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आत्म मंथन और अनुशासन की जरूरत है
<div><span style=color: #800000><b>अनंत मित्तल, </b><b>वरिष्ठ पत्रकार </b></span></div> <div>मीडिया
समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago
अनंत मित्तल, वरिष्ठ पत्रकार
मीडिया की स्थिति मिली-जुली है भारत प्रेस चूंकि सरकार और विज्ञापनों पर आशान्वित है इसलिये उसकी स्वतंत्रता प्रभावित होती है। यदि हम कोई ऐसा रास्ता खोज पाएं जिसमें प्रेस को आर्थिक स्वतंत्रता मिल जाये तो शायद वह और अधिक निस्वार्थता एवं निर्पेक्षता पूर्वक काम कर पायेगी। इन तमाम बाधाओं के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने प्रेस के विभिन्न उपादानो को अर्थात अखबारों, पत्रिकाओं, टेलीविजन चैनलों, रेडियो स्टेशनों को आपस में प्रतिद्धंदिता की छूट दी है
इसलिये अंत में सच सामने आ जाता है और पूवार्ग्रह धरे रह जाते है। हाल में क्रेन्द्रीय संतर्कता आयुक्त में नियमो की अनदेखी का मामला हो अथवा टूजी घोटाले से सम्बधित तथ्यो को उजागर करने का मामला हो भारतीय प्रेस ने अपना दायित्व बखूबी निभाया है। इसलिये कुल मिलाकर तस्वीर उतली धुंधली नही लगती जिसकी आशंका अक्सर जतायी जाती है । भारतीय प्रेस अपना दायित्व निभा रहा है आवश्यकता सिर्फ आत्म मंथन और अनुशासन की है जो कि जनता में लोकतांत्रिक चेतना बढ़ने के साथ अपने आप आ जायेगी। अन्ना हजारे के आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि जनता लोकतांत्रिक मानदण्डो के पक्ष में खड़ी हो जाती है तो क्या प्रेस और क्या सरकार सभी को उस माई-बाप के सामने नत मस्तक होना पड़ता है। और सारे राजनैतिक अथवा आर्थिक सरोकार या पूर्वाग्रह पीछे छूट जाते हैं।
अगर कार्यपालिका अथवा न्यायपालिका अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक अंजाम देने में विफल रहती है तो फिर प्रेस में अटकलें लगेंगी ही । और सभी आशंकित अथवा संभावित पहलुओं से ऐसे संवेदनशील मामलों की विवेचना करना प्रेस का अधिकार भी है और दायित्व भी।
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