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जयंती विशेष: जब पत्रकार से CM बने कमलापति के लिए कहा गया- ‘अहंकार देखता हूं तुम्हारे चेहरे पर...’

हिंदी और संस्कृत दोनों भाषाओं पर गहरी पकड़ रखने वाले पंडित कमलापति त्रिपाठी पत्रकारिता और राजनीति में भविष्य तलाशने वालों के ...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

समाचार4मीडिया ब्‍यूरो।।

हिंदी और संस्कृत दोनों भाषाओं पर गहरी पकड़ रखने वाले पंडित कमलापति त्रिपाठी पत्रकारिता और राजनीति में भविष्य तलाशने वालों के प्रेरणास्रोत रहे हैं। तीन सितंबर 1905 को काशी में जन्मे पंडित त्रिपाठी ने आजादी के दौर में अपनी लेखनी से युवाओं को अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया और आजादी के बाद वे बुराइयों, कुरीतियों एवं सामाजिक असमानता के खिलाफ लिखते रहे। उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत 1934 में हिंदी दैनिक ‘आज’ से की। उन दिनों एकमात्र ‘आज’ ही ऐसा समाचारपत्र था, जो पत्रकारिता के मूल्यों-आदर्श और विशुद्ध हिंदी के लिए पहचाना जाता था।

पंडित त्रिपाठी करीब 10 साल ‘आज’ से जुड़े रहे फिर उन्होंने ‘संसार’ के प्रधान संपादक की ज़िम्मेदारी संभाली। 1943 से लेकर 1952 तक वे काशी से प्रकाशित होने वाले ‘ग्रामसंसार, ‘आंधी’ और ‘युगधारा’ का संपादन करते रहे। पंडित त्रिपाठी धर्म में गहरी आस्था रहते थे, लेकिन उन्होंने कभी किसी ख़ास धर्म, जाति, समुदाय को ध्यान में रखकर लेखन नहीं किया। वे ऐसे पत्रकार थे, जो अपनी शर्तों पर कार्य करते थे और दबाव उन्हें छू भी नहीं सकता था। पत्रकारिता और राजनीति की नजदीकियां आज की तरह उस दौर में भी लोगों को प्रभावित करती थीं। कमलापति त्रिपाठी भी इस प्रभाव से खुद को अछूता नहीं रख सके। उन्होंने सियासी आंदोलनों में भाग लेना शुरू किया और धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा नाम बन गए। 1937 में वे पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने और यह सिलसिला लंबे समय तक कायम रहा। 1946, 1952, 1957, 1962 और 1969 में भी पंडित त्रिपाठी को जनता ने चुनकर विधानसभा भेजा।

1971 में जब कमलापति त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो कई कांग्रेसी नेताओं में उन्हें लेकर रोष था। इसकी वजह थी थोड़े से समय में उनका इस ऊंचाई पर पहुंचना। हालांकि, 1973 में उनकी सरकार गिर गई,  इसका कारण था पीएसी (प्रोविंशियल आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी) की 12वीं बटालियन का वो विद्रोह, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। दरअसल, पीएसी के जवानों ने ख़राब सेवा परिस्थितियों का हवाला देकर सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई छेड़ दी थी। इस विद्रोह को शांत करने के लिए सेना को बुलाना पड़ा था हिंसा में कई जवानों की जान गई थी। इस मुद्दे के चलते 12 जून 1973 को त्रिपाठी सरकार को सत्ता से हटना पड़ा और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। हालांकि, कमलापति त्रिपाठी की राजनीति इससे ज्यादा प्रभावित नहीं हुई। वे 1973-78, 78-80, 85-86 में राज्यसभा के सदस्य रहे। 1980-84 में लोकसभा के लिए चुने गए। 1973-77 तक रेल मंत्री रहे और 1977-80 राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे।

पंडित कमलापति त्रिपाठी पत्रकारिता और राजनीति दोनों क्षेत्रों में प्रेरणा के आदर्श थे। उनकी राजनीति और पत्रकारिता में समान रूप से जन-समर्पण और मूल्यों की निष्ठा का गहरा भाव निहित था। त्रिपाठी के राजनीति में प्रवेश करने को लेकर उनके मित्र एवं सहयोगियों के अलग विचार थे। कोई उनके इस फैसले से खुश था तो किसी को एक पत्रकार का सियासी दलदल में उतरना पसंद नहीं आया।

महादेवी वर्मा ने उस दौर में कमलापति को 'अजातशत्रु' कहा था। उन्होंने कहा था कि त्रिपाठी लेखक थे लेकिन राजनीति ने उन्हें उधार ले लिया था। वहीं दिनकर ने कहा कि था कि कमला कवि थे पर वो दौर ही ऐसा था कि राजनीति करनी थी। हालांकि, बेचन शर्मा उग्र की सोच कमलापति को लेकर कुछ जुदा थी। उन्होंने कमलापति के नेता बन जाने पर लिखा था:  सो, तुम जीते- कमला और बहुत ख़ूब जीते। याद है तुम्हें जब गांधी बनारस आए थे और लोगों को असहयोग आंदोलन समझा रहे थे। तब मैंने और तुमने तय किया था कि महात्मा मीटिंग कर बाहर निकलेंगे तो हम लोग उनके चरण पकड़ लेंगे। मेरे हाथ में दाहिना आया और तुम्हारे हाथ में बांया। उसके बाद हम दोनों के बीच 5-5 रुपये की बाजी लगी कि कौन जेल पहले जाता है। मैं ही गया था पर आज तुम कहते हो कि कोई तुमसे राजनीति में भिड़ाए तो जानूं। हरिश्चंद्र सत्य में भिड़ाने की बात करते थे, रामचंद्र मर्यादा में, गौतम करुणा में और पंडित कमलापति…राजनीति में। अहंकार देखता हूं तुम्हारे चेहरे पर।

मुख्यमंत्री, रेलमंत्री सहित कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित करने वाले पंडित कमलापति त्रिपाठी ने पत्रकारिता, राजनीति आदि विषयों पर विचारोत्तेजक लेखों के साथ कई किताबें भी लिखी हैं। 

पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले पत्रकारों को आज ‘पंडित कमलापति त्रिपाठी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाता है।


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