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सरकार का काम क्या बिजनेस करना है? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

भारत सरकार की 248 कंपनियां है। सरकार इन कंपनियों के जरिए बैंक चलाती हैं। इंश्योरेंस, पेट्रोल डीजल बेचती हैं। कोयला, बिजली, स्टील बनाती हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

मिलिंद खांडेकर, मैनेजिंग एडिटर, तक चैनल्स, टीवी टुडे नेटवर्क।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान शेयर बाजार में पैसे लगाने वालों को गुरु मंत्र दिया। उन्होंने कहा कि जिन सरकारी कंपनियों को ये लोग (विपक्ष) गाली दे उसमें पैसे लगा दो। उन्होंने दो सरकारी कंपनियों का उल्लेख किया, हिंदुस्तान Aeronautics लिमिटेड ( HAL) और LIC यानी लाइफ़ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन। HAL की शेयरों की क़ीमत पाँच साल में क़रीब चार गुना बढ़ गई है यानी जिसने 1 लाख लगाए थे वो अब चार लाख रुपये है। LIC की लिस्टिंग पिछले साल हुई है, साल भर पहले पैसे लगाने वाले मामूली नुकसान में रहे हैं। एक लाख रुपए अभी 95 हजार रुपये हो गए हैं।

भारत सरकार की 248 कंपनियां है। सरकार इन कंपनियों के जरिए बैंक चलाती हैं, इंश्योरेंस,पेट्रोल डीजल बेचती हैं, कोयला, बिजली, स्टील बनाती है। फोन इंटरनेट डेटा देती है, लिस्ट लंबी है। सरकार ने इस साल मार्च में संसद को बताया कि पिछले पांच सालों में इन कंपनियों को मिलाकर डेढ़ लाख करोड़ रुपए का घाटा हुआ। घाटा हालांकि घट रहा है।  2019-20 में घाटा 44 हजार करोड़ रुपए था, 2021-22 में घटकर 15 हजार करोड़ रुपए रह गया।

दुनिया अब खुले बाजार की तरफ बढ़ रही है। इसके पीछे सोच है कि सरकार काम धंधे में ना पड़े, नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधा दें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले दो साल में बोल चुके हैं कि सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है। भारत में सरकार बिजनेस में पड़ने का कारण है मिश्रित अर्थव्यवस्था। हर बिजनेस में सरकार भी रहें और प्राइवेट कंपनी भी। ये परिपाटी 1991 में अर्थव्यवस्था को बाजार के लिए खोलने तक चलती रही। जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में एयर इंडिया को सरकार ने टाटा से ले लिया। इंश्योरेंस कंपनियों को मिलाकर LIC बना दिया।

इंदिरा गांधी ने सभी प्राइवेट बैंकों को सरकारी बना दिया। पेट्रोलियम कंपनियां जैसे हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम सरकारी बन गई। हम पहले बात कर चुके हैं कि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल में सरकार ने बिजनेस से बाहर निकलना शुरू किया। कुछ कंपनियों को पूरी तरह बेच दिया गया, कुछ कंपनियों के शेयर बेचे गए। सरकार मारुति कार भी बनाती थी और ब्रेड भी। मारुति को सुज़ुकी को बेचा गया, जबकि मॉडर्न ब्रेड को हिंदुस्तान लीवर को। एयर इंडिया को पिछले साल ही टाटा को बेचा गया है।

अब भारत सरकार की 55 कंपनियों का शेयर बाजार में कारोबार होता है इनमें से 12 बैंक हैं। पिछले सालभर में इन कंपनियों का प्रदर्शन बाजार के मुकाबले बेहतर रहा है। BSE PSU इंडेक्स में आपने सालभर पहले एक लाख रुपए लगाए थे, तो आज 28 हजार रुपए का फायदा है जबकि BSE Sensex में 9 हजार रुपए का फायदा। सरकारी बैंकों का रिटर्न भी साल भर में अच्छा रहा है। NSE PSU Bank Index में एक लाख रुपए साल भर में 1.58 लाख रुपए हो गए हैं जबकि बाकी कंपनियों के इंडेक्स NIFTY में सिर्फ 9 हजार रुपए का फायदा हुआ है।

प्रधानमंत्री ने HAL और LIC का उल्लेख किया। पांच साल पहले HAL की हालत खराब हो गई थी। सैलरी देने के लाले पड़ गए थे। राफेल का काम अनिल अंबानी की कंपनी को मिलने के बाद कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि HAL बीमार कंपनी हो जाएगी। ये कंपनी सेना के लिए विमान बनाती है। पिछले वित्त वर्ष में 26,500 करोड़ रुपए की आय हुई जो अब तक का रिकॉर्ड है। अभी जून की तिमाही में 814 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ। मेक इन इंडिया के चलते कंपनी को सरकार से काफी काम मिल रहा है। LIC भारत की सबसे बड़ी बीमा कंपनी है। अडाणी ग्रुप के शेयर खरीदने को लेकर विवाद हुआ था। इस साल हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद अडाणी के शेयर में गिरावट आई थी, इसका नुकसान LIC को भी हुआ। LIC का कहना है कि ये शेयर अब नुकसान में नहीं है। जून की तिमाही में LIC को करीब 9500 करोड़ रुपए का फायदा हुआ जबकि पिछले साल इसी अवधि में 700 करोड़ रुपए का फायदा था यानी 13 गुना ज्यादा।

इन दोनों कंपनियों का रिकॉर्ड देखकर लग सकता है कि सरकार को बिजनेस करना चाहिए। इसमें दिक्कत है पिछले पांच सालों में सभी सरकारी कंपनियों को मिलाकर जो डेढ़ लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है उसकी भरपाई हम सबने की है। हम जो टैक्स देते हैं उससे ही ये कंपनियां चलती हैं। अब तो कम से कम सरकारी कंपनियों की मोनोपॉली खत्म हो गई है वरना ग्राहक पिसता था। एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का किराया ज्यादा था, विमान टाइम पर नहीं उड़ते थे। टेलीफोन कनेक्शन के लिए कई साल वेटिंग लिस्ट होती थी। ये सब 30-35 साल पुरानी बात है। कॉम्पिटिशन से किराए कम हुए, फोन कंपनियां अब आपके लिए वेट कर रही हैं। सरकार बिजनेस से जितनी दूर रहें उतना बेहतर। ये बात तो खुद प्रधानमंत्री कह चुके हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार मिलिंद खांडेकर 'टीवी टुडे नेटवर्क' के 'तक चैनल्स' के मैनेजिंग एडिटर हैं और हर रविवार सोशल मीडिया पर उनका साप्ताहिक न्यूजलेटर 'हिसाब किताब' प्रकाशित होता है।)

 


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