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‘पुराने लोग चले जा रहे हैं, नए लोगों के हाथ में बस उनकी थाती रह जा रही है’

पद्मभूषण गीतकार और कवि गोपालदास नीरज का गुरुवार शाम दिल्ली के एम्स में निधन हो गया...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

पद्मभूषण गीतकार और कवि गोपालदास नीरज का गुरुवार शाम दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। उन्हीं की याद में वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म निर्देशक अविनाश दास ने अपनी फेसबुक वाल पर एक पोस्ट लिखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है। उनकी पूरी फेसबुक पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं-

एक गीत था, जिसकी धुन एसडी बर्मन ने गुरु दत्त को सुनाई थी और गुरु दत्त ने उसे ख़ारिज़ कर दिया था। हालांकि अबरार अल्वी को वह धुन पसंद थी। बेशक तब उस धुन में शब्द नहीं डले थे। गोपाल दास नीरज के शब्दों के साथ वह धुन खिल गई और सन 1970 में प्रेम पुजारी फ़िल्म जब रीलीज़ हुई, तो पूरे हिन्दुस्तान के कंठ से यह गीत फूट रहा था-

दुख मेरा दूल्हा है, बिरहा है डोली

आंसू की साड़ी है, आहों की चोली

आग मैं पीऊं रे जैसे हो पानी

ना रे दीवानी हूं पीड़ा की रानी

मनवां ये जले है, जग सारा छले है

सांस क्यों चले है पिया, वाह रे प्यार वाह रे वाह

जी हां, वह गीत था- 'रंगीला रे मेरे रंग में यूं रंगा है तेरा मन, छलिया रे न बुझे है किसी जल से ये जलन' और इस गीत का सुनने वालों पर चले जादू को देखने के लिए गुरु दत्त नहीं थे। वह छह साल पहले सन 1964 में इस दुनिया से विदा ले चुके थे।

बहरहाल, अब से थोड़ी देर पहले जब किसी के स्टैटस से पता चला कि नीरज जी नहीं रहे, तो विश्वास नहीं हुआ। इन दिनों अफ़वाहें भी तो पूरे विश्वास के साथ शेयर होने लगी हैं। ख़ैर, गूगल न्यूज़ पर जाकर पता चला कि ख़बर सच है। मैंने लड़कपन के दिनों में हिंद पॉकेट बुक्स से छपा उनका एक संग्रह ख़रीदा था, जिसमें कई सारे गीत और मुक्तक थे। मुझे आज भी उनका एक मुक्तक याद है-

हंसी जिसने खोजी वो धन ले के लौटा

ख़ुशी जिसने खोजी चमन ले के लौटा

मगर प्यार को खोजने जो गया वो

न तन ले के लौटा न मन ले के लौटा

उनकी ढेर सारी ग़ज़लें और उनके ढेर सारे गीत दीवाने लोगों की ज़बान पर आज भी चढ़ी रहती है। हिंदी सिनेमा के कुछ गीत तो ऐसा लगता है, जैसे जब तक धरती रहेगी, वे गीत अमर रहेंगे। प्रेम पुजारी फ़िल्म में ही एक और गीत है उनका लिखा-

'शोख़ियों में घोला जाए फूलों का शबाब,

उसमें फिर मिलाई जाए थोडी सी शराब,

होगा यूं नशा जो तैयार...

वो प्यार है! प्यार है वो प्यार!!'

कुछ श्रेष्ठ हिंदी गीतों में शामिल है। 1968 में एक फ़िल्म आई थी कन्यादान, जिसका एक गीत मेरे उन किशोर दिनों का साथी रहा है, जब मुझे पहली बार प्यार हुआ था। यह गीत भी नीरज का लिखा हुआ था और इसे सुरों से संवारा था शंकर जयकिशन ने। बोल थे-

'लिखे जो ख़त तुझे, वो तेरी याद में –

हज़ारों रंग के नज़ारे बन गए

सवेरा जब हुआ तो फूल बन गए

जो रात आई तो सितारे बन गए...'

इटावा में पैदा हुए गोपाल दास नीरज मुंबई से लौट कर अलीगढ़ में रहे। गंगा-जमुनी तहज़ीब के हमेशा क़ायल रहे और विचारों में भी बाएं चलने की तरफ़दारी करते रहे। राज कपूर की फ़िल्म मेरा नाम जोकर के लिए यह गीत उन्होंने ही लिखा था-

'ऐ भाई! ज़रा देख के चलो,

आगे ही नहीं पीछे भी,

दाएं ही नहीं बाएं भी,

ऊपर ही नहीं नीचे भी...'

शर्मीली (1971) फ़िल्म का यह मशहूर गाना भी उन्हीं की कलम का कमाल था-

'खिलते हैं गुल यहां, खिल के बिखरने को;

मिलते हैं दिल यहां, मिल के बिछड़ने को'

और ‘प्रेम पुजारी’ यह गाना भी-

'फूलो के रंग से, दिल की कलम से

तुझको लिखी रोज पाती;

कैसे बताऊं किस-किस तरह से

पल-पल मुझे तू सताती...'

और नई उमर की नई फसल (1965) के एक गीत की पंक्ति 'कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे' तो ख़ैर मुहावरे की तरह आज भी लोग अपने भाषणों और व्याख्यानों में इस्तेमाल करते हैं। मुझे गर्व है कि मैंने यह पूरा गीत उनके मुंह से बल्लीमारान (चांदनी चौक, दिल्ली) के एक मुशायरे में पूरा सुना है। उनकी अपनी धुन थी, जो यू-ट्यूब पर खोजने से मिल जाएगा, लेकिन फ़िल्म में इस गीत को संगीतबद्ध किया था रोशन ने और आवाज़ दी थी मोहम्मद रफ़ी ने-

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से

लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे

कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे

अभी थोड़े दिनों पहले बालकवि बैरागी चले गए। वह गोपालदास नीरज से सात साल छोटे थे। पुराने लोग चले जा रहे हैं और नए लोगों के हाथ में बस उनकी थाती रह जा रही है। हम जैसे लोग इन थातियों को बचा पाने के लायक बनें रहें, अगर कोई ईश्वर है, तो उससे बस यही गुज़ारिश है।

कवि गोपालदास नीरज को अंतिम प्रणाम

 (साभार: फेसबुक वाल से)


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