enba 2016: TRP पर क्या बोले पंकज पचौरी, अनुराधा प्रसाद, श्रीनिवासन जैन, राणा यशवंत

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।। टेलिविजन न्यूज के क्षेत्र में बेहतर काम करने वालों को सम्मानित करने के लिए 25 फरवरी को नोएडा के ‘रेडिसन ब्लू’होटल में बहुप्रतिष्ठित ‘एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स (enba) 2016’ का आयोजन किया

Last Modified:
Monday, 06 March, 2017
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समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

टेलिविजन न्यूज के क्षेत्र में बेहतर काम करने वालों को सम्मानित करने के लिए 25 फरवरी को नोएडा के ‘रेडिसन ब्लू’होटल में बहुप्रतिष्ठित ‘एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स (enba) 2016’ का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के दौरान ‘Redefining TRPs: Trust & Respect Points’ थीम पर एक पैनल डिस्कशन (panel discussion) भी किया गया। पैनल डिस्कशन में न्यूज ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री से जुड़े कई बड़े नाम शामिल हुए। वरिष्‍ठ पत्रकार और कमेंटेटर माधवन नारायणन ने इसका संचालन किया।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए नारायणन ने मीडिया के बिजनेस में संतुलित पत्रकारिता की जरूरत पर बल दिया। उन्‍होंने कहा कि मीडिया में ‘लक्ष्‍मी’ और ‘सरस्‍वती’ के बीच तालमेल बनाए रखना चाहिए। इसको अलग-अलग करते हुए उन्‍होंने बताया कि पैसा यानी लक्ष्‍मी और पॉवर यानी पार्वती है। सरस्‍वती से आशय लोगों को विश्‍वसनीय न्‍यूज (credible news) देना है जो कभी-कभी इन दोनों शक्तिशाली ‘देवियों’ के बीच दबकर रह जाती है।

नारायणन की बात के जवाब में ‘बीएजी फिल्‍म्‍स एंड मीडिया लिमिटेड’ (B.A.G. Films & Media Limited) की चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्‍टर अनुराधा प्रसाद का कहना था कि ‘टीआरपी’ (TRPs) और विश्‍वसनीयता (credibility) के बीच सामंजस्‍य जरूरी है। अनुराधा प्रसाद ने कहा कि एक पत्रकार और उद्यमी होने के नाते वे यह कह सकती हैं कि आप क्रेडिबिलिटी के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं।

उनका कहना था, ‘यदि आपके पास पैसे नहीं हैं तो आप किसी भी आर्गनाइजेशन को नहीं चला सकते हैं और यदि आप जब किसी आर्गनाइजेशन को चला ही नहीं सकते हैं तो उस समय क्रेडिबिलिटी के बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।’

कार्यक्रम में सक्रिय पत्रकारिता (active journalism) में वापसी की तैयारी में जुटे मीडिया वेंचर ‘गो न्‍यूज’ (Go News) के संस्‍थापक और एडिटर-इन-चीफ पंकज पचौरी से पीएम ऑफिस में उनके ए‍डवाइजरी रोल को लेकर क्रेडिबिलिटी के बारे में सवाल पूछा गया, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। इस सवाल के जवाब में एनडीटीवी इंडिया के लोकप्रिय शो ‘हम लोग’ के पूर्व प्रजेंटर पंकज पचौरी ने कहा कि क्रेडिबिलिटी का संकट उन्‍हें कभी नहीं रहा। उनसे पहले हरीश खरे और संजय बारू भी प्रधानमंत्री कार्यालय से पत्रकारिता में वापस लौट चुके हैं।

उत्‍तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनावों का उदाहरण देते हुए पंकज पचौरी का मानना था कि जब से चुनावी जंग वॉट्सएप पर शुरू हुई है, तब से अलग तरह की पत्रकारिता हो रही है। अब आप मेनस्‍ट्रीम मीडिया (MSM) में क्‍या कह रहे हैं, इसे कम लोग देख रहे हैं। ऐसे में यह बड़ा कारण है कि क्रेडिबिलिटी घट रही है। पचौरी का यह भी कहना था मेनस्‍ट्रीम मीडिया की बजाय लोगों ने अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के कैंपेन को ऑनलाइन ज्‍यादा फॉलो किया था।

वहीं, पचौरी की बातों से असहमति जताते हुए ‘इंडिया न्‍यूज’ (India News) के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने इस बात को मानने से इनकार कर दिया कि डिजिटल प्‍लेटफार्म पर लोगों की मौजूदगी बढ़ने के कारण मेनस्‍ट्रीम मीडिया की क्रेडिबिलिटी में अपने आप कमी आई है। यशवंत राणा के अनुसार, इन दोनों माध्‍यमों (mediums) में अंतर को अच्‍छे से समझने की जरूरत है।

राणा यशवंत का कहना था, ‘डिजिटल प्‍लेटफार्म टू-वे यानी ‘दो तरफा यातायात’ (two-way traffic) की तरह है जहां पर दोनों तरफ से कम्‍युनिकेशन होता है। जबकि टेलिविजन और प्रिंट ‘एकतरफा यातायात’ (single-way platform) है।’

उन्‍होंने कहा कि अपने पत्रकारिता के कॅरियर में न्‍यूज ब्रॉडका‍स्‍ट इंडस्‍ट्री में काम करते हुए उन्‍होंने ‘ईमानदारी’ (honesty), ‘अखंडता’ (integrity) और ‘विश्‍वसनीयता’ (credibility) को एक सूत्र में बांधकर रखा है। उन्‍होंने स्‍वीकार किया कि टीआरपी को क्रेडिबिलिटी के पैमाने से जोड़कर नहीं देखना चाहिए लेकिन उन्‍होंने इस बात पर भी जोर दिया कि क्रेडिबिलिटी से समझौता करके टीआरपी को लंबे समय तक बनाए नहीं रखा जा सकता है।

 न्यूज बिजनेस (The business of news)

’ मीडिया प्लानर्स की जरूरतों का जिक्र करते हुए अनुराधा प्रसाद ने बताया कि कैसे वे टीआरपी डाटा को लेकर काम करते हैं। अनुराधा के अनुसार, मीडिया प्‍लानर्स को टीआरपी ओर क्रेडिबिलिटी में 75:25 का अनुपात है। टीआरपी की ओर बढ़े इस रुझान के बारे में अनुराधा का कहना था, ‘आखिर मीडिया प्‍लानर्स के लिए क्‍या मापदंड होंगे। क्‍योंकि आप किसी भी व्‍यक्ति की क्रेडिबिलिटी की तुलना दूसरे व्‍यक्ति से कर सकते हैं लेकिन जब बात नंबर गेम की आती है तो इस बारे में कोई सवाल नहीं कर सकता है क्‍योंकि कोई नंबर वन होगा, कोई दो नंबर पर और कोई तीसरे नंबर पर और इसमें फिर सवाल उठाने की गुंजाइश नहीं रह जाती है।’

हालांकि पचौरी ने अनुराधा प्रसाद की इस बात का जोरदार खंडन किया। उन्‍होंने कहा कि सिर्फ कुछ न्‍यूज चैनलों को छोड़कर जो मुश्किल से मुनाफा कमा रहे हैं, देश में अधिकांश न्‍यूज चैनल घाटे में चल रहे हैं। ऐसे समय में जब लोग ज्‍यादा टेलिविजन सेट खरीद रहे हैं, ऐसे में भी अंग्रेजी न्‍यूज में 17 प्रतिशत और हिन्‍दी न्‍यूज में छह प्रतिशत तक की कमी आई है।

टेलिविजन न्‍यूज में 1000-1500 करोड़ रुपये के एडवर्टाइजमेंट की बात करते हुए उन्‍होंने कहा कि टीआरपी में भी काफी बढ़ोतरी हुई। पचौरी के अनुसार, टीआरपी ज्‍यादा होना इस बात की गारंटी नहीं है कि न्‍यूज मीडिया सफल होगा और पैसे कमाएगा, जैसे कि हम ‘टाइम्‍स नाउ’ को देख सकते हैं। चैनल को 11 वर्षों में करीब 545 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। देश में शीर्ष चैनल (top channel) के रूप में इसने पांच साल तक राज किया लेकिन लोग इसके कंटेंट के लिए भुगतान नहीं कर रहे थे।’

इस मौके पर यशवंत राणा ने चैनल की कमाई (revenues) और खर्चों (expenses) के बीच के संबंधों को बेहतर तरीके से समझाने की कोशिश की। उन्‍होंने इस बात पर जोर दिया कि टीआरपी की बात करें तो चैनल नंबर वन की कुर्सी हासिल कर सकता है और इसके अनुसार रेवेन्‍यू भी बढ़ा सकता है लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होगा, जब तक कि यह अपने खर्चों पर लगाम नहीं लगाएगा।

उनका कहना था, ‘यदि आप एक पैसा कमाते हैं और तीन पैसे खर्च करते हैं तो आपका चैनल हमेशा घाटे में रहेगा और इसमें आपकी ही गलती है।’ न्‍यूज बिजनेस के बारे में उनका कहना था कि बिजनेस और न्‍यूज को हमेशा साथ रखकर चलने की जरूरत है।

 स्वच्छंद, राष्ट्रवादी पत्रिका का उदय और न्यूज को एंटरटेनमेंट के रूप में रखना (Rise of opinionated, nationalistic journalism and news as entertainment)

इस परिचर्चा में थोड़ी देर से शामिल हुए ‘एनडीटीवी’ (NDTV) के मैने‍जिंग एडिटर श्रीनिवासन जैन ने हल्‍के-फुल्‍के अंदाज में कहा कि वह सेरेमोनियल मैनेजिंग एडिटर (ceremonial Managing Editor) हैं जो सिर्फ अपने न्यूज शो Truth vs Hype को मैनेज करने के सिवाय कुछ नहीं करते हैं।

न्यूज वेंचर ‘रिपब्लिक’ के संस्‍थापक एवं वरिष्‍ठ पत्रकार अरनब गोस्‍वामी के विवादित स्‍टाइल (controversial style) का जिक्र करते हुए उन्‍होंने सुझाव दिया कि न्‍यूज में हमेशा रिपोर्टिंग और विश्‍लेषण के साथ रखे जाने वाले सुझाव, दोनों के लिए जगह होनी चाहिए लेकिन अरनब गोस्‍वामी ने इस ट्रेंड में बदलाव किया है। उन्‍होंने कहा, ‘समस्‍या यह है कि ‘Newshourification’ ने प्राइम टाइम के बैलेंस को एक तरफ झुका दिया है, जिससे एक तरह की विषमता की स्थिति हो गई है जहां पर आपकी राय को ज्‍यादा तवज्‍जो दी गई है। इस कारण से शाम को सात से रात 11 बजे तक प्राइम टाइम में सिर्फ ओपिनियन ही छाया रहता है। उन्‍होंने कहा कि ओपिनियन ज्‍यादा होने से न सिर्फ इसकी क्‍वॉलिटी में कमी आई बल्कि न्‍यूज शो पर आने वाले गेस्‍ट की क्‍वॉलिटी भी खराब होती है। ऐसे में पत्रकारिता के मूल्‍यों में भी कमी आती है।

इस पर गोस्वामी के बचाव में आते हुए माधवन नारायणन ने स्‍पष्‍ट किया कि गोस्‍वामी सिर्फ ‘theatrics’ होने से कहीं आगे हैं। उन्‍होंने रवीश कुमार के प्रजेंटेशन के स्‍टाइल का हवाला देते हुए कहा कि यह ‘antidote to the Arnab style’ है। उन्‍होंने ‘जनरुचि’ (public interest) की पत्रकारिता करने के लिए अरनब गोस्‍वामी की तारीफ भी की।

कार्यक्रम में राणा यशवंत इस बात से सहमत थे कि किसी भी व्‍यक्ति को अपनी बात रखने का और  किसी से भी संबंध मेंटेन रखने का हक है लेकिन उसे इन बातों की अनुमति कतई नहीं देनी चाहिए जिससे उसकी पत्रकारिता प्रभावित हो। यशवंत ने कहा, ‘जब मैं कोई न्‍यूज कर रहा हूं तो उस समय मुझे सिर्फ एक पत्रकार की तरह होना चाहिए। दिक्‍कत तब आती है जब कोई पत्रकार प्रवक्‍ता (spokespersons) की तरह बात करने लगता है।’

यशवंत ने उन दिनों को भी याद करते हुए कहा कि एक जमाना था जब भारतीय न्‍यूज मीडिया में राखी सावंत और राजू श्रीवास्‍तव छाये रहते थे और हेडलाइंस पर तक अपनी पकड़ रखते थे। उन्‍होंने बताया कि वर्ष 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद इस तरह की चीजों में काफी बदलाव हुआ।

नारायणन द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्‍या पत्रकार को ‘राष्‍ट्रवादी (nationalists) अथवा ‘विचारक’ (thinkers) होना चाहिए, पचौरी ने कहा कि उन्‍हें ‘ग्लोबल’ (global) होना चाहिए क्‍योंकि उन्‍हें सभी जगह से रिपोर्टिंग करनी है।

पुराने समय को याद करते हुए उन्‍होंने कहा कि ‘बीबीसी वर्ल्‍ड सर्विस’ (BBC World Service) में ‘नेशनलिज्‍म’ के लिए कोई स्‍थान नहीं था और 69 देशों में इसके पत्रकार काम कर रहे थे। उसी दौरान ‘आईआरए’ (Irish Republican Army) पर बीबीसी की पॉलिसी को लेकर बीबीसी में हड़ताल हुई थी। पचौरी का कहना था कि इस हड़ताल के कारण बीबीसी वर्ल्‍ड सर्विस के स्‍टूडियो में 48 घंटे के लिए सन्‍नाटा छा गया था।

 न्यूज का भविष्य (The future of news)

पैनल डिस्‍कशन जब समाप्ति की ओर पहुंचा नारायणन ने फाइनेंसियल जर्नलिस्‍ट के रूप में अपने अनुभवों के आधार पर कुछ सुझाव भी दिए। उन्‍होंने न्‍यूज चैनलों के लिए उसी तरह से ‘क्रेडिबिलिटी रेटिंग्‍स’ (credibility ratings) पर बल दिया जैसे फाइनेंसियल मार्केट में बॉन्‍ड या फिक्‍स्‍ड डिपॉजिट रखे जाते हैं। नई-नई टेक्‍नोलॉजी की भूमिका के बारे में बात करते हुए उन्‍होंने सुझाव दिया कि क्रेडिबिलिटी को मापने के लिए कोई तकनीकी युक्‍त किसी प्रणाली पर जोर दिया।

‘ट्रोलिंग’ और ‘ऑनलाइन अब्‍यूज’ (trolling and online abuse) का जिक्र करते हुए जैन ने इस बात पर खेद जताया कि न्‍यूज मीडिया दो भागों में बंट गई है। एक तो ऐसे पत्रकार हैं जो उन पत्रकारों को ट्रोल (troll) करते हैं जिन्‍हें संस्‍थान से सीधा फायदा होता है। उनके शब्‍दों में, ‘partisan journalism’ नया नहीं था लेकिन कुछ लोगों ने दूसरों के मुकाबले इसे ‘better job of concealing it’ बना दिया।

जैन ने कहा, ‘ऐसा कोई भी मामला नहीं हुआ है जब न्‍यूज चैनल और एंकर सरकार के प्रवक्‍ता बन गए हों।’ मुश्किल परिस्थितियों का जिक्र करते हुए उन्होंने रिपोर्ट की गई स्‍टोरी और रिपोर्टर्स की वकालत की। उन्‍होंने कहा कि प्राइम टाइम टेलिविजन किसी भी अखबार के पहले पेज की तरह होता है। हालांकि अखबार के फ्रंट पेज पर लगभग 12 स्‍टोरी होती हैं, प्राइम टाइम में सिर्फ ओपिनियन होते हैं और उन्‍होंने इसमें बदलाव की इच्‍छा जताई। उन्‍होंने उम्‍मीद जताई कि पॉलिटिकल रिपोर्टिंग से न्‍यूज रूम को अलग रखा जाएगा।

यशवंत का मानना था कि एडिटर्स को व्‍यूअर्स की पसंद और उसकी जरूरतों के बारे में अंतर को समझना चाहिए। उनका कहना था कि हालांकि व्‍युअर्स को उनकी पसंद के अनुसार न्‍यूज उपलब्‍ध कराना काफी महत्‍वपूर्ण है लेकिन उनकी जरूरतों का ध्‍यान रखना भी एक पत्रकार की जिम्‍मेदारी होती है। यशवंता का कहना था, ‘आप अपनी टीम के प्रति कितने संवेदनशील हो सकते हैं? एक लीडर के रूप में आप कितने संवेदनशील हो सकते हैं? देश के प्रमुख मुद्दों और लोगों के स्‍वभाव को लेकर आपकी समझ क्‍या है?, यह काफी महत्‍वपूर्ण बात है।’

सोशल मीडिया के उदय से बेफिक्री जताते हुए उन्‍होंने इस बात को मानने से इनकार कर दिया कि ब्रॉडकास्‍ट और प्रिंट का अंत होने वाला है। उनका मानना था कि न्‍यूज मीडिया का भविष्‍य इस बात पर बहुत ज्‍यादा निर्भर है कि पत्रकारों को कितनी एडिटोरियल की आजादी है और एडिटोरियल व सेस टीम के बीच किस तरह के रिश्‍ते हैं।

पचौरी का कहना था कि मीडिया को भी ग्‍लोबल ट्रेंड (global trends) अपनाना होगा। उन्‍होंने कहा कि प्रतिष्ठित विदेशी मीडिया ब्रैंड जैसे- ‘The Guardian’, ‘The New York Times’ और ‘New Yorker’ डिजिटल ऑपरेशंस द्वारा अपने ट्रेडिशनल बिजनेस को आगे बढ़ा रहे हैं, घरेलू मीडिया को भी कुछ नया करना चाहिए।

पचौरी ने कहा कि मेनस्‍ट्रीम मीडिया को अपने खर्चो में कटौती करने के लिए महंगे माइक्रोफोन की खरीद के मुकाबले अपने कर्मचारियों पर कैंची नहीं चलानी चाहिए।

पचौरी का कहना था,  ‘आपको नए-नए विचार लेकर आने होंगे ताकि आप पत्रकारिता की लागत को कम कर सकते हैं और तब आपको टीआरपी, मार्केटिंग और एडवर्टाइजमेंट डिपार्टमेंट का पीछा करने की जरूरत नहीं होगी।’ लोगों के उचित प्रशिक्षण की वकालत करते हुए उन्‍होंने कहा, ‘डिजिटल के आने से चीजें बदलने वाली हैं और न्‍यूज टेलिविजन इंडस्‍ट्री से जुड़े सभी लोगों के लिए यह एक चेतावनी है। किसी भी दिन आपके पैरों के नीचे से चादर खिंच सकती है।’

बता दें कि enba अवॉर्ड 2016 ‘जी राजस्थान न्यूज’  द्वारा powered था।

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अब सभी राजनीतिक दलों में यह 'महामारी' फैल चुकी है: राजेश बादल

भारतीय लोकतंत्र एक चिकने घड़े में तब्दील होता जा रहा है। संवैधानिक व्यवस्थाओं और बहुमत से नेता के चुनाव की परंपरा हाशिये पर जाती दिखाई दे रही है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 22 September, 2021
Last Modified:
Wednesday, 22 September, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदलना ठीक नहीं

भारतीय लोकतंत्र एक चिकने घड़े में तब्दील होता जा रहा है। संवैधानिक व्यवस्थाओं और बहुमत से नेता के चुनाव की परंपरा हाशिये पर जाती दिखाई दे रही है। सभी राजनीतिक दलों में यह महामारी फैल चुकी है।

जिला पंचायतों, प्रदेश विधानसभाओं और संसद के लिए नेता चुनने की प्रक्रिया में प्रदूषण घुलता हुआ देखना विवशता है। हजार साल तक राजशाही का दंश झेल चुके देश में सामंती चरित्र एक बार फिर दाखिल हो चुका है। अब नेता पद का चुनाव निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं करते और न उन्हें वापस घर बैठाने की प्रक्रिया में कोई नुमाइंदा शरीक होता है।

सारा उपक्र म सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया जाता है। इस उद्देश्य से कुछ राज्यों में चुनाव के पहले विधायक दल नेता को आलाकमान के इशारे पर हटाने का सिलसिला इन दिनों चल रहा है। यह अभी जारी है। मतदाता अपने साथ इस ठगी की शिकायत आखिर किस मंच पर करे?

कर्नाटक, उत्तराखंड, गुजरात और पंजाब में मुख्यमंत्रियों को जिस तरीके से हटाया गया, उसकी यकीनन कोई तारीफ नहीं करेगा। इन प्रदेशों के उदाहरण साफ करते हैं कि नेता बदलने के खेल में दोनों शिखर पार्टियां शामिल हैं। जिन दो बड़े दलों को यह देश लोकतांत्रिक कमान सौंपता रहा है, उनमें इस प्रवृत्ति का पनपना गंभीर संकेत देता है।

उत्तराखंड को तो इन दलों ने शर्मनाक प्रयोगशाला बना दिया है। वहां मुख्यमंत्री जाते ही अपने विदाई संदेश की प्रतीक्षा करने लगता है। गंभीर बात इसलिए है कि चार साढ़े चार साल तक एक मुख्यमंत्री सरकार चलाता है, कार्यकाल में वह पार्टी घोषणापत्र के आधार पर मुद्दों का क्रियान्वयन करता है, साढ़े चार बरस वह फसल बोता है, सिंचाई करता है तो उत्पादन क्यों नहीं देखना चाहेगा।

अर्थात मुख्यमंत्री अपने काम का मतदाताओं की नजर में मूल्यांकन भी देखना चाहता है। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। यह कैसे संभव है कि वोटर केवल चेहरा बदल जाने से उस पार्टी को दोबारा वोट दे दे। यदि चार -पांच साल सरकार ने खराब काम किया हो तो परिणाम बुरा ही मिलेगा। यदि येदियुरप्पा या कैप्टन अमरिंदर सिंह पांच से दस साल पार्टी की पतवार थाम सकते हैं तो चुनाव-वैतरणी क्यों पार नहीं लगा सकते?

ताबड़तोड़ हटाने से उनके समर्थकों की उदासीनता अथवा भितरघात का नया मोर्चा खुल जाता है- यह बात आलाकमान को ध्यान में रखनी चाहिए।

वैसे भी भारतीय संवैधानिक ढांचा किसी मुख्यमंत्री को हटाने की वैधानिक प्रक्रिया बताता है। जब मुख्यमंत्री विधायक दल का विश्वास खो दे तो पहले विधायक दल ही नया नेता चुनता है। कुछ दशकों से इस प्रक्रिया के बीच में दल का प्रदेश प्रभारी और आलाकमान का ऑब्जर्वर यानी दूत भी कूद पड़ा है। अब तो वे सीधे बंद लिफाफा लेकर आते हैं और फरमान सुनाते हैं।

कभी-कभी वे सीधे ही राज्यपाल से मिलकर विधायक दल के निर्णय की जानकारी दे देते हैं। यह अनुचित है और स्वस्थ संसदीय परंपरा का हिस्सा नहीं है। यह तो मुख्यमंत्री का अपना अनुशासन है कि वह शिखर नेतृत्व का संदेश पाकर इस्तीफा पेश कर देता है। अन्यथा यदि उसके पास बहुमत हो और वह कोर्ट का दरवाजा खटखटाए तो पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व को लेने के देने पड़ जाएं।

इसके अलावा एक नुकसान और है। आलाकमान ताजे चेहरे के नाम पर अपेक्षाकृत कनिष्ठ और प्रशासनिक अनुभव नहीं रखने वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाता है। जो व्यक्ति पहली बार विधायक चुना गया हो, उसे तो संसदीय प्रक्रिया के बारीक पेंचों की समझ ही नहीं होती। उसके सामने चुनाव होते हैं और वह वोटर को लुभाने के लिए अंधाधुंध असंभव सी घोषणाएं करने लगता है।

इनमें से अधिकतर कभी पूरी नहीं होतीं। वह अफसरशाही पर लगाम भी नहीं लगा पाता और न ही अपने हिसाब से उनका मूल्यांकन कर पाता है। नए मुख्यमंत्री को पद संभाले चार-छह महीने भी नहीं बीतते कि चुनाव तारीखों का ऐलान हो जाता है। आचार संहिता लग जाती है। यानी बबुआ मुख्यमंत्री के लिए कुछ भी करने को नहीं रहता। वोट तो पुराने मुख्यमंत्री के काम या सरकार की छवि पर ही मिलता है।

सियासी अतीत को देखें तो ज्यादातर मामलों में चुनाव पूर्व नेता बदलने का कोई लाभ किसी पार्टी को नहीं मिला है। शरद पवार और सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज भी चुनाव से पहले भेजे जाने पर पार्टी को जिता नहीं सके थे। अलबत्ता सुशील कुमार शिंदे और एकाध अन्य उदाहरण इसका अपवाद हैं। 

इसी तरह मुख्यमंत्री के मनोनयन का ढंग भी लोकतांत्रिक नहीं रहा। उसके लिए आवश्यक रस्मों का पालन होता है, लेकिन वास्तव में नए विधायकों को नेता चुनने की आजादी नहीं होती। अब तो इसे औपचारिक शक्ल भी दे दी गई है। विधायक दल प्रस्ताव पास करता है। उसमें कहा जाता है कि पार्टी का शिखर नेतृत्व या अध्यक्ष जिसे चुनेगा, वह विधायक दल को मंजूर होगा।

राजशाही में राजा ही तो सेनापतियों का चुनाव करता था। यह भी उसी तरह की कार्रवाई है। यह ठीक नहीं है। कोई अपने मत का अधिकार किसी दूसरे को कैसे दे सकता है? नेता चुनने का हक भारत के जन प्रतिनिधित्व कानून ने उसे दिया है। वह किसी अन्य को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। इससे स्वस्थ्य लोकतांत्रिक परंपरा की हत्या होती है।

मान्यता है कि सियासी तीर अक्सर उलट कर लगते हैं। मुझे याद है कि 1980 में अर्जुन सिंह के साथ बहुमत नहीं था। वे कमलनाथ और संजय गांधी की मेहरबानी से मुख्यमंत्री बने थे, जबकि बहुमत शिवभानु सिंह सोलंकी के पास था और जब 1985 में अर्जुन सिंह के नेतृत्व में पार्टी दोबारा जीत कर आई तो शपथ से पहले ही उन्हें पंजाब का राज्यपाल बना दिया गया। अल्पमत के मोतीलाल वोरा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी।

बड़ी पार्टियों पर यह जिम्मेदारी है कि वे संसदीय प्रक्रियाओं की हिफाजत और सम्मान करें। क्षेत्रीय दल तो पहले ही सामंती आचरण कर रहे हैं, उनसे क्या अपेक्षा करें!

(साभार: लोकमत)

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'अजीब भयावह दौर है, दशकों के साथी ईशमधु तलवार भी अपनी अनंत यात्रा पर चले गए'

अजीब सा भयावह दौर है। अब हमारी पीढ़ी का नंबर लग गया। हम लोग इतने बूढ़े हो गए या फिर नियति हमारे प्रति ज्यादा ही क्रूर हो गई।

राजेश बादल by
Published - Friday, 17 September, 2021
Last Modified:
Friday, 17 September, 2021
ishmadhu5454

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अजीब सा भयावह दौर है। अब हमारी पीढ़ी का नंबर लग गया। हम लोग इतने बूढ़े हो गए या फिर नियति हमारे प्रति ज्यादा ही क्रूर हो गई। करीब तीन दशकों के साथी और दोस्त भाई ईशमधु तलवार भी अपनी अनंत यात्रा पर रात को चले गए। दो दिन पहले ही बात हुई थी। नई किताब के बारे में देर तक बतियाते रहे। मैंने हंसते हुए कहा था, आपकी 'रिनाला खुर्द' ने बहुत रुलाया था। इस किताब में खिलखिलाने का अवसर देना। इस बात पर ठहाका लगाकर हंस दिए थे। क्या जानता था कि हंसते-हंसते वे फिर एक बार रुलाने का इंतजाम कर चुके हैं।

कैसे हमारे संपर्क के इकतीस बरस बीते, पता ही नहीं चला। हम सब उत्साह से भरे 1985 के अगस्त महीने में राजेंद्र माथुर के निर्देश पर ‘नवभारत टाइम्स’ का जयपुर संस्करण शुरू करने के लिए एकत्रित हुए थे। मैं वरिष्ठ उपसंपादक था और वे हमारे मुख्य संवाददाता। आम तौर पर हर अखबार में डेस्क और रिपोर्टिंग टीम में तलवारें तनी रहती थीं, लेकिन तलवार जी के साथ कभी ऐसा नहीं हुआ। हमारे सारे उपसंपादक तलवार जी की कॉपी संपादित करने के लिए लालायित रहते थे। क्या मोतियों जैसे शब्द खबरों के बीच चुनते थे और क्या ही शानदार हैंडराइटिंग थी। संपादन के लिए अपना लाल स्याही का निब वाला पेन चलाते तो लगता कि तलवार जी की कॉपी गंदी कर दी। यहां तक कि शीर्षक तक लिखने की इच्छा नहीं होती थी। कभी कुछ गड़बड़ भी हो जाए तो संवाद मुस्कुराते हुए ही होता था। कभी गुस्सा, तनाव या चीखना चिल्लाना होता ही नहीं था। कभी-कभी उनके किसी रिपोर्टर की कॉपी ऐसी होती कि उसे दोबारा लिखने की जरूरत होती तो डेस्क के लोग बचने की कोशिश करते। फिर आखिर तलवारजी पर ही बात पहुंचती। चाहे रात के कितने ही बज जाएं, वे अपनी टेबल से तभी उठते, जब वे दोबारा लिख कर हमें दे देते। जब घर जाते तो टेबल एकदम साफ रहती थी। एक एक विज्ञप्ति पर उनकी नजर रहती और उसमें से खबर निकालने की अद्भुत कला उन्हें आती थी। जयपुर छोड़ने के बाद चाहे भोपाल रहा, दिल्ली रहा या कुछ समय के लिए अमेरिका रहा, उनसे संपर्क वैसा ही गर्मजोशी भरा था।

दो तीन बरस पहले मित्र हरीश पाठक का आंचलिक पत्रकारिता पर एक विस्तृत शोध प्रबंध आया था। इस यज्ञ में तलवार जी और मैंने भी अपनी आहुतियां डाली थीं। चूंकि यह ग्रन्थ राजेंद्र माथुर फेलोशिप के तहत लिखा गया था, इसलिए हम सब जयपुर में एक कार्यक्रम करना चाहते थे। तलवार जी ने इसकी जिम्मेदारी ली और तय किया कि उनके जन्मदिन 7 अगस्त पर कार्यक्रम करेंगे और इसमें राजेंद्र माथुर पर केंद्रित मेरी फिल्म भी दिखाएंगे। कार्यक्रम हुआ और बेहद गरिमामय रहा। रात हमने दावत के दरम्यान संगीतकार दान सिंह के सुरों से सजा गीत- वो तेरे प्यार का गम... सुना। कुछ हम लोगों ने भी सुनाया। लेकिन उस शाम तलवार जी महफिल की शान थे। संगीतकार दान सिंह तो गुमनामी में खो ही गए थे, लेकिन तलवार जी ने उन्हें पुनःप्रतिष्ठा दिलाई। उनका ‘रिनाला खुर्द’ उपन्यास जिसने भी पढ़ा, उसके आंसू निश्चित ही बहे। चाई जी हमेशा तलवार जी के दिल में धड़कती रहीं।

जयपुर के साहित्य उत्सव को उन्होंने इतना ऊंचा शिखर प्रदान किया कि अन्य सारे उत्सव बौने हो गए। तलवार जी के नाम पर कोई आने से न नहीं कर सकता था। पिछले बरस कोरोना के कारण यह उत्सव ऑनलाइन हुआ लेकिन इसने अपनी अलग छाप छोड़ी। तलवार जी! आपके जाने से हम लोग विकलांगों की श्रेणी में आ गए हैं। क्यू में तो लगे थे, मगर नंबर इतनी तेजी के साथ आगे आ रहा है- इसका अहसास नहीं था। राजकुमार केसवानी, कमल दीक्षित, शिव पटेरिया, जीवन साहू, महेंद्र गगन और भी अनेक मित्र बीते दिनों साथ छोड़ गए। वाकई कुछ खालीपन सा आता जा रहा है-

अब नजा का आलम है मुझ पर, तुम अपनी मोहब्बत वापस लो

जब कश्ती डूबने लगती है, तो बोझ उतारा करते हैं   

जाते जाते एक बार गले मिल लेते तो तसल्ली हो जाती। आपने तो चुपचाप अपने अध्ययन कक्ष में बैठे बैठे विदाई ले ली। सब कुछ आपने ठीक किया, पर यह ठीक नहीं किया। अलविदा  दोस्त!

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सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

पेगासस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की उलझन समझ में आने वाली है। हुक़ूमते हिन्द ने अपना उत्तर देने से इनकार कर दिया है। सॉलिसिटर जनरल का एक तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़ा।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 15 September, 2021
Last Modified:
Wednesday, 15 September, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

पेगासस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की उलझन समझ में आने वाली है। हुक़ूमते हिन्द ने अपना उत्तर देने से इनकार कर दिया है। सॉलिसिटर जनरल का एक तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। आम नागरिकों की खुफ़ियागिरी पर जनता में चर्चा नहीं होनी चाहिए। अब सॉलिसिटर जनरल साहब को कोई कैसे समझाए कि यह समूचा  देश उत्तर चाहता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में तो भारतीय मतदाता भी नहीं जानना चाहते। जब एक बार किसी दल को बहुमत से सरकार बनाने का मौक़ा दिया है तो मुल्क़ की हिफाज़त करना भी उसी निर्वाचित सरकार की ज़िम्मेदारी है। एक नागरिक नहीं चाहता कि उनकी हुक़ूमत बताए कि आतंकवादियों से वह कैसे निबट रही है अथवा चीन और पाकिस्तान के षड्यंत्रों का मुक़ाबला कैसे कर रही है? वह तो सिर्फ़ दो तीन जानकारियां चाहता है कि परदेसी जासूसी सॉफ्टवेयर ख़रीदा गया है या नहीं। अगर ख़रीदा गया है तो किस मंत्रालय ने, कितने पैसे में और किन शर्तों पर खरीदा है। यह जानना उसका संविधान प्रदत्त अधिकार है। संसद में इसीलिए पाई पाई का हिसाब रखा जाता है। इसके अलावा संविधान में आम आदमी को अनुच्छेद-21 के तहत दिए गए निजता के अधिकार का उल्लंघन तो नहीं किया गया है? 

अगर इस अदृश्य जासूसी तकनीक से एक पत्रकार, एक राजनेता, एक न्यायाधीश, विपक्षी नेता और सामाजिक कार्यकर्त्ता के घर परिवार, कारोबार और रिश्तेदार की बातें सरकार तक पहुंच रही हैं तो ऐसा क्यों होना चाहिए? यदि इन श्रेणियों में से किसी एक नागरिक की भी खुफ़ियागिरी हुई है तो सरकार को बताना चाहिए कि वह राष्ट्रद्रोही है और उसके सबूत देश की आला अदालत के सामने रख देना चाहिए। खुले तौर पर नहीं रखना चाहते तो बंद लिफ़ाफ़े में अदालत को सौंप दीजिए। फिर माननीय न्यायालय को तय करने दीजिए कि वाकई उस लिफ़ाफ़े में बंद जानकारी को उजागर करना हिन्दुस्तान के हित में नहीं है तो फिर यह देश कभी भी हुकूमत से कोई जवाब तलब नहीं करेगा। अगर अदालत पाती है कि उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है तो उसे सामने लाना राष्ट्रहित में बेहद ज़रूरी है।

भारतीय मतदाता ने अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा टैक्स के रूप में इसलिए सरकारी ख़ज़ाने में जमा नहीं किया है कि उसका दुरूपयोग उसी के विरोध में हो। आख़िर किस देश में ऐसा हो सकता है। कम से कम लोकतंत्र और क़ायदे-क़ानून से चलने वाले किसी राष्ट्र में तो ऐसा नहीं हो सकता।

एक बार कल्पना करिए कि उस अंतर्ध्यान ख़ुफ़िया तकनीक से सरकार अपने किसी एक सर्वर में ये जानकारियां एकत्रित कर ले और वहां से यह लीक हो जाए तो फिर क्या सरकार के हाथों के तोते नहीं उड़ जाएंगे। इसके अलावा इस बात की क्या गारंटी है कि इस सर्वर में मौजूद सूचनाओं की कोई गुप्त कॉपी किसी अन्य देश में नहीं हो रही होगी। पहले भी संसार में ऐसे कई ख़ुलासे हो चुके हैं। अगर उस सूचना भण्डार से कोई जानकारी लीक हो गई तो फिर केंद्र सरकार के हाथ में कुछ नहीं रहेगा। वह अपने ही मतदाताओं के सामने कठघरे में खड़ी हो जाएगी। यही नहीं, इज़रायल समेत संसार के क़रीब एक दर्ज़न देश इसकी औपचारिक जांच कर रहे हैं। यदि उस वैधानिक जांच के दरम्यान किसी चरण में उस देश के अलावा भारत की सूचनाएं भी छप गईं तो कौन मुंह दिखाने के लायक रहेगा? भारत सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट की राय में भारत सरकार के लिए एक बेहद बारीक़ छिपा हुआ सन्देश है। अदालत अपनी परिधि में इससे अधिक कुछ नहीं कह सकती। यदि कुपित होकर शिखर न्यायालय ने कोई निर्णय दिया तो फिर कुछ नहीं बचेगा। अभी भी वक़्त है। हुक़ूमत को समय रहते समझ लेना चाहिए। अन्यथा इतिहास बड़े से बड़े शासक को माफ़ नहीं करता मिस्टर मीडिया !

हैं कहां हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेज़ ख़ां ,मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए

ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए, अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेड़िए    

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

मुश्किल दौर में है अफगानी मीडिया, भारतीय पत्रकारों को आगे आना होगा मिस्टर मीडिया! 

टकराव की स्थिति में पत्रकारिता और सरकार दोनों को नुकसान होगा मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता को कुचलने के नतीजे भी घातक होते हैं!

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'हम नए जमाने में हैं, जहां शिक्षा का ही मूल्य, दीक्षा का नहीं'

आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया। शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 September, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 September, 2021
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया। शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली। बेटे के स्नातक हो जाने की खुशी उनके चेहरे पर टपक रही थी। यह अस्वाभाविक भी नहीं है। एक डिग्री हासिल करने के लिए कई किस्म के जतन करने पड़ते हैं। अपनी जरूरतों और खुशी को आले में रखकर बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है और बच्चा जब सफलतापूर्वक डिग्री हासिल कर ले तो गर्व से सीना तन जाता है। उनके जाने के बाद एक पुराना सवाल भी मेरे सामने आ खड़ा हुआ कि क्या डिग्री हासिल कर लेना ही शिक्षा है? क्या डिग्री के बूते एक ठीकठाक नौकरी हासिल कर लेना ही शिक्षा है? मन के किसी कोने से आवाज आयी ये हो सकता है लेकिन यह पूरा नहीं है। फिर मैं ये सोचने लगा कि बोलचाल में हम शिक्षा-दीक्षा की बात करते हैं तो ये शिक्षा-दीक्षा क्या है? शिक्षा के साथ दीक्षा शब्द महज औपचारिकता के लिए जुड़ा हुआ है या इसका कोई अर्थ और भी है। अब यह सवाल शर्माजी के बेटे की डिग्री से मेरे लिए बड़ा हो गया। मैं शिक्षा-दीक्षा के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए पहले स्वयं को तैयार करने लगा।

एक पत्रकार होने के नाते ‘क्यों’ पहले मन में आता है। इस ‘क्यों’ को आधार बनाकर जब शिक्षा-दीक्षा का अर्थ तलाशने लगा तो पहला शिक्षा-दीक्षा का संबंध विच्छेद किया। शिक्षा अर्थात अक्षर ज्ञान। वह सबकुछ जो लिखा हो उसे हम पढ़ सकें। एक शिक्षित मनुष्य के संदर्भ में हम यही समझते हैं। शिक्षा को एक तंत्र चलाता है इसलिए शिक्षा नि:शुल्क नहीं होती है। विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हासिल करने के लिए हमें उसका मूल्य चुकाना होता है। इस मूल्य को तंत्र ने शब्द दिया शिक्षण शुल्क। यानि आप शिक्षित हो रहे हैं, डिग्री हासिल कर रहे हैं और समाज में आपकी पहचान इस डिग्री के बाद अलहदा हो जाएगी। आप डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार और शिक्षा जैसे अनेक पदों से सुशोभित होते हैं। चूंकि आपकी शिक्षा मूल्य चुकाने के एवज में हुई है तो आपकी प्राथमिकता भी होगी कि आप चुकाये गए मूल्य की वापसी चाहें तो आप अपनी डिग्री के अनुरूप नौकरी की तलाश करेंगे। एक अच्छी नौकरी की प्राप्ति आपकी डिग्री को ना केवल सार्थक करेगी बल्कि वह दूसरों को प्रेरणा देगी कि आप भी शिक्षित हों। यहां एक बात मेरे समझ में यह आयी कि शिक्षित होने का अर्थ रोजगार पाना मात्र है।

अब दूसरा शब्द दीक्षा है। दीक्षा शब्द आपको उस काल का स्मरण कराता है जब डिग्री का कोई चलन नहीं था। शिक्षित होने की कोई शर्त या बाध्यता नहीं थी। दीक्षा के उपरांत नौकरी की कोई शर्त नहीं थी। दीक्षित करने वाले गुरु कहलाते थे। दीक्षा भी नि:शुल्क नहीं होती थी लेकिन दीक्षा का कोई बंधा हुआ शुल्क नहीं हुआ करता था। यह गुरु पर निर्भर करता था कि दीक्षित शिष्य से वह क्या मांगे अथवा नहीं मांगे या भविष्य में दीक्षित शिष्य के अपने कार्यों में निपुण होने के बाद वह पूरे जीवन में कभी भी, कुछ भी मांग सकता था। यह दीक्षा राशि से नहीं, भाव से बंधा हुआ था। दीक्षा का अर्थ विद्यार्थी को संस्कारित करना था।

विद्यालय-विश्वविद्यालय के स्थान पर गुरुकुल हुआ करते थे और यहां राजा और रंक दोनों की संतान समान रूप से दीक्षित किये जाते थे। दीक्षा के उपरांत रोजगार तलाश करने के स्थान पर विद्यार्थियों को स्वरोजगार के संस्कार दिये जाते थे। जंगल से लकड़ी काटकर लाना, भोजन स्वयं पकाना, स्वच्छता रखना और ऐसे अनेक कार्य करना होता था। यह शिक्षा नहीं, संस्कार देना होता था। दीक्षा अवधि पूर्ण होने के पश्चात उनकी योग्यता के रूप में वे अपने पारम्परिक कार्य में कुशलतापूर्वक जुट जाते थे। अर्थात दीक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में संस्कार के बीज बोना, उन्हें संवेदनशील और जागरूक बनाना, संवाद की कला सीखाना और अपने गुणों के साथ विनम्रता सीखाना।

इस तरह हम शिक्षा और दीक्षा के भेद को जान लेते हैं। यह कहा जा सकता है कि हम नए जमाने में हैं और यहां शिक्षा का ही मूल्य है। निश्चित रूप से यह सच हो सकता है लेकिन एक सच यह है कि हम शिक्षित हो रहे हैं, डिग्रीधारी बन रहे हैं लेकिन संस्कार और संवेदनशीलता विलोपित हो रही है। हम शिक्षित हैं लेकिन जागरूक नहीं। हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदार नहीं। शिक्षक हैं लेकिन शिक्षा के प्रति हमारा अनुराग नहीं, पत्रकार हैं लेकिन निर्भिक नहीं। जिस भी कार्य का आप मूल्य चुकायेंगे, वह एक उत्पाद हो जाएगा। शिक्षा आज एक उत्पाद है जो दूसरे उत्पाद से आपको जोड़ता है कि आप नौकरी प्राप्त कर लें। दीक्षा विलोपित हो चुकी है। शिक्षा और दीक्षा का जो अंर्तसंबंध था, वह भी हाशिये पर है। शायद यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का हस हो रहा है क्योंकि हम सब एक उत्पाद बन गए हैं। शिक्षा और दीक्षा के परस्पर संबंध के संदर्भ में यह बात भी आपको हैरान करेगी कि राजनीति विज्ञान का विषय है लेकिन वह भी शिक्षा का एक प्रकल्प है लेकिन राजनेता बनने के लिए शायद अब तक कोई स्कूल नहीं बन पाया है। राजनेता बनने के लिए शिक्षित नहीं, दीक्षित होना पड़ता है। यह एक अलग विषय है कि राजनेता कितना नैतिक या अनैतिक है लेकिन उसकी दीक्षा पक्की होती है और एक अल्पशिक्षित या अपढ़ भी देश संभालने की क्षमता रखता है क्योंकि वह दीक्षित है। विरासत में उसे राजनीति का ककहरा पढ़ाया गया है। वह हजारों-लाखों की भीड़ को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है और यह ककहरा किसी क्लास रूम में नहीं पढ़ाया जा सकता है। शिक्षक दिवस तो मनाते हैं हम लेकिन जिस दिन दीक्षा दिवस मनाएंगे, उस दिन इसकी सार्थकता सिद्ध हो पाएगी।

(लेखक शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

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'कोरोना काल में शिक्षकों की डिजिटल चुनौतियां'

भारत में ऑनलाइन शिक्षा की नई और चुनौतीभरी दुनिया में आवश्यकता, आविष्कार की या कहें कि नवाचार की जननी बन गई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 September, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 September, 2021
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प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान ।।

साल 2020 में ये मार्च का महीना था। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था, जहां सबकी गति मानो थम सी गई थी। भागते-दौड़ते शहर रुक से गए थे। शिक्षा का क्षेत्र अपने सामने गंभीर संकट को देख रहा था। बच्चे हैरान थे, तो अभिभावक परेशान। लेकिन उस दौर में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में स्थित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के 260 शिक्षकों ने जो काम कर दिखाया, वो आज पूरे देश के शिक्षकों के लिए एक मिसाल है। इन शिक्षकों ने दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के पोर्टल पर लगभग 2,192 ऑडियो-वीडियो लेक्चर अपलोड किए। इनमें से प्रत्येक वीडियो को लगभग एक लाख से ज्यादा छात्रों ने देखा। इन शिक्षकों में से अधिकतर ने अपने अध्यापन काल में कभी भी इस तरह की तकनीक का प्रयोग नहीं किया था। डिजिटल शिक्षा की तरफ बढ़ते भारत के कदमों की ये पहली आहट थी।

भारत में ऑनलाइन शिक्षा की नई और चुनौतीभरी दुनिया में आवश्यकता, आविष्कार की या कहें कि नवाचार की जननी बन गई है। भारत में शिक्षा विशेषज्ञ लंबे अरसे से ब्लैकबोर्ड और चॉक की जगह स्क्रीन और कीबोर्ड को देने की सिफारिश करते रहे हैं, पर इस दिशा में हम कभी भी ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए। लेकिन शायद हमें इस मामले में कोरोना को धन्यवाद देना चाहिए, क्योंकि कोविड ने भारत में डिजिटल शिक्षा को एक नया आयाम दिया है। आज जब सोशल डिस्टेंसिंग नया नियम बन गई है, कक्षाओं में शारीरिक निकटता ने जानलेवा खतरा पैदा कर दिया है, स्कूल और शिक्षक सभी ऑनलाइन पढ़ाई के इस दौर में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं, तो शिक्षा के शब्दकोष में डेस्क, कुर्सी और पेंसिल की जगह तेजी से कंप्यूटर और कनेक्टिविटी लेते जा रहे हैं।

ऑनलाइन शिक्षा का मतलब केवल डिलिविरी मॉडल बदलना नहीं है। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके शिक्षक, अवधारणाओं को असरदार ढंग से समझाते हुए पढ़ाई को ज्यादा दिलचस्प बना सकते हैं। टेक्नोलॉजी और डेटा उन्हें फौरन फीडबैक देता है। वे विश्लेषण कर सकते हैं कि छात्र क्या चाहते हैं, उनके सीखने के पैटर्न क्या हैं और इस के आधार पर वे छात्रों की जरुरत के हिसाब से तैयारी कर सकते हैं। ‘अमेरिकन इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च’ की एक रिपोर्ट के अनुसार आमने-सामने पढ़ाई में छात्र जहां 8 से 10 फीसदी बातें याद रख पाते हैं, वहीं ई-लर्निंग ने याद रखने की दर बढ़ाकर 25 से 60 फीसद तक कर दी है। टेक्नोलॉजी छात्रों को सीखने के लिए प्रेरित करती है और शर्मिंदगी या संगी-साथियों के दबाव से मुक्त फीडबैक देती है। असल कक्षाओं की तरह छात्रों को यहां नोट्स नहीं लेने पड़ते और वे शिक्षक की बातों पर ज्यादा ध्यान दे पाते हैं।

ऑनलाइन शिक्षा की शुरुआत, उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात बढ़ाने में भी भारत की मदद कर सकती है। सकल नामांकन अनुपात का अर्थ है कि कितने प्रतिशत विद्यार्थी कॉलेज और विश्वविद्यालय में एडमिशन लेते हैं। 18 से 23 वर्ष के छात्रों की अगर बात करें, तो इस स्तर पर भारत का नामांकन अनुपात लगभग 26 फीसदी है, जबकि अमेरिका में ये आंकड़ा 85 फीसदी से भी ज्यादा है। एक अनुमान के मुताबिक अगर हमें 35 फीसदी के नामांकन अनुपात तक भी पहुंचना है, तो अगले पांच सालों में हमें कॉलेज में 2.5 करोड़ छात्र बढ़ाने होंगे। और इसके लिए हर चौथे दिन एक नया विश्वविद्यालय और हर दूसरे दिन एक नया कॉलेज खोलना होगा। जो लगभग असंभव सा प्रतीत होता है, लेकिन ऑनलाइन क्लासेस से ये सब संभव है।

 हालांकि भारत में ऑनलाइन शिक्षा की अभी भी कुछ दिक्कते हैं। वैश्विक शिक्षा नेटवर्क ‘क्यूएस’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में इंटरनेट का बुनियादी ढांचा अभी ऑनलाइन लर्निंग को सक्षम बनाने के लिए तैयार नहीं है। ‘इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 के अंत तक भारत में इंटरनेट के लगभग 45 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स थे और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के मामले में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर था। शिक्षा पर वर्ष 2018 के ‘नेशनल सैंपल सर्वे’ की रिपोर्ट के अनुसार, 5 से 24 साल की उम्र के सदस्यों वाले सभी घरों में से केवल 8 प्रतिशत के पास ही कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन है। ‘नीति आयोग’ की वर्ष 2018 की रिपोर्ट भी ये कहती है कि भारत के 55,000 गांवों में मोबाइल नेटवर्क कवरेज नहीं है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में छात्रों के बीच डिजिटल पहुंच की विविधता पर भी प्रकाश डाला गया है। इस सर्वेक्षण में शामिल लगभग 2500 छात्रों में से 90 प्रतिशत छात्रों का कहना था कि उनके पास मोबाइल फोन तो है, लेकिन केवल 37 प्रतिशत ने ही कहा कि वे ऑनलाइन क्लासेज से जुड़ सकते हैं। शेष छात्रों का कहना था कि कनेक्टिविटी, डेटा कनेक्शन की लागत या बिजली की समस्याओं के कारण वे ऑनलाइन क्लासेज से नहीं जुड़ पा रहे थे। इसके अलावा ऑनलाइन परीक्षाएं भी बड़ा मुद्दा है। ‘कैंपस मीडिया प्लेटफॉर्म’ द्वारा 35 से अधिक कॉलेजों के 12,214 छात्रों के बीच किए गए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में पाया गया कि 85 प्रतिशत छात्र ऑनलाइन परीक्षाओं से खुश नहीं थे, 75 प्रतिशत के पास उन कक्षाओं में भाग लेने या परीक्षाओं के लिए बैठने के लिए लैपटॉप नहीं था, जबकि 79 प्रतिशत के पास हाईस्पीड वाला ब्रॉडबैंड नहीं था। लगभग 65 प्रतिशत ने कहा कि उनके पास अच्छा मोबाइल इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध नहीं है, जबकि लगभग 70 प्रतिशत ने दावा किया कि उनके घर ऑनलाइन परीक्षा देने के लिए अनुकूल नहीं थे। यानी इस डिजिटल खाई को पाटने के लिए अभी हमें और मेहनत करने की जरुरत है।

सरकार इस दिशा में कई प्रयास भी कर रही है। ‘नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क’, जिसे अब ‘भारत नेटवर्क’ कहा जाता है, का उद्देश्य 40,000 करोड़ रुपए से अधिक की लागत के साथ देश की सभी 2,50,000 पंचायतों को आपस में जोड़ना है। भारत नेट के माध्यम से सरकार की, प्रत्येक ग्राम पंचायत में न्यूनतम 100 एमबीपीएस बैंडविड्थ प्रदान करने की योजना है, ताकि ऑनलाइन सेवाओं को ग्रामीण भारत के सभी लोगों तक पहुंचाया जा सके। इस नेटवर्क को स्थापित करने का कार्य पूरा हो जाने के बाद यह संरचना न केवल एक राष्ट्रीय संपत्ति बन जाएगी, बल्कि नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास की दिशा में एक गेम चेंजर भी साबित होगी। इसके अलावा ‘नेशनल नॉलेज नेटवर्क’ अखिल भारतीय मल्टी-गीगाबिट नेटवर्क है, जो भारत में कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और अनुसंधान को बढ़ावा देता है तथा अगली पीढ़ी के एप्लीकेशन्स और सेवाओं के निर्माण में सहायता देता है। नेशनल नॉलेज नेटवर्क का उद्देश्य ज्ञान बांटने और सहयोगात्मक अनुसंधान की सुविधा के लिये एक हाई स्पीड डाटा कम्युनिकेशन नेटवर्क के साथ उच्च शिक्षा और शोध के सभी संस्थानों को आपस में जोड़ना है।

नई शिक्षा नीति में भी ये कहा गया है कि डिजिटल खाई को पाटे बिना ऑनलाइन शिक्षा का लाभ उठा पाना संभव नहीं है। ऐसे में ये जरूरी है कि ऑनलाइन और डिजिटल शिक्षा के लिए तकनीक का उपयोग करते समय समानता के सरोकारों को नजरअंदाज ना किया जाए। शिक्षा नीति में तकनीक के समावेशी उपयोग यानि सबको साथ लेकर चलने की बात कही गई है, ताकि कोई भी इससे वंचित ना रहे। इसके अलावा शिक्षकों के प्रशिक्षण की बात भी नई शिक्षा नीति में कही गई है, क्योंकि ये जरूरी नहीं कि जो शिक्षक पारंपरिक क्लासरूम शिक्षण में अच्छा है, वो ऑनलाइन क्लास में भी उतना ही बेहतर कर सके। कोविड महामारी ने साफ कर दिया है कि ऑनलाइन कक्षाओं के लिए के लिए ‘टू-वे वीडियो’ और ‘टू-वे ऑडियो’ वाले इंटरफेस की सख्त जरूरत है।

कोरोना के पहले यह माना जाता था कि ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली का हर स्तर पर सीमित तथा सहयोगात्मक उपयोग ही होगा, क्योंकि डिजिटल कक्षा और भौतिक कक्षा कभी भी समकक्ष नहीं हो सकते हैं। खेल कंप्यूटर पर भी खेले जाते हैं, मगर स्क्रीन कभी भी खेल के मैदान का विकल्प नहीं बन सकती है। खेल के मैदान पर जो संबंध बनते हैं और जो मानवीय मूल्य सीखे और अन्तर्निहित किये जाते हैं, वह मैदान की विशिष्टता है, उसका विकल्प अन्यत्र नहीं है। इसी तरह अध्यापक और विद्यार्थी का आमने-सामने का संपर्क जिस मानवीय संबंध को निर्मित करता है, वह आभासी व्यवस्था में संभव नहीं होगा। लेकिन डिजिटल शिक्षा ने सब कुछ बदल दिया है। डिजिटल साक्षरता के जरिए बच्चे अपने आसपास की दुनिया से बातचीत करने के लिए टेक्नोलॉजी का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सीख सकते हैं। बच्चे की जिंदगी में अहम बदलाव लाने में डिजिटल शिक्षा से कई फायदे होते हैं, जैसे मोटर स्किल्स, निर्णय क्षमता, विजुअल लर्निंग, सांस्कृतिक जागरुकता, बेहतर शैक्षिक गुणवत्ता और नई चीजों की खोज। ये सब शिक्षा को इंटरेक्टिव बनाते हैं। सीखना बुनियादी तौर से एक सामाजिक गतिविधि है। इसीलिए बच्चों को ऑनलाइन नेटवर्क से जुड़ने से रोकने के बजाय, हमें उन्हें सुरक्षा के साथ सीखने के लिए प्रोत्सहित करना चाहिए। क्योंकि डिजिटल शिक्षा अब हमारे जीवन का एक अंग बन चुकी है।

शिक्षा में सूचना एवं संचार का प्रयोग, तकनीक के विकास एवं क्रांति का युग है। हर दिन नई-नई तकनीकों तथा माध्यमों का विकास किया जा रहा है। डिजिटल शिक्षा सभी वर्गों के लिये आज शिक्षा का एक आनंददायक साधन है। विशेष रूप से बच्चों के सीखने के लिये यह बहुत प्रभावी माध्यम साबित हो रहा है, क्योंकि ऑडियो-वीडियो तकनीक बच्चे के मस्तिष्क में संज्ञानात्मक तत्त्वों में वृद्धि करती है और इससे बच्चों में जागरुकता, विषय के प्रति रोचकता, उत्साह और मनोरंजन की भावना बनी रहती है। इस कारण बच्चे सामान्य की अपेक्षा अधिक तेज़ी से सीखते हैं। डिजिटल लर्निंग में शामिल इंफोटेंमेंट संयोजन, इसे हमारे जीवन एवं परिवेश के लिये और अधिक व्यावहारिक एवं स्वीकार्य बनाता है।

अंग्रेजी में एक कहावत है Technology knocks at the door of students यानी तकनीक अब छात्रों के घर पहुंच रही है। आधुनिक कम्प्यूटर आधारित तकनीक ने न केवल शैक्षिक प्रसार के स्वरूप को परिमार्जित किया है, बल्कि तकनीक के समावेशन की प्रक्रिया को जन्म देकर, शिक्षा के क्षेत्र को एक प्रामाणिक व सर्वसुलभ आयाम प्रदान किया है। तकनीक के विकास से शिक्षा के क्षेत्र में हम जिस क्रांति की कल्पना करते थे, आज कंप्यूटर आधारित तकनीक ने इस कल्पना को साकार करके शैक्षिक क्षेत्र में नये युग का सूत्रपात किया है। हमारे लिए यही मौका है कि हम शिक्षा को अनुभव-आधारित और अनुसंधान-उन्मुख बनाएं, बजाए इसके कि छात्रों को परीक्षा के लिए रट्टा लगाना सिखाएं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि छात्रों को चरित्र निर्माण की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। इसलिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि शिक्षा सिर्फ पढ़ाई-लिखाई और डिग्री भर न रह जाए, बल्कि मानवीय मूल्यों और संस्कारों से युक्त शिक्षा हमारे विद्यार्थियों को बेहतर इंसान भी बनाए।

भविष्य की शिक्षा में तकनीक का हस्तक्षेप बढ़ेगा और अनेक अनजाने तथा अनदेखे विषय अध्ययन के क्षेत्र में आएंगे। बावजूद इसके हमें परंपरागत एवं तकनीक आधारित शिक्षा पद्धति के बीच संतुलन बनाकर अपनी शिक्षा व्यवस्था को लगातार परिष्कृत करना होगा। वर्तमान सदी इतिहास की सबसे अनिश्चित तथा चुनौतीपूर्ण परिवर्तनों की सदी है। इसलिए भविष्य की अनजानी चुनौतियों को ध्यान में रखकर हमें स्वयं को तैयार करना होगा। आने वाले समय में केवल एक विषय के ज्ञान से हमारा भला नहीं हो सकता है, इसलिए हमें हर विषय की जानकारी को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाना होगा। सरकार का पूरा प्रयास है कि वह इस दिशा में भविष्यवादी दृष्टि के अनुरूप सुधार तथा बदलाव करती रहेगी। ऐसा करके ही हम शिक्षा के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं और भविष्य की शिक्षा को समय के अनुरूप बना सकते हैं।

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'चंदन' से जुड़ी इन बातों को याद कर भावुक हुए इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा

मेरे जहन में चंदन मित्रा को लेकर जो पहली याद है वह कॉलेज के एक टॉपर के तौर पर है, जो हमेशा अपनी किताबों के साथ नजर आते थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 September, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 September, 2021
Chandan545454

वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व राज्यसभा सदस्य चंदन मित्रा का बुधवार (1 सितंबर 2021) की देर रात दिल्ली में निधन हो गया था। करीब 65 वर्षीय चंदन मित्रा कुछ समय से बीमार चल रहे थे। चंदन मित्रा ‘द पायनियर’ (The Pioneer) के संपादक भी थे, लेकिन इस साल जून में उन्होंने इस अखबार के प्रिंटर और पब्लिशर के पद से इस्तीफा दे दिया था। चंदन मित्रा दो बार राज्यसभा सदस्य रहे थे। पहली बार वह अगस्त 2003 से अगस्त 2009 तक राज्यसभा सदस्य रहे, फिर भारतीय जनता पार्टी ने 2010 में उन्हें मध्यप्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनाया था। इसके बाद वर्ष 2018 में चंदन मित्रा ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी (TMC) जॉइन कर ली थी।

चंदन मित्रा के निधन पर इंडिया टीवी के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा ने दुख जताया और उनसे जुड़ी कुछ यादें ताजा कीं, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं-

मेरे जहन में चंदन मित्रा को लेकर जो पहली याद है वह कॉलेज के एक टॉपर के तौर पर है, जो हमेशा अपनी किताबों के साथ नजर आते थे। कॉलेज के दिनों में, वह हर विषय का बहुत गहराई से अध्ययन करते थे और उनका ज्ञान अकसर मुझे हैरत में डाल देता था। उन्हें तमाम विषयों पर बात करते हुए सुनना हमेशा अच्छा लगता था।

चंदन की पढ़ाई का तरीका अनोखा था। वह ज्यादातर दिल्ली विश्वविद्यालय में ऊपर कॉफी हाउस के एक कोने में किताबों का ढेर, एक कप ब्लैक कॉफी और कंपनी की सिगरेट के साथ बैठते थे। मैं सोचता था कि इतने शोर-शराबे वाली जगह पर कोई कैसे पढ़ सकता है, लेकिन चंदन मित्रा करते थे।

उनकी हमेशा से राजनीति में रुचि थी। मैं भी छात्र राजनीति में इसलिए आया क्योंकि अरुण जेटली से मेरी दोस्ती थी, जो उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) के अध्यक्ष थे। चंदन सेंट स्टीफंस कॉलेज के छात्र थे, जो दिल्ली विश्वविद्यालय से एफिलेटेड नहीं था। लेकिन फिर भी हम मिलते और राजनीति पर चर्चा करते थे। उन दिनों जयप्रकाश नारायण छात्र आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे थे और पूरे देश में कांग्रेस विरोधी लहर थी। चंदन सरकार की तानाशाही की आलोचना करने में बहुत मुखर थे। चंदन के साथ, हम अकसर उनके स्कूल के दोस्त स्वप्रसाद गुप्ता से भी मिलते थे। दोनों ही इतिहास के अच्छे जानकार थे और मेरे लिए तो दोनों ही ज्ञान के भंडार थे। समय के साथ, हमारी दोस्ती और मजबूत होती गयी, लेकिन हमारी दोस्ती कैसे शुरू हुई इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प कहानी है।

सेंट स्टीफंस में चंदन का एक दोस्त मिरांडा हाउस कॉलेज की एक लड़की से प्यार करता था। लड़की राजस्थानी राजपूत और लड़का बंगाली ब्राह्मण था। लड़की का भाई, जो हिंदू कॉलेज का छात्र था। वह इस रिश्ते के खिलाफ था। उसने उस बंगाली लड़के को अपनी बहन को न देखने की धमकी दी थी। लेकिन जब वह लड़का नहीं माना, तो उसका भाई अपने राजपूत दोस्तों के साथ एक दिन उसके हॉस्टल में घुस आए और कमरे में खूब तोड़फोड़ की और लड़की से दूर रहने की धमकी दी। इससे चंदन को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने यह बात मुझे बतायी, तो मैंने कहा कि चिंता मत करो हम भी देख लेंगे। उसी शाम, मैं भी कई लड़कों के साथ हिंदू कॉलेज गया और उन लड़कों को हिदायत दी और उस लड़की के भाई को फिर कभी धमकी न देने की बात कही। यही वह घटना थी, जिससे वास्तव में हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई थी।

एक और दिलचस्प बात थी, जो हम दोनों की दोस्ती की वजह बनी, वह थी हिंदी फिल्मी गानें सुनने को लेकर हमारा शौक। चंदन हिंदी फिल्मी गानों का भंडार थे! हम एक साथ काफी समय बिताते थे और इससे हमारी दोस्ती और मजबूत होती गयी। मैं अकसर उसे 'तुम चंदन, मैं पानी' कहकर चिढ़ाता था।

लेकिन फिर समय बदल गया और 1977 में आपातकाल घोषित कर दिया गया। मुझे और अरुण जेटली को जेल भेज दिया गया। इस वजह से हम बाहरी दुनिया से कट गए। जब हम बाहर निकले तो डर का माहौल था और हम ज्यादा एक्टिव नहीं थे। तब चुनावों की घोषणा हुई और चंदन बहुत उत्साहित थे। उन्होंने जनता पार्टी के लिए बहुत मेहनत की। उनका जुनून काबिले तारीफ था। वह घर-घर जाकर लोगों से जनता पार्टी को वोट देने की अपील करते थे।

इसके बाद चंदन एक पत्रकार बन गए और अखबारों में काम करने लगे। लेकिन फिर भी हम अकसर मिलते थे और देश से जुड़े मुद्दों पर बात करते थे। वह, हमेशा की तरह, इन सभी विषयों की बहुत गहरी समझ रखते थे। अरुण जेटली तब हम दोनों के एक कॉमन फ्रैंड थे और तब तक वह एक प्रसिद्ध अधिवक्ता बन गए थे और राजनीति में भी सक्रिय रूप से शामिल हो थे। धीरे-धीरे चंदन का भी झुकाव पत्रकारिता से ज्यादा राजनीति की ओर होने लगा था। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी सत्ता में आयी, तो अरुण जेटली ने उन्हें राज्यसभा भेजा। वह 10 साल तक उच्च सदन के सदस्य रहे, इस दौरान उन्होंने ‘द पॉयनियर’ को खरीदा और पत्रकारिता में वह एक सम्मानित नाम बन गए।

इस बीच, मैंने भी टेलीविजन पत्रकारिता में प्रवेश किया। हम दोनों तब अपने-अपने काम में बहुत व्यस्त हो गए थे और पहले की तरह नहीं मिल सकते थे। लेकिन मैं स्वप्रसाद से अकसर उनका हालचाल पूछता रहता था। जब भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में तीसरे कार्यकाल के लिए नामित नहीं किया, तो इससे चंदन बहुत परेशान थे। इसलिए वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

दो साल पहले, मुझे पता चला कि उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। मैं उनसे मिलना चाहता था, लेकिन नहीं कर सका क्योंकि कोविड महामारी ने बाहर जाना प्रतिबंधित कर दिया था। मुझे हमेशा इस बात का अफसोस रहेगा कि जब वह अस्वस्थ थे, तो एक बार भी उन्हें नहीं देख पाया। लेकिन दोस्तों की बातचीत में वह हमेशा याद रहेंगे। पत्रकारिता की दुनिया उन्हें उनके योगदान के लिए हमेशा याद करेगी। भारतीय राजनीति में उन्होंने जो शून्य छोड़ा है, वह हमेशा महसूस किया जाएगा।

 

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'कम्युनिटी रेडियो पर विज्ञापन का अनुपात बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू, होगा आर्थिक लाभ'

भारत में 335 कम्युनिटी रेडियो स्टेशन हैं, जिनकी पहुंच देश की लगभग 10 करोड़ आबादी तक है। संकट के समय लोगों को सशक्त बनाने में कम्युनिटी रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 03 September, 2021
Last Modified:
Friday, 03 September, 2021
sanjay325

'भारत में 335 कम्युनिटी रेडियो स्टेशन हैं, जिनकी पहुंच देश की लगभग 10 करोड़ आबादी तक है। संकट के समय लोगों को सशक्त बनाने में कम्युनिटी रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका है। समुदाय एवं उसमें रहने वाले लोगों को जोड़कर ही 'सबका साथ सबका विकास' संभव हो सकता है।' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने सूचना-प्रसारण मंत्रालय व वन वर्ल्ड फाउंडेशन इंडिया द्वारा आयोजित 'कम्युनिटी रेडियो जागरुकता कार्यशाला' के समापन समारोह में व्यक्त किए।

कार्यक्रम में सूचना-प्रसारण मंत्रालय के कम्युनिटी रेडियो सेल के अपर निदेशक गौरीशंकर केसरवानी, वन वर्ल्ड फाउंडेशन इंडिया के प्रबंध निदेशक राजीव टिक्कू और आभा नेगी भी उपस्थित थी।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि हमें ये समझना होगा कि आखिर हमें किसका साथ चाहिए और इससे किसका विकास होगा। उन्होंने कहा कि हमें समुदाय, प्रशासन और सरकार का साथ चाहिये और इससे समाज के उन लोगों का विकास होगा, जिन तक शासन और प्रशासन की पहुंच नहीं है।

प्रो. द्विवेदी के मुताबिक कम्युनिटी रेडियो सिर्फ समस्याओं की और ध्यान नहीं दिलाता, बल्कि उनका समाधान करने का प्रयास भी करता है। कोरोना महामारी के दौर में उत्तराखंड में 6 स्टेशनों ने मिलकर 'एक उम्मीद नेटवर्क' बनाया, जिसके द्वारा कोरोना से बचाव के उपाय लोगों को बताये गए। महामारी के इस दौर में प्रशासन को भी ये एहसास हुआ कि लोगों तक जानकारी पहुंचाने में कम्युनिटी रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि सामुदायिक रेडियो स्टेशन लोगों से उनकी भाषा में संचार करते हैं, जिससे न सिर्फ भाषा के बचाव में योगदान होता है, बल्कि अगली पीढ़ी तक उसका विस्तार भी होता है। कम्युनिटी रेडियो लोकगीतों के माध्यम से न सिर्फ संस्कृति का प्रचार प्रसार करते हैं, बल्कि सरकारी योजनाओं की जानकारी भी लोगों तक पहुंचाते हैं।

आईआईएमसी के महानिदेशक के अनुसार मौजूदा दौर में कम्युनिटी रेडियो पर विज्ञापन का अनुपात 7 मिनट प्रति घंटा है, जिसे बढ़ाकर 12 मिनट प्रति घंटा किये जाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। इस बढ़े हुए समय से कम्युनिटी रेडियो को आर्थिक लाभ होगा और अपने लिए वित्तीय संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा भारत सरकार ने देश में कम्युनिटी रेडियो समर्थन अभियान चला रखा है, जिसके लिए 25 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है। इस अभियान के तहत कम्युनिटी रेडियो स्टेशन की स्थापना का लगभग 75 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार देती है।

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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, क्यों फिसलती जा रही है अमेरिका के हाथ से बाजी

वही हुआ, जिसकी आशंका थी। अमेरिका के लिए अफगानिस्तान गले की हड्डी बनता दिखाई दे रहा है। उसने तालिबान से समझौता तो किया

Last Modified:
Tuesday, 31 August, 2021
Rajeshbadal5454

वही हुआ, जिसकी आशंका थी। अमेरिका के लिए अफगानिस्तान गले की हड्डी बनता दिखाई दे रहा है। उसने तालिबान से समझौता तो किया, लेकिन सेना की वापसी के बाद उस मुल्क के लिए कोई साफ तस्वीर या योजना उसके पास नहीं थी। इसका सीधा सपाट कारण यही नजर आता है कि जो बाइडन के लिए फौजियों की घर वापसी से बड़ा कोई मसला नहीं था। बीस वर्ष वहां कठपुतली सरकार चलाने के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान सरकार को ही कोसना शुरू कर दिया कि जब वे अपने लिए नहीं लड़ सकते तो फिर अमेरिका कब तक उनके लिए लड़ेगा। 

विश्व मंच पर चौधरी की भूमिका निभा रहे ताकतवर देश का यह रवैया न केवल गैर-जिम्मेदाराना है बल्कि मानवता के मसले पर भी अत्यंत चोट पहुंचाता है। इस प्रश्न का अमेरिकी सरकार के पास कोई उत्तर नहीं है कि उसने दो दशक में अफगानी निर्वाचित सरकार को सशक्त क्यों नहीं होने दिया। इसके पीछे उसके कौन से हित छिपे थे? अफगानिस्तान के करोड़ों बेकसूर नागरिकों के इन सवालों का प्रेत अमेरिका पर हमेशा मंडराता रहेगा।

असल में कठोर आलोचक रूस, चीन और ईरान जैसे राष्ट्रों के लिए भी अमेरिका का यह रुख पहेली ही है। जानकार हैरान हैं कि अमेरिका ने अपने तरकश के कूटनीतिक तीरों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। उसने तालिबानियों से यह समझौता तो नहीं ही किया था कि वे बाद में अपनी धरती पर गिल्ली-डंडा खेलेंगे और अशरफगनी की सरकार शांति से राज करती रहेगी। 

वे चाहते तो अपनी सेना के रहते तालिबान और वहां की सरकार के संग मिलीजुली सरकार बनवाते और साल भर पैनी नजर रखते। दूसरा विकल्प यह था कि वे अपनी कमान में संयुक्त प्रशासन परिषद बनाते। परिषद लगातार काम करती तो बीस साल के भूखे तालिबानी सत्ता के स्वाद से परिचित होते और फिर शायद चुनाव आयोग जैसी किसी संस्था में उनका भरोसा जगता (हालांकि यह बहुत मुश्किल था) पर यह सच है कि उस सूरत में अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से करीब साल भर और पिंड नहीं छुड़ा सकती थी। 
राजनीतिक ईमानदारी तो यही कहती है कि बीस वर्ष राज करने के बाद अमेरिका को अफगानिस्तान में समझदारी भरा एक साल और काटना चाहिए था। एक लोकतांत्रिक देश की अनुशासित सेना वहां एक वर्ष और बिता सकती थी।

अमेरिका के ऐसा नहीं करने के दो कारण समझ में आते हैं। कुछ वर्षो से अमेरिकी अर्थव्यवस्था गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। अपने हथियार उद्योग के जरिये वह वित्तीय हालत में प्राणवायु फूंक सकता है। इस मकसद में अफगानिस्तान सहायक है। 

यदि वहां गृहयुद्ध छिड़ता है तो एक तरफ तालिबान लड़ाकों को हथियार बेच सकता है तो दूसरी ओर अफगानी फौज को तालिबान से लड़ने के लिए हथियार गोला बारूद दे सकता है। इस तरह अफगानिस्तान में अशांति अमेरिका को रास आती है। 

दूर की कौड़ी यह है कि बोतल में बंद तालिबानी जिन्न बाहर निकालने से रूस, पाकिस्तान, ईरान, चीन और भारत की पेशानी पर बल पड़ते हैं। रूस तालिबान से आशंकित है तो चीन अपने यहां शिनजियांग में अशांति का खतरा देख रहा है। 

पाकिस्तान के पेशावर पर तो तालिबानी अपना हक जताते ही रहे हैं। मजहब के नाम पर वह पाकिस्तान को नचा सकता है। भारत कश्मीर में तालिबान के दखल की आशंका देख रहा है। याद दिलाना जरूरी है कि जो बाइडेन और कमला हैरिस अपने पदों पर चुने जाने से पहले ही भारत की कश्मीर नीति के कट्टर आलोचक रहे हैं। 

यानी अर्थ यह भी है कि अमेरिका ने एक तालिबानी तीर से कई निशाने साध लिए हैं। पर क्या उसकी यह मंशा पूरी होगी? शायद नहीं, क्योंकि एशिया में अगर समीकरण उलट गए तो अमेरिका के लिए संकट बढ़ जाएगा।

हकीकत यह है कि अमेरिका की स्थिति सांप-छछूंदर जैसी है। जिन देशों को वह सैनिक सहायता दे रहा है, वे भयभीत हैं और सोचते हैं कि अमेरिका कभी भी मंझधार में छोड़कर भाग सकता है। इसलिए वे अमेरिका से छिटक सकते हैं। 

अमेरिका के प्रति आशंकित तो जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी हैं। वे नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में यदि अमेरिका ने चीन से हाथ मिला लिया तो वे अपनी विदेश नीति का क्या करेंगे। अमेरिका अब अफगानिस्तान में दोबारा नहीं जा सकता और उससे दूरी बनाने में चौधराहट पर आंच आती है। 

जानकार कह रहे हैं कि अमेरिकी नागरिक ट्रम्प के बाद एक और राष्ट्रपति को नाकाम होते देखेंगे। अजीब बात है कि जॉर्ज बुश, बराक ओबामा, ट्रम्प और जो बाइडेन चारों राष्ट्रपतियों ने अफगानिस्तान के मामले में सारे विश्व को अंधेरे में रखा है। वे बार-बार दोहराते रहे हैं कि तालिबान निर्मूल हो चुका है। 

अफगानिस्तान सरकार और लोकतंत्र को वहां कोई खतरा नहीं है। हकीकत यह है कि तालिबान ने तो 2009 में ही देश के दक्षिणी भाग पर कब्जा कर लिया था। उसने अमेरिकी सेनाओं का ग्रामीण इलाकों में जाना वर्षों से रोक रखा था। अमेरिका ने 1000 अरब डॉलर वहां बहाए, 5000 से अधिक सैनिक गंवाए और लौट के बुद्धू घर को आए। 

लौटते-लौटते तालिबानियों को 8 लाख हथियार, 60 से अधिक मालवाहक विमान, 108 लड़ाकू हेलिकॉप्टर, 23 लड़ाकू विमान और 18 खुफिया टोही विमान, 168 यात्नी विमान, 76000 फौजी गाड़ियां और 200000 संचार उपकरण उपहार में देकर आए। अफगानी सेनाओं का आसान समर्पण और तालिबानियों को विराट मदद क्या दोहरे अमेरिकी चरित्र का सबूत नहीं है?

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इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की चिंता जायज है। सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर जानकारियों से छेड़छाड़ की बाढ़ है।

Last Modified:
Monday, 30 August, 2021
rajeshbadal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की चिंता जायज है। सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर जानकारियों से छेड़छाड़ की बाढ़ है। फर्जी खबरें भी नहीं रुक रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने इसे कोविड के दरम्यान इनफोडेमिक कहा है। ऐसे में निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता वक्त की आवश्यकता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने दो दिन पहले नागरिकों के सत्ता से सच बोलने के अधिकार पर अपने व्याख्यान में इस बात पर जोर दिया है कि राष्ट्र को ऐसी पत्रकारिता चाहिए, जो एकदम स्वतंत्र और निष्पक्ष जानकारियां दे सके। मौजूदा दौर में निश्चित ही इस राय का स्वागत किया जाना चाहिए।

दरअसल भ्रामक और फर्जी समाचारों का निजी इस्तेमाल कम और सियासी दुरुपयोग अधिक होता है। पत्रकारिता के अनेक आधुनिक रूप चुनाव के दौरान और बाद में लोक धारणा बनाने में एक कारगर हथियार की तरह काम आते हैं। राजनीतिक दल आपसी होड़ के चलते एक दूसरे के शिखरपुरुषों के बारे में निंदनीय और गलत सूचनाएं फैलाते हैं। पुरखों की चरित्र हत्या करते हैं। यह अब छिपी हुई बात नहीं है। ऐसा करके वे एक अपराध भी करते हैं। वे उन शिखर पुरुषों के जमाने के ऐतिहासिक और प्रामाणिक तथ्यों- आंकड़ों को भी झूठा साबित करते हैं। सोशल मीडिया के इन अवतारों का उपयोग करने वाला आम आदमी इतिहास में कोई शोध उपाधि प्राप्त नहीं होता। समाज के आम वर्गों को तो छोड़ दीजिए, पढ़े लिखे डॉक्टरों, वकीलों, शिक्षकों, बैंकरों, इंजीनियरों और प्रशासनिक तथा पुलिस अफसरों की पढ़ाई अपने अपने संकायों में होती है इसलिए भारतीय इतिहास की दस्तावेजी जानकारी उन्हें नहीं होती। जब यह फेक या फर्जी समाचार उन तक पहुंचता है तो बहुधा वे भरोसा भी कर लेते हैं। उनके कामकाज और व्यवहार में भी गलत सूचनाओं के आधार पर बदलाव आता है।झूठ का यह विस्तार यकीनन जुर्म है और माननीय न्यायालय सुओ मोटो इस पर कार्रवाई करेगा तो आम जनता को राहत मिलेगी। यह बात सर्वोच्च अदालत भी जानती है कि भारत का एक आदमी निजी तौर पर झूठ और पाखण्ड से लड़ने में उदासीन है। सोसाइटी में आया यह परिवर्तन सामाजिक ढांचे की सेहत के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का सच के साथ जुड़ने पर जोर देना सामयिक जरूरत भी है।

महात्मा गांधी अपने को पूर्णकालिक पत्रकार मानते थे। वे हिन्दुस्तान के सबसे बड़े संप्रेषण पुरूष थे। करीब आधी सदी तक उन्होंने जिम्मेदारी भरी और सरोकारों वाली पत्रकारिता की। वे हमेशा समाचारों के जरिए सच से संवाद पर बल देते रहे। उनके सत्याग्रह की सबसे बड़ी ताकत यही थी। सच सिर चढ़कर बोलता है और झूठ के पांव नहीं होते। इसलिए गांधी की सच वाली पत्रकारिता ही आज की आवश्यकता है। झूठ और फर्जी खबरें अपने आप गायब हो जाएंगीं। इस हकीकत को समझ लिया तो आने वाली चुनौतियों और नकली समाचारों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

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विचारों की स्वतंत्रता का अर्थ कतई मुंहजोरी नहीं हो सकता: पूरन डावर

भारत में पिछली कुछ जेनरेशन एक विचित्र स्थिति में हैं। संस्कृति की दृष्टि से हो या भाषा की दृष्टि से, न अंग्रेजी के मास्टर बन सके और न हिंदी समझ सके।

पूरन डावर by
Published - Friday, 27 August, 2021
Last Modified:
Friday, 27 August, 2021
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

भारत में पिछली कुछ जेनरेशन एक विचित्र स्थिति में हैं। संस्कृति की दृष्टि से हो या भाषा की दृष्टि से, न अंग्रेजी के मास्टर बन सके और न हिंदी समझ सके। न भारतीय संस्कृति अपना सके और न पाश्चात्य व्यवस्था को।

हिंदू संस्कृति में माता-पिता को भगवान का दर्जा दिया गया है। भगवान उन्हें जो कुछ देता है, माता-पिता के माध्यम से देता है। माता-पिता रात-दिन मेहनत कर, हर उधेड़बुन कर, यश-अपयश प्राप्त कर जो कुछ एकत्र करते हैं, सब कुछ संतान के पालन में और बचाया या जोड़ा,  संतान के लिए छोड़ या सौंप देते हैं। विडम्बना यह है कि आज की संतान उसे अपना अधिकार मानकर अपने आपको माता-पिता का पालक समझने लगती है, इस बात को भूलकर कि सब उन्हीं का तो दिया है। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर या स्वतंत्र विचारों को रखने के अधिकार का कुतर्क, माता-पिता से उसी के अनुसार व्यवहार और संबंधों को निभाने का प्रयास ये जेनरेशन कर रही है।

यानी प्राप्ति के लिए हिंदू संस्कृति और अधिकारों के लिए पाश्चात्य या तथाकथित वैचारिक स्वतंत्रता के कुतर्क। विचारों की स्वतंत्रता का अर्थ कतई मुंहजोरी नहीं हो सकता। मेरा स्पष्ट मत है कि जिसने हिंदू धर्म और संस्कृति में जन्म लिया है, उसे उसी संस्कृति का चुनाव और संस्कृति के अनुसार व्यवहार करना  चाहिए। इसमें लाभ अधिक हैं, लेकिन तथाकथित स्वतंत्र विचारों से थोड़ा समझौता और थोड़े से अनुशासन का पालन करना पड़ सकता है।

यदि आप माता-पिता की संपत्ति पर हक जताते हैं तो उनके पूरे सम्मान का ध्यान भी रखना होगा और कम से कम खाना और गुर्राना दोनों तो नहीं हो सकते। भारत में कमोबेश यही व्यवस्था भ्रष्टाचार में भी है। लेकिन संतान को पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि यदि उन्हें पाश्चात्य सभ्यता पसंद है तो उसे अंगीकार करें, जिसमें बच्चे की अच्छी परवरिश केवल बाल्यावस्था तक है या अधिकतम किशोरावस्था। हाईस्कूल में आते ही उसे अपनी स्कूल फीस भी स्वयं कमानी होती है और यदि माता-पिता से उधार लेता है तो जॉब शुरू करने पर वापस चुकाना होता है। पिता की फैक्टरी में यदि काम करता है तो अन्य कर्मचारियों की तरह अनुशासन अपनाना होता है एवं उसी योग्यतानुसार बराबर सैलरी मिलती है। दोनों व्यवस्थाएं अपनी जगह ठीक हैं।

इस व्यवस्था में हर जन्म लेने वाले को संघर्ष एवं स्वयं को स्थापित करने का मौका मिलता है और अपने जीवन को पूरी स्वतंत्रता से जीने का मौका। माता-पिता की उतनी सेवा और सम्मान, जितना बाल्यावस्था की सेवा को चुकाया जा सके।

माता-पिता की मृत्यु के बाद विरासत में भी सीमित मिलता है। बाकी बचा देश के कानून के अनुसार सरकार को जाता है।। लेकिन आज की जेनरेशन दोनों व्यवस्थाओं में अपने हित को चुनकर दोनों नावों पर पैर रख कर चलना चाहती है। यही पारिवारिक समस्याओं का मुख्य कारण है। हक भारतीय व्यवस्था और व्यवहार पाश्चात्य व्यवस्था: माता-पिता और बच्चों दोनों को ही युवावस्था आते ही बैठकर स्पष्ट विचार-विमर्श करना चाहिए और युवाओं को स्वेच्छानुसार सोच-समझकर पद्यति का चयन करना चाहिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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