अखबारों को अपनी कीमतों पर एक बार फिर गौर करना पड़ेगा: शशि शेखर

मीडिया के क्षेत्र में ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर का काफी नाम है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में शशि शेखर ने अपने जीवन और कार्य से जुड़ी तमाम बातें साझा की हैं।

Last Modified:
Monday, 19 April, 2021
Shashi Shekhar

मीडिया के क्षेत्र में ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर का काफी नाम है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में शशि शेखर ने अपने जीवन और कार्य से जुड़ी तमाम बातें साझा की हैं। इसके साथ ही उन्होंने आने वाले समय में प्रिंट मीडिया की चुनौती और अखबारों के भविष्य पर भी चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए?

पिताजी बनारस में सरकारी अधिकारी थे, मैं वहीं पैदा हुआ। पिताजी का ट्रांसफर देवरिया होने के कारण मेरी स्कूलिंग वहां हुई, फिर पिताजी मिर्जापुर आ गए और वहां भी मेरी स्कूल की कुछ यादें हैं। इसके बाद इलाहबाद, आगरा और मैनपुरी भी शिक्षा अर्जित की। बाद में उन्होंने बीएचयू जॉइन किया तो मैंने वहीं से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एमए किया।

आपने भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एमए किया तो मीडिया में आपका कैसे आना हुआ?

जी बिल्कुल, मैंने इस बारे में सोचा नहीं था और हमारे घर में मीडिया को लेकर भी कोई अच्छी बात नहीं होती थी लेकिन मैं छोटी उम्र से ही लिखने लगा था। मेरे कुछ लेख नवभारत टाइम्स में भी प्रकाशित हुए और उसके बाद आज अखबार के प्रॉपराइटर श्री शार्दुल विक्रम गुप्त ने मेरे लेख पढ़कर सोचा कि ये कोई अनुभवी आदमी हैं, जो बनारस से लिख रहे हैं। उन्होंने हमारे संपादक राममनोहर पाठक जी से बात की तो उन्होंने बताया कि ये तो 20 साल का लड़का है और एमए में पढ़ता है। मैं उनसे मिलने गया और उन्होंने मुझसे कहा कि आप अखबार में काम कर लीजिए। उस समय मैंने मना कर दिया लेकिन नियति अपना काम करती है। इसके बाद उन्होंने वापस मुझे बुलाया और उसके बाद मैंने हां कर दी और आप देखिए कि अगले बीस साल तक मैं उस अखबार के लिए काम करता रहा।

समय कभी एक सा नहीं रहता है और बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो समय के साथ चले, आप अपने समय में और आज के समय में कितना अंतर पाते हैं?

आपने सही कहा कि समय कभी एक सा नहीं रहता है लेकिन मेरा यह मत है कि अगर आदमी ईमानदार और समझदार है और परख रखता है तो उसे कभी कोई कठिनाई नहीं होगी। जीवन में हंसी और गम तो एक चक्र में की तरह हैं और बाद में कहानियां बनती हैं लोगों की, लेकिन कहानियों में मेरा यकीं नहीं है। एक यात्रा है 40 वर्ष की जो मैं करता रहा और आज इस मुकाम तक आ गया हूं।

एक समय ऐसा था, जब नौकरी जरूरी लगती थी क्योंकि बच्चे छोटे थे लेकिन अब वो बड़े हो गए हैं और अपना काम करने लगे हैं तो अब लगता है कि किसी के काम आ सकूं, कुछ लोगों के जीवन में बदलाव ला सकूं। आज मेरे साथी कोरोना की वजह से बहुत तनाव में थे और मैंने उन्हें दफ्तर बुलाया और उनसे बात की। मुझे ऐसा लगा कि आज मैंने जीवन का एक सार्थक दिन जीया, जब मैंने किसी की पीड़ा और दुःख को अनुभव किया और उसे दूर करने की कोशिश की। बस इससे अधिक मैं कुछ नहीं सोचता।

वहीं, मैं तब और आज के माहौल में कोई अंतर नहीं पाता, बस तकनीक बदल जाती है। उस समय के प्रिंट मीडिया में और आज के प्रिंट मीडिया में तकनीक का बड़ा अंतर आ गया है लेकिन अखबार के डिजाइन में बैलेंस होना चाहिए, अगर उसको जरा भी इधर-उधर करोगे तो बैलगाड़ी की भांति वो उल्टी टंग जाएगी। आज हम दुनिया के सबसे बड़े डिजाइनर के साथ बैठकर अखबार को रीडिजाइन कर रहे हैं। इससे पहले भी आज से 11 साल पहले मैंने अखबार को डिजाइन करवाया था। गुण और ज्ञान किसी डिग्री से नहीं आते हैं।

पत्रकारिता का मूल तत्व है सच बोलना, आज कौन कह रहा है कि उसमे घालमेल करो?, दरअसल पत्रकार बदल गए हैं। पत्रकारिता वही है और कुछ खास लोगों के बदल जाने से एक अजीब सी मंडी हो गई है। हर आदमी चिल्ला रहा है।

पिछले कुछ सालों से प्रिंट मीडिया के सामने डिजिटल से चुनौती उभरकर आ रही है। इस दिशा में आपका अखबार क्या काम कर रहा है?

साल 1995 की मैं आपको बात बताता हूं, जब फटाफट न्यूज चैनल्स का दौर नहीं था और उस समय मोबाइल भी उतने प्रचलन में नहीं थे। उस समय एक बहुत बड़े व्यक्ति ने मुझसे कहा कि शशि जी, आप खुद को अखबार से अलग कर लीजिए, आने वाले समय में इसका कोई भविष्य नहीं है। उन्होंने पर्यावरण का तर्क देते हुए मुझसे ये बात कही थी। उसके बाद साल 2000 आया और मेरे पास एक 24 घंटे के न्यूज चैनल का ऑफर था।

मैंने वहां काम करना शुरू किया और वहां भी यही सोच थी कि अखबार खत्म हो जाएंगे लेकिन उसके ठीक डेढ़ साल बाद ही मैं एक अखबार में काम करने चला गया और वो भी आधी सैलरी पर, क्योंकि जैसी पत्रकारिता में करना चाह रहा था वो मैं कर नहीं पा रहा था। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि टीवी में ये काम ठीक से नहीं किया जाता है। वो अखबार आठवें नंबर पर था और उसके मालिक भी मुझसे यही कहते थे की अखबार का कोई भरोसा नहीं है भविष्य नहीं है।

हमने कोशिश की और वो देश के तीसरे नंबर का अखबार बन गया। फिर मैं इस अखबार में आया और मुझे बहुत बढ़िया टीम मिली और इतना समय बीत जाने के बाद भी अखबार है। हां, समय बदलता है। मैं कश्मीर में था और वहां मैंने किसी के हाथ में अखबार नहीं देखा। डिजिटल माध्यम बढ़ रहा है। आने वाले समय में विज्ञापन का माध्यम भी बदल जाएगा। अखबारों की मृत्यु मीडियम की मृत्यु नहीं होगी बल्कि सिस्टम की मृत्यु होगी। तकनीक के परिवर्तन के साथ मीडियम बदल जाएगा लेकिन मीडिया वही रहेगा।

तेजी से बढ़ते डिजिटल मीडिया में फेक न्यूज एक बहुत बड़ी समस्या है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

इस देश में नारेबाज बहुत हो गए हैं और उनका यह धंधा बन गया है। पत्रकारिता में उन्होंने कोई काम किया है या नहीं इसका उन्हें कोई ज्ञान नहीं है लेकिन दूसरों के बारे में उन्हें बहुत ज्ञान है। अगर फेक न्यूज है तो ऐसे में सही न्यूज बोलने वाले की कद्र बढ़ती है। बाजार का दस्तूर है कि असली सिक्कों की आड़ में खोटे सिक्के चल जाते हैं। अगर सिर्फ खोटे सिक्के चलेंगे तो बाजार बंद हो जाएगा। आज जो योग्य है, उसके लिए काम की कोई कमी नहीं रह गई है, कमी उन लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी कोई पहचान नहीं बनाई है।

कुछ सालों में मीडिया में निगेटिव चीजे हुई हैं, गोदी मीडिया जैसी शब्दावली इस्तेमाल की जा रही है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

मेरा मानना है कि ये यात्रा है और यात्रा में इससे भी पहले कठिन समय आया है। यात्रा में कई मोड़ आते हैं और अगर किसी को तकलीफ है तो उसे हक है अपनी तकलीफ बयान करने का, कुछ लोगों का तो काम ही है तकलीफ को बोलना जैसा कि मैं आपसे पहले कह चुका हूं। मेरा ये मत है कि इस यात्रा में ये जो पड़ाव है वो भी गुजर जाएगा और जिस तरह कोरोना के बाद लोगों ने अपने जीने का रास्ता ढूंढा और अपने जीवन में बदलाव किए, ठीक उसी तरह से मीडिया भी अपना रास्ता बना लेगा।

हमने कोरोना का एक भयावह दौर देखा और उसके बाद प्रिंट मीडिया में चीजें किस तरह से बदली हैं?

कोरोना का प्रिंट मीडिया पर बड़ा असर हुआ और कई साथियों को उसकी वजह से तकलीफ भी उठानी पड़ी। लेकिन आज के समय की बात करें तो अखबारों का वो बुरा दौर बीत गया है। विज्ञापन भी वापस आ रहे है। लेकिन ये बुरे दिन वापस भी आ सकते हैं इसलिए उनको अपनी कीमतों पर एक बार फिर गौर करना पड़ेगा। रीडर से सीधे संवाद करना होगा और उसे यह समझाना होगा कि हम क्यों अखबार की कीमत बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा डिजिटल कंटेंट जो फ्री है उससे भी बड़ी परेशानी है।

ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने न्यूज पब्लिशर्स के हक में जो निर्णय लिया है क्या ऐसा कार्य भारत सरकार को भी करना चाहिए?

बिल्कुल करना चाहिए। अगर आज कोई इतना समय लगा रहा है और वही कंटेंट कोई अगर फ्री उठाकर डाल दे तो ये गलत है। उसके बाद फेक न्यूज वाले अपने हिसाब से उसे गलत तरीके से वायरल अगर कर दें तो नुकसान है। इसलिए गूगल को भारत में भी कंटेंट पब्लिशर्स को पैसे देने चाहिए। 

आपने मीडिया में एक लंबा सफर तय किया है और कई बड़े इंटरव्यू भी किए है। कोई ऐसा किस्सा जो आपको आज भी याद आता है?

श्रीमती इंदिरा गांधी अचानक से इलाहबाद में 1983 में आईं और उस वक्त मैं रिपोर्टर था। उस समय सिर्फ 4 या 5 रिपोर्टर ही होते थे। मुझे पता चला कि वो प्रोग्राम अचानक से ही बन गया था और किसी को खबर नहीं थी। उस समय पीएम इंदिरा के साथ सिर्फ दो ही लोग थे। गेट पर पुलिस वालों ने हमको रोक दिया। हम कुछ चार पांच थे और हमने कहा कि अरे मिश्रा जी, जरा इंदिरा जी से मिलवाइए। बाद में वो अंदर चले गए और हम सब बाहर खड़े रहे। कुछ देर बाद इंदिरा जी बाहर निकलीं और गाड़ी में बैठने लगी। लेकिन हमारी ओर उन्होंने देखा और इशारे से हमको बुलाया। मैं सबसे आगे था और मैंने चार सवाल सोचे हुए थे जो उनसे पूछे। उसके बाद उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा कि तुम ब्यूरो चीफ हो? अच्छा, दिखने में तो  कॉलेज के लगते हो, क्या उम्र है? उसके बाद मैंने जवाब दिया कि 23 साल। उन्होंने फिर मुझसे कहा कि अरे 23 साल की उम्र में ब्यूरो चीफ! अच्छा बताओ तुमने पंडित जी की किताबें पढ़ी हैं? मैंने कहा कि जी, मैंने पढ़ी हैं। उन्होंने फिर मुझसे कहा कि ये मैं तुमसे इसलिए नहीं कह रही कि वो मेरे पिता थे बल्कि इसलिए कह रही हूं क्योंकि वह पत्रकार थे। उसके बाद मुझसे कहा कि खूब पढ़ा लिखा करो और मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझसे कहा कि थोड़ा कसरत किया करो, बहुत पतले हो। मैं उस स्तर का पत्रकार नहीं था और सिर्फ दिल्ली वाले उनसे मिलते थे, लेकिन ये मेरा अनुभव यादगार है।

इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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पत्रकार का लक्ष्य सिर्फ खबर देना हो, न कि अपनी राय थोपने का: राहुल महाजन

समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में राहुल महाजन ने तमाम मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात राय रखी है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

Last Modified:
Saturday, 31 July, 2021
Rahul Mahajan

राहुल महाजन को मीडिया के क्षेत्र में काम करने का करीब 28 साल का अनुभव है। इनमें से 25 साल उन्होंने अलग-अलग मीडिया संस्थानों में काम किया है। वह ‘प्रसार भारती’ में कंसल्टिंग एडिटर भी रह चुके हैं। वर्तमान में 'दूरदर्शन' में कंटेंट ऑपरेशंस हेड के तौर पर अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे राहुल महाजन ने समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में तमाम मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात राय रखी है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन और शिक्षा के बारे में कुछ बताइए! पत्रकार बनने का ख्याल कैसे आया?

मेरी स्कूली शिक्षा शिमला में हुई और बचपन भी वहीं गुजरा है। मेरे पिता ऑल इंडिया रेडियो (AIR) में थे और वहीं से डायरेक्टर पद से वह रिटायर हुए। मेरे मन पर जो सबसे पहला प्रभाव था, वो मेरे पिता का ही था। मेरे पिता न सिर्फ बहुत पढ़ते थे, बल्कि उन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान था। उनके लेख भी नियमित तौर पर छपते थे और मैं अपनी बहन के साथ बचपन में वो खूब पढ़ता था।

वेद, पुराण और हिंदू धर्म पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी तो वो सब मेरे मन पर गहरा प्रभाव डालते थे। वैसे मैं आपको बता दूं कि मेरी कॉलेज की पढ़ाई विज्ञान विषय में हुई थी लेकिन मेरी बड़ी बहन के पत्रकार बन जाने के बाद अब मुझे भी पत्रकार बनने की इच्छा सताने लगी थी।

उसके बाद वहीं रहकर मैंने एक पत्रिका में लिखना शुरू कर दिया था। उसके बाद मैंने भी पत्रकारिता की पढ़ाई की और दिल्ली आ गया। यहां आने के बाद भी मुझे मेरी बहन ने बड़ा सहयोग किया।

पढ़ाई के दौरान मेरी पहली इंटर्नशिप ‘द स्टेट्समैन‘ में हुई। उसके बाद मुझे पहली नौकरी ‘जनसत्ता‘ में मिली, जहां राहुल देव एडिटर थे। उसी दौरान प्राइवेट टीवी चैनल्स  मार्केट में आने लगे थे तो मेरे एक पुराने सहयोगी की मदद से ‘जी न्यूज‘ में नौकरी मिली और वहां राधिका कौल बत्रा जी से मैंने बहुत कुछ सीखा।

दरअसल, मुझे न्यूज में नहीं, बल्कि टीवी प्रोग्रामिंग में नौकरी मिली थी तो कैसे प्रोग्राम बनता है और क्या उसकी बारीकियां होती हैं, ये सब मुझे ‘जी न्यूज‘ में काफी अच्छे से सीखने को मिला। उसके बाद मुझे न्यूज में शिफ्ट किया गया और उसके बाद चीजें आगे बढ़ती गईं और सफर आगे बढ़ता रहा।

आपने लगभग 12 साल तक संसद को कवर किया है। उस सफर के बारे में कुछ बताइए।

ये बड़ा रोचक सफर रहा है। आप देखिए कि आज जो पीढ़ी मीडिया में आ रही है उनमें से अधिकतर की सोच यही है कि वो ग्लैमर वर्ल्ड को कवर करें, फेमस हो जाएं, उनका चेहरा सबको दिखाई दे लेकिन मेरी सोच उससे अलग थी।

शुरू में मुझे फैशन कवर करने को ही मिला था। इसके बाद मुझे क्राइम, स्पोर्ट्स जैसी बीट भी कवर करने को मिलीं। मुझे राजनीतिक पत्रकारिता करने का मौका देर से मिला, लेकिन मिल गया था। मुझे वामपंथी दलों को कवर करने का मौका मिला था। उस समय की राजनीति को आप देखें तो बड़ी हलचल रहती थी, तो मेरी कई स्टोरी छपती थीं।

उसके बाद धीरे-धीरे मुझे सत्ताधारी दलों को कवर करने का मौका मिल गया और आखिरकार मुझे संसद कवर करने का मौका मिला, जहां मैंने काफी कुछ सीखा।

वैसे कई लोग यह भी सोचते हैं कि अगर हम राजनीतिक पत्रकारिता करेंगे तो हमारे बड़े-बड़े लोगों से संबंध बन जाएंगे तो ये ठीक नहीं है, बल्कि देश की राजनीति की समझ रखने के लिए ऐसा करना चाहिए, ताकि आप लोगों को सही और गलत का मतलब समझा सकें।

संसद कवर करने के दौरान का अनुभव कैसा रहा? कोई घटना या किस्सा हमें बताना चाहेंगे?

अनुभव और किस्से तो ढेर सारे हैं। जब मैं आजतक’ में रहते हुए संसद कवर करता था तो आपस में ही प्रतिस्पर्धा होती थी कि कौन सबसे पहले खबर लेकर आएगा। एक किस्सा मुझे याद आता है कि एक केंद्रीय मंत्री को हटाने की बात चल रही थी तो ’आजतक ’ में मेरे सहयोगी ने कहा कि उन्हें नहीं हटाया जाएगा और मेरा कहना था कि उन्हें हटाया जाएगा।

हालांकि बाद में उन्हें हटा दिया गया था। इसके बाद एक और दिलचस्प बात मैं आपको बताऊं कि सांसद कई बार जब अच्छा भाषण देते थे तो प्रेस गैलरी की तरफ हाथ हिलाकर और मुस्कराहट के साथ देखते थे।

 ये वो दौर था, जब तमाम सांसदों को टीवी पर दिखने का बड़ा शौक था। इसके अलावा नेताओं से मिलना, सांसदों से मिलना उनकी बातों को समझना, ये सब अनुभव वाकई में दिलचस्प रहे।

इसके अलावा जब संसद पर हमला हुआ था उसको कवर करने वाले जानते हैं कि कितनी पीड़ा और दर्द के साथ वो कवर किया गया। कई ऐसे लोकसभा स्पीकर भी हुए, जिनसे बड़े अच्छे संबंध बन गए थे और आज भी स्मृति पटल पर वो अंकित हैं।

आज 24 घंटे के टीवी चैनल का दौर है, कई बार गलत चीजें भी चल जाती हैं तो क्या आपको लगता है कि वर्तमान समय में टीवी की विश्वसनीयता में कमी आ रही है?

टेलीविजन के बारे में आप कह सकते हैं कि टीवी ने बड़े दौर देखे हैं। एक दौर वो भी था, जब सिर्फ न्यूज पर ही फोकस किया जाता था। उसके बाद ’भूत-प्रेत’ जैसी चीजें भी लोग दिखाने लगे और हर न्यूज को जरूरत से अधिक खींचा जाने लगा और ऐसे पहलू भी दिखाए जाने लगे, जो कि आवश्यक नहीं थे।

इसके बाद वापस एक बार खबरों का दौर आया है। उसे अच्छे ढंग से पेश करने का दौर आया है, लेकिन एक चीज की कमी मुझे दिखाई देती है और वो है पत्रकारिता, आज टीवी पत्रकारिता उस दौर वाली नहीं रह गई है, जिसे हम सुनहरा दौर कहते हैं। मुझे आज जूनून कम और स्वार्थ अधिक दिखाई देता है और मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में ये चीजें बदलेंगी।

राज्यसभा टीवी की अलग पहचान है और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे युवा भी उसे देखते हैं, आप तो वहां संपादक रहे तो कैसे ये सब संभव हुआ?

राज्यसभा टीवी अपने आप में एक यूनिक प्लेटफार्म है और अगर ये जिंदा रहता है तो कंटेंट के मामले में ये बहुत आगे जाएगा। आप देखिए कि जितने भी युवा हैं वो सब नॉलेज के लिए राज्यसभा टीवी को देखना पसंद करते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि ये सूचना का एक ऐसा माध्यम है, जो देश ही नहीं बल्कि विदेशी मामलों में भी आगे रहता है। कोई भी ऐसा विषय नहीं होगा, जिस पर राज्यसभा टीवी विशेष कार्यक्रम न करता हो।

एक और खास बात मैं आपको बता दूं कि राज्यसभा टीवी के यूट्यूब चैनल पर टीवी से अधिक विजिटर हैं और पांच मिलियन सबस्क्राइबर्स का आकंड़ा मेरे ही कार्यकाल में पूरा हुआ था। इससे एक चीज और साबित होती है कि अगर आप दर्शकों को सही फॉर्मेट में सही जानकारी देते हैं, वो उसे हाथों हाथ लेता है।

वैसे इस बात पर जरूर बहस हो सकती है कि कैसे एक व्यक्ति अच्छा कंटेंट देख रहा है और कैसे कोई डिबेट का शोर या नाग नागिन का नाच देख रहा है। दरअसल, सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है और हर व्यक्ति उसी हिसाब से चीजों को देखना पसंद करता है।

देश में जब भी न्यूज की बात आती है तो जहन में ’दूरदर्शन ’ का ही नाम आता है। भविष्य में इसके विस्तार के लिए क्या योजना बन रही है?

हाल में न्यूज एजेंसी ’रायटर्स ’ के सर्वे में भी ये साबित हो गया है कि खबरों की प्रामाणिकता की जब बात आती है तो बाकी चैनल्स दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते हैं। वहीं ’प्रसार भारती’ के सीईओ भी लगातार अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से नई-नई अपडेट देते रहते हैं। ’दूरदर्शन ’ एक बड़ा मंच है और इसके खुद कई प्रादेशिक चैनल्स भी हैं।

इसी कड़ी में अब एक इंटरनेशनल चैनल लाने की तैयारी है, वहीं जो प्रादेशिक चैनल्स है, उन्हें भी बढ़ाने की बात की जा रही है। इसके अलावा ’दूरदर्शन ’ अपने सारे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को बड़ी तेजी से आगे बढ़ा रहा है। ’प्रसार भारती’ न्यूज सर्विस ने हाल ही में एक मिलियन सबस्क्राइबर्स का आकंड़ा पार किया है।

वर्तमान समय में गोदी मीडिया और एजेंडा पत्रकारिता जैसे शब्द इस्तेमाल हो रहे हैं। क्या आप इन सब चीजों को सही मानते हैं?

पत्रकार को सिर्फ एक पत्रकार की तरह लिया जाना चाहिए और इस प्रकार के शब्द ठीक नहीं हैं। ये तो हमें विचार करना होगा कि हम किस तरह का काम करना चाहते हैं। पहला, या तो हम अपनी राय को न्यूज में ले आएं और दर्शक की राय बना दें या फिर अपनी राय को अलग रखकर सिर्फ दर्शक को खबर दिखाएं और उसे तय करने दें कि क्या सही है और क्या गलत है?

मेरा मत यह है कि एक पत्रकार को कभी भी न्यूज के अंदर अपनी राय नहीं देनी चाहिए। एक पत्रकार का लक्ष्य सिर्फ इतना होना चाहिए कि कैसे उसके यूजर की जानकारी बढ़े और कैसे वो न्यूज को समझे, बाकी उसी न्यूज के अंदर अपनी राय को डाल देना मैं ठीक नहीं मानता हूं। आप जनता को न्यूज दीजिए और उसके फैक्ट्स दीजिए, बाकी जनता खुद समझदार है यह तय करने के लिए कि सही क्या है और गलत क्या है।

इसके अलावा आज के मीडिया में फैक्ट चैक की कमी को मैं बड़ी समस्या मानता हूं, दरअसल हमें ये तय करना होगा कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल हम कैसे करें? सोशल मीडिया का इस्तेमाल किसी की छवि को बिगाड़ने के लिए फेक न्यूज के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि ये तय करना चाहिए कि कैसे लोगों तक सही और सटीक जानकारी पहुंचे।

समाचार4मीडिया के साथ राहुल महाजन की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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आप चाहे पत्रकार हों या संपादक, कभी मूल्यों से समझौता नहीं होना चाहिए: आलोक मेहता

वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष आलोक मेहता (पदमश्री) ने समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में अपने अनुभव साझा किए हैं।

Last Modified:
Wednesday, 28 July, 2021
Alok Mehta

वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष आलोक मेहता (पदमश्री) किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्हें मीडिया जगत में काम करने का 50 वर्षों से भी अधिक का अनुभव है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में उन्होंने अपने अनुभव साझा किए हैं। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश

आपका मीडिया में इतना लंबा अनुभव रहा है, अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए।

सफर तो लंबा रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन आज भी युवाओं से कुछ न कुछ सीखता रहता हूं। अपने शुरुआती दिनों की बात करूं तो मैं एक छोटे से गांव में पैदा हुआ और वहां कोई सुख सुविधा नहीं थी।

पिता शिक्षक थे तो उसी कमरे में सोते थे, जहां कक्षा लगती थी। एक छोटा सा कमरा था. जिसमें मेरी मां खाना बनाती थीं। मेरे दादाजी 1952 में निर्दलीय चुनाव लड़े थे और उनकी अच्छी खासी खेती भी थी।

उसके बाद उज्जैन आने का मौका मिला और कॉलेज में ड्रामा और डिबेट के माहौल से पत्रकारिता में रुचि जाग्रत हुई। उसके बाद मैं ‘हिन्दुस्तान‘ और ‘नई दुनिया‘ का स्ट्रिंगर बना। उसके बाद ‘नई दुनिया‘ में नौकरी भी मिल गई लेकिन दिल्ली जाने की मन में थी। साल 1971 में दिल्ली आना हुआ और इस तरह दिल्ली में मेरा सफर शुरू हुआ।

आपने बताया कि वर्ष 1971 में आप दिल्ली आ गए थे तो यहां किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?

जब मैं ‘नई दुनिया‘ जैसे अखबार की नौकरी छोड़कर आया तो ये सोचकर आया था कि जो संघर्ष भी करना होगा, उसे करेंगे। दिन में एक वक्त रोटी से गुजारा करना पड़े तो भी करेंगे, उस उम्र में एक अलग तरह का स्वाभिमान होता है।

मैंने उस समय कई एजेंसियों में काम किया और पत्रिकाओं में भी नियमित तौर से लिखता रहा। उसी दौर में काफी कम उम्र में न सिर्फ बड़े-बड़े नेताओं को कवर करने का मौका मिला बल्कि संसदीय रिपोर्टिंग करने का मौका भी मिला। 1973 का वो साल था जब ‘धर्मयुग‘ में सीबीआई को लेकर पहली कवर स्टोरी मैंने लिखी थी, जो आज भी मेरे पास रखी हुई है। इसके अलावा शुरू से ये अच्छी चीज ये रही कि मेरे किसी भी लेख को लेकर अगर संपादक को या किसी और को ये लगता था कि इसमें कोई कमी है तो मैं फिर से लिखता था।

कामचोरी मेरे जीवन में कभी नहीं रही, इसलिए काफी कम उम्र में ही तमाम संपादक मुझे पसंद करने लगे थे। पत्रकार का सबसे बड़ा गुण यही होता है कि वो अपने लेख पर मोहित नहीं हो।

आपने कम उम्र में ही पत्रकारिता में कदम रखे और बाद में संपादक भी बने, एक पत्रकार के संपादक बनने के बाद क्या अंतर आता है?

जैसा कि मैंने आपको बताया कि कम उम्र में ही मैं संपादकों का प्रिय हो गया था। इसके अलावा अखबार के मालिकों से भी अच्छे संबंध थे। आपातकाल के दौरान ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ के साथ भी काम किया, जिनसे सरकार नाराज थी।

‘हिंदुस्तान‘ में जब था तो उस समय मनोहर श्याम जोशी जी ने विदेश घूमने की छूट दी। उसके बाद जर्मनी रेडियो की हिंदी सेवा में संपादक बनने का मौका मिला था।

करीब तीन साल वहां काम करने के बाद 1988 में ‘नवभारत टाइम्स‘ पटना संस्करण में संपादक बनने का मौका मिला। उसके बाद दिल्ली एडिशन की भी जिम्मेदारी मिली। उसके बाद ‘हिंदुस्तान‘ का संपादक बनने का मौका मिला। आप चाहे पत्रकार हों या संपादक हों, कभी भी मूल्यों से समझौता नहीं होना चाहिए।

मैंने हर पीएम की आलोचना भी लिखी है और उनसे मिलता भी रहा हूं, कई से तो सम्मान भी प्राप्त किए हैं। पूर्व पीएम मनमोहन जी के समय में कैसे अनिल अंबानी जैसे लोग साउथ ब्लॉक जाते रहे, उसकी खबरें भी छापी हैं।

आप लालू यादव जी का उदाहरण ले लीजिए कि जब चारा कांड हुआ तो सबसे पहले ‘नवभारत‘ ने उसको छापा। संपादक का लक्ष्य किसी को हटाना नहीं होना चाहिए बल्कि जनता के सरोकार से जुड़कर और बिना किसी पूर्वाग्रह के न्यूज देनी चाहिए। 

मैंने अटल जी के साथ खूब यात्राएं कीं, लेकिन गोविंदाचार्य की डायरी भी मैंने ही उजागर की थी। संपादक बनाए जाने को मैं एक गौरव की तरह लेता हूं और अपने पूर्वजों के प्रति भी मैं अनुग्रहीत हूं कि उन्होंने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं उनकी उम्मीदों को पूरा कर सका।

मेरे पास हो सकता है कि बड़ी गाड़ी नहीं है, बंगले नहीं हैं, लेकिन अपने काम के प्रति ईमानदारी रही है। जब आप पीएम से मिलने जाते हैं या ओबामा से मिलने जाते हैं तो कोई ये नहीं देखता कि आप कितने धनी है! संपादक अपने काम के प्रति ईमानदार रहे, यही मेरा मत है।

अक्सर देखा जाता है कि संपादक पर नेताओं और कॉरपोरेट्स का दबाब रहता है। क्या आपने कभी कोई ऐसा दबाब महसूस किया?

इंसान जब इस दुनिया में आता है तो खाली हाथ आता है और जाता भी खाली हाथ है। इसे आप मेरा सौभाग्य कह लीजिए या मेरी ईमानदारी कि मैंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

पटना की शुगर मिल हो या चंद्रास्वामी पर मेरी स्टोरी हो, इन पर कभी भी संस्थान की ओर से मुझ पर दबाब नहीं आया। मेरे बीजेपी और कांग्रेस के सभी नेताओं से अच्छे संबंध रहे, लेकिन मैंने लगभग सबके बारे में कुछ न कुछ लिखा।

नरसिम्हा राव हों या अटल जी, कभी भी उस दौर में मेरे ऊपर किसी भी प्रकार का कोई दबाब नहीं बनाया गया। विनोद मेहता जी हों या कोई और हो, मुझे स्वतंत्र रूप से कार्य करने का मौका मिला है। हालांकि कई बार यह दबाब होता है। विनोद मेहता जी को नेताओं के दबाब के कारण ही मुंबई छोड़कर दिल्ली आना पड़ा था।

सरकार का दबाब भी कई बार आता है, पेड न्यूज पहले भी थी और आज भी है। बस ये हो सकता है कि पहले पैसा कम मिलता था और अब पैसा अधिक मिल रहा है। 

आपने मीडिया में पेड न्यूज को लेकर हमेशा आवाज उठाई है। आपको ऐसा क्यों लगता है कि मीडिया और राजनीति का यह गठजोड़ समाज के लिए ठीक नहीं है?

इसे आप ऐसे समझें कि आप नॉनवेज नहीं खाते हैं लेकिन आपके बगल में ही बैठकर अगर कोई खा रहा है तो उसका अर्थ यह तो नहीं है कि आप उसे देखते रहें। मैं तो ऐसे कई नेताओं को जानता हूं जो उनके पक्ष में रिपोर्टिंग करने के लिए बढ़िया कीमत देते थे, लेकिन आप अपने आप को उससे बचाए रखें तो बेहतर है। वैसे अच्छी चीज ये है कि आज की जनता ये सब जानने और समझने लगी है।

आप दोनों विरोधी लोगों की जब तारीफ़ लिखते हैं तो जनता समझ जाती है कि सही क्या है और गलत क्या है! मैं प्रेस काउंसिल में रहा और एडिटर्स गिल्ड में अध्यक्ष पद पर कार्य किया और उस समय भी इस बात को बड़ी प्रमुखता से मैंने उठाया था।

संपादक हो या पत्रकार, सबको अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी चाहिए। अगर आपकी कमाई 50 हजार रुपये महीना है तो करोड़ों के बंगले कहां से आए? पारिवारिक संपत्ति है तो वो भी सामने आए। कुछ नियम होना जरूरी है।

आपने मीडिया में इतने लंबे समय तक काम किया है और कई खुलासे किए हैं। क्या कभी आपको कोई धमकी मिली है?

देखिए, ये तो पेशा ही ऐसा है, जिसमें जान हथेली पर रखकर चलना होता है। अगर याद करूं तो जीवन में ऐसे अवसर आए हैं। जब मेरे मीडिया के सफर की शुरुआत ही हुई थी तो उस समय ‘नई दुनिया‘ में रहते हुए एक संस्कृत स्कूल पर मैंने स्टोरी की थी। दरअसल, उस स्कूल में अखबार पढ़ने पर रोक थी और उस पर काफी हंगामा हुआ था।

जब ‘नवभारत‘ में था तो एक स्टोरी करने पर एक नेता ने इतना तक कह दिया था कि ट्रक से कुचलवा देंगे। उस समय सिंधिया जी ने मुझसे कहा था कि आप घबराइए मत, ऐसा कुछ होने नहीं देंगे।

एक बार तो लालू यादव पर कुछ छाप दिया तो पता चला कि आधी रात को हिरासत में लेने की तैयारी हो चुकी थी। एक नेता का और मौका आया जिनका नाम तपेश्वर सिंह था। कुछ आर्थिक मामलों की खबर छापी थी तो उनके बेटे पिस्तौल लेकर घर आ गए थे। जब मैंने उनको पूरा मामला समझाया तो वो फिर चले गए थे।

क्या आपको लगता है कि वर्तमान में मीडिया स्वतंत्र नहीं है? नए आईटी नियमों पर आपकी क्या राय है ?

नियम अगर आए हैं तो सबसे पहले यह देखना होगा कि गड़बड़ कहां है? जैसे पत्रकारों पर राजद्रोह के मामले पर हमने खुलकर कहा कि ये ठीक नहीं है। हां,  जहां तक नियम की बात है तो हर पेशे की कोई न कोई लक्ष्मण रेखा होती है, जिसे खींचना जरूरी है। अगर आप कोई गलत काम नहीं करते हैं या कहीं से फंडिंग लेकर गलत नहीं कर रहे हैं तो नियम से समस्या क्यों हो?

मेरा तो यह भी कहना है कि प्रेस काउंसिल के पास भी कुछ अधिकार होने चाहिए। मैं आपको बताऊं कि जब मैं 26 साल का था तो विदेश गया था, उसके पीछे कारण ये था कि मुझे लगता था देश में सेना का अधिकार हो जाएगा।

उस वक्त जनता पार्टी टूट के कगार पर थी और पड़ोसी मुल्कों का हाल हम देख ही रहे थे। इसलिए मेरा मत है कि एक सीमा के बाद अधिकार तय होने चाहिए।

आप सरकार की कमी बताइए और सरकार से सवाल पूछिए लेकिन अच्छी चीज भी दिखाइए। आज अगर किसानों को खाद-बीज का पैसा मिल रहा है, एक गांव की महिला को सिलेंडर मिल रहा है तो उसकी तारीफ़ करने से आप मोदी समर्थक कैसे हो गए?

‘एनडीटीवी‘ एक बड़ा चैनल है, रवीश जी सरकार की खूब आलोचना करते हैं तो क्या उन्हें कुछ हुआ? क्या उन्हें बोलने से रोका गया?  आज भी हिंदी इंग्लिश दोनों चैनल चल रहे हैं तो आपातकाल कैसे हुआ? गुजरात के दो बड़े अखबार ‘गुजरात समाचार‘ और ‘संदेश‘ जैसे अखबारों में सरकार के खिलाफ तीखी हेडलाइन लिखी जा रही हैं। अगर तानाशाही होती तो क्या आप ये कर पाते?

प्रेस के प्रति पूर्वाग्रह तो हर पीएम का रहा है। मेरे पास तो इंदिरा जी के भाषण आज भी रखे हुए हैं। इसके अलावा ‘नेशनल हेराल्ड‘ तो गांधी परिवार का अखबार है वो तो पीएम मोदी नियंत्रित नहीं कर रहे है ना?

नोटिस तो मेरे पास, विनोद मेहता, राजेंद्र माथुर के पास न जाने कितने आए हैं। आप ये नहीं कह सकते कि ये आज से शुरू हुआ है। इतना जरूर मैं कह सकता हूं कि आज राज्यों में दबाब है, चाहे वो बीजेपी हो कांग्रेस हो या लेफ्ट हो, सभी राज्यों की सरकारें दबाब बना रही हैं।

इसके अलावा अगर नए आईटी नियमों की बात है तो ये भी लोगों को ज्ञात होना चाहिए कि बड़े-बड़े संस्थानों के संपादकों और प्रकाशकों ने ही सरकार को चिट्ठी भेजी थी कि आप ये नियम बनाएं।

अगर मैं ये कह रहा हूं कि पहले पेज पर जलती हुई लाशें मत दिखाइए, लाखों संवेदनशील लोग हैं और बच्चे हैं, जो उसे देखकर दहशत में आ सकते हैं, लेकिन उसके विरोध में आप अगर ये कहें कि आलोक मेहता जी तो मोदी के पक्ष में बोल रहे हैं तो ये तर्क ठीक नहीं है।

समाचार4मीडिया के साथ आलोक मेहता की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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'ये देखकर दुःख होता है कि प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में हम अफ्रीकी देशों से भी पीछे हैं'

वरिष्ठ पत्रकार पंकज पचौरी को मीडिया जगत में काम करते हुए 30 साल से भी अधिक हो गया है। समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में पंकज पचौरी ने अपनी इस यात्रा के अनुभव साझा किए हैं

Last Modified:
Wednesday, 21 July, 2021
Pankaj Pachauri

वरिष्ठ पत्रकार पंकज पचौरी को मीडिया जगत में काम करते हुए 30 साल से भी अधिक हो गया है। समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में पंकज पचौरी ने अपनी इस यात्रा के अनुभव साझा किए, वहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार के तौर पर किए गए कार्य के अनुभव भी हमें बताए। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के मुख्य अंश:

मीडिया जगत में आपको तीन दशक से भी अधिक का अनुभव है, पत्रकार बनने का ख्याल कैसे आया?

सबसे पहले आपके आमंत्रण के लिए शुक्रिया। देखिए, मैं आगरा से बीकॉम की पढ़ाई कर रहा था और सीए बनने की योजना थी। उस समय कई अच्छे और ज्ञानी लोगों का साथ मिला तो नियमित तौर से समाचार पत्र और पत्रिकाएं पढ़ा करते थे। उस समय भागलपुर में कुछ लोगों को अंधा कर दिया गया था और उस घटना को ‘संडे‘ मैग्ज़ीन ने कवर किया था और उस समय उसके संपादक एमजे अकबर हुआ करते थे।

उसी दौरान ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ ने कमला नाम की एक महिला को ‘खरीदकर‘ धमाका कर दिया था। उस खुलासे ने लोगों के होश उड़ा दिए थे कि आजाद भारत में भी आप कैसे महिला को खरीद-बेच सकते हैं। इन दो घटनाओं के कारण मैं पत्रकार बना और लखनऊ से मैंने पत्रकारिता का कोर्स किया है।

आपने जीवन में कई बड़े संस्थानों के साथ काम किया है। अपनी इस यात्रा को संक्षेप में बताइए।

16 जुलाई 1984 का वो दिन था, जब पहली बार ‘दी पैट्रियट‘ अखबार में मेरा लेख आया। मैं सबसे पहले इसी अखबार से जुड़ा था और मुझे फ्रीलॉन्सिंग करने के लिए कहा गया था। उसी दौरान इंदिरा गांधी की हत्या हुई और उसके बाद दिल्ली की सडकों पर जो हुआ वो एक इतिहास है। मुझे वो सब कवर करने का मौका मिला। मेरे संपादक को मेरा वो काम अच्छा लगा और मुझे नौकरी मिल गई, मुझे ट्रेनी रिपोर्टर बना दिया गया था।

उसके बाद मैंने खूब काम किया और कई स्टोरी ब्रेक कीं और मेरा काम देखकर विनोद मेहता जी ने ‘दी संडे आब्जर्वर‘ में मुझे नौकरी दे दी। उस समय 1987 में मेरठ के दंगे हुए थे और मैंने उसमें जमकर रिपोर्टिंग की थी, जो ना सिर्फ किताबों में पढ़ाई जाती है बल्कि आज भी जो केस चल रहे हैं, उनमें मेरी रिपोर्टिंग का संदर्भ दिया जाता है।

लगभग डेढ़ साल विनोद मेहता जी के साथ मैंने काम किया। उसके बाद मुझे ‘इंडिया टुडे‘ से कॉल आ गया और मेरी एक नई पारी उनके साथ शुरू हुई। मैं उस समय उस ग्रुप में सबसे कम उम्र का रिपोर्टर था।

साल 1990 तक वहां खूब काम किया, लेकिन बाद में मन हुआ कि विदेश जाकर काम करना चाहिए। उसी समय ‘धीरुभाई अंबानी‘ जी का एक मीडिया वेंचर शुरू हो रहा था और मेरे सबसे पहले संपादक के जरिये मुझे उसमें काम करने का मौका मिल रहा था, लेकिन मेरी एक ही मांग थी कि अगर ‘इंडिया टुडे‘ छोड़ना है तो फिर विदेश ही जाना है।

आखिरकार मुझे हॉन्गकॉन्ग भेज दिया गया और ‘इंडिया टुडे‘ ग्रुप के साथ मेरी पारी खत्म हुई। उसी दौरान खाड़ी युद्ध कवर करने का मौका भी मिला। 1991 की गर्मी का वो वक्त था, जब मैं भारत आया हुआ था और उसी समय ‘बीबीसी‘ से एक पुराने साथी का कॉल आया कि आपको इधर आकर काम करना चाहिए।

पहली बार ‘बीबीसी‘ रिपोर्टर्स को हायर कर रहा था। मेरे कुछ पुराने रेडियो के साथी थे, जिनसे मैंने उस काम की बारीकियां सीखीं और इस तरह ‘बीबीसी‘ लंदन में बतौर हिंदी सेवा प्रोड्यूसर मुझे नौकरी मिली।

मैंने तकरीबन छह साल वहां काम किया और टीवी में भी काम करने का मुझे मौका मिला। इसके बाद मुझे लगा कि भारत वापस जाकर काम करना चाहिए। दरअसल, 1991 में ‘एनडीटीवी‘ दूरदर्शन के लिए प्रोग्राम बनाता था और उस दौरान लंदन जाने से पहले लखनऊ से मैंने आम चुनाव कवर किया था और दो दिन में 10 से अधिक बड़े नेताओं के इंटरव्यू लिए। उसी दौरान राधिका राय और प्रणब राय से मेरी जान पहचान हुई थी। भारत आने के बाद ‘एनडीटीवी‘ के साथ जुड़ा और 15 साल तक उनके साथ काम किया और तमाम शो किए, खूब इंटरव्यू किए।

इसके बाद एक दिन पीएम ऑफिस से कॉल आया कि मुख्य सचिव आपसे मिलना चाहते हैं। उनसे मिलने के बाद पता चला कि मुझे पीएम के मीडिया सलाहकार के रूप में काम करने के लिए चुना गया है और इतने बड़े अवसर को मैं मना नहीं कर पाया। मेरी नियुक्ति पीएम के स्टाफ के तौर पर की गई थी। वहीं वर्तमान में एक डिजिटल वेंचर को मैं आगे बढ़ा रहा हूं और उसी में व्यस्त हूं।

आपने कन्या भ्रूण हत्या पर रिपोर्टिंग की और जीवन में काफी जमीनी पत्रकारिता की है। अनुभव कैसे रहे?

मैं हमेशा लोगों से कहता हूं कि अगर आपको लगता है कि आप बड़े-बड़े लोगों से संबंध बना लेंगे या खूब पैसा आपको मिलेगा तो आप इस गलत पेशे में आ गए हैं। ये एक नोबेल कार्य है, जिसे समाज की भलाई करने वाला काम माना जाता है। मेरी पहली ग्राउंड रिपोर्ट आगरा में बाल मजदूरी पर थी। मैंने वो बताया, जो गलत हो रहा था। समाज के असहाय वर्ग की आप मदद करिए, अपना धर्म निभाएं और बाकी बड़ी-बड़ी चीजें तो आपको मिलती ही जाएंगी। मैंने तो कई फिल्मों में काम ही इसलिए किया कि फिल्में बनती कैसे हैं।

पत्रकारिता का मकसद सिर्फ प्रसिद्ध होना नहीं, मैं जोधपुर गया जहां गाँव में कोई लड़की ही पैदा नहीं होने दी जाती थी। मैं वहां गया और रिपोर्टिंग की, खुलासे किए, सबको काम पसंद आया और लोगों ने ताली भी बजाई, अवार्ड भी मिले और ये सब इसलिए क्योंकि मैं अपना काम ईमानदारी से कर रहा था।

इसलिए मैं हमेशा कहता हूं कि अपने पेशे को पहचानिए। समाज के अंतिम व्यक्ति तक को न्याय मिले, उसके लिए पत्रकार को काम करना चाहिए। आपको याद होगा कि बिहार के एक व्यक्ति ने जब ‘केबीसी‘ में पांच करोड़ रुपये जीते तो मैंने बाकायदा उस पर शो किया था और उसकी जीवन यात्रा को लोगों के सामने लाने का कार्य किया। जब आम आदमी आपके केंद्र में होता है तो यकीनन कार्य ईमानदारी से हो ही जाता है।

आपने ‘मनी मन्त्र‘ जैसे आर्थिक शो भी किए हैं। वर्तमान में देश की आर्थिक स्थिति के बारे में आपके क्या विचार हैं?

साल 2010 में जब नया दशक शुरू हो रहा था, मैंने उस समय विस्तृत कार्यक्रम किए थे। उस समय तमाम लोगों से बात करने के बाद निचोड़ ये निकला कि अगर भारत अगले दस साल तक आठ से दस फीसदी जीडीपी ग्रोथ करे तो मिडिल इनकम ग्रुप में देश आ जाएगा, उस समय देश लोअर इनकम ग्रुप में था।

साल 2012 में जब मैंने पीएम के साथ काम करना शुरू किया तो उसका सबसे बड़ा कारण यही था कि मुझे लगता था कि पीएम मनमोहन सिंह के पास इसे करने की शक्ति और काबिलियत दोनों हैं, लेकिन साल 2013 आते-आते वह ग्रोथ ढीली पड़ गई और पिछले सात साल में ये कम होती जा रही है।

जहां 10 साल में हमें इसे आठ से दस फीसदी रखना था, वह पिछले दस साल में सिर्फ पांच फीसदी के आस-पास सिमट गई है। अगर आप कोरोना से पहले जीडीपी को देखें तो वो सिर्फ साढ़े चार फीसदी थी और कोरोना के बाद तो वो नेगेटिव हो गई है। मैं आपको शर्तिया ये कह सकता हूं कि ये हाल फिलहाल 8 या 10 फीसदी तो नहीं जाने वाली है।

आप देख ही रहे हैं कि हालात खराब हैं और तीन करोड़ से अधिक नौकरी गई हैं, आने वाले समय में देश और भी दिक्कतों का सामना करेगा और सरकार को इसके लिए तैयार रहना होगा। मैं आपको बताऊं कि साल 2013 में जब ‘राइट टू फ़ूड‘ आया था तो हमारे सामने ये तथ्य आए कि देश में 80 करोड़ लोगों को फ्री में राशन देने की जरूरत है।

अब अगर उसके आठ साल बाद भी हम 80 करोड़ लोगों को राशन दे रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि हमने इन आठ साल में कोई खास तरक्की नहीं की? तरक्की आम आदमी की नहीं बल्कि कॉर्पोरेट्स की हो रही है।

भारत का शेयर बाजार इस समय दुनिया में सबसे अधिक रिटर्न दे रहा है। देश की 60 फीसदी जनता ऐसी है जो सीधे कृषि से जुड़ी हुई है और उसकी ग्रोथ तो सिर्फ 4 फीसद के आस-पास है। यानी कि देश की 60 फीसदी जनता उस ग्रोथ के सहारे है, जो बढ़ नहीं रही है इसलिए ऐसी असमानता ही रोजगार को खत्म करती है और आम आदमी के हाथ में पैसा नहीं जा पाता है।  

जब मनमोहन जी ने कुर्सी संभाली तो अगले दस साल यानी 2004 से 14 तक 26 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर लाया गया लेकिन वर्तमान सरकार ने पिछले सात साल में ये डाटा देना ही बंद कर दिया है। आज देश में अमीरी के हालात सबको पता हैं, लेकिन गरीबों की क्या स्थिति है, उस पर कोई रिपोर्ट नहीं है।

आप तो पूर्व पीएम के मीडिया सलाहकार रहे, क्या आपको कभी ऐसा लगा कि मनमोहन जी को मीडिया कम स्पेस देता था?

देखिए, मैंने करीब ढाई साल पूर्व पीएम के साथ काम किया है और मैं दावे से कह रहा हूं कि वह खुद मीडिया में आना नहीं चाहते थे। हम जब भी उनसे कोई मीडिया से जुड़ी बात या सुझाव देते थे तो वो सिर्फ एक ही जवाब देते थे कि मैं ये सब करने नहीं आया हूं।

मैं इधर एक समय तक हूं और मैं एक दिन चला जाऊंगा, मेरा काम बोलना चाहिए और वो बोल रहा है। मैंने भी सिर्फ एक प्रेस वार्ता पत्रकारों के साथ की थी, उसमें भी मैंने यही कहा था कि उनके जो दस साल रहे, वैसी इकोनॉमी ग्रोथ आज तक कोई सरकार लगातार तौर से नहीं दे पाई है।

उनको सोशल मीडिया एकाउंट्स से और अपने फॉलो करने वालों से अधिक देश की चिंता थी। वहीं वर्तमान पीएम मोदी की बात करें तो वो अभी से नहीं बल्कि जब वो सीएम थे तभी से मीडिया से जुड़े हुए हैं।

उनकी उस समय से ही मीडिया पर अच्छी पकड़ थी और बाकायदा उनकी पूरी एक टीम काम करती थी कि कैसे हमें इस साल गुजरात को इस मामले में नंबर वन राज्य बनाना है। हमने कई स्टडी की थीं और आपको जानकार हैरानी होगी कि 30 पैरामीटर में से सिर्फ 2 ऐसे थे, जिनमें गुजरात टॉप 10 में आता था।

मैंने भी उनसे खूब बात की है, खूब चर्चा की है और वो एक सहज तौर पर मीडिया से मिलते थे और सबसे बात करते थे। जब गुजरात दंगों के बाद उनके ऊपर बार-बार आरोप लगाए गए, तब जाकर उन्होंने सलेक्शन करना शुरू किया वो किससे बात करेंगे और किससे नहीं। वर्तमान में मीडिया की माली हालात बेकार हो रही है और सरकार कहीं न कहीं हावी हो रही है।

क्या आपको ऐसा लगता है कि वर्तमान में मीडिया लेफ्ट विंग और राइट विंग में बंट गया है? ये सब देखकर दुःख होता है?

मुझे ये देखकर दुःख होता है कि प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में हम अफ्रीकी देशों से भी पीछे हैं। विदेशों में भी जिस तरह से मीडिया के लोगों पर एफआईआर करने पर लिखा जा रहा है तो एक इंटरनेशनल पत्रकार होने के नाते मुझे भी दुःख होता है।

जब मैं विदेश में काम करता था और ईरान, इराक और बाकी देशों के लोगों के साथ मैं जब चर्चा करता था तो कम से कम दिल में ये खुशी होती थी कि मेरे देश में तो मीडिया को पूरी आजादी है।

अगर आप किसी पर केस करते हैं तो केस तो पांच साल में खत्म हो जाएगा लेकिन कोई भी मीडिया संस्थान उन केस को नहीं झेल सकता है। मानवाधिकार आयोग सरकार के खिलाफ चिट्ठी लिख रहा है और उसके बाद विदेश मंत्रालय को उसका जवाब देना पड़ रहा है, ऐसा देश में कभी नहीं हुआ है।

कहीं ना कहीं ये समस्या भी है कि अगर आप सरकार के साथ नहीं चलेंगे तो आपको सरकारी विज्ञापन नहीं मिलेंगे, कुछ न्यूजपेपर्स के साथ ऐसा हुआ है। दूसरी ओर आप देखिए कि पहली बार ऐसा हुआ कि नए नियमों को लेकर पीटीआई खुद सरकार के खिलाफ कोर्ट में है।

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर किताब भी आई और फिल्म भी बनी। क्या आपको लगता है कि पूर्व पीएम मनमोहन सिंह एक कमजोर राजनेता थे?

अगर मनमोहन जी कमजोर नेता होते तो भारत की इकोनॉमी इतनी बेहतर नहीं हो पाती। विदेश में जहां भी वो जाते थे, दिल खोलकर उनका स्वागत होता था। अगर दुनिया आपसे खौफ नहीं रखती है और आपका सम्मान करती है तो ये आपकी असली ताकत है।

अब अगर किताब की बात करें तो उस समय खुद मनमोहन जी से बात करके मैंने बयान दिया था कि उनके बारे में लिखी गई बातें मनगढ़ंत हैं और वो सिर्फ पैसा कमाने के लिए लिखी गई और किताब के बाद फिल्म बनने से ये चीज साबित भी हुई है।

खुद पूर्व पीएम ने ये कहा था कि उस आदमी ने मेरी पीठ में छुरा भोंप दिया है, पूर्व पीएम ने आपको अपने करीब आने का मौका दिया और आप सब चीज जानते हैं उसके बाद भी आप सिर्फ लोकप्रियता के लिए किसी को छल सकते हैं तो ये चीज ठीक नहीं है। अगर कोई चीज गलत होती तो हम भी उस पर किताब लिख सकते थे, लेकिन वो चीज सही नहीं है।

समाचार4मीडिया के साथ पंकज पचौरी की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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भाषा ही शक्ति तो पहले भी थी, उसे पहचाना अब जा रहा है: प्रो. संजय द्विवेदी

‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (आईआईएमसी) के महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

Last Modified:
Tuesday, 13 July, 2021
Professor Sanjay Dwivedi

‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (आईआईएमसी) के महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी को 14 साल से ज्यादा सक्रिय पत्रकारिता का अनुभव है। सक्रिय पत्रकारिता के बाद वह शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। वह ‘माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी‘ (एमसीयू) में तकरीबन 10 साल तक मास कम्युनिकेशन विभाग के अध्यक्ष रहे हैं। प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश

पत्रकारिता में आना कैसे हुआ? अपने आरंभिक जीवन और पहली नौकरी के बारे में कुछ बताएं।

हमेशा से मैं इस बात को लेकर क्लियर था कि मुझे पत्रकार बनना है। इसी विषय में मैंने मास्टर्स की डिग्री भी ली है। पिताजी हिंदी से जुड़े हुए थे तो घर का परिवेश ही ऐसा था कि बहुत कम उम्र में लिखने लग गया था। बारहवीं तक आते-आते तो मेरे लेख प्रकाशित होने लग गए थे।

पिताजी साहित्य की दुनिया से जुड़े थे तो मैंने भी सोचा कि क्यों न इसी भाषा की दुनिया से मेरा जुड़ाव रहे? बस, यही सोचकर पत्रकार बन गया। इसके बाद सबसे पहले ‘दैनिक भास्कर‘ के साथ काम शुरू किया, उस समय मैं ‘एमसीयू‘ से मास्टर्स कर रहा था।

दरअसल, किसी पत्रकार की शादी थी और वह छुट्टी पर था। संयोग से मुझे उसकी जगह बुलाया गया। दो महीने मैंने अच्छा काम किया और बाद में मुझसे कहा गया कि अगर आप चाहें तो यहां काम करते रह सकते हैं।

इस प्रकार मुझे पहली नौकरी मिली। इसके बाद मैं ‘स्वदेश‘ रायपुर का संपादक भी बना। उसके बाद ‘नवभारत‘ के साथ काम किया। जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बना तो एक बार फिर ‘दैनिक भास्कर‘ के साथ काम करने का मौका मिला। उसके बाद रायपुर चला गया और ‘दैनिक हरिभूमि‘ अखबार में काम किया और ये यात्रा चलती रही।

आपने पत्रकार के बाद एक शिक्षाविद के रूप में काम किया। पहला ऑफर कैसे मिला था?

जब मैं रायपुर में था तो उस समय कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय शुरू हो रहा था। डॉक्टर जोशी वहां कुलपति बनकर आए और मेरे छात्र जीवन से वह जुड़े हुए थे।

दरअसल, जब मैं माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी में पढता था तो वह उस समय वहां कुलसचिव थे। उन्होंने ही मेरी नियुक्ति की और कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में नियुक्त होने वाला पहला शिक्षक मैं ही था। वहीं पत्रकारिता विभाग का अध्यक्ष भी मुझे बना दिया गया।

इसके बाद साल 2009 में माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर के पद पर मेरी नियुक्ति हुई। 10 साल तक मैं वहां जनसंचार विभाग का अध्यक्ष भी मैं रहा और बाद के दिनों में कुलसचिव भी बनने का सौभाग्य मिला।

थोड़े समय के लिए प्रभारी कुलपति बनने का भी मौका मुझे मिला और वर्तमान में जैसा कि आप देख रहे हैं कि मुझे ‘आईआईएमसी‘ के महानिदेशक की जिम्मेदारी दी गई और उसे पूरी निष्ठा से निभाने की कोशिश कर रहा हूं। 

पिछले कुछ वर्षों से हिंदी को सम्मान मिल रहा है, वहीं रीजनल भाषाओं में भी मीडिया आगे बढ़ रहा है। आप इसे किस तरह से देखते हैं?

मुझे ऐसा लगता है कि प्रभाव और अवसर तो हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं में ही है। आज अगर आप दस बड़े चैनल या अखबार गिनें तो उनमें हिंदी के ही सबसे अधिक होंगे। हमारे पास समृद्ध भाषाएं हैं। बांग्ला, मलयालम जैसी भाषाओं में शानदार और बेहतरीन काम हुए हैं। तेलुगु और कन्नड़ के साथ भी ऐसा ही है।

भाषा ही शक्ति तो पहले भी थी, लेकिन उसे पहचाना अब जा रहा है। आप मुझे बताइए कि क्या अंग्रेजी बोलकर आप इस देश में कहीं वोट मांग सकते हैं? नहीं! बस यही भाषा की ताकत है।

मुझे ऐसा लगता है कि हमें आज ही ये सोचना होगा कि 2040 का भारत कैसा होगा? हम उस समय किन भाषाओं में बात कर रहे होंगे? आज रिसर्च भी यही कह रही है कि आने वाला समय हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं का ही है।

एक लंबे समय से गुलामी का दौर जो रहा है, बस उसी ने हमारे दिमाग में अंग्रेजी डाल दी है और उसका महत्व बढ़ा दिया है, वरना हिंदी और प्रादेशिक भाषाएं कहीं अधिक समृद्ध हैं।

डिजिटल के बढ़ते प्रभाव को लेकर क्या आपको ऐसा लगता है कि वर्तमान में हिंदी पत्रकारों के लिए यह चुनौती बना है?

डिजिटल को मैं चुनौती भी मानता हूं और उससे अधिक अवसर भी मैं मानता हूं। जैसे कि आप देखिए कि आज सभी दिग्गज वो चाहे टीवी से हों या प्रिंट से हों, आज डिजिटल पर हैं।

उन सबने इस माध्यम को अपनाया है। अगर आज आप टॉप 10 न्यूज पोर्टल्स को देखेंगे तो पाएंगे कि जो पहले से स्थापित मीडिया घराने हैं, सबसे अधिक दर्शक उन्हीं के पास हैं। आज हमारा डिजिटलीकरण लगभग पूरा हो गया है।

आज आप देखिए कि कई केंद्रीय विश्वविद्यालय तो सिर्फ मीडिया को ही समर्पित हैं। आज सिर्फ प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। वो समय गया जब आप हिंदी के अच्छे जानकार होते थे और पत्रकार बन जाते थे।

आज पत्रकारिता अपने आप में एक सशक्त माध्यम है और अब इसमें भी प्रशिक्षण की जरूरत है। एक समय में बड़े-बड़े संपादकीय लेख लिखे जाते थे, लेकिन आज सिर्फ 500 या आप कहिए कि 300 शब्दों में अपनी बात कहने का चलन है।

कई ऐसे लोग हैं, जो हर माध्यम में प्रसिद्ध हैं तो ऐसा नहीं है कि लोगों की कमी है, बस उन्हें प्रशिक्षित करने की जरूरत है। एक समय जब टीवी आया तो उस समय कहा गया कि अखबार खत्म हो जाएंगे और उस समय जितने भी लोग टीवी में आए, वो सब अखबार से आए हुए लोग थे।

आज एक पूरी पीढ़ी हमारे पास ऐसी है, जिसने कभी अखबार में काम नहीं किया, जबकि एक समय ऐसा कहा जाता था कि आपको शुरुआत करनी है तो आप प्रिंट से करिए। उसी तरह से आने वाले समय में हमारे पास एक ऐसी पीढ़ी भी होगी, जिसने कभी टीवी में काम नहीं किया होगा।

हाल ही में आपने एक वेबिनार में ओटीटी, फिल्म पत्रकारिता और डिजिटल के भविष्य को लेकर चर्चा की थी। उसके बारे में कुछ बताएं।

एक जमाना था जब हम पत्रकारिता शब्द का इस्तेमाल करते थे, उसके बाद शब्द आया मीडिया,  उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता, फिर डिजिटल, लेकिन आज ये सारे शब्द पुराने हो गए हैं।

आज जो अनुकूल शब्द है वो है ‘जनसंचार‘, आप देखिए कि पत्रकारिता में नौकरी घट गई हैं, लेकिन संचार में बढ़ गई हैं। टीवी या प्रिंट में हो सकता है कि स्पेस घट गया हो, लेकिन संचार में नौकरी मिल रही है।

नेताओं को ही देख लीजिए। उनका जमीन से संपर्क नहीं है तो वो डिजिटल तौर पर संवाद करने वालों को नौकरी पर रख रहे हैं और वो सफल भी हो रहे हैं।

आज शायद ही कोई ऐसा अभिनेता या अभिनेत्री होगी, जिसके सोशल मीडिया मैनेजर नहीं होंगे। इसलिए एक अलग ‘जनसंचार‘ का माध्यम अपने आप में फलफूल रहा है और लोगों को रोजगार भी दे रहा है।

आज कोरोना ने हमको सिखाया कि इस देश में हेल्थ कम्युनिकेशन पर काम करने वाले लोग नहीं हैं। स्वास्थ्य पर काम करने वाले और लिखने वाले पत्रकार तक हमारे पास नहीं हैं और यही कारण है कि तमाम फालतू खबरें उस बीमारी को लेकर चलाई गईं।

उस समय जिसका जो मन कर रहा था, वो वैसा ही लिख रहा था। टीवी पैनल में आपके पास उस विषय की समझ रखने वाले लोग नहीं थे तो आपको डॉक्टर्स को बुलाना पड़ रहा था।

संचार की ताकत को हमें समझना होगा, आप गांधी और विवेकानंद को देखिए, जिन्होंने अपने जीवन से लोगों को कितना बड़ा संदेश दिया था। मुझे नहीं लगता कि उनसे बड़े कोई जनता से संचार करने वाले हुए होंगे।

पूर्व पीएम अटल बिहारी जी कहते थे कि दुनिया की ऐसी कोई भी समस्या नहीं है, जो संवाद से हल नहीं हो सकती। अब वो संवाद कौन करेगा? वही लोग, जिनको प्रशिक्षण देकर हम तैयार करेंगे। इसलिए हमे इस संचार की दुनिया को समझना होगा और इसे अपनाना होगा।

डिजिटल के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए सरकार ने नए आईटी नियम बनाए हैं, जिनमें ट्विटर को लेकर काफी बहस चल रही है। इस मामले में आपका क्या कहना है?

माध्यम कोई भी हो, उसकी हदें तो देश को तय करनी ही होंगी। कोई भी माध्यम देश के कानून और संविधान से बड़ा नहीं हो सकता है। ये जो माध्यम हैं, इनकी अपनी एक आर्थिक और सामाजिक उपस्थिति है और एक मीडिया हाउस से भी अधिक ये ताकतवर हैं। हमारी सरकार उदार है, इसलिए हमारे कानून का ये फायदा उठा रहे हैं।

अमेरिका के पूर्व प्रेजिडेंट ट्रंप का तो इन्होंने अकाउंट ही बंद कर दिया। जिन देशों में तानाशाही है, उन देशों में ये हाथ जोड़कर काम करते हैं और हमारा फायदा उठा रहे हैं। ये अपने इरादों में स्पष्ट नहीं हैं और स्वच्छंदता चाहते हैं। अगर मुझे किसी कंपनी में और मेरे देश में से किसी को चुनना होगा तो मैं देश को सलेक्ट करूंगा।

हम एक स्वयंभू राष्ट्र हैं। अगर ट्विटर अपनी मनमानी करेगा तो देश में संवैधानिक संकट आ सकता है। इस देश में कई मत, सम्प्रदाय को मानने वाले लोग रहते हैं और ऐसे में हम किसी प्लेटफार्म को अपनी मनमानी करने नहीं दे सकते हैं।  

गाजियाबाद में एक बुजुर्ग की पिटाई का वीडियो वायरल हुआ, जिसका मकसद दंगे करवाना था और उस फेक एजेंडे में कई पत्रकार भी शामिल थे। क्या आपको लगता है कि आज के समय में पत्रकारों की विश्वसनीयता खतरे में है?

मेरा मत है कि पत्रकार का पहला धर्म है विश्वसनीयता, पत्रकार किसी भी चीज को आगे बढ़ाने से पहले तीन बार जांचता है, लेकिन समस्या आज बढ़ती जा रही है।

एक होता है जर्नलिस्ट और एक होता है एक्टिविस्ट, दुर्भाग्य इस देश का यह है कि जो एक्टिविस्ट है उसने कपड़ा जर्नलिस्ट का पहना है। पत्रकार न्यूज को कवर करता है और ये लोग विचार को आगे बढ़ाते हैं।

आज देश में संकट ऐसा है कि जो नेता के प्रवक्ता का काम है, वो एक पत्रकार कर रहा है। आज ऐसे राजनीतिक विश्लेषक देश में हैं, जिनको सुनते समय आप टीवी की आवाज बंद भी कर देंगे तो लोग बता देंगे कि वो क्या बोल रहा होगा!

ऐसी बुरी स्थिति इस पत्रकारिता की आज से पहले कभी नहीं हुई थी। पत्रकार का अर्थ है लोगों और सत्य का पक्ष रखना, न कि अपना पक्ष रखना। अगर लोगों का पक्ष दिखाने की बजाय हम अगर अपने या किसी पार्टी का पक्ष दिखाने लगे तो आप यकीन मानिए कि इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है।

आज ये चीज देखने में आ रही है कि एक व्यक्ति का विरोध करते-करते आप पूरे देश का विरोध करने लग जाते हैं। सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में अगर कोई कमी है तो उसका पक्ष आप बताइए, लेकिन आप सिर्फ एक व्यक्ति को दिन रात कोसते रहें तो ये पत्रकार का धर्म नहीं है।

मेरा मत है कि 99 फीसदी पत्रकार अपने काम में ईमानदार हैं, लेकिन सिर्फ एक फीसदी लोगों ने अपनी ‘पक्षधारिता’ से पूरे मीडिया के पेशे को बदनाम करके रख दिया है।

आप एक अच्छे शिक्षाविद के साथ-साथ अच्छे लेखक भी हैं। लेखन का सिलसिला कैसे शुरू हुआ?  उसके बारे में बताइए।

खबरें पवित्र होती हैं और मनुष्य को उसमें न अपनी सोच रखनी चाहिए और न ही अपनी राय देनी चाहिए। आज सबसे बड़ी समस्या यही है कि तमाम पत्रकार न्यूज में ही अपने व्यूज देने लगे हैं। जब मैं खबरों के संसार में था तो जाहिर सी बात है कि अपनी राय को लिखने और लोगों तक पहुंचाने के लिए मुझे एक माध्यम चाहिए था, मैंने उसी के लिए लेखन को चुना।

हमें समाचार और विचार का अंतर समझना होगा। समाचार में सिर्फ तथ्य होता है, लेकिन विचार में आप अपनी बात कह सकते हैं, अपने चिंतन को लोगों तक लेकर जाते हैं। इसके लिए ही मैंने समाचार में घालमेल करने की बजाय स्वतंत्र तौर पर लिखना शुरू किया है। वैसे आजकल मेरे पद की मर्यादा है तो अधिक नहीं लिख रहा हूं।

इसके अलावा मैं आपको यह भी बता दूं कि मुझे लिखने में सुख प्राप्त होता है। किसी पुरस्कार या किसी की तारीफ के लिए मैं नहीं लिखता, मुझे ऐसा अहसास होता है कि लिखकर मैं समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हूं।

हाल ही में ‘आईआईएमसी‘ ने अपनी दो शोध पत्रिकाओं को दोबारा लांच किया है। उनके बारे में कुछ बताएं।

भारतीय जनसंचार संस्थान' (IIMC) की प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं 'कम्युनिकेटर' और 'संचार माध्यम' को रिलांच हमने किया है। आप कह सकते हैं कि विश्व स्तर के जो जर्नल्स होते हैं, उनको देखकर हमने उसी तरह से इनका प्रकाशन किया है। 'कम्युनिकेटर' हर तीन महीने में आपको मिलेगी और डॉक्टर वीरेंद्र कुमार इसके संपादन का कार्य देख रहे हैं।

इसके अलावा 'संचार माध्यम' साल में दो बार उपलब्ध होगी और इसके संपादन का जिम्मा डॉक्टर प्रमोद कुमार जी को सौंप दिया गया है।

इन दोनों पत्रिकाओं की एक महान परंपरा रही है, इसलिए एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि विश्व स्तर के शोध इनमें प्रकाशित किए जाएं। इसके लिए अन्य विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों को भी हमने संपादक मंडल में शामिल किया है।

कोरोना महामारी के कारण शिक्षा का कार्य भी बाधित हुआ है। ‘आईआईएमसी‘ ने इस दिशा में क्या कदम उठाए हैं?

ये एक वैश्विक संकट था और इससे निपटने की तैयारी उस समय न सरकार के पास थी और न ही हम इसके लिए तैयार थे। शुरू के दिनों में तो इतनी घबराहट थी कि हमारा सत्र विलंब से शुरू हुआ था।

इससे भी बड़ी बात यह है कि डिजिटल माध्यम से बच्चे तो सहज थे, लेकिन अध्यापक शायद नहीं थे, लेकिन धीरे-धीरे  हमने इस पर काम करना शुरू किया और चीजें ठीक होना शुरू हुईं। इसका एक बड़ा फायदा यह है कि दुनिया के किसी भी कोने में बैठे विद्वान व्यक्ति से आप संवाद कर सकते हैं और ऐसा हमने किया भी।

कई केंद्रीय मंत्रियों ने ऑनलाइन जुड़कर काफी अच्छे और ज्ञानवर्धक सत्र हमारे साथ किए। वहीं इसका नुकसान यह है कि संवाद और संचार की जो कला बच्चे के अंदर विकसित होनी चाहिए, वो नहीं हो पाती।

बच्चा सिर्फ कक्षा से नहीं, बल्कि परिसर से भी ज्ञान प्राप्त करता है। एक लघु भारत हमारे यहां है और 35 हजार से अधिक पुस्तकें हमारे पास उपलब्ध हैं। देश के सबसे विद्वान शिक्षक आज हमारे पास हैं। इस संकट की घड़ी में एक निर्णय और हमने लिया और उसके तहत अगर किसी  विद्यार्थी के माता या पिता का देहांत कोरोना से हुआ है तो उसकी फीस माफ कर दी जाएगी।

आने वाले समय में फेक न्यूज, तकनीक का गलत इस्तेमाल, एजेंडा पत्रकारिता जैसी चुनौती आने वाली हैं। ‘आईआईएमसी‘ इस दिशा में कैसे विद्यार्थियों को ट्रेनिंग दे रहा है?

किसी भी तथ्य को जांचना और उसके बाद ही उसे प्रकाशित करना, ये ‘आईआईएमसी‘ के हर विद्यार्थी को सिखाया जाता है। हमारा सिर्फ एक ही मकसद रहता है कि हर विद्यार्थी सीखे और उसे हम ट्रेनिंग के दौरान ये अवसर खूब देते हैं। इसके अलावा आपकी हदें और सरहदें आपको पता हों, ये सीख भी उन्हें दी जा रही है।

हर व्यक्ति की अपनी एक सीमा होती है और मुझे लगता है कि एक सीमा से आगे उसे नहीं बढ़ना चाहिए। इसके अलावा पत्रकार कैसे एक समाज के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, ये भी हम अपने स्टूडेंट्स को बताते हैं।

इसके अलावा आने वाले सत्रों में आपको पाठ्यक्रम में बदलाव भी दिखाई देंगे। अंत में एक बात मैं आपसे कहूंगा कि जब एक युवा किसी संस्थान में जाता है तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वो संस्थान उससे क्या करवाता है!

अक्सर कई बार ये देखा गया है कि जब कोई व्यक्ति निर्णय लेने की स्थिति में जाता है तो उस समय जरूर वो अपने सिद्धांत का पालन करता हुआ दिखाई देता है। मेरी बस यही कामना है कि मीडिया लोक मंगल के लिए कार्य करे, जनता का पक्ष दिखाए और इस देश की एकता और अखंडता को समृद्ध रखने में एक अहम भूमिका अदा करे।

समाचार4मीडिया के साथ प्रोफेसर संजय द्विवेदी की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।


 

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ऐसे लोगों को रोकना और इन पर लगाम कसना बेहद जरूरी है: जयदीप कर्णिक

‘अमर उजाला’ डिजिटल के संपादक जयदीप कर्णिक ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

Last Modified:
Saturday, 10 July, 2021
Jaideep Karnik

‘अमर उजाला’ डिजिटल के संपादक जयदीप कर्णिक ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। उन्होंने इस बातचीत में न सिर्फ मीडिया जगत के अपने अनुभव साझा किए बल्कि आने वाले समय में डिजिटल की चुनौती पर भी अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपका मीडिया में आना कैसे हुआ? क्या जीवन में कोई ऐसी घटना हुई, जिसने मीडिया में आने के लिए प्रेरित किया हो?

मैं इंदौर से हूं और वहां ‘नई दुनिया‘ नाम का अखबार घर-घर पहुंचता है। मेरा सौभाग्य रहा कि इस अखबार के परिवार से जुड़ने का मुझे मौका मिला। मेरे पिताजी इस अखबार में स्पोर्ट्स के लिए लिखा करते थे।

मेरे पिताजी चूंकि पहलवान रहे हैं तो कुश्ती या अन्य खेलों की खबर वही दिया करते थे। मैं भी अक्सर पिताजी के साथ जाता और दफ्तर में घूमता रहता तो आप कह सकते हैं कि पत्रकारिता के बीज तो बचपन में ही पड़ गए थे।

मैं जब दसवीं कक्षा में था तो वाद विवाद प्रतियोगिता जीतने लगा। उसी दौरान ‘दैनिक भास्कर‘ के संपादक से मेरा परिचय हुआ। अक्सर मैं उनके ऑफिस जाता और वो किसी न किसी विषय पर मुझे लिखने को दे देते थे।

मेरे दादाजी और ‘नई दुनिया‘ के संस्थापक बाबू लाभचंद छजलानी जी दोनों स्वतंत्रता सेनानी थे। मेरे जीवन में एक अहम मोड़ तब आया, जब कॉलेज के दिनों में दिल्ली में होने वाली प्रतिमान संसद प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिला।

इंदौर से 40 लोगों की टीम आई थी और मैं भी उसी टीम में था। आखिरी दौर में ‘बनारस हिंदू विश्वविद्यालय‘ और ‘देवी अहिल्या विश्वविद्यालय‘, इंदौर के बीच मुकाबला था। हम जीत गए और मुझे सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुरस्कार मिला था।

उस दिन इंदौर के अखबारों में हमारी फोटो और खबर थी, लेकिन हम इतने से संतुष्ट होने वाले नहीं थे। उस दिन मेरे साथी मेरे घर यानी इंदौर ही रुके और हमने पूरी रात चर्चा कर ये निर्णय लिया कि कॉलेज के युवाओं के लिए एक न्यूज पेपर निकाला जाए।

दरअसल, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से 30 से अधिक कॉलेज जुड़े हुए थे, लेकिन किस कॉलेज में क्या हो रहा है, ये किसी को पता नहीं होता था। हमने सोचा कि क्यों न सभी कॉलेजों के बीच एक संवाद स्थापित किया जाए और हमने एक महीने की अवधि के भीतर ‘प्रयास‘ नाम से अखबार निकाल दिया।

लगभग दो साल तक हमने वह अखबार निकाला और उसने खूब प्रसिद्धि पाई और मैं कह सकता हूं कि मीडिया जगत से मेरा पहला परिचय उस ‘प्रयास‘ नाम के अखबार से ही हुआ था।

जैसा कि आपने बताया कि पत्रकार बनने का निर्णय आप ले चुके थे तो पहली नौकरी कहां और कैसे मिली?

उस समय जब ‘प्रयास‘ अखबार निकल रहा था तो मेरी दिनचर्या बिल्कुल अलग हो गई थी। मैं सुबह निकल जाता और देर रात तक आता। उस दौर में खादी का कुर्ता, जींस, कोल्हापुरी जूती पहनकर मुझे ऐसा लगता था कि अब बस मैं दुनिया बदल ही दूंगा। उस समय मेरे साथ आर्थिक मोर्चे पर बड़ी दिक्क़ते आईं।

मेरे पिताजी एक सरकारी टेक्सटाइल मिल में फैक्ट्री मैनेजर की पोस्ट पर थे। उस समय मिल में कामकाज नहीं हो रहा था और पिताजी को तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली थी। मुझे लगा कि मुझे अब काम करना चाहिए तो जैसा कि आपने पूछा कि मेरी पहली नौकरी क्या थी? तो मैं आपको बताऊं कि मेरी पहली नौकरी मीडिया की नहीं थी, बल्कि एक कॉरपोरेट जॉब थी।

उसी दौरान मैं अपनी आगे की पढ़ाई करता रहा। उस वक्त मुझे अफसोस बस एक ही चीज का था कि मुझे और मेरे साथियों को ‘प्रयास‘ अखबार का प्रकाशन बंद करना पड़ा।

करीब साढ़े चार साल तक वह नौकरी करने के बाद मैं मार्केटिंग में चला गया। एक दिन सुबह जब मैं बस से ऑफिस जा रहा था तो मैंने विचार किया कि मैं क्या करने वाला था और क्या कर रहा हूं? उसी शाम मैंने वहां से त्याग पत्र दे दिया। 

उसके बाद ‘नई दुनिया‘ के उस समय के प्रधान संपादक अभय जी से मेरी मुलाकात हुई। उन्होंने मेरे उस जज्बे को निराश नहीं किया और इस तरह 1998 से मेरी मीडिया जगत की यात्रा शुरू हुई।

उसी दौरान 1999 में दुनिया का पहला हिंदी पोर्टल ‘वेब दुनिया‘ लॉन्च हुआ था। उसी दौरान मैं न सिर्फ अखबार से जुड़ा रहा बल्कि डिजिटल से भी जुड़ गया था। साल 2004 आते-आते मैं पूरे तरीके से ‘वेब दुनिया‘ का हिस्सा हो गया था।

2004 से 2008 तक मैं वहीं रहा और चार भाषाओं से 11 भाषाओं तक हम पहुंचे। साल 2008 में ‘नई दुनिया‘ इंदौर का स्थानीय संपादक और ‘वेब दुनिया‘ का कंटेंट हेड मुझे बनाया गया। मेरे लिए ये कितने बड़े सौभाग्य की बात थी कि जिस ‘नई दुनिया‘ अखबार को बचपन से पढ़ता रहा, मेरे भाषाई संस्कार जिस अखबार से आते हैं, उसी की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आई। मैंने दोनों जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश की। प्रिंट और डिजिटल कैसे एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं, इस पर मैंने काम किया।

धर्म और ज्योतिष ‘वेब दुनिया‘ की सबसे बड़ी ताकत थे। उस समय ‘वेब दुनिया‘ के संस्थापक विनय जी हमसे एक बात कहते थे कि आने वाले समय में लोग जब सर्च इंजन पर ‘भगवतगीता‘ टाइप करेंगे तो उन्हें क्या मिलना चाहिए? राम, कृष्ण, वेद, पुराण टाइप करेंगे तो क्या उन्हें मिलेगा?

आपको यह जानकार हैरानी होगी कि ‘करवाचौथ की पूजा कैसे करें‘ नाम का एक लेख साल 2001 में लिखा गया था और वह आज भी सर्वाधिक पठनीय लेख है। यह वो समय था, जब इंटरनेट पर हिंदी की कोई साम्रगी नहीं थी। उसके बाद यही काम स्थानीय भाषाओं में किया गया।

इसके बाद साल 2013 से 2015 तक मैं ‘नेटवर्क18‘ में रहा। वो एक ऐसा समय था, जब मैंने टीवी और डिजिटल को लेकर बहुत कुछ सीखा और काफी प्रयोग किए। आज ‘अमर उजाला‘ जैसे ब्रैंड के साथ काम कर रहा हूं, लेकिन आज भी डिजिटल और प्रिंट का कैसे गठजोड़ हो और पाठकों को उत्त्तम गुणवत्ता का कंटेंट मिले, यही मेरी कोशिश है।

आपने तो प्रिंट और डिजिटल दोनों में काम किया है तो दोनों में सबसे बड़ा फर्क आपको क्या दिखाई देता है?

प्रिंट और डिजिटल दोनों की कार्यप्रणाली अलग है। प्रिंट में दोपहर दो बजे के बाद गहमागहमी बढ़ जाती है और उनकी एक समय सीमा होती है कि शाम को छह बजे तक अखबार का पेज तैयार करना है। डिजिटल में ये अलग तरह से चलता है। वहां कोई समय सीमा नहीं है और न ही आपको कोई पेज तैयार करना है। वहां तो बस खबरें चलती रहती हैं और आपको उनके साथ डील करना है।

डिजिटल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक ही समय में अगर दो बड़े ईवेंट हो रहे हैं तो आपको दोनों को दिखाना पड़ेगा। आप ये कहकर किसी घटना को या ईवेंट को नहीं छोड़ सकते कि ये महत्वपूर्ण नहीं है। डिजिटल के पत्रकार को सजग रहना होता है।

इसके अलावा डिजिटल में आप लेख को सुरक्षित रख सकते हैं। आज भी 10 साल पहले मेरे द्वारा लिखा गया आर्टिकल आप देख सकते हैं। वहीं प्रिंट में खबर कितनी ही अच्छी हो, आपके पास जगह उतनी ही है। डिजिटल में आप जितना चाहे, उतनी लंबी खबर और विश्लेषण कर सकते हैं।

डिजिटल में एक दिन में 250 से ऊपर स्टोरी जाती हैं। इन सबकी निगरानी करना बेहद मुश्किल है! आप इसके लिए क्या करते हैं?

ये बहुत अच्छा सवाल आपने किया है। दरअसल, प्रिंट और टीवी में कुछ फिल्टर लगे होते हैं जो ये तय करते हैं कि आगे क्या जाएगा और क्या नहीं? डिजिटल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि खबर आते ही जाएगी। डेस्क पर रोजाना 200 से ऊपर खबर बनती हैं और अखबार की न्यूज मिला लें तो ये आकंड़ा 1000 के ऊपर जाएगा।

मेरा सबसे बड़ा ध्यान प्रशिक्षण पर रहता है। हर खबर आप नहीं पढ़ सकते हैं, लेकिन जहां से खबर प्रकाशित हो रही है, वहीं अगर उस पर ध्यान दे दिया जाए तो किसी भी बड़ी गलती से आप बच सकते हैं।

क्या आपको ऐसा लगता है कि डिजिटल कभी ब्रेकिंग न्यूज के मामले में टीवी को टक्कर दे सकता है?

आज के समय में ऐसा कोई भी चैनल नहीं है, जो डिजिटल की दुनिया में नहीं है और लाइव प्रसारण नहीं दे रहा हो। डिजिटल में भी आप सीधे लाइव जाकर दर्शकों से संवाद कर सकते हैं। टीवी और अखबार की रेटिंग का जो पैमाना है, वो काफी छोटा भी है और वर्तमान समय में तो उसकी गुणवत्ता तक सवालों के घेरे में है।

डिजिटल एक ऐसा माध्यम है, जहां कोई रेटिंग फार्मूला नहीं है। यहां जो कुछ भी है, सब आपके दर्शक ही हैं। आज हम हर महीने के अंत में ये देख सकते हैं कि कितने लोग आपकी वेबसाइट पर आए या कितने लोगों ने आपका शो देखा।

टीवी में ये पता लगाना बेहद कठिन है कि आपके दर्शक कितने हैं? टीवी और अखबार आज भी हर घर में हैं और लोग इन्हें समय दे रहे हैं, इसलिए टक्कर शब्द को मैं नकारता हूं। टीवी और अखबार के साथ समस्या यह है कि वो जो भी दिखा रहे हैं, आपको देखना पड़ता है, लेकिन डिजिटल में आप ‘किंग‘ हैं। डिजिटल में आप तय करते हैं कि आपको क्या देखना है और क्या नहीं देखना है।

वर्तमान में फेक न्यूज डिजिटल की सबसे बड़ी समस्या है। एक संपादक होने के नाते आपके क्या विचार हैं और ‘अमर उजाला‘ की टीम इस दिशा में क्या काम कर रही है?

देखिए, आज के समय में निश्चित रुप से फेक न्यूज सबसे बड़ी समस्या है। आज के इस दौर में डिजिटल के पत्रकार के तौर पर हमें सजग रहना है। पाठकों का ‘अमर उजाला‘ पर 70 सालों का एक भरोसा है और उसे कायम रखने के लिए हर संभव कोशिश हम कर रहे हैं।

खबर अपलोड होने से पहले कम से कम तीन जगह उसकी जांच की जाती है। स्थानीय पत्रकार से लेकर संपादकीय टीम तक इसमें शामिल रहती है। कई बार क्या होता है कि कोई गलत खबर अगर टीवी पर फ्लैश हो गई और आपने उसे बनाकर चढ़ा दिया तो टीवी वाले ने तो तुरंत उसे हटा दिया लेकिन आपके यहां अब उसका लिंक है और वो शेयर हो गया होगा। लोग स्क्रीन शॉट लेकर आपको बदनाम भी कर सकते हैं। इसलिए हमने इस चीज पर भी विशेष ध्यान दिया है कि ऐसी कोई गलती हमारे किसी भी कर्मचारी से नहीं हो।

पत्रकारिता का मूल पाठ संशय है। पुलिस और एक जासूस से भी अधिक आपको संशय करना है, तब जाकर आप खबर की सटीकता को समझ सकते हैं।

डिजिटल मीडिया एक बड़ा सस्ता माध्यम है तो क्या आपको लगता है कि इसका इस्तेमाल कुछ पत्रकार अपना एजेंडा चलाने में कर रहे हैं?

टीवी और अखबार की बात करें तो वहां शुरुआत करने के लिए न सिर्फ करोड़ों रुपये चाहिए, बल्कि सरकार की गाइडलाइंस का भी आपको पालन  करना होता है। डिजिटल के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि आप दो लैपटॉप लेकर कहीं भी अपनी वेबसाइट बनाकर बैठ जाइए और आपको जो लिखना है, लिखते रहिए।

आपकी बात से मैं सहमत हूं कि सस्ता माध्यम होने की वजह से कुछ लोग अपना एजेंडा लेकर इसमें आ गए और यही कारण है कि आज डिजिटल संदेह के घेरे में आ रहा है। सरकार के जो नए आईटी नियम हैं, उनमें से कुछ नियमों पर संघटनों को आपत्ति है और चर्चा चल रही है, लेकिन ये नियम अच्छे भी हैं और जरूरी भी थे।

एफएम जो शहर-शहर सुने जाते हैं, उन्हें आज भी न्यूज करने की अनुमति नहीं है, वहीं डिजिटल पर कुछ लोग एजेंडा चला रहे हैं, तो ऐसे में इन सब चीजों का कानून के दायरे में आना सही है। आज डिजिटल क्रांति इतनी तेजी से हुई है कि खुद सरकार को अब ये समझ नहीं आ रहा कि इनका रास्ता कैसे रोका जाए। यह एक ऐसा देश है, जिसमें एक गलत वीडियो अगर आग की तरह फैल जाए तो दंगे हो जाते हैं, इसलिए ऐसे लोगों को रोकना और इन पर लगाम कसना बेहद जरूरी है।

क्या आपको लगता है कि आने वाले समय में डिजिटल का दायरा इतना अधिक हो जाएगा कि ये सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन सकता है?

चुनौती आने नहीं वाली है, वो तो आ गई है। आज आप देखिए कि सरकार के मंत्री का ट्विटर अकाउंट ब्लॉक हो जाता है, नक्शा गलत दिखाया जाता है, लोनी के एक वीडियो को हटाने में कितनी मेहनत करनी पड़ी तो बाकी तो छोड़िए ये सरकार ट्विटर से कैसे लड़ना है, यही निर्णय नहीं कर पा रही है।

आज कई ऐसी वेबसाइट हैं, जिनके बारे में आपको पता ही नहीं है कि ये चला कौन रहा है? मुझे तो ऐसा लगता है कि काफी कुछ बिगड़ गया है और आज नियम सख्त किए तो भी करीब पांच साल में जाकर कुछ ठीक होगा और उसमें भी अगर हो जाए तो राहत की सांस लीजिए।

सरकार को दोनों काम करने पड़ेंगे। अगर किसी की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन हो रहा है तो उसे भी देखना होगा और जो इस माध्यम का इस्तेमाल देश विरोधी एजेंडा चलाने में कर रहे हैं, उन्हें हर हाल में रोकना होगा और मुझे लगता है कि चुनौती आ चुकी है और बहुत बड़ी है।

लोनी के उस बुजुर्ग का वीडियो शेयर करने वाले लोगों में कई बड़े-बड़े पत्रकार थे और ये चिंता की बात है। ट्विटर के बारे में अक्सर ये देखा गया है कि कई विवादित कंटेंट को वो नहीं हटाता है। इसलिए मेरा मानना है कि सरकार की लड़ाई किसी एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि दोनों मोर्चों पर है।

आज फेसबुक, ट्विटर जैसे माध्यम खुद अपनी संपादकीय नीति बनाने लगे हैं कि क्या अपलोड होगा और क्या नहीं, जबकि वो इसी देश से पैसा कमा रहे हैं। आपको मैं बताऊं कि हमारे देश में तो फिर भी इस बात को लेकर कम चर्चा हुई है, लेकिन यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में तो साफ-साफ इनसे कह दिया गया है कि आपको पब्लिशर को पैसे देने होंगे।

कंटेंट जो क्रिएट कर रहा है, उसे ये लोग कुछ नहीं दे रहे, लेकिन सिर्फ अपने सेटअप के कारण पैसा कमा रहे हैं। मुझे लगता है कि आने वाले समय में हमें ऐसे ही कानून बनाने होंगे।

डिजिटल के साथ भी एक सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो कमाई विज्ञापन से हो रही है, उसका तकरीबन 80 फीसदी हिस्सा तो ये लोग अपने पास रख लेते हैं तो ऐसे में संपादक क्या करें? हम अपने पाठकों के लिए गुणवत्ता के लेख दे रहे हैं, लेकिन उसके एवज में हमें उतनी कमाई डिजिटल माध्यम से नहीं हो रही है।

अगर आपके पोर्टल को देखें तो मनोरंजन और ज्योतिष के आपके लेख एक अलग ही गुणवत्ता लिए हुए हैं। ‘बॉयोस्कोप‘ नाम से एक सीरीज है जो पाठकों में लोकप्रिय है, इसके पीछे किसका दिमाग है?

दिमाग तो पूरी टीम का ही आप कहकर चलिए, लेकिन हम भीड़ का हिस्सा नहीं हैं इसलिए अपने पाठकों को हम अच्छे लेख दे पाते हैं। हमने तय किया हुआ है कि मनोरंजन की कोई भी फालतू, अश्लील या चटपटी न्यूज हम नहीं करेंगे।

जिस ‘बॉयोस्कोप‘ सीरीज की आप बात कर रहे हैं वो हमारे पंकज शुक्ला जी लिख रहे हैं, जिन्हें 30 साल का अनुभव है। उन्होंने उस जीवन को और उस दुनिया को जीया है और उनका वह अनुभव लेखन की धार बनकर पाठकों तक पहुंच रहा है।

एक समय में वह अखबार के लिए फिल्म की समीक्षा लिखते थे। अब बात करें ज्योतिष और धर्म की तो भारत की आत्मा इससे जुड़ी है और इस कदर जुड़ी है कि हजारों सालों के आक्रमण झेलने के बाद भी हमारी संस्कृति को आक्रांता नष्ट नहीं कर सके।

हमारी जड़ों से हमें काटने की कोशिश की गई, लेकिन आक्रांता कभी सफल नहीं हुए। एक ऐसी चीज, जिसको वक्त की मार भी नष्ट नहीं कर पाई तो उस पर साम्रगी नहीं देंगे तो किस पर देंगे?

हमारी कोशिश सटीक लेख देना है, हम कभी किसी भी पाखंड और ढोंग की चीज को न प्रकाशित करते हैं और न ही प्रमोट करते हैं। वैसे इसमें एक चीज और मैं जोड़ना चाहता हूं कि कोविड आने के बाद अब लोग स्वास्थ्य के लेख खूब पढ़ने लगे हैं। 

हमने अपनी विरासत को छोड़ा नहीं है और न ही बदला है। कई मीडिया संस्थानों में इसे कमजोरी मान लिया जाता है कि हम कब तक नीति का पालन करते रहेंगे, हमें बदलना होगा, लेकिन हम एक लाइन पर चलते हैं और वही हमारी सफलता का राज है।

वर्तमान में ‘अमर उजाला‘ के पाठकों की संख्या कितनी है?  आने वाले समय में क्या बदलाव देखने को मिलेंगे? भविष्य के लिए क्या लक्ष्य तय कर रहे हैं?

वर्तमान में हमारे पाठकों की संख्या सात करोड़/महीना है और आने वाले समय में हमें अपनी सबसे बड़ी ताकत गुणवत्ता पर लगातार काम करते रहना है। मेरा पाठकों से यही कहना होता है कि अच्छी साम्रगी को न केवल पढ़िए, बल्कि थोड़ा पैसा भी खर्च करिए।

हमने ‘अमर उजाला प्लस‘ नाम से एक सुविधा शुरू की है, जिसमें आप हर साल कुछ रुपयों का भुगतान कर न सिर्फ उच्च गुणवत्ता के लेख पढ़ सकते हैं बल्कि विज्ञापन मुक्त अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। हिंदी भाषी पोर्टल में ये मुहिम चलाने वाला एकमात्र पोर्टल ‘अमर उजाला‘ है।

विज्ञान, तकनीक और स्वास्थ्य के जो एक्सपर्ट है, उनको हम भुगतान करके उनसे लेख लिखवा रहे हैं, इसलिए आप ‘अमर उजाला‘ की इस मुहिम का हिस्सा बनिए और एक उच्च गुणवत्ता का कंटेंट पढ़ने के लिए हमारी मदद कीजिए।

समाचार4मीडिया के साथ जयदीप कर्णिक की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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मुझे ऐसा लगता है कि आज न्यूज की क्रेडिबिलिटी कम होती जा रही है: विनीता यादव

वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म ‘न्यूज नशा’ (News Nasha) की मैनेजिंग एडिटर विनीता यादव ने समाचार4मीडिया के साथ तमाम मुद्दों पर चर्चा की है।

Last Modified:
Monday, 05 July, 2021
Vineeta Yadav

वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म ‘न्यूज नशा’ (News Nasha) की मैनेजिंग एडिटर विनीता यादव ने समाचार4मीडिया के साथ तमाम मुद्दों पर चर्चा की है। बता दें कि नई दिल्ली स्थित मीडिया शिक्षण संस्थान YMCA से न्यूज रीडर व जर्नलिज्म में डिप्लोमा करने वाली विनीता ने अपने करियर की शुरुआत ‘डीडी भारती’ से साल 2001 में रिपोर्टर कम एंकर के तौर पर की थी। उन्होंने कई सनसनीखेज घटनाओं और स्पेशल शोज के लिए विशेष कवरेज भी की, जिनमें बदायूं बलात्कार मामला, 16 दिसंबर का निर्भया कांड, मुजफ्फरनगर दंगें, ब्लैक मनी, जनधन योजना, स्वच्छता अभियान, नेपाल भूकंप, उत्तराखंड घोटाला,  धर्म गुरुओं की सत्यता की जांच और हरियाणा में स्त्री भ्रूण हत्या पर स्पेशल शो आदि शामिल हैं।

प्रस्तुत हैं समाचार4मीडिया के साथ विनीता यादव की इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने मीडिया जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। क्या आपने पहले ही तय कर लिया था की आप पत्रकार बनेंगी?

कुछ लोग होते हैं, जिन्हे पता होता है कि उन्हें जीवन में क्या करना है और कुछ को बाद में समझ आता है कि आपको इस प्रोफेशन में जाना है और मैं आपको बताऊं कि मेरा पत्रकार बनने का कोई इरादा नहीं था। उन दिनों जब कॉलेज में थी तो कारगिल युद्ध की खबरें देखा करती थी। इसके अलावा सुहैब इलियासी का एक क्राइम बेस्ड शो भी आता था तो उसे देखकर कई बार इस पेशे के लिए जुनून पैदा होता था।

कॉलेज में मेरे एक सीनियर थे, जिन्होंने पत्रकार बनने की प्रक्रिया मुझे समझाई थी। वो आज ‘जी न्यूज‘ में हैं, लेकिन मेरे परिवार में नौकरी तो किसी ने की नहीं थी तो ये भी एक विचारणीय प्रश्न मेरे लिए था।

दिल्ली से बाहर नहीं जा सकते हैं। शाम को समय से आपको घर आना पड़ेगा, इस प्रकार के कई नियम हमारे ऊपर लागू थे। आखिरकार मैंने फॉर्म भर दिया और मेरी पढ़ाई तो चल ही रही थी, उसके साथ-साथ मैंने नौकरी भी शुरू कर दी थी ‘कौमी पत्रिका‘ नाम से एक अखबार से और सबसे पहले वहीं मैं अपराध जगत की खबरें कवर करती थी।

इसके बाद जब मेरी पढ़ाई पूरी हो गई तो उसी दौरान मुझे ‘दूरदर्शन‘ में एंकरिंग की भूमिका मिल गई। हालांकि मैं इस भूमिका में सहज नहीं थी, क्योंकि मुझे लिखा हुआ पढ़ना होता था और उसके बाद मैंने एंकरिंग छोड़ने का निर्णय ले लिया। इसके बाद ‘बीएजी फिल्म्स‘ में मैंने अप्लाई किया और वहीं से मैंने खोजी पत्रकारिता की शुरुआत की थी।

आप सिर्फ 19 साल की उम्र में क्राइम की न्यूज कवर करने लग गई थीं। उस समय आसपास के लोगों के रिएक्शन कैसे थे?

दरअसल, ऐसी कुछ चीज तो होती हैं। मैं आपको बताऊं कि उस समय अजीत अंजुम जी हमारे बॉस हुआ करते थे। जब ‘सनसनी‘ लॉन्च हुआ तो उन्होंने मुझे कहा कि अब तुम लगातार क्राइम पर ही बढ़िया खबरें करके लाओ।

अब उस समय मैं उनसे कैसे कहती कि मैं न तो खून देख सकती हूं और न ही किसी को रोते हुए देख सकती हूं। बस उसी के बाद मेरे स्टिंग ऑपरेशन वहां से शुरू हो गए और अब तक 55 से अधिक स्टिंग में कर चुकी हूं।

ये वो समय था जब लड़कियां स्टिंग को सिरे से खारिज कर देती थी। एक किस्सा मुझे याद आता है जहां मुझे एक ‘मॉडल कोऑर्डिनेटर‘ के साथ बात करनी थी और सवाल और जवाब दोनों अजीब थे। मैं इतनी हैरान थी कि ये मुझसे ऐसे कैसे बात कर सकता है। उस दिन मैंने ये किस्सा मेरी मां के साथ भी शेयर किया और उनसे कहा कि मैं शायद ऐसे काम अब आगे नहीं कर पाउंगी। 

उस दिन मेरी मां ने मुझे समझाया कि लड़की चाहे पुलिस में हो, वकील हो या डॉक्टर हो, उनके लिए न मर्द मायने रखता है और न ही औरत, उनके लिए सिर्फ उनका काम मायने रखता है। इसके बाद मुझे एक अपने आप में आत्मविश्वास महसूस होने लगा और मां की इस सीख के बाद मैंने फिर पलटकर नहीं देखा।

स्टिंग वाले काम में न सिर्फ आपको पूरी तैयारी करनी पड़ती है, बल्कि आपको अभिनय भी करना पड़ता है। जैसे किसी फ्लैट में अगर 10-12 नाबालिग बच्चियां हैं तो आप रिपोर्टर बनकर तो जाएंगे नहीं। आपको अभिनय ही करना पड़ेगा और ऐसे मैंने खूब स्टिंग किए हैं।

आपने करियर की शुरुआत क्राइम की खबरों के साथ की थी लेकिन बाद में राजनीतिक, सामाजिक, मनोरंजन जैसी खबरें भी आपने कीं। ये बदलाव कैसे हुए?

अगर आप लड़की हैं और नया-नया काम शुरू किया है तो आपके लिए बस एक ही चीज होती है और वो है ‘मनोरंजन‘, उनको इस चीज से कोई मतलब नहीं होता कि आपकी रुचि कहां है? वो ये निर्णय करते हैं कि आप क्या करेंगे! उस समय मैंने ‘दूरदर्शन‘ के लिए ‘खबरें बॉलिवुड की‘ नाम से शो किया था। रिलायंस के फोन में आने वाली छोटी-छोटी वीडियो क्लिप्स को मैं बनाया करती थी लेकिन जैसा कि मैंने आपको बताया कि जब अजीत अंजुम जी मुझे मिले तो उन्होंने मुझे वही करने को कहा, जो मेरी रुचि थी।

इसके अलावा राजनीति की बात करें तो यूपी में 14 हजार किलोमीटर का सफर तय करके मैंने पिछला विधानसभा चुनाव कवर किया था। ये सब मैंने ‘एबीपी न्यूज‘ के लिए किया। दरअसल, वहां पर लोगों को जिम्मेदारी दी जाती है और सबको सब कुछ करना होता है। मैं इसे एक अच्छी चीज मानती हूं, क्योंकि मुझे कई अलग तरह की चीजें करने को मिलीं।

नेपाल भूकंप हो या व्यापाम का मामला हो, ये सब मैंने कवर किया और बहुत कुछ सीखा। अगर देखा जाए तो मुझे भूकंप का बड़ा फोबिया है लेकिन जब नेपाल की त्रासदी आई तो मैंने खुद अपने बॉस को रात को कॉल किया और उनसे कहा कि मुझे वहां जाना है।

कई बार तो स्टिंग ऑपरेशन में ऐसी खतरनाक चीजें मैंने की हैं, जहां मुझे पता है कि मैं कैसे पहुंची हूं। कई बार तो दोपहर में एक बजे मेरी गाड़ी पर कुछ लोगों ने हमला तक कर दिया था, लेकिन कई बार वो कहते हैं न कि ऐसी कौनसी चीज होती है, जिसमें आपको मजा आता है और मेरे लिए वो खोजी पत्रकारिता थी।

हालांकि ये बात अलग है कि पिछले पांच साल से टीवी देखना कम हो गया है और इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि मैं इन सब खबरों को बहुत मिस करती हूं। आज भी आप देखिए कि कितने रैकेट चल रहे हैं और कितनी लड़कियां इनके जाल में फंसाई जा रही हैं, लेकिन कोई भी आज इनकी खबरें करने वाला नहीं है। 

आपने जीवन में कई बड़ी घटनाओं को कवर किया है और आपको काफी सराहना भी प्राप्त हुई है। क्या कोई ऐसी घटना या किस्सा आपको याद आता है जो आपके दिल के बेहद करीब हो?

मुझे हरियाणा में किया गया मेरा स्टिंग याद आ रहा है। दरअसल, एक मशीन थी जो कोख में बच्चे का लिंग पता करने के लिए और उसे मारने के लिए इस्तेमाल की जा रही है और वो चीन की मशीन थी।अब वो किसी के पास तो थी नहीं इसके अलावा जो मुजरिम थे वो अलग-अलग राज्यों के बॉर्डर पर अपने काम को अंजाम देते थे ताकि कानून की पकड़ से वो बाहर रहें।  हम सब जानते हैं कि अगर किसी राज्य के बॉर्डर पर एक मुजरिम अपना गुनाह करके अगर किसी दूसरे राज्य के बॉर्डर में चला जाए तो काफी समय तो मुकदमा कौन लिखेगा इसी में चला जाता है।

मुझे अपना काम करने के लिए वो मशीन चाहिए थी, लेकिन उसे हासिल करना बेहद कठिन कार्य था। आखिरकार मुझे किसी से पता चला कि एक कोर्ट केस में मशीन को सील करके थाने में रखवा दिया गया है और मैंने उस थाने में जाकर विनती की और आखिरकार वो मशीन मुझे मिली।

इसके बाद मैंने स्टिंग किया और उस स्टोरी को बहुत सराहना प्राप्त हुई। मगर आज भी अफसोस इस बात का होता है कि इतना सब कुछ करने के बाद भी हम समाज में कोई खास बदलाव नहीं ला पाए।

एक किस्सा मुझे याद आ रहा है, जहां स्कूल की एक छोटी बच्ची को उसकी प्रिंसिपल और टीचर ब्यूटी पार्लर लेकर जाती थी और उससे गंदा काम करवाया जाता था। मैंने उस बच्ची की बात को पक्का करने के लिए रोज उसकी और उसकी टीचर के बीच होने वाली बात को सुनना शुरू किया। इसके लिए मैं उस बच्ची के कपड़ों के अंदर माइक लगा देती थी और रोज घंटों उनकी बातों को सुना करती थी।

जब मुझे पक्का यकीन हो गया, तब मैंने उसका भंडाफोड़ किया था और उस समय दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री की पूरी टीम बैठी थी और घंटों इस स्टिंग को लेकर चर्चा हुई थी। चूंकि वो एक सरकारी स्कूल था इसलिए सरकार की जवाबदेही भी तय होनी थी और आखिरकार उस प्रिंसिपल और टीचर को सस्पेंड किया गया। वो बच्ची दसवीं कक्षा में थी तो सरकार ने उसका सेंटर भी बदल दिया, लेकिन आज मैं इस प्रकार की न्यूज को मिस करती हूं। मुझे ऐसा लगता है कि आज न्यूज की क्रेडिबिलिटी कम होती जा रही है। 

आप वर्तमान में एक डिजिटल चैनल चला रही हैं। आपने एकदम टीवी से ब्रेक ले लिया है। आप किसी और चैनल में भी जा सकती थीं तो डिजिटल में जाने का निर्णय कैसे हुआ?

सच कहूं तो इसके बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था। मैंने तो कई बार चर्चाओं में इतना तक कह दिया था कि डिजिटल का टीवी के सामने कोई भविष्य नहीं है। ये बात मैंने आज से करीब चार साल पहले कही थी लेकिन उस समय हो सकता है कि मैंने डिजिटल का आकलन करने में गलती की थी।

जब मैं ‘न्यूज नेशन‘ में इन्वेस्टीगेशन टीम की हेड थी तो उस समय मैं डिजिटल की टीम को बारीक से देखा करती थी। उस समय मुझे इस बात का अहसास हुआ कि डिजिटल वाकई में बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

डिजिटल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें समय सीमा का बंधन नहीं है। आप खुलकर न सिर्फ अपनी बात कह सकते हैं, बल्कि लोगों को जोड़कर अपनी बात तमाम लोगों तक पहुंचा सकते हैं।जितनी समय सीमा आज आपको डिजिटल में मिल रही है, उतनी आपको टीवी में नहीं मिलती है। उसके बाद मुझे ऐसा लगने लगा था कि डिजिटल के फील्ड में कुछ करना चाहिए।

इसी के बाद मैंने ‘न्यूज नशा‘ शुरू किया और धीरे-धीरे इसे लोकप्रियता हासिल हुई। आज भी मुझे ऐसा लगता है कि मुझे ‘न्यूज नशा‘ को उस मुकाम पर लेकर जाना है, जहां लोग इसे गंभीरता से लेना शुरू करें।

डिजिटल में काम करने में मुझे बड़ा मजा आ रहा है और इतना मजा आ रहा है कि मैं टीवी को मिस नहीं करती। इसके अलावा पिछले दो साल से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। यूपी और बिहार के हर जिले में हमारे लोग हैं और लखनऊ, नोएडा में हमारे ऑफिस हैं और बहुत ईमानदारी और मेहनत से हम काम कर रहे हैं।

हाल ही मैं हमने ‘स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया‘ के साथ भी सहभागिता की है। वहीं ‘zee 5‘ के साथ मिलकर भी हम काम कर रहे है। ‘Daily hunt‘ पर भी हमारी न्यूज आती है। जब आप अच्छे निर्णय लेते जाते हैं, तो आपकी जिम्मेदारी भी बढ़ती चली जाती है।

मुझे आज भी याद है कि जब मेरे पास ‘स्टार न्यूज‘ का ऑफर आया था तो मैंने उनसे कहा कि मैं सिर्फ स्पेशल स्टोरी करती हूं, रेगुलर काम मैं नहीं कर सकती हूं तो उन्होंने मुझे कहा कि आपको रेगुलर ही करना होगा, क्योंकि यहां स्पेशल जैसा कुछ होता नहीं है। इसके अलावा ‘स्टिंग ऑपरेशन‘ की तो वहां कोई गुंजाइश ही नहीं थी। उस वक्त मैंने उनसे मना करते हुए कहा कि मैं आपको एक एंकर बता देती हूं, जो आपके काम के लिए बिल्कुल फिट है।

इस तरह से मैंने अपनी दोस्त को ‘स्टार न्यूज‘ में भेजा था। इसके बाद उसी दोस्त ने मुझे समझाया कि तुम पहले जॉइन करो और उसके बाद कुछ स्पेशल करने दिखाना और धीरे-धीरे तुम्हें स्पेशल स्टोरी करने का मौका मिल जाएगा। मैंने उसकी बात मानी और वही हुआ। ‘स्टार न्यूज‘ जो स्टिंग को हाथ नहीं लगाता था, उसी के लिए मैंने खूब स्टिंग किए।

आपकी छवि और आपकी ईमानदारी ये दो बेहद जरूरी चीजें हैं और आज के समय में कुछ पत्रकारों के कारण लोगों को ये साबित करना पड़ रहा है। मैंने आज तक स्टिंग ऑपरेशन को सिर्फ ऑफिस की टेबल तक ही लिमिटेड रखा है। कभी उसका गलत इस्तेमाल न तो किसी को करने दिया और न ही किया। इसके अलावा मेरे सारे स्टिंग समाज के लिए होते थे न कि अपने लिए। पता नहीं क्यों, ये चीज मैं मिस कर रही हूं।

अगर डिजिटल की बात करें तो न्यूज चेक बाद में होती है पहले प्रमोट हो जाती है और यही डिजिटल की सबसे बड़ी समस्या है। ‘न्यूज नशा‘ इस दिशा में क्या काम कर रहा है?

मेरा सौभाग्य ये रहा कि मेरे सीनियर्स ने मुझे हमेशा स्टोरी फाइल करते समय एक ही बात सिखाई कि हमेशा दूसरे का पक्ष जरूर रिकॉर्ड करो। जब भी मैं कोई स्टोरी फाइल करती तो हमेशा मैं क्रॉस चेक करती थी कि मैंने सभी का पक्ष लिया है या नहीं। यही बात आज मैंने ‘न्यूज नशा‘ " की टीम को समझाई है। हम कोई भी स्टोरी करते हैं तो हमेशा जांचते हैं कि उसके तथ्य कैसे हैं? कहीं कोई तथ्य गड़बड़ तो नहीं है?

आज हमारी सबसे बड़ी सफलता यह है कि पिछले दो साल में हमारी एक भी स्टोरी ऐसी नहीं है, जिस पर क्लेम आया हो। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि हम बड़ी सावधानी से चलते हैं। मैं आपको बताऊं कि एक-दो स्टोरी तो हमारी ऐसी थीं, जिनका रेस्पॉन्स टीवी की खबर के जितना था और डिजिटल में ये बहुत बड़ी बात है।

हमने ‘Delhi minority commission‘ पर एक न्यूज की थी और वो इतने पुख्ता तरीके से की गई थी कि दिल्ली के उप राज्यपाल को 12 हजार आईडी कार्ड निरस्त करने पड़े थे। ऐसा सिर्फ इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि हमारी स्टोरी और तथ्य पुख्ता थे।

एक महिला होने के नाते क्या आपको कभी भेदभाव का शिकार होना पड़ा? क्या कभी सिर्फ महिला होने के नाते किसी टीम में जगह नहीं मिली?

बिल्कुल ऐसा हुआ है। एक बड़े चैनल में एक अच्छी जिम्मेदारी सिर्फ इसलिए नहीं मिली, क्योंकि मैं महिला थी। मैंने उस वक्त जो हेड थे, उनको भी अपनी शिकायत दर्ज करवाई थी। दरअसल ‘स्टिंग ऑपरेशन‘ के केस में कई बार लड़कियां तैयार नहीं होती थीं या फिर पकड़ी जाती थीं, लेकिन मेरा सौभाग्य रहा कि मैं कभी भी न पकड़ी गई और न ही एक्सपोज हुई। उनकी टीम बहुत अच्छी थी तो मेरा बड़ा मन था कि मैं काम करूं और मुझे उम्मीद थी कि मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। सभी चीजें क्लियर हो गई थीं लेकिन टीम के हेड ने मुझे लेने से मना कर दिया और कभी मुझे उसके पीछे का कारण नहीं बताया गया। बाद में मुझे पता चला कि उनकी टीम में कभी कोई महिला रही ही नहीं और वो महिलाओं को जगह देना भी नहीं चाहते थे। मुझे आज भी इस बात का मलाल है कि सिर्फ महिला होने के नाते मुझे उस टीम से जुड़ने का मौका नहीं मिला।

आपने अपनी पहचान एक खोजी पत्रकार के तौर पर बनाई है, क्या आप वर्तमान में पत्रकारों की स्टोरी में इन सबको मिस करती है?

जी हां, पर सवाल यह भी है कि क्या हम उनके सामने सही मिसाल पेश कर रहे हैं? कितने अच्छे-अच्छे पत्रकार हैं, जो बहुत बढ़िया खबरें करते हैं, लेकिन चैनल पता नहीं क्यों उनकी न्यूज नहीं चलाता है?

आप हाल ही में देखिए कि ‘एबीपी न्यूज‘ के एक पत्रकार ने शराब माफिया पर एक स्टोरी की थी और वो स्टोरी पहले टीवी पर नहीं चली उसे सिर्फ डिजिटल में चला दिया गया और उसके बाद उस रिपोर्टर की हत्या कर दी जाती है। आप सोचिए कि जब ऐसा हमारे पत्रकारों के साथ होने लगेगा तो खोजी पत्रकारिता कैसे होगी?

जब ऐसी बड़ी खबरों को आप जगह ही नहीं देंगे तो मुझे बताइये कि आज की पीढ़ी कैसे काम कर पाएंगी! आज 24 घंटे के टीवी चैनल हैं लेकिन आपको एक भी न्यूज ऐसी नहीं मिल पाएगी, जो आज की युवा पीढ़ी के लिए एक मिसाल कायम कर पाए।

आज कुछ अच्छे लोग टीवी में हैं और ग्राउंड में भी हैं लेकिन क्या उनको पूरी छूट है? शायद नहीं! आज के तमाम युवा पत्रकारों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि आज हर युवा ग्लैमर से प्रभावित होकर टीवी में आ रहा है। अगर आने वाले समय में हम कुछ नयापन नहीं ला पाए तो इससे बुरा पत्रकारिता के लिए कुछ नहीं हो सकता है।

समाचार4मीडिया के साथ विनीता यादव की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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अनुराधा प्रसाद ने बताया मीडिया में अपनी सफलता का राज

अनुराधा प्रसाद नाम है उस शख्सियत का, जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर भारतीय मीडिया जगत में वो मुकाम हासिल किया है, जो बड़े-बड़े पत्रकारों और उद्यमियों के लिये एक सपना है।

Last Modified:
Wednesday, 30 June, 2021
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अनुराधा प्रसाद नाम है उस शख्सियत का, जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर भारतीय मीडिया जगत में वो मुकाम हासिल किया है, जो बड़े-बड़े पत्रकारों और उद्यमियों के लिये एक सपना है। उनके चैनलों में सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला है और उनके प्रोग्राम देश के कई नामी-गिरामी एंटरटेनमेंट चैनलों पर लोकप्रियता की नई ऊंचाइयां छू चुके हैं। इनके अलावा वे एक शिक्षाविद् भी हैं, जो हर साल दर्जनों बच्चों का भविष्य संवार रही हैं। जी हां, यहां बात हो रही है बीएजी फिल्म्स एवं मीडिया की चेयरपर्सन व मैनेजिंग डायरेक्टर अनुराधा प्रसाद की। समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में उन्होंने न केवल अपनी निजी जिंदगी के बारे में, बल्कि अपने करियर के बारे में यहां तक कि बीएजी फिल्म्स की नींव कैसे पड़ी और न्यूज24 चैनल कैसे शुरू हुआ, इन सब विषयों पर विस्तार से चर्चा की। यहां पढ़ सकते हैं उनका पूरा इंटरव्यू-

आपने एक पत्रकार से अपना सफर तय किया और आज आप एक महिला उद्यमी के तौर पर जानी जाती है। अपने परिवार और बचपन के बारे में कुछ बताइये?

देखिए, मैं अपने परिवार में सबसे छोटी थी तो घर में सबका प्यार मुझे मिलता था। मैं बचपन में बहुत शांत थी, यानी कि चुलबुली टाइप और बाहर खेलने वाली लड़कियों जैसी नहीं थी, किताबें पढ़ने का शौक था। अच्छी पढ़ाई लिखाई हुई थी। पिताजी वकील थे, तो हर वर्ग से जुड़े लोगों का आना जाना लगा रहता था। मैं एक ऐसे घर में पली बढ़ी थी, जिसमें आपको किसी भी समय लोगों को मिलने के लिए तैयार रहना होता था।

बपचन में ही हम और हमारा परिवार जैसी सोच खत्म हो गई थी। हम सब लोगों से मिलते थे और अच्छे से मिलते थे। मेरे पिताजी एक प्रसिद्द वकील थे, तो घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं रही। ईश्वर की कृपा रही कि मैं पढ़ाई में भी ठीक ही रही। हालांकि मैनें कभी टॉप नहीं किया, लेकिन अच्छी थी।

आपने पत्रकार बनने के बारे में कब सोचा? क्या कोई ऐसी घटना जिसके कारण आपकी पत्रकार बनने में रुचि पैदा हुई?

देखिए, बचपन तो सामान्य था तो उस समय ऐसा कुछ दिमाग में नहीं था। जब मैं सीनियर स्कूल में थी तो उस समय जेपी आंदोलन का समय था और हमारा परिवार राजनीतिक तौर पर एक जागरूक परिवार था, तो उस समय मेरे दिमाग में ये सब चीज चलती थी।

उस समय मैं साप्ताहिक पत्रिकाएं भी पढ़ने लगी थी। कई बार मुझमें और मेरे भाई में प्रतिस्पर्धा भी होती थी कि कौन पत्रिका को पहले पढ़ पाएगा। एक तरह से वो रुचि मीडिया में नहीं थी लेकिन हां, खबरों में जरूर थी।

धीरे-धीरे समझ में आने लगा की मीडिया में ही जाना है, तो लोग कहते थे कि हो नहीं पाएगा, क्योंकि बिहार में यदि आप महिला हैं तो अधिक से अधिक ग्रेजुएशन और उसके बाद शादी हो जाएगी। अगर किसी अच्छे परिवार से हैं तो आप टीचर या डॉक्टर बन जाएंगे, उससे अधिक आप कुछ नहीं कर सकती हैं।

जब मैं किसी मुद्दे पर बोलती थी, तो परिवार में तो नहीं लेकिन बाहर उसकी बड़ी तारीफ होती थी। लिहाजा इसके बाद मैंने निर्णय ले लिया की कुछ भी हो जाए मुझे पत्रकार बनना है।

जब आपने निर्णय लिया कि आपको पत्रकार बनना है, तो पहला मौका आपको किसने और कैसे दिया?

जब मैनें ये निर्णय लिया कि मुझे मीडिया में जाना है तो मुझसे सबसे पहले पीटीआई में मौका मिल गया था, उस समय टीवी तो उतना था नहीं तो मुझे सबसे पहला मौका वहीं मिला था। उसके बाद वहीं से मेरा करियर टीवी की ओर मुड़ गया, उस समय पीटीआई से दूरदर्शन के लिए कुछ प्रोग्राम बनते थे और शशि कुमार जी उस समय वरिष्ठ एंकर और पत्रकार थे और वही सारा काम देखते थे। बस वहीं से मेरी टीवी पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी।

उस समय क्या महिला पत्रकार होने के नाते आपको कभी मुश्किल आई? कभी असहज महसूस हुआ?

देखिए, जब आप काम की धुन में होते हैं, तो इन सब चीजों को अधिक सोचते नहीं है। इसके अलावा उस समय प्रिंट मीडिया को पहचान मिली हुई थी, न कि टीवी को। उस समय टीवी का मतलब सिर्फ दूरदर्शन माना जाता था। उस समय एक युवा लड़की जिसके बाल कटे हों, दिल्ली से पढ़ी हो और वो आपके बीच में आ जाए तो उस समय लोगों को एक झटका तो खैर लगता ही था।

रोकने की कोशिश दूसरे तरीके से होती थी और आप जानते हैं कि उस समय हमारे समाज में महिलाओं को किस नजर से देखा जाता था।

कई चीजें आपके लिए गढ़ भी जाती है कि ये तो स्मार्ट है, कहीं भी कूद जाती है, जीन्स टी शर्ट पहनती है, आपके लिए एक नजरिया बना दिया जाता है, लेकिन मुझे कभी इन चीजों की परवाह नहीं रही। हर किसी को अपने स्तर पर ये सब झेलना होता है और उससे आगे भी बढ़ना होता है। उस समय लोग बड़े कम थे, तो दायरा एकदम खुला हुआ था। अच्छा ये लगता था कि आप एक रिपोर्टर हैं और उस वक्त के पीएम से आप बात कर सकते हैं।

आपने बहुत कम उम्र में मात्र 40 हजार रुपए में अपना खुद का प्रॉडक्शन हाउस शुरू कर दिया था। BAG फिल्म्स की स्थापना के पीछे क्या आपकी योजना थी और उस समय क्या विचार मन में थे?

देखिए, परिस्थिति आपसे सब कुछ करवाती है। मेरे साथ सबसे बड़ी चीज यही रही है कि मैनें कभी भी बहुत कुछ सोच समझ कर नहीं किया है और इसके बारे में भी इतना नहीं सोचा हुआ था। ये साल 1993 की बात है, जब मैं ‘आब्जर्वर’ को हेड करती थी और मुझे लगा कि मैनें इसे सक्सेस स्टोरी बना दिया है, तो अब कुछ किया जाए। उस समय मेरे साथ दो तीन लोग और थे और हम कुछ नया करने की सोच रहे थे और फिर मैंने अपना खुद का ही प्रॉडक्शन हाउस बना लिया। उस समय मेरे पास कुल जमा पूंजी ही 40 हजार थी और वो सारी मैनें इसमें लगा दी थी।

उस समय लोगों ने मेरा बढ़िया सहयोग किया। जब भी मैं किसी के पास काम मांगने गई तो लोगों ने दरवाजे बंद नहीं किए। हालांकि भागदौड़ होती है और कभी-2 आपको डर भी लगता है, लेकिन ये सब आपको अनुभव भी करना पड़ता है। जैसे कि मैं दूरदर्शन में जब गई तो मुझे उनकी टीम ने भले ही एक दो एपिसोड बनाने को दिए, लेकिन काम दिया। उन्होंने यह कहकर मुझे खारिज नहीं किया कि आपको तो काम आता नहीं है या आप कर नहीं सकती हैं। बस ऐसे ही लोगों के आशीर्वाद और प्यार से मैं और मेरी कंपनी दोनों आगे बढ़ते रहे।

आप एक पत्रकार के साथ-2 शिक्षाविद् भी हैं। आपके ISOMES की गिनती देश के बड़े मीडिया इंस्टीट्यूट में होती है। इसकी स्थापना का ख्याल कैसे आया?

दरअसल, मेरे साथ उस समय समस्या ये आई कि हम उस समय जिसे भी काम सिखाते थे, वो दो तीन महीनें में अच्छा काम सीख जाता और उसके बाद हमे अलविदा कह देता था। इसके बाद मुझे यह महसूस हुआ कि हमारे प्रोफेशन को अगर आगे बढ़ना है, तो उसे ट्रेनिंग की बड़ी जरूरत है। मेरा हमेशा से ये मानना रहा है कि शिक्षा बड़ी जरूरी है और मुझे तो भगवान की कृपा से अच्छे मौके मिले, लेकिन सबको नहीं मिल पाते हैं।

वैसे भी उस समय BAG फिल्म्स लोगों को ट्रेनिंग दे ही रहा था, तो मैंने सोचा क्यों ना इसका एक अच्छा मीडिया स्कूल तैयार किया जाए ताकि बच्चों को सही और अच्छे माहौल में सीखने को मिले। मीडिया में चीजें कभी एक समान नहीं रहती है इसलिए भी मीडिया स्कूल की भूमिका बड़ी हो जाती है और इस तरह से ISOMES की मैनें स्थापना की।

आपने जब ‘न्यूज24’ की शुरुआत की तो उस समय आपको कैसे चुनौती का सामना करना पड़ा, उस अनुभव के बारे में बताएं?

विज्ञान का एक नियम है कि जब वस्तु पृथ्वी की ओर गिरती है, तो त्वरण कार्य करता है। यह त्वरण पृथ्वी के गुरुत्वीय बल के कारण होता है। जीवन में भी ऐसा ही कुछ होता है। मेरे दिमाग में हमेशा एक चीज रही कि जब भी उड़ान भरूंगी, तो ये चुनौती तो रहने ही वाली है। अपना खुद का प्रॉडक्शन मैं देख रही थी, लेकिन टीवी की बात करें तो इसमें आप किसी और पर निर्भर होते हैं। मैनेजमेंट की अहमियत बढ़ जाती है, लोगों को साथ लेकर चलना होता है, किसी और की पसंद और नापसंद को भी लेकर चलना होता है। कभी- 2 ऐसा भी लगता था है कि यदि चैनल को कुछ हो गया, तो इतने लोग जो साथ काम कर रहे हैं। साथ चल रहे हैं, वो किधर जाएंगे।

उस समय स्टूडियो मैंने बना लिया था और मुझे लगा कि मुझे कोशिश करनी चाहिए ताकि आने वाले समय में जब आप पीछे मुड़कर देखें तो कम से कम आपको ये एहसास नहीं हो कि ये हम कर सकते थे, लेकिन किया नहीं और ईश्वर की कृपा से कोशिश हमेशा कामयाब होती है और हमारी भी हुई। 

पिछले एक दो साल से हम देख रहे हैं कि कोरोना के कारण मीडिया जगत बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। इस समय ‘न्यूज24’ का मैनेजमेंट इन चीजों के साथ कैसे डील कर रहा है?

देखिए, कोरोना के इस दौर में मुश्किलें तो हैं और सिर्फ हमारे साथ नहीं, सबके साथ हैं। कमाई भी घटी है और प्रतिस्पर्धा तो आप जानते ही हैं कि कितनी है, लेकिन मेरा मत यह है कि अगर आप अपने लोगों की परवाह करते हैं और उनकी देखभाल अच्छे से कर लेते हैं, तो हर मुश्किल समय कट जाता है।

जितने भी आपसे जुड़े लोग हैं उन सबका ध्यान रखिए। अगर रोटी कम हो गई है तो उसे उस तरह से परोसिए कि किसी की थाली में कम खाना नहीं जाए। हालांकि कई बार आपको ऐसे कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं, जिनसे हो सकता है किसी को कोई समस्या या दिक्क्त हो, लेकिन संस्थान के हित में कई बार ऐसा करना होता है। 

आपने मीडिया में एक लंबा सफर तय किया है। वर्तमान में मीडिया में महिलाओं की स्थिति और उनके भविष्य के बारे में आप क्या सोचती हैं?

देखिए, महिलाएं आज के समय में सबसे अधिक किसी प्रोफेशन में सुरक्षित हैं, तो वो मीडिया ही है। आप डिजिटल, प्रिंट या टीवी किसी भी माध्यम को देख लीजिए, महिलाओं का योगदान आपको जबरदस्त दिखाई देगा। मीडिया पढ़ी लिखी लड़कियों का प्रोफेशन है और इसमें अगर आप सही हैं, तो आप अपनी बात पर अडिग भी रह सकते हैं। हर संस्थान जो आज आपको टॉप पर दिखाई दे रहा है, उसमें महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। मीडिया एक व्यक्ति को या महिला को बहुत कुछ दे सकता है और यही कारण है कि लोग मीडिया की ओर अधिक आकर्षित दिखाई देते हैं। हो सकता है, बहुत अधिक पैसा या पावर नहीं है लेकिन मीडिया का एक अहम रोल देश में है और मीडिया में महिलाओं का एक बहुत बड़ा योगदान है।

आप अपने चैनल के लिए लोगों के इंटरव्यू करती हैं। क्या कभी किसी गेस्ट से तल्खी का सामना करना पड़ा है?

देखिए, कभी-2 ऐसे इंटरव्यू होते हैं, जिसमें आपके मेहमान का कभी-2 पूर्वाग्रह होता है कि आप तो ऐसा ही करेंगी या आप तो ऐसा ही सोचती हैं। लोग कई बार आपके बारे में एक सोच बना लेते हैं या कह लीजिए कि उनका एक नजरिया बन जाता है, लेकिन मेरा अपना एक स्टाइल है।

मैं कभी भी अपने आप को बदलती नहीं हूं और न ही मैं होस्ट बनने की एक्टिंग करती हूं। अगर मुझे ऐसा करना होता तो मैं किसी और फील्ड में होती, मीडिया में नहीं।

मैं हमेशा सोचती हूं कि यदि मैं किसी से बात करने जा रही हूं, तो मतलब मैं किसी को सुनने जा रही हूं, न कि मैं अधिक बोलने जा रही हूं। आपको अच्छा इंटरव्यू करना है, तो सामने वाले को सुनना सीखना होगा। ये लड़ाई करना, कैमरा के सामने एक्टिंग करना मुझे लगता है कि ये हमारे मीडिया के लिए, हमारे प्रोफेशन के लिए सही नहीं है और इसलिए मेरा अपना एक स्टाइल है और मैं उसी तरह काम करना पसंद करती हूं।

आपके ऊपर तमाम जिम्मेदारियां हैं, ऐसे में क्या आप अपने परिवार को पूरा समय दे पाती हैं, कोई शिकायत आती है घर से?

जी बिल्कुल नहीं! दरअसल मैं इतने सालों से काम कर रही हूं, तो मेरे परिवार ने मुझे इसी तरह स्वीकार कर लिया है। चाहे मेरा परिवार हो या मेरे पति हों, सबने मेरे काम और मेरी जिम्मेदारी को आदर दिया है। इसके अलावा अगर बच्चों की बात करें, तो उनको तो हमेशा यही लगता है कि उनको समय कम मिल रहा है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि एक भारतीय महिला को बहुत अधिक किरदार में रहना पड़ता है।

अगर आप काम करती हैं, तो अपने काम को भी देखना है। व्यापार करती हैं, तो पैसे को देखना है, अपने परिवार को देखना है, अपने पति को देखना है, किसी की बहन है, तो भाई को देखना है और उसे सबको साथ लेकर चलना है। मुझे कभी राजीव जी (पति) ने यह नहीं कहा कि तुम्हारे पास समय नहीं है, तो इस मामले में मेरी किस्मत अच्छी है।

समाचार4मीडिया के साथ अनुराधा प्रसाद की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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अगर देश की जनता हमें स्वीकार करती है तो हमारी जवाबदेही भी होनी चाहिए: अनिल सिंघवी

‘जी बिजनेस’ (Zee Business) के मैनेजिंग एडिटर अनिल सिंघवी ने मीडिया जगत में अपने सफर को लेकर समाचार4मीडिया से बात की है।

Last Modified:
Saturday, 26 June, 2021
Anil Singhvi

‘जी बिजनेस’ (Zee Business) के मैनेजिंग एडिटर अनिल सिंघवी ने मीडिया जगत में अपने सफर को लेकर समाचार4मीडिया से बात की है। इस बातचीत के दौरान उन्होंने अपने जीवन से जुड़े कई पहलू साझा किए, वहीं देश की आर्थिक स्थिति और उसके भविष्य पर भी खुलकर चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने तो सीए की पढ़ाई की है, फिर मीडिया में कैसे आना हुआ? अपनी उस यात्रा के बारे में कुछ बताएं।

मीडिया जगत में आने की योजना तो कभी नहीं थी। इधर तो बस ये मान लीजिए की किस्मत से आना हो गया है। हां, मैंने सीए की पढ़ाई की है और उसके लिए मैंने बचपन से ही योजना बना ली थी।आठवीं कक्षा से ही सोच लिया था कि मैं सीए ही बनूंगा और मैं पढ़ाई में बहुत अच्छा था। सब लोग मुझसे कहते थे की आप साइंस पढ़ो, लेकिन मैंने जो बनने की ठानी, वही बना और उसके बाद मैं मुंबई आ गया।

इधर मैंने सीए और सीएस दोनों कीं और शेयर मार्केट संबंधित नौकरी करने लगा। इसके बाद मुझे किसी मित्र के जरिये पता चला कि एक नया हिंदी बिजनेस चैनल ‘सीएनबीसी आवाज’ खुल रहा है और उन्हें ऐसे लोग चाहिए, जिनको न सिर्फ बाजार की समझ हो बल्कि हिंदी भी बहुत अच्छी बोलते हों और पत्रकार भी हों।

अब यहां मेरे लिए दुविधा थी, क्योंकि पत्रकारिता की बिल्कुल समझ नहीं थी लेकिन मैंने अप्लाई किया और मुझे चुन लिया गया। 35 साल की उम्र में दिल ने कहा कि चलो कुछ नया कोशिश करते हैं और बस मीडिया लाइन में आ गया और आपके सामने हूं। 

आपने कहा कि 35 साल की उम्र में मीडिया में आना हुआ, वैसे इस उम्र में सीए लोग अपनी खुद की कंपनी खोलने की सोचते हैं तो आपको मीडिया में आना क्यों बेहतर लगा?

सबसे पहली चीज है कि आपका आईक्यू लेवल और आपकी समझने, परखने की क्षमता अगर बलवान है तो आप कोई भी काम कर जाओगे। अगर किसी काम को करने में आपका जूनून है और चीजों की समझ है तो उसके बाद अंदर से काम करने में मजा आता है। 35 साल की उम्र में आप सिर्फ दो चीजें कर सकते हैं, या तो जो आपको आता है वो आप जीवन भर करिए या फिर कुछ नया सीखिए। मैंने सीखने वाला रास्ता चुना।

मैं आपको एक चीज बड़ी ईमानदारी से कहता हूं कि जो मेरा ऑडिशन हुआ था, वही ऑडिशन आज कोई और मुझे दे तो उसे नौकरी पर रखना तो बहुत दूर की बात है, मैं उसे अगली बार बुलाने तक की गलती नहीं करूं, लेकिन शायद मेरा जो जूनून था, उसने मुझे आगे ले जाने में मेरी मदद की।

मुझे वहां माहौल भी अच्छा मिला और सब मुझे ‘टाइगर‘ कहकर बुलाते थे। मेरी हमेशा एक ही सोच रही कि जब यहां से मैं जाऊं तो अनिल सिंघवी एक नाम हो और लोगों को लगना चाहिए कि कोई यहां से गया है।

हमने अक्सर देखा है कि आप बजट के दिन सुबह से शाम तक एंकरिंग करते हैं और बड़ी आसानी से लोगों को उसके बारे में समझा देते हैं। उन अनुभवों के बारे में हमें बताइए।

ये तो अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि आप कैसे आठ से दस घंटे तक बैठे रहते हैं और सच कहूं तो मेरे दो बजट तो ऐसे गए हैं, जहां मैं सुबह से रात तक बैठा रहा और वॉशरूम तक जाना नहीं हुआ। दरअसल, मुझे खुद नहीं पता कि वो ऊर्जा किधर से आ जाती है। बजट का दिन ऐसा होता है, जहां आप कोई गलती नहीं कर सकते हैं। वित्त मंत्री का एक-एक शब्द सुनो। आपके गेस्ट बैठे हैं और उसी समय आपको आकंड़ों का विश्लेषण भी करना होता है और यही कारण है कि वो दिन हमारे लिए एक बहुत बड़ा दिन होता है।

मेरी हमेशा से ये सोच रही है कि उस दिन मुझे बड़ा मजा आता है, आप किसी अच्छी बैटिंग पिच पर जाएं और बढ़िया रन करके आ जाएं, उसमें उतना मजा नहीं है जितना मजा आखिरी ओवर में 18-20 रन बनाकर टीम को जिताने में है, जिस काम में चुनौती नहीं हो वो काम ही कैसा! ये जो हमारे अंदर जोश आता है, वो दर्शकों के प्यार से आता है और इसलिए वो दिन आप कह सकते हैं कि हम लोगों के लिए एक बड़ा दिन होता है।

आप अपने कार्यक्रम में लोगों को कुछ शेयर खरीदने की सलाह देते हैं और लोग कमाते भी हैं। आप हमें बताइए कि इसके पीछे जो रिसर्च होती है वो आप करते हैं या आपकी टीम करती है?

इस सवाल के जवाब में दो पहलू हैं। एक तो मैं खुद पूरी निगरानी रखता हूं। मुझे पता होता है कि मैं अपने दर्शक को क्या सजेस्ट कर रहा हूं। मैं अपने स्तर पर बाजार का विश्लेषण करता हूं कि अब उसकी चाल कैसे रहने वाली है और ये मैं रोज करता हूं।

अब बात करते हैं स्टॉक की तो उसमें मेरी टीम का बहुत योगदान रहता है क्योंकि सारा डाटा या जिस भी कंपनी की जो भी रिपोर्ट या शीट मुझे चाहिए होती है, वो मेरी टीम मुझे लाकर देती है।

इसके अलावा मैं एक चीज और आपसे कहना चाहता हूं कि मेरी टीम ने मुझे कुछ भी दिया हो, लेकिन एडिटर मैं हूं और उस स्टॉक को खरीदने की सलाह देने वाला भी मैं हूं तो पूरे तरीके से मैं अपने आप को ही जिम्मेदार मानकर चलता हूं।

मैं पूरी ईमानदारी से कहूं तो पिछले 15 साल में शायद ही कोई ऐसा दिन होगा जब मैंने डाटा एनालिसिस नहीं किया हो। कभी कोशिश भी अगर करता हूं कि आज काम अधिक कर लिया, थक गए हैं सो जाओ तो सच बताऊं कि नींद नहीं आती है। मैं रात को कितने ही बजे आऊं, लेकिन मैं रोज एक घंटे अपना काम जरूर करता हूं।

आपने एक बार कहा कि हर नागरिक को अपनी बात कहने का हक है, लेकिन बड़े पदों पर जो लोग हैं, उनकी क्वालिफिकेशन का एक दायरा होना चाहिए! आपको ऐसा क्यों लगता है?

शिक्षा का महत्व हर जगह है, इसका मतलब यह है कि जो भी शिक्षा आपने ग्रहण की है वो आपके गुणों को परिलक्षित करती है। अगर मैं सीए हूं तो लोग मुझसे इतनी तो उम्मीद करते हैं न कि इसको यार इतना तो आता होगा। ठीक इसी प्रकार इस उदाहरण को हम हर डिग्री से जोड़कर देख सकते हैं।

आज अगर किसी को एडिटर बनना है या रिपोर्टर तो योग्यता क्या होगी? इसका कोई तय पैमाना नहीं है। अगर मैं अपना उदाहरण दूं तो शायद हो सकता था कि मैं कभी एडिटर नहीं बन पाता या 35 साल की उम्र में पढ़ना होता, कोई परीक्षा पास करनी होती, मेरे लिए तो अच्छा रहा कि योग्यता का कोई पैमाना नहीं है लेकिन फिर भी मेरा मत है कि पैमाना तय करना चाहिए।

अगर देश की जनता हमें स्वीकार करती है तो हमारी जवाबदेही भी होनी चाहिए। अगर आपको हर प्रोफेशन के लिए डिग्री चाहिए तो मीडिया के लिए क्यों नहीं? अगर ऐसा हो सका तो मेरा ये अनुमान है कि हमारा स्तर ऊपर ही जाएगा, नीचे नहीं।

साल 2020-21 में देश की जीडीपी-7.3 प्रतिशत रही है। कई एजेंसियों ने आर्थिक वृद्धि का अनुमान घटा दिया है। आपको देश की आर्थिक स्थिति का भविष्य क्या दिखाई देता है?

मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि अगर आपको पूरे तीन घंटे की फिल्म देखनी है तो अभी आपने सिर्फ आधे घंटे की फिल्म देखी है, ये हमारी अर्थव्यवस्था का हाल है। हम लोगों को अभी बहुत लंबा सफर तय करना है और आप देखिएगा कि अगले 20 से 25 साल हमारी अर्थव्यवस्था के लिए शानदार आने वाले हैं, जहां अभी हमें बहुत आयाम छूने हैं।

हो सकता है कि कोरोना जैसे हालात के कारण या नई सरकारों के गठन के कारण एक-दो साल बेकार जाएं, लेकिन फौरी तौर पर हम आगे जा रहे हैं और ये मेरा विश्वास है। देश अब उस स्थिति में आ गया है कि सरकार कोई भी आए, आर्थिक प्रगति तो होनी है और दमदार होनी है।

बड़ा बदलाव देश में ये हुआ है कि अब व्यापार को लेकर परिस्थिति बेहतर दिखाई दे रही है। आज व्यापार करने के लिए आपको बैंक से पैसे मिलते हैं, जो पहले इतना आसान नहीं था। आज क्राउड फंडिंग जैसे कॉसेप्ट हैं और देश में रिस्क लेने के लिए माहौल है। पहले लोगों को लगता था कि ये मदारियों और सपेरों का देश है। आज हम बहुत बड़ा मार्केट हैं और देश की युवा आबादी अच्छे से देश की क्षमता को जानती और पहचानती है।

इस देश में बहुत क्षमता है और हमें निवेशकों को और अच्छा माहौल देना होगा ताकि देश में और अच्छा सामान बने और विश्व स्तर की गुणवत्ता का बने। अगर आज आप व्यापार के कार्य को देखें तो वो भी देश को आगे बढ़ने में योगदान दे रहा है, सरकारों को टैक्स दे रहा है तो उसे भी अच्छी नजर से देखा जाए और चीजें बदलें तो देश बहुत आगे जाएगा।

सरकार लगातार बैंकों का विलय करती जा रही है। एक आम आदमी इससे कई बार डर जाता है कि कहीं बैंक खत्म तो नहीं हो जाएंगे। उस आम आदमी के लिए आसान भाषा में इसे समझाइए।

आप कभी ‘लोनावला’ घूमने जाइए तो आप देखेंगे कि रोड के दोनों तरफ हम लोगों को ’मनगलाल चिक्की’ का बोर्ड दिखाई देगा। अब आप सोचिए कि अगर कोई आदमी पहली बार जाएगा तो वो संशय में पड़ जाएगा कि इतने कितने परिवार के सदस्य हो गए, जिन्होंने एक ही नाम से अलग-अलग दुकान खोल ली है।

दरअसल, यही हाल हमारे बैंकों का है। अगर स्वामित्व सरकार के पास ही है तो क्यों अलग-अलग बैंक हैं? एक ही मोहल्ले में, एक ही शहर में आपको 50 बैंक क्यों चाहिए? सरकारी बैंक होने चाहिए क्योंकि सरकार की नीति को प्राइवेट बैंक कभी भी पूरे तरीके से दिल से क्रियान्वित नहीं करते हैं।

सरकारी बैंकों की हमें जरूरत है, लेकिन कितने चाहिए, ये बड़ा सवाल है! मेरा मानना यह है कि तीन या चार सरकारी बैंक आप बना लीजिए बहुत हैं, इससे न सिर्फ सरकार की नीतियों के क्रियान्वयन में मदद मिलेगी, बल्कि लोगों तक पैसा भी जाएगा।

कोरोना काल में शेयर मार्केट ने दो महीने में चार साल की बढ़त खो दी और उसके एक साल बाद वो एक बार फिर अचानक से 50000 अंकों के ऊपर काम कर रहा है! क्या आपको नहीं लगता कि 26000 से 50000 का स्तर जल्दी आ गया है। क्या ये बुलबुला है?

एक चीज मैं आपको पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि ये जो भी स्तर आप देख रहे हैं, ये बुलबुला बिल्कुल भी नहीं है। कुछ शेयर जरूर हो सकता है कि उच्चतम स्तर पर हों, लेकिन पूरा मार्केट बुलबुला नहीं है।

देखिए, बाजार कभी भी परफेक्ट नहीं होता है। कई बार देखते हैं कि शेयर बाजार अपने उच्चतम स्तर पर है लेकिन कई शेयर ऐसे हैं जो निम्नतम स्तर पर आपको दिखाई देंगे, वहीं कई बार बाजार की गिरावट में भी कुछ शेयर बढ़ते हैं तो ये सब चलता रहता है।

बाजार न भूतकाल देखता है और न वर्तमान, वो भविष्य देखता है। जब कोरोना के केस बढ़ने लगे तो बाजार ने भविष्य को देखा और अपनी चार साल की बढ़त दो महीने में खो दी और अब जब बाजार को उम्मीद दिखाई दे रही है तो वो 50000 के स्तर के ऊपर है।

आप आज शेयर खरीद रहे हैं और उसको भविष्य में बेचना है, लेकिन अगर आप कल में अटके रहे तो न ही आप उसको खरीद पाएंगे और न ही अच्छे स्तर पर बेच पाएंगे। इसके अलावा अगर आपको लगता है कि इस बाजार की तेजी में जब वो भविष्य को देखकर आगे बढ़ रहा है, आपको कुछ बेचना है तो आप बेच दीजिए।

हां, इस समय बाजार सस्ता नहीं है ये सही बात है लेकिन आप ये कहें कि बुलबुला है तो मैं इससे सहमत नहीं हूं। ( मुस्कुराते हुए) लोगों को तेजी चाहिए 2021 की लेकिन भाव 2020 का चाहिए, तो ये संभव नहीं है।

कोरोना काल में आपने एक मुहिम चलाई कि शेयर नहीं लेना है। मार्केट 41000 से 26000 आना बड़ी बात होती है। आपको इतनी बड़ी गिरावट का अंदाजा कैसे हुआ?

ये आपने बहुत अच्छा सवाल किया है। दरअसल, जीवन में मैंने एक चीज सीखी कि आपको जो भी चाहिए, उसे पाने के लिए मेहनत कीजिए। कोरोना ऐसा समय था, जब आपको सरकार ने कहा कि कुछ मत कीजिए, बस घर में बैठ जाइए। सरकार को तो 2008 में ही गणित समझ आ गया था कि जब भी बाजार में कोई गड़बड़ हो तो पैसा मार्केट में डाल दीजिए, जिसको जितना चाहिए, उसको दे दो ताकि खर्च करने की क्षमता बढ़े।

दुनिया के इतिहास में पहली बार ये हुआ था कि किसी समस्या का समाधान यह है कि आप कुछ मत करो। उस समय ही मैं समझ गया था कि ये समस्या अलग है और इसका असर तो तगड़ा ही आएगा।

भारत से अमेरिका जाना मुश्किल था, लेकिन आप अपने ही पड़ोसी के घर नहीं जा सकते तो आप समझ जाइये कि बाजार इसको कितना तेजी से पकड़ने वाला था और हुआ भी यही। उसी समय हमने अपने दर्शकों को कहा कि अब नहीं लेना है और बाजार जब नीचे आया और जब मुझे लगा कि अब ये भविष्य को देखकर आगे बढ़ने वाला है, उस समय खुद मैंने कहा था कि मैं अपनी 40 फीसदी नगदी बाजार में डाल रहा हूं, आप भी लगाइए।

आज भी इस देश में शेयर बाजार की समझ रखने वाले और उसमें पैसा लगाने वाले लोग बहुत कम हैं। क्या आपको ऐसा लगता है कि आने वाले समय में इनकी संख्या बढ़ेगी?

आपको इस देश में दो तरीके के लोग मिलते हैं। एक वो जो आपसे ये कहेंगे कि मैं तो कभी बाजार में पैसा लगाता नहीं,  मुझे तो समझ नहीं आता कि ये क्या है और दिन भर ऊपर-नीचे होता रहता है। वो लोग ऐसे हैं जो कभी अपने जीवन में एक शेयर नहीं खरीदते लेकिन इसको जुआ, सट्टा और न जाने क्या-क्या नाम देते हैं। दूसरे वो लोग हैं, जो अपनी पूरी कमाई को ही शेयर बाजार में लगा देते हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि ये दोनों ही तरह के लोग गलत कर रहे हैं। रही आपके सवाल के दूसरे हिस्से की बात तो देखिए देश में आज भी लोगों के अंदर बाजार को लेकर जागरूकता नहीं है तो वो जो सोचते हैं, गलत नहीं सोचते हैं।

मेरा जैसा व्यक्ति भी सीए जब बना तो समझ आया कि शेयर बाजार क्या है। वहीं आप विदेश में जाइए तो स्कूली शिक्षा में ही ये सब चीजें शामिल होती हैं। इसलिए बदलाव जब व्यापक स्तर पर होगा तो उसका असर दिखाई देगा।

हमारे पूर्वजों को जब भी पैसा बनाना होता था वो जमीन और सोना लेते थे। अगर आपातकाल के लिए निवेश है तो सोना ले लो, रातों रात बिक जाएगा और आने वाली पीढ़ी के लिए निवेश करना है तो जमीन ले लो, वो आराम से बढ़ती रहेगी।

लेकिन समझने वाली बात यह है कि उनके पास इसके अलावा कोई और दूसरा विकल्प था ही नहीं। आज विकल्प भी हैं और अवसर भी हैं।

वर्तमान में जो लोग बाजार में निवेश कर रहे हैं, उनके लिए आप कोई खास सलाह देंगे?

एक तो मेरा हमेशा ये ये मानना रहा है कि इंसान हो या निफ्टी, अंत में जाना उसको ऊपर ही है। आपको बस इतना ध्यान रखना है कि निफ्टी ऊपर जाए, इससे पहले आप ऊपर न चले जाएं। 1979 में बाजार 100 से आज 50000 के ऊपर है। सिर्फ 42 साल में बाजार ने आपको 520 गुना करके दिया है। दूसरी चीज आपको ये ध्यान रखनी है कि मुनाफे का लालच थोड़ा कम कीजिए। अगर आप रोज तीन से पांच फीसदी की तेजी की उम्मीद करते हैं तो कोई भी शेयर आपको 1000 फीसदी का मुनाफा तो नहीं देगा। इसका अर्थ यह हुआ कि आपके और बाजार के गणित में फर्क आ रहा है। तीसरी और आखिरी चीज ये है कि निवेश करना और ट्रेडिंग करना अपने आप में फुल टाइम जॉब है।

आप कोई नौकरी करते हैं और अगर 15 से 20 फीसदी की तनख्वाह बढ़ रही है तो ऐसा नहीं हो सकता है कि आप एक बार निवेश करें और आपका पैसा कई गुना दर से बढ़ने लग जाए। इसमें आपकी समझ और मेहनत दोनों से ही पैसा बढ़ता है।

समाचार4मीडिया के साथ अनिल सिंघवी की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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महज नौकरी नहीं है पत्रकारिता, चाहिए होता है जुनून: प्रबल प्रताप सिंह

न्यूज18 (हिंदी क्लस्टर) के ग्रुप एडिटर प्रबल प्रताप सिंह ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत में अपने अनुभवों को साझा किया है।

Last Modified:
Tuesday, 22 June, 2021
Prabal Pratap Singh

प्रबल प्रताप सिंह लंबे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वह अब तक तीन युद्ध- अफगानिस्तान, इराक और इजराइल-लेबनान कवर कर चुके हैं। कश्मीर और उत्तर-पूर्व विवाद को भी उन्होंने कवर किया है। वर्तमान में न्यूज18 (हिंदी क्लस्टर) के ग्रुप एडिटर पद पर कार्यरत प्रबल प्रताप सिंह ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है और अपने अनुभवों को हमारे साथ साझा किया है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

क्या आप हमेशा से मीडिया में आना चाहते थे? अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बारे में कुछ बताएं।

मेरे पिताजी बहुत सख्त थे तो बचपन में एक अनुशासन था और मैंने उसे आगे भी अपनाया। चूंकि मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में थे तो मैं कभी किसी स्कूल में अधिक समय तक नहीं रुक पाया। कहीं एक साल तो कहीं दो साल, इस तरह से मेरी बचपन की शिक्षा पूरी हुई है। हालांकि मैं अपनी बात कहूं तो कहीं न कहीं मैं लापरवाह भी था। मैं जब भी कोई शैतानी करता था तो मुझे कभी इसकी परवाह नहीं होती थी कि इसका परिणाम क्या होगा। मुझे ऐसा लगता है कि शायद वो स्वभाव का ही कमाल है कि आज मैं यहां हूं। वरना अगर मैं सब कुछ सोचकर करता तो आज इस मुकाम तक नहीं आ सकता था।

मैंने उत्तर प्रदेश से ग्रेजुएशन किया और जेनयू से एमफिल की पढ़ाई पूरी की, इसके बाद मैंने अपनी पीएचडी की पढ़ाई शुरू की लेकिन जैसा कि मैंने आपको पहले ही कहा कि मैं बहुत लापरवाह था तो मैंने अपनी पीएचडी बीच में ही छोड़ दी।

इसके बाद मेरे साथ समस्या यह थी कि मैं करूंगा क्या? बहुत सोचने के बाद मैंने पढ़ाने का निर्णय लिया और दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाने लगा। हालांकि मुझे करीब एक साल बाद वह भी रास नहीं आया तो यहां से भी छोड़ दिया। मेरे बड़े भाई एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखते थे और वो खूब किस्से भी सुनाते थे। बड़े राजनेता उनसे मिलने भी आते थे तो मैंने सोचा कि ये काम मेरे मन लायक है तो क्यों न इस काम को किया जाए?

मीडिया में आपकी यात्रा कैसे शुरू हुई, उसके बारे में कुछ बताइए।

जब मैंने पढ़ाना छोड़ा तो मेरे पिताजी का तो नहीं लेकिन मेरे भैया का मुझ पर बड़ा दबाब था, लेकिन मुझे आईएएस और आईपीएस बनने में न कोई रुचि थी और न ही मुझसे वो हो  सकता था। मैंने अपने दो मित्रों के साथ ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ मैं अप्लाई किया था और चयन होने में कोई परेशानी नहीं आई।

शुरू में हमें सिटी रिपोर्टर की जिम्मेदारी मिली थी। तकरीबन छह महीने बाद हो सकता है कि उनको मुझसे अच्छा कोई मिल गया था तो मुझे वहां से छोड़ना पड़ा और उसके बाद मैं ‘राष्ट्रीय सहारा‘ में आ गया। मुझे एजुकेशन बीट दी गई और उसी पर मैं हिंदी में रिपोर्टिंग किया करता था। चूंकि मैं जेएनयू में पढ़ा था तो मुझे ये अपने मनमुताबिक वाला काम लगता था और इसका असर मेरे काम में भी दिखाई देता था।

मैं रोजाना कुछ न कुछ लिखता था और वो अखबार में भी छपने लगा था। मेरी एक मित्र उस वक्त ‘द पायनियर‘  में रिपोर्टर थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारी अंग्रेजी इतनी बढ़िया है तो हिंदी में क्यों समय बर्बाद कर रहे हो? उसके बाद मेरा ‘द पायनियर‘ में इंटरव्यू हुआ।

मुझे एक एजुकेशनल रिपोर्ट लिखने को कही गई, जिसके बारे में मुझे पहले से आइडिया था। मेरी वो स्टोरी उन्हें अच्छी लगी और इस तरह फिर मैं ‘द पायनियर‘ से जुड़ गया और वहां मैंने छह साल तक काम किया।

मैं तकरीबन रोजाना कुछ न कुछ एक्सक्लूसिव स्टोरी फाइल करता था और वो मेरे एडिटर को पसंद भी आती थीं। एक बार मेरे एडिटर ने मुझसे कहा कि आप क्राइम क्यों नहीं कवर करते? मुझे भी उनका आइडिया अच्छा लगा तो जिस लगन और मेहनत से मैं एजुकेशन बीट पर काम करता था, उसी मेहनत से मैंने क्राइम बीट पर काम करना शुरू कर दिया।

उसके बाद कई बड़ी स्टोरी मैंने कवर कीं। रोमेश शर्मा का एक बड़ा फेमस केस था, जिसमें लगातार 17 दिन तक मैंने स्टोरी की थीं और वो सभी पहले पेज पर छपती थीं। इस केस के पूरे राजनीतिक नेक्सस को मैंने एक्सपोज किया था। इसके अलावा ‘जी न्यूज‘ में काम करने वाली एक लड़की और उसके दोस्त की बॉडी मिली थी और वो बहुत पेचीदा केस था, उसमें भी मैंने 18 स्टोरी फाइल की थीं और सब पेज एक पर छपती थीं। उस मर्डर कम सुसाइड में जब प्रेस वार्ता हुई तो लगभग 70 फीसदी बातें वही थीं, जो मैंने इन्वेस्टीगेट की थीं।

इसके बाद हमारे एडिटर ने भी अखबार में पूरा तुलनात्मक अध्ययन छपवाया, एक पेज पर पुलिस ने जो कहा वो था और एक पेज पर जो मेरी फाइंडिंग थी, वो बताई गई थीं। उस दिन मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने सोचा कि चलो मेरा काम सराहा जा रहा है। 

90 के दशक में आतंकी, बम ब्लास्ट जैसी चीजें आम थीं और मेरा भी इंट्रेस्ट इन सबमें होने लगा था। उसके बाद ‘द पायनियर‘  के आर्थिक हालात ठीक नहीं थे तो हम कुछ लोग अब ‘ईटीवी‘ लिए आधा घंटे का स्पेशल प्रोग्राम करने लगे।

उस दौरान कश्मीर में सिखों को मारा जा रहा था, उसकी रिपोर्टिंग करने के लिए भी मुझे भेजा गया था। उस आधे घंटे की जो स्टोरी मैंने फाइल की थी, उसका कई भाषाओं में रूपांतरण हुआ था। ‘ईटीवी‘ में अधिक समय तक मेरा रहना नहीं हुआ। एक दिन मुझे ‘आजतक‘ से कॉल आई और उनका ऑफर मैंने स्वीकार कर लिया। मुझे ‘आजतक‘ में गए बस कुछ महीने ही हुए थे कि लाल किले पर अशफाक नाम के आदमी ने हमला किया था और कुछ लोग मारे भी गए थे।

उस हमले के दो दिन बाद एक एनकाउंटर हुआ था जामिया में, एक आतंकी मारा गया था जबकि अशफाक को जिंदा पकड़ लिया गया था। मैंने अपने सूत्रों का इस्तेमाल करके उसका इंटरव्यू लिया और वो एक्सक्लूसिव था।

उस समय वो इंटरव्यू ‘आजतक‘ पर खूब चला था। इसके बाद मैंने उसकी पत्नी को भी ट्रैस किया और उसका भी इंटरव्यू किया था। उस समय ‘सिमी‘ नाम के संघटन का बड़ा जोर था। कई राज्यों से मांग आ रही थी कि इसे प्रतिबंधित किया जाए। मैंने अलीगढ़ जाकर उसकी पूरी छानबीन की और अपनी स्टोरी फाइल की। जब मेरी स्टोरी टीवी पर चली, उसके 48 घंटे के अंदर ‘सिमी‘ प्रतिबंधित हो गया था।

उसी समय कोलकाता में ‘अमेरिकन सेंटर‘ पर हमला हुआ था और उस हमले के मुख्य आरोपी के पूरे परिवार का इंटरव्यू मैंने किया था। उस हमले का मास्टरमाइंड दुबई में था और उस इंटरव्यू की भी बहुत चर्चा हुई थी। उसके बाद में अफगानिस्तान चला गया था। इसके बाद मैंने 2006 में ‘आजतक‘ छोड़ा और ‘आईबीएन7‘ में एग्जिक्यूटिव एडिटर बनकर आ गया था। उसके बाद वापस 2011 में ‘आजतक‘ में आया और साल 2013 में छोड़ दिया।

आपने ‘आजतक‘ में एक स्पेशल इंवेस्टिगेटिंग टीम बनाई थी और कई स्टिंग भी किए थे। उनके बारे में बताइए।

बिल्कुल, मैंने ही वो टीम बनाई थी और मैं ही उसे लीड भी करता था, उस समय सेल्स टैक्स में चोरी की बहुत न्यूज आ रही थीं तो मैंने टीम से कहा कि चलो स्टिंग करते हैं। इसके बाद हमने 12 दिन में उस पूरे घोटाले का पर्दाफाश किया और उस दौरान सरकार की ओर से 16 अधिकारियों को निलंबित किया गया था।

वहीं, तिहाड़ के बारे में मुझे पता चला कि अवैध रूप से तिहाड़ के अंदर सामान जा रहा है। इसके बाद मैंने एक लड़के को तिहाड़ के अंदर भिजवाया और पूरे रैकेट का भंडाफोड़ कर दिया। उस दौरान भी 13 लोगों को नौकरी से बर्खास्त किया गया था। ‘आजतक‘ में रहकर ऐसे कई स्टिंग हमने किए और वो एक शानदार यात्रा थी।

आपने अफगानिस्तान पर काफी रिपोर्टिंग की है। उसके बारे में कुछ बताइए।

देखिए, अफगानिस्तान में तो हमनें चोरी से बॉर्डर क्रॉस किया और अंदर घुसे थे। मेरी उस समय दाढ़ी बढ़ी हुई थी। दुर्भाग्य से हमें पकड़ लिया गया और उन्होंने समझा कि हम पाकिस्तानी हैं। वो मेरा हाथ मरोड़े जा रहा था और हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम कैसे बात करें क्योंकि उनको न हिंदी आती थी और न ही अंग्रेजी, वो बार बार ‘तुम पाकिस्तानी‘ कहे जा रहा था।

फिर मेरे कैमरा पर्सन को एक आइडिया आया और उसने हिंदी-हिंदी कहना शुरू किया और तीन-चार अभिनेताओं के नाम लिए। उसके बाद वो समझा कि हम पाकिस्तानी नहीं हैं और इसके बाद उसने बिरादर कहकर मुझे सीने से लगाया और उसके बाद हम अंदर घुसे।

वो दिन बेहद यादगार थे, जहां नौ दिन तक बिना भोजन किए हमने गुजारे हैं। कुछ अंगूर और सेव हमको मिले थे, बस वही सहारा थे। बहुत कुछ कवर किया था और मरते-मरते भी बचे थे। इसके अलावा एक और बात मैं आपको बताऊं कि डर नहीं लगता है। डर और ताकत में एक छोटी बारीक लाइन होती है और एक सेकंड में आप निर्णय करते हैं कि आप डरपोक हैं या ताकतवर।

आपने सद्दाम हुसैन के ‘स्पाइडर होल‘ तक पहुंचने में सफलता पाई और ऐसा करने वाले आप अकेले भारतीय पत्रकार थे। उसके बारे में हमें बताइए।

मैं उस समय इंडिया में ही था, जब एक दिन मुझे पता चला कि सद्दाम को गिरफ्तार कर लिया गया है। मुझे कहा गया कि आप जाइए और जो भी ग्राउंड रिपोर्ट है, उसे कवर कीजिए। मैं फ्लाइट से लेबनान गया और बाई रोड फिर मैं वहां पहुंचा जहां सद्दाम को रखा गया था। दरअसल जिस ‘तिकरित‘ नदी के पास उसने छिपने के ठिकाना बनाया था वहां तक जाना मुश्किल था।

उस समय मैं जिस होटल में था, उसी होटल में तीन-चार विदेशी पत्रकार भी थे। अब सद्दाम अमेरिका के कब्जे में था और हमें वो कोई खास मानते नहीं थे तो मैंने एक विदेशी पत्रकार को दोस्त बना लिया था।

जब वो जाने लगे तो हम भी उस पत्रकार के साथ हो लिए, लेकिन आगे मुझे रोक दिया गया क्योंकि मेरे पास अनुमति पत्र नहीं था। उस समय मैंने झूठ बोला कि मैंने तो रजिस्ट्रेशन करवाया था लेकिन हो सकता है किसी तकनीकी खामी के कारण ना हुआ हो।

मेरी किस्मत अच्छी थी कि उसने अपने सीनियर के पास मुझे भेज दिया। उसके बाद उसने मेरा कार्ड देखा और जब उसे पता चला कि मैंने अफगानिस्तान में कई दिनों तक रिपोर्टिंग की है, तो उसने मुझे जाने की अनुमति दे दी। उस समय वहां 10 से 12 पत्रकार थे और पूरे साउथ एशिया से मैं अकेला था। उस समय जितने भी पत्रकार थे, वो सब बाहर का व्यू कवर कर रहे थे, लेकिन मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा था।

मैंने सोचा कि बाहर से क्या रिपोर्ट करना, अंदर जाते है। मैंने जब यूएस आर्मी से ये रिक्वेस्ट की तो एक बार वो भी हक्के बक्के रह गए। किसी पत्रकार ने ऐसी रिक्वेस्ट नहीं की थी कि उसे सीधे सद्दाम से ही मिलना है।

मुझे उन्होंने दस मिनट का समय दिया और मैं अंदर जाने की तैयारी करने लगा। मैंने अपने कैमरापर्सन से कहा कि मैं जो भी अंदर बोलूंगा, उसे रिकॉर्ड करना और बाहर आकर मैं एक स्टोरी बना दूंगा, जिसे तुम बढ़िया से विजुअल के साथ रिकॉर्ड करना। ऐसे में सद्दाम से मिला और इंडिया में जब लोगों ने उसे देखा तो मुझे जबरदस्त सराहना प्राप्त हुई।

आपने कश्मीर को भी काफी करीब से देखा है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद क्या आपको लगता है कि अब हालात अच्छे होंगे ? क्या पाकिस्तान के शांति राग पर आपको विश्वास है?

पाकिस्तान पर तो मुझे जरा भी विश्वास नहीं है। अब बात करें अनुच्छेद 370 की तो इसके हटने के पहले भी मेरा ये मत था कि वहां की एक बहुत बड़ी साइलेंट मेजोरिटी है जो विवाद नहीं चाहती है लेकिन वो उन लोगों से डरते हैं, जो आवाज उठा रहे हैं।

दरअसल, भारत का विरोध करने वाले लोग कम हैं लेकिन उनके पास हथियार और ताकत दोनों हैं। इस समय पाकिस्तान की पूरी कोशिश होगी कि वो अपने एजेंटों के जरिए कश्मीर के लोगों को भड़काए। कश्मीर के बारे में जो भी लोग कहते हों, लेकिन मैं उन लोगों के बीच में रहा हूं। रात में गाड़ी उठाकर गांवों में चला जाता था और खूब समय उनके बीच बिताया है।

वहां की जो राजनीति है उसके कारण लोगों की छवि इस प्रकार की हो गई है। आप देखिए कि जब अनुच्छेद 370 हटाया गया तो अधिक विरोध नहीं हुआ और न ही कोई खूनखराबा हुआ। दरअसल ये सब काम पाकिस्तान के और कश्मीर के कुछ उग्रवादी लोगों के हैं, जिनके खिलाफ सरकार को काम करना चाहिए और वो कर भी रही है।

जहां तक बात पीओके की है तो संसद में प्रस्ताव पारित हो चुका है कि वो हमारा ही हिस्सा है लेकिन ये कहना कि अगर हम पीओके पर कब्जा कर लेंगे तो आतंकवाद ही खत्म हो जाएगा, इससे मैं सहमत नहीं हूं। अगर हम ऐसा करने में कामयाब भी हुए तो मुझे लगता है कि पाकिस्तान कोई और रास्ता अपना सकता है। इसके पीछे कारण ये है कि पाकिस्तान की राजनीति ही भारत विरोधी है।

गलवान घाटी में चीन के सैनिकों के साथ हुई झड़प और अब कोरोनावायरस को लेकर चीन के साथ हमारे संबंध ठीक दिशा में नहीं जा रहे हैं, आपको क्या लगता है?

चीन हमारा पड़ोसी भी है और साझेदार भी है। आपको मैं एक किस्सा बताता हूं और ये बात साल 2009 -2010 की है। भारत सरकार की ओर से एक सज्जन चीन गए थे और उन्होंने वापस आकर मुझे अपने पास बुलाया था। मैं भी उनके पास चीजें समझने के लिए गया था कि कैसे भारत और चीन के बीच बातें आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि जब वो चीन के टॉप लीडर्स से मिले तो उन्होंने (चीन के अधिकारियों ने) कहा कि आप हमारे पड़ोसी हैं, साझीदार हैं, लेकिन आप अपना ट्रेड अमेरिका के साथ बढ़ा रहे हैं, हमारे साथ क्यों नहीं!

चीन के साथ समस्या कम्युनिस्ट पार्टी और विदेश नीति है। आज चीन आपका साथी है, लेकिन कल को वो आपके साथ क्या कर दे, इसका आपको अंदाजा भी नहीं लग पाएगा। इसलिए फिलहाल जो हो रहा है, चाहे वो गलवान में हो या कोरोना को लेकर चीन के ऊपर लग रहे आरोप हों, ये उसकी नीति का हिस्सा है।

बाकी मुझे लगता है कि गलवान पर जो जवाब देना था, वो हमने दिया है। ऐसा कहना कि संबंध ठीक दिशा में नहीं हैं, तो इससे मैं सहमत नहीं हूं। इसका समाधान 24 घंटे में नहीं हो सकता है। आप जब तक चीन के बाजार को टक्कर देने की स्थिति में नहीं होंगे, तब तक वो ऐसा करता रहेगा।

आपने अपने जीवन में कई बार जोखिम भरी रिपोर्टिंग की है। आज के युवा पत्रकारों को क्या कहना चाहेंगे?

मैं तो इस फील्ड का नहीं हूं, गलती से आ गया था। मैं तो टीचर था लेकिन इस काम में मजा आने लगा तो बस करने लगा। आज तो मैं देख रहा हूं कि काफी पढ़े-लिखे लोग आगे आ रहे हैं। उन लोगों से मैं बस एक ही बात कहूंगा कि अपने काम को जियो, इसे नौकरी की तरह मत लो।

आप चाहे एंकर हों, रिपोर्टर हों या स्क्रिप्ट राइटर हों, जिस दिन आप इस पेशे को जीने लगेंगे, उसी दिन से आपको काम में एक अलग ही मजा आएगा और जिस दिन आपको इस पेशे में मजा आने लगा, उसी दिन से आप अच्छा काम करने लग जाएंगे।

अगर आप नौकरी को पेशा समझते हैं तो ये जान लीजिए कि ये नौकरी का पेशा नहीं है। हम जब फील्ड में होते थे तो कितनी ही गर्मी होती थी। एक बोतल पानी घंटों तक नसीब नहीं होता था लेकिन हमारी वो जरूरत कभी हमारे काम में अड़चन नहीं बनी। अगर 24 घंटे तक खाना नहीं मिला तो नहीं मिला, हो सकता है दो दिन बाद मिलेगा, लेकिन काम पहले है खाना नहीं। इसलिए ये नौकरी वाला काम नहीं है, इसमें जुनून की जरूरत है।

आपने कई बार अपनी जान को जोखिम में भी डाला है। कोई ऐसा किस्सा याद आता है, जब आपको लगा हो कि आज तो मरते-मरते बचे!

बिल्कुल, जीवन में कई बार ऐसा हुआ जब ये लगने लग गया कि अब जान बचने वाली नहीं है। अफगानिस्तान का एक किस्सा मुझे याद आता है। दरअसल, मैं वापस लौट रहा था और कंधार से 12 घंटे से भी अधिक का वो सफर था।

हम गाड़ी में थे और बीच में एक पहाड़ी का रास्ता आता है, जिसे ‘अंजुमन हिल‘ के नाम से जाना जाता है। लगभग 16000 फीट की ऊंचाई पर वो थी और पहाड़ी को काटकर ही सड़कों का निर्माण किया गया था।  

अब जब उस पहाड़ी पर चढ़ने लगे तो हमें बीच में एक चरवाहा मिला और चूंकि वहां बर्फीली हवाएं बहुत तेज आती हैं तो हमने उससे पूछा कि ऊपर मौसम कैसा है? उसने कहा कि आप जाइए, मौसम ठीक है लेकिन शाम होते-होते भयानक बर्फबारी शुरू हो गई। दोनों तरफ खाई, पतला रास्ता, ऊपर से बर्फ और गाड़ी सांप की तरह इधर-उधर होने लगी।

आधी जीप बर्फ से ढंक चुकी थी, कोई मदद नहीं थी और सैटेलाइट फोन सिर्फ इतना ही चार्ज थी कि कुछ मिनट किसी से बात हो जाए तो हो जाए। उस समय हम सबको मौत दिखाई देने लगी थी। तालिबानियों के बारे में सुनते थे कि वो बस आते हैं और मारकर चले जाते है। लास्ट एक पॉइंट बैटरी फोन में थी और हम चार लोग मौत की बात करने लगे। हमें लगा कि किसी से बात कर सके तो कर लेते हैं, वरना हमारी लाश भी किसी को नहीं मिलने वाली है।

मेरा कैमरापर्सन भावुक हो गया और मैं भी बस मृत्यु का ही इंतजार करने लगा। सब चुपचाप थे और ऑक्सीजन कम हो रही थी। रात के करीब डेढ़ बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया और हमें यकीन हो गया की तालिबानी आ गए हैं और अब हम मारे जाएंगे।

बड़ी दुविधा के बाद दरवाजा खोला तो देखा कि बड़ी दाढ़ी वाला अफगानी खड़ा था। उसने हिंदी में हमसे पूछा कि क्या तुम पाकिस्तानी? मैंने जवाब दिया कि नहीं, हम हिंदुस्तानी, उसके बाद उसने कहा कि मैं मुंबई रहा हैं, तुम हमारा बिरादर है, आओ हम तुमको छोड़ता है। तो वो जो अफगानी के आने के पहले के 20 मिनट थे, वो इतने भयावह थे कि बस लगता था कि मौत आ ही रही है। 

समाचार4मीडिया के साथ प्रबल प्रताप सिंह की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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आने वाले समय में पत्रकारिता का भविष्य स्थानीय भाषा में ही होगा : प्रो. केजी सुरेश

'माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय' (MCU) के कुलपति व वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश ने समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है।

Last Modified:
Friday, 18 June, 2021
Prof. KG Suresh

'माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय' (MCU) के कुलपति और देश के प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान 'भारतीय जनसंचार संस्थान' (IIMC) के पूर्व महानिदेशक व वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश ने समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने मीडिया जगत में पत्रकार से लेकर एक कुलपति तक के सफर को तय किया है। पत्रकार बनने का ख्याल कैसे आया?

मेरा जन्म एक साधारण परिवार में हुआ और मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में थे। चूंकि वो खुद सरकारी नौकरी में थे तो उनकी इच्छा भी यही थी कि मैं भी सरकारी नौकरी में ही जाऊं। मेरे पिताजी ने मेरी एक बहुत अच्छी आदत डाल दी थी और वो थी समाचार पत्रों को पढ़ना। दरअसल, मेरे पापा खुद बहुत अच्छे से समाचार पत्रों का अध्ययन करते थे और कई महत्वपूर्ण घटनाओं की तो कटिंग तक वह संभालकर रखते थे। उन्हीं के साथ-साथ मेरी भी ये आदत हो गई और धीरे-धीरे मेरी रुचि लिखने में भी आ गई। मैं संपादक के नाम पत्र लिख देता था और धीरे-धीरे वो प्रकाशित होने लगे।

समाचार पत्र में अपना नाम देखकर मुझे बड़ी ख़ुशी होती थी। इसके बाद लेख लिखने का सिलसिला शुरू हो गया था। जब मेरे लेख छपते थे तो धीरे-धीरे सबको खबर होने लगी और मुझे लोगों से तारीफ भी मिलने लगी। इसके बाद स्कूल में भी कुछ निबंध प्रतियोगिताओं में मैंने पुरस्कार जीते और उसके बाद मुझे ऐसा लगने लगा कि मुझे पत्रकार बनना है।

हालांकि, मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं सरकारी नौकरी करूं और उनके दबाब में आकर मैंने एक अनुवादक की सरकारी नौकरी को प्राप्त भी किया, लेकिन एक बौद्धिक वातावरण नहीं मिलने के कारण दो वर्ष तक भी मैं वो नौकरी नहीं कर पाया और मैंने वो नौकरी छोड़ दी।

उसी दौरान हमारे एक मित्र दीपक चौधरी जी ‘ऊर्जा‘ नाम की पत्रिका के संपादक हुआ करते थे, किन्ही कारणों से उनकी हत्या हुई, जिसका आज भी पता नहीं चल पाया है। जब उनके परिजन कोलकाता से आए तो उन्होंने इच्छा जताई कि इस पत्रिका का प्रकाशन बंद नहीं होना चाहिए। उनके कई दोस्त इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार नहीं हुए। उस समय मैं एक मौके की तलाश में था तो जब मुझसे कहा गया तो मैंने हां कह दी।

हालांकि, उस समय मेरी उतनी उम्र नहीं थी और मैं संपादक बन गया था। उस वक्त कई पत्रकार और कर्मचारी मेरे नीचे काम करते थे। जैसा कि मैंने आपको बताया कि इतनी कम उम्र में मैं संपादक तो बन गया था और साहित्य के ज्ञान के कारण भाषा शैली भी ठीक थी, लेकिन मुझे अभी और अनुभव हासिल करना था।

इसके बाद मैंने ऐसी ही कई पत्रिकाओं में संपादक या सहायक संपादक के तौर पर काम किया। जब मैं किसी प्रेसवार्ता में जाता था तो देखता था कि मुख्यधारा के पत्रकारों को अधिक सम्मान मिलता था और मुझे ऐसा लगने लगा कि कहीं तो कोई कमी है।

उस समय पीटीआई में एक नियुक्ति होनी थी, लेकिन दिक्क्त ये थी कि उस दौर में सीनियर लेवल पर जगह सीधे नहीं मिलती थी, आपको ट्रेनी के तौर पर ही नियुक्ति मिलती थी। मुझे मुख्यधारा की मीडिया से जुड़ना था तो उस समय जो मेरी सैलरी थी, उससे एक चौथाई सैलरी पर मैंने पीटीआई जॉइन कर लिया।

‘एशियानेट‘ जो कि दक्षिण भारत का पहला न्यूज नेटवर्क था, उसका भी मैं संपादकीय सलाहकार बना। पीटीआई में नीचे से शुरू होकर मैं पॉलिटिकल करेसपॉन्डेंट तक के पद पर पहुंचा। उसके बाद मेरी एक यात्रा शुरू हुई, जिसमें दूरदर्शन में भी वरिष्ठ सलाहकार संपादक जैसे अहम पदों पर मैं रहा और आज ‘एमसीयू‘ के कुलपति के रूप में आप लोगों के सामने हूं।

आपको एक प्रयोगधर्मी व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। आप 'एमसीयू' में कई भाषाओं के अलावा दक्षिण की भाषा में भी कोर्स शुरू करने वाले हैं। इसके बारे में कुछ बताएं।

अगर आप आकंड़ों की ओर देखें तो आने वाले समय में भाषा में ही पत्रकारिता का भविष्य है और इस बात को हम अच्छी तरह से समझते हैं। अगर आप इंग्लिश को देखें तो उसको पढ़ने वालों की संख्या कम होती जा रही है। लोग अपनी भाषा में पढ़ना पसंद करते हैं। जब मैं 'आईआईएमसी' में था तो अमरावती परिसर से मैंने मराठी भाषा में पाठ्यक्रम शुरू करवाया।

केरल में जो परिसर है, वहां से मैंने मलयालम में पत्रकारिता शुरू करवाई। इसके अलावा लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के साथ मिलकर संस्कृत का एक एडवांस कोर्स शुरू करवाया। अगर आप देखें तो पहले अखिल भारतीय परीक्षा पास करके कुछ छात्र केरल और बाकी राज्यों में भले ही चले जाते थे, लेकिन स्थानीय भाषा के बच्चों को वो मौका नहीं मिलता था।

हम सिर्फ ओडिशा के परिसर को छोड़ दें तो हर जगह सिर्फ इंग्लिश ही पढ़ाई जाती है। जब हमने मराठी में कोर्स शुरू किया तो गरीब से गरीब बच्चे को भी ये लगा कि अब वह भी 'आईआईएमसी' में पढ़ सकता है।

विदर्भ जैसे पिछड़े इलाके के बच्चों के अंदर भी हम वो उम्मीद जगाने में कामयाब रहे। मुझे एक छात्र ने बड़ी भावुक चिठ्ठी भी लिखी थी, जिसमें उसने कहा कि आज मैं मराठी मीडिया में सक्रिय रूप से काम कर रहा हूं और उसके पीछे आपका वो निर्णय था, जिसके कारण एक पिछड़ा और गरीब बच्चा भी 'आईआईएमसी' से पढ़ सका।

आज 'एमसीयू' भले ही प्रादेशिक भाषाओं में काम कर रहा है, लेकिन हमारा दृष्टिकोण राष्ट्रीय है। इसलिए हम 'भाषाई विभाग' और 'भाषाई पत्रकारिता' पर भी ध्यान दे रहे हैं, ताकि देश भर के बच्चों को एक विश्व स्तर का वातावरण मिल सके।

डिजिटल मीडिया के इस बढ़ते दौर में हिंदी पत्रकारिता के भविष्य को आप कैसे देख रहे हैं?

अगर आज हम 'वेबदुनिया' या 'जागरण' और इसके अलावा 'भास्कर' को देखें तो आप पाएंगे कि हिंदी पत्रकारिता ने डिजिटल को बहुत पहले ही भांप लिया था और अपनाना शुरू कर दिया था। आज जो लोग अखबार नहीं पढ़ पा रहे हैं, उनको अपने फोन में ही हिंदी भाषा में विश्वसनीय कंटेंट मिल रहा है।

एक अनुमान है कि प्रिंट सिर्फ तीन फीसदी की दर से आगे बढ़ रहा है, वहीं डिजिटल 36 फीसदी की ग्रोथ की ओर देख रहा है और विज्ञापन में भी डिजिटल आगे जा रहा है। इसके अलावा हम देखें तो आज जिला स्तर पर भी प्रिंट के संस्करण खुल रहे हैं और टीवी के बड़े-बड़े नेटवर्क आप देख लीजिए जो कभी सिर्फ इंग्लिश प्रोग्राम चलाया करते थे, वो आज हर भाषा में अपने चैनल खोल रहे हैं।

आप हाल ही में 'रिपब्लिक नेटवर्क' का उदाहरण देख लीजिए, इंग्लिश के बाद वह अपना हिंदी चैनल लाया और उसके बाद उन्होंने 'बांग्ला' भाषा में उसे लांच किया और यही मैं कह रहा हूं कि आने वाले समय में पत्रकारिता का भविष्य भाषा में ही होगा।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती लोकप्रियता के बीच आपने फिल्म पत्रकारिता की ओर भी ध्यान देने की बात कही है! उसके पीछे आपको क्या कारण दिखाई दे रहे हैं?

हमने हाल ही में अपने खंडवा परिसर में फिल्म पत्रकारिता शुरू करने का निर्णय लिया है। खंडवा सिर्फ दादा माखनलाल की कर्मभूमि ही नहीं, बल्कि दादा किशोर कुमार की जन्मभूमि भी है। फिल्म स्टडी या सिनेमा के बारे में ज्ञान देना हो या फिल्म प्रोडक्शन हो, आज के समय में देश में बहुत कम जगह पर ये सिखाया जा रहा है, लेकिन पहली बार हम इसे शुरू करेंगे। हमारी इस मुहिम में देश के बड़े निर्देशक, निर्माता और कलाकार शामिल हैं जो बच्चों को मार्गदर्शन देंगे। हम सब जानते हैं कि फिल्में संवाद का एक सशक्त माध्यम हैं तो इसे क्यों नहीं पढ़ाया जाए?

आज ओटीटी के बढ़ते प्रयोग ने बाजार के लिए रास्ते खोल दिए हैं और हमें ऐसे पत्रकार तैयार करने होंगे, जिन्हें वाकई में इस पूरे प्रोसेस की समझ हो। आज इतने माध्यम हैं कि फिल्म की लागत अब उतनी नहीं रह गई है तो ऐसे समय में हमें इसे भी समानांतर तौर पर लेकर चलना होगा।

आज मैं देख रहा हूं कि भोपाल के कई कलाकार भी वेब सीरीज और फिल्मों में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। आज आम आदमी के घर तक मनोरंजन पहुंच गया है। मेरा ये आह्वान है कि छोटे-छोटे परिसरों में भी इन चीजों को लेकर जागरूक होने की जरूरत है और लोगों की सृजनात्मकता को बढ़ाने की जरूरत है।

वर्तमान समय में पत्रकारों पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगाए जा रहे हैं और उन्हें लेकर देश के एक वर्ग में नाराजगी भी है। इसे आप किस तरह से लेते हैं?

ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए भी क्योंकि अब ये चीजें आम जनता के जहन में आ गई हैं, जिनका जवाब उन्हें मिलना भी चाहिए। दरअसल, मीडिया के एक बड़े वर्ग का ध्रुवीकरण हो गया है और अब पत्रकार कम पक्षकार अधिक हो गए हैं। पत्रकार आज भी हैं और बहुत बढ़िया काम भी कर रहे हैं।

कोरोना काल में जिस तरह से हमने फील्ड रिपोर्टिंग देखी, वो बहुत सराहनीय थी और खोजी पत्रकारिता भी बहुत बढ़िया हुई है लेकिन कई जगह पत्रकार मजबूत कम बल्कि मजबूर अधिक दिखाई देते हैं। देखिए, आज पक्षपात का आरोप तो लग रहा है लेकिन आपको पत्रकार और प्रबंधन को अलग-अलग देखना होगा। आज तमाम पत्रकार या तो अनुबंध पर हैं या बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों से जुड़े हुए हैं। कई मालिक तो खुलकर अपनी सोच को बताते हैं और अलग-अलग दलों से सांसद भी बने हैं।

आज अगर किसी पत्रकार को निलंबित कर दिया जाता है तो वो कुछ अधिक नहीं कर सकता है और दूसरे अखबार भी उसके बारे में नहीं लिखते हैं। इसके अलावा अब पत्रकारों का कोई मंच भी नहीं रह गया है। पत्रकारों के पास आज सामाजिक सुरक्षा तक नहीं है। आज जिला और गांव स्तर पर जो पत्रकार हैं, वो तो हाशिये पर हैं और न ही उनकी उतनी आय है। हम सबकी विचारधारा अलग-अलग हो सकती है, लेकिन दिक्क्त तब आती है जब हम राजनीतिक हो जाते हैं। जब आपकी चर्चा मुद्दों से भटक जाती है तो दिक्क्त आने लगती है।

हम आज-कल हर चीज को राजनीतिक चश्मे से देखने लग गए हैं तो ये पहले नहीं होता था। समस्या यह है कि आज हम किसी और के प्रवक्ता बन गए हैं। अगर कोई अच्छा काम कर रहा है तो उसकी तारीफ हो और कोई गलत काम कर रहा है तो पूरी ईमानदारी से उसकी आलोचना हो।

एक चीज यह भी जरूरी है कि आप किसको वोट देते हैं, उसकी झलक आपकी रिपोर्ट में नहीं आनी चाहिए और सही मायनों में यही पत्रकारिता है। रिपोर्ट निष्पक्ष, सत्यपरक और वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए और इसमें समझौता नहीं होना चाहिए।

आजकल सोशल मीडिया के माध्यम से फेक न्यूज फैला दी जाती है और उससे सामाजिक सौहार्द भी बिगड़ जाता है। आप अपने छात्रों को अच्छे फैक्ट चेकर बनाने के लिए क्या कर रहे हैं?

फेक न्यूज और फेक कंटेंट इस समाज के लिए बेहद खतरनाक है और ये आज से नहीं, बल्कि कई सालों से हो रहा है। बस अब डिजिटल से इसकी ताकत बढ़ गई है। आज पेंडेमिक की तरह इंफोडेमिक आ गया है और आज इतनी सूचनाओं का भंडार है कि लोग यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि कौन सी सूचना सही है और कौनसी गलत?

मुझे ‘नागरिक पत्रकारिता‘ इस शब्द से परहेज है। हर नागरिक को अपनी बात कहने का हक है, लेकिन वो पत्रकार नहीं बन सकता है। उसके लिए कुछ मापदंड और योग्यता होती है। आप चार शब्द लिख लेते हैं और मोबाइल चला लेते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि आप पत्रकार बन गए। अगर यही पत्रकार बनने की योग्यता है तो फिर इन विश्वविद्यालयों को बंद कर देते हैं, हमारी जरूरत ही क्या है?

‘झोलाझाप‘ शब्द क्यों इस्तेमाल किया जाता है? क्योंकि इसमें योग्यता नहीं है, लेकिन वो ऐसा होने का दिखावा कर रहा है और उनसे समाज को बचने की जरूरत है। फैक्ट चेक पत्रकार का मूल सिद्धांत है और आज से नहीं, ये सालों से चला आ रहा है। चेक और वेरीफाई शब्द तो पत्रकार की आत्मा होते हैं। एविडेंस आधारित रिपोर्टिंग करनी जरूरी है। 

हमने यूनिसेफ के साथ मिलकर भारत में पहला ‘पब्लिक हेल्थ कम्युनिकेशन‘ कोर्स जैसा प्रयोग किया है। ऑक्सफोर्ड के साथ मिलकर वर्ष 2016 में हमने ‘आईआईएमसी‘ में इसे लागू किया था। इसमें हमने पब्लिक हेल्थ को ध्यान में रखकर पत्रकारों को प्रशिक्षित किया था। आज के समय में भी हमारे सभी परिसर में लोकल स्वास्थ्य से जुड़े पत्रकारों के साथ मिलकर यह काम जारी है। आज समाज में जो गलत सूचना फैलाई जा रही है, उस पर कैसे एक करारा प्रहार हो, उसके लिए भी हम अपने छात्रों को तैयार कर रहे हैं।

कोरोना काल में परिसर में कक्षाएं कैसे हो रही हैं और आने वाले समय में कैसे तकनीक का प्रयोग आप करने वाले हैं, इसके बारे में हमे कुछ बताइये।

इस मामले में हम बड़े सक्रिय हैं। पूरे कोरोना काल में हमने तकनीक के जरिये सभी से संपर्क बनाए रखा है और सुचारु रुप से सभी चीजों को लागू किया गया है। मैं छात्रों के सहयोग से भी अभिभूत हूं और आप देखिए कि पूरा सिलेबस छात्रों को करवाया जा चुका है।

इस समय 1600 के करीब हमारे अध्ययन केंद्र हैं, जिनमें कई लाख छात्र पढ़ रहे हैं और फाइनल ईयर के जो छात्र हैं, जिनको प्रायोगिक शिक्षा मिलनी चाहिए थी, उनके साथ हम जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वो अपने आस-पास के केंद्र में जाकर अपनी प्रैक्टिकल क्लास ले सकें।

जब कोरोना की पहली लहर के बाद कैंपस थोड़े दिन खुले, उसके बाद हमने छात्रों को बुलाना शुरू किया ताकि उन्हें एक्सपोजर मिले और हमारे जनसंचार विभाग के ही बच्चों ने 200 से ऊपर वीडियो घर बैठे तैयार किए थे और आज भी बच्चे घर बैठे वीडियो और पोस्टर बना रहे हैं लेकिन मैं इस बात को भी स्वीकार करता हूं कि जिस प्रभावी तरीके से उनको हम परिसर में ट्रेनिंग दे सकते थे, वो अभी नहीं दे पा रहे हैं। आज इस कठिन समय में मुझे चिंता उन विद्यार्थियों की होती है, जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है, लैपटॉप नहीं है, वो कैसे पढ़ पाएंगे और उनके नुकसान की कैसे भरपाई होगी?

आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (Artificial intelligence) का जमाना है और हमे वर्तमान समय में ही भविष्य की योजनाओं को बनाकर चलना होगा, ताकि छात्रों को भी इसका फायदा मिले, इस दिशा में आप क्या कदम उठा रहे हैं?

आपने बिल्कुल सही कहा है। अगर हम पुराने कोर्स पर चलते रहे तो आने वाले समय में मुश्किल तो होगी। एक रिपोर्ट कहती है कि आने वाले समय में कॉमिक और एनिमेशन उद्योग में सालाना 16000 लोगों की जरूरत पड़ेगी, जिसकी तैयारी आज हमारे पास नहीं है। इसी पर सोचते हुए ‘आईआईएमसी‘ में मेरे कार्यकाल में मुंबई फिल्म सिटी में 20 एकड़ जमीन ली गई थी लेकिन मेरे प्रस्थान के बाद अब ये निर्णय लिया गया कि अब सूचना प्रसारण मंत्रालय उस काम को देखेगा। इसके अलावा ग्राफिक और एनिमेशन के एक प्रोग्राम को जो कि बंद पड़ा हुआ था, उसे हमने वापस शुरू करने में सफलता हासिल की है।

वर्तमान की शिक्षा नीति को देखते हुए अब हम चार साल का यूजी प्रोग्राम शुरू कर रहे है। हमारी योजना है कि आने वाले समय में जो छात्र हम तैयार करें, वो मल्टी टास्किंग हों, जो कि प्रिंट, टीवी और डिजिटल में समान रूप से काम कर सकें।

इसके अलावा हम मोबाइल और ड्रोन पत्रकारिता पर भी ध्यान दे रहे हैं। अगर एक फोटोग्राफर शादी में ड्रोन का इस्तेमाल कर सकता है तो हमारा पत्रकार क्यों नहीं कर सकता है? अगर आप बाहर निकलने में असमर्थ हैं तो आप ड्रोन के माध्यम से रिपोर्टिंग कर सकते हैं। आने वाले भविष्य को ध्यान में रखकर ये सब चीजें हम अपने सिलेबस में समाहित करने जा रहे हैं। आज के इस समय में हम अपने छात्रों को यही सिखाते हैं कि आने वाले समय में नौकरी की कमी नहीं होगी, लेकिन मल्टीटास्किंग लोगों की जरूरत होगी और हम अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

समाचार4मीडिया के साथ केजी सुरेश की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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