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‘हंस’ का अतीत गौरवशाली रहा है – राजेंद्र यादव
समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो हिन्दी साहित्य जगत की नामी पत्रिका हंस अपने प्रकाशन का 25 वां वर्ष (रजत जयंती) मना रहा है। इस अवसर पर पत्रिका का विशेषांक प्रकाशन किया जा रहा है। विशेष संस्करण का मूल्य 40 रुपये है जबकि नियमित संस्करण का मूल्य 25 रुपये होता है। इस संस्करण में प्रमुख हिन्दी लेखकों की विशेष फीचर रिपोर्ट होगी। हमसे बात करते हुए हंस के सं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 15 years ago
समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो हिन्दी साहित्य जगत की नामी पत्रिका हंस अपने प्रकाशन का 25 वां वर्ष (रजत जयंती) मना रहा है। इस अवसर पर पत्रिका का विशेषांक प्रकाशन किया जा रहा है। विशेष संस्करण का मूल्य 40 रुपये है जबकि नियमित संस्करण का मूल्य 25 रुपये होता है। इस संस्करण में प्रमुख हिन्दी लेखकों की विशेष फीचर रिपोर्ट होगी। हमसे बात करते हुए हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने कहा, यह पत्रिका एक व्यवसाय नहीं है लेकिन मेरे लिए यह एक प्रतिबद्धता है। हंस पत्रिका का प्रकाशन उन पाठकों के लिए है, जो रचनात्मक हिन्दी साहित्य के दीवाने हैं। यह पत्रिका ज्वलंत समस्याओं को उठाने के साथ ही इसके पाठकों को हिन्दी के प्रसिद्ध लेखकों की मनोरंजन कहानियां पढ़ने को उपलब्ध कराती है। पत्रिका के व्यवसाय पर यादव ने कहा, कोई भी पत्रिका सिर्फ सर्कुलेशन के आंकड़ों पर ही जीवित नहीं रहती है। विज्ञापन के लिए विज्ञापनदाताओं के साथ उच्च श्रेणी के संबंध का होना जरूरी है। हंस पत्रिका मात्र चार सदस्यों की टीम के द्वारा प्रकाशित की जाती है और इसका कोई सेल्स टीम नहीं है। एक साहित्यिक पत्रिका होने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि साहित्यिक प्रतिष्ठा को संरक्षित करके विज्ञापन को दोहरा फायदा पहुंचता है जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। उन्होंने आगे कहा, पत्रिका का प्रकाशन इन दिनों बड़े मीडिया घरानों का व्यवसाय हो गया है। यह काम सिर्फ पैसे के लिए किया जाता है और उनकी कोई प्रतिबद्धता नहीं होती। हंस लाभदायक स्थिति में नहीं है, लेकिन हम अपने प्रतिबद्ध पाठकों के लिए इसका प्रकाशन करते हैं। उन्होंने कहा, हम सदैव बुद्धिजीवियों को ध्यान में रखकर हंस का प्रकाशन करते हैं, जो कभी-कभी हंस की एक प्रति के लिए मीलों सफर करते हैं। हम वार्षिक बहस का आयोजन करते हैं जहां जिन्दगी के हर क्षेत्र के गणमान्य व्यक्ति एक जगह एकत्र होकर महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं। यादव का मानना है कि हंस की मांग अभी भी कई मार्केट में है जहां यह अभी तक नहीं पहुंच पाया है, लेकिन संसाधनों के अभाव में बाधा उत्पन्न होती है। उन्होंने टिप्पणी की, अभी भी हिन्दी के कई क्षेत्र हैं जहां हम पहुंच नहीं पाये हैं, लेकिन चूंकि हमारे पास संसाधनों की कमी है, हम उन क्षेत्रों में प्रवेश करने की स्थिति में नहीं हैं। हंस का पुनर्प्रकाशन 1976 में 5,000 प्रतियों के साथ की गई थी और कवर मूल्य 5 रूपये था। इससे पहले, हंस का प्रकाशन हिन्दी साहित्य की महान विभूति मुंशी प्रेमचंद के द्वारा शुरू किया गया था। महात्मा गांधी और के एम मुंशी जैसे लोग हंस से जुड़कर रचनात्मक लेखन के लिए प्रोत्साहित करते थे। वर्तमान में पत्रिका का प्रकाशन अक्षर प्रकाशन के द्वारा किया जाता है। समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।
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