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जानें, पत्रकारों की नौकरी पर किस तरह गहरा रहे हैं संकट के बादल

देश भर में करीब 1000 पत्रकारों को टर्मिनेशन लेटर दिया जा चुका है। विशेषज्ञों की मानें तो अंग्रेजी मीडिया इससे ज्यादा प्रभावित है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

आर्थिक मंदी से जूझ रहे मीडिया संस्थानों में खर्चों में कटौती और पत्रकारों की छंटनी दिखाई देने लगी है। चाहे प्रिंट हो, टीवी हो अथवा डिजिटल मीडिया, उनमें काम करने वाले पत्रकारों को नौकरी खत्म होने का नोटिस दिया जा रहा है। ऐसे में लोगों का कहना है कि वर्ष 2012-13 में जब से वैश्विक मंदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया, यह न्यूज बिजनेस के क्षेत्र में नौकरी जाने का सबसे खराब दौर चल रहा है।

देश भर में करीब 1000 पत्रकारों को टर्मिनेशन लेटर दिया जा चुका है। विशेषज्ञों की मानें तो अंग्रेजी मीडिया इससे ज्यादा प्रभावित है। लगभग सभी प्रमुख चैनल्स, अखबार और न्यूज पोर्ट्लस में पिछले तीन महीनों में छंटनी देखने को मिली है। छंटनी ही नहीं, कई प्रमुख मीडिया संस्थानों को अपने कई एडिशंस बंद करने को भी मजबूर होना पड़ा है, जिससे इंडस्ट्री में काफी निराशा है।  कई बड़े मीडिया समूहों ने अपने कुछ पोर्टल्स पर भी गाज गिराई है।

नाम पब्लिश न करने की शर्त पर एक महिला पत्रकार ने बताया कि वह पिछले हफ्ते अपने इंक्रीमेंट लेटर का काफी बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसे इस बात पर काफी आश्चर्य हो रहा था कि संस्थान में उसके कई साथियों को यह लेटर मिल चुका था, लेकिन उसे नहीं मिला था। महिला पत्रकार के अनुसार, ‘जब मैंने इस बारे में एचआर डिपार्टमेंट से मालूम किया तो उन्होंने बताया कि मेरी पूरी टीम को संस्थान छोड़ने के लिए कहा गया है।

एचआर का कहना था कि यह संस्थान का अंदरूनी निर्णय है। इसके साथ ही मुझे नौकरी छोड़ने के बाद दो महीने की सैलरी देने का वादा भी किया गया।’ बताया जाता है कि प्रमुख मीडिया संस्थान के डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए काम कर रही इस महिला पत्रकार समेत आठ पत्रकारों की पूरी टीम को नौकरी से हटाने का नोटिस दिया गया है, जिनमें एडिटर भी शामिल हैं।

महिला पत्रकार से जुड़ा यह अकेला मामला नहीं है। ऐसे कई मामले में हैं, जिनमें कई बड़े मीडिया संस्थान अपने यहां स्टाफ की कटौती कर रहे हैं। ऐसे में यह महिला पत्रकार और उनके साथी इंडस्ट्री को छोड़कर दूसरा ठिकाना तलाशने की तैयारी कर रहे हैं। कई बड़े मीडिया नेटवर्क्स अपने छोटे ब्रैंड्स को बंद कर रहे हैं और उन्हें बड़े ब्रैंड्स में मर्ज कर रहे हैं। नौकरियों में कटौती की मार से कुछ क्षेत्रीय चैनल्स भी नहीं बचे हैं। नॉर्थ-ईस्ट के एक क्षेत्रीय चैनल ने अपने कई ब्यूरो में कामकाज बंद कर दिया है। मध्य प्रदेश के भी कई लोकल चैनल बंद होने की खबर है, कई अपने ब्यूरो ऑफिस समेट चुके हैं। हिंदी के एक बड़े अखबार ने भी अपनी यूनिट को ब्यूरो ऑफिस में तब्दील करने की प्रकिया शुरू कर दी है। ज्यादा तन्ख्वाह वाले पत्रकारों की जगह कम सैलरी पर लोगों को रखने की कवायद भी जा रही है। 

एचआर एक्सपर्ट्स के अनुसार मंदी ने दूसरी इंडस्ट्री की तरह मीडिया बिजनेस को भी काफी बुरी तरह प्रभावित किया है। इन विशेषज्ञों का कहना है, ‘यदि हम ऑटो इंडस्ट्री को देखें तो अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर सामने आ जाएगी कि कैसे यह भयावह मंदी की ओर जा रही है।’

इस बारे में ‘Simply HR Solutions’ नाम से अपनी एचआर फर्म चलाने वाले रजनीश सिंह का कहना है कि ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में कमी भी एक बड़ा कारण है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन कम हो गया है और यह मीडिया इंडस्ट्री को खराब दौर की ओर ले जा रहा है।

पूर्व में टीवी18 इंडिया लिमिटेड में ग्रुप हेड (एचआर) के तौर पर काम कर चुके रजनीश सिंह का कहना है कि अधिकांश स्थानों पर सीनियर मैनेजमेंट को नोटिस नहीं दिया गया है, जबकि कम सैलरी वाले लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।   

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ और ‘आउटलुक’ जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता का कहना है, ‘अधिकांश मीडिया कंपनी में स्टाफ ज्यादा है। कई मीडिया संस्थानों ने नए वेंचर की लॉन्चिंग करते समय काफी ज्यादा पैकेज पर पत्रकारों की भर्ती कर ली, लेकिन दुर्भाग्य से वह लॉन्चिंग पूरी तरह सफल नहीं रही।’

आलोक मेहता के अनुसार, ‘सरकार का ध्यान क्षेत्रीय मीडिया पर है और अंग्रेजी मीडिया में विज्ञापनों की संख्या में लगभग 15 प्रतिशत की कमी हो गई है, खासकर प्रिंट मीडिया में प्रॉफिट में कमी आई है, जिसके परिणामस्वरूप नौकरियों में कटौती हुई है।’

इंडस्ट्री से जुड़े एक अन्य दिग्गज का कहना है, ‘अधिकांश मामलों में मीडिया संस्थान अपने प्रॉफिट मार्जिन से किसी तरह का समझौता नहीं करते हैं। यहां तक कि जब उन्हें रेवेन्यू में कमी दिखाई देती है तो प्रॉफिट मार्जिन को बचाए रखने के लिए वे खर्चों में कटौती कर देते हैं।’

यह पूछे जाने पर कि क्या यह स्थिति ऐसे ही रहेगी? और छंटनी की यह स्थिति कब तक समाप्त हो जाएगी? दैनिक जागरण के पूर्व चीफ जनरल मैनेजर निशिकांत ठाकुर ने कहा, ‘अर्थव्यवस्था में मंदी की मार का मीडिया इंडस्ट्री पर भी उतना ही प्रभाव पड़ेगा, जितना किसी दूसरे बिजनेस पर पड़ रहा है। मीडिया संस्थानों को आर्थिक मंदी से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए खर्चों पर कुछ लगाम लगानी चाहिए। यदि खर्चों पर लगाम नहीं लगी तो मीडिया संस्थानों को आगे और परेशानी होगी।’

हालांकि, छंटनी के साथ-साथ कुछ मीडिया संस्थानों ने अपने यहां यह घोषणा भी की है कि इस साल कर्मचारियों को किसी भी तरह का इंक्रीमेंट नहीं दिया जाएगा। यही नहीं, एक अंग्रेजी अखबार ने उन कर्मचारियों को भी दो से पांच प्रतिशत का इंक्रीमेंट दिया है, जो बेहतर प्रदर्शन करने वालों की कैटेगरी में शामिल हैं। प्रिंट और टीवी मीडिया संस्थानों में इंक्रीमेंट आठ से दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं हुआ है।    

इस स्थिति पर रजनीश सिंह का कहना है कि पत्रकारों को अब टीवी से अलग हटकर कुछ सोचना चाहिए। सिंह अब नेटवर्क18 के अपने पूर्व साथियों के लिए एक वर्कशॉप भी शुरू कर रहे हैं। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, ‘Starting your business-Beyond TV' नाम से इस वर्कशाप में पत्रकारों को टीवी की दुनिया से हटकर अपना बिजनेस शुरू करने के बारे में जानकारी दी जाएगी।


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