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हाशिये से फ्रंट तक: स्वतंत्र मीडिया आउटलेट्स ने आम चुनावों को ऐसे किया पुनर्परिभाषित
पूर्व टीवी एंकर्स के नेतृत्व में स्वतंत्र डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म के उभरने से 2024 के लोकसभा चुनावों की कहानी में महत्वपूर्ण बदलाव आया है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 1 year ago
भारत में मुख्यधारा का मीडिया 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान पक्षपात और हेरफेर के आरोपों से जूझ रहा है, ऐसे में मुख्यधारा के पूर्व दिग्गजों के नेतृत्व में शुरू किए गए स्वतंत्र डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ने इस कमी को पूरा किया है, जो सूचना के विश्वसनीय स्रोत और बदलाव के एजेंट बन गए हैं।
यूट्यूब, एक्स और अन्य सोशल मीडिया चैनलों जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हुए, विक्रम चंद्रा (एडिटरजी), बरखा दत्त (मोजो स्टोरी), संकेत उपाध्याय (द रेड माइक), रवीश कुमार, प्रज्ञा मिश्रा (उल्टा चश्मा), प्रणय-राधिका रॉय और संजय शर्मा (4 PM) जैसे अन्य लोगों ने इस बदलाव की अगुआई की, न केवल जमीनी स्तर पर संदेशों को प्रभावी ढंग से कैप्चर और संप्रेषित किया, बल्कि लोकप्रियता और प्रभाव के मामले में मुख्यधारा के मीडिया को भी पीछे छोड़ दिया।
बिजनेस स्ट्रैटेजिस्ट व एंजेल इन्वेस्टर लॉयड मैथियास कहते हैं, "यथास्थिति को चुनौती देने वाली और सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह ठहराने वाली उनकी प्रामाणिक और गहन सामाग्री ने विविध दर्शकों को प्रभावित किया और उन्हें एक नया परिप्रेक्ष्य प्रदान किया, जिसने अंततः जनता के बीच सार्वजनिक धारणा और राजनीतिक विमर्श को नया आकार देने में मदद की।"
मैथियास बताते हैं कि इंटरनेट के प्रसार और डिजिटल मीडिया की ओर उपभोक्ताओं के रुझान ने स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारों की लोकप्रियता को और बढ़ाया है।
वे कहते हैं, "इन प्लेटफॉर्म्स पर बड़े मीडिया घरानों द्वारा चलाए जाने वाले न्यूज चैनलों कमी है, लेकिन ये पत्रकार के अपने व्यक्तित्व और विश्वसनीयता से संचालित होते हैं।"
सीनियर वाइस प्रेजिडेंट और रिसर्च एनालिस्ट (मीडिया, उपभोक्ता विवेकाधीन और इंटरनेट) करण तौरानी कहते हैं, "चुनाव के समय को छोड़कर न्यूज चैनलों की निराशाजनक 6 प्रतिशत वृद्धि की तुलना में ये यूट्यूब पत्रकार तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके अलावा, अब न्यूज चैनलों का जो काम है, वह यूट्यूब वाले ज्यादा कर रहे हैं।"
ट्रेंडसेटर्स (Trendsetters)
स्वतंत्र मीडिया का चलन कुछ साल पहले तब शुरू हुआ, जब NDTV के दिग्गज विक्रम चंद्रा ने 2018 में बहुभाषी वीडियो न्यूज प्लेटफॉर्म 'एडिटरजी' की शुरुआत की थी। तौरानी ने बताया कि तब इसे इसे डिजिटल न्यूज क्षेत्र में विध्वंसकारी पेशकश माना गया था। इसके बाद एनडीटीवी की पूर्व एंकर बरखा दत्त ने 2019 में मोजो स्टोरी लॉन्च की, जिसने कोविड महामारी के दौरान अपनी ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए खूब लोकप्रियता हासिल की। धीरे-धीरे, और भी टीवी एंकर इस स्पेस में शामिल हो गए।
तौरानी का अनुमान है कि भविष्य में इन डिजिटल चैनलों की खपत और स्वीकार्यता दोनों में वृद्धि होने की संभावना है, क्योंकि उपभोक्ता बड़े ब्रैंड्स पर निर्भर रहने के बजाय नए मीडिया प्लेटफॉर्म्स की खोज कर रहे हैं।
इन्फ्लेक्शन पॉइंट (Inflection Point)
मीडिया को समाज का दर्पण माना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में अधिकांश न्यूज चैनलों पर आम लोगों के ज्वलंत मुद्दों और समस्याओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगा है।
एक शीर्ष FMCG ब्रैंड्स के मीडिया प्रमुख ने बताया, "समाचार उपभोक्ता, खास तौर पर GenZ, वैकल्पिक मीडिया की तलाश करने लगे हैं, क्योंकि न्यूज चैनल तेजी से शोरगुल और सरकार समर्थक होते जा रहे थे, जिससे दर्शकों की संख्या कम हो रही थी। इससे स्वतंत्र प्लेटफॉर्म को उनके लिए जगह बनाने और विस्तार करने में मदद मिली है।"
ये स्वतंत्र मीडिया चैनल इन्फॉर्मेटिव वीडियोज, स्टोरीज यहां तक कि एक लड़ी लेकर आए, जिसमें डेप्थ एनालिसिस, वोटर्स के स्पष्ट इंटरव्यूज, ग्राउंड रिपोर्ट्स और बिना शोर-शराबे की डिबेट्स शामिल थीं। वित्तीय, व्यावहारिक और राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए यह कोई आसान काम नहीं था।
सोशल मीडिया में भी बदलाव देखने को मिला। दिल्ली क्राउन के पंकज यादव कहते हैं, "2024 में लोग तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर सोशल मीडिया पर सरकार और उनकी नीतियों की आलोचना करने से नहीं डरे।"
इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट्स का कहना है कि ध्रुव राठी, आकाश बनर्जी, रेंटिंग गोला और श्याम रंगीला जैसे कुछ गैर-पत्रकार भी सभी प्रमुख मुद्दों पर अपने तीखे, आलोचनात्मक और व्यंग्यपूर्ण विचारों के कारण सशक्त आवाज के रूप में उभरे हैं, जिसने जनता के दिलों को छू लिया है। इनके यूट्यूब वीडियो को लाखों बार देखा गया और एक्स व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हजारों बार शेयर किया गया।
स्वतंत्र डिजिटल मीडिया: सबसे बड़ा विजेता (Independent digital media: The big winner)
'मोजो स्टोरी' की संस्थापक-संपादक बरखा दत्त कहती हैं, "मुझे लगता है कि यह चुनाव स्पष्ट रूप से स्वतंत्र डिजिटल मीडिया का था। हमने बड़े-बड़े कैश-रिच टीवी चैनलों के साथ प्रतिस्पर्धा की और निश्चित रूप से क्वॉलिटी के मामले में बेहतर प्रदर्शन किया, जिसके चलते दर्शकों के मन में एक अलग जगह बनाने में कामयाब रहे।"
'एनडीटीवी' की वरिष्ठ पत्रकार रह चुकी बरख दत्त की महामारी के दौरान व्यापक ग्राउंड रिपोर्टिंग को लेकर खूब प्रशंसा हुई थी। उन्होंने अपनी सीरीज 'ढाबाज़ ऑफ डेमोक्रेसी' (Dhabas of Democracy) के लिए आम चुनावों के दौरान कन्याकुमारी से कश्मीर तक सड़क मार्ग से यात्रा की और सैकड़ों ग्राउंड रिपोर्ट की व कई लाइव शोज किए, जिन्हें काफी लोकप्रियता मिली।
'एनडीटीवी' के पूर्व एंकर संकेत उपाध्याय, जिनका वेंचर 'द रेड माइक' है, ने चुनावों के दौरान प्रतिदिन आठ वीडियो बनाए। वह भी इसी भावना को दोहराते हैं। वे कहते हैं, "स्वतंत्र मीडिया अपनी सफलता का श्रेय बड़े मीडिया घरानों की गलतियों को देता है। बड़े मीडिया घरानों की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो जाने से छोटे खिलाड़ी मुख्यधारा में आ गए हैं।"
इन चुनावों ने यह दिखा दिया है कि लोग स्पष्ट रूप से दो अलग-अलग दुनिया से जुड़े हुए हैं- मौजूदा विरासत वाली मीडिया और नए युग के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स। डिजिटल पर स्पष्ट रूप से क्रिस्पी प्रड्यूस्ड एक्सप्लेनर्स बहुत बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। Thesquirrels.in के एडिटर-इन-चीफ भूपेंद्र चौबे ने टिप्पणी की कि टीवी पर पैनल में एक-दूसरे को गाली देने वाले लोगों का युग सबसे निम्न स्तर का माना जाता है।
बेजुबानों को आवाज (A voice to the voiceless)
जबकि कई लोगों ने इन पैदल सैनिकों के प्रयासों की सराहना की और महसूस किा कि उनके कवरेज ने नरेटिव को बदलने में मदद की और संभवतः चुनाव परिणाम भी बदले। वहीं बरखा दत्त का दृष्टिकोण अलग है।
दत्त ने रेखांकित किया, "यह परिणाम को प्रभावित करने को लेकर नहीं है। हमारा काम ऐसा करना नहीं है। हमारा काम घटनाओं को उसी तरह से दर्ज करना है, जैसे वे घटित हुई हैं और बेजुबानों को आवाज देना है, लिहाजा डिजिटल स्वतंत्र मीडिया ने निश्चित रूप से परम्परागत टीवी न्यूज चैनलों की तुलना में इस काम को बेहतर तरीके से किया है।"
चुनौतियां (Challenges)
स्वतंत्र डिजिटल मीडिया के उभरते क्षेत्र को वित्तीय और संपादकीय स्वतंत्रता सहित कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
संकेत उपाध्याय ने कहा, "चुनावी यात्रा पर निकलने से पहले हमें दो-तीन बार सोचना पड़ा। हालांकि, हमारे प्रयास का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा संपादकीय स्वतंत्रता और वित्तीय स्वतंत्रता के बीच एक बढ़िया संतुलन बनाना रहा है। कई बार, विभिन्न राजनीतिक इकोसिस्टम छोटे मीडिया आउटलेट्स को अपना मुखपत्र बनाने के लिए संपर्क करते हैं।"
फिर कुछ डिजिटल क्रिएटर्स हैं, जो निहित स्वार्थों के कारण फर्जी खबरें फैलाते हैं। उनके बहुत सारे फॉलोअर्स हैं। इसके अलावा, कुछ ऐसे स्वतंत्र प्लेटफॉर्म्स हैं, जो कुछ राजनीतिक दलों के मुखपत्र प्रतीत होते हैं, जिससे डिजिटल न्यूज क्षेत्र में रेगुलेशन की कमी को लेकर चिंता पैदा होती है।
संकेत उपाध्याय मानते हैं कि कुछ प्लेटफॉर्म्स मुख्यधारा के मीडिया के समान ही राह पर चल रहे हैं, लेकिन वह वैचारिक स्पेक्ट्रम के विपरीत छोर पर हैं।
यूट्यूब चैनल शुरू करके या ट्विटर पर नियमित रूप से लिखकर खुद को स्वतंत्र मीडियाकर्मी के तौर पर स्थापित करने में बहुत समय नहीं लगता। यदि हम इस तरह से लो एंट्री बैरियर को अनुमति देते हैं, तो यह एक खतरनाक प्रवृत्ति शुरू कर देगा। पंकज यादव ने चुटकी लेते हुए कहा, मेरा मानना है कि भारतीय प्रेस परिषद को स्वतंत्र पत्रकारों के रूप में लोगों को मान्यता देना शुरू कर देना चाहिए।
मैथियास और तौरानी का सुझाव है कि एक बार रेगुलेशन लागू हो जाए, तो एन्जेल इनवेस्टर्स इन प्लेटफॉर्म्स में निवेश की संभावना तलाश सकते हैं।
नोट- हमारे सहयोगी रुहैल अमीन व कंचन श्रीवास्तव द्वारा द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए आर्टिकल को आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं-
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