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वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की नई पारी, बने कुलपति
राज्यपाल एवं कुलाधिपति कल्याण सिंह ने हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय, जयपुर में प्रथम कुलपति की नियुक्ति के आदेश जारी किया
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
राज्यपाल एवं कुलाधिपति कल्याण सिंह ने हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय, जयपुर में प्रथम कुलपति की नियुक्ति के आदेश जारी किया है।
राज्यपाल सिंह ने राज्य सरकार के परामर्श पर ओम थानवी को कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से तीन वर्ष के लिए कुलपति नियुक्त किया है। हाल ही में ओम थानवी ने पत्रिका समूह के सलाहाकार संपादक के तौर पर इस्तीफा दिया था।
गौरतलब है कि वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी का जन्म 1 अगस्त 1957 को फलोदी, जोधपुर (राजस्थान) में हुआ था। वह नौ वर्षों (1980 से 1989) तक 'राजस्थान पत्रिका' में रहे। इसके बाद चंडीगढ़, फिर दिल्ली में संपादक बने। इसके अतिरिक्त हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ में भी वे डेढ़ दशक से भी अधिक समय तक संपादक की भूमिका निभा चुके हैं, जिसमें दस साल तक उन्होंने चंडीगढ़ एडिशन का संपादन किया।
बीते वर्ष की शुरुआत उन्होंने अध्यापन के क्षेत्र में भी कदम रखा और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़ गए थे। उन्हें यहां विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज में बतौर गेस्ट फैकल्टी (विजिटिंग स्कॉलर) की जिम्मेदारी दी गई है।
उन्होंने हिंदी की साहित्यिक व सांस्कृतिक पत्रिका ‘इतवारी’ का भी संपादन किया है। ओम थानवी की साहित्य, कला, सिनेमा, पर्यावरण, पुरातत्त्व, स्थापत्य और यात्राओं में गहन रुचि है। वह मेक्सिको, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड, फिनलैंड, स्वीडन, बेल्जियम, रोमानिया, थाईलैंड, आर्मेनिया, बेलारूस, चीन, ब्राजील, मलेशिया, सिंगापुर, गयाना, त्रिनिदाद व टोबेगो, सूरीनाम, श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ग्रीस और क्यूबा आदि अनेक देशों की यात्राएं कर चुके हैं।
ओम थानवी अपने यात्रा संस्मरणों पर केन्द्रित पुस्तक 'मुअनजोदड़ो' से विशेष चर्चा में रहे। थानवी ने अपनी इस पुस्तक में हड़प्पा सभ्यता के गंभीर ऐतिहासिक आयामों को साहित्यिक रूप मे पेश किया। इसके अलावा यात्रा संस्मरणों पर ही आधारित उनकी दो खंडों में संपादित किताब 'अपने-अपने अज्ञेय' व 'सिंधुघाटी की सभ्यता' और इतावली विद्वान एल.पी. तेस्सीतोरी और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अंतर्विरोध पर लिखी ‘लेखमाला’ भी काफी चर्चित रहीं।
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