HR डिपार्टमेंट की ओर से बैठक के संदेश आते हैं, जल्दबाजी में फोन किए जाते हैं, एम्प्लॉयीज से इस्तीफा मांगने वाले वॉट्सऐप संदेश आते हैं और न्यूजरूम धीरे-धीरे, एक-एक टीम करके छोटे होते जाते हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
तस्मयी लाहा रॉय, एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
“मुझे पता है कि मैं हैरान हूं... दुखी रही हूं, जबकि हैरान होने की बजाय मुझे खुश दिखना चाहिए।”
पत्रकारिता का पुरस्कार लेने के लिए मंच पर खड़ी Andy Sachs के हाथ में ट्रॉफी तो है, लेकिन उनका ध्यान उस पर नहीं है।
“क्योंकि मुझे अभी पता चला है कि मेरे अखबार के कई प्रतिभाशाली और पुरस्कार जीत चुके पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया है। वो भी एक संदेश के जरिए।”
कुछ ही पल बाद वह एक ऐसी बात कहती हैं, जो तालियां खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक याद रहती है।
“हम समझते हैं कि पत्रकारिता बदल रही है। लेकिन जब इसका असर खुद पर पड़ता है, तो बहुत दुख होता है... और तकनीकी भाषा में कहें तो हमारी हालत अब ‘खत्म’ है।”
यह दृश्य द डेविल वियर्स प्राडा 2 (The Devil Wears Prada 2) का है। काल्पनिक है, लेकिन पूरी तरह काल्पनिक नहीं।
भारत की न्यूज इंडस्ट्री में छंटनी के बाद कोई पुरस्कार लेने वाला भाषण नहीं होता। यहां सिर्फ HR डिपार्टमेंट की ओर से बैठक के संदेश आते हैं, जल्दबाजी में फोन किए जाते हैं, एम्प्लॉयीज से इस्तीफा मांगने वाले वॉट्सऐप संदेश आते हैं और न्यूजरूम धीरे-धीरे, एक-एक टीम करके छोटे होते जाते हैं।
Andy Sachs पर्दे पर जिस स्थिति का जिक्र करती हैं, वह अब भारतीय मीडिया में भी तेजी से जानी-पहचानी हकीकत बनती जा रही है। ‘पुनर्गठन’ या ‘लागत कम करने’ जैसे शब्दों के पीछे कई ऐसे करियर हैं, जिन्हें अचानक रोक दिया गया है। साथ ही एक ऐसी इंडस्ट्री है, जो अपने इतिहास के सबसे बड़े बदलावों में से एक से गुजर रही है।
2025 में करीब 1,000 मीडिया प्रोफेशनल्स ने गंवाई नौकरी
2025 में देशभर के न्यूजरूम में हुए पुनर्गठन के चलते अनुमानित 1,000 मीडिया प्रोफेशनल्स की नौकरियां गईं। 2026 में यह सिलसिला और तेज हुआ है। अगस्त तक एक्सचेंज4मीडिया की रिपोर्टिंग के मुताबिक, यह संख्या पहले ही 1,000 का आंकड़ा पार कर चुकी है, जबकि साल के अभी कई महीने बाकी हैं।
इस छंटनी से शायद ही कोई वर्ग बचा हो। जर्नलिस्ट, प्रोड्यूसर्स, वीडियो एडिटर्स, कैमरापर्सन, डिजाइनर, प्रोडक्ट व टेक्नोलॉजी सेक्टर से जुड़े एम्प्लॉयी, सेल्स टीम और सहायक एम्प्लॉयी- सभी प्रभावित हुए हैं।
छंटनी का असर अलग-अलग स्तर के एम्प्लॉयीज पर पड़ा है। इसमें नए-नए भर्ती हुए एम्प्लॉयी भी हैं और लंबे समय से काम कर रहे एडिटर और बिजनेस हेड भी। यहां तक कि उन संस्थानों में भी नौकरियां गई हैं, जिन्हें कभी इंडस्ट्री के सबसे स्थिर नियोक्ताओं में गिना जाता था।
ये अब अलग-अलग जगहों पर होने वाली छंटनी नहीं रह गई हैं। ये उस गहरे बदलाव के साफ संकेत हैं, जो चुपचाप न्यूज कारोबार को नए तरीके से परिभाषित कर रहा है।
पिछले 18 महीनों में भारत के कई बड़े मीडिया संगठनों में पुनर्गठन देखने को मिला है। इसका असर टीवी नेटवर्क, अखबार समूह, डिजिटल कंपनियों और कारोबार से जुड़ी खबरों के न्यूजरूम तक हुआ है।
यह लहर अंग्रेजी, हिंदी और क्षेत्रीय मीडिया- हर जगह पहुंची है। इससे संकेत मिलता है कि संकट किसी एक मंच या किसी एक कारोबार मॉडल तक सीमित नहीं है।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
यह अब सिर्फ एक कंपनी के खर्च कम करने या किसी एक न्यूजरूम के अपने बजट को कसने की कहानी नहीं है। दो दर्जन से ज्यादा मौजूदा और पूर्व मीडिया अधिकारियों, HR लीडर्स, एडिटर्स और एम्प्लॉयीज से बातचीत से संकेत मिलता है कि इंडस्ट्री एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।
बदल रहा पत्रकारिता का पूरा आर्थिक मॉडल
विज्ञापन अभी भी दबाव में है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के काम करने वाले एल्गोरिदम पहले से ज्यादा अनिश्चित हो गए हैं। दर्शक और पाठक अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स में बंट रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न्यूजरूम के काम करने के तरीके को बदल रही है और मैनेजमेंट पर मुनाफा देने का लगातार दबाव है।
इन सबका नतीजा यह है कि न्यूज संगठन किस तरह बनाए जाएं, उनमें कितने लोग काम करें और उन्हें लंबे समय तक कैसे चलाया जाए- इन सभी चीजों में बड़ा बदलाव हो रहा है।
आंकड़े पूरी कहानी बताते हैं
भारत का व्यापक मीडिया व एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री भले ही लगातार बढ़ रहा हो, लेकिन न्यूज क्षेत्र तेजी से एक अलग स्थिति में जाता दिख रहा है। हाल की FICCI-EY रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में डिजिटल सदस्यता से होने वाली कमाई में 60 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इसकी बड़ी वजह वीडियो और संगीत स्ट्रीमिंग में मजबूत वृद्धि रही।
पैसे देकर लिए जाने वाले वीडियो सदस्यता खातों की संख्या बढ़कर 21.6 करोड़ हो गई, जबकि पैसे देकर संगीत सुनने वाले ग्राहकों की संख्या 37 फीसदी बढ़कर 1.44 करोड़ हो गई।
लेकिन न्यूज इंडस्ट्री अभी भी लोगों को खबरों के लिए पैसे देने के लिए तैयार करने में संघर्ष कर रहा है।
भारत में सिर्फ करीब 40 लाख भुगतान वाली डिजिटल न्यूज सदस्यताएं हैं। इससे पता चलता है कि ऐसे बाजार में पत्रकारिता तैयार करने का आर्थिक मॉडल कितना मुश्किल है, जहां पाठक लंबे समय से मुफ्त खबरें पढ़ने के आदी हो चुके हैं।
पब्लिशर्स को इसके साथ एक और बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है- अपने पाठकों और दर्शकों को बनाए रखना।
उसी रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में ऑनलाइन न्यूज प्लेटफॉर्म्स की पहुंच 9 फीसदी कम हुई। इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने इसकी वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार सर्च समरीज और AI एप्लीकेशंस के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल को बताया है। इन तकनीकों की वजह से लोगों को उनके सवालों के जवाब सीधे मिल जाते हैं और उन्हें प्रकाशक की वेबसाइट पर जाने की जरूरत कम पड़ती है।
एक ऐसी इंडस्ट्री के लिए, जो अभी भी काफी हद तक विज्ञापन पर निर्भर है, कम पाठकों का मतलब है कम पेज व्यू, कम कमाई और लागत कम करने का बढ़ता दबाव। इससे एक दुष्चक्र बनता है। कम कमाई के कारण कंपनियों को अपनी टीम छोटी करनी पड़ती है, जबकि प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए तकनीक और AI में ज्यादा निवेश करना पड़ रहा है।
सूचीबद्ध मीडिया कंपनियों पर भी दबाव
यह दबाव शेयर बाजार में सूचीबद्ध मीडिया कंपनियों के प्रदर्शन में भी दिखाई देता है। कुछ कंपनियां आक्रामक लागत नियंत्रण और पुनर्गठन के जरिए मुनाफे में वापस आई हैं, जबकि कुछ अभी भी कमजोर ऐड मार्केट, टेलीविजन से होने वाली कमाई पर दबाव और धीमी डिजिटल कमाई से जूझ रही हैं।
कंपनियों के तिमाही नतीजों के दौरान मैनेजमेंट की बातचीत में भी अब विस्तार के बजाय कामकाज को ज्यादा कुशल बनाने, मुनाफे और लागत कम करने पर ज्यादा जोर दिखाई देता है। कुछ पब्लिशर्स के लिए प्रिंट जैसे पुराने कारोबार में स्थिरता के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन डिजिटल कारोबार, जिसे कभी इंडस्ट्री का सबसे बड़ा विकास इंजन माना जाता था, अब खुद दबाव में है।
उदाहरण के लिए HT मीडिया ने बताया कि उसके प्रिंट कारोबार में अच्छी वृद्धि के बावजूद डिजिटल कारोबार को चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
जून तिमाही में डिजिटल कारोबार से होने वाली आय साल-दर-साल 28 फीसदी घटकर 27 करोड़ रुपये रह गई, जबकि यह कारोबार लगातार घाटे में रहा। कंपनी ने इस गिरावट के लिए तिमाही के दौरान किए गए कारोबारी ढांचे में बदलाव को जिम्मेदार बताया।
इसके नतीजे न्यूज पब्लिशर्स के सामने मौजूद बड़ी चुनौती को दिखाते हैं। लोग भले ही ऑनलाइन न्यूज पढ़ रहे हों, लेकिन उस खपत को मुनाफे वाले डिजिटल कारोबार में बदलना लगातार मुश्किल हो रहा है।
HT मीडिया अकेली कंपनी नहीं
नेटवर्क18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट्स का प्रदर्शन एक अलग तस्वीर दिखाता है। जून तिमाही में कंपनी की कुल परिचालन आय 10.3 फीसदी बढ़कर 516 करोड़ रुपये हो गई। इसमें कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान बढ़े विज्ञापन खर्च की बड़ी भूमिका रही। लेकिन इसके बावजूद कंपनी को 38.7 करोड़ रुपये का कुल शुद्ध घाटा हुआ। पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी को 148 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ था।
जागरण प्रकाशन, डीबी कॉर्प, टीवी टुडे नेटवर्क और जी मीडिया जैसी कंपनियों के जून तिमाही के नतीजे अभी आने बाकी हैं। इसलिए भारत की पूरी न्यूज इंडस्ट्री की वित्तीय तस्वीर अभी सामने आना बाकी है।
ठीक है... लेकिन कंपनियां आखिर तय कैसे करती हैं कि किसे नौकरी से निकाला जाए?
वित्तीय नतीजे यह समझाते हैं कि कंपनियों पर दबाव क्यों है। लेकिन यह नहीं बताते कि बंद दरवाजों के पीछे छंटनी की प्रक्रिया आखिर कैसे होती है।
एक प्रमुख मीडिया कंपनी के पूर्व सीनियर HR अधिकारी, जो कई पुनर्गठन प्रक्रियाओं में सीधे शामिल रहे हैं, कहते हैं कि छंटनी आम तौर पर पहला कदम नहीं होता। उनके मुताबिक, “यह लगभग हमेशा आखिरी कदम होता है।”
उनके अनुसार, इसके पीछे कोई एक घटना नहीं होती, बल्कि कई दबाव एक साथ आते हैं।
विज्ञापन की वृद्धि धीमी हुई। डिजिटल पब्लिशर्स को Google के खोज तंत्र में हुए बदलावों का असर झेलना पड़ा, जिससे खासकर अमेरिका जैसे बाजारों से मिलने वाला ज्यादा कमाई वाला अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक कम हुआ। साथ ही कमाई का स्तर भी कमजोर हुआ।
उन्होंने बताया, “जब ट्रैफिक और कमाई दोनों एक साथ गिरने लगे तो कंपनियों को समझ आया कि पुराना विकास मॉडल अब टिकाऊ नहीं है।”
पहले कंपनियों ने समस्या से बाहर निकलने के लिए विकास का सहारा लेने की कोशिश की। टीमें बढ़ाई गईं। नए कंटेंट प्रारूप आजमाए गए। कई प्रयोग शुरू किए गए, इस उम्मीद में कि ट्रैफिक वापस आएगा। लेकिन जब यह रणनीति काम नहीं आई तो बातचीत विकास से बचने की तरफ चली गई।
उनके शब्दों में, “डिजिटल बदलाव अब नए प्रयोगों के बारे में नहीं रहा। यह लागत के बारे में हो गया।”
पहले लोगों को नहीं, पदों को निशाना बनाया गया
पूर्व HR अधिकारी के मुताबिक, शुरुआत में कंपनियों ने सीधे एम्प्लॉयीज को निशाना नहीं बनाया। सबसे पहले पदों पर नजर गई। भर्ती रोक दी गई। खाली पदों को नहीं भरा गया। किसी एम्प्लॉयी के जाने के बाद उसकी जगह नई भर्ती रोक दी गई।
हर डिपार्टमेंट, हर एम्प्लॉयी और हर वेतन पर खर्च की समीक्षा शुरू हुई। आम धारणा के उलट, शुरुआती लागत समीक्षा अक्सर एडिटोरियल डिपार्टमेंट के बजाय टेक्नोलॉजी, प्रोडक्ट और सहायक डिपार्टमेंट्स में की गई।
उनका कहना था, “टेक्नोलॉजी से जुड़े पांच वरिष्ठ पदों पर काम करने वाले लोग कभी-कभी उतनी लागत बचा सकते हैं, जितनी दर्जनों जूनियर एडिटोरियल पदों को खत्म करने से बच सकती है।”
जब इन उपायों के बाद भी आर्थिक अंतर कम नहीं हुआ, तभी कंपनियों ने एम्प्लॉयीज की छंटनी शुरू की।
डिपार्टमेंट हेड्स को एम्प्लॉयीज की संख्या घटाने का लक्ष्य देने के बजाय लागत कम करने का लक्ष्य दिया गया और उनसे पूछा गया कि वे यह लक्ष्य कैसे हासिल करेंगे।
प्रदर्शन का आकलन एक आधार था, लेकिन सिर्फ यही आधार नहीं था।
उत्पाद से होने वाली कमाई, पद की जरूरत खत्म होना, भविष्य की कारोबारी प्राथमिकताएं और कुल वेतन खर्च- इन सभी चीजों को एक साथ देखा गया और उसके बाद अंतिम फैसले लिए गए।
AI ने भी बदल दी न्यूजरूम की तस्वीर
पुनर्गठन के साथ-साथ न्यूजरूम में AI का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। टीमों से कम लोगों में ज्यादा काम करने की उम्मीद की जाने लगी। AI उपकरण रोजमर्रा के काम का हिस्सा बनने लगे। जो पत्रकार पहले एक दिन में आठ खबरें तैयार करते थे, उनसे अब 10 या 12 खबरें तैयार करने की उम्मीद की जाने लगी।
पूर्व HR अधिकारी ने कहा, “उम्मीद सिर्फ लागत कम करने की नहीं थी। साथ ही काम की उत्पादकता बढ़ाने की भी थी।”
हालांकि, पुनर्गठन के फैसलों से परिचित कुछ अधिकारियों ने एक्सचेंज4मीडिया से नाम न बताने की शर्त पर कहा कि इन प्रक्रियाओं को सिर्फ लागत कम करने के तौर पर देखना सही नहीं है।
एक ऐसे अधिकारी के मुताबिक, जिनके संगठन ने पिछले दो वर्षों में अपने मीडिया कारोबार में करीब 300 पद कम किए हैं, यह प्रक्रिया पहले एम्प्लॉयी को नौकरी से निकालने से काफी पहले शुरू हो जाती है।
उनके मुताबिक, उद्देश्य तेजी से बदलते उपभोक्ता व्यवहार, तकनीक और कमाई के तरीकों के हिसाब से कारोबार को फिर से तैयार करना, कामकाज को ज्यादा कुशल बनाना और उन क्षेत्रों में निवेश पर ध्यान देना है जहां लंबे समय में विकास की संभावना ज्यादा है।
स्रोत ने बताया कि संगठन के ढांचे की समय-समय पर समीक्षा की जाती है ताकि लगातार चुनौतीपूर्ण होते मीडिया माहौल में कारोबार टिकाऊ और मुनाफे वाला बना रहे।
उन्होंने यह भी कहा कि जहां पद प्रभावित होते हैं, वहां कंपनियां आम तौर पर अपनी आंतरिक नीतियों और लागू कानूनी नियमों का पालन करती हैं। नौकरी से अलग होने के दौरान मिलने वाली सहायता परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है।
एक्सचेंज4मीडिया ने पिछले कुछ महीनों में पुनर्गठन या एम्प्लॉयीज की संख्या कम करने वाले कई मीडिया संगठनों से संपर्क किया।
ज्यादातर ने आधिकारिक तौर पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, जबकि कुछ ने कोई जवाब नहीं दिया।
इंसानी कीमत
जिन एम्प्लॉयीज की नौकरियां गईं, उनके लिए ये छंटनी सिर्फ कंपनी के हिसाब-किताब के फैसले नहीं थे। ये उनकी जिंदगी से जुड़े बेहद निजी और मुश्किल पल थे।
एक अंग्रेजी न्यूज चैनल में यह प्रक्रिया अप्रैल के आखिरी सप्ताह में चुपचाप शुरू हुई। एम्प्लॉयीज को एक-एक करके HR डिपार्टमेंट ने बुलाया और बताया गया कि अब उनकी सेवाओं की जरूरत नहीं है। यह प्रक्रिया मई तक चली और कुछ एम्प्लॉयीज की विदाई जून तक जारी रही।
कुल मिलाकर अनुमानित 150 एम्प्लॉयीज को नौकरी से निकाला गया, जिनमें बड़ी संख्या अंग्रेजी न्यूज संचालन से जुड़े लोगों की थी। चैनल बंद नहीं हुआ, लेकिन उसके अंग्रेजी टेलीविजन और डिजिटल संचालन को काफी छोटा कर दिया गया। अब दोनों प्लेटफॉर्म्स को संभालने के लिए काफी छोटी टीम बची थी।
प्रभावित एम्प्लॉयीज में से कई ऐसे थे, जिन्होंने संगठन के साथ चार से पांच साल बिताए थे।
एम्प्लॉयीज के मुताबिक, नौकरी से अलग होने की प्रक्रिया और मुआवजा कंपनी की नीति के मुताबिक था, लेकिन आधिकारिक वजह आम तौर पर ‘लागत कम करना’ जैसे व्यापक शब्दों से आगे नहीं जाती थी।
हालांकि, एक पूर्व एम्प्लॉयी का मानना था कि समस्या इससे कहीं गहरी थी।
उसने कहा, “हमें लागत कम करना वजह बताई गई, लेकिन मुझे नहीं लगता कि असली समस्या यही थी। यह बड़ी मैनेजमेंट संबंधी कमियों का नतीजा था। योजना बनाने, काम को लागू करने और फैसले लेने- तीनों में दिक्कत आई थी और आखिरकार एम्प्लॉयीज को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।”
एक अन्य न्यूज नेटवर्क में भी करीब 120 लोग बाहर
इंडस्ट्री में ऐसा ही एक और मामला सामने आया। एक अन्य प्रमुख टेलीविजन न्यूज नेटवर्क में इस साल पुनर्गठन के तहत एडिटोरियल और कारोबारी डिपार्टमेंट्स से जुड़े करीब 120 एम्प्लॉयीज को बाहर जाने को कहा गया, ऐसा मामले से परिचित कई लोगों ने बताया।
कई एम्प्लॉयीज ने अचानक नौकरी जाने की बात बताई। कुछ से संदेश के जरिए इस्तीफा मांगा गया, जबकि कुछ से जल्दबाजी में HR डिपार्टमेंट ने बातचीत की।
एक एम्प्लॉयी ने बताया कि वह एक मीटिंग के बीच में थे, तभी उन्हें संदेश मिला कि वह तुरंत कंपनी का आंतरिक HR ऐप डाउनलोड करे और बिना देरी किए अपना इस्तीफा जमा करे।
कुछ दूसरी संस्थाओं के विपरीत, इन एम्प्लॉयीज ने बताया कि नौकरी से अलग होते समय उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया गया।
ये घटनाएं बताती हैं कि हाल की कई विदाइयां कितनी अचानक और परेशान करने वाली रही हैं। वर्षों में बनाया गया करियर कुछ ही मिनटों में खत्म हो गया।
छंटनी अब अस्थायी कारोबारी दबाव के जवाब में उठाए जाने वाले अलग-अलग कदम नहीं रह गए हैं। वे न्यूजरूम की अर्थव्यवस्था में हो रहे बड़े पुनर्गठन का हिस्सा बन गए हैं और अलग-अलग मालिकाना समूहों, प्लेटफॉर्म्स और कारोबारी मॉडलों वाली संस्थाओं को प्रभावित कर रहे हैं।
इसका असर सिर्फ नौकरी गंवाने वालों तक सीमित नहीं है।
जो एम्प्लॉयी बचे हैं, वे छोटी टीमें, बढ़ती जिम्मेदारियां, ज्यादा काम की उम्मीद और AI की मदद से काम करने के तरीकों पर बढ़ती निर्भरता की बात करते हैं।
कई न्यूजरूम्स में पुनर्गठन ने सिर्फ यह नहीं बदला कि वहां कौन काम करता है, बल्कि यह भी बदल दिया है कि पत्रकारिता तैयार कैसे की जाती है।
मीडिया में निवेश और भर्ती खत्म नहीं हुई, बस दिशा बदल गई
पुनर्गठन के साथ-साथ कई मीडिया संगठन डिजिटल कारोबार, पत्रकारों की व्यक्तिगत पहचान पर आधारित पत्रकारिता, न्यूज पत्रिकाओं, पॉडकास्ट, यूट्यूब और सीधे उपभोक्ता तक पहुंचने वाले उत्पादों के आसपास खुद को फिर से तैयार कर रहे हैं।
अब लक्ष्य सिर्फ ज्यादा खबरें प्रकाशित करना नहीं रह गया है।
अब कोशिश है वफादार पाठक-दर्शक तैयार करने, मजबूत समुदाय बनाने और पारंपरिक विज्ञापन से अलग कमाई के टिकाऊ रास्ते खोजने की।
यह बदलाव पूरी इंडस्ट्री में दिखाई दे रहा है।
पुराने मीडिया प्रकाशक वीडियो और पत्रकारों पर आधारित डिजिटल सामग्री में ज्यादा निवेश कर रहे हैं। वहीं डिजिटल मीडिया कंपनियां पॉडकास्ट, न्यूज पत्रिकाओं और सदस्यता आधारित सेवाओं का विस्तार कर रही हैं।
उदाहरण के लिए ThePrint, जो एक स्वतंत्र मीडिया संगठन है, ने भारत के बड़े डिजिटल न्यूज वीडियो संचालन में से एक तैयार किया है। उसके YouTube पर करीब 30 लाख ग्राहक हैं। यह उसके लिखित न्यूज और पॉडकास्ट रणनीति के साथ मिलकर काम करता है।
इसके साथ ही प्रकाशक विशेष विषयों पर आधारित डिपार्टमेंट, पाठक-दर्शक बढ़ाने वाली टीमें, उत्पाद, आंकड़ों, सदस्यता और कमाई से जुड़ी टीमों में भी निवेश बढ़ा रहे हैं।
कई संगठनों ने डिजिटल कहानी कहने और पत्रकार-केंद्रित प्रारूपों पर ध्यान देते हुए चुनिंदा एडिटोरियल भर्तियां भी की हैं।
इससे पता चलता है कि पूरी इंडस्ट्री एक जैसी गति से सिकुड़ नहीं रही है।
इसके बजाय प्रतिभा और निवेश उन कारोबारों की तरफ जा रहे हैं जो खोज तंत्र से मिलने वाले ट्रैफिक और पारंपरिक विज्ञापन पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय पाठकों और दर्शकों के साथ सीधा संबंध बना सकते हैं।
क्या पत्रकारिता की पढ़ाई करना अब भी फायदे का सौदा है?
पुनर्गठन की मौजूदा लहर से एक असहज सवाल भी उठ रहा है- क्या पत्रकारिता में करियर बनाने के लिए लगातार बढ़ती शिक्षा लागत अब भी सही है?
भारत के प्रमुख पत्रकारिता संस्थानों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की फीस आज करीब 2 लाख रुपये से लेकर 10 लाख रुपये से ज्यादा तक हो सकती है। यह फीस संस्थान और विशेषज्ञता के आधार पर अलग-अलग होती है।
प्रमुख निजी पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में डिग्री या स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम की लागत कई लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म, सिम्बायोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया एंड कम्युनिकेशन, एमिटी यूनिवर्सिटी, मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन और क्राइस्ट यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में पढ़ाई छात्रों और उनके परिवारों के लिए बड़ा आर्थिक निवेश है।
लेकिन राजनीश सिंह, मैनेजिंग पार्टनर, SimplyHR Solutions और TV18 के पूर्व Group Head-HR के मुताबिक शुरुआती वेतन में लगभग उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई है।
उन्होंने कहा, “चिंता की बात यह है कि मीडिया में करियर का आर्थिक ढांचा करीब दो दशक में मूल रूप से नहीं बदला है। जब मैंने करीब 20 साल पहले इंडस्ट्री जॉइन की थी, तब शुरुआती वेतन 20,000-25,000 रुपये के आसपास था। आज भी कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान लगभग इसी तरह का शुरुआती वेतन देते हैं। इससे पता चलता है कि इसमें बहुत कम बदलाव आया है। एक पेशे के तौर पर मीडिया अभी भी आर्थिक रूप से कम भुगतान वाला क्षेत्र है, जबकि इसमें काफी कौशल और मेहनत की जरूरत होती है।”
सिंह का मानना है कि पत्रकारिता अब धीरे-धीरे ऐसा पेशा बनता जा रहा है, जिसे आर्थिक लाभ से ज्यादा जुनून के दम पर लोग चुनते हैं।
साथ ही, उनका कहना है कि अनुभवी पेशेवर कॉरपोरेट कम्युनिकेशन, सार्वजनिक मामलों और स्वतंत्र काम की तरफ जा रहे हैं। दूसरी तरफ AI और लगातार बढ़ता लागत दबाव आने वाले वर्षों में न्यूजरूम्स को और छोटा कर सकता है।
उन्होंने कहा, “पत्रकारिता खत्म नहीं हो रही है। लेकिन मीडिया संस्थानों में पहले की तुलना में निश्चित तौर पर कम लोग काम करेंगे।”
उनके मुताबिक, आने वाले समय के पत्रकारों को खुद को बदलने के लिए तैयार रहना होगा, तकनीक की अच्छी समझ रखनी होगी और उन्हें एक ही विषय तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग प्रारूपों और विषयों में काम करने के लिए तैयार रहना होगा।
पत्रकारिता की पढ़ाई को लेकर दूसरा नजरिया
YourStory के एडिटर-इन चीफ और ACJ-Bloomberg, Post-Graduate Diploma in Business and Financial Journalism के पूर्व डीन जरशद एनके इस मुद्दे को थोड़ा अलग तरीके से देखते हैं।
उनका कहना है कि पत्रकारिता की पढ़ाई की लागत अपने आप में समस्या नहीं है, बशर्ते छात्रों को उसके बदले वास्तविक लाभ मिले।
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि अगर छात्र को फायदा मिल रहा है तो लागत सही है। ACJ-Bloomberg में, जहां मैं संस्थापक डीन था, फीस ज्यादा हो सकती है, लेकिन छात्रों को ऐसी योग्यताएं सिखाई जाती हैं जो उन्हें अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी पाने में मदद करती हैं। पत्रकारिता गहराई की तरफ बढ़ रही है और दुर्भाग्य से ज्यादातर पत्रकारिता स्कूल अभी भी विस्तार पर ज्यादा ध्यान देते हैं। यही समस्या है।”
उन्होंने आगे कहा कि दूसरी समस्या यह है कि संस्थान युवा पीढ़ी के मीडिया देखने-पढ़ने के तरीके से दूर हो गए हैं।उनके मुताबिक, युवा संस्थागत राय की तुलना में व्यक्तिगत अनुभव को ज्यादा महत्व देते हैं।
“उनके लिए विश्वसनीयता से ज्यादा असलियत मायने रखती है। सोशल मीडिया पर पत्रकारों को अपने संस्थानों की तुलना में जो प्रतिक्रिया मिलती है, उसे देखकर यह साफ हो जाता है। पत्रकारिता स्कूलों को इसका रास्ता निकालना होगा। लागत समस्या नहीं है, जब तक नौकरी मिलने की स्थिति अच्छी है। ACJ-Bloomberg में हमारे 100 फीसदी प्लेसमेंट हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अच्छे कारोबारी पत्रकारों की मांग काफी ज्यादा है।”
अब वही टिकेगा जो खुद को बदल पाएगा
यह खुद को बदलने की जरूरत सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं है।
यह आधुनिक न्यूजरूम्स में सबसे बड़ी जरूरतों में से एक बन गई है, खासकर तब जब संगठन छोटी टीमों और बदलते कारोबारी मॉडल के साथ काम कर रहे हैं।
एक पूर्व वरिष्ठ HR अधिकारी ने बताया कि पुनर्गठन के दौरान सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बदलाव का विरोध था। उन्होंने कहा, “हमारे पास ऐसे लोग थे जो कहते थे, ‘मैं स्वास्थ्य से जुड़ी खबरें करता हूं। मैं जीवनशैली की खबरें नहीं लिख सकता।’ अब यह सोच टिकाऊ नहीं है।”
उनके मुताबिक, “इंडस्ट्री बदल गई है, लेकिन कई पेशेवर उसके साथ नहीं बदले।”
उन्होंने कहा, “आज के न्यूजरूम में खुद को बदलने की क्षमता, विशेषज्ञता जितनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। जो पत्रकार अलग-अलग विषयों, प्रारूपों और AI की मदद से काम करने के तरीकों में काम कर सकते हैं, उनके लिए आगे के अवसर उन लोगों की तुलना में ज्यादा हैं, जिनकी पहचान सिर्फ एक विशेषज्ञता से जुड़ी है।”
लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती नेतृत्व के सामने है। कई वर्षों तक प्रकाशक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से मिलने वाले ट्रैफिक पर काफी निर्भर रहे, बजाय इसके कि वे वफादार और सीधे पाठक-दर्शक तैयार करते। जब एल्गोरिदम बदले तो इस निर्भरता की कमजोरी पूरी तरह सामने आ गई।
अंत में सवाल यही है- क्या न्यूजरूम बचेगा?
द डेविल वियर्स प्राडा 2 में Andy Sachs अपना पुरस्कार लेने के बाद मंच से चली जाती हैं। भारत के न्यूजरूम्स में छंटनी के बाद तालियां नहीं बजतीं। यहां सिर्फ अगले काम की तलाश होती है। अगले अनुबंध की तलाश होती है। अगले अवसर की तलाश होती है।
पत्रकारिता बचेगी। लेकिन जिस न्यूजरूम को पत्रकारों की कई पीढ़ियों ने जाना और समझा है, क्या वह उसी रूप में बचा रहेगा? इसका जवाब कहीं ज्यादा मुश्किल है।
Top Story में नई जिम्मेदारी के साथ डॉ. अनिल सिंह अमेरिका स्थित डिजिटल न्यूज नेटवर्क STAR Views के एडिटर की जिम्मेदारी भी जारी रखेंगे।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक डॉ. अनिल सिंह ने अंग्रेजी दैनिक Top Story में एडिटर की जिम्मेदारी संभाली है। अपनी इस भूमिका में डॉ. अनिल सिंह राष्ट्रीय राजनीति, संसद, अंतरराष्ट्रीय मामले, सार्वजनिक नीति, शासन, रणनीतिक मामलों और प्रमुख राजनीतिक व आर्थिक घटनाक्रमों की कवरेज पर नजर रखेंगे। इसके अलावा वह अखबार की संपादकीय दिशा, विशेष रिपोर्ट, इंटरव्यू, राजनीतिक विश्लेषण और विस्तृत टिप्पणी में भी योगदान देंगे।
डॉ. अनिल सिंह को टेलीविजन पत्रकारिता, प्रिंट और डिजिटल मीडिया, अकादमिक क्षेत्र तथा सार्वजनिक नीति विश्लेषण का तीन दशक से ज्यादा का अनुभव है। अपने करियर में वह स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज), आजतक और न्यूज24 जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में वरिष्ठ संपादकीय जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं।
उन्होंने 2004 से 2013 तक स्टार न्यूज में एग्जिक्यूटिव एडिटर, 2013 से 2015 तक आजतक में एग्जिक्यूटिव एडिटर और 2015 से 2020 तक न्यूज24 में एग्जिक्यूटिव एडिटर के तौर पर काम किया। अपने करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने जी न्यूज और Asia-Pacific Communication Associates के साथ भी काम किया है।
डॉ. सिंह को संसद और भारतीय राजनीति की कवरेज का दो दशक से ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की रिपोर्टिंग की है। टेलीविजन पत्रकारिता के दौरान उन्होंने स्टार न्यूज के ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ और आजतक के ‘राज तिलक’ जैसे प्रमुख राजनीतिक और चुनावी कार्यक्रमों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अनुभव में लाइव राजनीतिक कार्यक्रम, विशेष असाइनमेंट और अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बातचीत शामिल है।
Top Story में नई जिम्मेदारी के साथ डॉ. अनिल सिंह STAR Views के एडिटर की जिम्मेदारी भी जारी रखेंगे। बता दें कि STAR Views अमेरिका स्थित एक डिजिटल न्यूज नेटवर्क है। यह समानांतर संपादकीय जिम्मेदारी उनके काम में अंतरराष्ट्रीय आयाम जोड़ने की उम्मीद है, जिससे भारत के घटनाक्रमों को वैश्विक राजनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक नजरिए से जोड़ने में मदद मिलेगी।
डॉ. सिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की है। इसके अलावा उन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एम.फिल. और राजनीति विज्ञान में एम.ए. किया है। वह दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में बी.ए. (ऑनर्स) और भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता में पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा भी कर चुके हैं। पत्रकारिता में पूरी तरह आने से पहले उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध एक कॉलेज में राजनीति विज्ञान भी पढ़ाया है।
डॉ. सिंह एक लेखक के तौर पर भी सक्रिय रहे हैं। उनके लेखन में भारतीय राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े विषय शामिल हैं। उनकी हालिया किताब ‘The Prime Minister: Discourses in Indian Polity’ 2025 में हर-आनंद से प्रकाशित हुई। यह किताब भारत में प्रधानमंत्री के संस्थान के विकास और कामकाज पर केंद्रित है। उनकी अन्य किताबों में ‘Bihar: Chaos to Chaos’, ‘Military and Media’ और ‘India’s Security Concerns in the Indian Ocean Region’ शामिल हैं।
उनकी संपादकीय विशेषज्ञता के क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय संबंध, भारतीय और वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था, शासन और सार्वजनिक नीति, संसद और लोकतांत्रिक संस्थान, रक्षा और रणनीतिक मामले, सतत विकास, मीडिया और समाज, चुनाव तथा राजनीतिक विश्लेषण शामिल हैं। डॉ. सिंह PIB से एडिटर कैटेगरी में मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। वह Indian Institute of Public Administration, Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analyses, United Service Institution of India और India International Centre सहित कई प्रमुख अकादमिक और नीति संस्थानों से जुड़े हैं।
Top Story में अपनी नई जिम्मेदारी को लेकर डॉ. अनिल सिंह ने कहा कि वह ऐसे समय में एडिटर के तौर पर जुड़कर खुश हैं, जब पत्रकारिता में बड़े बदलाव हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनका प्रयास विश्वसनीय, संतुलित और विश्लेषणात्मक पत्रकारिता को मजबूत करना होगा, जिसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल घटनाओं की रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे संदर्भ उपलब्ध कराने, नीतियों की पड़ताल करने और पाठकों को भारत तथा दुनिया को प्रभावित करने वाली ताकतों को समझने में मदद करनी चाहिए। उन्होंने Top Story में योगदान देने के साथ STAR Views में अपनी संपादकीय जिम्मेदारी जारी रखने की बात भी कही।
निर्णय भट्टाचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन (LinkedIn) पर एक पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी साझा की। अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा कि अब एक नए अध्याय की शुरुआत हो रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जानी-मानी मीडिया कंपनी Network18 Media & Investments Limited में निर्णय भट्टाचार्य ने नई जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने कंपनी के न्यूज प्लेटफॉर्म News18Bangla.com में एडिटर के तौर पर अपनी नई पारी शुरू की है। निर्णय भट्टाचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन (LinkedIn) पर एक पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी साझा की।
अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा कि अब एक नए अध्याय की शुरुआत हो रही है। उन्होंने Network18 के साथ अपनी नई पारी शुरू करने पर खुशी जताते हुए नई चुनौतियों, नई बातचीत और नई संभावनाओं को लेकर उत्साह व्यक्त किया।
नेटवर्क18 से पहले निर्णय भट्टाचार्य Associated Broadcasting Co. Pvt Ltd (TV9) के साथ करीब छह साल तक जुड़े रहे। अप्रैल 2023 से अगस्त 2026 तक उन्होंने TV9 Bangla Digital में एडिटर की भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने डिजिटल एडिटोरियल स्ट्रैटेजी और न्यूजरूम ऑपरेशंस का नेतृत्व किया।
दिसंबर 2024 से जनवरी 2026 के बीच उन्होंने TV9 Bangla Digital के साथ TV9 Assamese Digital की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी संभाली। इससे पहले सितंबर 2020 से अप्रैल 2023 तक वह TV9 Bangla में डिप्टी एडिटर रहे। वह TV9 Bangla की शुरुआती कोर टीम का हिस्सा थे और डिजिटल रोलआउट, न्यूज प्लानिंग, SEO आधारित कंटेंट पाइपलाइन, सोशल मीडिया स्ट्रैटेजी और डिजिटल-ब्रॉडकास्ट इंटीग्रेशन से जुड़े काम संभालते रहे।
TV9 से पहले निर्णय भट्टाचार्य अक्टूबर 2018 से सितंबर 2020 तक द इंडियन एक्सप्रेस (The Indian Express) में सीनियर कंटेंट ऑफिसर, The Indian Express Bangla Digital के तौर पर कार्यरत रहे। इससे पहले 2017 से अक्टूबर 2018 तक उन्होंने जी मीडिया (Zee Media) में Head of Zee 24 Ghanta Digital की जिम्मेदारी संभाली।
मई 2016 से मार्च 2017 तक वह जी मीडिया में सीनियर कॉपी राइटर (News) रहे। जुलाई 2012 से मई 2016 तक उन्होंने एबीपी ग्रुप में एग्जिक्यूटिव के तौर पर काम किया। निर्णय भट्टाचार्य ने कोलकाता यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की है। इसके अलावा उन्होंने नेताजी सुभाष ओपन यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुशन किया है।
रचिता प्रसाद ने बीबीसी में सीनियर जर्नलिस्ट के तौर पर नई पारी शुरू की है। वह मुंबई से भारत से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग करेंगी। इससे पहले मनीकंट्रोल और ईटी में थीं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
रचिता प्रसाद (Rachita Prasad) ने बीबीसी (BBC) में सीनियर जर्नलिस्ट (Senior Journalist) के तौर पर नई पारी शुरू की है। वह मुंबई से भारत से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग करेंगी। उनके नई भूमिका संभालने की जानकारी सामने आई है।
बीबीसी से जुड़ने से पहले रचिता स्वतंत्र रूप से पॉलिसी, फाइनेंस और एनर्जी (Policy, Finance and Energy) से जुड़े असाइनमेंट्स पर काम कर रही थीं। इससे पहले वह मनीकंट्रोल डॉट कॉम (moneycontrol.com) में एडिटर- इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड एनर्जी (Editor - Infrastructure and Energy) की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।
रचिता प्रसाद इससे पहले द इकनॉमिक टाइम्स (The Economic Times) के साथ भी 11 साल से अधिक समय तक जुड़ी रही हैं। वहां उन्होंने बिजनेस, इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी से जुड़े विषयों पर काम किया। बीबीसी में अपनी नई भूमिका के तहत वह मुंबई से भारत से संबंधित प्रमुख खबरों और घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग करेंगी।
मीडिया कंपनी The Sandesh Limited की 83वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) 15 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मीडिया कंपनी The Sandesh Limited की 83वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) 15 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई। करीब 14 मिनट चली इस बैठक में कंपनी के सदस्यों ने कुल 7 प्रस्तावों पर मंजूरी दी। इनमें वित्त वर्ष 2025-26 के लिए फाइनल डिविडेंड, डायरेक्टर की दोबारा नियुक्ति और कंपनी के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर के कार्यकाल को आगे बढ़ाने जैसे प्रस्ताव शामिल रहे।
AGM दोपहर 2 बजे शुरू हुई और 2:14 बजे समाप्त हुई। कट-ऑफ डेट 9 सितंबर 2026 तक कंपनी के कुल 7,112 शेयरहोल्डर्स थे। बैठक में कुल 41 शेयरहोल्डर्स शामिल हुए, जिनमें 8 प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप से और 33 पब्लिक शेयरहोल्डर्स थे।
₹5 प्रति शेयर फाइनल डिविडेंड को मंजूरी
शेयरहोल्डर्स ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ₹10 फेस वैल्यू वाले प्रत्येक इक्विटी शेयर पर ₹5 का फाइनल डिविडेंड मंजूर किया। कंपनी के मुताबिक यह 50% डिविडेंड है। इसका भुगतान 12 अक्टूबर 2026 या उससे पहले किया जाएगा। यह भुगतान उन शेयरहोल्डर्स को मिलेगा, जो 14 अगस्त 2026 की रिकॉर्ड डेट पर कंपनी के शेयरहोल्डर थे।
राहुल राजीवकुमार शाह फिर बने डायरेक्टर
AGM में राहुल राजीवकुमार शाह (Rahoul Rajivkumar Shah) की डायरेक्टर के तौर पर दोबारा नियुक्ति को भी मंजूरी दी गई। वह रोटेशन के आधार पर रिटायर हो रहे थे और दोबारा नियुक्ति के लिए योग्य होने के कारण उन्होंने अपना नाम पेश किया था। कंपनी के मुताबिक उन्हें विज्ञापन, सेल्स और मार्केटिंग का लंबा अनुभव है और वह 25 साल से ज्यादा समय से कंपनी से जुड़े हुए हैं।
फाल्गुनभाई पटेल 2032 तक चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर
शेयरहोल्डर्स ने फाल्गुनभाई सी. पटेल को कंपनी के चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर दोबारा नियुक्त करने को मंजूरी दी है। उनका नया कार्यकाल 1 अप्रैल 2027 से 31 मार्च 2032 तक पांच साल का होगा।
कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, फाल्गुनभाई पटेल 27 नवंबर 1974 से कंपनी से जुड़े हुए हैं। कंपनी ने बताया कि पिछले पांच दशकों में उनके नेतृत्व में कंपनी ने एक पारंपरिक मीडिया एंटरप्राइज से एक प्रमुख क्षेत्रीय मीडिया संगठन के रूप में बदलाव किया है।
पन्नाबेन एफ. पटेल की डायरेक्टर के तौर पर जारी रहेगी नियुक्ति
AGM में पन्नाबेन एफ. पटेल की नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर के तौर पर नियुक्ति जारी रखने के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिली। यह मंजूरी इस बात के बावजूद दी गई है कि वह 17 अक्टूबर 2027 को 75 वर्ष की उम्र पूरी करेंगी। वह 29 अक्टूबर 2010 से कंपनी के बोर्ड से जुड़ी हुई हैं।
₹1,500 करोड़ तक सिक्योरिटी बनाने की मंजूरी
शेयरहोल्डर्स ने कंपनी की प्रॉपर्टीज और अंडरटेकिंग्स पर मौजूदा सिक्योरिटी के अलावा ₹1,500 करोड़ तक का mortgage, charge, pledge या hypothecation/security बनाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी।
₹2,000 करोड़ तक निवेश, लोन और गारंटी की सीमा
इसके अलावा कंपनी को ₹2,000 करोड़ तक की सीमा के भीतर किसी व्यक्ति या दूसरी कंपनी को लोन देने, किसी लोन के संबंध में गारंटी या सिक्योरिटी देने और किसी अन्य कंपनी की सिक्योरिटीज को खरीदने या सब्सक्राइब करने की अनुमति देने वाले प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई।
कंपनी ने बताया कि AGM में पारित प्रस्तावों के ई-वोटिंग रिजल्ट और Scrutinizer Report को अलग से स्टॉक एक्सचेंजों के साथ साझा किया जाएगा।
म्यूजिक कंपनी TIPS Music Limited ने खुले बाजार के जरिए अपने इक्विटी शेयरों की बायबैक प्रक्रिया जारी रखी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
म्यूजिक कंपनी TIPS Music Limited ने खुले बाजार के जरिए अपने इक्विटी शेयरों की बायबैक प्रक्रिया जारी रखी है। कंपनी की ओर से स्टॉक एक्सचेंजों को दी गई जानकारी के मुताबिक, 9 सितंबर से 15 सितंबर 2026 के बीच कंपनी ने कुल 1,35,700 इक्विटी शेयर वापस खरीदे हैं।
कंपनी ने 15 सितंबर को जारी रिपोर्ट में बताया कि इस दिन उसने कुल 58,000 शेयर खरीदे। इनमें BSE से 2,000 और NSE से 56,000 शेयर शामिल हैं। इन शेयरों की औसत खरीद कीमत ₹664.1929 प्रति शेयर रही। यह कीमत ट्रांजैक्शन कॉस्ट को छोड़कर है।
कंपनी ने बताया कि 15 सितंबर तक कुल 1,35,700 इक्विटी शेयर बायबैक किए जा चुके हैं। इस दिन की खरीद से पहले कंपनी के पास 77,700 शेयरों का संचयी बायबैक था। इस दौरान कोई शेयर क्लोज आउट नहीं किया गया।
इससे पहले 11 सितंबर 2026 को कंपनी ने कुल 39,143 शेयर खरीदे थे। इनमें BSE से 2,000 और NSE से 37,143 शेयर शामिल थे। इन शेयरों की औसत खरीद कीमत ₹660.2036 प्रति शेयर रही। 11 सितंबर तक कंपनी द्वारा कुल बायबैक किए गए शेयरों की संख्या 77,700 हो गई थी।
वहीं, 10 सितंबर 2026 को कंपनी ने 38,069 शेयर खरीदे थे। इनमें BSE से 1,000 और NSE से 37,069 शेयर शामिल थे। इनकी औसत खरीद कीमत ₹651.7867 प्रति शेयर रही। इसके बाद कुल बायबैक किए गए शेयरों की संख्या 38,557 हो गई थी।
बायबैक प्रक्रिया की शुरुआत 9 सितंबर 2026 को हुई थी। उस दिन कंपनी ने कुल 488 शेयर खरीदे थे। इनमें BSE से 100 और NSE से 388 शेयर शामिल थे। इनकी औसत खरीद कीमत ₹649 प्रति शेयर रही थी।
कंपनी ने बताया है कि यह बायबैक SEBI (Buyback of Securities) Regulations, 2018 के प्रावधानों के तहत खुले बाजार में स्टॉक एक्सचेंज के जरिए किया जा रहा है।
Paramount और Netflix ने अपने एनिमेशन फिल्म करार को खत्म करने का फैसला किया है। दोनों कंपनियों ने आपसी सहमति से इस समझौते को समाप्त करने की पुष्टि की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
Paramount और Netflix ने अपने एनिमेशन फिल्म करार को खत्म करने का फैसला किया है। दोनों कंपनियों ने आपसी सहमति से इस समझौते को समाप्त करने की पुष्टि की है। हालांकि, दोनों कंपनियां Netflix पर आने वाली अपनी आगामी एनिमेटेड फिल्मों को लेकर प्रतिबद्ध रहेंगी।
यह समझौता मूल रूप से Netflix और Skydance Animation के बीच 2023 में हुआ था। बाद में Paramount के साथ मर्जर के बाद Skydance Animation, Paramount के तहत आ गया।
दोनों कंपनियों ने एक संयुक्त बयान में कहा कि Netflix और Paramount ने अपने एनिमेशन फिल्म समझौते को आपसी सहमति से खत्म करने का फैसला किया है। हालांकि, दोनों कंपनियां Brad Bird की ‘Ray Gunn’ और डायरेक्टर Rich Moore की अभी तक नाम तय न हुई ‘Jack and the Beanstalk’ फिल्म को Netflix पर सफलतापूर्वक रिलीज करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
कंपनियों ने यह भी कहा कि Netflix और Paramount के बीच लंबे समय से चली आ रही कंटेंट लाइसेंसिंग साझेदारी जारी रहेगी। दोनों कंपनियों ने अब तक की साझेदारी पर खुशी जताते हुए कहा कि वे दुनिया भर के दर्शकों के लिए आने वाली फिल्मों को पेश करने को लेकर उत्साहित हैं।
‘Swapped’ को मिली बड़ी सफलता
हाल ही में Skydance Animation की फिल्म ‘Swapped’ Netflix की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली फिल्मों में शामिल हुई। इसे दुनियाभर में 14.49 करोड़ व्यूज मिले हैं। वहीं, Paramount Netflix को आगे भी अपना कंटेंट लाइसेंस करता रहेगा। इसमें ‘Matlock’, ‘The King of Queens’, ‘SEAL Team’, ‘Watson’ और ‘NCIS’ जैसी सीरीज शामिल हैं।
Skydance Animation, Paramount Pictures के तहत एक स्वतंत्र लेबल के तौर पर काम करता है और यह Jennifer Doge के नेतृत्व वाली Paramount Animation से अलग है। Skydance Animation का नेतृत्व John Lasseter कर रहे हैं, जबकि Holly Edwards इसकी प्रेसिडेंट हैं।
Skydance Animation की प्रमुख फिल्में
Skydance Animation ने 2022 में Peggy Holmes के निर्देशन में बनी अपनी पहली एनिमेटेड फीचर फिल्म ‘Luck’ को Apple Original Films के साथ रिलीज किया था। इसके बाद 2024 में Vicky Jenson के निर्देशन में बनी ‘Spellbound’ Netflix पर रिलीज हुई।
स्टूडियो की अन्य परियोजनाओं में Emmy Award जीत चुकी सीरीज ‘Wondla’ और चर्चित शॉर्ट फिल्म ‘Blush’ शामिल हैं। दोनों Apple TV के लिए बनाई गई थीं।
आने वाले समय में Paramount, Skydance Animation की ‘Cosmic Motors’ को सिनेमाघरों में रिलीज करेगा। इसका निर्देशन John Lasseter और सह-निर्देशन Louie Del Carmen ने किया है।
Netflix Animation की भी बड़ी लाइनअप
Netflix Animation का नेतृत्व Netflix के फिल्म डिवीजन के चेयरमैन Dan Lin और Netflix Animation Studios की प्रमुख Hannah Minghella कर रही हैं। Netflix Animation की शुरुआती सफल फिल्मों में ‘The Sea Beast’, ‘Leo’ और ऑस्कर विजेता ‘Pinocchio’ शामिल हैं।
वहीं, ‘KPop Demon Hunters’ Netflix की अब तक की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली फिल्म बन चुकी है। इसे दुनियाभर में 32.51 करोड़ व्यूज मिले हैं। यह Netflix की पहली ऐसी फिल्म भी थी, जिसने अगस्त 2025 के अंत में 1.9 करोड़ डॉलर की कमाई के साथ वीकेंड बॉक्स ऑफिस पर नंबर-1 स्थान हासिल किया था।
Netflix Animation की आने वाली फिल्मों में ‘Steps’, ‘Charlie vs. the Chocolate Factory’, Guillermo del Toro की ‘The Buried Giant’, एक ओरिजिनल ‘Ghostbusters’ एनिमेटेड फिल्म और ‘KPop Demon Hunters’ का सीक्वल शामिल हैं।
इसके अलावा Adam Sandler की ‘Leo’ का सीक्वल भी आने वाला है। ‘Leo’ ने Netflix पर अपने डेब्यू के दौरान 3.46 करोड़ व्यूज के साथ एनिमेटेड फिल्म की सबसे बड़ी शुरुआत का रिकॉर्ड बनाया था।
प्रियंका भार्गव ने फ्लिपकार्ट में सात साल से अधिक समय बिताने के बाद लॉरियल में नई पारी शुरू की है। वह अगस्त से जनरल मैनेजर और CMI हेड की भूमिका संभाल रही हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रियंका भार्गव (Priyanka Bhargav) ने फ्लिपकार्ट (Flipkart) से आगे बढ़ते हुए लॉरियल (L'Oréal) में नई पारी शुरू की है। उन्होंने कंपनी में जनरल मैनेजर और सीएमआई हेड (General Manager and CMI Head) यानी वाइस प्रेसिडेंट (VP) की जिम्मेदारी संभाली है। उनके कंपनी बदलने की जानकारी उनके लिंक्डइन प्रोफाइल (LinkedIn Profile) से सामने आई है।
प्रियंका ने अगस्त में अपनी नई भूमिका संभाली। इससे पहले वह फ्लिपकार्ट में हेड- कंज्यूमर इंटेलिजेंस एंड ब्रांड स्ट्रैटेजी (Head-Consumer Intelligence & Brand Strategy) के पद पर थीं। वह मई 2019 में फ्लिपकार्ट से जुड़ी थीं और कंपनी में सात साल से अधिक समय तक काम किया।
फ्लिपकार्ट से पहले प्रियंका भार्गव इनमोबी (InMobi) के साथ जुड़ी थीं। इससे पहले वह मिंत्रा (Myntra) और आईएमआरबी इंटरनेशनल (IMRB International) में भी अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर चुकी हैं।
एबीपी नेटवर्क में अपनी करीब सात साल पुरानी पारी को विराम देकर अविनाश राय ने इंडिया टुडे समूह के डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द लल्लनटॉप’ (The Lallantop) में वापसी की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एबीपी नेटवर्क में अपनी करीब सात साल पुरानी पारी को विराम देकर अविनाश राय ने इंडिया टुडे समूह के डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द लल्लनटॉप’ (The Lallantop) में वापसी की है। उन्होंने यहां पर बतौर वीडियो हेड जॉइन किया है। अविनाश राय ने स्वयं सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी साझा करते हुए बताया कि वह एक बार फिर द लल्लनटॉप के साथ जुड़ गए हैं। अविनाश राय ने अपने पोस्ट में लिखा, ‘सात साल बाद घरवापसी। नया ठिकाना The Lallantop। अब से लिखना-पढ़ना सब यहीं पर...।’
अविनाश राय करीब 14 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की और राजस्थान पत्रिका तथा नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया। इसके बाद उन्होंने डिजिटल मीडिया की दुनिया में कदम रखा और द लल्लनटॉप से जुड़े।
अविनाश राय वर्ष 2017 से 2019 तक द लल्लनटॉप में चीफ सब एडिटर के तौर पर कार्य कर चुके हैं। इसके बाद उन्होंने एबीपी नेटवर्क का रुख किया। एबीपी नेटवर्क में वह न्यूज एडिटर (न्यूज एंड इलेक्शन प्रोग्रामिंग) के पद पर कार्यरत रहे, जहां से अब द लल्लनटॉप में उनकी वापसी हुई है।
शिक्षा की बात करें तो अविनाश राय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक (B.A.) किया है। इसके अलावा उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से भी पढ़ाई की है। समाचार4मीडिया की ओर से अविनाश राय को उनकी नई पारी के लिए ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।
प्रशांति मोकतान के पास डिजिटल मीडिया, ऑडियंस ग्रोथ और कंटेंट स्ट्रैटेजी के क्षेत्र में 13 वर्षों से अधिक का अनुभव है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एनडीटीवी (NDTV) ने अपने सोशल मीडिया नेटवर्क को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए प्रशांति मोकतान को ‘हेड ऑफ इंस्टाग्राम’ नियुक्त किया है। इस भूमिका में वह NDTV की इंस्टाग्राम स्ट्रैटेजी का नेतृत्व करेंगी। साथ ही नेटवर्क के व्यापक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट, ऑडियंस एंगेजमेंट और ग्रोथ से जुड़ी पहलों को भी दिशा देंगी।
मीडिया उपभोग के बदलते दौर में सोशल मीडिया न्यूज की खोज, शेयर करने और उन पर चर्चा का प्रमुख माध्यम बन चुका है। इसी को ध्यान में रखते हुए NDTV ने अपने सोशल मीडिया फोकस को और मजबूत करने के लिए यह नियुक्ति की है।
प्रशांति मोकतान के पास डिजिटल मीडिया, ऑडियंस ग्रोथ और कंटेंट स्ट्रैटेजी के क्षेत्र में 13 वर्षों से अधिक का अनुभव है। NDTV से जुड़ने से पहले वह बिजनेस टुडे में सीनियर असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत थीं। वहां उन्होंने ब्रैंड के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का नेतृत्व किया।
इस नियुक्ति के बारे में एनडीटीवी के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल ने कहा कि सोशल मीडिया लोगों के न्यूज देखने और महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ने के तरीके को तेजी से बदल रहा है। उन्होंने कहा कि NDTV अपनी डिजिटल उपस्थिति को और मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है और प्रशांति की ऑडियंस की समझ तथा प्लेटफॉर्म-आधारित स्टोरीटेलिंग की विशेषज्ञता दर्शकों के साथ मजबूत संबंध बनाने में मदद करेगी।
एनडीटीवी के चीफ कंटेंट ऑफिसर विनय सरावगी ने कहा कि बेहतरीन पत्रकारिता को वहीं पहुंचना चाहिए जहां दर्शक मौजूद हैं। उनके अनुसार प्रशांति के पास संपादकीय समझ, रचनात्मकता और ऑडियंस इनसाइट्स का मजबूत संयोजन है, जो NDTV की पहुंच और प्रासंगिकता को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर और बढ़ाने में मदद करेगा।
अपनी नई जिम्मेदारी पर प्रशांति मोकतान ने कहा कि आज न्यूज को खोजने, समझने और उन पर बातचीत का हिस्सा बनने में सोशल मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि NDTV भारत के सबसे प्रतिष्ठित समाचार ब्रांड्स में से एक है और वह नए दर्शकों तक इसकी कहानी कहने की शैली को पहुंचाने तथा प्रत्येक प्लेटफॉर्म के अनुरूप विशिष्ट और प्रासंगिक फॉर्मेट विकसित करने को लेकर उत्साहित हैं।
प्रशांति मोकतान ने क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से जर्नलिज्म, साइकोलॉजी और इंग्लिश में डिग्री प्राप्त की है। इसके अलावा उन्होंने नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (IIMC) से रेडियो एवं टेलीविजन जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है।
भारतपे ने युगल तिवारी को चीफ प्रोडक्ट एंड मार्केटिंग ऑफिसर नियुक्त किया है। इससे पहले वह पेटीएम में प्रोडक्ट लीडर के तौर पर यूपीआई, रिवॉर्ड्स और कंज्यूमर ऐप से जुड़े कारोबार संभाल रहे थे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारतपे (BharatPe) ने युगल तिवारी (Yugal Tiwari) को चीफ प्रोडक्ट एंड मार्केटिंग ऑफिसर (Chief Product and Marketing Officer) यानी सीपीएमओ (CPMO) नियुक्त किया है। वह कंपनी में प्रोडक्ट और मार्केटिंग से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालेंगे।
भारतपे में नियुक्ति से पहले तिवारी पेटीएम (Paytm) में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट II, प्रोडक्ट (Senior Vice President II, Product) के पद पर थे। पेटीएम से पहले वह दो साल से अधिक समय तक क्रेड (CRED) से जुड़े रहे। वह पेटीएम पेमेंट्स बैंक (Paytm Payments Bank) के साथ भी काम कर चुके हैं।
पेटीएम में अपनी भूमिका के दौरान तिवारी कंपनी के कंज्यूमर ऐप (Consumer App) से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रोडक्ट चार्टर्स संभाल रहे थे। इनमें यूपीआई पेमेंट्स (UPI Payments), ऑनबोर्डिंग जर्नी (Onboarding Journey), ऐप होमस्क्रीन (App Homescreen), रेफरल (Referral), रिवॉर्ड्स और लॉयल्टी प्रोग्राम (Rewards and Loyalty Program) शामिल थे।