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मीडिया में जिस तरह अंग्रेजी ही हिन्दी होती जा रही है, यह हिन्दी को अधिग्रहित करने की कोई साजिश नही लगती?

<p><strong>डॉ वेद प्रताप वैदिक&mdash;</strong></p> <p>जिन अखबारों के परिप्रेक्ष्य में यह बाते सामने

समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago

डॉ वेद प्रताप वैदिक—

जिन अखबारों के परिप्रेक्ष्य में यह बाते सामने आयी थी उन लोगों का भाषा तथा संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। उनके मालिक भी अनपढ गवांर है। उनके सम्पादक घोर आलसी है वो गुलामों के गुलाम है इसलिये भाषाई भ्रष्टता में उनका विशेष योगदान है। इससे हिन्दी को मिल जुलकर बचाना चाहिये। हिन्दी का अधिग्रहण नहीं उसको भ्रष्ट करने की साजिश जरूर हो रही है।

मंगलेश डबराल— अंग्रेजी वास्तव में सभी भाषाओं पर हावी है इसलिये नही कि यह ज्यादा बोली जाती है या हिन्दी या मराठी या तमिल से श्रेष्ट है बल्कि इसलिये कि शासन की मूलभाषा अंग्रेजी है। अभी भी हम इससे मुक्त नहीं हो पाये हैं। इसने हिन्दी सहित अन्य भाषाओ का अहित किया है। यह एक नया साम्राज्यवाद है जो पुनः एकबार बाजार से ही घुसने लगा है। उपभोक्तावाद की भाषा अंग्रेजी है इसलिये इसका बाजारू प्रभाव है, यह थोडा बहुत हिन्दी भी इस्तेमाल कर लेता है क्योंकि उसे अपना सामान हिन्दी उपभोक्ता को भी बेचना है। अंकल चिप्स को ग्रामिण उपभोक्ता तक पहूँचना है इसलिये उसे हिन्दी में भी लिखेगा, बस इतना ही सरोकार उसका हमसे है। किसी भी भाषा को कोई अधिग्रहित नही करता हां उसे नष्ट कर सकता है। अंग्रेजी के उपभोक्तावादी साम्राज्यवाद से हिन्दी को खतरा है जिसे हिन्दी समाज शायद कम समझता है।

ओम थानवी: साजिश जैसा कुछ नही है। यह हमारा दोष है। अंग्रेजी अपना काम कर रही है। हमें अपना काम करना है। अधिग्रहण उसी भाषा का हो सकता है जो शक्तिहीन हो। हिन्दी भाषा के पीछे एक नहीं, अनेक महान भाषाओं का बल है। संस्कृत इसकी मां है। ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, अरबी, फारसी आदि की शक्ति इसके पीछे है। हिंदी अंग्रेजी से बहुत समृद्ध भाषा है। हिन्दी में पानी के लिए जितने शब्द हैं उतने अंग्रेजी में हैं? अंग्रेजी में सिर्फ वाटर है। हिन्दी में नीर, जल, पानी, सलिल... अनेक शब्द हैं। और ये सब आपस में पर्याय नहीं हैं- गंदे नाले में बहने वाला पानी होता है, उसे संस्कारी भाषा वाला जल नहीं कह सकता। ऐसी ताकत अंग्रेजी के पास है ही नहीं। वह किस आधार पर अधिग्रहण करेगी? यह भ्रम निर्मूल है।

अभय कुमार दुबे: मेहरबानी करके कांसपिरेसी थियरी के चक्कर में न फँसें। कोई विकसित भाषा किसी दूसरी विकसित भाषा को अधिग्रहीत नहीं कर सकती। वही भाषायें अधिग्रहीत की जा सकती हैं जिनकी कोई अपनी जमी-जमाई परम्परा नहीं होती। हिंदी तो अनेकानेक स्तरों पर जमी हुई है। सिनेमा, मनोरंजन, साहित्य, मीडिया— हर स्तर पर हिंदी परिष्कृत ही हुई है, न कि उसका स्वरूप विकृत हुआ है। भाषाएँ एक तरल प्रवाह में बहती है और जब वे स्थिर हो जाती है उनकी स्वयंमेव मृत्यु हो जाती है। हिंदी को बहने देना चाहिए। इस प्रक्रिया में वह खुद का अधिग्रहण करवाने की बजाय दूसरों का अधिग्रहण करने में खुद को सक्षम साबित करेगी।

 

समाचार4मीडिया के राजेश शुक्ला से बातचीत


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