HR डिपार्टमेंट की ओर से बैठक के संदेश आते हैं, जल्दबाजी में फोन किए जाते हैं, एम्प्लॉयीज से इस्तीफा मांगने वाले वॉट्सऐप संदेश आते हैं और न्यूजरूम धीरे-धीरे, एक-एक टीम करके छोटे होते जाते हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
तस्मयी लाहा रॉय, एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
“मुझे पता है कि मैं हैरान हूं... दुखी रही हूं, जबकि हैरान होने की बजाय मुझे खुश दिखना चाहिए।”
पत्रकारिता का पुरस्कार लेने के लिए मंच पर खड़ी Andy Sachs के हाथ में ट्रॉफी तो है, लेकिन उनका ध्यान उस पर नहीं है।
“क्योंकि मुझे अभी पता चला है कि मेरे अखबार के कई प्रतिभाशाली और पुरस्कार जीत चुके पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया है। वो भी एक संदेश के जरिए।”
कुछ ही पल बाद वह एक ऐसी बात कहती हैं, जो तालियां खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक याद रहती है।
“हम समझते हैं कि पत्रकारिता बदल रही है। लेकिन जब इसका असर खुद पर पड़ता है, तो बहुत दुख होता है... और तकनीकी भाषा में कहें तो हमारी हालत अब ‘खत्म’ है।”
यह दृश्य द डेविल वियर्स प्राडा 2 (The Devil Wears Prada 2) का है। काल्पनिक है, लेकिन पूरी तरह काल्पनिक नहीं।
भारत की न्यूज इंडस्ट्री में छंटनी के बाद कोई पुरस्कार लेने वाला भाषण नहीं होता। यहां सिर्फ HR डिपार्टमेंट की ओर से बैठक के संदेश आते हैं, जल्दबाजी में फोन किए जाते हैं, एम्प्लॉयीज से इस्तीफा मांगने वाले वॉट्सऐप संदेश आते हैं और न्यूजरूम धीरे-धीरे, एक-एक टीम करके छोटे होते जाते हैं।
Andy Sachs पर्दे पर जिस स्थिति का जिक्र करती हैं, वह अब भारतीय मीडिया में भी तेजी से जानी-पहचानी हकीकत बनती जा रही है। ‘पुनर्गठन’ या ‘लागत कम करने’ जैसे शब्दों के पीछे कई ऐसे करियर हैं, जिन्हें अचानक रोक दिया गया है। साथ ही एक ऐसी इंडस्ट्री है, जो अपने इतिहास के सबसे बड़े बदलावों में से एक से गुजर रही है।
2025 में करीब 1,000 मीडिया प्रोफेशनल्स ने गंवाई नौकरी
2025 में देशभर के न्यूजरूम में हुए पुनर्गठन के चलते अनुमानित 1,000 मीडिया प्रोफेशनल्स की नौकरियां गईं। 2026 में यह सिलसिला और तेज हुआ है। अगस्त तक एक्सचेंज4मीडिया की रिपोर्टिंग के मुताबिक, यह संख्या पहले ही 1,000 का आंकड़ा पार कर चुकी है, जबकि साल के अभी कई महीने बाकी हैं।
इस छंटनी से शायद ही कोई वर्ग बचा हो। जर्नलिस्ट, प्रोड्यूसर्स, वीडियो एडिटर्स, कैमरापर्सन, डिजाइनर, प्रोडक्ट व टेक्नोलॉजी सेक्टर से जुड़े एम्प्लॉयी, सेल्स टीम और सहायक एम्प्लॉयी- सभी प्रभावित हुए हैं।
छंटनी का असर अलग-अलग स्तर के एम्प्लॉयीज पर पड़ा है। इसमें नए-नए भर्ती हुए एम्प्लॉयी भी हैं और लंबे समय से काम कर रहे एडिटर और बिजनेस हेड भी। यहां तक कि उन संस्थानों में भी नौकरियां गई हैं, जिन्हें कभी इंडस्ट्री के सबसे स्थिर नियोक्ताओं में गिना जाता था।
ये अब अलग-अलग जगहों पर होने वाली छंटनी नहीं रह गई हैं। ये उस गहरे बदलाव के साफ संकेत हैं, जो चुपचाप न्यूज कारोबार को नए तरीके से परिभाषित कर रहा है।
पिछले 18 महीनों में भारत के कई बड़े मीडिया संगठनों में पुनर्गठन देखने को मिला है। इसका असर टीवी नेटवर्क, अखबार समूह, डिजिटल कंपनियों और कारोबार से जुड़ी खबरों के न्यूजरूम तक हुआ है।
यह लहर अंग्रेजी, हिंदी और क्षेत्रीय मीडिया- हर जगह पहुंची है। इससे संकेत मिलता है कि संकट किसी एक मंच या किसी एक कारोबार मॉडल तक सीमित नहीं है।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
यह अब सिर्फ एक कंपनी के खर्च कम करने या किसी एक न्यूजरूम के अपने बजट को कसने की कहानी नहीं है। दो दर्जन से ज्यादा मौजूदा और पूर्व मीडिया अधिकारियों, HR लीडर्स, एडिटर्स और एम्प्लॉयीज से बातचीत से संकेत मिलता है कि इंडस्ट्री एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।
बदल रहा पत्रकारिता का पूरा आर्थिक मॉडल
विज्ञापन अभी भी दबाव में है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के काम करने वाले एल्गोरिदम पहले से ज्यादा अनिश्चित हो गए हैं। दर्शक और पाठक अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स में बंट रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न्यूजरूम के काम करने के तरीके को बदल रही है और मैनेजमेंट पर मुनाफा देने का लगातार दबाव है।
इन सबका नतीजा यह है कि न्यूज संगठन किस तरह बनाए जाएं, उनमें कितने लोग काम करें और उन्हें लंबे समय तक कैसे चलाया जाए- इन सभी चीजों में बड़ा बदलाव हो रहा है।
आंकड़े पूरी कहानी बताते हैं
भारत का व्यापक मीडिया व एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री भले ही लगातार बढ़ रहा हो, लेकिन न्यूज क्षेत्र तेजी से एक अलग स्थिति में जाता दिख रहा है। हाल की FICCI-EY रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में डिजिटल सदस्यता से होने वाली कमाई में 60 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इसकी बड़ी वजह वीडियो और संगीत स्ट्रीमिंग में मजबूत वृद्धि रही।
पैसे देकर लिए जाने वाले वीडियो सदस्यता खातों की संख्या बढ़कर 21.6 करोड़ हो गई, जबकि पैसे देकर संगीत सुनने वाले ग्राहकों की संख्या 37 फीसदी बढ़कर 1.44 करोड़ हो गई।
लेकिन न्यूज इंडस्ट्री अभी भी लोगों को खबरों के लिए पैसे देने के लिए तैयार करने में संघर्ष कर रहा है।
भारत में सिर्फ करीब 40 लाख भुगतान वाली डिजिटल न्यूज सदस्यताएं हैं। इससे पता चलता है कि ऐसे बाजार में पत्रकारिता तैयार करने का आर्थिक मॉडल कितना मुश्किल है, जहां पाठक लंबे समय से मुफ्त खबरें पढ़ने के आदी हो चुके हैं।
पब्लिशर्स को इसके साथ एक और बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है- अपने पाठकों और दर्शकों को बनाए रखना।
उसी रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में ऑनलाइन न्यूज प्लेटफॉर्म्स की पहुंच 9 फीसदी कम हुई। इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने इसकी वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार सर्च समरीज और AI एप्लीकेशंस के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल को बताया है। इन तकनीकों की वजह से लोगों को उनके सवालों के जवाब सीधे मिल जाते हैं और उन्हें प्रकाशक की वेबसाइट पर जाने की जरूरत कम पड़ती है।
एक ऐसी इंडस्ट्री के लिए, जो अभी भी काफी हद तक विज्ञापन पर निर्भर है, कम पाठकों का मतलब है कम पेज व्यू, कम कमाई और लागत कम करने का बढ़ता दबाव। इससे एक दुष्चक्र बनता है। कम कमाई के कारण कंपनियों को अपनी टीम छोटी करनी पड़ती है, जबकि प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए तकनीक और AI में ज्यादा निवेश करना पड़ रहा है।
सूचीबद्ध मीडिया कंपनियों पर भी दबाव
यह दबाव शेयर बाजार में सूचीबद्ध मीडिया कंपनियों के प्रदर्शन में भी दिखाई देता है। कुछ कंपनियां आक्रामक लागत नियंत्रण और पुनर्गठन के जरिए मुनाफे में वापस आई हैं, जबकि कुछ अभी भी कमजोर ऐड मार्केट, टेलीविजन से होने वाली कमाई पर दबाव और धीमी डिजिटल कमाई से जूझ रही हैं।
कंपनियों के तिमाही नतीजों के दौरान मैनेजमेंट की बातचीत में भी अब विस्तार के बजाय कामकाज को ज्यादा कुशल बनाने, मुनाफे और लागत कम करने पर ज्यादा जोर दिखाई देता है। कुछ पब्लिशर्स के लिए प्रिंट जैसे पुराने कारोबार में स्थिरता के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन डिजिटल कारोबार, जिसे कभी इंडस्ट्री का सबसे बड़ा विकास इंजन माना जाता था, अब खुद दबाव में है।
उदाहरण के लिए HT मीडिया ने बताया कि उसके प्रिंट कारोबार में अच्छी वृद्धि के बावजूद डिजिटल कारोबार को चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
जून तिमाही में डिजिटल कारोबार से होने वाली आय साल-दर-साल 28 फीसदी घटकर 27 करोड़ रुपये रह गई, जबकि यह कारोबार लगातार घाटे में रहा। कंपनी ने इस गिरावट के लिए तिमाही के दौरान किए गए कारोबारी ढांचे में बदलाव को जिम्मेदार बताया।
इसके नतीजे न्यूज पब्लिशर्स के सामने मौजूद बड़ी चुनौती को दिखाते हैं। लोग भले ही ऑनलाइन न्यूज पढ़ रहे हों, लेकिन उस खपत को मुनाफे वाले डिजिटल कारोबार में बदलना लगातार मुश्किल हो रहा है।
HT मीडिया अकेली कंपनी नहीं
नेटवर्क18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट्स का प्रदर्शन एक अलग तस्वीर दिखाता है। जून तिमाही में कंपनी की कुल परिचालन आय 10.3 फीसदी बढ़कर 516 करोड़ रुपये हो गई। इसमें कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान बढ़े विज्ञापन खर्च की बड़ी भूमिका रही। लेकिन इसके बावजूद कंपनी को 38.7 करोड़ रुपये का कुल शुद्ध घाटा हुआ। पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी को 148 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ था।
जागरण प्रकाशन, डीबी कॉर्प, टीवी टुडे नेटवर्क और जी मीडिया जैसी कंपनियों के जून तिमाही के नतीजे अभी आने बाकी हैं। इसलिए भारत की पूरी न्यूज इंडस्ट्री की वित्तीय तस्वीर अभी सामने आना बाकी है।
ठीक है... लेकिन कंपनियां आखिर तय कैसे करती हैं कि किसे नौकरी से निकाला जाए?
वित्तीय नतीजे यह समझाते हैं कि कंपनियों पर दबाव क्यों है। लेकिन यह नहीं बताते कि बंद दरवाजों के पीछे छंटनी की प्रक्रिया आखिर कैसे होती है।
एक प्रमुख मीडिया कंपनी के पूर्व सीनियर HR अधिकारी, जो कई पुनर्गठन प्रक्रियाओं में सीधे शामिल रहे हैं, कहते हैं कि छंटनी आम तौर पर पहला कदम नहीं होता। उनके मुताबिक, “यह लगभग हमेशा आखिरी कदम होता है।”
उनके अनुसार, इसके पीछे कोई एक घटना नहीं होती, बल्कि कई दबाव एक साथ आते हैं।
विज्ञापन की वृद्धि धीमी हुई। डिजिटल पब्लिशर्स को Google के खोज तंत्र में हुए बदलावों का असर झेलना पड़ा, जिससे खासकर अमेरिका जैसे बाजारों से मिलने वाला ज्यादा कमाई वाला अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक कम हुआ। साथ ही कमाई का स्तर भी कमजोर हुआ।
उन्होंने बताया, “जब ट्रैफिक और कमाई दोनों एक साथ गिरने लगे तो कंपनियों को समझ आया कि पुराना विकास मॉडल अब टिकाऊ नहीं है।”
पहले कंपनियों ने समस्या से बाहर निकलने के लिए विकास का सहारा लेने की कोशिश की। टीमें बढ़ाई गईं। नए कंटेंट प्रारूप आजमाए गए। कई प्रयोग शुरू किए गए, इस उम्मीद में कि ट्रैफिक वापस आएगा। लेकिन जब यह रणनीति काम नहीं आई तो बातचीत विकास से बचने की तरफ चली गई।
उनके शब्दों में, “डिजिटल बदलाव अब नए प्रयोगों के बारे में नहीं रहा। यह लागत के बारे में हो गया।”
पहले लोगों को नहीं, पदों को निशाना बनाया गया
पूर्व HR अधिकारी के मुताबिक, शुरुआत में कंपनियों ने सीधे एम्प्लॉयीज को निशाना नहीं बनाया। सबसे पहले पदों पर नजर गई। भर्ती रोक दी गई। खाली पदों को नहीं भरा गया। किसी एम्प्लॉयी के जाने के बाद उसकी जगह नई भर्ती रोक दी गई।
हर डिपार्टमेंट, हर एम्प्लॉयी और हर वेतन पर खर्च की समीक्षा शुरू हुई। आम धारणा के उलट, शुरुआती लागत समीक्षा अक्सर एडिटोरियल डिपार्टमेंट के बजाय टेक्नोलॉजी, प्रोडक्ट और सहायक डिपार्टमेंट्स में की गई।
उनका कहना था, “टेक्नोलॉजी से जुड़े पांच वरिष्ठ पदों पर काम करने वाले लोग कभी-कभी उतनी लागत बचा सकते हैं, जितनी दर्जनों जूनियर एडिटोरियल पदों को खत्म करने से बच सकती है।”
जब इन उपायों के बाद भी आर्थिक अंतर कम नहीं हुआ, तभी कंपनियों ने एम्प्लॉयीज की छंटनी शुरू की।
डिपार्टमेंट हेड्स को एम्प्लॉयीज की संख्या घटाने का लक्ष्य देने के बजाय लागत कम करने का लक्ष्य दिया गया और उनसे पूछा गया कि वे यह लक्ष्य कैसे हासिल करेंगे।
प्रदर्शन का आकलन एक आधार था, लेकिन सिर्फ यही आधार नहीं था।
उत्पाद से होने वाली कमाई, पद की जरूरत खत्म होना, भविष्य की कारोबारी प्राथमिकताएं और कुल वेतन खर्च- इन सभी चीजों को एक साथ देखा गया और उसके बाद अंतिम फैसले लिए गए।
AI ने भी बदल दी न्यूजरूम की तस्वीर
पुनर्गठन के साथ-साथ न्यूजरूम में AI का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। टीमों से कम लोगों में ज्यादा काम करने की उम्मीद की जाने लगी। AI उपकरण रोजमर्रा के काम का हिस्सा बनने लगे। जो पत्रकार पहले एक दिन में आठ खबरें तैयार करते थे, उनसे अब 10 या 12 खबरें तैयार करने की उम्मीद की जाने लगी।
पूर्व HR अधिकारी ने कहा, “उम्मीद सिर्फ लागत कम करने की नहीं थी। साथ ही काम की उत्पादकता बढ़ाने की भी थी।”
हालांकि, पुनर्गठन के फैसलों से परिचित कुछ अधिकारियों ने एक्सचेंज4मीडिया से नाम न बताने की शर्त पर कहा कि इन प्रक्रियाओं को सिर्फ लागत कम करने के तौर पर देखना सही नहीं है।
एक ऐसे अधिकारी के मुताबिक, जिनके संगठन ने पिछले दो वर्षों में अपने मीडिया कारोबार में करीब 300 पद कम किए हैं, यह प्रक्रिया पहले एम्प्लॉयी को नौकरी से निकालने से काफी पहले शुरू हो जाती है।
उनके मुताबिक, उद्देश्य तेजी से बदलते उपभोक्ता व्यवहार, तकनीक और कमाई के तरीकों के हिसाब से कारोबार को फिर से तैयार करना, कामकाज को ज्यादा कुशल बनाना और उन क्षेत्रों में निवेश पर ध्यान देना है जहां लंबे समय में विकास की संभावना ज्यादा है।
स्रोत ने बताया कि संगठन के ढांचे की समय-समय पर समीक्षा की जाती है ताकि लगातार चुनौतीपूर्ण होते मीडिया माहौल में कारोबार टिकाऊ और मुनाफे वाला बना रहे।
उन्होंने यह भी कहा कि जहां पद प्रभावित होते हैं, वहां कंपनियां आम तौर पर अपनी आंतरिक नीतियों और लागू कानूनी नियमों का पालन करती हैं। नौकरी से अलग होने के दौरान मिलने वाली सहायता परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है।
एक्सचेंज4मीडिया ने पिछले कुछ महीनों में पुनर्गठन या एम्प्लॉयीज की संख्या कम करने वाले कई मीडिया संगठनों से संपर्क किया।
ज्यादातर ने आधिकारिक तौर पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, जबकि कुछ ने कोई जवाब नहीं दिया।
इंसानी कीमत
जिन एम्प्लॉयीज की नौकरियां गईं, उनके लिए ये छंटनी सिर्फ कंपनी के हिसाब-किताब के फैसले नहीं थे। ये उनकी जिंदगी से जुड़े बेहद निजी और मुश्किल पल थे।
एक अंग्रेजी न्यूज चैनल में यह प्रक्रिया अप्रैल के आखिरी सप्ताह में चुपचाप शुरू हुई। एम्प्लॉयीज को एक-एक करके HR डिपार्टमेंट ने बुलाया और बताया गया कि अब उनकी सेवाओं की जरूरत नहीं है। यह प्रक्रिया मई तक चली और कुछ एम्प्लॉयीज की विदाई जून तक जारी रही।
कुल मिलाकर अनुमानित 150 एम्प्लॉयीज को नौकरी से निकाला गया, जिनमें बड़ी संख्या अंग्रेजी न्यूज संचालन से जुड़े लोगों की थी। चैनल बंद नहीं हुआ, लेकिन उसके अंग्रेजी टेलीविजन और डिजिटल संचालन को काफी छोटा कर दिया गया। अब दोनों प्लेटफॉर्म्स को संभालने के लिए काफी छोटी टीम बची थी।
प्रभावित एम्प्लॉयीज में से कई ऐसे थे, जिन्होंने संगठन के साथ चार से पांच साल बिताए थे।
एम्प्लॉयीज के मुताबिक, नौकरी से अलग होने की प्रक्रिया और मुआवजा कंपनी की नीति के मुताबिक था, लेकिन आधिकारिक वजह आम तौर पर ‘लागत कम करना’ जैसे व्यापक शब्दों से आगे नहीं जाती थी।
हालांकि, एक पूर्व एम्प्लॉयी का मानना था कि समस्या इससे कहीं गहरी थी।
उसने कहा, “हमें लागत कम करना वजह बताई गई, लेकिन मुझे नहीं लगता कि असली समस्या यही थी। यह बड़ी मैनेजमेंट संबंधी कमियों का नतीजा था। योजना बनाने, काम को लागू करने और फैसले लेने- तीनों में दिक्कत आई थी और आखिरकार एम्प्लॉयीज को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।”
एक अन्य न्यूज नेटवर्क में भी करीब 120 लोग बाहर
इंडस्ट्री में ऐसा ही एक और मामला सामने आया। एक अन्य प्रमुख टेलीविजन न्यूज नेटवर्क में इस साल पुनर्गठन के तहत एडिटोरियल और कारोबारी डिपार्टमेंट्स से जुड़े करीब 120 एम्प्लॉयीज को बाहर जाने को कहा गया, ऐसा मामले से परिचित कई लोगों ने बताया।
कई एम्प्लॉयीज ने अचानक नौकरी जाने की बात बताई। कुछ से संदेश के जरिए इस्तीफा मांगा गया, जबकि कुछ से जल्दबाजी में HR डिपार्टमेंट ने बातचीत की।
एक एम्प्लॉयी ने बताया कि वह एक मीटिंग के बीच में थे, तभी उन्हें संदेश मिला कि वह तुरंत कंपनी का आंतरिक HR ऐप डाउनलोड करे और बिना देरी किए अपना इस्तीफा जमा करे।
कुछ दूसरी संस्थाओं के विपरीत, इन एम्प्लॉयीज ने बताया कि नौकरी से अलग होते समय उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया गया।
ये घटनाएं बताती हैं कि हाल की कई विदाइयां कितनी अचानक और परेशान करने वाली रही हैं। वर्षों में बनाया गया करियर कुछ ही मिनटों में खत्म हो गया।
छंटनी अब अस्थायी कारोबारी दबाव के जवाब में उठाए जाने वाले अलग-अलग कदम नहीं रह गए हैं। वे न्यूजरूम की अर्थव्यवस्था में हो रहे बड़े पुनर्गठन का हिस्सा बन गए हैं और अलग-अलग मालिकाना समूहों, प्लेटफॉर्म्स और कारोबारी मॉडलों वाली संस्थाओं को प्रभावित कर रहे हैं।
इसका असर सिर्फ नौकरी गंवाने वालों तक सीमित नहीं है।
जो एम्प्लॉयी बचे हैं, वे छोटी टीमें, बढ़ती जिम्मेदारियां, ज्यादा काम की उम्मीद और AI की मदद से काम करने के तरीकों पर बढ़ती निर्भरता की बात करते हैं।
कई न्यूजरूम्स में पुनर्गठन ने सिर्फ यह नहीं बदला कि वहां कौन काम करता है, बल्कि यह भी बदल दिया है कि पत्रकारिता तैयार कैसे की जाती है।
मीडिया में निवेश और भर्ती खत्म नहीं हुई, बस दिशा बदल गई
पुनर्गठन के साथ-साथ कई मीडिया संगठन डिजिटल कारोबार, पत्रकारों की व्यक्तिगत पहचान पर आधारित पत्रकारिता, न्यूज पत्रिकाओं, पॉडकास्ट, यूट्यूब और सीधे उपभोक्ता तक पहुंचने वाले उत्पादों के आसपास खुद को फिर से तैयार कर रहे हैं।
अब लक्ष्य सिर्फ ज्यादा खबरें प्रकाशित करना नहीं रह गया है।
अब कोशिश है वफादार पाठक-दर्शक तैयार करने, मजबूत समुदाय बनाने और पारंपरिक विज्ञापन से अलग कमाई के टिकाऊ रास्ते खोजने की।
यह बदलाव पूरी इंडस्ट्री में दिखाई दे रहा है।
पुराने मीडिया प्रकाशक वीडियो और पत्रकारों पर आधारित डिजिटल सामग्री में ज्यादा निवेश कर रहे हैं। वहीं डिजिटल मीडिया कंपनियां पॉडकास्ट, न्यूज पत्रिकाओं और सदस्यता आधारित सेवाओं का विस्तार कर रही हैं।
उदाहरण के लिए ThePrint, जो एक स्वतंत्र मीडिया संगठन है, ने भारत के बड़े डिजिटल न्यूज वीडियो संचालन में से एक तैयार किया है। उसके YouTube पर करीब 30 लाख ग्राहक हैं। यह उसके लिखित न्यूज और पॉडकास्ट रणनीति के साथ मिलकर काम करता है।
इसके साथ ही प्रकाशक विशेष विषयों पर आधारित डिपार्टमेंट, पाठक-दर्शक बढ़ाने वाली टीमें, उत्पाद, आंकड़ों, सदस्यता और कमाई से जुड़ी टीमों में भी निवेश बढ़ा रहे हैं।
कई संगठनों ने डिजिटल कहानी कहने और पत्रकार-केंद्रित प्रारूपों पर ध्यान देते हुए चुनिंदा एडिटोरियल भर्तियां भी की हैं।
इससे पता चलता है कि पूरी इंडस्ट्री एक जैसी गति से सिकुड़ नहीं रही है।
इसके बजाय प्रतिभा और निवेश उन कारोबारों की तरफ जा रहे हैं जो खोज तंत्र से मिलने वाले ट्रैफिक और पारंपरिक विज्ञापन पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय पाठकों और दर्शकों के साथ सीधा संबंध बना सकते हैं।
क्या पत्रकारिता की पढ़ाई करना अब भी फायदे का सौदा है?
पुनर्गठन की मौजूदा लहर से एक असहज सवाल भी उठ रहा है- क्या पत्रकारिता में करियर बनाने के लिए लगातार बढ़ती शिक्षा लागत अब भी सही है?
भारत के प्रमुख पत्रकारिता संस्थानों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की फीस आज करीब 2 लाख रुपये से लेकर 10 लाख रुपये से ज्यादा तक हो सकती है। यह फीस संस्थान और विशेषज्ञता के आधार पर अलग-अलग होती है।
प्रमुख निजी पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में डिग्री या स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम की लागत कई लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म, सिम्बायोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया एंड कम्युनिकेशन, एमिटी यूनिवर्सिटी, मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन और क्राइस्ट यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में पढ़ाई छात्रों और उनके परिवारों के लिए बड़ा आर्थिक निवेश है।
लेकिन राजनीश सिंह, मैनेजिंग पार्टनर, SimplyHR Solutions और TV18 के पूर्व Group Head-HR के मुताबिक शुरुआती वेतन में लगभग उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई है।
उन्होंने कहा, “चिंता की बात यह है कि मीडिया में करियर का आर्थिक ढांचा करीब दो दशक में मूल रूप से नहीं बदला है। जब मैंने करीब 20 साल पहले इंडस्ट्री जॉइन की थी, तब शुरुआती वेतन 20,000-25,000 रुपये के आसपास था। आज भी कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान लगभग इसी तरह का शुरुआती वेतन देते हैं। इससे पता चलता है कि इसमें बहुत कम बदलाव आया है। एक पेशे के तौर पर मीडिया अभी भी आर्थिक रूप से कम भुगतान वाला क्षेत्र है, जबकि इसमें काफी कौशल और मेहनत की जरूरत होती है।”
सिंह का मानना है कि पत्रकारिता अब धीरे-धीरे ऐसा पेशा बनता जा रहा है, जिसे आर्थिक लाभ से ज्यादा जुनून के दम पर लोग चुनते हैं।
साथ ही, उनका कहना है कि अनुभवी पेशेवर कॉरपोरेट कम्युनिकेशन, सार्वजनिक मामलों और स्वतंत्र काम की तरफ जा रहे हैं। दूसरी तरफ AI और लगातार बढ़ता लागत दबाव आने वाले वर्षों में न्यूजरूम्स को और छोटा कर सकता है।
उन्होंने कहा, “पत्रकारिता खत्म नहीं हो रही है। लेकिन मीडिया संस्थानों में पहले की तुलना में निश्चित तौर पर कम लोग काम करेंगे।”
उनके मुताबिक, आने वाले समय के पत्रकारों को खुद को बदलने के लिए तैयार रहना होगा, तकनीक की अच्छी समझ रखनी होगी और उन्हें एक ही विषय तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग प्रारूपों और विषयों में काम करने के लिए तैयार रहना होगा।
पत्रकारिता की पढ़ाई को लेकर दूसरा नजरिया
YourStory के एडिटर-इन चीफ और ACJ-Bloomberg, Post-Graduate Diploma in Business and Financial Journalism के पूर्व डीन जरशद एनके इस मुद्दे को थोड़ा अलग तरीके से देखते हैं।
उनका कहना है कि पत्रकारिता की पढ़ाई की लागत अपने आप में समस्या नहीं है, बशर्ते छात्रों को उसके बदले वास्तविक लाभ मिले।
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि अगर छात्र को फायदा मिल रहा है तो लागत सही है। ACJ-Bloomberg में, जहां मैं संस्थापक डीन था, फीस ज्यादा हो सकती है, लेकिन छात्रों को ऐसी योग्यताएं सिखाई जाती हैं जो उन्हें अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी पाने में मदद करती हैं। पत्रकारिता गहराई की तरफ बढ़ रही है और दुर्भाग्य से ज्यादातर पत्रकारिता स्कूल अभी भी विस्तार पर ज्यादा ध्यान देते हैं। यही समस्या है।”
उन्होंने आगे कहा कि दूसरी समस्या यह है कि संस्थान युवा पीढ़ी के मीडिया देखने-पढ़ने के तरीके से दूर हो गए हैं।उनके मुताबिक, युवा संस्थागत राय की तुलना में व्यक्तिगत अनुभव को ज्यादा महत्व देते हैं।
“उनके लिए विश्वसनीयता से ज्यादा असलियत मायने रखती है। सोशल मीडिया पर पत्रकारों को अपने संस्थानों की तुलना में जो प्रतिक्रिया मिलती है, उसे देखकर यह साफ हो जाता है। पत्रकारिता स्कूलों को इसका रास्ता निकालना होगा। लागत समस्या नहीं है, जब तक नौकरी मिलने की स्थिति अच्छी है। ACJ-Bloomberg में हमारे 100 फीसदी प्लेसमेंट हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अच्छे कारोबारी पत्रकारों की मांग काफी ज्यादा है।”
अब वही टिकेगा जो खुद को बदल पाएगा
यह खुद को बदलने की जरूरत सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं है।
यह आधुनिक न्यूजरूम्स में सबसे बड़ी जरूरतों में से एक बन गई है, खासकर तब जब संगठन छोटी टीमों और बदलते कारोबारी मॉडल के साथ काम कर रहे हैं।
एक पूर्व वरिष्ठ HR अधिकारी ने बताया कि पुनर्गठन के दौरान सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बदलाव का विरोध था। उन्होंने कहा, “हमारे पास ऐसे लोग थे जो कहते थे, ‘मैं स्वास्थ्य से जुड़ी खबरें करता हूं। मैं जीवनशैली की खबरें नहीं लिख सकता।’ अब यह सोच टिकाऊ नहीं है।”
उनके मुताबिक, “इंडस्ट्री बदल गई है, लेकिन कई पेशेवर उसके साथ नहीं बदले।”
उन्होंने कहा, “आज के न्यूजरूम में खुद को बदलने की क्षमता, विशेषज्ञता जितनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। जो पत्रकार अलग-अलग विषयों, प्रारूपों और AI की मदद से काम करने के तरीकों में काम कर सकते हैं, उनके लिए आगे के अवसर उन लोगों की तुलना में ज्यादा हैं, जिनकी पहचान सिर्फ एक विशेषज्ञता से जुड़ी है।”
लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती नेतृत्व के सामने है। कई वर्षों तक प्रकाशक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से मिलने वाले ट्रैफिक पर काफी निर्भर रहे, बजाय इसके कि वे वफादार और सीधे पाठक-दर्शक तैयार करते। जब एल्गोरिदम बदले तो इस निर्भरता की कमजोरी पूरी तरह सामने आ गई।
अंत में सवाल यही है- क्या न्यूजरूम बचेगा?
द डेविल वियर्स प्राडा 2 में Andy Sachs अपना पुरस्कार लेने के बाद मंच से चली जाती हैं। भारत के न्यूजरूम्स में छंटनी के बाद तालियां नहीं बजतीं। यहां सिर्फ अगले काम की तलाश होती है। अगले अनुबंध की तलाश होती है। अगले अवसर की तलाश होती है।
पत्रकारिता बचेगी। लेकिन जिस न्यूजरूम को पत्रकारों की कई पीढ़ियों ने जाना और समझा है, क्या वह उसी रूप में बचा रहेगा? इसका जवाब कहीं ज्यादा मुश्किल है।
SGPC की आपत्तियों के बीच कुछ मिनट ही रुका प्रसारण, श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में फोन आने के बाद लिया गया दोबारा शुरू करने का फैसला
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
‘जीटीसी नेटवर्क’ (GTC Network) ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की ओर से उठाई गई आपत्तियों के बीच गोल्डन टेंपल से गुरबाणी का लाइव प्रसारण दोबारा शुरू कर दिया है। प्रसारण कुछ ही मिनट के लिए बाधित रहा, जिसके बाद श्रद्धालुओं के बड़ी संख्या में फोन आने के बाद इसे फिर से शुरू कर दिया गया। अब गुरबाणी का प्रसारण रोजाना अपने निर्धारित समय के अनुसार जारी है।
GTC Network के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. रवींद्र नारायण ने एक भावुक वीडियो संदेश में कहा कि प्रसारण कुछ मिनट के लिए रोका गया था, लेकिन श्रद्धालुओं की ओर से लगातार फोन आने लगे। उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की भावनाओं और उनकी आस्था को देखते हुए नेटवर्क को प्रसारण दोबारा शुरू करना पड़ा।
डॉ. रवींद्र नारायण ने कहा कि गुरबाणी का प्रसारण अब हर दिन अपने निर्धारित समय के अनुसार जारी रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अब तक गोल्डन टेंपल से होने वाला गुरबाणी का प्रसारण डीडी फ्री डिश (DD Free Dish) के दर्शकों के लिए उपलब्ध नहीं था। GTC Punjabi के जरिए यह प्रसारण खासकर शाम के समय इन दर्शकों के लिए उपलब्ध हुआ है। उन्होंने कहा कि डीडी फ्री डिश का इस्तेमाल बड़े स्तर पर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग करते हैं, जो पहले इस प्रसारण को नहीं देख पाते थे।
डॉ. नारायण ने दोहराया कि GTC Network का उद्देश्य गुरबाणी को वैश्विक संगत तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि यह प्रसारण आध्यात्मिक सेवा के तौर पर किया जा रहा है और इसमें किसी तरह का व्यावसायिक या निहित स्वार्थ नहीं है।
गौरतलब है कि यह संक्षिप्त व्यवधान SGPC की ओर से उसकी आधिकारिक गुरबाणी फीड के री-टेलीकास्ट को लेकर उठाई गई आपत्तियों के बाद आया था। हालांकि, GTC Network के मुताबिक श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में मिली प्रतिक्रिया और प्रसारण रुकने पर उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया को देखते हुए इसे दोबारा शुरू करने का फैसला किया गया। प्रसारण बहाल होने के बाद दर्शक GTC Punjabi पर अपने निर्धारित समय के अनुसार रोजाना गुरबाणी का प्रसारण देख सकते हैं।
गीतिका शरण (Gitika Sharan) ने Athena Infonomics और APLYD में Head of Marketing and Strategic Communications के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गीतिका शरण (Gitika Sharan) ने एथेना इन्फोनॉमिक्स (Athena Infonomics) और एप्लाइड (APLYD) में हेड ऑफ मार्केटिंग एंड स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस (Head of Marketing and Strategic Communications) के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने लिंक्डइन (LinkedIn) पोस्ट के जरिए अपनी नई भूमिका की जानकारी साझा की।
नई भूमिका में गीतिका शरण दोनों संस्थानों के लिए मार्केटिंग (Marketing) और स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस (Strategic Communications) का नेतृत्व करेंगी। वह कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस (Corporate Communications), पब्लिक रिलेशंस (PR), मार्केटिंग और ब्रांड बिल्डिंग के अपने अनुभव का इस्तेमाल करेंगी।
इससे पहले गीतिका शरण वाधवानी एआई ग्लोबल (Wadhwani AI Global) में हेड ऑफ मार्केटिंग एंड कम्युनिकेशंस (Head of Marketing & Communications) थीं। उन्होंने वेलस्पन वर्ल्ड (Welspun World) में जनरल मैनेजर–मारटेक (General Manager – Martech) के रूप में भी काम किया है।
इसके अलावा वह इंदिरा आईवीएफ ग्रुप (Indira IVF Group) सहित कई संस्थानों में कम्युनिकेशंस और मार्केटिंग से जुड़ी जिम्मेदारियां संभाल चुकी हैं।
गीतिका शरण ने अपनी पोस्ट में बताया कि कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस और ब्रांड मार्केटिंग में कई वर्षों तक काम करने के बाद करीब एक साल पहले उन्होंने इम्पैक्ट सेक्टर (Impact Sector) की ओर कदम बढ़ाया था। अब Athena Infonomics और APLYD में नई भूमिका के साथ वह इसी क्षेत्र में अपने अनुभव को आगे बढ़ाएंगी।
गुरबाणी के कथित अनधिकृत री-स्ट्रीमिंग को लेकर SGPC ने जारी किया था लीगल नोटिस, GTC Network के डॉ. रवींद्र नारायण ने वैश्विक सिख संगत के लिए प्रसारण फिर शुरू करने की अपील की
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
‘जीटीसी नेटवर्क’ (GTC Network) ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की आपत्तियों के बाद गोल्डन टेंपल से गुरबाणी के लाइव प्रसारण को फिलहाल रोक दिया है। SGPC ने आरोप लगाया था कि GTC Network उसकी आधिकारिक फीड को कथित तौर पर बिना अनुमति री-स्ट्रीम कर रहा था।
SGPC के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने कहा है कि गुरबाणी के प्रसारण अधिकार विशेष रूप से कमेटी के पास सुरक्षित हैं। उनके मुताबिक, SGPC की औपचारिक अनुमति के बिना किसी भी चैनल या डिजिटल प्लेटफॉर्म को इस सामग्री को री-स्ट्रीम या अपलोड करने की अनुमति नहीं है।
इसके बाद SGPC की ओर से GTC Network को लीगल नोटिस जारी किया गया, जिसके बाद नेटवर्क ने फिलहाल गुरबाणी के अपने प्रसारण को रोक दिया।
इस बारे में GTC Network के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. रवींद्र नारायण ने SGPC से अपील की है कि वह उदार रुख अपनाए और वैश्विक सिख संगत के लिए नेटवर्क को दोबारा गुरबाणी का प्रसारण शुरू करने की अनुमति दे।
डॉ. नारायण ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य केवल गुरबाणी का प्रचार करना और श्रद्धालुओं की सेवा करना है। इसमें किसी तरह का व्यावसायिक या निहित स्वार्थ नहीं है।
उन्होंने कहा कि शाम के प्रसारण के रुकने से दुनियाभर के श्रद्धालुओं में चिंता और निराशा पैदा हुई है। उनके मुताबिक, 1,000 से अधिक अन्य प्लेटफॉर्म भी SGPC की आधिकारिक फीड साझा कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि कानूनी कार्रवाई विशेष रूप से GTC Network के खिलाफ ही क्यों की गई।
डॉ. नारायण ने कहा कि नेटवर्क ने SGPC की आपत्तियों का तुरंत सम्मान करते हुए गुरबाणी का री-स्ट्रीम रोक दिया। उन्होंने कमेटी से प्रसारण दोबारा शुरू करने की अनुमति देने की अपील की है। साथ ही उन्होंने भरोसा दिलाया कि प्रसारण पूरी धार्मिक मर्यादा के साथ और मर्यादा का पालन करते हुए किया जाएगा।
अविनाश सिंह को डिजिटल विज्ञापन बिक्री के क्षेत्र में 15 साल से ज्यादा का अनुभव है। ZEE News से पहले उन्होंने OneIndia Group में विभिन्न भूमिकाएं निभाईं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मीडिया प्रोफेशनल अविनाश सिंह ने ‘जी न्यूज’ (ZEE News) के साथ अपनी नई पारी का आगाज किया है। उन्होंने यहां AVP–Digital Ad Sales की जिम्मेदारी संभाली है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘लिंक्डइन’ पर अपनी नई जिम्मेदारी की जानकारी साझा करते हुए अविनाश सिंह ने इसे अपने करियर का एक नया अध्याय बताया है।
उन्होंने कहा कि ZEE News से जुड़ना उनके लिए एक रोमांचक अवसर है। वह एक गतिशील डिजिटल मीडिया इकोसिस्टम का हिस्सा बनकर मजबूत साझेदारियां बनाने, कारोबार की वृद्धि को आगे बढ़ाने और ब्रैंड्स व विज्ञापनदाताओं के लिए सार्थक मूल्य तैयार करने पर काम करने को लेकर उत्साहित हैं।
अविनाश सिंह को डिजिटल विज्ञापन बिक्री के क्षेत्र में 15 साल से ज्यादा का अनुभव है। ZEE News से पहले उन्होंने OneIndia Group में विभिन्न भूमिकाएं निभाईं। अप्रैल 2022 से जुलाई 2026 तक उन्होंने यहां हेड ऑफ सेल्स के तौर पर काम किया। इससे पहले अप्रैल 2020 से अप्रैल 2022 तक वह जनरल मैनेजर (North Region) की भूमिका में रहे। OneIndia Group में इससे पहले सितंबर 2017 से अप्रैल 2019 तक उन्होंने सीनियर मैनेजर के तौर पर भी काम किया।
OneIndia से पहले अविनाश सिंह ने Amarujala.com में रीजनल हेड (North) के तौर पर मई 2019 से मार्च 2020 तक काम किया। इससे पहले दिसंबर 2015 से सितंबर 2017 तक वह टाइम्स इंटरनेट में एरिया सेल्स मैनेजर रहे। टाइम्स इंटरनेट में उनकी भूमिका डिजिटल विज्ञापन बिक्री, डिजिटल मार्केटिंग और प्लानिंग, बिजनेस डेवलपमेंट, स्ट्रैटेजी तैयार करने, ऑनलाइन मार्केटिंग, सोशल मीडिया और नए बिजनेस अवसर तलाशने से जुड़ी रही।
उन्होंने क्लाइंट की कारोबारी जरूरतों को समझते हुए प्रस्ताव तैयार करने, बिजनेस निर्णय लेने वालों के सामने उन्हें पेश करने और टीम मैनेजमेंट जैसी जिम्मेदारियां भी संभालीं। पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो अविनाश सिंह ने इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, नोएडा से मार्केटिंग में एमबीए किया है।
ओरिएंट इलेक्ट्रिक (Orient Electric) ने अपनी चीफ मार्केटिंग ऑफिसर अनिका अग्रवाल (Anika Agarwal) को Executive Vice President & Business Unit Head – Lighting नियुक्त किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
ओरिएंट इलेक्ट्रिक (Orient Electric) ने अपनी मौजूदा चीफ मार्केटिंग ऑफिसर (Chief Marketing Officer-CMO) अनिका अग्रवाल (Anika Agarwal) को एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट एवं बिजनेस यूनिट हेड–लाइटिंग (Executive Vice President & Business Unit Head – Lighting) नियुक्त किया है। नई भूमिका में वह कंपनी के कंज्यूमर और प्रोफेशनल लाइटिंग (Consumer and Professional Lighting) दोनों कारोबार की जिम्मेदारी संभालेंगी।
अनिका अग्रवाल के पास टेलीकॉम, इंश्योरेंस और कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स सहित विभिन्न क्षेत्रों में दो दशक से अधिक का अनुभव है। वह पिछले चार वर्षों से Orient Electric की लीडरशिप टीम का हिस्सा हैं और इस दौरान ब्रांड, ई-कॉमर्स और प्रोडक्ट स्ट्रैटेजी से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों का नेतृत्व कर चुकी हैं।
नई जिम्मेदारी के तहत अनिका कंपनी के लाइटिंग कारोबार को आगे बढ़ाने, दोनों बिजनेस सेगमेंट के बीच तालमेल मजबूत करने और विकास के नए अवसरों पर काम करेंगी।
ओरिएंट इलेक्ट्रिक के सीईओ रवींद्र सिंह नेगी (Ravindra Singh Negi) ने अनिका की नियुक्ति पर कहा कि उन्होंने लगातार कंज्यूमर इनसाइट और व्यावसायिक समझ को साथ लेकर काम किया है। उन्होंने अलग-अलग टीमों को एकजुट कर बेहतर परिणाम देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हैवेल्स इंडिया (Havells India) ने आशीष पारिख (Ashish Parikh) को President और SBU Head नियुक्त किया है। वह Diageo India में चार साल की पारी के बाद नई जिम्मेदारी संभालेंगे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
हैवेल्स इंडिया (Havells India) ने आशीष पारिख (Ashish Parikh) को प्रेसिडेंट और एसबीयू हेड (President and SBU Head) नियुक्त किया है। वह डायजियो इंडिया (Diageo India) में चार साल तक चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर और एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट (Chief Operating Officer & Executive Vice President) के पद पर काम करने के बाद हैवेल्स इंडिया से जुड़े हैं।
आशीष पारिख के पास कंज्यूमर बिजनेस, मार्केटिंग, कैटेगरी मैनेजमेंट और बिजनेस ऑपरेशंस के क्षेत्र में व्यापक नेतृत्व अनुभव है। डायजियो इंडिया में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कंपनी के ऑपरेशनल और कारोबारी प्रदर्शन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इससे पहले पारिख ने रेकिट (Reckitt) के साथ 10 वर्षों से अधिक समय तक काम किया। वहां उनकी अंतिम जिम्मेदारी ग्लोबल ओम्नीचैनल एंड कैटेगरी डेवलपमेंट डायरेक्टर (Global Omnichannel and Category Development Director) की थी। आशीष पारिख ने इससे पहले मैरिको लिमिटेड (Marico Limited) और पेप्सिको (PepsiCo) में भी वरिष्ठ नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभाई हैं।
फिल्म निर्माण और मनोरंजन क्षेत्र की कंपनी Panorama Studios International Limited ने एक अन्य कंपनी में रणनीतिक निवेश करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
फिल्म निर्माण और मनोरंजन क्षेत्र की कंपनी Panorama Studios International Limited ने एक अन्य कंपनी में रणनीतिक निवेश करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने 7 अगस्त 2026 को हुई बैठक में इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी।
कंपनी के अनुसार, यह निवेश उसके कारोबारी विस्तार और रणनीतिक उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। हालांकि, फिलहाल यह नहीं बताया गया है कि निवेश किस कंपनी में किया जाएगा और इसकी राशि कितनी होगी।
Panorama Studios ने कहा कि प्रस्तावित निवेश अभी शुरुआती चरण में है। अंतिम समझौते से पहले मूल्यांकन, बातचीत, जरूरी दस्तावेजी प्रक्रिया और सभी नियामकीय मंजूरियां पूरी की जाएंगी। इन प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही निवेश से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी।
फिलहाल कंपनी ने निवेश पाने वाली कंपनी का नाम, निवेश की रकम और कितनी हिस्सेदारी खरीदी जाएगी, जैसी जानकारियां गोपनीय रखी हैं। कंपनी का कहना है कि सौदा पूरा होने के बाद इन सभी विवरणों की घोषणा की जाएगी।
बोर्ड ने इस पूरे सौदे को अंतिम रूप देने की जिम्मेदारी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर कुमार मंगत पाठक को सौंपी है। उन्हें बातचीत करने, समझौतों पर हस्ताक्षर करने और जरूरत पड़ने पर शर्तों में बदलाव करने का भी अधिकार दिया गया है।
कंपनी का मानना है कि यह संभावित निवेश उसके कारोबार को आगे बढ़ाने और भविष्य की विकास योजनाओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। फिलहाल निवेशक अब कंपनी की अगली घोषणा का इंतजार करेंगे, जिसमें इस सौदे से जुड़े सभी अहम विवरण सामने आने की उम्मीद है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने सिनेमा हॉल में दिखाई जाने वाली पब्लिक सर्विस अवेयरनेस (PSA) फिल्मों को लेकर नई स्पष्टता जारी की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने सिनेमा हॉल में दिखाई जाने वाली पब्लिक सर्विस अवेयरनेस (PSA) फिल्मों को लेकर नई स्पष्टता जारी की है। मंत्रालय ने कहा है कि 30 नवंबर 2023 को जारी दिशा-निर्देशों को लेकर मिले सवालों के बाद यह स्पष्टीकरण जारी किया गया है।
मंत्रालय के अनुसार, केंद्र सरकार की PSA फिल्म की अधिकतम अवधि 2 मिनट होगी। इसी तरह, संबंधित राज्य सरकार भी अधिकतम 2 मिनट की PSA फिल्म सिनेमा हॉल में दिखा सकती है। यानी केंद्र और राज्य सरकार की फिल्में अलग-अलग 2-2 मिनट तक की हो सकती हैं।
नई व्यवस्था के तहत इन फिल्मों को फिल्म शुरू होने से पहले 10 मिनट के प्री-शो के दौरान या फिर इंटरवल के आखिरी 5 मिनट में दिखाया जा सकता है। केंद्र और राज्य सरकार अपनी-अपनी PSA फिल्म इन दोनों में से किसी एक तय समय स्लॉट में प्रदर्शित कर सकती हैं।
मंत्रालय ने यह भी साफ किया है कि यदि कोई PSA फिल्म 1 मिनट या उससे कम की है, तो उसे दोनों समय स्लॉट में दिखाया जा सकता है। हालांकि, किसी भी स्थिति में एक सरकार की PSA फिल्मों की कुल अवधि 2 मिनट से अधिक नहीं होनी चाहिए।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों, केंद्रीय मंत्रालयों, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) और अन्य संबंधित पक्षों से कहा है कि वे सिनेमा हॉल में PSA फिल्मों का प्रदर्शन इसी स्पष्टीकरण के अनुसार सुनिश्चित करें। यह कदम सरकारी जनजागरूकता अभियानों के प्रदर्शन को लेकर किसी भी तरह की भ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए उठाया गया है।
मध्य प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी राहुल जैन (Rahul Jain) को वॉशिंगटन डीसी स्थित अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में भारत के Executive Director के Senior Adviser के रूप में नियुक्त किया गया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) कैडर के वर्ष 2005 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (Indian Administrative Service-IAS) अधिकारी राहुल जैन (Rahul Jain) को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) में भारत के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर (Executive Director) के वरिष्ठ सलाहकार (Senior Adviser) के पद पर नियुक्त किया गया है। वह वॉशिंगटन डीसी (Washington DC) स्थित IMF मुख्यालय में अपनी नई जिम्मेदारियां संभालेंगे।
राहुल जैन वर्तमान में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) में संयुक्त सचिव (Joint Secretary) के पद पर कार्यरत हैं। उनकी नियुक्ति आर्थिक कार्य विभाग (Department of Economic Affairs), वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) के तहत प्रतिनियुक्ति (Deputation) के आधार पर संयुक्त सचिव स्तर के पद पर तीन वर्ष के लिए की गई है।
नियुक्ति आदेश के अनुसार, राहुल जैन IMF में भारत के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर को आर्थिक और वित्तीय मामलों पर सलाह देंगे। साथ ही वह वैश्विक वित्तीय संस्थान के साथ भारत की रणनीतिक भागीदारी और समन्वय को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
दो दशक से अधिक के प्रशासनिक अनुभव वाले राहुल जैन ने मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार में कई अहम पदों पर कार्य किया है। वर्तमान में वह कॉर्पोरेट गवर्नेंस (Corporate Governance) और नियामकीय नीतियों (Regulatory Policies) से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। नई भूमिका में वह IMF में भारत के हितों का प्रतिनिधित्व करने और आर्थिक नीतियों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहयोग प्रदान करेंगे।
एआईपीएल (AIPL) ने मनीष कुमार (Manish Kumar) को Deputy General Manager – Marketing & Corporate Communications नियुक्त किया है। वह 15 वर्षों से अधिक का अनुभव लेकर कंपनी से जुड़े हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एआईपीएल (AIPL) ने मनीष कुमार (Manish Kumar) को डिप्टी जनरल मैनेजर–मार्केटिंग एंड कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस (Deputy General Manager – Marketing & Corporate Communications) नियुक्त किया है। उन्होंने लिंक्डइन (LinkedIn) पोस्ट के जरिए अपनी नई पेशेवर पारी की जानकारी साझा की।
मनीष कुमार के पास मार्केटिंग (Marketing), ब्रांड रणनीति (Brand Strategy), कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस (Corporate Communications) और पब्लिक रिलेशंस (Public Relations) के क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने विभिन्न उद्योगों में ब्रांड्स की पहचान मजबूत करने और प्रभावी संचार रणनीतियां तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
AIPL से पहले मनीष कुमार स्पाइसजेट (SpiceJet) में असिस्टेंट जनरल मैनेजर (Assistant General Manager) के पद पर कार्यरत थे। करीब नौ वर्षों के दौरान उन्होंने रणनीतिक मार्केटिंग, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस, मीडिया रिलेशंस (Media Relations) और क्राइसिस कम्युनिकेशन (Crisis Communication) से जुड़े कार्यों का नेतृत्व किया।
इससे पहले वह आरके स्वामी बीबीडीओ (RK Swamy BBDO), मैक्कैन एरिक्सन (McCann Erickson) और ओगिल्वी एंड मेदर (Ogilvy & Mather) जैसी प्रमुख कंपनियों में भी नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभा चुके हैं। नई जिम्मेदारी में वह AIPL की मार्केटिंग, ब्रांड कम्युनिकेशन और कॉर्पोरेट प्रतिष्ठा को मजबूत करने पर फोकस करेंगे।