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अमेरिकी मदद से चलने वाले इस न्यूज नेटवर्क पर संकट, फंडिंग रुकी, एम्प्लॉयीज की छंटनी
। चैनल के चीफ जेफ्री गेडमिन (Jeffrey Gedmin) ने लगभग पूरी टीम को बाहर का रास्ता दिखा दिया है और टीवी कार्यक्रमों को भी सीमित कर दिया है।
Vikas Saxena 10 months ago
मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में 3 करोड़ दर्शकों का दावा करने वाला अमेरिकी फंडिंग वाला अरबिक न्यूज चैनल अल हुर्रा (Al Hurra) इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रहा है। चैनल के चीफ जेफ्री गेडमिन (Jeffrey Gedmin) ने लगभग पूरी टीम को बाहर का रास्ता दिखा दिया है और टीवी कार्यक्रमों को भी सीमित कर दिया है। उन्होंने इसके लिए अमेरिका की पूर्व ट्रंप सरकार और एलन मस्क के नेतृत्व वाले प्रशासन पर “गैर-जिम्मेदाराना और अवैध तरीके से” फंडिंग रोकने का आरोप लगाया है।
शनिवार को एम्प्लॉयीज को भेजे गए ईमेल में गेडमिन ने साफ किया कि अब वह इस उम्मीद में नहीं हैं कि अमेरिकी सरकार द्वारा रोकी गई फंडिंग जल्द बहाल होगी। ये फंडिंग अमेरिकी संसद द्वारा पास की गई थी, जिसका इस्तेमाल अल हुर्रा और अन्य अरबिक भाषी संगठनों के संचालन के लिए होता रहा है।
गेडमिन ने इस संकट के लिए करी लेक (Kari Lake) को जिम्मेदार ठहराया, जो अमेरिका की वैश्विक मीडिया एजेंसी की प्रमुख हैं और जिन्हें ट्रंप सरकार ने नियुक्त किया था। गेडमिन के मुताबिक, उन्होंने फंडिंग रुकने के मुद्दे पर बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उनके अनुसार, "वह जानबूझकर हमें वो पैसा नहीं दे रहीं जिसकी हमें जरूरत है ताकि हम अपने कर्मियों को वेतन दे सकें।"
अल हुर्रा की वेबसाइट पर काम करने वाले मिस्र के पत्रकार मोहम्मद अल-सबाघ (Mohamed al-Sabagh) ने मीडिया को बताया कि चैनल और वेबसाइट से जुड़े सभी एम्प्लॉयीज को ईमेल के जरिए कॉन्ट्रैक्ट समाप्त करने की सूचना दी गई है।
अल हुर्रा की शुरुआत 2003 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश सरकार के कार्यकाल में हुई थी, जब इराक युद्ध के दौरान अमेरिका ने इस चैनल को एक 'मध्य पूर्व की आवाज' के रूप में लॉन्च किया। इसका उद्देश्य था स्वतंत्र प्रेस और लोकतांत्रिक मूल्यों को ऐसे इलाकों तक पहुंचाना, जहां पर सेंसरशिप और अधिनायकवादी शासन मौजूद हो।
हालांकि समय-समय पर इस चैनल पर पक्षपात के आरोप लगते रहे, लेकिन यह क्षेत्र का एकमात्र ऐसा मंच था जो प्रेस की स्वतंत्रता और खुलकर बोलने की आजादी की जगह देता रहा।
अपने विदाई संदेश में गेडमिन ने कहा कि कुछ दर्जन एम्प्लॉयीज को रखा जाएगा और ऑनलाइन मौजूदगी बरकरार रहेगी, लेकिन फंडिंग को लेकर अब अमेरिका की अदालतों में कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी। उन्होंने कहा, “मध्य पूर्व में अमेरिका की आवाज को चुप कराना किसी भी तरह से समझदारी नहीं है।”
यह घटनाक्रम एक ऐसे वक्त में आया है जब अमेरिका समर्थित अन्य मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे वॉयस ऑफ अमेरिका, रेडियो फ्री यूरोप और रेडियो फ्री एशिया भी फंडिंग में कटौती के चलते मुश्किलों से जूझ रहे हैं।
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