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मिस्टर मीडिया: अजब ग़ज़ब दुनिया है हमारे रीजनल चैनलों की...
अजब ग़ज़ब दुनिया है हमारे चैनलों की। नेशनल चैनल और रीजनल चैनलों के परदे का कंटेंट...
राजेश बादल 7 years ago
राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार ।।
अजब ग़ज़ब दुनिया है हमारे चैनलों की। नेशनल चैनल और रीजनल चैनलों के परदे का कंटेंट देखिए। आंखें फटी रह जाती हैं। क्षेत्रीय चैनलों के दर्शक के बारे में क्या राय बना रखी है आपने? एक ही समूह का एक राष्ट्रीय और एक क्षेत्रीय चैनल देख लीजिए। माथा पीट लेने को जी करता है। समूह का न भी देखें- कोई अन्य स्थानीय चैनल लीजिए। वहां भी यही हाल नज़र आएगा। इतना बासी और उबाऊ कंटेंट आपको कहीं दिखाई नहीं देगा। क्या आज़ादी के सत्तर साल बाद अपने ड्राइंग रूम में रंगीन टीवी खरीदकर रखने वाला दर्शक इतनी कम अक़्ल का है?
आए दिन हम मीडिया के लोग इस जुमले का इस्तेमाल करते हैं कि कंटेंट इज़ द किंग। उस पर भाषण भी देते हैं। लेकिन जब दफ़्तर में अपनी न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठते हैं तो इस जुमले को खूंटी पर टांग देते हैं। उसके लिए आप पर कोई दबाव नहीं होता। आप खुद इसे ओढ़ने-बिछाने लगते हैं। क्या आप यह समझते हैं कि भिंड-मुरैना, अमेठी-अयोध्या, वैशाली-हाजीपुर, बांकुरा-पुरलिया, नागपत्तनम-सालेम, कच्छ-काठियावाड़, वर्धा-बारामती, चित्तूर-किन्नूर या बदरीनाथ-केदारनाथ का दर्शक अभी भी साठ के दशक में जी रहा है? उसे राष्ट्रीय मसलों की समझ नहीं है, वह अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी पकड़ नहीं रखता, उसे आर्थिक नीति समझ नहीं आती या बौद्धिक विश्लेषण उसकी समझ से परे हैं। माफ़ कीजिए आप ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं। मैं अनेक कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए देश भर में घूमता हूं। जब दर्शक या कार्यक्रमों में भागीदारी करने आए लोग यह सवाल करते हैं कि प्रादेशिक चैनलों पर राष्ट्रीय महत्त्व के मसले-मुद्दे ग़ायब क्यों होते हैं तो उनको तर्कों के ज़रिए संतुष्ट करना कठिन हो जाता है और उस समय तो हास्यास्पद हो जाती है, जब क़स्बा स्तर की ख़बर बुलेटिनों की पहली हेडलाइन बनती है और राष्ट्रीय समाचार वरीयता क्रम में निचले पायदानों पर खिसक जाते हैं। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय महत्त्व की चर्चाएं सिर्फ नेशनल चैनल पर दिखाकर हटा दी जाती हैं। प्रादेशिक चैनलों में वे अदृश्य रहती हैं। एक तरह से दर्शक, उपभोक्ता की बौद्धिक समझ का अपमान।
याद करिए, एक ज़माना था, जब चंद राष्ट्रीय चैनल ही आए थे और वे स्थानीय मुद्दे और राष्ट्रीय मसलों के विशिष्ट अनुपात के चलते बेहद लोकप्रिय हुए थे। उस समय दर्शक की मानसिक खुराक को लेकर यह धारणा नहीं बनी कि वह सिर्फ़ अपने गांव में उगाई गई मूंग की दाल ही खाना चाहता है और शाही पनीर खाने का हक़दार नहीं है। वही दर्शक अब दस-पंद्रह बरस बाद अधिक साक्षर, जागरूक और अपने राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय सरोकारों के लिए अत्यंत संवेदनशील हो गया है तो स्थानीय चैनल उसे गाजर घास परोस रहे हैं। यह कौन सा मज़ाक़ हम कर रहे हैं?
आपको यह भी ध्यान देना होगा कि आज का दर्शक ज़्यादा परिपक्व और विश्लेषण क्षमता रखता है। उसके बच्चे भी सोशल मीडिया के नए नए रूपों के चलते पूरी दुनिया से वाक़िफ़ हैं। वे अगर क्षेत्रीय चैनलों से छिटके हुए हैं तो इसका बड़ा कारण उनका कंटेंट है।
मीडियाकर्मी कभी-कभी छोटे शहरों में बसे अपने परिवार वालों से मिलने भी जाते हैं। बच्चे अपने दादा दादी, नाना नानी से मिलने भी जाते हैं। वहां आपके पास सिर्फ़ लोकल चैनल उपलब्ध है तो क्या आप पंद्रह मिनट भी उसके सामने बैठ सकते हैं? शायद कभी नहीं। किशोर-जवान होते बच्चे तो कतई नहीं। आज गांव और छोटे क़स्बों में भी लोगों के सोच में तब्दीली आई है। विधानसभा चुनाव में अब राष्ट्रीय मुद्दे रैलियों में उठाए जाते हैं। लेकिन लोकल चैनलों से वे मसले नदारद रहते हैं तो इसका क्या अर्थ लगाया जाए?
आज गांव-गांव में रिज़र्व बैंक, नोटबंदी, रॉफेल और राममंदिर, डीज़ल-पेट्रोल की कीमतें, पाकिस्तान के चुनाव, चीन और पाक दोस्ती, श्रीलंका में नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम पर आप बात कर सकते हैं।
क़रीब एक महीने से मैं देश के एक दर्ज़न से अधिक स्थानीय चैनलों को बहुत बारीकी से देख रहा हूं। आप कल्पना करें कि राजस्थान के किसी चैनल में ब्रेकिंग न्यूज़ यह चलती है कि झोटवाड़ा के तहसीलदार ने अपने दफ्तर का निरीक्षण किया तो राजस्थान में ही झालरापाटन के दर्शक के लिए उसका क्या उपयोग है? अगर उत्तर प्रदेश के बेलाताल में मोटरसाइकल से टक्कर में अज्ञात ग्रामीण घायल ब्रेकिंग न्यूज़ अथवा किसी अन्य फॉर्मेट में दिखता है तो उसका उत्तर प्रदेश के ही सिकन्दराऊ के दर्शक से क्या लेना देना। स्थानीय कवरेज के नाम पर अपनी नासमझी तो न दिखाएं मिस्टर मीडिया।
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