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मीडिया की गिरती साख पर उदय शंकर की दो टूक- "हम खुद अपनी कब्र खोद रहे हैं"
बोधि ट्री सिस्टम्स के को-फाउंडर व जियोस्टार के वाइस चेयरमैन उदय शंकर ने एक बड़े मीडिया कार्यक्रम में पत्रकारिता को लेकर एक ऐसा बयान दिया, जिसने पूरी इंडस्ट्री को सोचने पर मजबूर कर दिया।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 10 months ago
बोधि ट्री सिस्टम्स के को-फाउंडर व जियोस्टार के वाइस चेयरमैन उदय शंकर ने एक बड़े मीडिया कार्यक्रम में पत्रकारिता को लेकर एक ऐसा बयान दिया, जिसने पूरी इंडस्ट्री को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, "जो पत्रकारिता हम जानते थे, वह अब खत्म हो चुकी है।"
यह कोई सामान्य भाषण नहीं था, बल्कि एक सटीक और कठोर विश्लेषण था, जिसमें उन्होंने पत्रकारिता की मौजूदा स्थिति पर सवाल उठाए। "मैं कोई वक्ता नहीं, बल्कि एक व्यवसायी (प्रैक्टिशनर) हूं।" यह कहते हुए उन्होंने पत्रकारिता की आत्मा और उसके बिजनेस मॉडल के क्षरण पर खुलकर बात की।
मीडिया का पतन किसी सरकार की वजह से नहीं, बल्कि खुद पत्रकारों की वजह से हुआ
उदय शंकर ने साफ कहा कि पत्रकारिता का पतन किसी सरकार या नेता की वजह से नहीं हुआ, बल्कि यह समस्या अंदर से आई है। उन्होंने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि एक दौर था जब किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार के पहुंचने भर से उसकी गंभीरता बढ़ जाती थी।
उदय शंकर ने बताया कि जब वे एक इंटर्न थे, तब एक मुख्यमंत्री ने सिर्फ इसलिए उनका सम्मानपूर्वक व्यवहार किया क्योंकि वे 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का पहचान पत्र (आईडी कार्ड) लेकर वहां पहुंचे थे। यह उस दौर को दर्शाता है जब पत्रकारों की उपस्थिति मात्र से उनके प्रभाव और प्रतिष्ठा का अंदाजा लगाया जाता था। यही वह समय था जब पत्रकारिता सूचना और विश्लेषण का सबसे ताकतवर माध्यम थी। लोग स्टेडियम में लाइव मैच नहीं देख सकते थे, या भूकंप प्रभावित क्षेत्र में नहीं जा सकते थे, लेकिन पत्रकार वहां मौजूद होते थे और वही जानकारी का एकमात्र स्रोत होते थे। लेकिन फिर वक्त बदला और पत्रकारिता नहीं बदली।
तकनीक आई, पत्रकारिता ने खुद को नहीं बदला
उन्होंने कहा कि जब स्टीव जॉब्स ने हर जेब में एक कैमरा रख दिया, तो हर कोई पत्रकार बन गया। लेकिन इसके बावजूद, पत्रकारों ने अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने कहा, "पत्रकारों ने इनोवेशन करने के बजाय उन्हीं जगहों से खबरें जुटानी शुरू कर दीं, जहां से उनके पाठक पहले से जानकारी ले रहे थे— ट्विटर, फेसबुक, वॉट्सऐप।"
इस बदलाव ने पत्रकारिता की विशिष्टता खत्म कर दी। पत्रकार जनता से अलग नहीं रहे, बल्कि उन्हीं का हिस्सा बन गए। पत्रकारिता की गहरी समस्या उसकी अवधारणा (concept) से जुड़ी है।
उन्होंने कहा कि पत्रकार यह सोचते रहे कि उनके पास पहले जैसा ही प्रभाव और शक्ति है, जबकि हकीकत में परिस्थितियां बदल चुकी थीं और उनकी जमीन खिसक रही थी। यानी, पत्रकारों को यह ऐहसास नहीं हुआ कि समय के साथ उनकी भूमिका और प्रभाव कम होता जा रहा था।
न्यूजरूम में 'महौल' पत्रकारिता का दौर
उदय शंकर ने न्यूजरूम में आए बदलावों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "पहले खबरों का महत्व संपादकीय फैसलों पर निर्भर करता था, लेकिन अब यह सिर्फ लॉजिस्टिक्स पर केंद्रित हो गया है। रिपोर्टिंग में अब तकनीकी संसाधनों, जैसे सैटेलाइट ट्रक और ओबी वैन (OB Van) को ज्यादा अहमियत दी जाने लगी और संपादक की भूमिका खत्म होने लगी। एंकर का काम सिर्फ इतना रह गया कि मौके पर मौजूद रिपोर्टर से पूछे: "वहां का माहौल कैसा है?"
'आजतक' के शुरुआती दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि पहले कंटेंट सबसे महत्वपूर्ण था और दर्शकों पर उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखता था, भले ही उसके लिए कोई विशेष आंकड़े (metrics) न होते। लेकिन जब रीच (यानी कितने लोगों तक खबर पहुंच रही है) का दौर आया, तो न्यूजरूम ने रेटिंग्स के पीछे भागना शुरू कर दिया। अब खबर की गुणवत्ता या प्रासंगिकता (relevance) से ज्यादा इस बात को महत्व दिया जाने लगा कि कौन-सी खबर ज्यादा दर्शक खींच सकती है।
पत्रकारिता और बिजनेस के बीच की खाई
उदय शंकर आगे बताते हैं कि पत्रकारिता और बिजनेस के बीच की दूरी ने बड़ी समस्या पैदा की। न्यूजरूम में यह धारणा बन गई कि पैसे के बारे में बात करना पत्रकारिता के मूल्यों के खिलाफ है। पत्रकार अच्छी सैलरी तो चाहते थे, लेकिन इस पर चर्चा नहीं करना चाहते थे कि वह पैसा कहां से आएगा। उन्हें monetization (कमाई के स्रोत) की बात करना एक तरह का धोखा लगता था।
उन्होंने कहा कि जब वह सीईओ बने, तो उनके कई पत्रकार साथियों ने उन्हें turncoat (धोखेबाज़/पलटी मारने वाला) मान लिया, क्योंकि उन्होंने बिजनेस मॉडल पर ध्यान देना शुरू किया। लेकिन उन्होंने सवाल किया कि "यदि पत्रकारिता के पास टिकाऊ (viable) बिजनेस मॉडल नहीं होगा, तो वह कैसे जिंदा रहेगी?"
उदय शंकर ने आगे कहा कि संपादकीय (Editorial) और आर्थिक (Economics) पक्ष के बीच बढ़ी दूरी विनाशकारी साबित हुई है। अब पत्रकारिता विज्ञापनों (Advertising) पर पूरी तरह निर्भर हो गई है, लेकिन विज्ञापनदाता खबर की गुणवत्ता (content) से नहीं, बल्कि इस बात से मतलब रखते हैं कि कितने लोग उसे देख रहे हैं।
विज्ञापनदाताओं को खुश करने की होड़ में गिर गया पत्रकारिता का स्तर
उन्होंने कहा कि विज्ञापनदाताओं को खुश करने की इस होड़ में पत्रकारिता की विश्वसनीयता खत्म होती जा रही है। खबरें अब घिसे-पिटे ढंग से बनाई जा रही हैं, जिससे उनकी गहराई और प्रभावशीलता कम हो गई है। यहां तक कि समाचार पत्र छापने का खर्च तक पूरा नहीं हो पा रहा था, जिससे यह साफ है कि पत्रकारिता ने खुद को बहुत सस्ते में बेच दिया।
ब्रैंड वैल्यू खत्म, पत्रकारों की पहचान भी खत्म
जब सभी न्यूज चैनल एक जैसे दिखने और सुनाई देने लगे तो उनकी अलग पहचान खत्म हो गई। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई खबर हर जगह मुफ्त में उपलब्ध है, तो लोग उसके लिए पैसे क्यों देंगे? इसका नतीजा यह हुआ कि अब कोई किसी खास पत्रकार को ध्यान से नहीं सुनता और पत्रकार अब वह कारण नहीं रह गए जिसकी वजह से लोग किसी न्यूज़ प्लेटफॉर्म पर आते हैं।
पत्रकारिता में प्रतिभा संकट
उदय शंकर ने चेतावनी दी कि पत्रकारिता अपनी अलग पहचान और ताकत खो चुकी है। अब यह अनिवार्य नहीं रह गई है और दुनिया इसके दोबारा प्रासंगिक होने का इंतजार नहीं करेगी। अगर पत्रकार खुद को नहीं बदलेंगे तो उनकी जरूरत खत्म हो जाएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया इंडस्ट्री में अच्छे और योग्य लोगों की कमी होती जा रही है। इसे उन्होंने "प्रतिभा का मौन संकट" कहा। आज की पत्रकारिता में प्रतिभावान लोगों की संख्या घटती जा रही है, जिससे इसकी गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ रहा है।
उदय शंकर का कहना है कि 1970 और 1980 के दशक में पत्रकारिता में बेहतरीन प्रतिभाएं इसलिए आईं क्योंकि उनके पास करियर के ज्यादा विकल्प नहीं थे। लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। अब सबसे प्रतिभाशाली लोग अन्य क्षेत्रों में जा रहे हैं और पत्रकारिता में वे ही बचते हैं जिन्हें अन्यत्र अवसर नहीं मिलते। उनका तर्क है कि कम योग्यता वाले लोग पत्रकारिता में आते हैं और इसका नतीजा यह होता है कि वे अपने जैसे ही और कमजोर प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करते हैं, जिससे पूरे क्षेत्र की गुणवत्ता गिरती जाती है।
उन्होंने मीडिया संस्थानों की संरचना पर भी सवाल उठाया। भारत एक युवा देश है, जहां 65% आबादी युवा है, लेकिन न्यूज़रूम में नेतृत्व संभालने वाले अधिकतर लोग उम्रदराज़ हैं। नई पीढ़ी के लिए जगह नहीं बनाई जा रही, ठीक वैसे ही जैसे बॉलीवुड में हो रहा है। इसका नुकसान दोनों उद्योगों को भुगतना पड़ रहा है।
विदेशी निवेश क्यों नहीं?
उदय शंकर ने सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए पूछा कि मीडिया क्षेत्र में विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति क्यों नहीं दी जाती। 1948 में कैबिनेट ने जो फैसला लिया था, वह आज भी लागू है, जबकि बाकी सेक्टर्स में FDI को स्वीकार किया गया और वे तेजी से आगे बढ़े। लेकिन मीडिया में इसे लागू नहीं किया गया। उन्होंने इस विरोधाभास की ओर इशारा किया कि जो संपादक बाकी उद्योगों में FDI की वकालत करते रहे, वे खुद के क्षेत्र में इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
उदय शंकर का मानना है कि इस निवेश की कमी के कारण मीडिया में नवाचार ठप पड़ गया है। न तो तकनीक के लिए पैसा है, न प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए और न ही किसी तरह का जोखिम उठाने की क्षमता बची है। मीडिया संस्थान केवल खर्चों में कटौती कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि केवल लागत घटाने से कोई महान नहीं बन सकता।
AI की आंधी आ रही है, पत्रकारिता तैयार है?
अपने भाषण के अंत में उन्होंने पत्रकारिता के सामने खड़ी अगली सबसे बड़ी चुनौती- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर फोकस डाला। उन्होंने इसे मीडिया के लिए अस्तित्व का संकट बताते हुए कहा कि एआई रूपी ट्रेन तेजी से आ रही है- अब या तो पत्रकार इसमें सवार हो सकते हैं या फिर इसके नीचे कुचल जाएंगे। यानी अब या तो पत्रकार इस बदलाव को अपनाएं और खुद को नए सांचे में ढालें, या फिर समय के साथ अप्रासंगिक होकर खत्म हो जाएं।
उन्होंने मीडिया प्रोफेशनल्स को चेताया कि उन्हें बार-बार दोहराई जाने वाली खबरों और सिर्फ मत व्यक्त करने की पत्रकारिता छोड़नी होगी। आज हर कोई किसी न किसी माध्यम से अपनी राय व्यक्त कर रहा है, ऐसे में लोग पत्रकारों की राय पर पैसे क्यों खर्च करें? इसलिए मीडिया को एक नया मॉडल तैयार करना होगा, जो पाठकों को विशिष्ट और मूल्यवान जानकारी दे सके।
"यदि हम नहीं बदले, तो पत्रकारिता का अगला अध्याय नहीं लिखेंगे, सिर्फ उसकी समाप्ति लिखेंगे"
उन्होंने साफ कहा कि अब पत्रकार देश नहीं चला रहे और न ही वे अपने खुद के मीडिया संस्थानों पर पूरी तरह नियंत्रण रखते हैं। उनका मानना था कि खतरे में केवल पत्रकारिता का पेशा नहीं है, बल्कि जनता और प्रेस के बीच का पूरा भरोसे का तंत्र कमजोर हो रहा है।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इन सच्चाइयों का सामना नहीं किया गया, तो पत्रकारिता का अगला अध्याय लिखने के बजाय, हम केवल इसकी मौत की कहानी लिखने में व्यस्त रह जाएंगे।
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