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यह डिजिटल के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है: चंदन जायसवाल, डिजिटल एडिटर, नवोदय टाइम्स

कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है और ऐसे में तमाम इंडस्ट्री पर आर्थिक संकट का खतरा मंडराने लगा है।

Last Modified:
Friday, 29 May, 2020
chandan Jaiswal

देश में कोरोनावायरस (COVID-19) का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है और ऐसे में तमाम इंडस्ट्री पर आर्थिक संकट का खतरा मंडराने लगा है। मीडिया इंडस्ट्री पर भी लॉकडाउन के असर से अछूती नहीं रही। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन भी काफी प्रभावित हुआ है, लेकिन इसका डिजिटल पर कितना असर पड़ा है। इन्हीं तमाम मुद्दों पर समाचार4मीडिया ने 'नवोदय टाइम्स' के डिजिटल एडिटर चंदन जायसवाल से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

डिजिटल के लिए भी लॉकडाउन का समय पाठकों के लिहाज से सही रहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि कोरोना काल के दौरान डिजिटल किसी और की पीठ पर चल के सफलता की मंजिल पर काबिज हुआ है। पिछले कई वर्षों से देखा जा रहा है कि समाचार को लेकर खास तौर पर यूथ की पसंद में बदलाव आया है और डिजिटल उन्हें यह यकीन दिलाने में सफल रहा है कि यह माध्यम उनके मन मुताबिक है और उनकी जरूरतों को पूरी भी कर रहा है। हां, ये बात जरूर कही जा सकती है कि लॉकडाउन के दौरान लोगों की गतिविधियां कम हुईं और घर में बैठे रहने के दौरान उनका रुख भी डिजिटल की और हुआ इसका असर हमें साइट पर विजिटर्स (व्युअरशिप) की बढ़ी संख्या के रुप में दिखा। समाचारों का विश्वसनीय स्रोत होने के नाते पंजाब केसरी समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी यूजर्स की संख्या बढ़ी है।

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

लॉकडाउन और कोरोना काल से वैश्विक स्तर पर संकट है और इसका सबसे बुरा असर यदि जिन सेक्टर्स पर देखना पड़ रहा है, उनमें मीडिया भी शामिल है। डिजिटल की बात करें तो इस संकट काल में रेवेन्यू को लेकर कोई खास असर नहीं पड़ा है, क्योंकि डिजिटल के लिए रेवेन्यू की कमी हमेशा से रही है। हां, कोरोना काल में डिजिटल के पक्ष में एक अच्छी बात जो सामने आई है वो ये है कि कल तक जो इस माध्यम को विज्ञापन देने से हिचक रहे थे, अब तैयार नजर आ रहे हैं। कहा जा सकता है कि आने वाला दिन डिजिटल में रेवेन्यू के लिए बेहतर होने वाला है।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

कोरोना काल में तमाम तरह के झूठ फैलाए गए है। जैसा कि सब जानते हैं कि महज एक अफवाह के डर से दिल्ली-एनसीआर से लेकर गांवों तक तमाम लोगों ने अखबार/ मैगजींस लेना छोड़ दिया है। विज्ञापन शून्य हो जाने से एडिशन निकालना कठिन हो गया है। लेकिन यही अंतिम सत्य नहीं है। हमें इस आपदा को चुनौती के तौर पर लेना है। पहले भी पत्रकारिता चुनौतियों का सामना करती रही है। पंजाब केसरी समूह के चुनौतियों से जुझने और उससे बेहतर तरीके से निपटने का इतिहास रहा है। बुरा दौर है जो निश्चित ही जल्द खत्म होगा। हालांकि इस संकट काल में डिजिटल मीडिया को कोई नुकसान नहीं हुआ है बल्कि पाठक संख्या तो और बेहतर ही हुई है। भविष्य को लेकर तो अभी कुछ दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन हिचकते हुए ही सही, जिस तरह से विज्ञापन देने वाली कंपनियां डिजिटल की तरफ रुख कर रही हैं...यह डिजिटल के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है। 

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

देखिए मैंने पहले ही साफ कर दिया है कि प्रिंट और डिजिटल दोनों ही पत्रकारिता के आयाम तो हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसे पाठक जो कल तक अखबार पढ़ रहे थे कोरोना के बाद डिजिटल की तरफ मुखातिब हो गए हैं और सिर्फ इसलिए ही डिजिटल की गाड़ी चल निकली है। कोरोना के दौरान प्रिंट के सर्कुलेशन गिरने और डिजिटल की रीडरशिप बढ़ने की व्याख्या कुछ लोग ऐसे कर रहे हैं कि लग रहा है कि प्रिंट की 'शहादत' से ही डिजिटल फलाफूला है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है।

आज से 5-7 साल पहले ही देश में इंटरनेट फ्रेंडली यूजर्स की बढ़ोतरी और समाचार की सभी विधाओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर सबसे पहले (कई बार इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी पहले) परोस देने की खूबी के कारण डिजिटल ने प्रिंट को पीछे छोड़ दिया था। यही वह दौर था जब अखबार मालिकों ने डिजिटल पर ध्यान देना शुरू किया। इसका मतलब कही से भी यह नहीं निकालना चाहिए कि मैं कह रहा हूं कि प्रिंट आउटडेटेड हो गया। लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि आज का यूथ न्यूज के लिए प्रिंट की ओर नहीं डिजिटल की ओर देखता है। इसका कोरोना काल से कोई संबंध नहीं है। यूथ के हाथ में मोबाइल है, ऑफिस से आते-जाते महज उंगलियों की हलचल से वह दोस्तों से चैटिंग करते-करते टी-20 का स्कोर भी देख लेता है और लेटेस्ट न्यूज भी जान जाता है। न पेज पलटने की समस्या, न स्टेशन आने पर पेपर को समेट कर बैग में रखने का लोचा। ये मैंने डिजिटल की जो खूबियां गिनाई हैं, इन्हें प्रिंट के लिए खतरे के तौर पर मत देखिए। प्रिंट पर जो भी संकट है वह अस्थायी है या फिर जेनेरेशन का है। प्रिंट इन दोनों से बहुत आसानी से निपटने में सक्षम है। हम जब मीडिया में नए-नए आए थे तब से मीडिया पंडित प्रिंट के संकट की भविष्यवाणी कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक के आने के बाद तो उन लोगों ने समय भी बताना शुरू कर दिया था, जबकि हकीकत सबके सामने है।  

 इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, संकट के इस दौर में हमारे समूह के सभी साथी बहुत ही मजबूती और बहादुरी के साथ काम कर रहे हैं। डिजिटल की बात करें तो जैसे ही लॉकडाउन के पहले चरण की शुरुआत होने वाली थी और जनता कर्फ्यू लग रहा था, उसी समय हम लोगों को ये अंदाजा हो गया था कि आने वाले समय में पाबंदियां बढ़ेंगी। हमने बिल्कुल शुरुआती दौर में ही सभी साथियों को वर्क फ्रॉम होम दे दिया। पहले हम लोग कंटेंट के लिए शिफ्ट वाइज मीटिंग करते थे, लेकिन अब सभी साथियों के साथ वर्चुअल मीटिंग करते हैं।

शुरुआत से ही हमने पूरा ध्यान कोरोनावायरस से जुड़े कंटेंट की ओर लगाया ताकि लोगों को ज्यादा से ज्यादा ऑथेंटिक इंफॉर्मेशन उपलब्ध करा सकें। इसके लिए हमने टेक्नोलॉजी का यूज करके विशेषज्ञ चिकित्सकों को लाइव कनेक्ट किया और लोगों को कोरोनाकाल की समस्याओं से निजात पाने का उपाय बताया। लॉकडाउन में एंटरटेनमेंट की खबरों के लिए तमाम सेलिब्रिटीज से लाइव कनेक्ट कर उसको फैंस के साथ रूबरू करवाते हैं। हमारे लिए वर्क फ्रॉम होम इसलिए भी आसान रहा कि नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी की टीम 9 राज्यों से काम करती है जिससे डिजिटल टीम को काफी मदद मिली। 

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

मेरे हिसाब से तो मीडिया की दुनिया में बदलाव निश्चित है क्योंकि कोरोना काल इतनी जल्दी जाने वाला नहीं है। डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में पहला बड़ा बदलाव जो मैं देख पा रहा हूं वह है वर्क फ्रॉम होम। कोरोना काल में यह कार्य संस्कृति एम्प्लॉयी और एम्प्लॉयर दोनों के लिए बेहतर है और यह बदलाव दोनों के लिए ज्यादा व्यापक और अर्थपूर्ण है। पत्रकारों के काम करने का तरीका भी बदलेगा, मसलन किसी का इंटरव्यू करने के लिए टेक्नोलॉजी की सहायता से घर या दफ्तर से बैठे-बैठे उसे कनेक्ट कर लिजिए। इससे समय और मैनपावर दोनों की बचत भी होगी।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

फिलहाल मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है, आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

देखिए, मेरा मानना तो ये है कि ये सब कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे न्यूज पोर्टल्स का मर्ज है। कई लोग प्रोपेगैंडा खबरों के लिए न्यूज पोर्टल्स खोल के बैठे हैं। इसके लिए सरकार को कुछ कड़े नियम बनाने चाहिए ताकि फेक न्यूज की पोस्टिंग पर लगाम लगाया जा सके। सोशल मीडिया पर समाचार पढ़ने वालों को भी जागरूक करना होगा कि वे हर किसी ख़बर पर आंख बंद करके भरोसा न करें।

जहां तक हमारा सवाल है तो हम लोग एक बड़े मीडिया हाउस (परम्परागत मीडिया संस्थान) से जुड़े हैं। नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी समूह की पाठकों में विश्वसनीयता है। हमारे यहां संपादकीय चेक एंड बैलेंस की व्यवस्था है जो वैसी खबरों को दूर रखने का काम करती है। हालांकि PV और UV के चक्कर में कई बार उतावलापन हावी होता है लेकिन क्रॉस चेक, फैक्ट चेक जैसे एथिक्स हैं जिसका दामन जितनी मजबूती से कोई संपादकीय टीम पकड़े रहेगी तब तक फेक न्यूज से बचना संभव है। यह कहना आसान है लेकिन डिजिटल मीडिया की 'सबसे पहले' वाली मानसिकता में इसे अमल में लाना उतना ही मुश्किल काम है।

न्यूज टीम के हर सदस्य के लिए भी यह समझने का विषय है कि एक ब्रैंड को तो ऐसी खबरें दागदार करती ही हैं,  खुद पत्रकारों के लिए भी ऐसी खबरों में ट्रैप होना उनके प्रोफेशनलिज़्म पर सवाल उठाता है और भविष्य में उनके सलेक्शन ऑफ न्यूज और न्यूज सेंस को भी खराब करता है।

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गौतम अडानी ने बताया, NDTV का अधिग्रहण करने में क्यों है उनकी दिलचस्पी

‘फाइनेंशियल टाइम्स’ (Financial Times) को दिए इंटरव्‍यू में जाने-माने कारोबारी गौतम अडानी ने संकेत दिए कि वह एक ग्लोबल न्यूज ब्रैंड बनाना चाहते हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 25 November, 2022
Last Modified:
Friday, 25 November, 2022
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देश की अग्रणी मीडिया कंपनियों में शुमार ‘नई दिल्ली टेलीविजन’ (NDTV) में 26 फीसदी की अतिरिक्त हिस्सेदारी हासिल करने की कवायद में जुटे जाने-माने कारोबारी गौतम अडानी का अब इस पूरे मामले पर बयान सामने आया है। दरअसल, ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ (Financial Times) को दिए इंटरव्‍यू में उन्होंने संकेत दिए कि वह एक ग्लोबल न्यूज ब्रैंड बनाना चाहते हैं।

अगस्त में एनडीटीवी के अधिग्रहण की कवायद शुरू करने वाले अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी से यह पूछे जाने पर कि आप किसी मीडिया हाउस को स्वतंत्र रूप से कार्य करने और उसे ग्लोबल स्तर पर अपने पैर फैलाने में क्यों सपोर्ट नहीं कर सकते हैं, तो इस पर अडानी का कहना था कि ‘फाइनेंसियल टाइम्स’ अथवा ‘अल-जजीरा’ की तुलना भारत में ऐसी कोई एक इकाई नहीं है।

अपने गृह राज्य गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद के निकट स्थित समूह के गगनचुंबी इमारत में हुए इस इंटरव्यू के दौरान अडानी ने एनडीटीवी में 26 फीसदी की अतिरिक्त हिस्सेदारी हासिल करने की कवायद को ‘व्‍यावसायिक अवसर’ (Business Opportunity) से ज्‍यादा ‘दायित्व’ (Responsibility) बताया है। उन्होंने कहा कि मीडिया में आना और एनडीटीवी खरीदना उनके लिए व्यवसाय से अधिक एक जिम्मेदारी है।

‘एनडीटीवी’ के अधिग्रहण के लिए की जा रही अडानी समूह की कवायद ने देश में मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर बहस छेड़ दी है। बता दें कि अडानी को मोदी सरकार का करीबी और एनडीटीवी को सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाला माना जाता है।

गौतम अडानी ने कहा कि स्वतंत्रता का मतलब है कि अगर सरकार ने कुछ गलत किया है, तो आप उसे गलत कहें। साथ ही आपको साहस होना चाहिए कि जब सरकार हर दिन सही काम कर रही हो, तो यह भी दिखाएं।  

उन्होंने कहा कि एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया समूह बनाने में आने वाली लागत समूह के लिए मामूली होगी और उन्होंने कहा कि NDTV के मालिक-संस्थापक प्रणय रॉय यदि इसके चेयरमैन बने रहते हैं, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। बता दें कि अडानी की ‘AMG मीडिया नेटवर्क’ (AMG Media Network) ने इस साल बिजनेस न्यूज प्लेटफॉर्म ‘BQ Prime’(पूर्व में BloombergQuint) में भी हिस्सेदारी खरीदी है।

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गुजरात चुनाव से पहले गृह मंत्री ने Network18 को दिया खास इंटरव्यू, कही ये बातें

गुजरात चुनाव से पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘नेटवर्क18’ (Network18) के मैनेजिंग डायरेक्टर व ग्रुप एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी के साथ खास बातचीत की

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 16 November, 2022
Last Modified:
Wednesday, 16 November, 2022
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गुजरात विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। बीजेपी, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक पार्टियां इस महासमर को जीतने के लिए जी-जान लगा रही हैं। इस बीच गुजरात चुनाव से पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘नेटवर्क18’ (Network18) के मैनेजिंग डायरेक्टर व ग्रुप एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी के साथ खास बातचीत की। यह गुजरात चुनाव से पहले गृह मंत्री का पहला एक्सक्लूसिव इंटरव्यू था, जिसमें बीजेपी के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह ने बताया कि आखिर गुजरात चुनाव को लेकर क्या है उनकी रणनीति।   

‘न्यूज18 इंडिया’ के खास कार्यक्रम 'गुजरात अधिवेशन' (Gujarat Adhiveshan) के दौरान लिए गए इंटरव्यू में अमित शाह ने कहा कि हम गुजरात की जनता की उम्मीदों पर हमेशा खरा उतरे हैं और बीजेपी को गुजरात की जनता का आशीर्वाद है। गुजरात में बीजेपी को बड़ी जीत मिलेगी। हम सारे चुनावी रिकॉर्ड तोड़कर प्रचंड बहुमत से सरकार बनाएंगे। गुजरात में स्थायी सरकार के सवाल पर शाह ने कहा कि भूपेंद्र पटेल (Bhupendra Patel) के नेतृत्व में ही बीजेपी ये चुनाव लड़ रही है और वह ही मुख्यमंत्री बनेंगे।

'गुजरात बीजेपी में पूरी तरह एकजुट'

टिकट कटौती से नाराज नेताओं की बगावत पर अमित शाह ने कहा कि गुजरात बीजेपी में पूरी तरह एकजुट है। उन्होंने कहा कि बीजेपी में जब भी कोई फैसला लिया जाता है, वो आपसी सहमति से लिया जाता है। इसलिए कोई नेता पार्टी के खिलाफ नहीं जाता।

‘गुजरात में है मजबूत कानून व्यवस्था वाला शासन’

गुजरात में शांति और सुरक्षा को लेकर अमित शाह ने कहा, ‘गुजरात में मोदी जी की सरकार के समय से ही हमने मजबूत कानून व्यवस्था वाला शासन दिया है। उन्होंने कहा कि हमने ऐसी सुरक्षा दी है कि गुजरात में 20 साल के युवा को भी नहीं पता कि कर्फ्यू क्या होता है? उन्होंने आगे कहा कि हमने गुजरात की जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

‘गुजरात ने कभी किसी तीसरी पार्टी को नहीं किया स्वीकार’

वहीं त्रिकोणीय मुकाबला और राज्य में आम आदमी पार्टी के ताल ठोकने के पर कहा कि गुजरात ने कभी किसी तीसरी पार्टी को स्वीकार नहीं किया है। यहां किसी तीसरे के लिए जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारा किसी से मुकाबला नहीं है। हम सुरक्षा और समृद्धि देने वाली सरकार बनाएंगे।

‘रेवड़ी पॉलिटिक्स और बीजेपी के चुनावी वादों के बीच का फर्क’

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने रेवड़ी पॉलिटिक्स और बीजेपी के चुनावी वादों के बीच का फर्क बताते हुए कहा, ‘वोट के लिए रेवड़ी बांटना और किसी का जीवन स्तर उठाने के लिए एक बार मदद देना अलग बात है।" उन्होंने कहा कि घर, बिजली, शौचालय, गैस देना रेवड़ी बांटना नहीं है।

'50 साल तक कांग्रेस के स्टेज के पीछे नहीं देखी सरदार पटेल की फोटो'

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘सबसे ऊंची प्रतिमा बनायी पीएम मोदी ने। किसान नेता का विश्व का सबसे बड़ा पुतला बनाया, एक भी कांग्रेसी वहां पुष्पाजंलि करने नहीं गया। ये प्रतिमा पीएम मोदी ने बनाई, इसलिए नहीं जाते हैं क्योंकि ये प्रतिमा सरदार पटेल की है, इसलिए नहीं जाते हैं। 50 साल तक कांग्रेस के स्टेज के पीछे हमने पटेल की फोटो नहीं देखी।’

अमित शाह ने कॉमन सिविल कोड पर कांग्रेस को घेरा

अमित शाह ने इंटरव्यू के दौरान कॉमन सिविल कोड पर पूछे गए सवाल का भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 में इसे लागू करने के लिए कहा गया है। साथ ही जनसंघ के जमाने से चुनावी घोषणापत्र में ये मुद्दा हम उठाते रहे हैं। अमित शाह ने कहा कि बीजेपी ने जो भी वादे किए, उनको पूरा किया है। चाहे राम मंदिर हो, 370 हो या तीन तलाक। बीजेपी ने कभी चुनावों को ध्यान में रखकर कोई काम नहीं किया। सभी कदम देश और जनता के हित में उठाए हैं।

कॉमन सिविल कोड को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधते हुए शाह ने  कहा कि कॉमन सिविल कोड का उनका वादा आज का नहीं, बल्कि पुराना है। इस पर राजनीति क्यों होती है। उन्‍होंने पूछा कि कांग्रेस बताए कि वह सिविल कोड के पक्ष में है या विरोध में है।  

‘पंजाब पर नजर बनाए हुए है केंद्र सरकार’

वहीं, पंजाब में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बनने के बाद से कानून-व्यवस्था पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में जब शाह से यहां की कानून-व्यवस्था के लचर प्रदर्शन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये सही है कि पंजाब में लगातार हत्याएं हो रही हैं। ड्रग्स का कारोबार काफी बढ़ गया है। नशे की वजह से लगातार पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं। केंद्र सरकार ने राज्य के ऐसे हालात पर नजर बना रखी है।   पंजाब में चीजों को केंद्र सरकार किसी सूरत में आउट ऑफ कंट्रोल नहीं होने देगी। ये पूछे जाने पर कि क्या केंद्र सरकार सख्त कदम उठाएगी? अमित शाह ने कहा कि केंद्र और राज्य मिलकर काम करेंगे। उन्होंने कहा कि रणनीति को मैं सार्वजनिक मंच से जाहिर नहीं करूंगा।

‘कांग्रेस शासन में घोटाले गिनना मुश्किल था’

केंद्रीय गृह मंत्री ने घोटालों और भ्रष्टाचार के सवाल को लेकर कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधा और कहा कि 12 लाख करोड़ के घपले कांग्रेस सरकार के समय हुए हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी के शासन में घोटाले गिनना मुश्किल था, लेकिन हमारे राज में घोटाले मिलना मुश्किल है।’ उन्होंने कहा, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने ऐसी व्यवस्था बनायी है कि अब सुशासन चलता रहता है।’

'हमने जमात-ए-इस्लाम और हुर्रियत पर शिकंजा कसा'

केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा, ‘1990 से लेकर आज तक हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ते रहे। सभी ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन आतंकवाद का पोषण करने वालों के खिलाफ कभी लड़ाई नहीं लड़ी। हमने जमात-ए-इस्लाम पर लगाम लगाई। उसी तरह हुर्रियत पर शिकंजा कसा। उनके मोहरों को मोदी सरकार ने साफ कर दिया। 1990 के बाद आज कश्मीर में सबसे कम आतंकी घटनाएं होती हैं। पहले आंतकवाद के खिलाफ सेंट्रल एजेंसी लड़ती थी। आज उसके खिलाफ पुलिस लड़ रही है।’

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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अखबारों की बेहतरी के लिए अब पाठकों को आगे आना होगा: शशि शेखर

‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर ने समाचार4मीडिया से बातचीत के दौरान पत्रकारिता से जुड़े अपने तमाम अनुभव शेयर किए और कई मुद्दों पर खुलकर बात की।

पंकज शर्मा by
Published - Thursday, 17 November, 2022
Last Modified:
Thursday, 17 November, 2022
Shashi Shekhar.

दिग्गज संपादक, ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ और 'समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40अंडर40' की जूरी के अध्यक्ष शशि शेखर से हाल ही में दिल्ली स्थित ‘एचटी मीडिया लिमिटेड’ के ऑफिस में मुलाकात हुई। मीडिया में चार दशक से ज्यादा समय से सक्रिय शशि शेखर ने इस दौरान पत्रकारिता से जुड़े अपने तमाम अनुभव शेयर किए और कई मुद्दों पर खुलकर बात की। शशि शेखर के साथ हुई इस बातचीत के प्रमुख अंश आप यहां पढ़ सकते हैं-

सबसे पहले बात करते हैं फेक न्यूज की, जिसकी आजकल काफी चर्चा हो रही है। पिछले दिनों हरियाणा के सूरजकुंड में हुए विभिन्न राज्यों के गृहमंत्रियों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यह मुद्दा उठाते हुए चिंता जताई थी। फेक न्यूज को लेकर आपका क्या कहना है, आखिर यह क्यों इतनी बढ़ रही है?

फेक न्यूज बढ़ने के पीछे दो कारण हैं, एक तो यह है कि जिस मीडिया यानी सोशल मीडिया के जरिये उसका प्रसार किया जाता है, उसकी गति बहुत तेज है। दूसरा, चीजों को जानने की लोगों की जो आकांक्षाएं हैं, उन्हें राजनीतिज्ञों की तरफ से मोल्ड कर दिया गया है। जैसे-आप देखिए कि लोग कहते हैं कि चुनाव में बेरोजगारी और महंगाई मुद्दा है, लेकिन वोट उनके नाम पर नहीं पड़ता है।

जैसे हम जब रिसर्च करते हैं तो तमाम अखबारों/चैनलों के लिए कहा जाता है कि लोग ज्योतिष विषय पर नहीं पढ़ना/देखना चाहते हैं, लेकिन यदि आप उसे छापेंगे/दिखाएंगे तो पाएंगे कि पाठकों के सबसे ज्यादा पत्र उसी विषय पर आते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वो कौन लोग हैं, जो ज्योतिष नहीं पढ़ना/देखना चाहते और कौन हैं जो सबसे ज्यादा अपनी प्रतिक्रिया देते हैं।
मैं तो इसे फेक न्यूज कहने के भी खिलाफ हूं, क्योंकि मेरा मानना है कि न्यूज तो वही है जो सच है। मेरी नजर में इसे फेक फैक्ट्स बोलना चाहिए।    

क्या आपको लगता है कि फेक न्यूज या यूं कहें कि फेक फैक्ट पर लगाम लगाने के लिए वर्तमान में उठाए जा रहे कदम कारगर हैं। जैसे-पीआईबी समेत तमाम संस्थानों ने अपनी फैक्ट चेक टीम बना रखी है। आपकी नजर में इसकी रोकथाम के लिए क्या कोई ठोस ‘फॉर्मूला’ है?

मेरी नजर में इसकी रोकथाम के लिए कोई ठोस ‘फॉर्मूला’ नहीं है। झूठ हमेशा से बिकाऊ  था और झूठ आज भी बिकाऊ  है। झूठ तब बिकता है, जब सत्य मौजूद होता है। इसके लिए मैं एक उदाहरण बताता हूं-दुनिया का बाजार इसलिए चलता है कि उसमें असली सिक्के और असली रुपये चलते हैं, यदि वहां सभी नकली सिक्के और नकली रुपये चलने लगें तो बाजार बंद हो जाए।

इसी तरह असली और नकली न्यूज की बात है। इसलिए कहा जाता है कि संस्थानों को वर्षों लग जाते हैं अपनी ब्रैंड इक्विटी बनाने में। इसी तरह पत्रकारों को भी वर्षों लग जाते हैं अपनी क्रेडिबिलिटी बनाने में। तो ये समय है, जब सच्चे पत्रकारों के वाकई अच्छे दिन आ गए हैं, क्योंकि लोग उनकी ओर देखते हैं कि यदि यह बोल रहा होगा तो सच बोल रहा होगा।    

अब जबकि कोविड लगभग खत्म हो चुका है। ऐसे में अखबारों के नजरिये से वर्तमान दौर को आप किस रूप में देखते हैं। क्या अखबार कोविड से पहले के दौर की तरह अपनी पहुंच फिर बनाने में और टीवी व डिजिटल को टक्कर देने में कामयाब रहेंगे?

ये सभी अलग मीडियम हैं, इसलिए टक्कर देने जैसी कोई बात ही नहीं हैं। हां, जहां तक अखबारों के सर्कुलेशन की बात है तो आंकड़े गवाह हैं कि 90 प्रतिशत से ज्यादा सर्कुलेशन वापस आ गया है। अखबारों की जो कॉपियां पहले की तरह नहीं वापस आ पाईं, उनका कोविड से कोई लेना-देना नहीं है। मेरा मानना है कि वह फेक सर्कुलेशन था, जो सर्कुलेशन विभाग के लोग कॉपी बढ़ा-चढ़ाकर बता देते हैं, वह खत्म हो गया है। असली पाठक तो तुरंत ही लौट आया था।  

मीडिया में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान आपने पत्रकारिता को काफी बारीकी से देखा है। आपकी नजर में पहले के मुकाबले वर्तमान दौर की पत्रकारिता में क्या बदलाव आया है। क्या यह सकारात्मक है अथवा नकारात्मक। इस बदलाव को आप किस रूप में देखते हैं?

मेरी नजर में यह बदलाव नकारात्मक नहीं बल्कि पूरी तरह सकारात्मक है। मैं जब 20 साल का था, उस समय पत्रकार बन गया। मैं जिस समय पत्रकारिता के पेशे में आया, उस समय बड़ी तेजी से टेक्नोलॉजी बदल रही थी। प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी बदल रही थी। पुरानी रोटरी जा रही थी। ऑफसेट मशीनें आ रही थीं। मेरे देखते-देखते कंपोजिंग के लिए कंप्यूटर आ गए और यह धीरे-धीरे हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गए। जब इंसानियत बदल रही थी, तौर-तरीके बदल रहे थे, टेक्नोलॉजी बदल रही थी, उस समय मीडिया ने भी अपने आपको उसी तरह से बदला।

अब कभी-कभी लगता है कि आज मैं 20 साल का क्यों नहीं हूं। तब के दौर में और अब के दौर में एक बड़ा अंतर यह है कि करीब 40 साल पहले मुझे अपनी बात रखने के लिए किसी संस्थान की आवश्यकता होती थी। आज बहुत से ऐसे लोग हैं जो किसी संस्थान के बिना भी अपनी बात रखने में सक्षम हो पा रहे हैं। यह वो दौर है, जहां सभी साहसी-दुस्साहसी और ऊंचे सपने देखने वाले लोगों के लिए खुला आमंत्रण है कि आइए, मैदान में उतरिये और कुछ नया कीजिए, आपके लिए जगह खाली है।  

तमाम अखबारों ने अब सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाया हुआ है, यानी बिना सबस्क्राइब किए पाठक अब उन अखबारों को इंटरनेट पर नहीं पढ़ सकते हैं। इस मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? क्या आपको नहीं लगता कि इससे रीडरशिप प्रभावित होती है। क्योंकि डिजिटल रूप से समृद्ध पाठकों के पास आज सूचना प्राप्त करने के तमाम स्रोत हैं। ऐसे में वे पैसा देकर ऑनलाइन अखबार क्यों पढ़ेंगे? इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?

जब पाठक पैसा देकर अखबार खरीदते हैं तो वे पैसा देकर इसे इंटरनेट पर क्यों नहीं पढ़ना चाहेंगे। मेरा मानना है कि कंटेंट फ्री रखने की इजाजत ही खत्म कर देनी चाहिए। कानूनी बाध्यता होनी चाहिए कि पैसा खर्च करके अखबार पढ़ें। इस देश का कबाड़ा ही इसलिए हुआ, जब अखबारों में 80 के दशक में इनविटेशन प्राइस यानी आमंत्रण मूल्य शुरू हुआ। ऐसे में लोगों को लगने लगा कि अखबार काफी सस्ती चीज है और उन्हें यही आदत पड़ गई। फिर टीवी चैनल आ गए और अंधी दौड़ शुरू हो गई। ऐसे में बजाय कंटेट पर लड़ाई करने के चैनल फ्री दिखाने शुरू कर दिए गए।

मुझे याद है कि जब मैं ‘आजतक’ के साथ काम करता था, तो हमने एक साल के अंदर ही सबसे विश्वसनीय ब्रैंड की उपाधि हासिल कर ली थी और उसकी वजह यही थी कि हमारा मानना था कि खबर वही है, जो सच हो। सबसे पहले खबर दिखाने से ज्यादा हमारा जोर सबसे पहले सच दिखाने का था। जब आपका कंटेंट नया और विश्वसनीय होगा, ऐसे में पाठक/दर्शक पैसे क्यों नहीं देना चाहेंगे। जब आप अखबार खरीदने के लिए पैसा ही नहीं खर्च करेंगे तो अखबार ‘जिंदा’ कैसे रहेगा?            

तमाम अखबारों में एडिटोरियल पर मार्केटिंग व विज्ञापन का काफी दबाव रहता है। आपकी नजर में एक संपादक इस तरह के दबावों से किस तरह मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से संपादकीय कार्यों का निर्वहन कर सकता है? 

देखिए, यह तो सबसे ज्यादा ऐसे लोगों की शोशेबाजी है, जो कभी संपादक हुआ करते थे और अब उस पद पर नहीं हैं। कुछ तो ऐसे भी संपादक हुए हैं जो किसी एक संस्थान से निकाले जाने के बाद फिर उसी संस्थान में दूसरी-तीसरी बार संपादक बने। मैं ऐसे लोगों से पूछना चाहता हूं कि यदि वह संस्थान इतना ही खराब था, तो फिर आप दोबारा वहां क्यों गए। कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो पद से हटने के बाद लिखना शुरू कर देते हैं कि वहां तो काफी दबाव था।

मैं ऐसे लोगों से पूछता हूं कि ऐसे में आप वहां इतने साल क्या कर रहे थे? जहां तक मेरी बात है तो मैं नहीं मानता कि मेरे ऊपर इस तरह का कोई दबाव है। न ही मुझसे कोई कहता है कि विज्ञापन के लिए ये खबर लगा दो और न ही मैं किसी के कहने पर लगाता हूं, लेकिन संपादकों को भी यह मानना चाहिए कि जब उनका अखबार लोगों तक कम दाम पर पहुंच रहा है तो उनकी सैलरी आखिर कहां से आती है? ऐसे में इसका कोई ऐसा रास्ता तलाशना पड़ेगा कि आपका संपादक भी बचा रहे और सारी चीजें बची रहें। कुछ लोग इधर बहुत शोशेबाजी कर रहे हैं। तमाम पत्रकार बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, मैं इनसे पूछता हूं कि जब आपके संस्थान में गड़बड़ी हो रही थी, तब आपके मानक कहां चले गए थे?

आप देखिए कि आज के दौर में जो स्वयंभू बड़े और ईमानदार पत्रकार हैं, क्या वो किसी निश्चित एजेंडे पर नहीं चल रहे हैं? पत्रकारों में कितने ऐसे लोग हैं, जो तटस्थ हैं? ऐसे कितने पत्रकार हैं जो कहते हैं कि मुझे पदमश्री नहीं चाहिए, मैं कभी राज्यसभा नहीं जाऊंगा। ऐसे कितने पत्रकार हैं जो सीना ठोंककर कहते हैं कि मैं रिटायर होने के बाद सीधा अपने गांव चला जाऊंगा। लेकिन कम से कम अपने बारे में मैं यह दावे के साथ कहता हूं। भाई, जब हम किसी तरह की तीन-पांच नहीं करते हैं तो हम क्यों किसी के लिए पार्टी बनें, हमें इस तरह की जरूरत ही नहीं है।

पत्रकारिता की दुनिया में शशि शेखर जाना-माना नाम है। शशि शेखर के बारे में कहा जाता है कि वह काम करते हुए कभी थकते नहीं हैं। अपनी इस असीम ऊर्जा से वह अपने अधीन कार्यरत सहकर्मियों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। आखिर इस असीम ऊर्जा के पीछे क्या राज है?

सच कहूं तो इसके पीछे कोई राज नहीं है। मैं ऐसा ही हूं। ईश्वर ने मुझे ऐसा ही बनाया है। 

इस फील्ड में कार्यरत अथवा नवागत पत्रकार आपसे काफी प्रेरित होते हैं। ऐसे में मीडिया में आ रहे युवा पत्रकारों के लिए आप क्या संदेश या यूं कहें कि सफलता का क्या ‘मूलमंत्र’ देना चाहेंगे?

मैं खुद को इतना बड़ा अथवा ‘मसीहा’ नहीं मानता कि मैं लोगों से कुछ कहूं। मैं उनसे सिर्फ यही कहना चाहूंगा कि देखिए, आप यदि खबर के धंधे में हैं तो खबर सिर्फ सत्य है। सत्य भी वही है जो प्रमाणित हो सके। आपको दो उदाहरण देता हूं। बोफोर्स का मामला जब आया, तो उस समय हम तमाम नौजवानों ने इस पर काफी कुछ लिखा। उस समय बहुत कुछ लिखा गया कि भ्रष्टाचार हो गया और पता नहीं क्या-क्या हो गया, लेकिन ये आज तक प्रमाणित नहीं हुआ कि बोफोर्स में किसने दलाली ली, किसने दी और क्या हुआ।

अब राफेल का मामला आया, तब कुछ लोगों ने बड़ा हल्ला मचाया और बाकायदा चैलेंज किया कि अमुक अखबार और अमुक संपादक राफेल मामले पर नहीं छाप रहा है, लेकिन जब मेरे पास राफेल मामले पर कोई प्रूफ ही नहीं था तो मैं क्या छापता। उस समय एक अखबार ने इस पर काफी छापा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में वह टिक ही नहीं सका। अब या तो वह अखबार सही था या सुप्रीम कोर्ट, कोई तो फैसला करेगा। आखिर सुप्रीम कोर्ट तथ्यों पर काम करता है, वह आपके मन से थोड़े ही न फैसला देगा। इसलिए, मैं फिर कहता हूं कि सत्य वही है, जो प्रमाणित हो सके। इसलिए, यदि आप सत्य से जरा भी विचलित होंगे, जो जान लीजिए कि आप उसी समय प्रोपेगेंडा का हिस्सा बन जाएंगे।

हाल ही में कानपुर से समाजवादी पार्टी के विधायक अमिताभ बाजपेई को एक साल की सजा सुनाई गई है। कुछ दिन पहले बीजेपी के एक विधायक को सजा हुई थी। कुछ दिन पहले आजम खान की विधानसभा की सदस्यता गई थी। इसी तरह तमाम कई बड़े नेताओं को सजा हुई।

मैं आपको बता दूं कि ये सजाएं अखबारों की रिपोट्र्स पर नहीं हुईं, बल्कि उन विवेचनाओं पर हुईं, जो प्रमाणित कर सकीं कि इन्होंने गलत किया था। ऐसे में जब कुछ लोग यदि ये कहते हैं कि अखबार में ये नहीं लिखा गया और इस बारे में नहीं लिखा गया तो उन्हें ये भी तो सोचना चाहिए कि आखिर किस आधार पर लिखा जाए। लिखने के लिए कोई तो प्रमाण होना चाहिए।

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प्रो. के.जी सुरेश ने बताया, वर्तमान दौर की पत्रकारिता में किस तरह के बदलाव की है जरूरत

'माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय' के कुलपति प्रो. के.जी सुरेश का कहना है कि टेक्नोलॉजी के प्रभाव से पत्रकारिता में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू शामिल हो गए हैं।

पंकज शर्मा by
Published - Tuesday, 01 November, 2022
Last Modified:
Tuesday, 01 November, 2022
Pro K G Suresh

'माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय' (MCU) भोपाल के कुलपति, देश के प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान 'भारतीय जनसंचार संस्थान' (IIMC) के पूर्व महानिदेशक और 'समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40अंडर40' की जूरी के सदस्य प्रो. के.जी सुरेश से हाल ही में समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा की दिल्ली स्थित उनके आवास पर भेंट हुई। इस दौरान तमाम अहम मुद्दों पर चर्चा की गई। प्रो. के.जी सुरेश के साथ हुई इस बातचीत के प्रमुख अंश आप यहां पढ़ सकते हैं-

वर्तमान दौर में जिस तरह की पत्रकारिता हो रही है, उसे लेकर आपका क्या मानना है? क्या आपको लगता है कि इसमें बदलाव की जरूरत है? यदि हां, तो कहां पर?

मैं समझता हूं कि इसमें काफी सुधार की जरूरत है, गुंजाइश है। इसे लेकर सरकार और उच्चतम न्यायालय समेत तमाम स्तरों पर चिंता जताई जा रही है। आज के दौर में फेक कंटेंट का मुद्दा सभी मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए गंभीर चुनौती है। फैक्ट चेकिंग शब्द से मैं सहमत नहीं हूं, क्योंकि यदि कोई चीज फैक्ट है तो उसे क्यों चेक करना। मैं इसे फेक चेकिंग या इंफो चेकिंग कहूंगा। इसमें हमें नया कुछ करने की जरूरत नहीं है। बस मीडिया के मूलभूत सिद्धांत यानी-चेकिंग, क्रॉस चेकिंग, वेरीफाइंग और सोर्सिंग जो हम पत्रकारिता में करते हैं, अगर वही हम नियमित तौर पर करने लग जाएं तो फेक कंटेंट पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। टीआरपी की रेस के चक्कर में, हेडलाइन से लोगों को आकर्षित करने के चक्कर में तमाम मीडिया संस्थान जिस तरह से लोगों को समाचारों में सनसनी देने लग गए हैं, इससे फेक कंटेंट बढ़ रहा है। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के आने के बाद इसका प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। ये सबसे बड़ी चुनौती है।

दूसरा, मेरे विचार में आज के दौर में ग्राउंड रिपोर्टिंग से दूरी बढ़ती जा रही है और डेस्कटॉप रिपोर्टिंग बढ़ रही है। ऐसे में हमें जमीन पर वापस जाने यानी ग्राउंड रिपोर्टिंग करने की जरूरत है। जमीनी स्तर पर क्या हो रहा है, उस हकीकत से पब्लिक को रूबरू कराना है। हमें डेस्कटॉप पत्रकारिता यानी प्रेस विज्ञप्ति की पत्रकारिता को छोड़कर जमीनी स्तर की पत्रकारिता करने की जरूरत है। धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही मीडिया की विश्वसनीयता को यदि पुन:स्थापित करना है तो मैं समझता हूं कि हमें पत्रकारिता के मूल्यों को फिर से स्थापित करना होगा।

आज के दौर की पत्रकारिता की तुलना यदि पुराने समय की पत्रकारिता से करें तो आपकी नजर में इसमें कितना बदलाव आया है?

जैसा कि मैंने अभी कहा कि पत्रकारिता में सबसे बड़ा बदलाव तो टेक्नोलॉजी का आया है। पहले हम लोग टाइपराइटर पर काम करते थे, हाथ से लिखते थे, लेकिन अब मोबाइल/कंप्यूटर आ गया है। यानी टेक्नोलॉजी के स्तर पर काफी बड़ा परिवर्तन आया है। आज मैं बोलकर खबरें लिखवा सकता हूं। अपने प्लेटफॉर्म के माध्यम से हजारों लोगों तक पहुंच सकता हूं। लेकिन इस टेक्नोलॉजी ने हमें कंफर्ट जोन में भी डाल दिया है। अब हम रिसर्च की जगह इंटरनेट पर सर्च करने लगे हैं। ज्यादातर पत्रकार अपने घरों अथवा वातानुकूलित ऑफिस में बैठकर पत्रकारिता कर रहे हैं। मेरी नजर में इसे पत्रकारिता नहीं कहते हैं। पत्रकारिता के लिए आपको जमीन पर उतरना होगा यानी ग्राउंड रिपोर्टिंग पर जोर देना होगा। मैं एक हार्डकोर पत्रकार रहा हूं। मेरा मानना है कि जब तक आप ग्राउंड रिपोर्टिंग नहीं करेंगे, जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं होंगे, तब तक आप सही मायने में सच्चाई को, तथ्यों को जनता तक नहीं पहुंचा पाएंगे। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि आप जमीनी स्तर पर पत्रकारिता करें। कहने का मतलब टेक्नोलॉजी के प्रभाव से पत्रकारिता में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू शामिल हो गए हैं। सकारात्मकता की बात करें तो टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से चीजें काफी सुगम हो गई हैं। हम लाखों/करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं, वहीं नकारात्मकता की बात करें तो इस टेक्नोलॉजी ने कहीं न कहीं हमें जमीनी स्तर की पत्रकारिता से दूर भी कर दिया है। मेरे हिसाब से आज के दौर की पत्रकारिता के लिए यह बड़ी चुनौती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों फेक न्यूज के प्रति गंभीर चिंता जताते हुए फैक्ट चेकिंग पर जोर दिया है, इस बारे में आपकी क्या राय है?

फेक न्यूज का मुद्दा हर जगह चिंता का विषय बना हुआ है। मोदी जी ही नहीं, उच्चतम न्यायालय ने भी इस पर चिंता जताई है। आम पाठक के दिल में भी अक्सर यह सवाल रहता है कि वह जो कंटेंट पढ़/देख रहा है, वह सच है या फर्जी है। तो विश्वसनीयता को लेकर ये जो चुनौती है, वह स्थापित मीडिया घरानों के लिए तो खासतौर पर बहुत बड़ी चुनौती है। लोगों को यह विश्वास दिलाना बहुत बहुत जरूरी है कि उन्हें मिलने वाला कंटेंट फैक्ट की दृष्टि से पूरी तरह सही है। मेरे लिए ये चिंताएं पूरी तरह जायज हैं और इन चिंताओं को दूर करने के लिए हमें एक्टिविस्ट की नहीं फैक्टिविस्ट की जरूरत है। यानी तथ्यों पर फोकस करने और उन्हें स्थापित करने की बहुत जरूरत है।

नए दौर में पत्रकारिता की तमाम नई विधाएं शुरू हो रही हैं। आपकी यूनिवर्सिटी ने ही फिल्म पत्रकारिता समेत कई नए कोर्स शुरू किए हैं। इसके बारे में कुछ बताएं।

हमने फिल्म पत्रकारिता, ग्रामीण पत्रकारिता, मोबाइल पत्रकारिता और सोशल मीडिया मैनेजमेंट समेत कई नए पत्रकारिता पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। ग्रामीण पत्रकारिता पाठ्यक्रम शुरू करने का मकसद यह है कि आज अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारिता के मूल्यों और सिद्धांतों के साथ समझौता हो चुका है। वहां पत्रकारिता के प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है। इसलिए उनकी सुविधा के लिए यह कोर्स शुरू किया गया है। दूसरा, मोबाइल पत्रकारिता की बात करें तो तमाम लोगों को लगता है कि आज के दौर में यदि उनके पास मोबाइल है, तो वे पत्रकार बन सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए हमने मोबाइल पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरू किया है। भोपाल परिसर में उन्हें हफ्ते में पांच दिन शाम के समय दो घंटे की क्लास में मोबाइल पत्रकारिता का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांतों से वाकिफ हो सकें। इसे पार्टटाइम कोर्स की तरह किया जा सकता है। मेरा मानना है कि पत्रकारिता में प्रशिक्षण बहुत आवश्यक है। इसी उद्देश्य के साथ इन पाठ्यक्रमों को शुरू किया गया है। 

समय के साथ टेक्नोलॉजी समेत बहुत सारी चीजें बदल गई हैं। ऐसे में समय के साथ कदमताल मिलाने के लिए आपके विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में किस प्रकार के बदलाव किए गए हैं, जिससे विद्यार्थी आज के दौर की पत्रकारिता के लिए खुद को पूरी तरह तैयार कर सकें?

हमने आठ नए पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। पिछले साल ही हमने विश्वविद्यालय में डिपार्टमेंट ऑफ सिनेमा स्टजीज यानी सिनेमा अध्ययन विभाग का गठन किया है। इससे ओटीटी जैसी टेक्नोलॉजी के बारे में पढ़ाया जा रहा है। अब हमारे पास न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी का भी डिपार्टमेंट है। वहां हम एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग, कॉमिक्स, वर्चुअल रियलिटी, ऑगमेंटेड रियलिटी (ऑगमेंटेड रियलिटी वर्चुअल रियलिटी का ही दूसरा रूप है, इस तकनीक में आपके आसपास के वातावरण से मेल खाता हुआ एक कंप्यूटर जनित वातावरण तैयार किया जा सकता है।) पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा ग्राफिक्स और एनिमेशन का हमारा बहुत ही लोकप्रिय पाठ्यक्रम जो बंद हो गया था, उसे मैंने फिर शुरू करवाया है। मेरा मानना है कि इस तरह के कोर्स एक तो नई टेक्नोलॉजी के बारे में अवगत कराते हैं, दूसरा रोजगार के विकल्पों में भी इजाफा करते हैं। अब हम पारंपरिक मीडिया के साथ मीडिया के बदलते आयामों यानी इंडस्ट्री की जरूरतों को देखते हुए उसके हिसाब से विद्यार्थियों को तैयार कर रहे हैं।

कोविड के बाद दुनिया में काफी चीजें बदल गई हैं। अब जब कोविड का इतना खतरा नहीं रहा है, तो क्या आपका विश्वविद्यालय कोविड पूर्व के ढर्रे पर लौट आया है? इसके अलावा कोविड के दौर से सीख लेते हुए आपने अपने विश्वविद्यालय में किस तरह की नई व्यवस्थाएं की हैं?

कोविड के बाद बहुत सारी नई बातें आ गई हैं। राष्ट्रीय शिक्षानीति को अमलीजामा पहनाने वाले पहले विश्वविद्यालयों में हम हैं। नए-नए तमाम पाठ्यक्रम कोविड के बाद ही शुरू हुए हैं। कोविड के बाद स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर मीडिया पहले से ज्यादा जागरूक हो गई है, ऐसे में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी समाजोन्मुखी पत्रकारिता की दिशा में हम बहुत ज्यादा काम कर रहे हैं। हम विद्यार्थियों को नई टेक्नोलॉजी से तैयार कर रहे हैं। काफी सारा कंटेंट हम उन्हें ऑनलाइन माध्यम से भी उपलब्ध करा रहे हैं। बहुत सारे कोर्सेज करवा रहे हैं। हमने जेनरिक इलेक्टिव कोर्स शुरू किया है, जिसमें विद्यार्थी सिर्फ पत्रकारिता की पढ़ाई ही नहीं करता, बल्कि उसके साथ-साथ पर्सनालिटी डेवलपमेंट और साइकोलॉजी समेत बहुत सारे विषयों पर जोर दिया जाता है। ताकि पठन-पाठन के साथ विद्यार्थियों का व्यक्तित्व विकास भी बेहतर हो सके। अब हमने एनसीसी को भी कोर्स का हिस्सा बना दिया है। हम बाकायदा इसके नंबर भी विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम में शामिल करते हैं। हम जमीन से जोड़कर, समाज से जोड़कर नई पीढ़ी के पत्रकारों को तैयार कर रहे हैं।

विभिन्न पत्रकारिता विश्वविद्यालयों से निकल रहे नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे? उन्हें कामयाबी का क्या मूलमंत्र देंगे?

मैं यही कहूंगा कि उन्हें मल्टीटास्कर बनना होगा। यदि आज के समय में कोई यह सोचे कि मैं प्रिंट का पत्रकार बनूंगा, अथवा टीवी का पत्रकार बनूंगा, तो मुझे लगता है कि वह अपने आपको पत्रकारिता के लिए पूरी तरह तैयार नहीं कर पा रहा है। हमें मल्टीटास्किंग पर फोकस करना होगा। यानी हमें लिखने की क्षमता पर भी काम करना है, बोलने की क्षमता पर भी काम करना है। सोशल और डिजिटल मीडिया पर प्रभावी रूप से काम करने की क्षमता भी विकसित करनी होगी। इसके अलावा अध्ययनशीलता और स्टोरीटेलिंग पर खास ध्यान देना होगा। आज के दौर में विज्ञापनों में भी स्टोरीटेलिंग पर काफी जोर दिया जा रहा है। यानी आप एक अच्छी खबर को अच्छी कहानी की तरह किस तरीके से चित्रों के माध्यम से यानी विजुअल तरीके से पाठकों/श्रोताओं/दर्शकों को आकर्षित कर सकते हैं, यह काफी जरूरी बन गया है। इसके लिए भाषा पर अच्छी पकड़ होना बहुत जरूरी है। साहित्य का अध्ययन बहुत जरूरी है।

इन सबके अलावा मेहनत बहुत जरूरी है। ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलना-जुलना और मेहनत करना बहुत जरूरी है। मेरी नजर में पत्रकारिता वातानुकूलित कमरे में बैठकर करने वाला अथवा दस से छह बजे वाला जॉब नहीं है। इस तरह की मानसिकता हर विद्यार्थी को तैयार करनी पड़ेगी, तभी वह अच्छा पत्रकार बन पाएगा।

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TRP और रेवेन्यू नहीं, सिर्फ एक ही चैलेंज पर है हमारा फोकस: डॉ. जगदीश चंद्रा

नेशनल हिंदी न्यूज चैनल ‘भारत24’ (Bharat24) ने मार्केट में दस्तक दे दी है। 15 अगस्त से इसका प्रसारण शुरू हो गया है।

Last Modified:
Tuesday, 16 August, 2022
Jagdish Chandra

नेशनल हिंदी न्यूज चैनल ‘भारत24’ (Bharat24) ने मार्केट में 'दस्तक' दे दी है। 15 अगस्त से इसका प्रसारण शुरू हो गया है। जाने-माने पत्रकार और ‘ईटीवी न्यूज नेटवर्क’ (ETV News Network) व ‘जी मीडिया’ (Zee Media) के रीजनल क्लस्टर के पूर्व सीईओ जगदीश चंद्रा के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित सेक्टर-62 से लॉन्च हुए इस चैनल की टैगलाइन ‘विजन ऑफ न्यू इंडिया’ (Vision of new India) रखी गई है। नए चैनल के उद्देश्य और इसकी खासियत समेत तमाम मुद्दों पर ‘समाचार4मीडिया’ ने ‘भारत24’ के सीईओ व एडिटर-इन-चीफ डॉ. जगदीश चंद्रा से खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

नए चैनल की प्लानिंग कब और कैसे बनी, वहीं इसका नाम ‘भारत24’ क्यों रखा गया, सबसे पहले इस बारे में कुछ बताएं?

इसकी प्लानिंग की बात करूं तो एक कहावत है कि अगर तमन्ना अधूरी रहे और सांस खत्म हो जाए तो अधूरी मौत है, लेकिन तमन्ना पूरी हो जाए और सांस भी बाकी रहे तो मोक्ष कहलाता है। तो कह सकते हैं कि मैं इसी तरह के ‘मोक्ष’ की ओर बढ़ना चाहता हूं। मैंने सोचा कि कौन सी तमन्ना बाकी रही है जीवन में तो ध्यान आया कि हमने एक नेशनल चैनल ‘जी हिन्दुस्तान’ लॉन्च किया था। वहां करीब 14 महीने ही अपनी जिम्मेदारी निभाने के बाद मैं जयपुर आ गया था, तो नेशनल चैनल चलाने की तमन्ना अधूरी रह गई थी। इसी तमन्ना को पूरा करने के लिए नए चैनल की प्लानिंग की गई और अब इसकी लॉन्चिंग होने जा रही है। कह सकते हैं कि इस चैनल के पीछे पैशन का कॉन्सेप्ट है।

रही बात इस चैनल का नाम ‘भारत24’ रखे जाने की तो समय, काल, देश और परिस्थिति के अनुसार जो नाम अनुकूल होता है, वही नाम लेकर आदमी चलता है। काफी सोच विचार और मित्रों की राय के बाद इस चैनल का नाम ‘भारत24’ रखा गया। चूंकि इस नाम को काफी पसंद किया जा रहा है तो अब लग रहा है कि इस बारे में हमारा फैसला सही था।   

नए चैनल का प्रसारण 15 अगस्त से ही किए जाने के पीछे क्या कोई खास वजह है?

नहीं, इसके पीछे कोई खास वजह नहीं है। पहले हम इसे जुलाई के आखिरी हफ्ते में लॉन्च करने वाले थे। लेकिन कुछ काम बाकी रह गए थे। फिर इसे छह-सात अगस्त को लॉन्च करने की तैयारी थी, लेकिन फिर तभी मन में विचार आया कि क्यों न इसे 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस वाले दिन लॉन्च किया जाए। जैसा कि चैनल का नाम है ’भारत24 ’ तो इस हिसाब से लगा कि 15 अगस्त को लॉन्च करना ज्यादा सही रहेगा।

मार्केट में पहले से कई स्थापित चैनल हैं, ऐसे में नए चैनल को उनके बीच में स्थापित करने के लिए किस तरह की स्ट्रैटेजी पर फोकस करेंगे? यह दूसरे चैनल्स के मुकाबले किस तरह अलग होगा?

देखिए, एक स्थिति होती है कि सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट (Survival of the fittest) यानी हम संघर्ष करेंगे और अपना स्थान बनाएंगे। जीवन में चैनल लॉन्च करने और उन्हें चलाने का काफी अनुभव रहा है, ऐसे में हमारे पास काफी आत्मविश्वास है। किसी भी चैनल की सफलता उसकी टीम पर निर्भर करती है। हमें अपनी टीम पर पूरा भरोसा है और अपनी टीम के साथ मिलकर हम इसे सफलता की ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।

यदि आर्थिक पक्ष की बात करें तो इसकी फंडिंग का क्या सोर्स है? यानी इसमें निवेशक कौन है, इसके अलावा डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल और रेवेन्यू मॉडल के बारे में भी कुछ बताएं?

मैं आपको बता दूं कि इसमें निवेशक के तौर पर गुजरात के एक बड़े कॉरपोरेट हाउस का पैसा लगा है। हम अभी उनके नाम के बारे में नहीं बता सकते हैं। हो सकता है कि वे खुद ही अपना सार्वजनिक करें। मैं आभारी हूं उन लोगों का कि उन्होंने हम पर भरोसा जताया और सोचा कि जगदीश चंद्रा पर यदि पैसा लगाएंगे तो पैसा बढ़ेगा ही। ऐसे में हमें फंडिंग की कोई समस्या नहीं है। अभी ये छोटा चैनल है। आप इसे स्टार्टअप चैनल भी मान सकते हैं। पूरे देश में मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े लोग इस बात को जानते हैं कि हम रेवेन्यू के मामले में हमेशा नंबर वन पर रहते हैं। हमारी टीम में शामिल मनोज जिज्ञासी एक तरह से देश के बेस्ट सेल्स हेड हैं। वो हमारे स्ट्रैटेजिक एडवाइजर भी हैं। हमने पहले भी साथ काम किया है और मैं जानता हूं कि वो जहां भी रहे हैं, रेवेन्यू को आगे बढ़ाया है।

रेवेन्यू हमारे लिए किसी तरह से चुनौती नहीं है। इसके दो पार्ट हैं। एक तो निवेश और दूसरा आगे चैनल को चलाना। निवेश के लिए हम उनका आभार मानते हैं, जिन्होंने हमारे ऊपर भरोसा जताया और हमें प्रोत्साहन देते हुए आगे बढ़ाया। रही बात आगे चैनल को चलाने की तो मनोज जिज्ञासी के नेतृत्व में सेल्स टीम और अजय कुमार के नेतृत्व में एडिटोरियल टीम के साथ मिलकर हम सभी इसे आगे ले जाएंगे। मेरा मानना है कि रेवेन्यू को लेकर हमारे सामने कभी कोई इश्यू नहीं आएगा। हम यहां सिर्फ बिजनेस करने नहीं बल्कि अच्छा चैनल चलाने के लिए आए हैं। बिजनेस अच्छा होता है तो बहुत अच्छी बात है। हम अपने स्टाफ का भी काफी ध्यान रखते हैं। मेरे कहने का मतलब है कि हम सभी मिलकर काम करेंगे और बिना रेवेन्यू की चिंता किए लोगों के बीच अच्छा चैनल लेकर जाएंगे।

रही बात डिस्ट्रीब्यूशन की तो हमने सेलेक्टिव डिस्ट्रीब्यूशन पर फोकस किया है। इसके अलावा मेरा तो यह मानना है कि आखिर में आपकी खबरें ही काम आती है। खबरें ही जीवन है। यदि आपकी खबरों में दम है तो चैनल अपने आप दमदार होगा और यदि खबरों में दम नहीं है तो कितनी ही ब्रैंडिंग और डिस्ट्रीब्यूशन कर लें, उससे कुछ होना नहीं है। देश भर में हमारी दमदार मौजूदगी दिखाई देगी। डिस्ट्रीब्यूशन और रेवेन्यू हमारे लिए किसी तरह की चुनौती नहीं है।

आजकल तमाम चैनल्स हैं और लगभग सभी एक जैसे दिख रहे हैं। ऐसे में आपका एडिटोरियल स्टैंड कैसा रहेगा। टीवी पर आजकल जो हंगामा दिखाई देता है, आप इसे किस रूप में देखते हैं और कैसे चैनल को नई पहचान दिलाएंगे?

हमारी एक ही स्ट्रैटेजी है कि ‘States make the Nation’ यानी राज्यों से ही राष्ट्र का निर्माण होता है। यह पहला ऐसा चैनल होगा, जिसमें देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवरेज मिलेगी। आजकल तमाम चैनल्स का फोकस दिल्ली-एनसीआर पर रह गया है। आज के दौर में न्यूज पिछड़ गई है। अगर न्यूज हैं भी तो तमाम चैनल्स दिन भर चुनिंदा चार-पांच खबरों को ही दिखाते रहते हैं, लेकिन हमारे चैनल पर ऐसा नहीं होगा और कश्मीर से कन्याकुमारी तक यानी देशभर की खबरों को हम अपने चैनल पर कवर करेंगे। रोजाना किसी न किसी राज्य का बेहतर कवरेज आपको हमारे चैनल पर मिलेगा। देश के 4000 विधानसभा क्षेत्रों में से अधिकतर क्षेत्रों में हमारे इनफॉर्मर/स्ट्रिंगर/रिपोर्टर होंगे जो देश के सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को पूरी कवरेज देंगे। इसलिए हमने कहा भी है कि ‘भारत24‘ वहां तक होगा, जहां तक भारत है।

लगभग सभी चैनल्स डिजिटल पर फोकस कर रहे हैं, उनकी अपनी न्यूज वेबसाइट्स भी हैं। इस बारे में आपकी क्या प्लानिंग है? क्या चैनल की वेबसाइट भी शुरू करेंगे? क्या उसका कंटेंट अलग से क्रिएट करेंगे या चैनल के कंटेंट को ही उस पर चलाएंगे?

मेरा मानना है कि वेबसाइट को चलाने के लिए चैनल का भी कंटेंट दिया जाना चाहिए। सोशल मीडिया वैसे तो काफी लोकप्रिय है, लेकिन रेवेन्यू के मामले में जीरो है या लॉस मेकिंग है। हम चैनल का कंटेंट भी चलाएंगे और अन्य एजेंसियों से भी वेबसाइट के लिए कंटेंट हासिल करेंगे। हमारा फोकस जितना टीवी पर है, उतना ही डिजिटल पर भी है।

आपका ‘द जेसी शो’ (The JC Show) काफी लोकप्रिय रहा है। क्या उस शो को दोबारा शुरू करेंगे अथवा अपना कोई और शो लेकर आएंगे?

लगभग हर तीन महीने में मैं एक ‘द जेसी शो‘ करता हूं, यह कई मायनों में देश का सबसे बड़ा शो रहा है। क्योंकि हम 18 चैनल चलाते थे और यह शो सबमें चलता था। पिछली बार भी जब मैंने यह शो किया था, तो उसे करीब एक करोड़ लोगों ने देखा था। यहां भी ‘द जेसी शो‘ करेंगे। यह चैनल को चलाने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ पैशन के लिए होगा। चैनल को चलाने वाले शो हमारे एडिटोरियल के लोग करेंगे। 

चैनल की मार्केटिंग को लेकर किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाई गई है?

मेरा मानना है कि मीडिया में मार्केटिंग एक लग्जरी है। लोगों को चैनल के बारे में जानकारी देने के लिए मार्केटिंग जरूरी है लेकिन असली मार्केटिंग तो खबर से होती है। खबर में यदि दम है तो उसे लोग पाताल से ढूंढ लाएंगे।

ज्यादातर चैनल्स टीआरपी के पीछे भागते हैं, जिसे लेकर कई बार विवाद भी होता है और आरोप-प्रत्यारोप भी लगते हैं। क्या आप भी टीआरपी में यकीन करते हैं और आप भी नंबरों की इस दौड़ में शामिल होंगे?

टीआरपी में मेरी कभी भी मान्यता नहीं रही। हमारा चैनल देश का पहला टीआरपी फ्री चैनल होगा। यानी हमारे न्यूज रूम में टीआरपी को लेकर कोई दबाव नहीं होगा। टीआरपी यदि आती है तो अच्छी बात है उसका स्वागत है, लेकिन यदि नहीं आती है तो भी हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हम तो ये चाहते हैं कि हमारा कंटेंट अच्छा हो और हमारी टीम पूरे मन से अपना बेस्ट काम करे। हमारी खबरों में पूरी ताकत है रेवेन्यू लाने की और एडवर्टाइजर्स भी जानते हैं कि हमारी क्या वैल्यू है। मेरा मानना है कि अब टीआरपी वाली क्रेडिबिलिटी खत्म हो गई है, बस एक सिस्टम है जो चल रहा है। लेकिन एक दिक्कत ये है कि नेशनल चैनल का सारा बिजनेस टीआरपी से आता है, लेकिन रीजनल चैनल में टीआरपी का कोई रोल नहीं है। मैं आपको बता दूं कि लॉन्चिंग के पहले साल में ही मैं बिना टीआरपी के 50 करोड़ रुपये से ज्यादा का रेवेन्यू लेकर आऊंगा। हालांकि, टीआरपी आ जाए तो बहुत अच्छी बात है, उसका स्वागत है, पर हम टीआरपी के मोहताज नहीं हैं। मैं फिर कहता हूं कि हमारी खबर हमारी ब्रैंडिंग करेगी और हमारा शो हमारी ब्रैंडिंग करेगा। हमारे लिए रेवेन्यू, ब्रैंडिंग और डिस्ट्रीब्यूशन का कोई चैलेंज नहीं है। हमारे लिए एक ही चैलेंज है कि हमारे रिपोर्टर्स खबर कहां से लाएंगे।

आपने पत्रकारिता में लंबा वक्त बिताया है और इसके तमाम चरण देखे हैं। आजकल पहले के मुकाबले पत्रकारिता थोड़ी बदल गई है और तमाम चैनल्स पर हल्ला-गुल्ला ज्यादा होता है। ऐसे में आप समय के साथ किस तरह इस चैनल को प्रासंगिक रखेंगे?

यह मैंने अभी कहा कि आदमी समय, काल, देश और परिस्थिति के अनुसार फैसले लेता है। एडिटोरियल पॉलिसी भी उसी से बनती है। हम भी शोरगुल करेंगे लेकिन दूसरों के मुकाबले थोड़ा कम करेंगे। हम कोशिश करेंगे कि आज के माहौल में यह चैनल मार्केट में ताजा हवा के झोंके की तरह आए। लोगों को सुकून मिले। उन्हें पता चले कि इस चैनल पर 24 घंटे लड़ाई-झगड़ा और शोरगुल वाले कार्यक्रम ही नहीं दिखाए जाते हैं। हमारे डिबेट शो अन्य चैनल्स के मुकाबले शालीन होंगे और कम हंगामेदार रहेंगे, इसके लिए हमारी पूरी कोशिश रहेगी। बाकी समय आने पर पता चलेगा कि हम कितना इस दिशा में कर पाते हैं और कितना नहीं। लेकिन मैं विश्वास दिलाता हूं कि यह चैनल अन्य चैनल्स से अलग होगा।

कोई भी चीज जब हम शुरू करते हैं तो उसके भविष्य के बारे में भी सोचते हैं। ऐसे में आपने अगले पांच साल के लिए इस चैनल का क्या रोडमैप तैयार किया है? अगले पांच साल के सफर में इस चैनल को आप कहां व किस रूप में देखते हैं?

इसे हम इस रूप में देखते हैं कि आने वाले समय में कोई भी राजनीतिक पार्टी इस चैनल को ध्यान में रखे बिना अपनी रणनीति नहीं बना पाएगी। ईटीवी में हम ऐसा कर चुके हैं, जब बिना ईटीवी को ध्यान में रखे हुए कोई भी पॉलिटिकल पार्टी अपनी रणनीति नहीं बनाती थी। हमारा पूरा विश्वास है कि यह चैनल अपनी मजबूत पकड़ बनाएगा। हम कॉरपोरेट के लोग नहीं हैं, जो टार्गेट के पीछे भागें। मेरा मानना है कि टार्गेट इस तरह का होना चाहिए, जिसे अपने बेहतर प्रयासों से हासिल किया जा सके। टार्गेट काल्पनिक नहीं होना चाहिए। हम पहले यह देखते हैं कि टार्गेट ऐसा है कि नहीं, जिसे प्राप्त किया जा सके।

कई चैनल्स अपनी सेल्स टीम के सामने इतना टार्गेट रख देते हैं कि उसे सामान्य तौर पर हासिल करना नामुमकिन होता है, लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं हैं। हम उतना ही टार्गेट रखते हैं, जो वास्तविक हो न कि इतना काल्पनिक कि उसे हासिल करना नामुमकिन हो। हम रेवेन्यू के लिए अपने पूरे प्रयास करते हैं, लेकिन हमारा फोकस टार्गेट हासिल करने पर नहीं होता है। हालांकि, अपने प्रयासों की बदौलत आमतौर पर आखिर में हमें बहुत अच्छा रेवेन्यू हासिल होता है। मैं सिर्फ इस बात को जानता हूं कि हमारा चैनल आज के दौर में सभी के लिए प्रासंगिक होगा और लोग इसे देखेंगे व पसंद करेंगे।

आपका चैनल किन बड़े प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध होगा?

हमारा यह चैनल सभी प्रमुख डीटीएच प्लेटफॉर्म्स जैसे- टाटा स्काई, एयरटेल, डिश टीवी और वीडियोकॉन आदि पर उपलब्ध होगा।

हाल ही में चीफ जस्टिस एनवी रमना ने टीवी मीडिया की विश्वसनीयता पर कटाक्ष करते हुए इसे कंगारू कोर्ट तक की संज्ञा दी थी। आपका इस बारे में क्या कहना है?

उनकी राय अपनी जगह सही हो सकती है, मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा, लेकिन इस बारे में मैं चीफ जस्टिस को लिखूंगा कि आप ‘भारत24’ देखना शुरू कीजिए, फिर मैं आपसे इस बारे में आपकी राय जानूंगा।  

तमाम लोग सफल होने के बाद लाइफ को एंज्वॉय करते हैं, लेकिन आप इतनी सफलता मिलने के बाद और इस उम्र में एक नया चैनल लेकर आ रहे हैं। ऐसे में इस चैनल को लेकर मार्केट में काफी हलचल है। इस बारे में आपका क्या कहना है?

इसे मैं सिर्फ पैशन ही कहूंगा। मैं इस समय 72 साल का हूं, लेकिन मैं अपनी सेहत को लेकर काफी सजग हूं और मुझे अभी काफी काम करना है। बाकी तो सब ईश्वर के हाथों में है। मेरा मानना है कि दो ही चीज जीवन हैं। पहला खबर और दूसरा स्वाद। मैं इन दोनों चीजों पर पूरा ध्यान देता हूं और वर्कआउट भी करता हूं, ताकि लंबे समय तक हम खाने का स्वाद ले सकें और फिट रहकर काम कर सकें। मेरा मानना है कि लाइफ में एंज्वॉय करने के लिए आपको पॉवर में होना चाहिए, तभी आपकी पूछ होगी। मैं आज भी रोजाना 11 किलोमीटर चलता हूं और देश-विदेश के कई अखबार पढ़ता हूं।

आजकल के पत्रकारों के लिए आप क्या कहना चाहेंगे?

उनसे मेरा यही कहना है कि खबर लेकर आओ बस। आजकल तमाम पत्रकार सिर्फ इवेंट में सिमटकर रह गए हैं और खबर करना भूल गए हैं। उन्हें एक्सक्लूसिव कंटेंट पर फोकस करना चाहिए और खबर के अंदर की खबर निकालकर लानी चाहिए।

आप अपनी टीम किस तरह तैयार कर रहे हैं। इसमें किस तरह के लोग आपके साथ जुड़ रहे हैं। उनकी भर्ती में आप किन बातों पर फोकस रखते हैं, इस बारे में कुछ बताएं?

हमारे यहां भर्ती से पहले तमाम तरह की औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं और आवेदकों को तमाम मानकों पर परखने के बाद ही नियुक्ति दी जाती है। ऐसा नहीं है कि आज किसी को भर्ती कर लिया, कुछ दिनों बाद उसे जाने के लिए कह दिया। भर्ती ही तय मानकों के हिसाब से होती है तो उनकी परफॉर्मेंस पर हमें पूरा भरोसा होता है।

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हमेशा छाया रहेगा बड़े पर्दे का प्यार और सिनेमा का जादू: रवीना टंडन

हिंदी सिनेमा में 'मस्त मस्त गर्ल' का तमगा पाने वाली अभिनेत्री रवीना टंडन ने पहले बड़े पर्दे पर और अब ओटीटी की दुनिया में खुद को साबित किया है।

Last Modified:
Thursday, 12 May, 2022
RaveenaTandon54121

हिंदी सिनेमा में 'मस्त मस्त गर्ल' का तमगा पाने वाली अभिनेत्री रवीना टंडन ने पहले बड़े पर्दे पर और अब ओटीटी की दुनिया में खुद को साबित किया है। नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो चुकी वेब सीरीज ‘अरण्यक’ से रवीना टंडन ने ओटीटी की दुनिया में कदम रखा और यहां भी अपने अभिनय के झंडे गाड़े। ‘ई4एम प्ले स्ट्रीमिंग समिट 2022’ (e4m Play Streaming Summit 2022) में उन्होंने सिनेमा से लेकर स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म तक अपने सफर के बारे में, 90 के दशक से फिल्म इंडस्ट्री में हुए बदलाव के साथ-साथ कई अन्य मुद्दों पर चर्चा की।  

ट्रेडिशनल सिनेमा से ओटीटी तक अपनी पारी के बारे में बात करते हुए रवीना टंडन ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि एक अभिनेता या कलाकार को बड़े पर्दे से छोटे पर्दे की ओर या स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट होना मुश्किल है। ऐसा इसलिए क्योंकि मेरा लगाव कैमरे से है (खुद के लिए बोल रही हूं)। इसलिए जब भी मेरे सामने कैमरा आता है और कोई किरदार मुझे दिया जाता है, तो एक्शन बोलने के साथ ही मैं उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ देती हूं। मेरे लिए, यह मायने रखता है कि मैं खुद को ऑडियंस के साथ कैसे जोड़ पाउं। एक कलाकार के तौर पर, मैं हर उस किरदार में अपना सर्वश्रेष्ठ देती हूं, जो मुझे दिया गया है। लिहाजा, मुझे पता है कि मेरे लिए अपने ऑडियंस तक पहुंचने का रास्ता उसी कैमरे के जरिए ही होकर जाता है।

यह भी पढ़ें: देश में OTT कंटेंट के विस्तार पर बोले शैलेश लोढ़ा, प्रड्यूसर्स को दी ये सलाह

1990 से 2022 तक फिल्म इंडस्ट्री में हुए बदलावों को लेकर रवीना टंडन ने कहा, ‘90 के दशक से अब 2022 तक, निश्चित रूप से एक बड़ा बदलाव आया है और मुझे लगता है कि यह केवल अच्छे के लिए हुआ है। हमेशा ही सिनेमा के लिए एक खास तरह की प्रतिस्पर्धा रही है, चाहे वह डीवीडी, वीसीडी के रूप में आयी हो, या टेलीविजन पर खुलने वाले विभिन्न चैनल्स के रूप रही हो या फिर विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर हर दिन खुलने वाली स्ट्रीमिंग सर्विसेज के रूप में रही हों। लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि बड़े पर्दे का प्यार और सिनेमा का जादू हमेशा छाया रहेगा। इसका फायदा यह है कि कुछ हद तक टेलीविजन सहित तमाम ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने हमें विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों, विभिन्न देशों से आने वाले शोज और उनके पारम्परिक तौर तरीकों और उनकी कहानियों से और यहां तक उनके कहानी कहने के तरीके से भी रूबरू कराया है।

उन्होंने आगे कहा, ‘ऐसा जरूरी नहीं है कि निश्चित तौर पर कोई बड़े नाम की वजह से फिल्म या शो हिटा होगा।  यह कंटेंट पर भी निर्भर करता है। कई बार बड़े नामों को शो में लिया जाता है, लेकिन दुर्भाग्यवश शो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पता है, या उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाता है। हालांकि इसके कई कारण हो सकते हैं। फिल्म मेकर्स, जो एक ऐसा शो बना रहे हों, जिसमें उन्हें लगता है कि फलां बड़े अभिनेता की वजह से उन्हें क्रेडिट मिलेगा, या वह करेक्टर में घुस जाएगा और उन्हें वह देने में सक्षम हो जाएगा, जो वह चाहते हैं, तो मुझे लगता है कि यह सिर्फ है एक अतिरिक्त बोनस है। इसलिए, इसमें आप निश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कह सकते हैं।’

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टाइम्स नेटवर्क के राहुल शिवशंकर ने बताया, TRP की ‘दौड़’ में क्यों आते हैं आगे

गोवाफेस्ट 2022 में ‘टाइम्स नाउ’ (Times Now) के एडिटोरियल डायरेक्टर और एडिटर-इन-चीफ राहुल शिवशंकर ने एक्सचेंज4मीडिया से तमाम मुद्दों पर की बातचीत

Last Modified:
Monday, 09 May, 2022
Rahul Shivshankar.

‘टाइम्स नाउ’ (Times Now) के एडिटोरियल डायरेक्टर और एडिटर-इन-चीफ राहुल शिवशंकर ने हाल ही में गोवा में आयोजित ‘गोवाफेस्ट 2022’ (Goafest 2022) में बतौर स्पीकर शिरकत की। इस दौरान हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने डेनियल मैकएडम्स (Daniel McAdams) वाली वाकये समेत तमाम मुद्दों पर उनसे विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

जब आपने पत्रकारिता की शुरुआत की थी, तब क्या न्यूज कुछ अलग थी? इतने वर्षों में चीजें कैसे बदल गई हैं?

उन दिनों न्यूज काफी कम हुआ करती थी और उनका ज्यादा फोकस क्रिकेट, राजनीति और एंटरटेनमेंट पर होता था। उस समय अखबार, दूरदर्शन और राज्यों द्वारा नियंत्रित रेडियो होते थे। इसके बाद निजी टीवी चैनल्स आए। उस समय हमारे पास विज्ञान, पर्यावरण, यूनिवर्स और टेक्नोलॉजी जैसी आला दर्जे की पत्रकारिता नहीं थी। चीजें अब बिल्कुल अलग हैं।

एक टीवी पत्रकार के रूप में आप किस चीज को अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं?

इसमें मैं ईमानदारी और विश्वसनीयत कहूंगा। मैं न्यूज में किसी भी तरह का समझौता नहीं करता और इसके अलावा मेरे पास और कुछ नहीं है।

न्यूज रेटिंग्स की बात करें तो टाइम्स नाउ टॉप चैनल्स में से एक है। आपको क्या लगता है, वो कौन सी चीज है जो इसे दूसरों से आगे रखती है?

टीआरपी के मामले में हम हमेशा दूसरों से आगे रहे हैं। अभी जो ताजा रेटिंग आई है उसमें हम सभी कैटेगरी में टॉप पर हैं। आप तमाम शहरों को देखें, हमने हर आयु वर्ग और अन्य श्रेणियों में शीर्ष स्थान हासिल किया है। यह सब कुशल नेतृत्व और दृढ़ विश्वास के कारण है। हम दृढ़ निर्णय लेते हैं। उदाहरण के लिए, हमने महामारी के दौरान चुनावों का बहिष्कार किया था। ऐसा इसलिए नहीं था कि हम कुछ और करना चाहते थे, बल्कि हमने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उस समय लोग गैर-राजनीतिक कंटेंट चाहते थे। यही कारण है कि हम टीआरपी में आगे रहते हैं।

कोविड-19 और लॉकडाउन के कारण तमाम मीडिया संस्थानों के लिए पिछले दो साल काफी मुश्किलों भरे रहे। एडिटोरियल लीडर के रूप में आपके लिए यह समय कितना चुनौतीपूर्ण था? इसके अलावा पिछले दिनों चर्चा का विषय बने मैकएडम्स वाकये के बारे में भी कुछ बताएं?

महामारी के चरम पर लोगों को ऑफिस में काम पर आने के लिए कहना काफी मुश्किल था। हमने अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन और दवाओं की उपलब्धता पर व्यापक कवरेज के लिए अपनी जान जोखिम में डाली। हमने इसके लिए काफी प्रयास किया।

मैकएडम्स वाकये की बात करें तो यह अचानक हुआ। लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसा नहीं किया गया। मैं किसी भी तरह की पब्लिसिटी नहीं चाहता हूं। किसी का नाम गलत लेने के लिए मुझे इस तरह नहीं घसीटा जाना चाहिए था। लोगों ने मुझे अपशब्द कहे और यहां तक ​​कि अन्य तमाम मीडियाकर्मियों ने भी सोशल मीडिया पर हमले शुरू कर दिए।

एक चैनल के रूप में हमने सोचा कि यह बताने की कोशिश करने का कोई मतलब नहीं है कि यह घटना कभी नहीं हुई, जबकि हमारा ब्रैंड कितना बड़ा है। हमने अपनी गलती पर चर्चा करने के लिए एक और शो चलाया। दूसरा शो भी हिट रहा, हालांकि इसे पहले वाले जितने व्यूज नहीं मिले, जिसे 20 मिलियन लोगों ने देखा। अन्य मीडिया संस्थानों ने इसे लेकर खबरें चलाईं।

न्यूज चैनल्स पर अक्सर आरोप लगते हैं कि टीआरपी के लिए डिबेट शो पर गरमागरम बहस की जाती हैं, जबकि समाज के वास्तविक मुद्दों को पीछे छोड़ दिया जाता है, जबकि उन पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। इस तरह के आरोपों पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

क्या हमें टीवी डिबेट्स बंद कर देनी चाहिए? क्या विभिन्न सत्रों के दौरान हो रहे हंगामे के कारण देश की संसद को बंद कर देना चाहिए? कुछ ऐसे एंकर्स और चैनल्स हैं जो डिबेट में एक दर्जन मेहमानों को आमंत्रित कर लेते हैं। हम ऐसा कभी नहीं करते। कुछ ऐसे लोग हैं जो चैनल्स पर आते हैं और डिबेट को बाधित करते हैं। वे अपनी आवाज ऊंची रखने के लिए डिबेट शो में चिल्लाते हैं और यदि आप उन्हें म्यूट करते हैं तो वे आप पर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीनने का आरोप लगाते हैं। जहां तक समाज के वास्तविक मुद्दों की बात है तो मैं यह बताना चाहता हूं कि टाइम्स नाउ बेरोजगारी और ईंधन की बढ़ती कीमतों के बारे में बात करता है।

वैसे न्यूज चैनल्स पर ये आरोप कौन लगा रहा है? जो अभी मार्केट में आए हैं। मीडिया स्टार्ट-अप मुख्यधारा के मीडिया को बदनाम करना चाहते हैं, ताकि वे आगे बढ़ सकें। वैकल्पिक मीडिया खुद को बढ़ावा देने के लिए मुख्यधारा को बदनाम करना चाहता है। मैं कहना चाहता हूं कि वे ध्यान आकर्षित करने के लिए न्यूज चैनल्स के खिलाफ नकारात्मकता फैलाने के बजाय अच्छी पत्रकारिता कर सकते हैं।

कई न्यूज चैनल्स ने खुद को राजनीतिक स्पेक्ट्रम के बायें अथवा दायें पक्ष की ओर कर लिया है। आप अपने चैनल की स्थिति कैसे देखते हैं?

अमेरिका में, कई बड़े मीडिया घराने राष्ट्रपति पद की दौड़ में राजनीतिक पक्ष लेते हैं। जैसे कि वे जो बाइडेन या डोनाल्ड ट्रम्प का समर्थन करते हैं। हम कभी भी चुनाव में उम्मीदवारों का समर्थन नहीं करते हैं। हर पत्रकार को अपनी विचारधारा रखने का अधिकार है, जब तक कि वे किसी राजनीतिक पार्टी के पीछे नहीं भाग रहे हैं। मैं खुद को एक प्रगतिशील रूढ़िवादी पत्रकार के रूप में वर्णित करता हूं। मेरा अपना एक दृष्टिकोण है और मैं तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष रखता हूं। 

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आज के दौर में लंबे समय तक न्यूज रेटिंग्स की अनुपलब्धता की कल्पना करना मुश्किल: हर्ष भंडारी

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के ग्रुप सीओओ (ब्रॉडकास्टिंग डिवीजन) ने एक्सचेंज4मीडिया के साथ खास बातचीत में अपनी प्राथमिकताओं, टीवी रेटिंग्स की वापसी समेत कई मुद्दों पर अपनी राय रखी है।

Last Modified:
Thursday, 03 March, 2022
Hersh Bhandari

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ (Republic Media Network) ने करीब 15 दिन पहले हर्ष भंडारी को प्रमोशन का तोहफा देते हुए ग्रुप सीओओ (ब्रॉडकास्टिंग डिवीजन) की जिम्मेदारी सौंपी है। उनकी प्रोन्नति ऐसे समय पर हुई है, जब ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल‘ (BARC) इंडिया दोबारा से न्यूज चैनल्स की रेटिंग्स को शुरू करने जा रहा है। ऐसे महत्वपूर्ण समय में, बड़ी जिम्मेदारियों को संभालने के लिए भंडारी ने पूरी तरह से कमर कस ली है। हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) के साथ खास बातचीत में भंडारी ने अपनी प्राथमिकताओं और टीवी रेटिंग्स की वापसी समेत कई मुद्दों पर अपनी राय रखी है।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

नई भूमिका में आपकी बड़ी प्राथमिकताएं क्या होंगी?

मेरी बड़ी प्राथमिकताएं वही हैं, जो संस्थान और यहां की लीडरशिप टीम की हैं। यानी हमारा मूल उद्देश्य कोर बिजनेस को मजबूत करना और भविष्य के लिए इसे और बेहतर तरीके से तैयार करना है। कहने की जरूरत नहीं है कि उपरोक्त उद्देश्यों के लिए हमारी रणनीतिक आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ने के लिए बेहतर प्रदर्शन, टीम निर्माण और संस्थान में उत्साह को और बढ़ाना शामिल है।

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क में आप विकास के अगले चरण को किस तरह से देखते हैं?

पांच साल पुराने संस्थान के रूप में, विकास की हमारी भूख को शांत होने में समय लगेगा। न्यूज बिजनेस में और जिन भाषाओं में हम काम कर रहे हैं, उनमें अभी भी विकास की बहुत गुंजाइश है। एक मार्केट लीडर और तेजी से बढ़ते न्यूज ऑर्गनाइजेशन के रूप में, अंग्रेजी, हिंदी और बंगाली मार्केट्स में और बढ़ोतरी की गुंजाइश है। हमारे बिजनेस पार्टनर्स की सेवा के लिए मार्केट के विस्तार और इनोवेशन (नवाचार) की भी काफी गुंजाइश है। हमारी सांगठनिक संस्कृति के हिस्से के रूप में हम अपनी प्रतिष्ठा से किसी तरह का कोई समझौता करने में विश्वास नहीं करते हैं। इसी का परिणाम है कि हम हमेशा कंटेंट पक्ष और मार्केट मुद्रीकरण दोनों पहलुओं पर अपने विजन को नवीनीकृत करते रहे हैं।

हमें अपनी टीवी प्लस रणनीति (TV Plus strategy) के बारे में बताएं। आप उस दिशा में क्या और कैसे कर रहे हैं?

किसी भी बिजनेस के लिए डिजिटल में बदलाव एक बड़ी व महत्वपूर्ण गतिविधि बन चुका है। रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क ने दो साल पहले ही इस क्षमता को विकसित करना शुरू कर दिया था। मुझे यह स्वीकार करना होगा कि हमें अपने यूजर्स से महत्वपूर्ण खिंचाव (traction) मिल रहा है। वास्तव में यह हमारे रैखिक टेलिविजन (linear television) से जुड़ाव की दिशा में है। हमारे व्युअर्स किसी भी प्लेटफॉर्म पर हमारे कंटेंट को काफी पसंद करते हैं। यह ट्रेंड हमें अपने ऑडियंस की बदलते रुचि और प्राथमिकताओं को गतिशील तरीके से पेश करने की प्रेरणा देता है।

स्ट्रैटेजी बिजनेस पार्टनरशिप को अब अलग-अलग बिजनेस डिवीजन में विभाजित किया जाएगा, प्रत्येक का अपना नेतृत्व और लक्ष्य होगा। यह रणनीतिक ढांचा (strategic architecture) किस तरह काम करेगा?

सभी बिजनेस संस्थानों में स्ट्रैटेजिक बिजनेस यूनिट्स (SBU) होती है जो लाभ को केंद्र में रखकर काम करती हैं। इस बिजनेस सिद्धांत को किसी आधार की आवश्यकता नहीं है। रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क की बात करें तो हम काफी तेजी से विकास की राह पर हैं, हमें ऐसा ढांचा तैयार करने की जरूरत है जो हमारे स्ट्रैटेजिक ढांचे को सपोर्ट करे। यह हमें प्रत्येक SBU की प्राथमिकता पर ध्यान केंद्रित करने और संस्थान के विकास की गति पर सहक्रियात्मक और गुणक प्रभाव उत्पन्न करने में भी सक्षम होना चाहिए।

न्यूज रेटिंग्स की वापसी को लेकर आपका क्या कहना है? तमाम ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि BARC को अभी भी अधिक मजबूत और समावेशी मीट्रिक प्रणाली बनाने की जरूरत है। इस बारे में आप क्या कहेंगे?

न्यूज रेटिंग्स की वापसी हमारे कानों में मधुर संगीत की तरह है। ऐसे दौर में जब डेटा को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, ऐसे में लंबे समय तक बिना डेटा की कल्पना नहीं की जा सकती है, खासकर न्यूज जॉनर के लिए। बार्क डेटा न केवल हमारे बिजनेस पार्टनर्स के लिए काफी महत्वपूर्ण है, बल्कि व्युअर्स की प्राथमिकताओं को भी प्रत्यक्ष रूप से दर्शाता है। जहां तक ​​डेटा की मजबूती पर आपके प्रश्न का संबंध है, मुझे लगता है, डोमेन विशेषज्ञ अपने मूल्यवान इनपुट के साथ BARC के साथ जुड़े हुए हैं और मैं इस पर टिप्पणी नहीं कर सकता हूं।

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मैं इस तरफ या उस तरफ का होता तो पत्रकार नहीं होता: अमिताभ अग्निहोत्री

पत्रकारिता में लंबे समय से सक्रि‍य अमिताभ अग्निहोत्री ने जीवन और पत्रकारिता में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। अमिताभ अग्निहोत्री की जीवन यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया ने उनसे खास बातचीत की है।

Last Modified:
Monday, 31 January, 2022
Amitabh Agnihotri

पत्रकारिता में लंबे समय से सक्रि‍य अमिताभ अग्निहोत्री ने जीवन और पत्रकारिता में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। अमिताभ ने वर्ष 1989 में ‘आईआईएमसी’, दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद करियर की शुरुआत ‘दैनिक जागरण’ से की थी। अमिताभ अग्निहोत्री की जीवन यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया ने उनसे खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

पत्रकारिता में आपका तीन दशक से भी अधिक का अनुभव है। मीडिया में कैसे आए? प्रारंभिक जीवन के बारे में बताएं?

मेरा जन्म यूपी के फर्रुखाबाद में हुआ है। जब बड़ा हुआ तो सामाजिक कार्यों में मन लगने लगा। मुझसे बड़े दो भाई-बहन काफी मेधावी थे लेकिन मेरा मन उतना पढ़ाई में लगता नहीं था। मेरी एक बहन है, जो आज आगरा में खुद का अस्पताल संचालित कर रही हैं।

कुल मिलाकर भाई-बहन विद्वान थे लेकिन मैं अपने आप को सदैव समाज से जोड़कर चलता था। मां को मेरी बहुत चिंता होती थी तो उनके कहने से बीकॉम करने चला गया, लेकिन वहां भी मन तो बस डिबेट में ही लगता था।

वो मेरी यात्रा ऐसी थी, जहां मैं छात्र जीवन के साथ-साथ एक सामाजिक जीवन भी जीने लगा था। उसी दौरान मैंने जिले के एसएसपी को चिट्ठी लिखी और जिले के हालात के बारे में बताया। कुछ दिन बाद कुछ लोग घर आए और मेरे बारे में पूछने लगे। मैं उनके साथ गया और बाद में एसएसपी से मित्रवत संबंध हो गए।

इसके बाद सामाजिक दायरा बढ़ा। मुझे आज भी याद है, जब इंदिराजी की हत्या हुई तो मैंने उनकी स्मृति में एक कार्य्रकम का आयोजन करवाया था और उस समय की राज्यमंत्री शीला दीक्षित जी भी उसमें शामिल हुई थीं।

उसके बाद मैंने एमकॉम किया और एमबीए के लिए लखनऊ से बुलावा भी आया, लेकिन मां को अपने मन की पीड़ा बताई और कहा कि मुझे तो मीडिया में जाना है। मां का आशीर्वाद मिला और आखिरकार जो बचपन से मेरी आत्मा मुझसे कह रही थी, मैंने उसकी आवाज सुनी। इसके बाद मैं आईआईएमसी दिल्ली गया और मेहनत का फल ऐसा हुआ कि मैंने वहां टॉप किया।

उसके बाद ऐसा लगा कि जैसे जीवन में कुछ अच्छा होगा और नौकरी की तलाश शुरू की। उसी दौरान ‘दैनिक जागरण‘ दिल्ली से भी शुरू हो रहा था और मुझे सबसे पहले वहां नौकरी मिली।

पहली नौकरी हमेशा से खास होती है। पहली नौकरी के कुछ अनुभव बताएं।

बिल्कुल, आपने सही कहा है। वो यादें खास हैं। वहां मैंने खूब मन लगाकर काम किया और एक महीने के बाद तो मेरा लिखा हुआ छपने भी लगा। ये आज भी मेरे लिए गर्व की बात है।

इसके बाद मुझे रिपोर्टिंग करने का भी मौका दिया गया। बाद में मुझे ब्यूरो भेजा गया और मेरी ग्राउंड रिपोर्टिंग की यात्रा शुरू हुई। ‘दैनिक जागरण‘ जैसे संस्थान के लिए ग्राउंड वर्क करना और वो भी उस दौर में जब राम मंदिर आंदोलन चरम पर था, वो समय मेरे लिए स्वर्णिम था।

इसके बाद मुझे बीजेपी और आरएसएस को कवर करने का जिम्मा मिला और साधु संत भी उसी में शामिल हो गए तो इस तरह से मेरी पहली नौकरी के अनुभव बड़े अच्छे रहे।

आपने प्रिंट और टीवी दोनों में काम किया है। आपकी टीवी में यात्रा कैसे शुरू हुई?

सच कहूं तो प्रिंट में काम करने का अपना एक अलग जलवा होता है। एक जगह बैठने का झंझट भी नहीं होता है। ‘दैनिक भास्कर‘ के समय में टीवी वालों से बढ़िया पहचान होने लगी। कई बार तो लोग मुझे टीवी का पत्रकार समझने लग जाते थे। वो एक ऐसा दौर था, जब टीवी आकार ले रहा था। कुछ बड़े चैनल्स में बात हुई, लेकिन मामला जमा नहीं।

जब मैं ‘देशबंधु‘ का संपादक था तो उसी समय ‘टोटल टीवी‘ से ऑफर आया और उनके मालिक से मेरी अच्छी मित्रता भी थी तो मना नहीं कर पाया और जुड़ गया। उसके बाद ‘समाचार प्लस‘ की शुरुआत हुई और सफलता के झंडे गाढ़े। करीब एक साल ‘के न्यूज‘ में भी रहा और एक बार उसे भी नंबर एक पर पहुंचा दिया। बाद में मैंने ‘एटीवी‘ और ‘नेटवर्क 18‘ के UP/UK चैनल्स का भी काम देखा।

कोरोना के कालखंड में एक छोटी सी पारी ‘R9‘ के साथ भी रही और मुझे संतोष इस बात का है कि हमने उस चैनल को एक पहचान दिलाई। इसके बाद ‘टीवी9‘ (डिजिटल) के साथ नई पारी शुरू की और आज आपके सामने हूं।

अगर आपसे ये पूछा जाए कि टीवी और प्रिंट दोनों में से किसमें अधिक मजा आया तो क्या कहेंगे? भविष्य में रीजनल चैनल्स की चुनौती क्या दिखाई देती है?

देखिए, मजा तो दोनों में है लेकिन आपने प्रश्न ऐसा किया है तो मैं कहूंगा कि टीवी में अधिक मजा है, क्योंकि उसमें गति है। कोई भी घटना जब हो रही है तो टीवी के माध्यम से आप उसमें ‘हस्तक्षेप‘ कर सकते हैं, लेकिन अखबार में पूरा एक दिन उसमें लग जाएगा।

प्रभावी माध्यम दोनों हैं, लेकिन टीवी की गति उसे अधिक आकर्षक बना देती है। मुझे कई बार लोग पूछते हैं कि आप किस तरफ हैं तो मैं एक ही बात कहता हूं कि मैं इस तरफ या उस तरफ का होता तो पत्रकार नहीं होता।

पहले लोग नेताओं के बारे में कहते थे कि ये फलां पार्टी का है, लेकिन अब मीडिया वालों के लिए कह रहे हैं कि देखिए वो उस पार्टी का पत्रकार है। अगर बात करें रीजनल चैनल्स की तो उनका भविष्य अच्छा है पर उन्हें नेशनल चैनल्स को कॉपी करने से बचना होगा। कॉपी करने से पैसा कमाया जा सकता है लेकिन लंबे समय तक चैनल नहीं टिक सकता।

मैं तो आम आदमी का पत्रकार हूं और उनसे जुड़ी ही खबरें दिखाता हूं। अगर आप अखबार को देखें तो हर जिले का अलग अखबार निकलता है और इसलिए वो टॉप पर है। उसी तरह से रीजनल चैनल्स को भी हर गांव, कस्बे की खबर दिखानी होगी, तब जाकर वो आपसे जुड़ेगा। अगर आप उसे अफगानिस्तान की खबर दिखाएंगे तो वो आपको क्यों देखेगा? रीजनल चैनल्स का मतलब यही होता है कि दर्शक के गांव की खबर कुछ ही घंटों में टीवी पर आ जाए।

वर्तमान में आपके पास डिजिटल की जिम्मेदारी है। फेक न्यूज की चुनौती को कैसे देख रहे हैं?

टीवी और अखबार की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन डिजिटल का कोई दायरा नहीं है। इसे आप एक समुद्र कह सकते हैं, जिसका अपना एक अलग आनंद है। मुझे ऐसा लगता है कि नियम कानून ठीक हैं, लेकिन पूरी तरह से इसे सरकारी नियंत्रण में लाने से इसका ‘सौंदर्य‘ नष्ट हो जाएगा।

इस मसले पर मुझे स्वर्गीय अटल जी की याद आती है, जिनकी मैंने एक बार आलोचना की थी और जब वो मुझसे मिले तो भरपूर स्नेह दिया। इसलिए मीडिया को स्वतंत्र होना चाहिए और मैं अधिक प्रतिबंधों के पक्ष में नहीं हूं। अब जहां तक बात है फेक न्यूज की तो कोई आम आदमी इन्हें तैयार नहीं करता। ये सब एजेंडे से प्रभावित होती हैं और एक आम आदमी तो बस फंस जाता है, इसलिए जागरूकता के पक्ष में हमेशा रहना चाहिए।

क्या आपने कभी किसी से प्रभावित होकर, भय में या लालच में कभी एजेंडा चलाया है?

ये आपने अच्छा सवाल किया। वर्तमान समय में तमाम आरोप मीडिया पर लगाए जा रहे हैं। जहां तक मेरी बात है तो मेरी सिर्फ एक विचारधारा है और वो है गरीब। लोग मुझे कहते हैं कि आप बहुत बोलते हो, लेकिन उसके बाद भी मुझे खतरा महसूस नहीं हुआ है। मुझे तो केंद्र सरकार तक से सुरक्षा लेने का ऑफर आया, लेकिन मैंने ये कहकर मना कर दिया कि मुझे कौन मारेगा?

अब पत्रकार सुरक्षा मांगे तो बचकाना लगता है। मैं आपसे ईमानदारी से कहूंगा कि एक बार नहीं, कई बार ऐसे मौके आए जब सत्ता के सर्वोच्च व्यक्ति और मेरे बीच सीधा संवाद हुआ, लेकिन मैंने हमेशा एक बात कही है कि मैं आम आदमी का पत्रकार हूं और उसी की बात करूंगा।

मेरे मंच पर सबका स्वागत है और आपको जो कहना है, जनता से कहिए, मुझसे मत कहिए। मुझे ऐसा लगता है कि इस पेशे में किसी से लाभ नहीं लेना चाहिए और अगर ऐसा किया है तो फिर भगत सिंह बनने का ‘स्टंट’ मत कीजिए, वो हानिकारक हो जाएगा।

समाचार4मीडिया के साथ अमिताभ अग्निहोत्री की बातचीत के वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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मेरा मानना है कि इंसान को हमेशा सीखते रहना चाहिए: कमर वहीद नकवी

वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने मीडिया में अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई यादों को साझा किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 25 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 25 December, 2021
Qamar Waheed Naqvi

वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने मीडिया में अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई यादों को साझा किया है। पेश हैं इस वार्ता के प्रमुख अंश-

अपने बचपन के बारे में कुछ बताएं, पत्रकार कैसे बनना हुआ?

मैं बनारस में पैदा हुआ हूं और पढ़ाई वहीं से की है। मेरे चचेरे नाना उर्दू का अखबार निकालते थे और सगे नाना शायर थे तो पढ़ने-लिखने का माहौल बचपन से ही मिला। दस साल की उम्र तक आते-आते मैं पत्रिका और उर्दू अखबार पढ़ने-समझने लगा था। इसके बाद बाल पत्रिका में भी रुचि होने लगी और बनारस के अखबारों में जो बच्चों का पेज होता था, उसमें मेरी कविताएं छपने लगीं। इसके बाद मेरी रुचि लेखन में होने लगी और 15 साल का जब हुआ तो संपादक के नाम पत्र छपने लगे। साल 1971 में जब बांग्लादेश की मुक्ति का आंदोलन हुआ तो मेरी कविता ‘आज‘ अखबार में छापी गई। इसके बाद एक और अखबार ‘सन्मार्ग‘ में स्पोर्ट्स पर मेरे लेख आने लगे।

इसके बाद एक जानकार वकील ने अपना अखबार शुरू किया और मैं उस जगह काम करने लगा। एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि वहां के संपादक ने काम छोड़ दिया, उसके बाद मैंने उस जिम्मेदारी को निभाया और सिर्फ 19 साल की उम्र में तीन साल तक संपादक की हैसियत से उस अखबार को निकालता रहा। जहां तक बात पत्रकार बनने की है तो मैं साफ इस बात को कहता हूं कि मुझसे सरकारी अफसरी नहीं हो सकती थी, इसलिए या तो मैं शिक्षक बनता या मैं पत्रकार बनता। उन दिनों मैं अखबारों में नौकरी भी ढूंढ रहा था और बच्चों को पढ़ाता भी था। एक दिन मेरे एक शिष्य विजय ने जो होजरी की दुकान करता था, मुझे एक विज्ञापन के बारे में बताया जो टाइम्स ग्रुप का था। उसके बाद 30 पैसे के एक लिफाफे के अंदर मैंने 1000 शब्दों का एक लेख भेज दिया। इसके बाद मुझे दिल्ली बुलाया गया और मैं पहली बार उसी सिलसिले में दिल्ली आया। फाइनल इंटरव्यू मुंबई में हुआ और इस तरह मेरी ‘टाइम्स ग्रुप‘ के साथ यात्रा शुरू हुई और इसका पूरा श्रेय उस होजरी वाले मेरे शिष्य विजय को देता हूं।

नौकरी के दौरान आपके अनुभव कैसे रहे? ‘चौथी दुनिया‘ की नींव कैसे पड़ी?

आज जिस तरह मीडिया संस्थान मोटी फीस लेते हैं, वैसा ‘टाइम्स ग्रुप‘ का नहीं था। मुझे साल 1980 में पहली नौकरी ट्रेनी के तौर पर मिली और उस दौरान मैंने बहुत कुछ सीखा। मैंने अपने दस साल उन्हें दिए। अगर वो प्रोग्राम नहीं होता तो मेरे जैसा बनारस के साधारण परिवार का लड़का आज यहां नहीं पहुंच सकता था। ‘चौथी दुनिया‘ की भूमिका ‘रविवार‘  में काम करते हुए बनी थी। उस समय मैं ‘रविवार‘ में था तो संतोष भारतीय जी भी वहीं विशेष संवाददाता की भूमिका में थे। उसी समय उन्होंने मुझे और राम कृपाल जी को इस अखबार की योजना के बारे में बताया। दरअसल, उस समय तक मेरी और राम कृपाल की जोड़ी प्रसिद्ध हो चुकी थी। राजेंद्र माथुर जी ने भी मुझे और रामकृपाल को साथ ही लखनऊ ‘एनबीटी‘ का काम देखने भेजा था। एसपी सिंह ने जब ‘रविवार‘ छोड़ दिया, तब उदयन जी को उसकी जिम्मेदारी दी गई थी। उसी दौरान संतोष जी ने हम दोनों को उदयन जी से मिलवाया। हम साथ काम करने लगे। उसी दौरान ‘चौथी दुनिया‘ की नींव पड़ी और हमने उसे सफलतापूर्वक लॉन्च किया। राम कृपाल जी न्यूज एडिटर थे और मैं अखबार की डिजाइन देख रहा था। बहुत कम समय में ही ‘चौथी दुनिया‘ लोगों के बीच प्रसिद्ध हो गया।

आपको एक बार फिर लखनऊ और फिर जयपुर भेजा गया। उसके बारे में कुछ बताइए। 

जैसा कि मैंने आपको बताया कि ‘चौथी दुनिया‘ हमने लॉन्च किया और करीब तीन साल तक मैं वहां जुड़ा रहा। उसी समय लखनऊ ‘नवभारत टाइम्स‘ में कुछ दिक्कत आ रही थी। अखबार ठीक से चल नहीं रहा था वहीं प्रतियां बिकनी भी कम हो गई थीं। संस्थान उस अखबार को बंद करने की तैयारी में था और उसी कारण माथुर जी ने मुझे और राम कृपाल दोनों को लखनऊ भेजा। जब मैंने उनसे कहा कि आप हम दोनों को कैसे न्यूज एडिटर बनाएंगे तो उन्होंने कहा कि मैं राम कृपाल और नकवी को अलग मानता ही नहीं हूं। मेरे लिए आप दोनों एक हैं और आप दोनों साथ ही काम करेंगे। उसके बाद हम दोनों ने मिलकर वहां अखबार की गुणवत्ता सुधारी और इसके बाद मैं डेढ़ साल के करीब जयपुर रहा और राम कृपाल जी दिल्ली आ गए।

आपने ‘आजतक‘  के साथ भी काम किया है। अरुण पुरी जी से पहली मुलाकात के बारे में कुछ बताएं।

दरअसल, उस समय ‘डीडी मेट्रो‘ ने ये विचार किया था कि कुछ निजी समाचार एजेंसियों को समाचार प्रसारण का मौका दिया जाए। उस समय तक प्रणव राय ‘दूरदर्शन‘ के लिए एक कार्यक्रम कर चुके थे और चुनावी कवरेज भी वो अच्छी करते थे। विनोद दुआ जी उस समय ‘परख‘ निकाल रहे थे और उसी दिशा में हिंदी में न्यूज बुलेटिन की बात निकलकर सामने आई। उसी समय ‘टीवी टुडे‘ को हिंदी का बुलेटिन मिला और अरुण पुरी जी को हिंदी की चिंता था कि वो कैसी हिंदी हो जो दर्शकों को पसंद आए! वो सहज और सरल हिंदी चाहते थे और उसी दौरान एसपी सिंह का मुझे कॉल आया, जब मैं जयपुर था। फिर मैं अरुण जी से मिला और उन्होंने शेखर गुप्ता जी से कहकर मुझसे एक अंग्रेजी पैराग्राफ का अनुवाद करवाया। उस समय शेखर जी ‘इंडिया टुडे‘ हिंदी के संपादक थे। शेखर जी ने मेरे अनुवाद को पसंद किया और इस तरह मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला और मुझे उस बुलेटिन की भाषा की जिम्मेदारी दी गई। उसी समय बुलेटिन के नाम को लेकर काफी विमर्श हुआ और जयपुर जाते समय बस में मुझे ‘आजतक‘ नाम सूझा और मैंने उसी समय नामकरण कर दिया।

आपने ‘आजतक‘ को आगे बढ़ते हुए देखा है। कुछ यादें हैं, जो आपके जहन में आती हैं?

देखिए, आज के समय में अगर ‘आजतक‘ नंबर वन बना है तो उसकी नींव एसपी सिंह ने रखी थी। उनके असमय निधन ने हम सबको घोर पीड़ा दी लेकिन जैसा कि वो कहते थे कि काम करते रहो। बाद में राहुल देव जी और उसके बाद मैं संपादक हुआ। एसपी सिंह ने ‘आजतक‘ को लोकप्रिय किया। बाद में कई लोगों ने उन्हें कॉपी करने की कोशिश की है। वो एक दिन में 17 से अधिक अखबार पढ़ लेते थे। छोटी से छोटी खबर उनको पता रहती थी। चुनावों को लेकर जो उनकी समझ थी, वो अच्छे-अच्छे बुद्धिमान लोगों को चकित कर देती थी। वो जो भी खबर पढ़ते थे, उनको पूरी समझ रहती थी कि मैं क्या पढ़ रहा हूं! उन्होंने हमे सिखाया कि व्यक्ति को समाज के हर पहलू की समझ होनी चाहिए। उसी नक्शेकदम पर चलते हुए जब मैं न्यूज डायरेक्टर बना तो मैंने वर्कशॉप का आयोजन करना शुरू किया। पत्रकार से लेकर कॉपी राइटर तक को हमने ट्रेनिंग देने का काम किया। मेरा मानना है कि इंसान को हमेशा सीखते रहना चाहिए। आज मैं डिजिटल को समझ रहा हूं और अपना काम कर रहा हूं। फोटोग्राफी सीखने का फायदा भी मुझे अखबार में मिला।

आपने एसपी सिंह और राहुल देव जैसे लोगों के साथ काम किया है। क्या आपको वर्तमान में भाषा की समृद्धि को लेकर कोई शिकायत है?

भाषा को लेकर मेरे विचार थोड़े अलग हैं। शुद्ध बोलने वालों की बजाय अशुद्ध बोलने वाले भाषा का विस्तार अधिक करते हैं। अगर शुद्धता पर अटके होते तो आज 100 साल पहले की हिंदी हम बोल रहे होते। जैसे कि ‘खुलासा‘,  इस शब्द का अर्थ एक्सपोज करना नहीं है, बल्कि किसी चीज का निचोड़ है लेकिन आज इस शब्द का अर्थ बदला चुका है। इसी तरह से भाषा बढ़ती भी है और बदलती है। हम किसी भी भाषा को खूंटा बांधकर नहीं रख सकते हैं। हिंदी आज जो है, वो कल नहीं रहेगी। जहां तक बात टीवी की है तो सोशल मीडिया ने थोड़ा उसका आकर्षण कम कर दिया है। टीवी डिबेट में जो हो रहा है, वो समय की मांग है लेकिन आज नहीं तो कल ये चीज बदल जाएगी। आपको टीवी को जीवित रखने के लिए कुछ अच्छा करना पड़ेगा।

आपकी रुचि क्या है? भविष्य में क्या योजनाएं हैं?

मेरी रुचि तो आती-जाती रहती है। पढ़ना, लिखना और फोटोग्राफी तो हमेशा से शौक रहा है। इसके अलावा ज्योतिष में भी रुचि जागी है। स्टॉक मार्केट की भी समझ आ गई है। डिजिटल मीडिया की कई चीजें आजकल मैं सीख रहा हूं। भविष्य का कुछ सोचना नहीं है, बस जो करना है अच्छा करना है और पहले से बेहतर करना है।

समाचार4मीडिया के साथ कमर वहीद नकवी की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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