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गूगल पर मुकदमा क्यों हो गया? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

अमेरिका में सरकार कंपनियों के एकाधिकार के दुरुपयोग के खिलाफ मुकदमे करते रहती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

मिलिंद खांडेकर, मैनेजिंग एडिटर, तक चैनल्स, टीवी टुडे नेटवर्क।

हमें जब इंटरनेट पर कुछ खोजना होता है तो हम कहते हैं कि गूगल कर लो। बहुत कम सुनने मिलता है कि इंटरनेट पर सर्च कर लो, क्योंकि सर्च का मतलब ही गूगल हो गया है। किसी कंपनी के लिए इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता है कि उसका नाम ही उस काम से जुड़ जाए, जैसे हम पहले कहते थे कि जेरोक्स कर लो। फोटो कॉपी का मतलब ज़ेरोक्स हो गया था, जबकि बाकी कंपनियों की मशीन से भी फोटो कॉपी होती थी। अब गूगल के लिए यही मुसीबत का कारण बन गया है। अमेरिकी सरकार ने गूगल सर्च की मोनोपॉली के खिलाफ मुकदमा कर दिया है। ये मुकदमा सरकार ने जीत लिया तो गूगल को जुर्माना देना पड़ सकता है। कंपनी को अलग-अलग हिस्सों में तोड़ा जा सकता है।

अमेरिका में सरकार कंपनियों के एकाधिकार के दुरुपयोग के खिलाफ मुकदमे करते रहती है। गूगल पर आरोप है कि वो सर्च बिजनेस में अपने एकाधिकार का दुरुपयोग कर रहा है। दुनिया भर में 100 में से 91 सर्च गूगल पर होते हैं। बाक़ी सर्च माइक्रोसॉफ़्ट के बिंग, याहू या डक डक गो जैसे इंजन पर होते हैं। अमेरिकी सरकार का आरोप है कि गूगल फोन कंपनियों को हर साल अरबों डॉलर देता है ताकि फोन या कम्प्यूटर पर पहले गूगल सर्च ही खुले। फोन पर गूगल का ऐप लोड होकर आता है। लोग इसे इस्तेमाल करने के लिए मजबूर है। बाकी सर्च इंजन इसके चलते मार खा रहे हैं।

गूगल का जवाब है कि लोग गूगल सर्च करते हैं, क्योंकि लोग उसे पसंद करते हैं। उसका तर्क है कि जैसे कंपनियां डिपार्टमेंट स्टोर में अपना सामान डिस्प्ले करने के लिए पैसे देती है वैसे ही वो भी पैसे देता है। गूगल सर्च को फोन या कम्प्यूटर पर जगह दिलाने के लिए तय ग्राहक को करना है। उसके पास गूगल को हटाने का ऑप्शन है। उसका दावा है कि iPhone पर दो स्टेप में आप अपना सर्च इंजन बदल सकते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट में बताया है कि ये कितना मुश्किल है। कोई इस झंझट में पड़ता नहीं है। लोग गूगल करते रहते हैं।

गूगल के बिजनेस मॉडल को समझिए। आप सर्च करते हैं तो गूगल आपको संबंधित विज्ञापन दिखा देता है। यही विज्ञापन उसकी कमाई का जरिया है। 2022 में कुल आमदनी में गूगल सर्च का हिस्सा 57% था। सर्च गूगल का सबसे बड़ा बिजनेस है , वो उसे हर कीमत पर बचा कर रखना चाहता है। गूगल हर साल एप्पल को करीब 10 बिलियन डॉलर यानी करीब 80 हज़ार करोड़ रुपये सिर्फ इस बात के लिए देता है कि एप्पल फ़ोन या कम्प्यूटर में अपने आप गूगल सर्च ही खुलेगा। इसी तरह बाकी फोन कंपनियों को भी पैसे दिए जाते हैं।

गूगल ने कोर्ट में कहा कि ये सरकार का नहीं माइक्रोसॉफ़्ट का मुक़दमा है। सर्च में माइक्रोसॉफ़्ट गूगल से बहुत पीछे है। सरकार का सबसे बड़ा गवाह भी माइक्रोसॉफ़्ट है। माइक्रोसॉफ्ट का मुनाफा गूगल से ज्यादा है। CEO सत्या नडेला ने कोर्ट में कहा कि माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनी भी सर्च में उसका मुकाबला नहीं कर पा रही है। इसका कारण है हर जगह गूगल सर्च का अपने आप खुलना। इंटरनेट का मतलब ही गूगल हो गया है। बाकी कंपनियों को मौका ही नहीं मिल रहा है। गूगल के पास इतनी जानकारी है कि वो आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस AI में इसका दुरुपयोग कर सकता है।

इस मुकदमे का एक दिलचस्प पहलू यह है कि भारतीय मूल के तीन लोग इसके केंद्र में है। माइक्रोसॉफ्ट के CEO सत्या नडेला, गूगल के CEO सुंदर पिचाई और जज हैं अमित मेहता। मुकदमा अगले साल तक चलेगा। पहले जज को तय करना है कि गूगल एकाधिकार का दुरुपयोग कर रहा है या नहीं। ये तय होने के बाद तय होगा कि कार्रवाई क्या करना है? कंपनी को तोड़ना है या जुर्माना लगाना है।

समय का पहिया 25 साल में घूमा है। 1998 में माइक्रोसॉफ़्ट को ऐसा ही मुक़दमा झेलना पड़ा था। उस पर आरोप था कि विंडोज़ के साथ हर कम्प्यूटर में इंटरनेट एक्सप्लोरर लगा कर दिया जाता है। बाकी ब्राउजर एकाधिकार का शिकार हो रहे हैं। इस मुकदमे का नतीजा यह हुआ था कि माइक्रोसॉफ्ट उलझ गया। कंपनी को अलग अलग हिस्से में बांटने का आदेश दिया गया। फिर माइक्रोसॉफ्ट ने अपील कर के सरकार से समझौता कर लिया। ऐसा माना जाता है कि मुक़दमे के बाद माइक्रोसॉफ्ट फोन और इंटरनेट के कारोबार में पिट गया, नई नई कंपनी गूगल ने उसे पीछे छोड़ दिया। गूगल के क्रोम ब्राउज़र ने माइक्रोसॉफ्ट को बहुत पीछे छोड़ दिया है।

(वरिष्ठ पत्रकार मिलिंद खांडेकर 'टीवी टुडे नेटवर्क' के 'तक चैनल्स' के मैनेजिंग एडिटर हैं और हर रविवार सोशल मीडिया पर उनका साप्ताहिक न्यूजलेटर 'हिसाब किताब' प्रकाशित होता है।)


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