'जब मैंने छात्रों से राजेंद्र माथुर के बारे में पूछा, तो मेरे लिए यह सदमे से कम नहीं था'

आपातकाल लग चुका था। देश आजाद होने के बाद पहली बार प्रेस सेंसरशिप लगा दी गई थी...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
rajendra Mathur

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर, राज्यसभा टीवी   

आपातकाल लग चुका था। देश आजाद होने के बाद पहली बार प्रेस सेंसरशिप लगा दी गई थी। मैं कॉलेज में पढ़ता था। साथ में स्थानीय दैनिक शुभ भारत और दैनिक जागरण के साथ संवाददाता के रूप में पत्रकारिता की पारी शुरू कर चुका था। सेंसरशिप के चलते सारे पत्रकारों का खून खौला रहा था। दरअसल उन दिनों हर खबर को छापने से पहले जिला प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी से बाकायदा सील लगवा कर इजाजत लेनी होती थी। यह प्रक्रिया बेहद अपमानजनक थी। वह डिप्टी कलेक्टर बड़ी हेकड़ी दिखाते हुए खबरें अप्रूव करता था। हम लोग खून का घूंट पीकर रह जाते। हालांकि बाद में उदार जिला कलेक्टर आए। वे सेंसरशिप के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने हम लोगों को ऑफ द रिकॉर्ड खबर प्रकाशन की पूरी आजादी दे दी। केवल सरकारी रिकॉर्ड में कुछ प्रतियां छाप कर जमा करानी होती थीं। 

उन दिनों नईदुनिया अखबार अपनी निर्भीक नीति के कारण हम लोगों का चहेता बन गया था, जिस दिन आपातकाल लगा, उस दिन अखबार के संपादक राजेंद्र माथुर ने संपादकीय वाली जगह कोरी छोड़कर विरोध प्रदर्शन का नायाब नमूना पेश किया था। वो हमारे हीरो बन गए थे। छतरपुर जिले में उन दिनों नईदुनिया अगले दिन सुबह आता था- यानी चौबीस घंटे लेट। फिर भी लोग बेताबी से उसका इंतजार  करते थे। नईदुनिया ने स्वतंत्र पत्रकारिता की लाज बचा कर रखी थी। ऐसे में उस समाचारपत्र का संवाददाता बनने की होड़ थी। मैंने राजेंद्र माथुर को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में संवाददाता बनने का अनुरोध था। कोई उत्तर नहीं आया। मैंने कुछ दिन बाद फिर पत्र लिखा। उसका भी कोई उत्तर नहीं। फिर मैं करीब करीब हर महीने- पंद्रह  दिन में चिट्ठी लिखता रहा।  साल भर बाद एक पोस्टकार्ड आया। संवाददाता बनाने से मना किया था। लिखा था ,छतरपुर बहुत दूर है। डाक से समाचार पहुंचते पहुंचते पुराने हो जाएंगे। फिर भी मैं अपना अनुरोध पत्र भेजता रहा। आखिरकार एक दिन नईदुनिया से मुझे एक फॉर्म मिला। लिखा था इसे भरकर भेज दीजिए। फिर विचार करेंगे। मैं फूलकर कुप्पा था- मानो मुझे संवाददाता बना ही दिया गया हो। पर कुछ नहीं हुआ। मैं थोड़ा थोड़ा निराश होने लगा। इसी बीच आपातकाल हटाने का ऐलान हुआ और आम चुनाव की भी घोषणा हो गई। एक दिन मुझे राजेंद्र माथुर का तार मिला। चुनाव सामग्री और बुंदेलखंड इलाके का चुनावी विश्लेषण मांगा था 

छतरपुर जैसे छोटे से कस्बे में किसी नौजवान पत्रकार को नईदुनिया के प्रधान संपादक का तार। साइकल उठाकर शहर के परिचितों को दिखाता फिरा। मेरे जैसे कस्बाई पत्रकार के लिए यकीनन गर्व की बात थी। उन दिनों नईदुनिया हिंदी पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ नाम था और राजेंद्र माथुर भारतीय हिंदी पत्रकारिता का सबसे बड़ा नाम। राजेंद्र माथुर देश भर के पत्रकारों-संपादकों के प्रेरणा स्रोत बन गए थे। इसके बाद उन्होंने सात मुद्दों की श्रृंखला लिखी। भारतीय हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में यह एक दस्तावेज है। बहरहाल मैंने आलेख भेजा। छप गया। नईदुनिया और राजेंद्र माथुर से रिश्ते की शुरुआत हो गई। मैं लिखता। माथुर साहब हर दूसरे तीसरे आलेख पर अपनी राय देते। वे पत्र खुद लिखा करते थे। इन पत्रों ने मेरा हौसला बढ़ाया। अलबत्ता संवाददाता बनने का औपचारिक पत्र मुझे कभी नहीं मिला, लेकिन मेरे रिपोर्ताज छप रहे थे, मेरे लिए यही बहुत था। 

इसी बीच भारतीय हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना घटी। इस घटना से मेरे पत्रकारिता जीवन में नया मोड़ आया। हुआ यह कि छतरपुर में नए कलेक्टर ने जॉइन किया। एक दिन उनका कुत्ता बंगले से निकलकर सड़क पर आ गया। एक ट्रक उसे कुचलकर चला गया। इससे कलेक्टर का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। उन्होंने एसपी को निर्देश दिया कि ट्रक को खोज कर ड्राइवर को गिरफ्तार किया जाए। सारे नाकों पर तलाशी अभियान चला। जिले भर की पुलिस ट्रक ढूंढने में लगी रही। वायरलेस पर सैकड़ों संदेश दौड़ते रहे। स्थानीय अखबारों में इसकी आलोचना हुई कि डाकू समस्या से जूझ रहे जिले में पुलिस इतना समय, ऊर्जा और संसाधनों अगर डाकू विरोधी अभियान में लगाती तो शायद कुछ गिरोह पकड़ में आ जाते। एक कुत्ते के लिए सरकारी साधनों का इस तरह इस्तेमाल बेजा है। इस पर कलेक्टर इतने खफा हुए कि उन्होंने जनसंपर्क अधिकारी को बुलाकर डांटा और हम लोगों को पहली चेतावनी मिली। इसके कुछ समय बाद बाद एक पुलिस इन्स्पेक्टर पर एक महिला से दुष्कर्म का आरोप लगा। इसके एक दिन पहले एक बच्ची के साथ भी दुष्कर्म की वारदात हुई थी। दोनों घटनाओं के विरोध में एक जुलूस निकला। इस पर पुलिस ने गोली चलाई। अनेक घायल हुए। घटना की मजिस्ट्रेटी जांच हुई। जांच रिपोर्ट में पुलिस को दोषी पाया गया। एक अधिकारी भी दोषी ठहराया गया। उस अधिकारी को  कलेक्टर बचाना चाहते थे। कलेक्टर के इसमें निजी हित थे। उन्होंने जांच रपट ठंडे बस्ते में डाल दी। 

उन दिनों दैनिक शुभभारत के साथ हम लोग जुड़े थे। शुभभारत के संपादक श्यामकिशोर अग्रवाल, मैं, शिवअनुराग पटेरिया और विभूति शर्मा जैसे नौजवान पत्रकारों का हमारा समूह था। इसी बीच खबर मिली कि जिस जांच रिपोर्ट को कलेक्टर दबा रहे हैं, वह हासिल हो सकती है। हमारे एक साथी  को रिपोर्ट की कॉपी मिल गई। वह शुभभारत में छपी। फिर क्या था। कलेक्टर बौखला गए। वो चाहते थे कि हम उन्हें जांच रिपोर्ट का स्रोत बताएं। हमने मना कर दिया। इसके बाद तो उन्होंने सारे हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए। हम लोगों को धमकाया जाने लगा, हमारे अभिभावकों को नौकरी खोने की चेतावनी दी गई। श्याम के पिता की किराना की दुकान थी। उस पर छापे पड़े। फर्जी केस बनाए गए। कॉलेज के प्राचार्य पर हमें कॉलेज से निकालने का दबाव डाला गया। हमारे खिलाफ हमारे ही शहर में लाउडस्पीकर पर दिन भर प्रचार होता था। जीना मुश्किल हो गया था।

मैं उन दिनों अपने चाचाजी के घर रहता था। चाचा जी को एक और शिक्षक ने कलेक्टर के इशारे पर चेतावनी दी कि अपने भतीजे को घर से निकालो अन्यथा उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। चाचाजी परेशान हो गए। इसी तरह विभूति और पटेरिया के साथ भी हुआ। शुरू में तो पुलिस कलेक्टर के निर्देश पर काम कर रही थी। लेकिन बाद में पुलिसअधीक्षक को लगा कि हमारे साथ गलत हो रहा है तो उन्होंने हमें समर्थन दिया। इससे कलेक्टर और भड़क गए। उन्होंने किराए पर लिए गुंडों की फौज हमारे खिलाफ उतार दी। ये गुंडे उत्तरप्रदेश के झांसी जिले से लाए गए थे। आत्मसमर्पण कर चुके कुछ डाकुओं का सहारा भी हमें दहशत में डालने के लिए किया गया। हमने विरोध में एक दिन अखबार बंद रखे। एक दिन अखबार का पहला पन्ना केवल विरोध दिवस लिख कर खाली छोड़ा। इस बीच ज्यों ज्यों कलेक्टर हमारे खिलाफ होते गए, हमें समाज और पत्रकार बिरादरी का समर्थन मिलता गया। इक्का दुक्का पत्रकारों को छोड़, जो कलेक्टर से विज्ञापन लेते थे, हथियारों के लाइसेंस और तबादलों में दलाली करते थे। उस समय के एक बड़े राजनेता भी हमारे खिलाफ हो गए थे। एक बारगी तो लगने लगा कि शहर छोड़ दें। पानी सर से गुजर गया तो हम करीब पंद्रह-सोलह पत्रकार बस में सवार होकर भोपाल आ गए। हमें 27 रुपए भोपाल तक का किराया भी भारी था। डिपो मैनेजर अरुण श्रीवास्तव ने हमें आधे किराए का पास दिया और बचे पैसे हमें कई दिन बापू की कुटिया में खाना खाने के काम आए।

उन दिनों न्यू मार्केट के इस ढाबे में हम तीन या चार रुपए में भरपेट खाना खा लेते थे। ठहरने की निःशुल्क सुविधा हमें कामरेड कपूरचंद घुआरा और शंकरप्रताप सिंह के विधायक निवास में मिल गई थी। तीन चार दिन भटके। भोपाल के बड़े बड़े पत्रकारों तक ने हमें घास नहीं डाली। तब विजयदत्त श्रीधर और आंचलिक पत्रकार संघ ने बहुत साथ दिया। एक दिन प्रतिपक्ष के नेता सुंदरलाल पटवा के पास पहुंचे। उन्होंने सारी कहानी सुनी। पटवाजी हैरत में थे कलेक्टर की करतूतें जानकर। उनके प्रयास से एक दिन विधानसभा में इस मसले पर अनेक घंटे धुआंधार बहस हुई। जिस दिन यह बहस हुई, हमारे पास खाने तक के पैसे नहीं बचे थे और एक दिन पहले ही हम रोडवेज की बस से छतरपुर लौट गए थे। बहस के बाद शाम करीब छह बजे मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने विधानसभा में मामले की न्यायिक जांच का ऐलान किया। भारत की आजादी के बाद पत्रकारों की प्रताड़ना का यह पहला और आखिरी मामला है, जिसमें न्यायिक जांच कराई गई। मैंने और अनेक मित्रों ने अपने अपने अखबारों में जमकर लिखा। हमें भरपूर समर्थन मिला। इस मसले पर मैंने लगातार नईदुनिया, देशबंधु ब्लिट्ज, करंट, ज्ञानयुग प्रभात, दीनोदय, दैनिक जागरण और रविवार जैसे पत्र पत्रिकाओं में लिखा। तब तक राजेंद्र माथुर नईदुनिया के प्रधान संपादक हो गए थे। उन्होंने और रविवार के संपादक सुरेंद्रप्रताप सिंह ने बहुत सहयोग किया। उन्होंने संपादकीय भी लिखे। सरकार पर भारी दबाव बना। मुझे इसका फायदा मिला। एक दिन माथुर साहब का पत्र मिला। लिखा था-इंदौर मिलने आइए। आने जाने का किराया दे देंगे। मैं उस अलौकिक अखबार के दफ्तर में जा पहुंचा। जिस अखबार का संवाददाता न बन सका, उसका उप संपादक बनने का प्रस्ताव। लॉटरी खुल गई। राजेंद्र माथुर के प्रति मन श्रद्धा से भर गया।

नईदुनिया ने मुझे संपादकीय विभाग में बतौर प्रशिक्षु उप संपादक काम करने का ऑफर दिया। मैंने जॉइन कर लिया। इस बीच सरकार की घोषणा के मुताबिक न्यायाधीश देवीप्रसाद पांडे आयोग ने छतरपुर में काम शुरू किया। इसमें गवाही के लिए मैं इंदौर से आता था। हमारे साथी जगदीश तिवारी ने इस केस की पैरवी के लिए महीनों तक अपनी वकालत बंद रखी। जगदीश तिवारी दिल्ली से प्रकाशित जनयुग के संवाददाता भी थे। जब आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी तो जहां तक मुझे याद आता है, जांच के सात बिंदुओं में से साढ़े छह आरोप सही पाए गए थे। आधा आरोप इसलिए सिद्ध नहीं हो पाया क्योंकि एक गवाह कलेक्टर के दबाव में गवाही देने नहीं आया था। इस तरह जांच आयोग के जरिए हमें जीत मिली। अफसोस राज्य सरकार ने आयोग की सिफारिशें तो मानी लेकिन कलेक्टर की सीआर में कोई प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज नहीं की गई और हम लोग लड़ाई जीत कर भी हार गए थे। राजेंद्र माथुर  ने इस मामले में तीखे संपादकीय लिख कर सरकार को हिला दिया था। 

उन दिनों अविभाजित मध्यप्रदेश समेत देश भर में इस मामले की गूंज थी और हम लोगों को दूर दूर तक पत्रकारों के संघर्ष पर व्याख्यान के लिए बुलाया जाता था। हमारे लिए यह बहुत बड़ी बात थी। हां एक बात और है कि जब हम लोगों के उत्पीड़न की खबर इंडियन एक्सप्रेस समेत देश के तमाम राष्ट्रीय अखबारों में छपी तो प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया ने सुओ मोटो इसकी जांच कराने का फैसला किया। जांच समिति आई। उसने जांच की तो उसमें भी हमारे सारे आरोप सही पाए गए। ऐसा नहीं होता कि दो अर्ध न्यायिक एजेंसियां एक समय में एक ही मामले की जांच करें, लेकिन इस मामले में ऐसा हुआ। इस तरह भारत में प्रेस की अभिव्यक्ति का अपने किस्म का यह अनोखा मामला है। तो इस मामले ने पत्रकारिता में अपने सरोकारों के लिए न केवल संघर्ष का रास्ता दिखाया, बल्कि रोजगार का द्वार भी खोला। मैं उन दिनों रेडियो में कैजुअल अनाउंसर और महाराजा महाविद्यालय में अनुबंध के आधार पर इतिहास पढ़ा रहा था। स्वर्गीय राजेंद्र माथुर को मेरे मामले में श्रेय जाता है कि उन्होंने दिशा ही बदल दी।

पत्रकार के तौर पर बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाके से अंग्रेजी में लिखने का अवसर कम हीआता था। यू.एन.आई और पी.टी.आई के लिए केवल स्थानीय खबरें ही भेजीं थीं। माथुरजी ने जॉइन करते ही संपादकीय पन्ने के लिए एक आलेख अनुवाद करने दिया। अगर मुझे याद है तो वह आलेख कुलदीप नैयर का था। शायद वे मेरी अंग्रेजी जांचना चाहते थे। जाहिर था- मैं उनकी अपेक्षा पर  खरा नहीं उतरा। इसके  बाद उनका आदेश था-रोज सुबह घर आओ। मैं अनुवाद सिखाऊंगा। 

अगले दिन सुबह से किराए की साइकल लेकर पांच किलोमीटर दूर उनके घर जाता और वे मुझे अंग्रेजी पढ़ाते। करीब तीन महीने उन्होंने पढ़ाया। गुरु के रूप में राजेंद्र माथुर मेरे सामने थे। दिन गुजरते रहे। वे अखबार की हर विधा में मुझे पारंगत देखना चाहते थे। कुछ दिन बाद उन्होंने मुझे भोपाल संस्करण का स्वतंत्र प्रभार दे दिया। देखते ही देखते संस्करण का प्रसार दोगुना हो गया। इसके बाद उन्होंने ग्रामीण रूपकों के पृष्ठ-परिवेश की जिम्मेदारी भी मुझे सौंप दी। मुझे काम में मजा आने लगा था। मेरे शीर्षक और ले आउट उन्हें बहुत पसंद आते थे। मैं केवल सोने के लिए अपने दड़बे में जाया करता था। बाकी समय दफ्तर में ही बीतता था। कुछ दिन बाद मुझे डेस्क से कुछ ऊब सी होने लगी। मैंने एक दिन उनसे कहा, अब तक मैंने रिपोर्टिंग में काफी समय बिताया है। संभव हो तो रिपोर्टिंग में लगा दें। वो मान तो गए, लेकिन इस शर्त पर कि मैं अपने अन्य सारे काम भी करता रहूंगा। मुझे एक नई साइकल दी गई। यह साइकल अनेक दिन तक कार्यालय में चर्चा का विषय बनी रही। शायद मैं पहला रिपोर्टर था, जिसे नई साइकल खरीदकर दी गई थी। 

राजेंद्र माथुर भाषा की शुद्धता और शब्दों के इस्तेमाल को लेकर बहुत संवेदनशील थे। अक्सर संपादकीय विभाग में इस पर बहस छिड़ जाती कि अमुक शब्द किस तरह लिखा जाना चाहिए। माथुर साब भी उस बहस में शामिल होते थे। अंततः किसी वाक्य और अनुवाद में सर्वश्रेष्ठ शब्द के चुनाव पर ही सहमति बनती थी। फिर भी उन्होंने एक नए ढंग की कक्षा शुरू की। प्रूफ रीडर से लेकर प्रबंध संपादक तक इसमें हिस्सा लेते। विश्वविद्यालय के हिन्दी प्राध्यापकों से लेकर विद्वान तक हमें पढ़ाने आते। हमारी हिंदी ठीक करते। इन कक्षाओं में काफ़ी मशक़्क़त के बाद अखबार की स्टाइल शीट तैयार हुई। मेरे ख्याल से देश में आज भी किसी समाचार पत्र में ऐसा नहीं होता। इसी वजह से राजेंद्र माथुर स्कूल से निकले पत्रकार आज भी भाषा और शब्दों की गरीबी का सामना नहीं करते। 

उन दिनों रविवार देश का सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक था। संपादक थे सुरेंद्रप्रताप सिंह। पत्रकारों के बीच वो एसपी के नाम से लोकप्रिय थे। एसपी किसी काम से इंदौर आए। दोनों शिखर संपादकों की बैठक रविवार में यायावर की डायरी स्तंभ के लेखक बसंत पोतदार के मार्तण्ड चौक वाले घर में हुई। मैं बसंत दा के घर मौजूद था। बसंत दा ने ही मेरी मुलाकात एसपी से कराई। मुलाकात के दौरान एसपी ने माथुर साहब  से कहा कि राजेश को रविवार के लिए मध्य प्रदेश का संवाददाता बनाना चाहते हैं। क्या रविवार के लिए नईदुनिया से मुक्त कर सकेंगे। राजेंद्र माथुर ने सीधे तौर पर न तो नहीं कहा लेकिन रविवार के लिए नईदुनिया में रहते हुए रिपोर्टिंग की अनुमति दे दी। इस तरह रविवार में मेरी रिपोर्टिंग शुरू हो गई। क्या आज के भारत में कोई संपादक इस तरह की अनुमति दे सकता है ?

बहरहाल, रविवार के साथ रिपोर्टिंग के दौरान कभी न भूलने वाला एक वाकया है। हुआ यह कि उन दिनों मध्य प्रदेश के कद्दावर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पर भारतीय जनता पार्टी ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। एसपी ने उस पर एक कवर स्टोरी मांगी। मैंने भेजी। छपते ही हड़कंप मच गया। नईदुनिया पर मुझे नौकरी से निकालने का दबाव आया। सरकारी विज्ञापन बंद करने की धमकी दी गई। माथुर साब पर मुझे निकालने का दबाव बढ़ता गया। मैंने तय किया कि मैं इस्तीफा दे दूंगा। माथुरजी पर आंच नहीं आनी चाहिए। मैंने एसपी को कोलकाता फ़ोन लगा कर जानकारी दी। एसपी ने कहा, राजेश! चिंता मत करो। माथुरजी का सम्मान मेरा अपना सम्मान है। मैं तुम्हारा रविवार में नियुक्ति पत्र भेज रहा हूं। शाम होते होते टेलेक्स पर रविवार का संदेश आ गया। मैं माथुरजी के पास गया और उन्हें सारा हाल बताया। माथुर जी हंस पड़े। बोले, तुम्हें इस्तीफा देने की जरूरत नहीं है। देना ही पड़ेगा तो मैं दूंगा। और मैनेजमेंट को जब माथुरजी ने अपने इस्तीफे की पेशकश की तो सारे लोग परेशान हो गए। माथुर जी और नईदुनिया एक ही सिक्के के दो रूप थे। बताने की जरूरत नहीं कि न मेरी नौकरी गई और  न माथुरजी को इस्तीफा देना पड़ा। क्या आज के दौर में आप ऐसे संपादक की कल्पना भी कर सकते हैं ? 

राजेंद्र माथुर के संपादन की क्या मिसाल दूं। किसी भी आलेख की संपादित प्रति देखिए। आप दंग रह जाएंगे।  उनके पास  आलेख की आत्मा से खिलवाड़ किए बिना उसे छोटा करने का अद्भुत कौशल था। एक और बात। संपादकीय लिखने के बाद उसे किसी दूसरे उपसंपादक को संपादित करने के लिए देते थे। मेरी सीट उनकी कुर्सी के ठीक पीछे थी। अपना लेख या संपादकीय लिखने के बाद वो मेरी तरफ उसे बढ़ा देते। पहली बार जब उन्होंने मुझे संपादन के लिए प्रति दी तो मैं हक्का बक्का रह गया। माथुरजी के लिखे हुए को मैं संपादित करूं? उन्होंने मेरी झिझक पकड़ ली। बोले भूल जाओ कि तुम संपादक के लेख को संपादित कर रहे हो। तुम संपादक हो और तुम्हारे सामने एक आलेख है। हालांकि उसके बाद भी कई दिन तक मैं उनके संपादकीय और आलेख डर डर कर संपादित करता रहा। इसी बीच वे 1982 में नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बनकर दिल्ली जा पहुंचे। उनके जाने के बाद नईदुनिया प्रबंधन ने मुझ पर भरोसा किया। करीब साल भर बाद  मैं उसी कुर्सी पर बैठकर काम कर रहा था, जिस पर माथुर साहब बैठते थे। मेरे लिए इससे बड़ा और क्या हो सकता था? भोपाल संस्करण, संपादकीय पृष्ठ, संपादक के नाम पत्र, रविवारीय संस्करण, मध्य साप्ताहिक और एक तरह से पूरे अखबार का ही जिम्मा मुझ पर आ गया था। 

जिस दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई, उस दिन सुबह सुबह खबर मिल गई थी। अभय छजलानी जी के मार्गदर्शन में हम लोग सारे दिन छोटे आकार का अखबार निकालते रहे। अगले दिन मैंने माथुर जी को सारे अखबार डाक से भेजे। आप यकीन नहीं करेंगे। उन्होंने सारे अखबारों में लाल स्याही से अपने निशान लगाकर मेरे पास भेजे इस टिप्पणी के साथ कि वो अंक और बेहतर कैसे बनाए जा सकते थे। इसके चंद रोज बाद सदी की भीषण मानवीय त्रासदी भोपाल में गैस कांड के रूप में सामने आई। उस रात और अगले कुछ  दिन हम लोगों ने गैस कांड का खास कवरेज किया। उस दिन माथुर साब दिल्ली से इंदौर आए हुए थे। उन्हें खबर मिली तो सीधे नईदुनिया आए। हम लोग उन्हें अचानक देखकर चौंक गए। क्या दिलचस्प नजारा था। उन्होंने उसी कुर्सी पर बैठकर नवभारत टाइम्स के लिए अपना विशेष संपादकीय दिल्ली भेजा, जिस पर नईदुनिया के दिनों में लिखते थे। पहले की तरह मैंने उस आलेख का संपादन किया और दिल्ली भेजा। उस दिन मन बार बार यही मनाता रहा- काश! माथुर जी हमेशा की तरह लिखते रहें। हम उन्हें देखते रहें। 

सिलसिला चलता रहा। माथुर साहब जब इंदौर आते, मैं मिलने पहुंच जाता। वे बड़े उत्साह से नवभारत टाइम्स में हो रहे बदलावों का जिक्र करते थे। एक दिन (शायद 28 जुलाई 1985) दिल्ली से उनका फोन नईदुनिया के दफ्तर आया। मैं उन दिनों तक अखबार की अनेक जिम्मेदारियां संभाल रहा था। माथुर जी ने कहा- एक सप्ताह के भीतर जयपुर पहुंचो। नवभारत टाइम्स जयपुर संस्करण शुरू करने जा रहा था। माथुर साहब एक नए अंदाज और अवतार में थे। उन दिनों नवभारत टाइम्स में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा और साक्षात्कार देना जरूरी था। लेकिन मेरे लिए उन्होंने कहा, जिसे मैंने तैयार किया है, उसे किसी परीक्षा की आवश्यकता नहीं। मैं सीधे ही जयपुर जॉइन करने पहुंचा था। ये था उनका भरोसा। 

मैंने वरिष्ठ वरिष्ठ उप संपादक के रूप में जयपुर जॉइन किया। इसके बाद अगले पांच- छह साल उनके मार्गदर्शन में एक बार फिर काम किया। देश की राजनीति में वह राजीव गांधी के चमत्कारिक उत्थान और असमय अवसान का काल है। राजेंद्र माथुर ने पंजाब में आतंकवाद, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, राजीव गांधी- लोंगोवाल समझौता, भारत की दुनिया भर में बेहतर होती स्थिति, श्रीलंका में शांति सेना, जनता दल का उदय, बोफोर्स विवाद, कम्प्यूटर युग की शुरुआत, कश्मीर में अशांति का एक भयानक दौर, राजीव गांधी की धुंधलाती छवि, बीजेपी की रथयात्रा और चंद्रशेखर की अस्थिर सरकार पर जिस तरह अपनी कलम चलाई, उसकी मिसाल कम से कम हिंदी पत्रकारिता में तो दूसरी नहीं है।

जयपुर में इन्ही दिनों भाचावत वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग को लेकर जयपुर नवभारत टाइम्स में हड़ताल हुई। तालाबंदी की नौबत आ गई। हम लोगों का तबादला दिल्ली कर दिया गया। राजेंद्र माथुर ने मुझे फीचर संपादक बनाया और रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी भी सौंपी। उनके भरोसे पर खरा उतरा। जयपुर में तालाबंदी खत्म हुई। एक बार फिर मैं मुख्य उप संपादक के तौर पर जयपुर में था। जयपुर का नवभारत टाइम्स और वहां की संपादकीय टीम को श्री माथुर सारे संस्करणों में श्रेष्ठ मानते थे। इसलिए यह संस्करण उनका हमेशा चहेता बना रहा। तालाबंदी के बाद तो नवभारत टाइम्स ने उत्कृष्ट पत्रकारिता के अनेक कीर्तिमान गढ़े। राजेंद्र माथुर की कलम ने पाठकों को दीवाना बना दिया। भारत में आज भी संपादक प्रधानमंत्री से मिलने और उनके साथ चाय पीने के लिए लार टपकाते हैं। लेकिन राजेंद्र माथुर को राजीव गांधी ने न जाने कितने बार बुलाया और वो कभी नहीं गए। कहते थे मेरा राजनीतिक रिपोर्टर आपसे मिलेगा। 

राजेंद्र माथुर और सुरेन्द्र प्रताप सिंह की जोड़ी ने देश की हिंदी पत्रकारिता को ऐसे सुनहरे दिन दिखाए, जो उस दौर के हिन्दुस्तान में लोगों को चमत्कृत कर रही थी। इससे पहले सन 1982 से 87-88 तक राजेंद्र माथुर ने नवभारत टाइम्स के पन्नों पर जितने प्रयोग किए वे अद्भुत और चौंकाने वाले थे। अखबार के संस्करण दिल्ली और मुंबई से निकलकर पटना, लखनऊ और जयपुर जैसे प्रादेशिक अवतारों में प्रकट हुए। बताने की जरूरत नहीं कि इन अखबारों ने निष्पक्ष, निर्भीक और जिम्मेदार पत्रकारिता के एक से बढ़कर एक नमूने पेश किए। भारत की आजादी के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ था। करीब-करीब हर संस्करण एक लाख प्रसार संख्या छू रहा था। उस दौर में यह एक करिश्मा ही था। एक तरफ पत्रकारिता के नित नए कीर्तिमान रचते राजेंद्र माथुर तो दूसरी तरफ पत्रकारिता को साबुन बनाकर बेचने की कोशिश करता प्रबन्धन। एक ओर नाविक राजेंद्र माथुर जहाज को फुल स्पीड पर दौड़ाने के प्रयास में। तो दूसरी ओर जहाज के पेंदे में किए जा रहे छोटे-छोटे सुराख। एक तरफ पत्रकारिता की ऊंचाई छूते पेशेवर तो दूसरी तरफ लोकप्रिय पत्रिकाओं की होती हत्या। वह एक भयावह दौर था। विडंबना यह कि- उनके निधन के बाद सारे संस्करण बंद हो गए। कोई संपादक चला ही नहीं पाया। संवेदनाओं के किसी धरातल पर कलम का यह महानायक इस दौर के क्रूर चेहरे को महसूस करता रहा और अभिमन्यु की तरह अकेला मुकाबला करता रहा। 

बहरहाल! उन्नीस सौ नव्बे और इक्यानवे के दरम्यान देश की राजनीति के साथ पत्रकारिता भी उथलपुथल से गुजर रही थी। नवभारत टाइम्स में अगली पीढ़ी प्रबंधन में आई, बाजार का दबाव बढ़ने लगा। माथुर साब पहली बार कुछ कुछ असहज नजर आ रहे थे। मेरी जिंदगी में भी नई शुरुआत हो चुकी थी। श्रीमती मीता बादल मेरी जिंदगी में आ चुकीं थीं। वो मध्यप्रदेश के दमोह में कॉलेज प्राध्यापक थीं। हम दोनों करीब पांच साल से अकेले अकेले दिन काट रहे थे। मैंने माथुर साहब से अनेक बार अनुरोध किया कि मुझे भोपाल कार्यालय में विशेष संवाददाता के तौर पर स्थानांतरित कर दें जिससे हम लोग साथ रह सकें। किन्ही वजहों से ऐसा नहीं हो पाया।

लेकिन एक दिन शायद तीस मार्च उन्नीस सौ इक्यानवे को माथुर जी का सन्देश मिला- इस्तीफा दे दो। भोपाल में नईदुनिया के समाचार संपादक/विशेष संपादक के पद पर काम का प्रस्ताव था। उनकी चिंता थी कि हम लोगों की गृहस्थी की गाड़ी पटरी पर आ जाए। उनका संदेश यह भी था कि चार अप्रैल को सुबह आठ बजे शताब्दी एक्सप्रेस से मैं उनके साथ भोपाल चलूं। वह खुद मेरी नई जिम्मेदारी संभालने के मौके पर साथ रहना चाहते थे। मेरे लिए जीवन का वह अनमोल क्षण था। शताब्दी में भोपाल तक यात्रा के दौरान उस समय की पत्रकारिता और बाजार के बढ़ते दबाव पर लंबी चर्चा हुई। सारी बात लिखना संभव नहीं। 

हां- कह सकता हूं कि राजेंद्र माथुर अनमने थे और अपने राज्य लौटना चाहते थे। उनके पास माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय संस्थान के महानिदेशक पद पर काम का न्यौता भी था। माथुरजी ने मुझे नईदुनिया में अपरान्ह तीन बजे जॉइन कराया और किसी कार्यक्रम में चले गए। अगले दिन तमिलनाडु एक्सप्रेस से उन्हें दिल्ली लौटना था। रात साढ़े आठ बजे भोपाल के मुख्य रेलवे स्टेशन पहुंचे। तमिलनाडु एक्सप्रेस तीन घंटे लेट थी। हम लोग करीब तीन साढ़े तीन घंटे प्लेटफॉर्म के बाहर दूर एक अंधेरे में बेंच पर बैठे गपशप करते रहे। दो दिनों में माथुर जी ने अपने आठ-दस घंटे में अपनी ज्ञानगंगा से मेरी झोली भर दी थी। उतना तो मैंने पंद्रह साल में उनसे नहीं पाया था। गाड़ी आई। मैंने उन्हें विदा किया। वो एसी कोच के दरवाजे पर खड़े देर तक हाथ हिलाते रहे, मैं हाथ उठाए विदाई देता खड़ा रहा। देर तक। ट्रेन जब चली गई तो मेरा मन भारी था। लग रहा था दौड़ कर वापस ट्रेन पकड़ लूं और माथुर साहब से कहूं मुझे आपके साथ ही दिल्ली काम करना है। पर यह संभव न था। मैं भारी मन से अपने को लाश की तरह उठाए लौट पड़ा। वह पांच अप्रैल उन्नीस सौ इक्यानवे की रात थी।

अगले दो तीन दिन नईदुनिया में और बीते। मुझे रोज ही बेचैनी होती। उस रात स्टेशन पर राजेंद्र माथुर जी की बातें, उनकी बेचैनी, उनकी उद्विग्नता सब कुछ याद आता। इच्छा होती कि ट्रेन पकड़ूं और माथुर साब के पास पहुंच जाऊं। लगता था- मुझे वो याद कर रहे हैं। चार दिन बाद याने नौ अप्रैल को दोपहर बारह बजे के आसपास कार्यालय पहुंचा। जाते ही प्रबंध संपादक राजेंद्र तिवारी जी ने खबर दी- राजेश! रज्जू बाबू चले गए। मैं हक्का बक्का। काटो तो खून नहीं। मन चीख उठा। ऐसे कैसे जा सकते हैं माथुर साहब।अभी उस रात तो उन्होंने अपने भविष्य की योजना बताई थी। बहुत काम बाकी था। छप्पन साल की उमर में चले गए। जहां से उन्होंने मेरा सफर शुरू कराया, वहीं छोड़ कर चले गए। तब से आज तक कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जिस दिन उनकी याद न आती हो। उनका लेखन कई -कई बार पढ़ चुका हूं। हर बार यादों की फिल्म आंखों के सामने नाचने लगती है।

राजेंद्र माथुर के साथ काम करने का अनुभव अनमोल मोती की तरह मेरे पास है। वे जितने अच्छे पत्रकार थे, उससे अच्छे लेखक। जितने अच्छे लेखक थे, उससे अच्छे संपादक। जितने अच्छे संपादक थे, उससे अच्छे इंसान। किसी भी देश को ऐसे देवदूत बार बार नहीं मिलते।

कुछ साल पहले मैं एक पत्रकारिता संस्थान में गया। छात्रों से बातचीत के दौरान मैने उनसे राजेंद्र माथुर के बारे में पूछा। अफसोस कम छात्र ही थे जो राजेंद्र माथुर के बारे में ठीक ठाक जानकारी रखते थे। मेरे लिए यह सदमे से कम नहीं था। कहीं न कहीं बड़ी गलती हुई है। नई पीढ़ी अगर माथुर साहब का लिखा नहीं पढ़ रही है, उन्हें नहीं जान रही है तो हम लोग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। एक तो उनके लेखन को सामने लाने में देरी हुई। दूसरे पत्रकारिता पाठ्यक्रमों में राजेंद्र माथुर को जगह नहीं मिली। तीसरा टेलिविजन पत्रकारिता ने माथुर साहब को कहीं गुम कर दिया। यह गलती अब भी ठीक की जा सकती है। यह सोचकर मैंने तय किया कि अगर नई पीढी के पत्रकार माथुरजी को नहीं पढना चाहते तो कम से कम उनके बारे में न्यूनतम जानकारी तो रखें। मैंने राजेंद्र माथुर पर वृतचित्र बनाने का फैसला किया। फैसला तो कर लिया, लेकिन जो हमारे बीच से करीब दो दशक पहले जा चुका हो, उस पर फिल्म बनाना आसान नहीं था। बहुत कुछ सामग्री मेरे पास थी, लेकिन उनकी आवाज, उनके विजुअल्स खोजना आसान नहीं था। तीन साल भटकता रहा। कई बार लगता-फिल्म नहीं बन पाएगी।फिर अन्दर से ताकत जुटाता और खोज में लग जाता।

श्रीमती मोहिनी माथुर और नईदुनिया के पूर्व प्रधान संपादक आलोक मेहता ने अपने खजाने से माथुर जी पर कुछ दुर्लभ सामग्री निकाली। फिल्म का पहला शो इंदौर के प्रेस क्लब में हुआ, जिसके कभी राजेंद्र माथुर अध्यक्ष रहे थे। उनके नाम पर सभागार भी वहां है। फिल्म का शो इसी ऑडिटोरियम में हुआ। तब से कोई दस बारह विश्वविद्यालयों में, पच्चीस से ज्यादा मीडिया संस्थानों में यह फिल्म दिखाई जा चुकी है। अब तो राजेंद्र माथुर और उनके बारे में सब कुछ सामने लाना यही मकसद है।

 

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वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने बताया, पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में 26 अक्टूबर से नवागत विद्यार्थियों के आत्मीय प्रबोधन और करियर मार्गदर्शन के लिए ‘संत्रारंभ 2020’ का आयोजन किया जा रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 October, 2020
Last Modified:
Tuesday, 27 October, 2020
AlokMehta

देश के विख्यात माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में 26 अक्टूबर से नवागत विद्यार्थियों के आत्मीय प्रबोधन और करियर मार्गदर्शन के लिए ‘संत्रारंभ 2020’ का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम के दूसरे दिन 27 अक्टूबर को सुबह 10 बजे से साढ़े 12 बजे के बीच उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने कहा, ‘आज भी पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धातों में कोई अंतर नहीं आया है। अंतर सिर्फ तकनीकी और माध्यम में आया है। उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया और डिजिटल मीडिया ने सूचना और समाचारों का लोकतांत्रिकरण एवं विकेंद्रीकरण किया है। प्रो. सुरेश ने कहा कि पत्रकार न विपक्ष का होता है और न ही सत्ता पक्ष का। उसका मात्र एक ही पक्ष होता है और वह है, जनपक्ष।’

वहीं, कार्यक्रम के दौरान पद्मश्री से अलंकृत व वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने कहा कि यह कहना सही नहीं कि आज पत्रकारिता के सामने अधिक कठिनाई है। वास्तविकता यह है कि पत्रकारिता में हर युग में चुनौतियां रही हैं। यदि लक्ष्मणरेखा को ध्यान में रखें तभी हम पत्रकारिता में खतरे उठा सकते हैं। आज पत्रकारिता इसलिए सुरक्षित है क्योंकि हमारे प्रारंभिक पत्रकारों एवं संपादकों ने लक्ष्मणरेखा नहीं लांघी।

‘पत्रकारिता की लक्ष्मणरेखा’ पर अपने विचार रखते हुए आलोक मेहता ने कहा कि सबसे बड़ा संकट विश्वसनीयता का है। पत्रकारों को विश्वसनीयता बचाए रखने के प्रयास करने चाहिए। उसे किसी का पक्षकार बनने से बचना चाहिए। जब कोई भरोसा करके आपको सूचना या समाचार देता है, तब उसे लीक नहीं करना चाहिए, उसकी जांच करके प्रकाशित करना चाहिए। पत्रकारों को अपनी पाचनशक्ति को मजबूत रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को भ्रम फैलाने वाली खबरों के प्रसारण से बचना चाहिए।

बढ़ गई है डिजिटल मीडिया की खपत :

‘न्यू मीडिया : अवसर और चुनौतियां’ विषय पर रिलायंस इंडस्ट्रीज के मीडिया निदेशक एवं अध्यक्ष उमेश उपाध्याय ने कहा कि कोरोना काल में डिजिटल मीडिया की उपयोगिता सामने आई और उसका दायरा भी बढ़ा। इस दौरान न केवल शहरों में बल्कि ग्रामीण भारत में भी डिजिटल कंटेंट देखे जाने की प्रवृत्ति बहुत बढ़ी है। उन्होंने कहा कि भारत में चीन के मुकाबले प्रति व्यक्ति डेटा की खपत अधिक है। भारत में प्रति व्यक्ति 12 जीबी डेटा की खपत है। पत्रकारिता के विद्यार्थियों को डेटा और उसके विश्लेषण की विधि को समझना चाहिए। आज समाचारों की दुनिया मोबाइल फोन में सिमट गई है। दुनिया में 91 प्रतिशत डेटा मोबाइल के माध्यम से उपयोग हो रहा है।

प्रयोगों में कंटेंट नहीं दबना चाहिए :

‘टेलीविजन समाचारों के बदलते प्रतिमान’ विषय पर डीडी न्यूज के सलाहकार संपादक अशोक श्रीवास्तव ने कहा कि तीन दशक में टेलीविजन पत्रकारिता और उसके समाचारों के प्रस्तुतिकरण में व्यापक बदलाव आया है। हर दौर में टेलीविजन में बदलाव आया है और उन बदलावों का विरोध हुआ है। समाचार प्रस्तुतिकरण में होने वाले प्रयोगों से दिक्कत नहीं होनी चाहिए, तकलीफ इस बात की होती है कि इन प्रयोगों में कई बार कंटेंट दब जाता है। उन्होंने कहा कि टीआरपी की व्यवस्था न्यूज चैनल्स के लिए ठीक नहीं है, इसे बंद कर देना चाहिए।

संचार के तरीकों को सरल बनाना है जनसंपर्क :

‘कोविड उपरांत व्यवसाय के लिए जनसंपर्क वैक्सीन’ पर अपनी बात रखते हुए ग्रे मैटर्स कम्युनिकेशन्स के संस्थापक डॉ. नवनीत आनंद ने कहा कि जनसंपर्क विधा में हम ब्रांड की छवि और उसके प्रति बनी अवधारणा का प्रबंधन करते हैं। अच्छे जनसंपर्क अधिकारी की विशेषता होती है कि वे संचार के तरीकों को सरल बनाते हैं। जनसंपर्क के क्षेत्र में हम संकट के समय में लोगों का उत्साह बढ़ाते हैं, उनको प्रेरित करते हैं। कोरोना के कारण व्यावसायिक क्षेत्र में अनेक प्रकार के संकट आए हैं, जिनसे बाहर निकलने में पीआर बहुत उपयोगी साबित होगा।

वहीं कार्यक्रम के तीसरे दिन 28 अक्टूबर को सुबह 10:00 बजे ‘मीडिया मैनेजमेंट’ विषय पर बिजनेस वर्ल्ड  व एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा, सुबह 11:30 बजे ‘कम्प्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में संभावनाएं’ विषय पर स्कूल ऑफ कम्प्यूटर साइंस यूपीएस, देहरादून के डीन डॉ. मनीष प्रतीक और दोपहर 2:00 बजे ‘ब्रॉडकास्ट का भविष्य’ विषय पर प्रख्यात आरजे सिमरन कोहली विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करेंगी। समापन सत्र में अपराह्न 3:30 बजे महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतीहारी (बिहार) के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा बतौर मुख्य अतिथि एवं वक्ता उपस्थित रहेंगे। समापन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रो. केजी सुरेश करेंगे।

सभी व्याख्यान का प्रसारण विश्वविद्यालय के फेसबुक पेज पर होगा-

https://www.facebook.com/mcnujc91

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राष्ट्रपति का ये इंटरव्यू बना चर्चा का विषय, सवालों से परेशान होकर बीच में छोड़ा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार उनका एक इंटरव्यू चर्चा का विषय बना हुआ है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 October, 2020
Last Modified:
Tuesday, 27 October, 2020
trump4

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार उनका एक इंटरव्यू चर्चा का विषय बना हुआ है। CBS न्यूज के साथ चल रहे इंटरव्यू को बीच में छोड़कर चले जाने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) की आलोचना हो रही है।

दरअसल, कुछ दिनों पहले '60 मिनट' के कार्यक्रम के लिए उन्हें पत्रकार लेस्ली स्टाल के साथ इंटरव्यू करना था। व्हाइट हाउस में नेटवर्क के क्रू ने कैमरा के साथ पूरी तैयारी कर ली थी। डोनाल्ड ट्रंप ने भी सभी सवालों के जवाब देने का संकेत दिया था।

इंटरव्यू शुरू हुआ तो मेजबान लेस्ली स्टाल के साथ ट्रंप करीब 45 मिनट बैठे। इंटरव्यू के दौरान ट्रंप एंकर के एक सवाल पर नाराज हो गए।

पत्रकार लेस्ली ने राष्ट्रपति से पूछा- 'क्या आपके ट्वीट्स और नाम लेकर बात कहने से लोगों का मोह भंग हो रहा है?'

इसका जवाब देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, 'अगर मेरे पास सोशल मीडिया नहीं होता तो मैं यहां नहीं होता। ट्रंप ने कहा कि वे सोशल मीडिया की ताकत के कारण ही राष्ट्रपति बने हैं और वे इसे नहीं बदलेंगे। उन्होंने कहा कि मीडिया फेक है। मैं खुलकर कहूं तो अगर मेरे पास सोशल मीडिया नहीं होता, तो मैं लोगों तक अपनी बात नहीं पहुंचा पाता।'

इंटरव्यू के दौरान लेस्ली ने डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट पर सवाल खड़े किये, साथ ही कहा कि एक राष्ट्रपति के तौर पर उनके ट्वीट सही नहीं हैं। जिस पर डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वो सोशल मीडिया की ताकत के कारण ही राष्ट्रपति बने हैं और वो इसे नहीं बदलेंगे,जिसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने पत्रकार को टोका और कहा कि आप जो बिडेन से भी इतने सख्त सवाल क्यों नहीं पूछतीं और वे शो से उठकर चले गये।

इसके बाद दोनों के बीच तीखी बहस भी हो गई। इंटरव्यू के दौरान ट्रंप ने ये भी आरोप लगाया कि जो बाइडेन से इतने सख्त सवाल नहीं पूछे जाते जितने सख्त सवाल उनसे पूछे जाते हैं। पत्रकार लेजले ने शुरू में ही उनसे पूछा था कि क्या वे सख्त सवालों के लिए तैयार हैं इस पर ट्रंप ने कहा कि 'ये बात करने का तरीका नहीं है।'

जब पत्रकार ने ट्रंप को ये याद दिलाया कि बाइडेन राष्ट्रपति नहीं थे, बल्कि ट्रंप खुद राष्ट्रपति थे। इस बात पर ट्रंप सेट से उठकर चले गए और फिर टीवी शो की दोबारा शूटिंग के लिए नहीं लौटे। 

बाद में ट्रंप ने ट्विटर पर पत्रकार का एक क्लिप शेयर किया, जिसमें ट्रंप को मास्क पहने देखा गया। हालांकि, पत्रकार व्हाइट हाउस में मास्क नहीं लगाए हुई थीं। ट्रंप वीडियो में पत्रकार पर मास्क नहीं पहनने का आरोप लगा रहे हैं।

ट्रंप ने कहा, ‘मुझे आपको बताते हुए खुशी हो रही है कि रिपोर्टिंग में सत्यता की खातिर मैं लेस्ली स्टाल के साथ अपने इंटरव्यू को प्रसारण से पहले पोस्ट करने की सोच रहा हूं।’ उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि हर शख्स को एक झलक मिल सके कि कैसा फर्जी और पक्षपातपूर्ण इंटरव्यू है।

 

इस बीच टीवी इंटरव्यू (TV Interview) को बीच में ही छोड़कर चले जाने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) की आलोचना हो रही है। सोशल मीडिया (Social Media) पर इस इंटरव्यू का क्लिप तेजी से वायरल हो रही है। साथ ही बराक ओबामा (Barak Obama) सहित विपक्षी नेता भी ट्रंप की आलोचना कर रहे हैं।  

पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा, ‘वह पगला गये और 60 मिनट के साक्षात्कार से उठकर चले गये। उन्होंने सोचा कि सवाल बड़े कठिन हैं। यदि वह ‘आप दूसरे कार्यकाल में क्या करना पसंद करेंगे' जैसे कठिन सवाल का जवाब नहीं दे सकते तो हम उन्हें दूसरा कार्यकाल नहीं दे सकते।

 

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सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स के CEO एनपी सिंह ने कुछ यूं समझाया बेहतर कंटेंट का महत्व

विजिनरी टॉक सीरीज के तहत ‘गवर्नेंस नाउ’ के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ विशेष बातचीत में सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स के एमडी और सीईओ एनपी सिंह ने अच्छे कंटेंट समेत तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 24 October, 2020
Last Modified:
Saturday, 24 October, 2020
Visionary Talk

‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स’ (Sony Pictures Networks) इंडिया के ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म ‘सोनी लिव’ (SonyLIV) पर नई वेब सीरीज ‘Scam 1992: The Harshad Mehta Story’ की सफलता से उत्साहित सोनी पिक्चर्स नेटवर्क के एमडी और सीईओ एनपी सिंह का कहना है कि आज के समय में स्क्रिप्ट नया हीरो है।

‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में एनपी सिंह ने वेब सीरीज की सफलता का श्रेय इसके कंटेंट को देते हुए कहा कि इसमें नए एक्टर्स होने के बावजूद सोनी लिव का सबस्क्राइबर बेस काफी बढ़ा है और लोगों का फोकस अब दमदार स्टोरीटैलिंग की ओर हो गया है।  

पब्लिक पॉलिसी प्लेटफॉर्म पर ‘विजिनरी टॉक सीरीज’ (Visionary Talk series) के तहत होने वाले इस वेबिनार के दौरान एनपी सिंह ने अन्य सफल वेब सीरीज जैसे- ‘अनदेखी’, ‘पंचायत’, ‘गुल्लक’ और ‘पाताल लोक’ का उदाहरण भी दिया, जिन्हें लोगों ने काफी पसंद किया है और कहा कि नए चेहरों और कंटेंट की ओर लोगों का रुझान बढ़ना शुरू हो गया है।  

एनपी सिंह के अनुसार, ‘अब फोकस स्टोरीटैलिंग की ओर शिफ्ट हो चुका है। मेरे लिए स्क्रिप्ट हीरो है। हम हमेशा अच्छी क्वालिटी के कंटेंट को बेहतर स्टोरीटैलिंग के साथ पेश करेंगे, जो हमारे व्युअर्स को पसंद आएगी। यदि आपके पास अच्छी क्वालिटी का कंटेंट है और आप सच्चे व मूल विचारों के साथ रहते हैं तो आपको सफलता जरूर मिलेगी।’

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ट्रेडमार्क-टैगलाइन के इस्तेमाल को लेकर Times Network की याचिका पर HC ने दिया ये आदेश

वर्ष 2017 में बेनेट कोलमैन कंपनी ने ट्रेडमार्क उल्लंघन के आरोप में एआरजी आउटलियर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था।

Last Modified:
Friday, 23 October, 2020
Times Network

दिल्ली हाई कोर्ट ने अरनब गोस्वामी की कंपनी ‘एआरजी आउटलेयर मीडिया’ (ARG Outlier Media Private Limited) द्वारा ‘NEWS HOUR’ अथवा इसके नाम से मिलते-जुलते किसी भी ट्रेड मार्क का इस्तेमाल किए जाने पर अंतरिम तौर पर रोक लगा दी है।   

बता दें कि वर्ष 2017 में बेनेट कोलमैन/टाइम्स नेटवर्क ने अपने ट्रेडमार्क ‘न्यूज आवर’ (News Hour) और ‘नेशन वॉन्ट्स टू नो’ (Nation Wants to Know) के संरक्षण के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष अरनब गोस्वामी की कंपनी एआरजी आउटलेयर मीडिया के खिलाफ ट्रेडमार्क उल्लंघन का एक मुकदमा दायर किया था।

वहीं, ‘NATION WANTS TO KNOW’ टैगलाइन के बारे में न्यायमूर्ति जयंत नाथ की एकल पीठ ने कहा कि सभी सबूतों का विस्तृत परीक्षण किए जाने की जरूरत है, इसलिए तब तक एआरजी आउटलियर को किसी भी न्यूज चैनल पर अपने भाषण/प्रजेंटेशन आदि के हिस्से के रूप में इसके इस्तेमाल की अनुमति है।

हालांकि कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि एआरजी आउटलियर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड किसी भी संबंध में ट्रेडमार्क के समान इसका इस्तेमाल करना चाहता है तो उसे इस तरह के इस्तेमाल का हिसाब रखने की जरूरत होगी। इस तरह के हिसाब अथवा खातों को हर छह महीने में एक बार एआरजी के निदेशकों में से एक के हलफनामे पर नियमित रूप से अदालत में दायर किया जाना चाहिए।

खंडपीठ ने ‘NATION WANTS TO KNOW’ टैगलाइन के मालिकाना हक के मामले में किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं दी और इसे सबूतों के आधार पर निर्णय के लिए छोड़ दिया। इसी तरह वर्ष 2017 में ‘टाइम्स नेटवर्क’  ने दिल्ली हाई कोर्ट में एआरजी आउटलियर के खिलाफ गोपनीयता भंग के लिए एक मुकदमा दायर किया था। इसमें एआरजी ने कोर्ट में यह वचन दिया था कि वह अपने चैनल पर टाइम्स नाउ की प्रोग्रामिंग सामग्री का इस्तेमाल नहीं करेंगे और इसके आधार पर उसे राहत प्रदान की गई थी।

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इस वजह से पहले पत्रकार के बेटे का किया अपहरण, फिर कर दी हत्या

तेलंगाना के महबूबाबाद जिले में एक पत्रकार के नौ साल के बेटे का अपहरण करने के बाद उसकी हत्या कर दी गई है

Last Modified:
Friday, 23 October, 2020
Crime

तेलंगाना के महबूबाबाद जिले में एक पत्रकार के नौ साल के बेटे का अपहरण करने के बाद उसकी हत्या कर दी गई है। फिरौती के लिये अपहर्ताओं ने 45 लाख रुपए देने की मांग की थी। पुलिस ने जानकारी दी है कि आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है।

पुलिस के मुताबिक, बच्चे के पिता को जानने वाले 23 वर्षीय मैकेनिक ने बच्चे का 18 अक्टूबर को अपहरण किया था और उसी दिन ही गला दबाकर हत्या करने के बाद बच्चे के शव को पहाड़ी पर जला दिया गया था। पुलिस ने बताया कि अपहर्ताओं को भय था कि बच्चे को छोड़ने पर वह उसकी पहचान उजागर कर देगा, लिहाजा आरोपी ने उसकी हत्या कर दी थी।

बता दें कि महबूबाबाद शहर के कृष्णा कॉलोनी निवासी में रंजीत कुमार का परिवार रहता है। रंजीत कुमार पेशे से पत्रकार हैं। उनका 9 वर्षीय बड़ा बेटा दीक्षित रेड्डी का रविवार शाम 6.30 बजे के आसपास बाइक सवार अज्ञात लोगों ने अपहरण कर लिया था, जब वह महबूबाबाद शहर में स्थित अपने घर के बाहर खेल रहा था। अपहर्ता मोटरसाइकिल पर सवार होकर आये थे और बच्चे को उठा ले गए। पुलिस को शक था कि बच्चा संभवत: उनको जानता था। बाद में अपहर्ताओं ने इंटरनेट के माध्यम से फोन पर बच्चे की मां से संपर्क किया और उसकी रिहाई के लिये  45 लाख रुपए देने की मांग की थी।

पुलिस ने बताया कि बच्चे के पिता द्वारा हाल में संपत्ति खरीदे जाने की जानकारी मिलने के बाद आरोपी ने जल्द से जल्द पैसे कमाने के लिए अपहरण की योजना बनाई, जिसके बाद इस अपराध को अंजाम दिया, ताकि वह अमीरों की तरह जिंदगी जी सके। महबूबाबाद जिले के पुलिस अधीक्षक कोटी रेड्डी ने बताया कि योजना के तहत आरोपी 18 अक्टूबर को पीड़ित के घर गया और बच्चे को बुलाया। चूंकि अरोपी बच्चे के पिता का जानता था इसलिए बच्चा उसके साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर चला गया। आगे ले जाने के बाद उसे एहसास हुआ कि अकेले बच्चे को संभालना बहुत मुश्किल है। आरोपी सीसीटीवी कैमरे से बचने के लिए बच्चे को अलग रास्ते से शहर से बाहर किसी सूनसान जगह पर ले गया। वहां उसने बच्चे को बंधक बनाकर रखा। वह डर गया था कि बच्चा अपने माता-पिता को सब बता देगा, इसलिए उसने बच्चे की हत्या कर दी।

बच्चे की हत्या करने के बाद भी, उसने घटना के दिन रात नौ बजे उसकी मां वसंता को फोन किया और 45 लाख रुपए की राशि मांगी। अपहर्ता रोज इंटरनेट से बच्चे के परिवार को फोन कर पैसा मांगता था। बुधवार को उसने परिवार से पैसे को मोडू कोटला इलाके में लाने के लिए कहा। एक न्यूज चैनल में काम करने वाले बच्चे के पिता रंजीत रेड्डी पैसों का बैग लेकर पहुंच भी गए, लेकिन अपहरर्ता वहां से बाहर नहीं आया। उन्होंने वहां बुधवार रात तक इंतजार किया।

बाद में परिवार की शिकायत पर अपहरर्ता को पकड़ने के लिए पुलिस ने जाल बिछाया। एसपी ने कहा कि उन्होंने कई संदिग्धों से पूछताछ की लेकिन जांच से पता चला कि मंदा सागर ने इस घटना को अकेले अंजाम दिया। उन्होंने बताया कि बाद में पुलिस ने शिकायत पर कार्रवाई करते हुए इलाके के सीसीटीवी फुटेज को खंगाला और आरोपी को बच्चों को मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले जाने की तस्वीर दिखी, जिसके आधार पर मैकेनिक को गिरफ्तार किया गया। 

पुलिस ने कहा कि मामले की जांच की जा रही है और पता लगाया जा रहा है कि कहीं इस अपराध में और लोग तो शामिल नहीं है।

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मीटिंग के समय वीडियो कॉल पर रिपोर्टर ने किया कुछ ऐसा, मांगनी पड़ी माफी

कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को देखते हुए देश-दुनिया में ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) करने का चलन बढ़ा है।

Last Modified:
Friday, 23 October, 2020
Meeting

कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को देखते हुए देश-दुनिया में ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) करने का चलन बढ़ा है।  तमाम कंपनियां घरों से काम कराने को प्राथमिकता दे रही हैं। ऐसे में तमाम लोगों के लिए उनका लिविंग रूम दफ्तर और वीडियो कॉल उनके नए कॉन्फ्रेंस रूम में तब्दील हो गया है। ऐसा भी देखने में आया है कि वीडियो कॉल के दौरान कुछ लोग भूल जाते हैं कि वह सार्वजनिक मंच पर हैं और कोई न कोई ऐसी ‘हरकत’ कर देते हैं, जिससे उन्हें बाद में शर्मिंदा होना पड़ता है।

ऐसा ही एक मामला अमेरिका से सामने आया है, जहां पर पिछले हफ्ते वर्चुअल मीटिंग के दौरान अमेरिकी मैगजीन ‘न्यू यॉर्कर’ (New Yorker) का एक रिपोर्टर हस्तमैथुन (masturbating) करने लगा। इस दौरान जेफरी टोबिन (jeffrey toobin) नामक इस रिपोर्टर को अहसास ही नहीं हुआ कि तमाम लोग उसे देख रहे हैं। रिपोर्टर की इस हरकत पर उसे निलंबित कर दिया गया है।

म़ीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले हफ्ते ‘न्यू यॉर्कर’ और ‘डब्ल्यूएनवाईसी रेडियो’ (WNYC radio) के सदस्यों के बीच जूम वीडियो कॉल हो रही थी। इस कॉल के दौरान थोड़ी देर के लिए ब्रेक हुआ तो टोबिन दूसरी कॉल पर व्यस्त हो गए। ब्रेक के बाद जब अन्य लोग वीडियो कॉल पर वापस आए तो उन्हें जेफरी टोबिन हस्तमैथुन करते हुए दिखाई दिए।

रिपोर्ट्स के अनुसार इस बारे में टोबिन का कहना है, ‘मैंने एक शर्मनाक मूर्खतापूर्ण गलती की। मुझे लगा कि कैमरा बंद है। इस शर्मनाक गलती के लिए मैं अपनी पत्नी, परिवार, दोस्तों और सहयोगियों से माफी मांगता हूं।’ ‘न्यू यॉर्कर’ की प्रवक्ता नताली रेबे (Natalie Raabe) ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि टोबिन को निलंबित कर दिया गया है और मामले में जांच का आदेश दिया गया है।

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बिहार में इस पॉलिटिकल पार्टी के प्रवक्ता बने पत्रकार असित नाथ

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने न्यूज एंकर असित नाथ तिवारी ने राजनीति में अपनी नई पारी की शुरुआत की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 22 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 22 October, 2020
Asit Nath

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने न्यूज एंकर असित नाथ तिवारी ने राजनीति में अपनी नई पारी की शुरुआत की है। उन्हें बिहार कांग्रेस का प्रवक्ता नियुक्त किया गया है। इस बात की जानकारी असित नाथ ने खुद अपने फेसबुक पेज पर दी है।

बिहार के बेतिया के रहने वाले असित नाथ तिवारी ने पश्चिम चंपारण में पढ़ाई की है और पत्रकारिता की शुरुआत भी वहीं से की। उन्होंने दैनिक जागरण की मुजफ्फरपुर यूनिट से सम्बद्ध होकर रिपोर्टिंग की शुरुआत की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

टीवी पत्रकारिता में असिता नाथ ने महुआ टीवी से बतौर एंकर शुरुआत की और यह सफर मौर्या टीवी, जी न्यूज हिंदी, के न्यूज इंडिया और समाचार प्लस आदि  तक जारी रहा। असित इन चैनल्स में आउटपुट हेड समेत कई वरिष्ठ पदों पर रहे। पत्रकारिता के साथ साथ कविता और सार्थक लेखन में भी असित की विशेष रुचि है। उन्होंने ‘नदी लौटती भी है’ नाम से कहानी संग्रह भी लिखा है।

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अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थाओं ने PM मोदी को लिखा लेटर, उठाया ये बड़ा मुद्दा

जिन दो अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थाओं ने मोदी को पत्र लिखा है, वे ‘इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट’ (आईपीआई) और ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स’ (आईएफजे) हैं।

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Published - Thursday, 22 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 22 October, 2020
PM MODI

दो अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर पत्रकारों के उत्पीड़न का मामला उठाया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार को लिखे गए इस पत्र में इन दोनों प्रेस संस्थाओं ने पीएम से यह सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने का आग्रह किया है, जिससे पत्रकारों का उत्पीड़न न हो और वे प्रतिशोध के डर के बिना काम कर सकें।

जिन दो अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थाओं ने मोदी को पत्र लिखा है, वे ऑस्ट्रिया-मुख्यालय स्थित ‘इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट’ (आईपीआई) और बेल्जियम स्थित ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स’ (आईएफजे) हैं। इन दोनों संस्थाओं ने मोदी से राज्य सरकारों को पत्रकारों के खिलाफ देशद्रोह समेत सभी आरोपों को वापस लेने का निर्देश देने के लिए कहा है, जो कर्तव्य पालन के दौरान उन पर लगाए गए हैं।

इसके साथ ही पत्र में यह भी कहा गया है कि महामारी फैलने के बाद पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। पत्र के अनुसार, ‘स्वास्थ्य संकट का उपयोग उन लोगों को चुप कराने के लिए किया जा रहा है, जिन्होंने सरकार की कमी को उजागर किया है। एक सफल सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया के लिए एक स्वतंत्र मीडिया आवश्यक है।’

उन्होंने लिखा है, ‘स्वतंत्र, महत्वपूर्ण पत्रकारों को परेशान करने के लिए राजद्रोह के कानूनों का उपयोग न केवल देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का घोर उल्लंघन है। यह सरकार द्वारा किसी आलोचना को चुप कराने का भी प्रयास है।’

रिपोर्ट्स के अनुसार इन दोनों एसोसिशंस का कहना है, ’भारत में 25 मार्च को जब पहली बार लॉकडाउन लगाया गया था, तब से 31 मई के बीच महामारी को कवर करने के लिए 55 पत्रकारों को निशाना बनाया गया। राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप (आरआरएजी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में ये जानकारी दी गई।’

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पत्रकार की पिटाई के खिलाफ आगे आया एडिटर्स गिल्ड, उठाई ये मांग

संपादकों की संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने दिल्ली में ‘कारवां’ मैगजीन के पत्रकार अहान पेनकर को पुलिस द्वारा पीटे जाने के मामले की कड़ी निंदा की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 22 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 22 October, 2020
EGI

संपादकों की संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ (Editors Guild Of India) ने दिल्ली में ‘कारवां’ (Caravan) मैगजीन के पत्रकार अहान पेनकर को पुलिस द्वारा पीटे जाने के मामले की कड़ी निंदा की है। इस बारे में गिल्ड की ओर से एक स्टेटमेंट भी जारी किया गया है। गिल्ड ने गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस कमिश्नर से इस मामले में लिप्त पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने की मांग की है।  

गिल्ड का कहना है कि पेनकर पर पुलिस ने उस समय हमला किया, जब वह बतौर पत्रकार अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे। दिल्ली में पिछले दो महीनों के दौरान कारवां मैगजीन का यह चौथा पत्रकार है, जिस पर हमला किया गया है।

यह भी पढ़ें: पत्रकार ने पुलिस अधिकारी पर लगाए गंभीर आरोप, कमिश्नर को दी शिकायत

गिल्ड की ओर से जारी स्टेटमेंट के अनुसार, ‘पिछले दिनों उत्तरी दिल्ली में नाबालिग दलित लड़की के बलात्कार और हत्या की घटना के मामले में कुछ छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता मॉडल टाउन इलाक़े के पुलिस स्टेशन के बाहर पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। पेनकर इसी मामले की कवरेज कर रहे थे। तभी पुलिस ने उनकी पिटाई कर दी। इस दौरान पेनकर ने अपना प्रेस कार्ड भी दिखाया, लेकिन पुलिस नहीं मानी। पुलिस ने उनका फोन जब्त कर लिया और खींचे गए फोटोग्राफ डिलीट कर दिए।’

इस स्टेटमेंट भी यह भी कहा गया है, ‘कारवां के रिपोर्टर पर हुआ यह हमला संवैधानिक सिद्धांतों और मीडिया के स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने के अधिकार का उल्लंघन है। गिल्ड हमले में शामिल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ केंद्रीय गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस आयुक्त से सख्त कार्रवाई की मांग करता है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। इसके साथ ही पत्रकार के खिलाफ किसी भी मामले को रोकने का निर्देश देना चाहिए।’

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ZEE में हुए बड़े बदलाव, राहुल जौहरी को मिली ये जिम्मेदारी

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEE) ने बुधवार को ‘ZEE 4.0 स्ट्रेटजी’ के अनुरूप संगठन के रणनीतिक पुनर्गठन की घोषणा की

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2020
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2020
Zee

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEE) ने बुधवार को ‘ZEE 4.0 स्ट्रेटजी’ के अनुरूप संगठन के रणनीतिक पुनर्गठन की घोषणा की।

इस पुनर्गठन के तहत पुनीत मिश्रा कंटेंट व इंटरनेशनल मार्केट्स के प्रेजिडेंट की भूमिका निभाएंगे। वहीं अमित गोयनका डिजिटल बिजनेस एंड प्लेटफॉर्म्स के प्रेजिडेंट की जिम्मेदारी संभालेंगे। तरुण कात्याल जो ZEE5 इंडिया के बिजनेस का नेतृत्व कर रहे हैं, वे अमित गोयनका को रिपोर्ट करते रहेंगे।

शरीक पटेल इंटीग्रेटेड मूवीज बिजनेस का काम देखेंगे और अनुराग बेदी म्यूजिक बिजनेस संभालते रहेंगे।

इसके अलावा राहुल जौहरी को प्रेजिडेंट (बिजनेस- साउथ एशिया) के तौर पर नियुक्त किया गया है और वे इंटीग्रेटेड रेवेन्यू और मोनेटाइजिंग टीम का नेतृत्व करेंगे। जौहरी इससे पहले भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के पहले सीईओ थे और करीब चार साल तक उन्होंने इस पद पर अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। बीसीसीआई से पहले वे करीब 15 साल तक डिस्कवरी नेटवर्क्स एशिया पैसिफिक में एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट और जनरल मैनेजर (दक्षिण एशिया) के पद पर कार्यरत थे। करीब 15 साल तक डिस्कवरी से जुड़े रहने के बाद जौहरी ने बीसीसीआई के सीईओ का पदभार संभाला था।

पुनीत मिश्रा, अमित गोयनका, शरीक पटेल, अनुराग बेदी और राहुल जौहरी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर पुनीत गोयनका को रिपोर्ट करेंगे। कंपनी में किए गए ये बदलाव तुरंत प्रभाव से लागू हो गए हैं।

 

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