिनके पीछे एक मंडली खड़ी हो जाती है और आप लोग उन्हें हीरो बनाने लग जाते हैं। इस रास्ते का बंद होना जरूरी है।

पिछले एक साल से भी अधिक समय से मीडिया कोरोना महामारी का सामना कर रहा है और रेवेन्यू का भी नुकसान हुआ है, उस दिशा में आपका चैनल क्या कदम उठा रहा है?

देखिए, कोरोना का संकट असाधारण, विनाशकारी और विस्फोटक है। सिर्फ इस देश में ही नहीं बल्कि बाकी देशों में भी लाखों लोगों ने इस संकट के कारण जीवन खोया है। अमेरिका जैसे विकसित देश में भी हाहाकार मचा है और इस देश से अधिक मौतें वहां हुई हैं। आर्थिक हालात की बात करें तो फिलहाल जल्दी रिकवर होने के कोई चांस नहीं हैं और यही हालत कंपनियों की भी है। मीडिया में जो रेवेन्यू आज से तीन साल पहले आ रहा था, वो आज ध्वस्त हो गया है।

बाकी चैनल्स का भी यही हाल है और इसी वजह से कम संसाधनों में बेहतर काम करने का माद्दा रखना जरूरी है। जैसे परिवार में, खेतीबाड़ी में, उद्योग में परेशानी है, वैसे ही मीडिया में भी संकट है और हर संपादक उससे बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। जीवन में जिस संतुलन से हम चलते हैं, उसी तरीके से हमें इधर भी चलना होगा। कम खर्चे में चैनल कैसे बेहतर हो सके, हमें उसका कौशल भी विकसित करना होगा।

आप कवि हैं और लेखन भी करते हैं। आपका काव्य संग्रह भी पब्लिश हुआ है। इस यात्रा के बारे में कुछ बताएं?

सिर्फ मीडिया में ही नहीं, आप अगर जीवन के किसी और हिस्से में भी हैं तो लिखना, सोचना और बोलना ये सब आपके जीवन का हिस्सा है। कुछ लोग लिखते हैं और कुछ सिर्फ सोचकर रह जाते हैं। लिखने से आपके पास हुनर आ जाता है कि लिखने का सलीका क्या होना चाहिए।

साहित्य की अपनी कुछ शर्तें होती हैं और वो उस पर आपको आजमाता है। आप उसके बाद अनुभव करते हैं कि मैंने जो लिखा है, उसका असर कितनी दूर तक है। इसे लेकर मेरा लगाव बचपन से रहा, कॉलेज के दिनों में भी मैं ये सब करता रहा। मेरे साथ एक अच्छी बात यह रही कि मेरे जितने भी दोस्त थे, उन सबका सरोकार कहीं ना कहीं साहित्य से रहा और यह चीज मेरे अनुकूल हुई।

हम 12वीं कक्षा तक आते-आते बड़े साहित्यकारों और मीडियाकर्मियों के बारे में बात करते थे। देश और दुनिया के बारे में हम बाते करते थे। एक चाव था और दिलचस्पी थी। इसके अलावा कुछ करम ऊपर वाले का भी होता है और कुछ मेहनत आप भी करते हैं।

मैं जब लिखने लगा तो हिंदी साहित्य के लोगों ने उसको सराहा, हिंदी समाज के लोगों ने उसे हाथों हाथ लिया। केदारनाथ जैसे महाकवि जिनको ज्ञानपीठ पुरुस्कार भी प्राप्त हुआ है, उन्होंने भी मेरी कई कविताओं को सराहा है और उनकी तारीफ की है। अलग हालातों और समस्याओं को आप कैसे देखते हैं। अपने साहित्य में उसे कैसे ढालते हैं और इसके अलावा आपकी सोच पर भी यह काफी हद तक निर्भर करता है।

समाचार4मीडिया के साथ राणा यशवंत की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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ABP नेटवर्क के CEO अविनाश पांडेय ने बताया, ग्रुप ने तमिल मार्केट में क्यों रखा कदम

‘एक्सचेंज4मीडिया’ से बातचीत में ‘एबीपी नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडेय ने नेटवर्क की नई पेशकश एबीपी नाडु समेत तमाम मुद्दों पर अपने विचार रखे।

Last Modified:
Friday, 23 April, 2021
Avinash Pandey

‘एबीपी नेटवर्क’ (ABP Network) ने अपने विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाते हुए तमिल बोलने और समझने वालों के लिए तमिल भाषा में एक नया डिजिटल प्लेटफॉर्म 'एबीपी नाडु' (ABP Nadu) लॉन्च किया है। इस लॉन्चिंग के जरिये एबीपी नेटवर्क की योजना तमिलनाडु के प्रतिस्पर्धी डिजिटल न्यूज स्पेस में अपना प्रमुख स्थान बनाने की है। इस प्लेटफॉर्म को लेकर योजनाओं और मार्केट में मौजूद अन्य प्लेटफॉर्म्स से यह किस तरह अलग होगा, समेत तमाम मुद्दों पर ‘एबीपी नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडेय ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

एबीपी नाडु के बारे में हमें बताएं। इसे अभी क्यों लॉन्च किया गया है? क्या यह विस्तार की दिशा में सिर्फ एक कदम है अथवा रीजनल मार्केट से आ रही मजबूत ग्रोथ से प्रेरित है?

इसमें मैं दोनों बात कहना चाहूंगा। पहली बात तो यह कि तमिल मार्केट कंटेंट के लिहाज से अभी काफी उथल-पुथल है, ऐसे में यह हमारे प्रवेश के लिए सही समय है। राज्य में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की दर काफी ज्यादा है और न्यूज कंटेंट ऑनलाइन रूप से हासिल करने में भी तमिल ऑडियंस काफी रुचि दिखा रहे हैं।  

दूसरी बात यह है कि यदि हम कंज्यूमर के लिहाज से देखें तो रीजनल मार्केट में ग्रोथ के अवसर बहुत ज्यादा हैं। पिछले कुछ वर्षों में रीजनल लॉन्चिंग में काफी बढ़ोतरी देखी गई है, क्योंकि लोग अपनी भाषा में कंटेंट हासिल करने को प्राथमिकता देते हैं। एबीपी नेटवर्क भी रीजनल न्यूज और कंटेंट के क्षेत्र में अग्रणी के रूप में उभरा है। नेटवर्क के रीजनल चैनल्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने संबंधित मार्केट्स में सफलतापूर्वक मजबूत ब्रैंड इक्विटी तैयार की है। साथ ही, वे हमारे नेटवर्क के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसलिए, दक्षिण के बाजार में हमारी एंट्री एबीपी नेटवर्क के लिए मध्यम और दीर्घकालिक अवधि में स्थायी विकास सुनिश्चित करेगी।

एबीपी नाडु से उम्मीद है कि यह युवाओं से जुड़े मुद्दों पर जोर देगा, इस प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की कवरेज को कैसे विस्तार देंगे? 

एबीपी नाडु राज्य के मजबूत, शिक्षित और प्रगतिशील युवाओं की कंटेंट की जरूरत को पूरा करेगा। ये वे लोग हैं जो 24x7 अपडेट रहने के इच्छुक हैं और हर एक मिनट में कंटेंट का उपभोग कर रहे हैं।

हम उन्हें सशक्त बनाना चाहते हैं। उन्हें खुद को व्यक्त करने के लिए एक मंच देना चाहते हैं, ताकि वे राज्य के विषय में महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस कर सकें और अपनी राय दे सकें। एबीपी नाडु सभी तरह के यूजर्स को उनकी पसंद का कंटेंट उपलब्ध कराएगा, जिसमें तमिलनाडु से जुड़े ज्वलंत मुद्दे भी शामिल होंगे। इस प्लेटफॉर्म पर डिबेट शो, राजनीतिक विश्लेषण, ब्रेकिंग न्यूज के साथ-साथ एंटरटेनमेंट, एजुकेशन, फाइनेंस, गेमिंग, टेक्नोलॉजी और ऑटो से जुड़ी विस्तृत कवरेज शामिल होगी।   

तमाम लोकप्रिय न्यूज नेटवर्क दक्षिण के मार्केट में पहले से हैं। आपको क्या लगता है कि एबीपी नाडु इस प्रतिस्पर्धी मार्केट में कैसे अपने जगह बना पाएगा?

तमिलनाडु की संस्कृति हमेशा से समृद्ध रही है और यह अपने लोगों में गर्व की भावना पैदा करती है। पूर्व में मुख्यधारा की मीडिया में इस सांस्कृतिक समृद्धि को अक्सर मंदिरों, स्मारकों, राजवंशों आदि से जोड़ा जाता था। हालांकि, वास्तव में तमिल संस्कृति एक विकास, एक पुनर्जागरण देख रही है जो एक नया आयाम ला रही है।

इसलिए, एबीपी नाडु, तमिल संस्कृति की गतिशीलता में इस बदलाव को रेखांकित करता है, जिसे 'न्यू तमिलियन' द्वारा आगे लाया गया है। मुझे विश्वास है कि यह ताजा कदम हमारी सभी पेशकश में सार्थक रूप से प्रतिबिंबित होगा और हमें तमिलनाडु के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में चमकने और खुद को अलग दिखाने में मददगार साबित होगा।

इसके अलावा, एबीपी नेटवर्क ने इस प्लेटफॉर्म पर काम करने के लिए इंडस्ट्री के प्रतिभाशाली युवाओं को अपने साथ जोड़ा है, वे सभी मिलकर तमिल युजर्स और न्यूज उपभोक्ताओं को उनकी पसंद का कंटेंट उपलब्ध कराएंगे।

क्या आपने इस मार्केट में सिर्फ डिजिटल की पेशकश की है? क्या निकट भविष्य में टीवी न्यूज चैनल शुरू करने की योजना है?

गूगल द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 90 प्रतिशत इंटरनेट यूजर्स अपनी स्थानीय भाषा में कंटेंट के इस्तेमाल को प्राथमिकता देते हैं। इसके अलावा, पिछले साल रोजाना इंटरनेट के इस्तेमाल में 42 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। इसलिए, डिजिटिल कंटेंट का बिजनेस मातृभाषा में काफी आगे बढ़ रहा है और यह तमिलनाडु में ऑडियंस और एडवर्टाइजर्स के लिए काफी अच्छी बात है।

इसे ध्यान में रखते हुए, हम वर्तमान में तमिलनाडु में अपने डिजिटल फुटप्रिंट का विस्तार करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, क्योंकि बाजार में अपार वृद्धि की संभावना है। फिलहाल यह हमारी प्राथमिकता बनी हुई है। यदि भविष्य में हमारे पास किसी न्यूज चैनल को लेकर कोई योजना होगी, तो योजना परवान चढ़ने पर हम उसके बारे में जरूर बताएंगे।

डिजिटल की बात करें तो एबीपी अपने डिजिटल वेंचर्स को लेकर आर्थिक रूप से काफी सफल रहा है, इस बारे में आपका क्या लक्ष्य है? आपकी टॉपलाइन में डिजिटल रेवेन्यू की क्या भूमिका है?

पिछले वर्षों में डिजिटल के यूजर बेस में काफी ग्रोथ होने के साथ एबीपी नेटवर्क ने अपनी डिजिटल मौजूदगी को ज्यादा मजबूत किया है। यूट्यूब पर इसने चार बिलियन से ज्यादा व्यूज का आंकड़ा पार कर लिया है। ट्विटर पर इसके दस मिलियन से ज्यादा और फेसबुक पर करीब 21 मिलियन फॉलोअर्स हैं। एबीपी लाइव ऐप के दस मिलियन से ज्यादा डाउनलोड हो चुके हैं। जनवरी 2020 से जनवरी 2021 के लिए Comscore MMX के ‘Year On Year Review’ के अनुसार, हमारे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। 

इसलिए आगे बढ़ने के साथ-साथ हमारा लक्ष्य इस निरंतर बढ़ते माध्यम पर निर्विवाद रूप से नंबर वन बनने के लिए अपनी डिजिटल पेशकश की गुणवत्ता और विविधता को लगातार ऊपर उठाना है।

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अखबारों को अपनी कीमतों पर एक बार फिर गौर करना पड़ेगा: शशि शेखर

मीडिया के क्षेत्र में ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर का काफी नाम है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में शशि शेखर ने अपने जीवन और कार्य से जुड़ी तमाम बातें साझा की हैं।

Last Modified:
Monday, 19 April, 2021
Shashi Shekhar

मीडिया के क्षेत्र में ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर का काफी नाम है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में शशि शेखर ने अपने जीवन और कार्य से जुड़ी तमाम बातें साझा की हैं। इसके साथ ही उन्होंने आने वाले समय में प्रिंट मीडिया की चुनौती और अखबारों के भविष्य पर भी चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए?

पिताजी बनारस में सरकारी अधिकारी थे, मैं वहीं पैदा हुआ। पिताजी का ट्रांसफर देवरिया होने के कारण मेरी स्कूलिंग वहां हुई, फिर पिताजी मिर्जापुर आ गए और वहां भी मेरी स्कूल की कुछ यादें हैं। इसके बाद इलाहबाद, आगरा और मैनपुरी भी शिक्षा अर्जित की। बाद में उन्होंने बीएचयू जॉइन किया तो मैंने वहीं से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एमए किया।

आपने भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एमए किया तो मीडिया में आपका कैसे आना हुआ?

जी बिल्कुल, मैंने इस बारे में सोचा नहीं था और हमारे घर में मीडिया को लेकर भी कोई अच्छी बात नहीं होती थी लेकिन मैं छोटी उम्र से ही लिखने लगा था। मेरे कुछ लेख नवभारत टाइम्स में भी प्रकाशित हुए और उसके बाद आज अखबार के प्रॉपराइटर श्री शार्दुल विक्रम गुप्त ने मेरे लेख पढ़कर सोचा कि ये कोई अनुभवी आदमी हैं, जो बनारस से लिख रहे हैं। उन्होंने हमारे संपादक राममनोहर पाठक जी से बात की तो उन्होंने बताया कि ये तो 20 साल का लड़का है और एमए में पढ़ता है। मैं उनसे मिलने गया और उन्होंने मुझसे कहा कि आप अखबार में काम कर लीजिए। उस समय मैंने मना कर दिया लेकिन नियति अपना काम करती है। इसके बाद उन्होंने वापस मुझे बुलाया और उसके बाद मैंने हां कर दी और आप देखिए कि अगले बीस साल तक मैं उस अखबार के लिए काम करता रहा।

समय कभी एक सा नहीं रहता है और बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो समय के साथ चले, आप अपने समय में और आज के समय में कितना अंतर पाते हैं?

आपने सही कहा कि समय कभी एक सा नहीं रहता है लेकिन मेरा यह मत है कि अगर आदमी ईमानदार और समझदार है और परख रखता है तो उसे कभी कोई कठिनाई नहीं होगी। जीवन में हंसी और गम तो एक चक्र में की तरह हैं और बाद में कहानियां बनती हैं लोगों की, लेकिन कहानियों में मेरा यकीं नहीं है। एक यात्रा है 40 वर्ष की जो मैं करता रहा और आज इस मुकाम तक आ गया हूं।

एक समय ऐसा था, जब नौकरी जरूरी लगती थी क्योंकि बच्चे छोटे थे लेकिन अब वो बड़े हो गए हैं और अपना काम करने लगे हैं तो अब लगता है कि किसी के काम आ सकूं, कुछ लोगों के जीवन में बदलाव ला सकूं। आज मेरे साथी कोरोना की वजह से बहुत तनाव में थे और मैंने उन्हें दफ्तर बुलाया और उनसे बात की। मुझे ऐसा लगा कि आज मैंने जीवन का एक सार्थक दिन जीया, जब मैंने किसी की पीड़ा और दुःख को अनुभव किया और उसे दूर करने की कोशिश की। बस इससे अधिक मैं कुछ नहीं सोचता।

वहीं, मैं तब और आज के माहौल में कोई अंतर नहीं पाता, बस तकनीक बदल जाती है। उस समय के प्रिंट मीडिया में और आज के प्रिंट मीडिया में तकनीक का बड़ा अंतर आ गया है लेकिन अखबार के डिजाइन में बैलेंस होना चाहिए, अगर उसको जरा भी इधर-उधर करोगे तो बैलगाड़ी की भांति वो उल्टी टंग जाएगी। आज हम दुनिया के सबसे बड़े डिजाइनर के साथ बैठकर अखबार को रीडिजाइन कर रहे हैं। इससे पहले भी आज से 11 साल पहले मैंने अखबार को डिजाइन करवाया था। गुण और ज्ञान किसी डिग्री से नहीं आते हैं।

पत्रकारिता का मूल तत्व है सच बोलना, आज कौन कह रहा है कि उसमे घालमेल करो?, दरअसल पत्रकार बदल गए हैं। पत्रकारिता वही है और कुछ खास लोगों के बदल जाने से एक अजीब सी मंडी हो गई है। हर आदमी चिल्ला रहा है।

पिछले कुछ सालों से प्रिंट मीडिया के सामने डिजिटल से चुनौती उभरकर आ रही है। इस दिशा में आपका अखबार क्या काम कर रहा है?

साल 1995 की मैं आपको बात बताता हूं, जब फटाफट न्यूज चैनल्स का दौर नहीं था और उस समय मोबाइल भी उतने प्रचलन में नहीं थे। उस समय एक बहुत बड़े व्यक्ति ने मुझसे कहा कि शशि जी, आप खुद को अखबार से अलग कर लीजिए, आने वाले समय में इसका कोई भविष्य नहीं है। उन्होंने पर्यावरण का तर्क देते हुए मुझसे ये बात कही थी। उसके बाद साल 2000 आया और मेरे पास एक 24 घंटे के न्यूज चैनल का ऑफर था।

मैंने वहां काम करना शुरू किया और वहां भी यही सोच थी कि अखबार खत्म हो जाएंगे लेकिन उसके ठीक डेढ़ साल बाद ही मैं एक अखबार में काम करने चला गया और वो भी आधी सैलरी पर, क्योंकि जैसी पत्रकारिता में करना चाह रहा था वो मैं कर नहीं पा रहा था। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि टीवी में ये काम ठीक से नहीं किया जाता है। वो अखबार आठवें नंबर पर था और उसके मालिक भी मुझसे यही कहते थे की अखबार का कोई भरोसा नहीं है भविष्य नहीं है।

हमने कोशिश की और वो देश के तीसरे नंबर का अखबार बन गया। फिर मैं इस अखबार में आया और मुझे बहुत बढ़िया टीम मिली और इतना समय बीत जाने के बाद भी अखबार है। हां, समय बदलता है। मैं कश्मीर में था और वहां मैंने किसी के हाथ में अखबार नहीं देखा। डिजिटल माध्यम बढ़ रहा है। आने वाले समय में विज्ञापन का माध्यम भी बदल जाएगा। अखबारों की मृत्यु मीडियम की मृत्यु नहीं होगी बल्कि सिस्टम की मृत्यु होगी। तकनीक के परिवर्तन के साथ मीडियम बदल जाएगा लेकिन मीडिया वही रहेगा।

तेजी से बढ़ते डिजिटल मीडिया में फेक न्यूज एक बहुत बड़ी समस्या है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

इस देश में नारेबाज बहुत हो गए हैं और उनका यह धंधा बन गया है। पत्रकारिता में उन्होंने कोई काम किया है या नहीं इसका उन्हें कोई ज्ञान नहीं है लेकिन दूसरों के बारे में उन्हें बहुत ज्ञान है। अगर फेक न्यूज है तो ऐसे में सही न्यूज बोलने वाले की कद्र बढ़ती है। बाजार का दस्तूर है कि असली सिक्कों की आड़ में खोटे सिक्के चल जाते हैं। अगर सिर्फ खोटे सिक्के चलेंगे तो बाजार बंद हो जाएगा। आज जो योग्य है, उसके लिए काम की कोई कमी नहीं रह गई है, कमी उन लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी कोई पहचान नहीं बनाई है।

कुछ सालों में मीडिया में निगेटिव चीजे हुई हैं, गोदी मीडिया जैसी शब्दावली इस्तेमाल की जा रही है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

मेरा मानना है कि ये यात्रा है और यात्रा में इससे भी पहले कठिन समय आया है। यात्रा में कई मोड़ आते हैं और अगर किसी को तकलीफ है तो उसे हक है अपनी तकलीफ बयान करने का, कुछ लोगों का तो काम ही है तकलीफ को बोलना जैसा कि मैं आपसे पहले कह चुका हूं। मेरा ये मत है कि इस यात्रा में ये जो पड़ाव है वो भी गुजर जाएगा और जिस तरह कोरोना के बाद लोगों ने अपने जीने का रास्ता ढूंढा और अपने जीवन में बदलाव किए, ठीक उसी तरह से मीडिया भी अपना रास्ता बना लेगा।

हमने कोरोना का एक भयावह दौर देखा और उसके बाद प्रिंट मीडिया में चीजें किस तरह से बदली हैं?

कोरोना का प्रिंट मीडिया पर बड़ा असर हुआ और कई साथियों को उसकी वजह से तकलीफ भी उठानी पड़ी। लेकिन आज के समय की बात करें तो अखबारों का वो बुरा दौर बीत गया है। विज्ञापन भी वापस आ रहे है। लेकिन ये बुरे दिन वापस भी आ सकते हैं इसलिए उनको अपनी कीमतों पर एक बार फिर गौर करना पड़ेगा। रीडर से सीधे संवाद करना होगा और उसे यह समझाना होगा कि हम क्यों अखबार की कीमत बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा डिजिटल कंटेंट जो फ्री है उससे भी बड़ी परेशानी है।

ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने न्यूज पब्लिशर्स के हक में जो निर्णय लिया है क्या ऐसा कार्य भारत सरकार को भी करना चाहिए?

बिल्कुल करना चाहिए। अगर आज कोई इतना समय लगा रहा है और वही कंटेंट कोई अगर फ्री उठाकर डाल दे तो ये गलत है। उसके बाद फेक न्यूज वाले अपने हिसाब से उसे गलत तरीके से वायरल अगर कर दें तो नुकसान है। इसलिए गूगल को भारत में भी कंटेंट पब्लिशर्स को पैसे देने चाहिए। 

आपने मीडिया में एक लंबा सफर तय किया है और कई बड़े इंटरव्यू भी किए है। कोई ऐसा किस्सा जो आपको आज भी याद आता है?

श्रीमती इंदिरा गांधी अचानक से इलाहबाद में 1983 में आईं और उस वक्त मैं रिपोर्टर था। उस समय सिर्फ 4 या 5 रिपोर्टर ही होते थे। मुझे पता चला कि वो प्रोग्राम अचानक से ही बन गया था और किसी को खबर नहीं थी। उस समय पीएम इंदिरा के साथ सिर्फ दो ही लोग थे। गेट पर पुलिस वालों ने हमको रोक दिया। हम कुछ चार पांच थे और हमने कहा कि अरे मिश्रा जी, जरा इंदिरा जी से मिलवाइए। बाद में वो अंदर चले गए और हम सब बाहर खड़े रहे। कुछ देर बाद इंदिरा जी बाहर निकलीं और गाड़ी में बैठने लगी। लेकिन हमारी ओर उन्होंने देखा और इशारे से हमको बुलाया। मैं सबसे आगे था और मैंने चार सवाल सोचे हुए थे जो उनसे पूछे। उसके बाद उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा कि तुम ब्यूरो चीफ हो? अच्छा, दिखने में तो  कॉलेज के लगते हो, क्या उम्र है? उसके बाद मैंने जवाब दिया कि 23 साल। उन्होंने फिर मुझसे कहा कि अरे 23 साल की उम्र में ब्यूरो चीफ! अच्छा बताओ तुमने पंडित जी की किताबें पढ़ी हैं? मैंने कहा कि जी, मैंने पढ़ी हैं। उन्होंने फिर मुझसे कहा कि ये मैं तुमसे इसलिए नहीं कह रही कि वो मेरे पिता थे बल्कि इसलिए कह रही हूं क्योंकि वह पत्रकार थे। उसके बाद मुझसे कहा कि खूब पढ़ा लिखा करो और मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझसे कहा कि थोड़ा कसरत किया करो, बहुत पतले हो। मैं उस स्तर का पत्रकार नहीं था और सिर्फ दिल्ली वाले उनसे मिलते थे, लेकिन ये मेरा अनुभव यादगार है।

इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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ABP के साथ मेरी कभी न खत्म होने वाली यादें हैं: दीपांकर दास पुरकायस्थ

एबीपी के पूर्व सीईओ और एमडी ने नेटवर्क के साथ अपनी लंबी पारी और भविष्य की योजनाओं समेत कई मुद्दों पर रखी अपनी बात

Last Modified:
Thursday, 25 March, 2021
Dipankar Das Purkayastha

‘एबीपी प्राइवेट लिमिटेड’ (ABP Pvt Ltd)  में अपनी चार दशक से ज्यादा पुरानी पारी को विराम देते हुए दीपांकर दास पुरकायस्थ (Dipankar Das Purkayastha) ने हाल ही में सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर के पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया है। इस नेटवर्क में अपनी इतनी लंबी पारी, पुरानी यादों और भविष्य की योजनाओं को लेकर डीडी पुरकायस्थ ने ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

: एबीपी नेटवर्क के साथ आप चार दशक से ज्यादा समय से जुड़े रहे हैं। इतनी लंबी पारी की अपनी कुछ बेहतरीन यादों के बारे में कुछ बताएं? 

एबीपी के साथ मेरी कभी न खत्म होने वाली यादें हैं। चार दशक पुरानी बात करें तो पूर्व में हमारे पास तकनीकी कम थी। ज्यादातर लोगों का झुकाव अखबार पढ़ने पर था। विज्ञापनों को लेकर ज्यादा स्थिरता नहीं थी और टेलिविजन बहुत ज्यादा आम नहीं था। समय गुजरने के साथ सभी चीजें बदल गईं। प्रतिस्पर्धा बढ़ गई, मीडिया के तमाम माध्यम विकसित हो गए, डिजिटल और मोबाइल टेक्नोलॉजी की शुरुआत हो गई और मैंने इन चार दशकों में अपने सामने इन सब परिवर्तनों को होते हुए देखा है। इस दौरान कंपनी एक छोटे क्षेत्रीय समाचार पत्र से बड़े राष्ट्रीय समूह में विकसित हुई है और टेलिविजन, मैगजींस, न्यूजपेपर्स और डिजिटल क्षेत्र में बहुत मजबूती से अपनी जगह बनाई है। मैं खुश हूं कि मेरे इस्तीफे के समय तक एबीपी देश का एक प्रमुख न्यूज मीडिया ग्रुप बन चुका है।

: बीस-तीस साल पहले राजनीतिक घटनाक्रमों की कवरेज बिल्कुल अलग तरीके से होती थी। आपकी नजर में इस दिशा में क्या बदलाव आया है?

लोग अब सभी चीजें जल्दी से जल्दी जान लेना चाहते हैं। मीडिया का काम समाज में घट रही अच्छी-बुरी घटनाओं को सामने लाना है, लेकिन लोग अच्छे पक्ष को देखना चाहते हैं। इन हालातों में सही तथ्यों को सामने रखना काफी दुविधाजनक होता है। लेकिन एबीपी ने हमेशा से एक साहसिक दृष्टिकोण अपनाया है और समाज के लिए जो सही है, वही पब्लिश करता है।

: जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं कि कैसे एबीपी न्यूज नेटवर्क अब एबीपी ब्रैंड बन गया है, तो आपको कैसा लगता है?

एबीपी न्यूज को पहले स्टार न्यूज के नाम से जाना जाता था। इससे पहले कि हम इसे पूरी तरह से खरीद लें, यह सीखने का एक अच्छा अनुभव रहा। स्टार न्यूज रातों रात एबीपी न्यूज बन गया, लेकिन इसके लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया गया, क्योंकि लोगों के दिमाग में किसी की छवि को बदलना इतना आसान नहीं है और बहुत लंबे समय तक इसे स्टार न्यूज कहा जाता था। स्टार ग्रुप से सीखी गईं तकनीकी की बारीकियां और कंटेंट को लेकर एबीपी की तैयारियां ही इसे खास बनाती हैं। यह सहयोग सफल रहा। शुरू से ही हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट रहा है कि हम एक प्रमुख स्थान चाहते थे। हम जानते थे कि हमें क्या ब्रॉडकास्ट करना है। हम अपने रीडर्स और व्युअर्स को गंभीर न्यूज और गंभीर पत्रकारिता देना चाहते थे। एबीपी न्यूज ने बंगाली भाषा में अपना चैनल शुरू किया, जो काफी सफल रहा। इसके बाद मराठी और गुजराती भाषा में चैनल शुरू किए गए। महाराष्ट्र में एबीपी माझा नंबर वन न्यूज चैनल बन गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड पर आधारित हिंदी न्यूज चैनल ‘एबीपी गंगा’ (ABP Ganga) की शुरुआत की गई। इसे अभी एक साल ही हुआ है। एबीपी पूरे देश का नंबर वन रीजनल न्यूज मीडिया बनना चाहता है। हम पूरे देश में अपनी मौजूदगी की तैयारी कर रहे हैं और जल्द ही दक्षिणी क्षेत्रों में अपने कदम बढ़ाएंगे और देश का नंबर वन न्यूजपेपर प्लेयर बनने का प्रयास करेंगे।

: निजी और प्रोफेशनल तौर पर पिछले 12 महीने आपके लिए कैसे रहे हैं। चुनौतियों का सामना करने और भविष्य की तैयारी के लिए एबीपी ने क्या किया?

पिछले 12 महीनों की बात करें तो यह काफी अनिश्चितता भरा दौर रहा। हर कोई भोजन और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति को लेकर पूरी तरह निश्चित नहीं था। अखबारों का डिस्ट्रीब्यूशन जीरो हो गया था, विज्ञापन बंद हो गए थे और एक मीडिया कंपनी के रूप में हमारे लिए काफी मुश्किल हो गई। इन चुनौतियों से निपटने और स्ट्रैटेजी के निर्माण के लिए हमने लोगों की एक टीम बनाई। सीमित रेवेन्यू के कारण कंपनी सभी को भुगतान करने में सक्षम नहीं थी, इसलिए छंटनी की गई। लागत को कम करना पड़ा। कुछ बड़े मीडिया संस्थानों ने मुझे फोन कर सुझाव दिया कि रेवेन्यू गिरने के कारण न्यूजपेपर्स की प्रिंटिंग बंद कर देनी चाहिए, लेकिन मैंने इससे यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इससे लोग हमें पूरी तरह भूल सकते हैं। 

इससे बाद एक जागरूकता कैंपेन शुरू किया गया कि अखबार सुरक्षित हैं और इससे कोरोना का संक्रमण फैलने का खतरा नहीं है, क्यों प्रॉडक्शन के सभी स्तरों पर तमाम जरूरी सावधानियां बरती जा रही हैं। धीरे-धीरे सेल्स और रेवेन्यू में सुधार आना शुरू हुआ। विज्ञापन रेवेन्यू बढ़ गया। मुझे खुशी है कि मैं ऐसे समय पर इस्तीफा दे रहा हूं और मैंने कंपनी की ग्रोथ में खासकर इस मुश्किल समय में बहुत योगदान दिया है।

: अवीक सरकार और अरुप सरकार के साथ काम करने का आपका कैसा अनुभव रहा है और उनके पेशेवर दृष्टिकोण क्या हैं? 

दोनों बिल्कुल अलग हैं। कई मायनों में वे एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन व्यक्तित्व में वे थोड़े अलग हैं। अवीक सरकार बहिर्मुखी हैं और लोगों से मिलना-जुलना पसंद करते हैं, दूसरी ओर अरुप सरकार थोड़े अंतर्मुखी हैं, लेकिन दोनों ही बहुत बौद्धिक हैं और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। वे एम्प्लॉयीज को काम करने की पूरी आजादी देते हैं। उनके साथ काफी अच्छा सफर रहा है।

: अतिदेब सरकार एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। कंपनी के भीतर से लीडर्स तैयार करने के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

संस्थान में काफी सक्षम व्यक्ति हैं और एबीपी उन्हें अपने कौशल का प्रदर्शन करने का अवसर देने में विश्वास करता है। अतिदेब को सीईओ के पद पर प्रमोट किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि परिवार के सदस्य को उस भूमिका में नहीं आना चाहिए। चुने हुए सीईओ अतिदेब को रिपोर्ट करेंगे, जो सभी कार्यों की देखरेख करेंगे क्योंकि वह खुद एक बहुत ही सक्षम पत्रकार हैं। परिवार एक शेयरधारक के रूप में मौजूद हो सकता है लेकिन सीईओ को एक स्वतंत्र व्यक्ति होना चाहिए, जिसका परिवार के साथ कोई सीधा संबंध नहीं हो।

: ऑस्ट्रेलिया में, हाल ही में लिए गए एक फैसले से वहां सोशल मीडिया दिग्गज अब न्यूज दिखाने के बदले अखबारों को भुगतान करेंगे और यदि भारत में भी ऐसा कुछ होता है तो यह अखबार मालिकों को कैसे प्रभावित करेगा?

ऑस्ट्रेलिया में इसे कानूनी मान्यता दे दी गई है और मेरा मानना है कि अन्य देशों की मीडिया इंडस्ट्री में भी इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेंगे और उम्मीद है कि भारत और ब्राजील भी इसे फॉलो करेंगे। गूगल और फेसबुक भी इस आर्थिक कदम को नजरंदाज नहीं करेंगे। गूगल ने गूगल शोकेस बनाया है, जो अखबार कंपनियों को प्रति वर्ष एकमुश्त राशि का भुगतान करता है। इस तरह के फैसले से प्रकाशकों को उनकी मेहनत का उचित हिस्सा मिलेगा, जो अभी तक उन्हें नहीं मिलता है।

: एक कंटेंट कंपनी के तौर पर एबीपी ने डिजिटल बेस का विस्तार देखा है। लिहाजा यह अपने डिजिटल फुटप्रिंट पर कैसे काम कर रहा है और इसमें क्या सफलताएं मिल रही हैं?

डिजिटल भविष्य है और विशेष रूप से महामारी के बाद तो चीजें काफी बदल गई हैं। एबीपी में हमारी दो डिवीजन (divisions) हैं, पहली एबीपी लाइव (ABP Live) है, जो वास्तव में बहुत अच्छा कर रही है। दूसरी- एबीपी डिजिटल (ABP Digital), जो आने वाली कई थीम्स के साथ बेहतर कर रही है। टेक्नोलॉजी एक बेहतरीन सुविधा (facilitator) है और इसे समय के साथ हमें स्वीकार करना है, क्योंकि आने वाला समय इसी का है।

: आपको क्या लगता है कि भारतीय मीडिया मालिकों और अखबार मालिकों को प्रासंगिक बने रहने के लिए क्या करना चाहिए?

विश्वसनीयता से कभी समझौता नहीं किया जाना चाहिए। संपादकीय (एडिटोरियल) वास्तविक ताकत है और सही लोगों के लिए गेम-चेंजर है। इसके अलावा, हजारों सालों की तरह यह नई पीढ़ी भी और अधिक जानना चाहती है। सोशल मीडिया के भंवर में बहुत सारे ऐसे तथ्य हैं, जिनकी सच्चाई छिप जाती है। ऐसे कई ब्रैंड से जुड़े अखबार हैं, जो विश्वसनीय जानकारी प्रकाशित करने की हिम्मत रखते हैं। प्रासंगिक और व्यक्तिगत अनुभव केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से ही संभव है। डिजिटल और प्रिंट मीडिया एक दूसरे के पूरक हैं और मुझे लगता है कि इन्हे अलग से नहीं देखा जाना चाहिए। प्रासंगिक रहने के लिए, नए विषयों (themes) के साथ आना जरूरी है। न्यूयॉर्क टाइम्स (New York Times) ने अपने एक पत्रकार को पर्वतारोहियों के साथ रहने के लिए भेजा, जिसे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना पड़ा, ताकि वह उनकी दैनिक दिनचर्या और चोटी पर चढ़ने वाले प्रेरक कारकों के बारे में उनके विचार जान सके। इस खबर ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि भारत के मीडिया घरानों को भी इसी तरह की परिपाटी को अपनाना चाहिए।

: इतनी दूर आने के बाद, क्या आपको अभी भी लगता है कि कुछ ऐसे काम बाकी रह गए हों, जिन्हें आप पूरा करना चाहते हैं?

बिल्कुल, दुनियाभर में यात्रा करना मेरी तीव्र इच्छा है। महामारी के दौरान, मैंने स्पैनिश सीखी और वेलेंसिया विश्वविद्यालय (University of Valencia) से सीखने के कई लेवल्स को पूरा किया। मैं अब हल्की-फुल्की स्पैनिश बोल सकता हूं और इसे समझ भी सकता हूं। लैटिन अमेरिका की यात्रा करना मेरी दिली इच्छा है और अगले दो सालों में जब सब चीजें थोड़ी सामान्य हो जाएंगी, तो मैं बहुत सी यात्राएं करना चाहूंगा। मैं अलग-अलग व्यंजनों का लुत्फ उठाना चाहता हूं। मैं निकट भविष्य में एक किताब भी लिखना पसंद करूंगा।

इंटरव्यू का पूरा वीडियो फॉर्मेट यहां देखें:

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