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ANI व मोहक मंगल विवाद: भारत की क्रिएटर इकोनॉमी में 'फेयर यूज' पर फिर छिड़ी बहस

भारत में और दुनिया के कई अन्य हिस्सों की तरह, कॉपीराइट कानून समाचार एजेंसियों को उनके द्वारा तैयार किए गए कंटेंट, जैसे- वीडियो क्लिप्स, फुटेज और ग्राफिक्स पर पूरा अधिकार देता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 8 months ago

शालिनी मिश्रा, सीनियर कॉरेस्पोंडेंट, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारत में और दुनिया के कई अन्य हिस्सों की तरह, कॉपीराइट कानून समाचार एजेंसियों को उनके द्वारा तैयार किए गए कंटेंट, जैसे- वीडियो क्लिप्स, फुटेज और ग्राफिक्स पर पूरा अधिकार देता है। जब इस तरह के कंटेंट का दोबारा इस्तेमाल किया जाता है, चाहे वो कुछ सेकंड का ही अंश क्यों न हो, और वह भी बिना वैध लाइसेंस के, तो कॉपीराइट धारक इसे हटाने की कार्रवाई या मुआवजे की मांग करने के पूरे हकदार होते हैं।

मोहन मंगल, जो एक शिक्षक और डिजिटल इनफ्लुएंसर हैं और यूट्यूब पर उनके 4.1 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं, इन दिनों पारंपरिक मीडिया के निशाने पर हैं। उन्होंने भारतीय सेना के समर्थन में एक वीडियो बनाया था- 'ऑपरेशन सिंदूर' पर आधारित 33 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री, जो उन्होंने यूट्यूब पर पोस्ट की।

वीडियो को तेजी से लोकप्रियता मिली और इसने 20 लाख से ज्यादा व्यूज जुटा लिए, जोकि वीडियो के प्रभाव की ताकत को दर्शाता है। लेकिन उतनी ही तेजी से यह वीडियो हटा भी लिया गया, वजह बनी एक न्यूज एजेंसी ANI द्वारा 11 सेकंड की क्लिप पर लगाया गया कॉपीराइट स्ट्राइक। यूट्यूब की नीति के मुताबिक, वीडियो को तुरंत प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।

शुरुआत में यह एक सामान्य कॉपीराइट मामला लगा, लेकिन आगे जो हुआ उसने कई गहरी चिंताएं खड़ी कर दीं। एक फॉलो-अप वीडियो में मोहन मंगल ने दावा किया कि यह सिर्फ कॉपीराइट स्ट्राइक नहीं थी, बल्कि इसके बाद एक भारी भरकम मुआवजे की मांग भी की गई।

इसके बाद क्रिएटर कम्युनिटी ने उनका खुलकर समर्थन किया। कुणाल कामरा, ध्रुव राठी, नितेश राजपूत और ठगेश जैसे चर्चित नामों ने न केवल मंगल के पक्ष में आवाज उठाई, बल्कि इसे डिजिटल स्टोरीटेलिंग से जुड़े एक बड़े ट्रेंड की ओर इशारा किया।

कई छोटे क्रिएटर्स ने भी कमेंट्स में अपनी-अपनी ऐसी ही कहानियां साझा कीं, जहां चंद सेकंड के न्यूज फुटेज के इस्तेमाल पर उन्हें भारी कानूनी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा। जो मामला पहले एक व्यक्तिगत संघर्ष लग रहा था, वह अब 'फेयर यूज', डिजिटल अधिकारों और मीडिया की बदलती दुनिया में संतुलित कानून प्रवर्तन की बहस बन चुका है।

यह पूरा घटनाक्रम इस सवाल को उठाता है कि क्या कॉपीराइट कानूनों का इस्तेमाल स्वतंत्र आवाजों को डराने और दबाने के लिए किया जा रहा है?

यूट्यूब की मौजूदा नीति के अनुसार, जब किसी क्रिएटर को स्ट्राइक मिलता है, तो उन्हें ईमेल से सूचित किया जाता है कि कौन-सा कंटेंट हटाया गया, किस नीति का उल्लंघन हुआ (जैसे कि उत्पीड़न, हिंसा या कॉपीराइट) और इस स्ट्राइक से चैनल पर क्या प्रभाव पड़ेगा और आगे क्या विकल्प हैं।

पहला स्ट्राइक लगते ही क्रिएटर की एक हफ्ते तक नई वीडियो अपलोड करने, लाइव जाने, प्रीमियर शेड्यूल करने, कस्टम थंबनेल डालने और प्लेलिस्ट मैनेज करने की सुविधा रोक दी जाती है। इस अवधि में पहले से शेड्यूल की गई सभी वीडियो प्राइवेट हो जाती हैं। यदि 90 दिनों के भीतर दूसरा स्ट्राइक लगता है, तो दो हफ्तों तक पोस्टिंग प्रतिबंधित हो जाती है। तीसरा स्ट्राइक चैनल को स्थायी रूप से बंद भी करवा सकता है।

यह स्थिति और गंभीर इसलिए हो जाती है क्योंकि भारत सरकार लगातार यह लक्ष्य दोहरा रही है कि वह भारत को "वैश्विक कंटेंट पावरहाउस" बनाना चाहती है। हाल ही में आयोजित WAVES समिट में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “हम भारत को कंटेंट का सबसे बड़ा निर्यातक बनाना चाहते हैं।” इस दिशा में सरकार ने ₹100 करोड़ का बजट भी तय किया है।

कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो...

ABA Law Office की फाउंडर अनुष्का अरोड़ा का कहना है कि एक चिंताजनक चलन सामने आ रहा है जहां पारंपरिक मीडिया कॉपीराइट कानून का इस्तेमाल अपने कंटेंट की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि डिजिटल स्वतंत्रता को दबाने और आलोचनात्मक आवाजों को चुप कराने के लिए कर रहा है।

अरोड़ा ने अमेरिका के मशहूर केस Lenz v. Universal Music Corp. का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि कोई भी कॉपीराइट हटाने की कार्रवाई करने से पहले फेयर यूज का आकलन करना जरूरी है। उनके शब्दों में, “फेयर यूज पर विचार किए बिना कॉपीराइट का डर दिखाना, कानून का दुरुपयोग है। यह कंटेंट की सुरक्षा नहीं, बल्कि उस पर नियंत्रण पाने की कोशिश है।”

उन्होंने भारत में फेयर यूज को मजबूत करने और दुर्भावनापूर्ण कॉपीराइट दावों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।

इंडस्ट्री की प्रतिक्रिया

लाइसेंसिंग प्लेटफॉर्म Hoopr के CEO और को-फाउंडर गौरव डागाओंकर ने कहा, “फेयर यूज की स्पष्टता की कमी के कारण हटाने की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो रहा है, खासकर उन क्रिएटर्स के खिलाफ जो एजुकेशनल या व्याख्यात्मक कंटेंट बना रहे हैं। 2023 में ही यूट्यूब ने 15 लाख से अधिक टेकडाउन रिक्वेस्ट प्रोसेस कीं, जिनमें से कई ऑटोमेटेड थीं और बहुत कम को चुनौती दी गई।”

उन्होंने कहा कि कॉपीराइट धारकों को अपने अधिकारों की रक्षा जरूर करनी चाहिए, लेकिन यह प्रक्रिया टकराव भरी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “अब कई कंटेंट कंपनियां सहयोग की जगह कानूनी दावों के जरिए कमाई का रास्ता ढूंढ रही हैं।”

डागाओंकर ने बताया कि 2023 की शुरुआत में यूट्यूब पर किए गए Content ID क्लेम्स में से 0.5% से भी कम को चुनौती दी गई। उन्होंने मानव हस्तक्षेप, पारदर्शी समाधान प्रणाली और लाइसेंसिंग को लेकर बेहतर जानकारी की जरूरत बताई।

उनके मुताबिक, “प्लेटफॉर्म्स और राइट्स ओनर्स को ऐसे सिस्टम बनाने चाहिए जो वैध उपयोग की अनुमति दें, बिना डर के। प्री-अप्रूव्ड म्यूजिक, फेयर लाइसेंसिंग मॉडल्स और शिक्षाप्रद टूल्स इस दिशा में जरूरी कदम हैं। आज के इंफ्लुएंसर्स आधुनिक नैरेटिव तैयार कर रहे हैं। अगर कॉपीराइट का इस्तेमाल उन्हें रोकने के लिए होगा, तो हम अपने ही विकास के लक्ष्य को नुकसान पहुंचाएंगे।”

संतुलन की जरूरत

भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था, जिसकी अनुमानित वैल्यू 2025 तक ₹35,000 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है, मुख्य रूप से रीमिक्स और मौजूदा कंटेंट की नई व्याख्या (reinterpretation) पर आधारित है। लेकिन अगर इस तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ बनाना है, तो इसके लिए कानूनी और संचालन से जुड़ी व्यवस्थाओं (legal and operational frameworks) में बदलाव जरूरी है।  

जो लोग खासतौर पर कमर्शियल यानी व्यावसायिक कंटेंट बना रहे हैं, उन्हें अब कॉपीराइट और लाइसेंसिंग की जिम्मेदारी पहले से ज्यादा समझदारी से निभानी होगी। यानी यदि वे किसी और का वीडियो, ऑडियो या ग्राफिक्स इस्तेमाल कर रहे हैं, तो पहले उचित लाइसेंस लेना जरूरी है। लेकिन सिर्फ क्रिएटर्स को जिम्मेदार बनाना काफी नहीं है। कानूनों को लागू करने वालों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। अब जरूरत इस बात की है कि सीधे वीडियो हटाने या सजा देने के बजाय पहले लोगों को शिक्षित किया जाए। एक सहयोगात्मक तरीका अपनाया जाए जिसमें पहले नर्मी से नोटिस देना, समाधान के लिए बातचीत करना और आसान लाइसेंसिंग जैसी चीजें शामिल हों ताकि कानूनी टकराव कम हो सके।

गौरव डगाओंकर यह सुझाव देते हैं कि कंटेंट के मालिक यानी न्यूज एजेंसियों या प्रोडक्शन हाउस को चाहिए कि वे कुछ खुले और लचीले मॉडल अपनाएं। जैसे- ओपन लाइसेंसिंग (जहां कुछ शर्तों के साथ कंटेंट इस्तेमाल की अनुमति दी जाए), डेरिवेटिव यूज परमिशन (जहां कंटेंट को थोड़ा बदलकर दोबारा इस्तेमाल करने की इजाजत हो) या को-क्रिएटेड फॉर्मैट्स (जहां मूल और नया कंटेंट मिलाकर साझा किया जाए)। क्योंकि भारत में हर महीने 10 लाख से ज्यादा ब्रैंडेड कंटेंट बन रहे हैं, ऐसे में जरूरी है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म इस बीच संतुलन बनाए रखें यानी एक तरफ अधिकारों की रक्षा करें और दूसरी तरफ रचनात्मक स्वतंत्रता को भी बढ़ावा दें।

पुराने मीडिया संस्थानों और नए डिजिटल क्रिएटर्स के बीच जो संघर्ष चल रहा है, वह केवल कॉपीराइट का मुद्दा नहीं है। यह असल में एक बड़ी परीक्षा है जो यह तय करेगा कि भारत अपने डिजिटल कहानी कहने (डिजिटल स्टोरीटेलिंग) के भविष्य को किस रास्ते पर ले जाएगा, क्या हम नियंत्रण और सख्ती को चुनेंगे या सहयोग और नवाचार को अपनाएंगे।


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