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अब इन नारों के ‘रथ’ पर सवार हो जीत की राह ताक रहीं पॉलिटिकल पार्टियां

कभी ‘इंदिरा इज इंडिया’, फिर ‘शाइनिंग इंडिया’, फिर ‘चाय पर चर्चा’ और...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल।।

चुनाव, नारे और मैनेजमेंट

कभी ‘इंदिरा इज इंडिया’, फिर ‘शाइनिंग इंडिया’, फिर ‘चाय पर चर्चा’ और ‘मोदी है तो मुमकिन है’...कुछ इस तरह के चुनाव प्रचारों का स्वरूप बदलता रहा है। पहले दो नारों ने इंदिरा गांधी और अटलबिहारी वाजपेयी को सत्ता से बाहर कर दिया था। राजीव गांधी के समय में चुनाव में एक अलग किस्म का प्रयोग हुआ था, जो पारम्परिक प्रचार से दूर था और जिसके शिल्पकार सैम पित्रोदा माने गए थे। यह चुनावी विज्ञापन मतदाताओं को लुभा नहीं पाया।

बदले दौर में युवा भारत में युवा मतदाताओं को उनकी ही भाषा में जब चुनाव प्रचार आरंभ हुआ तो जीत जैसे सिर चढ़कर बोली। 2014 के चुनाव में ‘चाय पर चर्चा’ ने मोदी को अकल्पनीय विजय दिलायी तो इस बार मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में हुए काम जुबान पर चढ़ने वाले नारों के साथ गढ़े हैं, जिसमें ‘मोदी है तो मुमकिन है’,का उपयोग किया जा रहा है। इसी तरह कांग्रेस के आरोप, ‘चौकीदार चोर है’ के जवाब में भाजपा इस बार ‘घर घर चौकीदार’..वाले नारों से लोकसभा चुनाव में विजय हासिल करने के लिए आक्रामक हो चली है। चुनाव और नारों का बहुत पुराना रिश्ता रहा है। कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह जब कहें कि चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं तो आप हल्के में ले सकते हैं, लेकिन एक प्रोफेशनल व्यक्ति चाय पर चर्चा लेकर पब्लिक के बीच भाजपा और मोदी को लेकर जाता है और जो जीत मोदी की लीडरशिप को मिलती है तो यहां पर मैनेजमेंट की बात पक्की हो जाती है। हालांकि, प्रशांत किशोर के पहले, प्रोफेशनल्स ना सही, लेकिन साहित्य से जुड़े लोग कांग्रेस के लिए नारे लिखकर मतदाताओं को लुभाते रहे हैं। कुछ नारे तो आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं-दूरदृष्टि पक्का इरादा, गरीबी हटाओ जैसे कई नारे हैं।

प्रशांत किशोर ने 2014 में चुनावी मैनेजमेंट की आधुनिक परिभाषा गढ़ी। वे इस बात को स्थापित करने में कामयाब रहे कि चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं, लेकिन उनका अपना तरीका पारम्परिक न होकर आधुनिक था। बिलकुल वैसा ही जैसा कि हेलमेट के एक विज्ञापन की पंच लाइन है ‘सर है आपका, मर्जी है आपकी’. युवाओं से सीधे कनेक्ट करने वाली भाषा में बात करने की जो जुगत प्रशांत किशोर ने चाय की प्याली के साथ घोली, वह युवाओं के दिल में उतर गई। चाय पर चर्चा ने ऐसा जोर पकड़ा कि युवा भारत की चाबी उनके हाथ में आ गई। दिग्विजयसिंह का चुनावी मैनेजमेंट इससे इतर था। वे लगभग पारम्परिक प्रबंधन की चर्चा करते हैं और वह नए जमाने के दौर में उतना प्रभावी नहीं बन पाया, जैसा कि उन्हें उम्मीद थी। यही मैनेजमेंट 2003 के चुनाव में भाजपा ने उमा भारती जैसे चेहरे को उतार कर किया तो जीत के सारे रिकार्ड टूट गए। कांग्रेस और दिग्विजयसिंह के लिए मिस्टर बंटाधार ने मतदाताओं पर जादू का काम किया लेकिन 15 साल बाद जब इसी चुनावी मैनेजमेंट को दुहराने की भाजपा ने गलती की तो उन्हें जीत से कुछ कदम पीछे रहना पड़ा।

2018 के चुनाव में भाजपा ‘माफ करो महाराज, हमारा तो शिवराज’ के सहारे कांग्रेस को मात देने की कोशिश की तो भाजपा का वैसा जादू नहीं चला, जो 2003, 2008 और 2013 में चला था। तब कांग्रेस के बीते दस साल के राज्य में विफलता को भाजपा ने भुनाया। कांग्रेस ने 2018 में ‘वक्त है बदलाव का’ के सहारे मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की और आशातीत सफलता हासिल की। कांग्रेस को मध्यप्रदेश में वैसी सफलता नहीं मिली, जिसकी उसे आस थी लेकिन सता तक पहुंचने में कामयाब रही। वहीं छत्तीसगढ़ में भाजपा का सूपड़ा साफ करते हुए कांग्रेस ने बीते 15 सालों का हिसाब-किताब चुकता कर दिया तो राजस्थान में पांच साल में बदलाव की परम्परा कायम रही।

साल 2014 के चुनाव में प्रशांत किशोर, जिसने असंभव को ऐसा संभव कर दिखाया कि एक कप चाय ने पूरे प्याले में तूफान ला दिया था। जिस व्यापक विजय की उम्मीद भाजपा को भी नहीं थी, वह विजय भाजपा को मिली। हालांकि इसमें प्रशांत किशोर का मैनेजमेंट था तो पब्लिक से कनेक्ट करने की मोदी की वाककला भी। दोनों ने ऐसा रंग जमाया कि भारतीय राजनीति का रंग ही बदल गया। लोकसभा में विपक्ष के लिए भी उतनी सीट नहीं मिली, जितना कि संविधान में उल्लेखित है। कांग्रेस एक बड़े दल के रूप में स्थापित रही लेकिन नेता विपक्ष का पद नहीं मिला। इसे एक किस्म का चुनावी मैनेजमेंट कह सकते हैं जो तमाम अटकलों के बाद भी भाजपा को मोदी के लीडरशिप में सत्तासीन कर गई। प्रशांत किशोर एक कामयाब मैनेजर के रूप में इस जीत के साथ स्थापित हो गए। चूंकि प्रशांत किशोर की कम्पनी एक प्रोफेशनल कम्पनी है, सो उसे किसी भी दल के लिए प्रचार करने में परहेज नहीं था। परहेज था तो यह कि वह जिनके साथ जुड़े, वह प्रशांत किशोर के मैनेजमेंट को फालो करे। कांग्रेस के साथ भी प्रशांत किशोर की चर्चा हुई लेकिन बात दूर तक नहीं गई। नीतीश कुमार के साथ भी प्रशांत किशोर का साथ चुनाव के मद्देनजर था, लेकिन राजनीति उन्हें अपनी ओर खींच लाई। अब वे बिहार में नीतीश की पार्टी में दूसरे नम्बर के नेता के रूप में स्थापित हैं। प्रशांत किशोर प्रोफेशनल्स हैं, इस लिहाज से यह देखना जरूरी होगा कि राजनीति में नीतीश के साथ वे कितना लम्बा सफर तय करते हैं। 

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अकल्पनीय जीत के शीर्ष पर ला खड़ा किया था, यह था प्रशांत किशोर का चुनावी मैनेजमेंट। अब थोड़ा पीछे चलिए और याद करिए कि 2003 में (तब) मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह ने कहा था कि ‘चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं’ तो भी तूफान खड़ा हो गया था। 2003 और 2004 में अंतर इतना ही था कि दिग्विजय सिंह का चुनावी मैनेजमेंट उस समय पीट गया और मध्यप्रदेश में भाजपा उसी अकल्पनीय बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब हो गई थी जैसा कि 2014 में प्रशांत किशोर के चुनावी मैनेजमेंट के चलते केन्द्र में भाजपा को अकल्पनीय जीत हासिल हुई। लेकिन एक सवाल खड़ा रह गया और शायद दिग्विजयसिंह का कहा एक मायने में सच हुआ कि चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं। हालांकि यह भी सच है कि नारों और स्लोगन का चुनाव में बड़ा महत्व होता है। सही अर्थों में यह चुनावी मैनेजमेंट का यह एक हिस्सा होता है। राजनीतिक दलों के लिए नारे गढऩे का काम तब के नामचीन साहित्यकार किया करते थे। ख्यातनाम उपन्यास मैला आंचल लिखने वाले फणीश्वरनाथ रेणु हों, बालकवि बैरागी हों या श्रीकांत वर्मा, इन्होंने तब की देशकाल परिस्थितियों को देखते हुए नारे और स्लोगन गढ़े। प्रशांत किशोर तब प्रोफेशनल चुनावी मैनेजर के रूप में नाम कमा रहे थे। एक समय कांग्रेस के साथ होने के लिए बेताब प्रशांत किशोर को कांग्रेस ने खास तवज्जो नहीं दी तो वे भाजपा के साथ हो लिए। ज्यों ही भाजपा अकल्पनीय बहुमत के साथ सत्ता में आयी तो लगभग हर राजनीतिक दल प्रशांत किशोर को अपने साथ रखना चाहता था। उनका अल्पावधि का साथ कांग्रेस में भी रहा लेकिन कोई उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज नहीं हुई।

अब समय बदल गया है और संचार के साधनों का इतना विस्तार हो गया है कि महीनों की बात सेकंड्स में होने लगी है। सोशल मीडिया का राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से उपयोग करते रहे हैं, लेकिन 2014 के चुनाव में सोशल मीडिया का जो उपयोग किया गया,उसका पूरा लाभ भाजपा को मिला। यह वही दौर था जब अन्ना हजारे लोकपाल की मांग को लेकर रामलीला मैदान में कांग्रेस के खिलाफ डटे थे। तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ना बोलने वाले प्रधानमंत्री के रूप में इस तरह प्रचारित किया गया कि युवा मतदाताओं के मन में यह बात बैठ गई कि बदलाव का यह वक्त है। 2014 के बाद 2019 में एक बार फिर लोकसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है लेकिन इन पांच सालों में देश का मन बदल चुका है। कांग्रेस के पास आक्रामक अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी का चेहरा है जो बीते पांच सालों से भाजपा की नींद में खलल डाल रहा है तो भाजपा में प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी एक सफल रणनीतिकार हैं जो विरोधियों को उनके ही वार से घायल कर विजय का रास्ता प्रशस्त करते हैं। ट्विटर अकाउंट में भाजपा नेताओं ने अपने नामों के साथ चौकीदार का उपयोग कर राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देने की कोशिश की है। 2014 में चाय की प्याली में तूफान उठा था और देश ने तीन दशक बाद एक दलीय बहुमत वाली सरकार को सदन में भेजा था लेकिन अब रॉफेल कितना उड़ पाएगा और किसे लाभ मिलेगा, इसके लिए 23 मई तक का इंतजार करना होगा।


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