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जहरीले पानी को ‘अमृत’ बनाने की राष्ट्रीय चुनौती : आलोक मेहता

दिल्ली सहित उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब जैसे कई राज्यों में प्रदूषित पानी की समस्या से निपटने के लिए राज्यों और केंद्र सरकारों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

भारत के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में कई बार सम्मानित इंदौर, इस समय एक गंभीर दूषित पानी संकट का सामना कर रहा है। शहर के कई इलाकों में नल के पानी में गंदगी और सीवरेज मिला पानी मिलने की वजह से सैकड़ों लोग बीमार पड़े और कई जानें भी गईं। उल्टी-दस्त, बुखार, पेट दर्द जैसे गंभीर लक्षणों के साथ सैकड़ों लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया। हजारों लोग प्रभावित हैं, जिनमें बच्चों और बुजुर्गों सहित पूरे परिवार शामिल हैं।

यह मामला सिर्फ इंदौर का स्वास्थ्य संकट नहीं है, बल्कि पूरे देश में जल गुणवत्ता, जल प्रबंधन और नागरिक सुरक्षा तंत्र की मजबूती पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। राजधानी दिल्ली सहित उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब जैसे कई राज्यों में प्रदूषित पानी की समस्या से निपटने के लिए राज्यों और केंद्र सरकारों को मिलकर अधिक तेज़ी से काम करने की आवश्यकता है। दिल्ली को एक मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता है।

इंदौर की भयावह घटना ने भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ‘अमृत’ पेयजल परियोजना की ओर ध्यान खींचा है और संभव है कि इससे राज्यों के भी कान खड़े हों। अब केवल सरकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक और स्वयंसेवी संगठनों को भी प्रदूषित पानी और हवा को लेकर अधिक सक्रिय निगरानी अभियान चलाने होंगे।

इंदौर की घटना प्रशासन, इंजीनियरिंग अधिकारियों और नागरिकों के बीच जिम्मेदारी, निगरानी और जवाबदेही की कमी को सामने लाती है। सुरक्षित पानी की कमी से स्वास्थ्य, जीवन और सामाजिक विश्वास को भारी नुकसान हो सकता है। अब समय है कि मजबूत सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी कोई त्रासदी दोबारा न हो।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस घटना पर शोक व्यक्त किया और मृतकों के परिजनों को ₹2 लाख मुआवजा देने की घोषणा की। जांच के आदेश दिए गए और तीन सदस्यीय समिति गठित की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि पानी में मिलावट कैसे हुई। कुछ विभागीय अधिकारियों को बर्खास्त और निलंबित भी किया गया। जांच से पहले ही यह तथ्य सामने आया कि पाइपलाइन में लीकेज या खराब कनेक्शन के कारण सीवरेज का पानी पीने की सप्लाई लाइन में मिल गया। रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि सीवरेज चैंबर का निर्माण गलत तरीके से मुख्य ड्रिंकिंग लाइन के ऊपर किया गया था, जिससे अपशिष्ट सीधे जल पाइप में मिला।

राजधानी दिल्ली में भी गर्मियों के दौरान न केवल पानी की कमी, बल्कि गुणवत्ता की समस्या भी एक बड़ी चुनौती रही है। इसका मुख्य कारण यमुना नदी का प्रदूषण, कच्चे पानी का अस्थिर स्रोत, जर्जर और पुरानी आपूर्ति नेटवर्क, सीवर मिलावट का जोखिम, नियमित गुणवत्ता जांच का अभाव और लैब प्रमाणन से जुड़ी समस्याएँ हैं। इन वजहों से कुछ इलाकों में गंदा, बदबूदार और स्वास्थ्य-खतरनाक पानी की आपूर्ति होती है, जिससे लोगों की दैनिक जरूरतें भी प्रभावित होती हैं।

पिछले वर्ष आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान पूर्वी दिल्ली के निवासियों ने लगभग तीन महीनों तक गंदा और दुर्गंधयुक्त पानी मिलने की शिकायत की। इस दौरान पानी पीने के अलावा त्वचा और पेट से जुड़ी बीमारियाँ भी सामने आईं। सुप्रीम कोर्ट ने भी अनियमित और दूषित पानी की आपूर्ति वाले इलाकों का निरीक्षण करने के निर्देश दिए थे।

दिल्ली का पीने का पानी मुख्यतः यमुना नदी से आता है, जो अत्यधिक प्रदूषित है। रिपोर्टों में बताया गया कि अमोनिया जैसे प्रदूषकों का स्तर काफी अधिक है और यह जल उपचार संयंत्रों में आने से पहले ही दूषित होता है। कई इलाकों में 40 से 80 साल पुरानी पाइपलाइन हैं, जिनसे पानी की गुणवत्ता और अधिक बिगड़ती है। सप्लाई के दौरान सीवर और पानी की पाइपलाइन के पास लीकेज होने से सीवेज मिलावट की आशंका बनी रहती है। सरकार ने इन समस्याओं को पहचानते हुए जल और सीवर व्यवस्था में सुधार की योजनाएँ बनाई हैं।

अब भारतीय जनता पार्टी की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की सरकार ने पानी सप्लाई, जल संरचना, यमुना नदी की सफाई और दिल्ली जल बोर्ड को मजबूत करने को प्राथमिकता बनाया है। बोर्ड को वित्तीय स्वायत्तता दी गई है, जिससे बड़े प्रोजेक्टों के लिए कैबिनेट से अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी और निर्णय तेज़ी से लिए जा सकेंगे। सरकार ने यमुना नदी के पर्यावरण सुधार और सफाई कार्यक्रम भी शुरू किए हैं।

भाजपा सरकार के पहले बजट में पेयजल, स्वच्छता और जल संरचना के लिए 9,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो नए बोरवेल, पाइपलाइन अपग्रेड, वर्षा जल संरक्षण और यमुना सफाई पर खर्च होंगे। दिल्ली जल बोर्ड ने 735 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जिससे पानी और सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का आधुनिकीकरण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त 300 करोड़ रुपये की नई पाइपलाइन परियोजना के तहत 11 किलोमीटर कनेक्शन पाइपलाइन की योजना शुरू की गई है। हालांकि, इन योजनाओं के परिणाम जनता तक पहुँचने में समय लगेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पहले कार्यकाल में ‘हर घर नल से जल’ के लक्ष्य के साथ जल जीवन मिशन शुरू किया। ग्रामीण भारत में हर घर नल कनेक्शन सुनिश्चित करने और शहरी क्षेत्रों के लिए ‘अटल मिशन फॉर रिजन्यूएशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत)’ जैसी योजनाएँ शुरू की गईं। केंद्रीय बजट 2025-26 में जल जीवन मिशन के लिए लगभग 67,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक हैं। मिशन का लक्ष्य अब 2028 तक बढ़ाया गया है।

पहले ग्रामीण क्षेत्रों में केवल लगभग 3.24 करोड़ घरों में नल कनेक्शन थे, लेकिन मिशन के लागू होने के बाद अब तक 15.5 करोड़ से अधिक घरों को नल से पानी मिल रहा है। 2.66 लाख से अधिक गांवों में हर घर तक नल जल पहुँचाया जा चुका है और कई क्षेत्रों में महिलाओं को पानी की गुणवत्ता जांच के लिए प्रशिक्षित किया गया है।

‘अमृत’ योजना 2015 में शुरू की गई थी और इसका दूसरा चरण अमृत 2.0 अक्टूबर 2021 में लागू हुआ। इसके तहत 4,700 से अधिक शहरों और नगरीय निकायों में पाइप जल आपूर्ति विकसित की जानी है। अमृत 2.0 का कुल अनुमानित बजट लगभग 2.77 से 2.99 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें केंद्र सरकार का हिस्सा लगभग 86,760 करोड़ रुपये बताया गया है।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में भी जल परियोजनाओं पर तेज़ी से काम हो रहा है। हालांकि, कुछ स्थानों पर क्रियान्वयन में देरी, बजट और संचालन संबंधी समस्याएँ सामने आई हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन, सख्त निगरानी और सामाजिक जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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