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'पुण्य' के सामने नही रहेगा शून्य, 'क्रांतिकारी' से लगा था साख को बट्टा
दस्तक के जरिए हो या ‘मास्टरस्ट्रोक’ के जरिए खबरों से सिस्टम पर प्रहार करने वाले पत्रकारिता...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
वरिष्ठ टीवी पत्रकार ।।
दस्तक के जरिए हो या ‘मास्टरस्ट्रोक’ के जरिए खबरों से सिस्टम पर प्रहार करने वाले पत्रकारिता जगत के मुखर और प्रखर दिग्गज पुण्य प्रसून बाजपेयी का एबीपी से जाना एक साफ संकेत देता है। हाथ मलते हुए ही तथ्यों से सिस्टम के कड़वे सच को बयां करने वाले एक पत्रकार अपने पत्रकारीय गुण के बावजूद क्या 'हाथ मलता' रह जाए? क्या उसे सच को सामने रखने का अधिकार नहीं है? क्या पत्रकारिता का चौथा स्तंभ कार्यपालिका के हाथों की कठपुतली बन गया है? क्या इमरजेंसी का विरोध करने वाली पार्टी की सरकार में फिर से इमरजेंसी जैसे दिन दिखाई पड़ने लगे हैं?
ये देश के लिए सौभाग्य की बात है कि देश की सत्ता पर एक ऐसा व्यक्ति काबिज है जो जिसने चाय बेचने से लेकर अपने जीवन का सफर तय किया और संघर्ष के लंबे पगडंडियों से होकर अर्श तक पहुंचा हुआ है। संयोग से वो इमरजेंसी का विरोधी भी रहा है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के इस मुखिया ने दुनिया भर में भारत का बड़ा नाम भी किया है। इस दौर में पत्रकारिता में इमरजेंसी जैसे हालात देखने और सुनने में अजीब से लगते हैं। हमेशा से पत्रकारिता सत्ता और सिस्टम की आलोचना कर उसे सचेत करती रही है और सत्ता अपनी आलोचना से सीखकर उसमें सुधार करती रही है। मगर अब ये सब बीते दिनों की बात जैसा लगने लगा है। हमें ये सोचना होगा की सत्ता क्या तारीफ का पुल बांधना या सरकार की योजनाओं का प्रचार करना, सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाना ही पत्रकारिता है या वो सब भी, जिसके लिए गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता, दिलीप पड़गांवकर की पत्रकारिता, प्रभास जोशी की पत्रकारिता और एसपी सिंह की पत्रकारिता जानी जाती रही है। न जाने ऐसे कितने नाम रहे हैं जिनके बारे में सुनकर गर्व का एहसास होता है। सौभाग्य महसूस होता है कि हम जिस पत्रकारिता का हिस्सा है उसके पुरोधा ये नामचीन हस्तियां रही हैं, लेकिन आज के माहौल में ऐसा करना कठिन बना दिया गया ह।
वाम धारा के माने और समझे जाने वाले पुण्य प्रसून बाजपेयी के मास्टरस्ट्रोक को तकनीकी रूप से हिलाने की कोशिश की गई, फिर उन पर मास्टरस्ट्रोक का प्रयोग करते हुए उन्हें इस लायक ही नहीं छोड़ा गया कि वो मास्टरस्ट्रोक कर सकें। तीखे सवाल, सरकार से जवाब मांगना। चार सालों का हिसाब मांगना और तथ्यों के साथ सूरते हाल पेश करना पुण्य की ताकत रही और वही उनकी विदाई की वजह भी। आप पुण्य पर सवाल उठा सकते हैं। सवाल पूछने के उनके आधार को लेकर उनकी सोच को लेकर, उनके विचारों को लेकर उनकी राजनीतिक पसंद-नापसंद को लेकर लेकिन बतौर टीवी एंकर जो सवाल वो देश के सामने रखते रहे हैं, सत्ता और सिस्टम को उनका जवाब देना चाहिए और इस तरह से नहीं, जिस तरह से देखा समझा जा रहा है।
इससे पहले आज तक में दस्तक कर रहे पुण्य प्रसून बाजपेयी ने जिस टोन में बाबा रामदेव से टैक्स को लेकर सवाल किया तब भी विवाद हुआ, हालांकि उसी चैनल में केजरीवाल से इंटरव्यू के दौरान उनका एक टेप देखा गया, जिसमें वो बहुत केजरीवाल के साथ सेटिंग करते हुए क्रांतिकारी कहते सुने गए और आजतक आज भी उनके इस शब्द बहुत क्रांतिकारी पर एक शो दिखाता है। पुण्य का एक और विवाद सहारा टीवी में सीईओ के कार्यकाल के दौरान आया था। इंटरव्यू के बीच में पुण्य लालू यादव से चैनल को सुधारने की बात कहते सुने गए। सहारा श्री ने इसी को आधार बनाकर उन्हें चलता कर दिया।
बिहार के चंपारण से ताल्लुक रखने वाले पुण्य का ताल्लुक कुछ हद तक हमारे गृह जिला यानी झारखंड के पलामू से भी रहा है। कभी-कभार बात और एनडीटीवी में उनके कार्यकाल के दौरान एक मुलाकात के अलावा पुण्य से हमारा कोई जुड़ाव नहीं रहा, कुछ लोग उन्हें दंभी करार देते है, ये उनका अनुभव होगा। पत्रकारिता के जरिए आम आदमी के मुद्दों को रखने वाले पुण्य प्रसून बाजपेयी की पत्रकारिता देश के जनमानस के एक बड़े वर्ग के दिलों को छूती है और छूती रहेगी। यही पत्रकारिता उनका ‘पुण्य’ है और ये ‘पुण्य’ उनके जीवन में कभी शून्य नहीं आने देगा। वो फिर से किसी नए फलक पर अपने पुराने आयाम के साथ नजर आएंगे, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।
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