विज्ञापनों पर नजर रखने के लिए ASCI ने बनाई नई टीम, ये नाम हुए शामिल

एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया की 33वीं वार्षिक आम बैठक के बाद हुई बोर्ड मीटिंग में लिया गया फैसला

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 20 September, 2019
Last Modified:
Friday, 20 September, 2019
ASCI

‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क’ के प्रेजिडेंट रोहित गुप्ता को टीवी पर आने वाले विज्ञापनों की प्रामाणिकता की जांच करने वाली संस्था 'एडवर्टाइजिंग स्‍टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया' (एएससीआई) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स का नया चेयरमैन चुना गया है। ‘ASCI’ की 33वीं वार्षिक आम बैठक के बाद हुई बोर्ड मीटिंग में उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई। रोहित गुप्ता के पास उपभोक्ता, मीडिया और मनोरंजन उद्योग में प्रमुख पदों पर काम करने का 30 वर्षों से अधिक का अनुभव है।

रोहित गुप्ता को चेयरमैन पद पर चुनने के अलावा ‘बीबीएच कम्युनिकेशंस इंडिया’ (BBH Communications India) के मैनेजिंग पार्टनर सुभाष कामथ को वाइस चेयरमैन चुना गया और ‘आईपीजी मीडिया ब्रैंड्स’ (IPG Mediabrands) के सीईओ शशि सिन्हा को एक बार फिर मानद कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में ‘दैनिक भास्कर’ समूह के निदेशक गिरीश अग्रवाल, ‘गूगल इंडिया’ के डायरेक्टर (सेल्स) विकास अग्निहोत्री, ‘नील्सन इंडिया’ के प्रेजिडेंट (साउथ एशिया) प्रसून बासु, ‘टाटा ग्लोबल बेवरेजेज लिमिटेड’ के डायरेक्टर हरीश भट्ट,‘प्रॉक्टर एंड गैंबल हाइजीन एंड हेल्थ केयर लिमिटेड’ के सीईओ मधुसूदन गोपालन, ‘हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड’ (पर्सनल केयर) के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर और वाइस प्रेजिडेंट संदीप कोहली, ‘एग्जिक्यूटिव एजुकेशन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी’ के अनुबंधक प्रोफेसर एवं सलाहकार प्रोफेसर एसके पालेकर, ‘केचम सम्पर्क प्राइवेट लिमिटेड’ के प्रबंध निदेशक एनएस राजन, ‘सीआईएबीसी’ के पूर्व वाइस चेयरपर्सन अबंति शंकरनारायणन, ‘आदित्य बिड़ला मैनेजमेंट कॉर्पोरेशन प्राइवेट लिमिटेड’ के ग्रुप एग्जिक्यूटिव प्रेजिडेंट डी. शिवकुमार,‘टैपरूट इंडिया कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड’ के सीईओ उमेश श्रीखंडे, ‘हाइपर कलेक्टिव क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड’ के फाउंडर और चीफ क्रिएटिव ऑफिसर (डायरेक्टर) केवी श्रीधर और ‘बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड’ के प्रेजिडेंट (रेवेन्यू) शिवकुमार सुंदरम को शामिल किया गया है।

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मीडिया के लिए कुछ यूं फायदे का सौदा साबित हो सकता है दिल्ली चुनाव

वोटर्स को लुभाने के लिए राजनीतिक दल आउटडोर एडवर्टाइजिंग में नए रास्ते तलाश रहे हैं, वहीं नए मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सहारा भी लिया जा रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 11 January, 2020
Last Modified:
Saturday, 11 January, 2020
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मार्केट में मंदी से उबरने के लिए विज्ञापनों को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन चुनाव में मीडिया पर विज्ञापन खर्च के मामले में राजनीतिक दल ज्यादा आगे नहीं बढ़ रहे हैं। आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतक दलों द्वारा विज्ञापनों पर 150 से 200 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान हुए खर्च से अब के खर्च का आकलन किया जा सकता है।

‘एसोचैम’ (ASSOCHAM) की रिपोर्ट के अनुसार,पांच साल पहले राजनीतिक दलों द्वारा सभी तरह के अभियानों पर लगभग 200 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। पिछली बार के विधानसभा चुनाव के बाद प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यक्तिगत तौर पर उम्मीदवारों के बजाय विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा ज्यादा और एकमुश्त बड़ा खर्चा किया गया। इसमें भी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापन पर ज्यादा खर्च किया गया। इस साल 2020 में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है।      

‘मैडिसन मीडिया प्लस’ (Madison Media Plus) के चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर राजुल कुलश्रेष्ठ का कहना है, ‘राजनीतिक दल आर्थिक रूप से ज्यादा प्रभावित नहीं होते हैं। इन चुनावों में भी इन दलों को अपनी बात लोगों तक पहुंचानी होगी। उन्हें इस तरह की स्ट्रैटेजी अपनानी होगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सके। दिल्ली की करीब दो करोड़ जनता तक प्रभावी रूप से अपनी पहुंच बनाने के लिए इन राजनीतिक दलों को मीडिया में भी खर्चा करना होगा।।’

इसके साथ ही कुलश्रेष्ठ का यह भी कहना है, ‘राजनीतिक दलों के अभियानों में जुटे लोगों की संख्या पर मंदी का प्रभाव पडेगा, इसके बावूजद विज्ञापन पर खर्च नहीं रुकेगा। दूसरी तरफ, यही समय है, जब लोग पैसे कमाएंगे।’

आउटडोर एडवर्टाइजिंग ब्रैंड ‘Jcdecaux’ के एग्जिक्यूटिव चेयरमैन प्रमोद भंडूला के अनुसार, ‘इस दौरान बहुत सारी नई चीजें होंगी। उदाहरण के लिए- आम आदमी पार्टी ने तो अपने वोटर्स से बातचीत भी शुरू कर दी है। अपने पॉलिटिकल कैंपेन के लिए उन्होंने सभी प्रकार के माध्यमों को आधार बनाया है। चाहे प्रिंट हो, टीवी हो, रेडियो हो अथवा आउट ऑफ होम (OOH), वे सभी मोर्चों पर काफी आक्रामक रहे हैं। जब एडवर्टाइजिंग की बात होती है तो राजनीतिक दल कोई भी कसर नहीं छोड़ते हैं।’

विशेषज्ञों का कहना है कि आउटडोर, रेडियो, टीवी और प्रिंट में दिए जाने वाले विज्ञापन खर्च में वर्ष 2015 के मुकाबले 10 से 15 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद है। इस बार के विज्ञापन खर्च के मामले में सोशल मीडिया गेम चेंजर साबित होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रत्येक राजनीतिक दल द्वारा सोशल मीडिया पर कुल विज्ञापन खर्च का 25 से 30 प्रतिशत खर्च किया जाएगा। एक मीडिया बायर के अनुसार, सोशल मीडिया पर विज्ञापन खर्च के मामले में राजनीतिक दल काफी उदार हैं और उन्होंने इस माध्यम के लिए अपने बजट में कम से कम 30 प्रतिशत की वृद्धि की है।

‘Posterscope India’ के डायरेक्टर फेबियन कोवान (Fabian Cowan) के अनुसार, विज्ञापन के लिहाज से पांच साल बहुत लंबा समय है और इस समय में तमाम चीजें काफी बदल चुकी हैं। आज के समय में ऑडियंस तक पहुंच बढ़ाने के लिए तमाम नए मीडिया प्लेटफॉर्म्स आ चुके हैं। ऐसे में इन सब के साथ मिलकर चलने की जरूरत होगी। इससे निश्चित रूप से विज्ञापन खर्च बढ़ेगा।

वहीं, ‘Vizeum’ के सीईओ हिमांक दास (Himanka Das) का कहना है कि जब राजनीतिक दलों द्वारा विज्ञापन खर्च में बढ़ोतरी की बात आती है तो यह सोशल मीडिया से भी प्रेरित होती है, जो कि कम्युनिकेशन का प्रमुख टूल बन चुकी है। खास बात यह है कि इसमें फीडबैक तुरंत मिल जाता है, जो राजनीतिक दलों के लिए सुविधाजनक होता है। हालांकि, कैंपेन के लिए अभी भी पारंपरिक मीडिया यानी ट्रेडिशनल मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इसमें इन्वेंट्री नहीं बढ़ती है। उदाहरण के लिए, दिल्ली में आउट ऑफ होम अभी भी स्थिर बना हुआ है, फिर चाहे वह 2015 हो अथवा 2020। दूसरी तरफ सोशल मीडिया काफी आगे बढ़ रहा है और यह स्थिति न सिर्फ लोगों से ज्यादा बातचीत को लेकर है, बल्कि कंटेंट को लेकर भी है, जो लोगों का ध्यान खींच रहा है और राजनीतिक दलों के संदेश को उन तक पहुंचा रहा है।  

इसके अलावा, यदि रेडियो की बात करें तो 2015 के चुनाव में जहां इसने काफी अहम भूमिका निभाई थी, आज भी उसने अपनी उतनी ही मौजूदगी दर्ज करा रखी है। इस बार यह आंकड़ा कम से कम 10 प्रतिशत ज्यादा है और दिल्ली के मुख्यमंत्री व आम आदमी पार्टी लीडर अरविंद केजरीवाल के रेडियो जिंगल्स को इस बार भी मिस करना मुश्किल है।

पॉलिटिकल स्ट्रैटेजी के बारे में इंडिपेंडेंट पॉलिटिकल कम्युनिकेशंस कंसल्टेंट अनूप शर्मा का कहना है कि इस बार आरोप-प्रत्यारोप लगाने में भी विज्ञापन खर्च ज्यादा होगा। वर्ष 2015 की बात अलग थी, लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी को अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करने की चुनौती होगी, वहीं बीजेपी विकास न होने का मुद्दा उठाकर जवाबी हमला करने का प्रयास करेगी।

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मीडिया में विज्ञापनों पर खर्च का सरकार ने कुछ यूं दिया हिसाब

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने मोदी सरकार द्वारा 2014 से लेकर 2019 तक विज्ञापनों पर किए गए खर्च को लेकर किए थे सवाल

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 31 December, 2019
Last Modified:
Tuesday, 31 December, 2019
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मोदी सरकार ने 2014 से लेकर 2019 तक विज्ञापनों पर कितना खर्चा किया, यह सवाल कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने सूचना प्रसारण मंत्रालय से किया था, जिसका उन्हें कोई सीधा जवाब नहीं मिला। हालांकि, ये बात जरूर सामने आई है कि भारत सरकार विदेशों में विज्ञापन पर कोई खर्चा नहीं करती है। मनीष तिवारी ने सरकार से जानना चाहा था कि 26 मई 2014 से लेकर 30 सितंबर 2019 तक सरकार ने प्रिंट, ब्रॉडकास्ट और सोशल मीडिया के साथ ही विदेशी मीडिया में विज्ञापनों पर सालाना कितना खर्च किया। साथ ही उन्होंने यह भी पूछा था कि देश की टॉप 20 मीडिया कंपनियों के राजस्व में सरकारी विज्ञापनों की हिस्सेदारी कितनी है?

इस संबंध में सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अपने जवाब में कहा कि ‘ब्यूरो ऑफ आउटरीच एंड कम्युनिकेशन (बीओसी) द्वारा नोटिस, निविदाएं, नीलामी, भर्ती आदि के साथ ही जागरूकता अभियान और सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी देने वाले विज्ञापन जारी किये जाते हैं। जहां तक कुल खर्चे की बात है तो यह बीओसी की वेबसाइट पर उपलब्ध है।’

जावड़ेकर के जवाब में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि प्रिंट मीडिया में विज्ञापनों का प्रति वर्ग सेमी रेट 42.31 रुपए से बढ़कर 62.13 रुपए हो गया है, लेकिन बीओसी द्वारा प्रिंट मीडिया को हर साल दिए जाने वाले विज्ञापनों की संख्या जरूर घटी है। मोदी सरकार के वित्त वर्ष 2014-15 और 2018-19 के बीच यह 10.95 करोड़ वर्ग सेमी रहा, जबकि मनमोहन सरकार में वित्त वर्ष 2009-10 और 2013-14 के बीच 11.88 करोड़ वर्ग सेमी था।

भारतीय मीडिया कंपनियों के राजस्व प्रवाह में हिस्सेदारी के मनीष तिवारी के सवाल के जवाब में जावडेकर ने कहा कि भारत सरकार इस संबंध में कोई विवरण नहीं रखती। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा विदेशी समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के लिए विज्ञापन जारी नहीं किये जाते हैं।

मनीष तिवारी ने अपने ट्विटर हैंडल पर इन सवालों के साथ ही मंत्रालय की ओर से मिले जवाबों को भी शेयर किया है। इस ट्वीट को आप यहां देख सकते हैं।

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'ब्लूमबर्ग' ने एक महीने में मीडिया को दे दिए इतने विज्ञापन, हो गई बल्ले-बल्ले

अमेरिका में अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवारी के लिए न्यूयॉर्क सिटी के पूर्व मेयर माइकल ब्लूमबर्ग ने अपनी दावेदारी पेश की है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 December, 2019
Last Modified:
Thursday, 26 December, 2019
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अमेरिका में अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवारी के लिए न्यूयॉर्क सिटी के पूर्व मेयर और मीडिया कंपनी ‘ब्लूमबर्ग एलपी’ (Bloomberg LP) के सह संस्थापक माइकल ब्लूमबर्ग (Michael Bloomberg) ने पिछले महीने औपचारिक रूप से अपनी दावेदारी पेश कर दी है। माना जा रहा है कि माइकल ब्लूमबर्ग राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी (Democratic Party) के आधिकारिक प्रत्याशी बनने की होड़ में शामिल होने वाले आखिरी नेता हैं। प्रत्याशी चुनने का काम अगले साल तीन फरवरी से होगा।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 77 वर्षीय ब्लूमबर्ग ने उम्मीदवार की दौड़ में शामिल होने के लिए पिछले महीने के आखिर में जब से अपनी दावेदारी पेश की है, तब से अब तक लगभग एक महीने में ही उन्होंने डिजिटल और टेलिविजन एडवर्टाइजिंग पर 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च कर दिए हैं।

अमेरिका की पॉलिटिकल वेबसाइट ‘पॉलिटिको’ (Politico) के अनुसार, हालांकि ब्लूमबर्ग लगभग सभी अमेरिकी राज्यों में खर्च कर रहे हैं, लेकिन उनका मुख्य फोकस कैलिफोर्निया, टेक्सास और फ्लोरिडा पर है।

‘पॉलिटिको’ के अनुसार, डेमोक्रिटक पार्टी के जितने भी उम्मीदवारों ने राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी की दौड़ में अपनी दावेदारी पेश की है, उनके इस साल कुल विज्ञापन खर्च की तुलना में ब्लूमबर्ग ने पिछले कुछ समय के दौरान ही विज्ञापनों पर दोगुना से ज्यादा खर्चा किया है।

इस बारे में रिपब्लिकन राजनीतिक रणनीतिकार जिम मैकलॉघलिन (Jim McLaughlin) का कहना है, ‘राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी की दौड़ में हमने कभी भी इतना खर्च होते हुए नहीं देखा है। ब्लूमबर्ग के पास बजट की कोई सीमा ही नहीं है।’ वहीं, एक राजनीतिक विश्लेषक का कहना है, ‘जब आप टीवी पर एक ही विज्ञापन 10 बार देखते हैं, तो उसका ज्यादा प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।’

वहीं, पिछले हफ्ते ‘Quinnipiac University’ की ओर से जारी नेशनल पोल के अनुसार, इस दौड़ में शामिल पूर्व उपराष्ट्रपति जो बिडेन (Joe Biden) के पास करीब 30 प्रतिशत वोटों के साथ डेमोक्रेटिक वोटर्स और इंडिपेंडेंट वोर्टस के बीच मजबूत पकड़ है। वह इस दौड़ में सबसे आगे हैं। इस पोल के अनुसार, बिडेन के बाद 17 प्रतिशत वोटों के साथ सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन (Elizabeth Warren) का नंबर है, जबकि सात प्रतिशत वोटों के साथ ब्लूमबर्ग पांचवे नंबर पर हैं।

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स्कूलों के आसपास विज्ञापनों को लेकर FSSAI ने उठाया ये कदम

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने तैयार किया है मसौदा, अंतिम मंजूरी के लिए भेजा जाएगा स्वास्थ्य मंत्रालय के पास

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 24 December, 2019
Last Modified:
Tuesday, 24 December, 2019
FSSAI

स्कूल कैंटीन और स्कूल परिसर के 50 मीटर के दायरे में जंक फूड के विज्ञापन और बिक्री पर रोक लगाने के लिए ‘भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण’ (FSSAI)  अगले दो महीने में नियमनों को अंतिम रूप दे सकता है।

FSSAI के सीईओ पवन कुमार अग्रवाल ने यह जानकारी दी। बता दें कि नवंबर में 'खाद्य सुरक्षा और मानक (स्कूली बच्चों के लिए सुरक्षित भोजन और स्वस्थ आहार) नियमन 2019' का मसौदा जारी किया गया था। इस मसौदे पर संबंद्ध पक्षों को 30 दिन के अंदर टिप्पणियां देने के लिए कहा गया था। इस प्रकार के मसौदा नियमों में FSSAI ने कहा था, 'जिन खाद्य पदार्थों में वसा, नमक और चीनी  अधिक मात्रा में होती है, उन्हें स्कूल कैंटीन, स्कूल परिसर, हॉस्टल की रसोई या स्कूल के 50 मीटर के दायरे में बच्चों को नहीं बेचा जा सकता है।'

इस मसौदे में FSSAI ने यह भी प्रस्तावित किया है कि स्कूली बच्चों के बीच सुरक्षित भोजन और स्वस्थ आहार को बढ़ावा देने के लिए स्कूली अधिकारियों को आगे आकर व्यापक कार्यक्रम अपनाना होगा। मसौदे के अनुसार, 'बाजार छोड़कर स्कूलों में स्वास्थप्रद भोजन का समर्थन करने के लिए खाद्य व्यापार परिचालकों (FBO) को लोगो, ब्रैंड नेम, पोस्टर, पाठ्यपुस्तक कवर आदि के माध्यम से स्कूल परिसर में कहीं भी कम पोषण वाले खाद्य पदार्थों को नहीं बेचना है। वहीं, स्कूल परिसर का नियमित रूप से निरीक्षण किया जाना चाहिये, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि छात्रों को स्कूलों में सुरक्षित, स्वस्थ और स्वास्थ्यकर भोजन दिया जाता है।

इस बारे में अग्रवाल का कहना है, 'विभिन्न अंशधारकों से मिले सुझावों को हम एकत्रित कर रहे हैं। एक तकनीकी समिति इन सुझावों पर गौर करेगी। इसके बाद नियमों को अंतिम रूप दिया जाएगा।' उन्होंने कहा कि नियमों को अंतिम रूप देने में 1-2 महीने लग सकते हैं। इसके बाद इन्हें अंतिम मंजूरी के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय के पास भेजा जाएगा।

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मीडिया में इस तरह के विज्ञापनों पर HC ने लगाई रोक

कई जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने लिया निर्णय, मामले में अगली सुनवाई नौ जनवरी को होगी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 24 December, 2019
Last Modified:
Tuesday, 24 December, 2019
High Court

‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस’ (एनआरसी) तथा ‘नागरिकता संशोधन कानून’ (सीएए) को लेकर देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इस बीच, इन दोनों मामलों को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कराका झटका दिया है।

दरअसल, हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से प्रदेश भर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दिए गए सभी विज्ञापनों को हटाने को कहा है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने अगले आदेश तक सरकार पर ऐसा कोई भी विज्ञापन देने पर रोक लगा दी है। सीएए पर जारी कई जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीबी राधाकृष्णनन नैयर और न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी की खंडपीठ ने यह आदेश दिया है।

इस मामले में अब अगली सुनवाई नौ जनवरी को होगी। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य के तमाम इलाकों में इंटरनेट सेवाओं को तत्काल बहाल करने का भी आदेश दिया है। बता दें कि ममता बनर्जी ने टीवी चैनल्स और वेबसाइट्स समेत कई माध्यमों पर नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में विज्ञापन दिया था। इन विज्ञापनों में ममता बनर्जी ने लोगों को भरोसा दिया था कि राज्य में इन दोनों को लागू नहीं किया जाएगा। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में कई जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें वेबसाइट्स और अन्य जगहों से इस तरह के सभी विज्ञापनों को हटाने की मांग की गई थी।

गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बंगाल के कई जिलों में विरोध प्रदर्शन के दौरान सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था और बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की गई थी। इस पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने ममता सरकार से राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर जिलेवार एक रिपोर्ट तलब की थी। कोर्ट ने बंगाल के अटॉर्नी जनरल से सीएए के खिलाफ दिए गए सरकारी विज्ञापनों पर भी सवाल जवाब किया था।

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नहीं रुका कमलनाथ की फजीहत का सिलसिला, ‘भूल सुधार’ में भी भूल कर गए कांग्रेसी

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के जन्मदिन के मौके पर कांग्रेस कमेटी की ओर से प्रदेश के अधिकांश अखबारों में दिए गए थे विज्ञापन

नीरज नैयर by
Published - Friday, 22 November, 2019
Last Modified:
Friday, 22 November, 2019
Kamalnath

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को अपना 73वां जन्मदिन हमेशा याद रहेगा। पहले उन्हें मध्यप्रदेश कांग्रेस द्वारा जारी विज्ञापन के लिए फजीहत झेलनी पड़ी, फिर उस विज्ञापन की गलतियों के लिए छपे ‘भूल सुधार’ में उनका नाम ही भुला दिया गया। अब इस ‘भूल’ को वाकई भूल माना जाए या साजिश, इसका फैसला तो कमलनाथ को ही करना है।

दरअसल, 18 नवंबर को कमलनाथ का जन्मदिन था। इस मौके पर कांग्रेस कमेटी की तरफ से प्रदेश के अधिकांश अखबारों में विज्ञापन छापे गए। इन विज्ञापनों का मकसद मुख्यमंत्री के चेहरे पर मुस्कान खिलाना और जनता को उनके संघर्ष से रूबरू कराना था, लेकिन हुआ इसके एकदम उलट।

कुछ विज्ञापनों में कमलनाथ की तारीफ के साथ-साथ इतिहास का हवाला देकर उन पर तंज भी कसे गए। बात जब आम हुई तो बवाल मच गया। पहले कांग्रेस नेता संबंधित विज्ञापन से पल्ला झाड़ते रहे और दूसरे दिन अखबारों में प्रकाशित ‘भूल सुधार’ के जरिये अपनी भूल सुधारने का प्रयास किया गया, लेकिन फजीहत का सिलसिला यहीं नहीं रुका।

‘भूल सुधार’ में फिर एक ऐसी भूल कर दी गई, जिसे देखकर कमलनाथ का आगबबूला होना लाजमी है। संबंधित अखबारों में ‘भूल सुधार’ की सूचना के तहत विवादस्पद विज्ञापनों को दुरुस्त करके पुन: दूसरे दिन प्रकाशित किया गया। पहली नजर में सबकुछ ठीक नजर आया है, पर जब नजरों पर जोर दिया गया, तो ‘भूल’ में एक और भूल नजर के सामने आ गई।

संशोधित विज्ञापन के पहले पैरा में मुख्यमंत्री का नाम ही बदल दिया गया। उन्हें कमलनाथ से कमलाथ बनाया गया है। ‘सांसद से मुख्यमंत्री तक का सफर’ शीर्षक तले कमलनाथ की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है, जिसकी आखिरी लाइन कहती है, ‘कमलाथ के नेतृत्व में कांग्रेस कमेटी ने मध्यप्रदेश में शानदार विजय हासिल की।’ इसे टाइपिंग त्रुटि कहा जा सकता है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या पहली गलती से सबक लिया गया? यदि लिया गया होता तो एक-एक शब्द को ध्यान से पढ़ा जाता और तब शायद कमलनाथ को पुन: अपना सिर नहीं पकड़ना पड़ता।

आमतौर पर कोई विज्ञापन जारी करने से पहले उसकी कई बार प्रूफरीडिंग की जाती है तो फिर मुख्यमंत्री से जुड़े विज्ञापन को पुन: जांचना कांग्रेसियों को क्यों याद नहीं रहा, यह समझ से परे है। बहरहाल यह आपसी साजिश है या भूल, ये कांग्रेस का आंतरिक मामला है, पर इतना तय है कि कमलनाथ ने ऐसा जन्मदिन पहले कभी नहीं मनाया होगा और न ही भविष्य में मनाना चाहेंगे।

विज्ञापन में हुई इस गलती को आप यहां देख सकते हैं- 

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कमलनाथ के बर्थडे विज्ञापन पर छपा 'भूल सुधार', उड़ा खूब मजाक

आज संबंधित अखबारों में भूल सुधार के साथ संशोधित विज्ञापन प्रकाशित किया गया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 19 November, 2019
Last Modified:
Tuesday, 19 November, 2019
Kamal Nath

विज्ञापनों से तौबा करने वाली मध्यप्रदेश कांग्रेस ‘विज्ञापन’ को लेकर ही घिर गई है। सोशल मीडिया पर पार्टी का जमकर मजाक बनाया जा रहा है। भाजपा नेताओं को तो जैसे बैठे-बैठाए कांग्रेस पर ‘तीर’ चलाने का मौका मिल गया है और वे इस मौके को बखूबी भुना रहे हैं।

वैसे, इस मामले में ठीकरा विज्ञापन जारी करने वाली एजेंसी के माथे पर फोड़ दिया गया है। आज संबंधित अखबारों में संशोधित विज्ञापन प्रकाशित किया गया है और ‘भूल सुधार’ के माध्यम से बाकायदा यह साफ करने का प्रयास किया गया है कि ‘गलतियों’ का विज्ञापनदाता यानी मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी से कोई लेना देना नहीं है। वैसे, ये समझना मुश्किल है कि नेताओं ने बिना जांचे-परखे ही विज्ञापन को हरी झंडी कैसे दिखा दी? वो भी तब जब विज्ञापन मुख्यमंत्री कमलनाथ के जन्मदिन से जुड़ा हो।

दरअसल, 18 नवंबर को कमलनाथ का जन्मदिन था, इस उपलक्ष्य में कांग्रेस नेताओं की तरफ से लगभग सभी अखबारों में फुल पेज विज्ञापन दिए गए। ऐसा ही एक विज्ञापन मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी की तरफ से जारी किया गया, जिसमें कमलनाथ के जीवन से जुड़ी कुछ बातों पर प्रकाश डाला गया। जन्मदिन जैसे मौकों पर फोकस ‘अच्छी बातों’ पर रहना चाहिए, लेकिन विज्ञापन में कुछ ऐसी बातें भी शामिल हो गईं, जिन्हें पढ़ने के बाद तारीफ से ज्यादा कटाक्ष या तंज का अहसास हुआ।

मसलन- (1) सन 1993 में कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने की चर्चा थी। बताया जाता है कि तब अर्जुन सिंह ने दिग्विजय सिंह का नाम आगे किया और इस तरह कमलनाथ उस वक्त सीएम बनने से चूक गए। अब 25 साल बाद दिग्विजय के समर्थन से उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। (2) छिंदवाड़ा से कमलनाथ को 1996 में हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें सुंदरलाल पटवा ने चुनाव मैदान में पटखनी दी थी।

(3) आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार के दौरान संजय गांधी को एक मामले में कोर्ट ने तिहाड़ जेल भेजा था। तब इंदिरा संजय की सुरक्षा को लेकर चिंतित थीं। कहा जाता है कि तब कमलनाथ जानबूझकर एक जज से लड़ पड़े और जज ने उन्हें सात दिन के लिए तिहाड़ भेज दिया। वहां वे संजय गांधी के साथ ही रहे।’         

विज्ञापन की चर्चा आम होते ही भाजपा नेता अपने शाब्दिक ‘अस्त्रों’ को लेकर मोर्चे पर आ गए और कांग्रेस को निशाना बनाना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर भी कांग्रेस को घेरा गया। इतना सब होने के बाद जाहिर है कि खलबली मचनी थी। कांग्रेस नेता पहले खामोशी साधे रहे फिर डैमेज कंट्रोल के लिए सामने आये।

वरिष्ठ नेताओं द्वारा कहा गया कि कांग्रेस कमेटी ने विज्ञापन जारी नहीं किया है, लेकिन आज के संबंधित अखबारों में विज्ञापन के नीचे प्रकाशित ‘भूल सुधार’ उनके ही दावे को गलत साबित कर रहा है। ‘भूल सुधार’ में लिखा गया है, ‘एजेंसी की गलती के कारण 18 नवंबर के अंक में कुछ त्रुटिपूर्ण पंक्तियां प्रकाशित हो गई थीं। इसका विज्ञापनदाता से कोई लेना-देना नहीं है। इसका हमें खेद है, भूल सुधार करते हुए विज्ञापन दोबारा प्रकाशित किया जा रहा है’। अब भले ही ‘गलती’ का ठीकरा किसी के सिर भी फोड़ा जाए, फजीहत तो कांग्रेस की हो ही गई है। कमलनाथ पर अपनों से मिली इन ‘शुभकामनाओं’ का क्या असर हुआ होगा,  समझा जा सकता है।

ऐसे ही एक अखबार में छपे भूल सुधार को आप यहां देख सकते हैं।

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ASCI: जांच में भ्रामक निकले इन बड़ी कंपनियों के विज्ञापन

टीवी पर आने वाले विज्ञापनों की प्रमाणिकता की जांच करती है भारतीय विज्ञापन मानक परिषद

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 October, 2019
Last Modified:
Wednesday, 23 October, 2019
ASCI

टीवी पर आने वाले विज्ञापनों की प्रमाणिकता की जांच करने वाली संस्था 'ऐडवर्टाइजिंग स्‍टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया' (ASCI) ने जुलाई में 489 विज्ञापनों की जांच की। ‘एएससीआई’ द्वारा इस बारे में सूचित किए जाने के बाद 151 एडवर्टाइजर्स ने अपने विज्ञापनों को हटा लिया। इसके बाद ‘एएससीआई’ की ‘कंज्यूमर कंप्लेंट्स काउंसिल’ (CCC) ने 338 विज्ञापनों का मूल्यांकन किया और 299 शिकायतों को सही ठहराते हुए जांच के लिए रोका गया।

इन 299 विज्ञापनों में 201 एजूकेशन सेक्टर के, 59 हेल्थकेयर सेक्टर के, नौ पर्सनल केयर के, चार फूड और बेवरेज सेक्टर के और 26 अन्य कैटेगरी के थे। इन सभी विज्ञापनों में ‘एएससीआई’ की गाइडलाइंस का पालन नहीं किया गया था। इन सभी को भ्रामक विज्ञापनों की श्रेणी में रखा गया।  

स्‍वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई (SUO MOTO ACTION)

‘ASCI’ की प्रिंट और टीवी मीडिया सर्विलॉन्‍स ने ‘नेशनल ऐडवर्टाइजिंग मॉनीटरिंग सर्विसेज प्रोजेक्‍ट’ (NAMS) द्वारा स्‍वत: संज्ञान लेकर कुछ विज्ञापनों को जांच के लिए रोका गया। इसके त‍हत 409 विज्ञापनों में से 128 मामले तुरंत निपटा दिए गए। इनमें एडवर्टाइजर्स ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद ये विज्ञापन हटा दिए गए थे। बाकी बचे विज्ञापनों की ‘CCC’ द्वारा जांच की गई और 278 विज्ञापनों के खिलाफ शिकायतों को बरकरार रखते हुए जांच के लिए रोका गया। इन 278 विज्ञापनों में 193 एजुकेशन सेक्टर के, 59 हेल्थ केयर सेक्टर के, सात पर्सनल केयर कैटेगरी के और 19 अन्य कैटेगरी के थे।  

फूड और बेवरेज कैटेगरी में एएससीआई ने जिन विज्ञापनों को भ्रामक पाया है, उनमें ‘ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन कंज्यूमर हेल्थकेयर लिमिटेड’ (हॉर्लिक्स प्रोटीन प्लस) का नाम भी शामिल है। वहीं ‘रसना इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ (Rasna Insta EnerG) के टीवी विज्ञापन के दावे को भी फर्जी पाया गया है। यदि पर्सनल केयर कैटेगरी की बात करें तो ‘जायडस वेलनेस लिमिटेड’ (नायसिल) का नाम भी इस लिस्ट में शामिल है। इस विज्ञापन में दावा किया गया है कि यह पाउडर कीटाणुओं का तुरंत खात्मा करता है और तीन दिन में इसके परिणाम दिखने लगते हैं। यह विज्ञापन भी भ्रामक पाया गया। क्योंकि इसमें किसी भी तरह के मार्केट रिसर्च डाटा को नहीं दिखाया गया है।

इसके साथ ही अन्य कैटेगरी में हैवेल्स इंडिया लिमिटेड (Lloyd AC) और ‘कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के दावे भी भ्रामक मिले। हैवेल्स इंडिया लिमिटेड के विज्ञापन में जहां दावा किया गया था कि उनका ए.सी 45 सेकेंड में 18 डिग्री सेल्सियस तापमान कर देता है, जबकि कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने पर्किंसन बीमारी के इलाज में अग्रणी होने का दावा किया था, लेकिन इससे संबंधित कोई सबूत नहीं दे सके।

वहीं, ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ (Zee Educare) के विज्ञापन में इसे देश का सबसे बड़ा एजुकेशन फेस्टिवल (India's Largest Education Festival) होने का दावा किया गया है, जो सही नही है। जांच में पता चला कि वर्ष 2019 में देश में कई करियर, एजुकेशन और ट्रेनिंग ट्रेड सो हुए। ऐसे में एडवर्टाइजर्स ऐसा कोई भी तुलनात्मक डाटा उपलब्ध नहीं करा सका, जिससे इसके दावे की पुष्टि हो।

टाइम्स इंटरनेट लिमिटेड (TOI App) के प्रिंट विज्ञापन में इसे देश का सबसे ज्यादा भरोसेमंद न्यूज ब्रैंड होने का दावा किया गया है। केवल ‘रॉयटर्स इंस्टीट्यूट इंडिया डिजिटल रिपोर्ट’ (Reuters Institute India Digital News Report) के आधार पर यह दावा उचित नहीं है। यह दावा अस्पष्ट और भ्रामक है। जांच में पता चला कि सर्वे के नमूनों में इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले सिर्फ अंग्रेजी भाषा के न्यूज यूजर्स को शामिल किया गया। ऐसे में ये विज्ञापन ‘एएससीआई’ की गाइडलाइंस का उल्लंघन करते मिले।

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दो कंपनियों के विज्ञापन को लेकर उठे सवाल, कॉस्ट कटिंग का नायाब नमूना है या गलती?

आमतौर पर कंपनियां कम चर्चित मॉडल्स को प्रतियोगी कंपनियों के विज्ञापन में इस्तेमाल करती रहती हैं, लेकिन यहां मामला अलग हो गया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 October, 2019
Last Modified:
Tuesday, 15 October, 2019
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मंदी की आहट के बीच कॉस्ट कटिंग के कई नायाब नमूने देखने को मिलते हैं। एक ऐसा ही नमूना सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि, अभी ये स्पष्ट नहीं हुआ है कि ये वाकई कॉस्ट कटिंग का परिणाम है या फिर गलती हो गई है। दरअसल, टाइम्स ऑफ इंडिया के 13 अक्टूबर के मुंबई संस्करण के पेज 6 पर एलजी कंपनी का विज्ञापन छपा है, जिसमें एक परिवार को दिवाली मनाते दिखाया गया है। इसी तरह पेज 7 पर भी इलेक्ट्रॉनिक एप्लायंस कंपनी व्हर्लपूल का विज्ञापन है।

गौर करने वाली बात ये है कि व्हर्लपूल के विज्ञापन में भी वही परिवार दिवाली मना रहा है जो एलजी के विज्ञापन में है। यानी एक ही परिवार दो अलग-अलग कंपनियों का प्रचार कर रहा है। वैसे ये कोई नई बात नहीं है। आमतौर पर कंपनियां कम चर्चित मॉडल्स को प्रतियोगी कंपनियों के विज्ञापन में इस्तेमाल करती रहती हैं, लेकिन यहां मामला इसलिए अलग हो गया है, क्योंकि दोनों विज्ञापन एक ही दिन एक ही अखबार में प्रकाशित हुए हैं।

मोदी सरकार के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ‘मेरी सरकार (MyGov India)’ के सीईओ रह चुके अरविंद गुप्ता ने दोनों ही विज्ञापनों की कटिंग को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ‘जब एक ही परिवार दो अलग-अलग ब्रैंड, टीवी और माइक्रोवेव का प्रचार कर रहा है।’ गुप्ता के इस ट्वीट को काफी पसंद किया जा रहा है। लोगों ने अपने-अपने अंदाज में विज्ञापन कंपनी पर चुटकी ली है। लवेश नामक यूजर ने लिखा है, ‘परिवार टीवी एलजी से खरीदेगा और माइक्रोवेव व्हर्लपूल से।’ इसी तरह एक अन्य यूजर ने कुछ साल पहले प्रकाशित दो विज्ञापन पोस्ट किये हैं, जिसमें एक ही महिला को रिटेल आउटलेट ‘मोर’ और ‘बिग बाजार’ से खरीदारी करते दिखाया गया है।

संजीवा नामक यूजर ने इसे कंपनी की चालबाजी करार देते हुए लिखा है, ‘विज्ञापन कंपनी एक ही होगी, जिसके पास एलजी और व्हर्लपूल दोनों के विज्ञापन अधिकार होंगे। लागत और बिलिंग कम करके ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए विज्ञापन कंपनी ने एक ही परिवार की फोटो को दो अलग-अलग विज्ञापनों के लिए इस्तेमाल किया है।’

यदि आप दोनों विज्ञापनों को ध्यान से देखें तो व्हर्लपूल के विज्ञापन में फोटो को थोड़ा अलग अंदाज में लगाया गया है, शायद इसलिए कि दिवाली मनाता परिवार एक जैसा न लगे। हालांकि, अरविंद गुप्ता जैसी पारखी नजर रखने वाले इस ‘अंदाज’ में छिपे भेद को पहचान ही गए। आप भी इन दोनों विज्ञापनों को यहां देख सकते हैं।

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‘ZEE’ के पुनीत गोयनका को फिर मिली ये बड़ी जिम्मेदारी

बैठक में एसोसिएशन के कई अन्य पदाधिकारियों का भी किया गया चुनाव

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 01 October, 2019
Last Modified:
Tuesday, 01 October, 2019
Punit Goenka

'जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ (ZEEL) के एमडी और सीईओ पुनीत गोयनका को लगातार दूसरी बार ‘इंटरनेशनल एडवर्टाइजिंग एसोसिएशन’ (IAA) के इंडिया चैप्टर का प्रेजिडेंट चुना गया है। वहीं, ‘डिस्कवरी’ (साउथ एशिया) की एमडी मेघा टाटा को वाइस प्रेजिडेंट के पद पर चुना गया है। इनके अलावा अन्य पदाधिकारियों में जयदीप गांधी (सचिव), प्रदीप द्विवेदी (कोषाध्यक्ष) और रमेश नारायण (पूर्व प्रेजिडेंट) को शामिल किया गया है।

वहीं, मैनेजिंग कमेटी में अनंत गोयनका (इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप), अभिषेक करनानी (फ्री प्रेस जर्नल), जनक सारदा (देशदूत), एमवी श्रेयम्स कुमार (मातृभूमि ग्रुप) और आई वेंकट (इनाडु ग्रुप) को चुना गया है। 

इस मौके पर पुनीत गोयनका ने कहा, ‘इंडस्ट्री के प्रमुख मुद्दों को लेकर आईएए लगातार पूरी तरह से सक्रिय रहेगी। इस प्रतिष्ठित संस्थान के साथ काम करना वाकई काफी अच्छा अनुभव रहा है और अपने दूसरे कार्यकाल में मैं इसके सदस्यों के साथ मिलकर काम करने के लिए पूरी तरह तैयार हूं। इसके साथ ही उनके सहयोग और समर्थन की अपेक्षा के साथ मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं।’
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