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अरनब की गिरफ्तारी पर बोले डॉ. अनुराग बत्रा, मीडिया के लिए इससे बुरा दौर नहीं हो सकता

चुप रहने से ज्यादा किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना ज्यादा सही है। मीडिया में मेरे मित्रों, यह समय आगे बढ़कर अपनी बात रखने का है। इसे अपने लोकतंत्र के लिए काला दिवस कहा जा सकता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 04 November, 2020
Last Modified:
Wednesday, 04 November, 2020
Arnab Goswami

डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।

चुप रहने से ज्यादा किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना ज्यादा सही है। मीडिया में मेरे मित्रों, यह समय आगे बढ़कर अपनी बात रखने का है। इसे अपने लोकतंत्र के लिए काला दिवस कहा जा सकता है और इस तरह का कृत्य कल को किसी दूसरे के घर को भी निशाना बना सकता है। हमारे लोकतंत्र में, कानून का शासन सर्वोपरि है और यह सिर्फ मीडिया प्रोफेशनल्स और पत्रकारों पर सबसे ज्यादा लागू होता है। इसलिए, मीडिया और देश में हम सभी के लिए अरनब गोस्वामी को गिरफ्तारी के दौरान घसीटे जाने और उनसे दुर्व्यवहार किए जाने के जो दृश्य देखने को मिले हैं, उनके खिलाफ आगे आना चाहिए। अरनब की गिरफ्तारी के दौरान जिस तरह के दृश्य देखने को मिले, वह मुझे काफी हैरान और परेशान करने वाले लगे।

पिछले करीब आठ हफ्तों से टीआरपी पर विवाद और न्यूज चैनल्स व मीडिया संगठनों के बीच झगड़ा देखने को मिल रहा है, लेकिन एक्सचेंज4मीडिया के रूप में हमने तथ्यात्मक और संतुलित रुख अपनाए रखा है। हमारा मानना है कि सही चीजों को सही कारण के लिए और सही तरीके से करना चाहिए और हमने वही किया है।

हालांकि आज जो कुछ भी हुआ, वह काफी डराने वाला है। हम इस तरह के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। अगर मुंबई में अरनब के साथ ऐसा हो सकता है तो नोएडा में किसी भी मीडिया मालिक या संपादक, पत्रकार या देश के किसी भी हिस्से में किसी भी अन्य मीडिया पेशेवर के साथ ऐसा हो सकता है।

इससे बुरी मिसाल नहीं हो सकती

मैंने एक सम्मानित मीडिया कंपनी के और बेहद ही संतुलित सीईओ को फोन किया, जिन्हें मैं अपना मित्र कहता हूं और उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे यह कॉलम नहीं लिखना चाहिए। उन सीईओ ने मुझसे कहा कि उन्हें (अरनब को) आत्महत्या के एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया है। मैं अपने दोस्त और आप सभी से कहता हूं कि आज जो कुछ हुआ और पुराने मामले को महत्वहीन नहीं बताया जाना चाहिए और इसे प्राथमिकता के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह पुराना केस था जिसे बंद कर दिया गया था। लोग ये मानेंगे कि इसे सामान्य के अलावा अन्य कारणों से फिर से खोला गया।

मैं यहां दो अक्टूबर 2020 को लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर सुप्रीम कोर्ट के बयान का उल्लेख करना चाहता हूं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,  'उकसाने के अपराध में दोषी ठहराने के लिए अपराध विशेष को अंजाम देने की मनोदशा दिखनी चाहिए।'

अरनब को साथ दुर्व्यवहार और बाद में उनकी गिरफ्तारी पुलिसिया कार्यशैली का सबसे खराब उदाहरण है और यह सरकारी मशीनरी और शक्ति का दुरुपयोग है। मीडिया प्रोफेशनल्स के रूप में यह हमारा कर्तव्य कि हम इसके खिलाफ अपनी आवाज उठाएं, भले ही हमें इस तरह की पत्रकारिता पसंद हो अथवा नहीं।

फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर (Voltaire) का कहना था, ‘हो सकता है कि मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं। परन्तु विचार प्रकट करने के आपके अधिकार की रक्षा करूंगा।’

मुझे आज भी यह याद है। मैं किसी भी प्रोफेशनल, पत्रकार, मीडिया मालिक के साथ खड़ा रहूंगा, भले ही मैं उनके संपादकीय विचारों से असहमत होऊं। यदि अरनब गोस्वामी जैसी मीडिया हस्ती इस तरह की पुलिसिया बर्बरता और सत्ता के दुरुपयोग का शिकार हो सकती है, तो हमें मीडिया के रूप में इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। चुप रहना मेरे या हमारे लिए कोई विकल्प नहीं है, न ही आपमें से किसी के लिए एक विकल्प होना चाहिए।

कुछ अन्य प्रमुख मीडिया मालिकों के खिलाफ भी विभिन्न तरह की जांच चल रही हैं। यह मानकर चलना चाहिए कि उनके साथ भी भविष्य में इस तरह हो सकता है। इसलिए उन सभी को अरनब का समर्थन करना चाहिए ताकि भारतीय मीडिया की रीढ़ न टूटे।

लोकतंत्र की रक्षा करने वालों और कानून की नुमाइंदगी करने वालों ने खुद का आज एक बुरा चेहरा दिखाया है।

भारतीय मीडिया प्रोफेशनल्स के रूप में हमारे विभिन्न दृष्टिकोण  अथवा विचारधाराएं हो सकती हैं, लेकिन आज जो कुछ हुआ, उसकी एकतरफा निंदा किए जाने और अरनब को सुरक्षित रखने व न्याय दिलाने में मदद करने का समय है। 

मुझे आज महात्मा गांधी की वह बात याद आ रही है, जो उन्होंने कई दशक पहले कही थी-

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शशि शेखर वेम्पति ने बताया, समय के साथ तालमेल बिठाने में क्यों विफल रहा प्रसार भारती

प्रसार भारती के पूर्व CEO शशि शेखर वेम्पति ने एक लेख में बताया कि प्रसार भारती समय के साथ तालमेल बिठाने में क्यों विफल रहा और अब अपने पैरों पर कैसे खड़ा हो सकता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 24 November, 2022
Last Modified:
Thursday, 24 November, 2022
PrasarBharati5454

प्रसार भारती अपनी स्‍थापना की रजत जयंती मना रहा है। इसका गठन वर्ष 1997 में 23 नवंबर के दिन एक सांविधिक स्‍वायत्‍त इकाई के रूप में किया गया था। इसमें दूरदर्शन और आकाशवाणी शामिल हैं। इस मौके पर प्रसार भारती के पूर्व मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी (Ex CEO) शशि शेखर वेम्पति ने एक लेख लिखा है, जिसे 23 नवंबर को ‘नवभारत टाइम्स’ में प्रकाशित किया गया है, जिसमें उन्होंने बताया कि प्रसार भारती समय के साथ तालमेल बिठाने में क्यों विफल रहा और अब अपने पैरों पर कैसे खड़ा हो सकता है। उनका ये लेख आप यहां ज्यों का त्यों पढ़ सकते हैं-

कुछ दिन पहले हुआ एक सर्वे बताता है कि कोविड-19 लॉकडाउन के समय से लेकर अभी तक लोगों का विश्वास दूरदर्शन और आकाशवाणी पर बाकी सबसे कहीं ज्यादा बना हुआ है। इसी विश्वास के साथ आज प्रसार भारती अपना रजत जयंती समारोह मना रहा है। 1997 में प्रसार भारती की स्थापना की गई थी। वैसे प्रसार भारती की पिछले 25 वर्षों की यात्रा को दो दशकों के खोए हुए अवसरों की गाथा के रूप में वर्णित किया जा सकता है, जिसका पिछले पांच वर्षों में पुनरुद्धार हुआ है। आकाशवाणी और दूरदर्शन के पूर्ववर्ती सरकारी विभागों से यह संगठन बना। फिर वैधता के लिए हुआ संघर्ष काफी हद तक बताता है कि प्रसार भारती समय के साथ तालमेल बिठाने में क्यों विफल रहा। 

एक महत्वपूर्ण गलती यह हुई कि पूर्ववर्ती एआईआर और डीडी के कर्मचारियों को इसमें सरकारी कर्मचारियों के रूप में बनाए रखा गया। अब रिटायरमेंट के करीब पर पहुंच चुके लोगों को दर्शकों की संख्या और राजस्व के लिए निजी मीडिया के साथ कॉम्पिटिशन की चुनौती दी जा रही है। 

दुनिया के सार्वजनिक प्रसारक कमाई का बड़ा हिस्सा लाइसेंस शुल्क जैसे सुनिश्चित स्रोतों से प्राप्त करते हैं, तो प्रसार भारती इसके लिए निजी क्षेत्र के साथ कॉम्पिटिशन करने में अद्वितीय है। यह सार्वजनिक सेवा प्रसारक पर व्यावसायिक रूप से प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ अपने सार्वजनिक सेवा दायित्वों के कारण भारी बोझ डालता है। एक उदाहरण के रूप में बीबीसी मुट्ठी भर चैनलों और सेवाओं का संचालन करता है, जबकि लाइसेंस शुल्क में हजारों करोड़ रुपए प्राप्त करता है। इससे उसे डीडी या आकाशवाणी की तुलना में प्रति चैनल या सर्विस बेस पर सौ गुना से अधिक निवेश करने की परमिशन मिलती है। यह एक महत्वपूर्ण अंतर है जो बीबीसी और प्रसार भारती जैसे वैश्विक सार्वजनिक प्रसारक के बीच गलत तुलना के चलते छूट गया है।

वैसे डीडी फ्री डिश- डीटीएच की कामयाबी के 4.5 करोड़ से अधिक घरों तक पहुंचने के साथ परिचालन खर्च का बोझ कुछ हद तक कम हो गया है। लेकिन लगभग 20,000 सरकारी कर्मचारियों का जो वेतन सालाना 2000 करोड़ से अधिक बैठता है, उसके लिए अनुदान सहायता के रूप में सरकार से समर्थन की आवश्यकता है। वैसे सार्वजनिक सेवा दायित्व के तहत अनिवार्य चुनाव प्रसारण से लेकर सौ से अधिक भाषाओं-बोलियों में दूरदर्शन और आकाशवाणी बाकी दुनिया में कहीं आगे हैं।

इस रजत जयंती के समय प्रसार भारती को आगे बढ़ने में कुछ चुनौतियों का सामना करना होगा-

* शानदार प्रोग्राम बनाकर दर्शकों को डिजिटल माध्यमों से आकर्षित करना होगा। संचालन को और आधुनिक बनाने के लिए पिछले पांच वर्षों के सुधार में और तेजी चाहिए।

अगले कुछ वर्षों में सालाना लगभग 2000 कर्मचारियों के रिटायर होने के कारण उनकी जगह और लोगों को लाना होगा।

नए लोगों को भी लाना एक चुनौती है, क्योंकि इसके लिए सेल्स, मार्केटिंग, डिजिटल और आईटी सहित अन्य क्षेत्रों में विशेष कार्यों के लिए प्रतिस्पर्धी, प्रफेशनल टैलंट का समावेश सुनिश्चित करना होगा।

जनशक्ति परिवर्तन को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए प्रसार भारती अधिनियम के भीतर भर्ती नियमों और प्रावधानों में संशोधन के प्रयासों को तार्किक निष्कर्ष पर ले जाना होगा।

अगले दो दशकों में सार्वजनिक प्रसारक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप रोडमैप बनाना होगा।

स्मार्टफोन पर मीडिया की खपत, ऑटोमेशन और आईटी बेस्ड सिंक्रोनाइजेशन का मैनेजमेंट करना होगा। क्लाउड बेस्ड प्रसारण मैनेजमेंट तो बदलना ही होगा, ताकि ऑन-डिमांड खपत और तेज हो सके।

प्रसार भारती को आत्मनिर्भर बनना होगा। जो चीजें मौजूद हैं, उनसे बिजनेस के नए रास्ते बनाने होंगे। डायरेक्ट टू मोबाइल ब्रॉडकास्टिंग (डी2एम) के साथ, डीडी फ्री-डिश जैसा बिजनेस मॉडल सीधे स्मार्टफोन और बाकी स्मार्ट उपकरणों पर फ्री टू एयर ब्रॉडकास्टिंग सर्विस दे सकता है। यह प्रसार भारती के लिए अगले 25 वर्षों तक खुद को आत्मनिर्भर बनाए रखने का महत्वपूर्ण जरिया है।

(साभार: नवभारत टाइम्स)

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वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष चतुर्वेदी ने बताया, क्यों हैं भारतीय टीम में बदलाव की जरूरत

कई वरिष्ठ खिलाड़ियों ने टीम के चयन पर सवाल उठाये थे। जब मुकाबला बेहद कड़ा हो, तो खिलाड़ियों का चयन बहुत अहम हो जाता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 14 November, 2022
Last Modified:
Monday, 14 November, 2022
PrabhatKhabar4548541

आशुतोष चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कहा जाता है कि इस देश पर दो बुखार ‘चुनाव और क्रिकेट’ बड़ी तेजी से चढ़ते हैं। हम सब जानते हैं कि यह देश क्रिकेट का दीवाना है, लेकिन टी-20 विश्व कप के सेमीफाइनल में इंग्लैंड से भारत की शर्मनाक हार से क्रिकेट प्रेमी निराश हैं। सभी विश्व कप में टीम से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद लगाये बैठे थे। विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में आपको हर मैच में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होता है। माना जा रहा है कि सीमित ओवरों की क्रिकेट प्रतियोगिता में यह भारतीय टीम का सबसे खराब प्रदर्शन है।

पहली बार टी-20 विश्व कप के सेमीफाइनल में कोई टीम 10 विकेट से हारी है, लेकिन यह कोई रहस्य नहीं है कि भारतीय टीम के पहले तीन-चार खिलाड़ी आप जल्दी आउट कर दीजिए, उसके बाद टीम को धराशायी होने में देर नहीं लगती है। वैसे तो टीम को तैयार करने में काफी दिनों से मशक्कत चल रही थी, लेकिन जब टीम घोषित हुई, तो पता चला कि एशिया कप में खेलने वाले ज्यादातर खिलाड़ियों को ही जगह दे दी गयी, जबकि इन खिलाड़ियों का प्रदर्शन स्तरीय नहीं रहा था।

कई वरिष्ठ खिलाड़ियों ने टीम के चयन पर सवाल उठाये थे। जब मुकाबला बेहद कड़ा हो, तो खिलाड़ियों का चयन बहुत अहम हो जाता है, पर भारतीय चयनकर्ता हमेशा से ही प्रदर्शन के बजाय नामों की चमक पर ज्यादा ध्यान देते आये हैं। राहुल द्रविड़ की अगुआई में भारतीय टीम में इतने प्रयोग हो रहे थे कि कहा जा सकता है कि भारतीय टीम प्रयोगों की कहानी बन गयी है। पता ही नहीं चलता कि कौन खिलाड़ी कब खेलेगा और क्यों खेलेगा।

यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि विश्व कप में भारतीय टीम की हार में चयनकर्ताओं की गलतियों का भी योगदान रहा है। चयनकर्ताओं ने 2021 टी-20 विश्व कप के बाद सात कप्तान बदले हैं और यह सिलसिला जारी है। इस पर चिंतन जरूरी है कि 2011 के बाद हम कोई बड़ा टूर्नामेंट क्यों नहीं जीत पाये हैं। सचिन तेंदुलकर ने कहा है कि सेमीफाइनल में इंग्लैंड के हाथों भारत की शर्मनाक हार से वह काफी निराश हैं, लेकिन उन्होंने आग्रह किया है कि टीम का आकलन एक हार के आधार पर न किया जाए।

तेंदुलकर ने कहा कि एडीलेड पर 168 रन अच्छा स्कोर नहीं था। उस मैदान पर बाउंड्री बहुत छोटी है, लिहाजा 190 के आसपास रन बनाने चाहिए थे। हमारे गेंदबाज भी विकेट नहीं ले पाये। इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल वॉन ने कहा कि भारतीय टीम ने पुरानी शैली का क्रिकेट खेला। उन्होंने लंदन के अखबार द टेलीग्राफ में लिखे अपने लेख में कहा कि टी-20 प्रतियोगिता में खेलने वाली यह भारत की सबसे कमजोर टीम है।

उनका कहना है कि इंडियन प्रीमियर लीग में खेलने वाला हर खिलाड़ी कहता है कि इससे उसके खेल में सुधार हुआ है, लेकिन भारतीय टीम को इससे क्या हासिल हुआ है। वॉन ने कहा कि भारत के पास गेंदबाजी के विकल्प बहुत कम हैं। उनकी बल्लेबाजी में भी गहराई नहीं है। एक-डेढ़ दशक पहले भारत के सभी शीर्ष बल्लेबाज गेंदबाजी कर सकते थे। सचिन तेंदुलकर, सुरेश रैना, वीरेंद्र सहवाग और यहां तक कि सौरव गांगुली भी गेंदबाजी कर लेते थे। अब कोई भी बल्लेबाज गेंदबाजी नहीं करता, इसलिए कप्तान के पास केवल पांच ही विकल्प थे।

लेग स्पिनर युजवेंद्र चहल को न खिलाने का खामियाजा भी भारत को भुगतना पड़ा। जाने-माने ऑलराउंडर कपिल देव ने मौजूदा भारतीय टीम को चोकर्स करार दिया है। चोकर्स ऐसी टीमों को कहा जाता है, जो अहम मैचों को जीतने में नाकाम रहती हैं। पिछले छह विश्व कप में भारतीय टीम पांचवीं बार नॉकआउट चरण में हार कर टूर्नामेंट से बाहर हुई है। कपिल देव ने एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहा कि वह ज्यादा कड़े शब्दों में आलोचना नहीं करेंगे, क्योंकि ये वही खिलाड़ी हैं, जिन्होंने हमें अतीत में जश्न मनाने का मौका दिया है, लेकिन हां, हम उन्हें चोकर्स कह सकते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से टीम इंडिया के लिए अंतिम मौके पर हार बड़ी समस्या बनी हुई है। टीम 2014 के टी-20 विश्व कप के फाइनल में पहुंची थी, पर श्रीलंका से हार गयी। साल 2015 और 2016 के विश्व कप में भी टीम सेमीफाइनल में हारी थी। साल 2017 के चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में भी उन्हें पाकिस्तान से बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा टीम 2019 के विश्व कप सेमीफाइनल में भी हार गयी थी। वर्ष 2021 के टी-20 विश्व कप से टीम पहले ही दौर से बाहर हो गयी थी। अब 2022 में भी भारतीय टीम एक बार फिर सेमीफाइनल में हार गयी।

जब पुरवइया हवा चलती है, तो दर्द उभर आता है। उसी तरह जब भारतीय टीम हारती है, तो महेंद्र सिंह धौनी की कमी याद आती है। पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर ने भारतीय टीम हार के बाद धौनी को याद किया है। उन्होंने कहा कि धौनी जैसा कप्तान दोबारा टीम को नहीं मिलेगा। धौनी भारत के सबसे सफल कप्तान रहे हैं। ऐसी कोई ट्रॉफी नहीं है, जो उन्होंने अपनी कप्तानी में न जीती हो।

उनकी कप्तानी में टीम ने सबसे पहले 2007 में टी-20 विश्व कप जीता, 2011 में वनडे का विश्व कप जीता और 2013 में चैंपियंस ट्रॉफी भी जीती थी। गौतम गंभीर ने कहा कि कोई खिलाड़ी आयेगा और रोहित शर्मा व विराट कोहली से ज्यादा शतक लगा देगा, लेकिन उन्हें नहीं लगता है कि कोई भी भारतीय कप्तान आईसीसी की तीनों ट्रॉफी जीत पायेगा। खेल विशेषज्ञ भी मानते हैं कि एक दौर में भारतीय टीम के लगातार टूर्नामेंट जीतने की एक बड़ी वजह धौनी की कप्तानी रही थी।

कप्तानी छोड़ने के बाद उनकी बनायी टीम अगले कुछ साल खेलती रही। नतीजतन 2018 में रोहित शर्मा की कप्तानी में भी हम एशियाई चैंपियन बनने में सफल रहे। लेकिन उसके बाद टीम का प्रदर्शन गिरता चला गया। बतौर कप्तान धौनी जानते थे कि किस खिलाड़ी का कब इस्तेमाल करना है और कैसे खिलाड़ियों पर दबाव को हावी नहीं होने देना है। उनके जाने के बाद परिदृश्य बदल गया। अब भारतीय टीम दो देशों की सीरीज तो जीत जाती है, लेकिन बड़ी प्रतियोगिताओं में हार जाती है।

अब समय आ गया है कि खिलाड़ियों के चयन में नामों की चमक के बजाय प्रदर्शन पर ध्यान दिया जाए। टी-20 युवा खिलाड़ियों का खेल है। चयनकर्ताओं को चाहिए कि वे उम्रदराज खिलाड़ियों को विश्राम दें और युवा खिलाड़ियों को खेलने का मौका दें।

(साभार: प्रभात खबर)

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पत्रकारों के लिए तो ऐसे फैसले बहुत ही दुख भरे होते हैं मिस्टर मीडिया!

स्वस्थ पत्रकारिता को समर्पित पत्रकारों के लिए ऐसे फैसले बड़े दुख भरे होते हैं। जो दुनिया भर के लिए लड़ते हैं, उनके लिए कोई नही लड़ता।

राजेश बादल by
Published - Saturday, 12 November, 2022
Last Modified:
Saturday, 12 November, 2022
rajeshbadal

राजेश बादल,  वरिष्ठ पत्रकार ।।

बड़े इरादे हमेशा कामयाब नहीं होते

फेसबुक, इंस्टाग्राम, वॉट्सऐप और ट्विटर से बड़ी तादाद में छंटनी इन दिनों सुर्खियों में है। अभिव्यक्ति के इन अंतरराष्ट्रीय मंचों में प्रबंधन की इस कार्रवाई पर अलग अलग राय व्यक्त की जा रही है। फेसबुक के कर्ता धर्ता मार्क जुकरबर्ग ने अपनी दीर्घकालिक कारोबारी नीति में खामियों को जिम्मेदार माना है। उसकी सजा पेशेवर अधिकारियों और कर्मचारियों को मिल रही है। बोलचाल की भाषा में कहें तो कंपनी के मालिकों की अक्षमता का दंड उनको मिल रहा है, जो उसके लिए दोषी नहीं हैं। यह अन्याय का चरम है। खुद जुकरबर्ग ने कहा कि उनकी योजना ने काम नहीं किया और वे स्वयं इसके लिए जिम्मेदार हैं। यह सवाल उनसे जरूर पूछा जाना चाहिए कि उनकी पेशेवर नैतिकता कहां गई। कंपनी को आर्थिक नुकसान के लिए वे अपने को दोषी मानते हैं और सजा कर्मचारियों को देते हैं।

कंपनी के मुताबिक, कोविड के लॉकडाउन काल में लोग समय काटने के लिए इन अवतारों पर देर तक टिके। इस कारण विज्ञापन बढ़े और कंपनी के कई खर्चे बचे। इससे मैनेजमेंट ने ख्याली पुलाव पकाया कि कोविड के बाद भी यही स्थिति बनी रहेगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। उसने मुनाफे के मद्दे नजर लंबी महत्वाकांक्षी योजनाएं बना लीं। जब हालात सामान्य हो गए, तो कंपनियों की कमाई घट गई। करीब साल भर ऐसा चलता रहा। तब प्रबंधन नींद से जागा और वैकल्पिक मंझोली या छोटी कारोबारी नीति तैयार करने के बजाय उसने कर्मचारियों पर गाज गिरा दी। वे समर्पित प्रोफेशनल, जिन्होंने दिन रात मेहनत करके संस्था को एक ब्रैंड बनाया, एक झटके में ही सड़क पर आ गए।

कुछ नए संस्थानों को भी ऐसा करना पड़ा। उनकी भी योजना दोषपूर्ण थी। आमतौर पर कोई पौधा जड़ों से अंकुरित होता है और फिर ऊपर जाता है। जड़ जितनी मजबूत होगी, पौधा उतना ही ऊंचे जाएगा। आप पत्तों को सींच कर पौधे को मजबूत नहीं कर सकते। लेकिन इन नई कंपनियों ने इस बुनियादी सिद्धांत का पालन नहीं किया। उन्होंने छोटे आकार से शुरुआत करके शिखर छूना गवारा नहीं किया। उन्होंने भारी भरकम निवेश से आगाज किया। पहले दिन से ही अपने आसमानी खर्चे रखे। नतीजा यह कि मुनाफा लागत के अनुपात में नहीं निकला और निवेश का धन भी समाप्त हो गया। इसलिए भी छटनी और कटौती की तलवार चल गई।

कोई पंद्रह बरस पहले एक टीवी चैनल समूह ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ के नाम से बाजार में आया। फाइव स्टार कल्चर से यह प्रारंभ हुआ और कुछ महीनों बाद मालिकों के पास वेतन देने के लिए लाले पड़ गए। चैनल बंद करना पड़ा। मैं उसमें समूह संपादक था। मेरे भी लाखों रुपए डूब गए।

मुझे याद है कि उससे भी पंद्रह साल पहले रिलायंस समूह ने हिंदी और अंग्रेजी में साप्ताहिक ‘संडे ऑब्जर्वर’ प्रारंभ किया था। शानदार शुरुआत हुई। तड़क भड़क के साथ। आज से तीस साल पहले उस अखबार में ट्रेनी पत्रकार को पांच हजार रुपए दिए जाते थे। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस भव्यता के साथ यह अखबार शुरू हुआ होगा। इसका परिणाम भी वही ढाक के तीन पात। तीन साल पूरे होते होते ताला पड़ गया।

स्वस्थ्य पत्रकारिता को समर्पित पत्रकारों के लिए ऐसे फैसले बड़े दुख भरे होते हैं। जो दुनिया भर के लिए लड़ते हैं, उनके लिए कोई नही लड़ता। कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों की डगर आसान नहीं है मिस्टर मीडिया।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

पत्रकारिता वही है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी नहीं झुके मिस्टर मीडिया!

इन ‘अवतारों’ का दर्शक भी अब ठगा जा रहा है, इसे समझना होगा मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: सच्चे पत्रकारों का क्या वाकई इतना अकाल है?

राजेश बादल ने उठाया सवाल, यह हमारी टीवी पत्रकारिता का कौन सा चेहरा है मिस्टर मीडिया!

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इंसान के रूप में फरिश्ता थे रमेश नैयर, अब ऐसे लोग कहां हैं: राजेश बादल

बयालीस-तैंतालीस साल तो हो ही गए होंगे, जब मैं रायपुर में रमेश नैयर जी से पहली बार मिला था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 07 November, 2022
Last Modified:
Monday, 07 November, 2022
ramesnayar785455

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

नहीं याद आता कि उनसे पहली बार कब मिला था, पर यह जरूर कह सकता हूं कि पहली भेंट में ही उन्होंने दिल जीत लिया था। एकदम बड़े भाई या स्नेह से भरे एक अभिभावक जैसा बरताव। निश्छल और आत्मीयता से भरपूर। आजकल तो देखने को भी नहीं मिलता।

बयालीस-तैंतालीस साल तो हो ही गए होंगे, जब मैं रायपुर में रमेश नैयर जी से पहली बार मिला था। एक शादी में रायपुर गया था। मैं उन दिनों ‘नईदुनिया’ में लिखा करता था और राजेंद्र माथुर के निर्देश पर शीघ्र ही सह संपादक के तौर पर वहां जॉइन करने जा रहा था। वहां नैयर जी और ललित सुरजन जी की शुभकामनाएं लेना मेरे लिए आवश्यक था। मैं ‘देशबंधु’ में भी तब बुंदेलखंड की डायरी लिखा करता था। नैयर साब के पास डाक से ‘नईदुनिया’ पहुंचता था और ‘देशबंधु’ तो वे पढ़ते ही थे। फिर वे मेरा आलेख पढ़कर चिट्ठी लिखकर अपनी राय प्रकट करते थे। उनके खत हौसला देते थे। फिर जहां-जहां भी गया, कभी फोन तो कभी चिट्ठी के जरिए संवाद बना रहा।

अपने उसूलों की खातिर उन्होंने कई बार नौकरियां छोड़ीं थीं और आर्थिक दबावों का सामना किया था। लेकिन कभी भी उनकी पीड़ा जबान पर नही आई। कुछ-कुछ मेरे साथ भी ऐसा ही था। जब भी मैंने अपने सरोकारों और सिद्धांतों के लिए इस्तीफे दिए तो वे नैयर साब ही थे, जो सबसे पहले फोन करके पूछते थे कि भाई घर कैसे चला रहे हो। कोई मदद की जरूरत हो तो बताओ। मैं कहता था कि जब तक आपका हाथ सिर पर है तो मुझे चिंता करने की क्या आवश्यकता है?

एक उदाहरण बताता हूं। मैं उन दिनों एक विख्यात समाचार पत्र में समाचार संपादक था। सितंबर 1991 के अंतिम सप्ताह में प्रख्यात श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी की हत्या छत्तीसगढ़ के पूंजी पतियों ने करा दी। वे मेरे मित्र भी थे। इसके बाद मेरे हाथ कुछ दस्तावेज लगे। वे संदेह की सुई सही दिशा में मोड़ते थे। मैंने आशा भाभी (श्रीमती नियोगी) से संपर्क किया। संयोग से उनके पास भी कुछ ठोस सुबूत थे। मैंने उन्हें राज्यपाल और पुलिस महानिदेशक को ज्ञापन सौंपने की सलाह दी। उन्होंने ऐसा ही किया। इसके बाद मैंने उन सारे सुबूतों और दस्तावेजों को आधार बनाकर पहले पन्ने की पट्टी (बॉटम) छह कॉलम छाप दी। छपते ही जैसे तूफान आ गया। संवाद समितियों ने मेरी खबर को आधार बनाकर देशभर में इसका विस्तार कर दिया। एक दिन बाद रात को लगभग ग्यारह बजे उन कंपनियों की ओर से एक जनसंपर्क अधिकारी आए। उनके हाथ में एक ब्रीफकेस था। उन्होंने खोलकर दिखाया तो ठसाठस नोट भरे थे। उनका कहना था कि मैं अपनी खबर का खंडन छाप दूं तो यह आपके लिए लाया हूं। मैने गुस्से पर काबू रखते हुए उन्हें दरवाजा दिखा दिया। वे बोले, सोच लीजिए। कंपनियों की पहुंच ऊपर तक है। खंडन तो छपना ही है। मैंने लगभग चीखते हुए कहा कि फिर तो आप जाइए। संपादक और मालिक को यह पैसा दे दीजिए। मैं भी देखता हूं कि सच खबर का खंडन कैसे छपता है। वे मुस्कुराए। बोले, देखिए। पैसा तो देना ही है। संपादक और मालिक को पांच लाख रुपए और बढ़ाने पड़ेंगे। मैनें उन्हें फिर एक तरह घर से निकाल दिया। उस रात मूसलाधार बरसात हो रही थी और वे भीगते हुए नोटों भरा ब्रीफकेस लेकर अपना सा मुंह लेकर लौट गए।

अगले दिन दफ्तर पहुंचा तो मालिक याने प्रबंध संपादक और संपादक ने बुलाया और बड़े प्रेम से खबर का खंडन छापने का अनुरोध किया। मैंने उन्हें रात का किस्सा बयान किया और बताया कि पूंजीपतियों का पक्ष तो छापने के लिए तैयार हूं। यह पत्रकारिता का तकाजा है। पर खंडन, वह भी अपनी खबर का, जिसके बारे में मैं सौ फीसदी आश्वस्त हूं, कैसे छाप सकता हूं। प्रबंध संपादक मुस्कुराए। बोले, वे लोग अखबार को विज्ञापनों से मदद करने के लिए तैयार हैं। आप जानते हैं कि आजकल हम आप लोगों की वेतन कितनी मुश्किल से दे पा रहे हैं। अखबार का बंटवारा हुआ है। पैसा उलझा हुआ है। मैं मुस्कुराया। रात वाले दूत की बात सच साबित हो रही थी। इसके बाद संपादक से कुछ गरमागरम संवाद हुए। वे पूंजीपतियों के दलाल की भाषा बोल रहे थे। अंततः मैंने कहा,  मेरे रहते तो खंडन नहीं छप सकता और उठकर अपनी टेबल पर आ गया। अगले दिन से संपादक ने दफ्तर आना बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि राजेश बादल की खबर का खंडन प्रकाशित होगा, मैं तभी कार्यालय आऊंगा। उनकी शर्त यह भी थी कि मुझे गलत समाचार प्रकाशित करने के लिए अखबार को माफीनामा लिखकर देना होगा। माफी नामे को पूरे संपादकीय विभाग की बैठक में पढ़कर सुनाया जाएगा। कोई भी पत्रकार ऐसी ऊटपटांग शर्त को कैसे स्वीकार कर सकता था। मेरे लिए यह इशारा काफी था । फिर भी मैं जाता रहा और संपादक घर बैठे आराम फरमाते रहे । क़रीब एक सप्ताह बीत गया । उधर खंडन नहीं छपने से पूंजीपतियों का गिरोह भी परेशान था। एक दिन मालिक याने प्रबंध संपादक ने बुलाया और कहा, राजेश! मैं तुमको खोना नही चाहता और उन संपादक के बिना समाचार पत्र चल नहीं सकता। इसलिए ऐसा कब तक चलेगा। मैंने उनसे कहा, मैं कल सुबह आपके घर आता हूं और बात करता हूं।

अगले दिन आठ अक्तूबर, 1991 को सुबह 9.20 बजे मैं उनके घर गया और इस्तीफा सौंप दिया। उन्होंने रोकने का बहुत प्रयास या अभिनय किया, पर जहां  पैसा, विवेक और सिद्धांतों पर हावी हो जाए, वहां काम करने का कोई मतलब नहीं था। बाहर निकलते हुए लोहे का दरवाजा बंद करते हुए मेरे कुछ आंसू गिरे। धुंधलाई आंखों से स्कूटर स्टार्ट करके मैं घर आ गया। मैं सड़क पर आ गया था।

मैं इस अखबार में आने से पहले राष्ट्रीय दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ में मुख्य उप संपादक था। अब सोच रहा था कि कौन सी घड़ी में त्यागपत्र दिया। मुझे प्रोविडेंट फंड का कुछ पैसा मिला था। उससे मैंने स्कूटर खरीद लिया था। अब मैं ठन ठन गोपाल था। उस दिन के बाद मेरे दुर्दिन शुरू हो गए। मेरा फोन छह सौ रुपए बिल नहीं भरने के कारण काट दिया गया। स्कूटर के पेट्रोल तक के लिए पैसे नहीं थे। यहां तक कि सब्जी खरीदने के लाले पड़ गए। अकेला रहता था। खाना खुद बनाता था। पत्रकार वार्ताओं में जाता था। चार-पांच  किलोमीटर पैदल चलकर। उन दिनों सारी पत्रकार वार्ताएं पत्रकार भवन में हुआ करती थीं। उस दौर का संघर्ष याद करके रूह कांप जाती है। यद्यपि कई अखबारों से चीफ रिपोर्टर से लेकर संपादक के पद तक के प्रस्ताव आए, मगर मैंने आठ अक्तूबर को ही फैसला ले लिया था कि अब किसी समाचार पत्र में नौकरी नहीं करूंगा। धीरे-धीरे फ्री लांसर के तौर पर काम शुरू कर दिया। वह मेरी शून्य से शुरुआत थी। संघर्ष की वह मार्मिक और घनघोर संकटों वाली दास्तान फिर कभी सुनाऊंगा। लौटता हूं रमेश नैयर जी पर।  

उस दौर में रमेश नैयर जी मेरा बड़ा संबल बने। फोन कटा था मगर आने वाले कॉल आ सकते थे। नैयर जी को न जाने कैसे इस पूरी कहानी की भनक लग गई। फिर तो प्रायः रोज ही उनके फोन आने लगे। वे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा देते। मैं सोचा करता था कि ईश्वर को किसी ने नहीं देखा, लेकिन अगर उसका कोई अंश है तो वह नैयर जी में है। राजेंद्र माथुर जी के असामयिक निधन के बाद वे मेरे सबसे बड़े शुभ चिंतक थे। याद करता हूं कि उस दौर में भोपाल के बड़े नामी गिरामी पत्रकारों ने मुझसे मिलना बंद कर दिया था, जिनका मैं आदर करता था। वे बेरुखी दिखाने लगे थे। उन पत्रकारों के प्रति मेरे मन में आज भी कोई श्रद्धा नहीं है। अब मैं केवल अधिक आयु के कारण उनका सम्मान करता हूं। उनमें से अधिकांश को उन पूंजीपतियों ने खरीद लिया था। वे उस रिश्वतखोर संपादक के साथ मंच साझा करते थे। उनकी हकीकत जानते थे। मगर मुझे कोई दुःख नहीं था। दुःख था तो यही कि जिन लोगों का पत्रकारिता के कारण सम्मान करता था, उनके मुखौटे उतर गए थे। रमेश नैयर फरिश्ते की तरह मेरी जिन्दगी में आए थे। वे उन दिनों संडे ऑब्जर्वर, हिंदी में सहायक संपादक थे। उनके अलावा राजीव शुक्ल भी ‘ऑब्जर्वर’ में थे। लगभग दस बारह बरस पहले वे और मैं ‘रविवार’ में रिपोर्टिंग कर चुके थे। एक दिन मैंने देखा कि मेरी संघर्ष समाचार कथा उसमें प्रकाशित हुई थी। उसमें  हवाला दिया गया था कि मुझे कैसे अखबार की नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा था। नैयर जी का फोन तो अब रोज ही आने लगा था। एक दिन उनका सुबह सुबह फोन आया कि आप नियमित रूप से ‘संडे ऑब्जर्वर’ के लिए लिखिए। हम आपको उतना पारिश्रमिक तो दे ही देंगे, जितनी आपकी वेतन पिछले अखबार में थी। मेरी बांछें खिल गई। मेरा पुनर्जन्म हुआ था। संडे ऑब्जर्वर से हर महीने पहले सप्ताह में पैसे आने लगे थे। नैयर जी इसके बाद मेरी हर प्रगति की हर गाथा पर नजर रखते थे। मैं भी उन्हें अपनी हर बात बताया करता था। जब तक वे संडे ऑब्जर्वर में रहे, मैं लिखता रहा। हालांकि बाद में मेरी नियति ने करवट बदली और दो तीन साल दिन रात एक करने के बाद मैं अपने सहकर्मियों को करीब लाख रुपए का पेशेवर पारिश्रमिक देने में सक्षम था। मेरी स्थिति से नैयर साब प्रसन्न थे। उनके चेहरे पर खुशी देखकर जो अहसास होता था मैं नहीं बता सकता। इसके बाद जब भी रायपुर गया, उनसे मिलने का कोई अवसर नहीं गंवाया। कोई दस बरस पहले उन्होंने अपनी किताब- धूप के शामियाने भेंट की थी। मैं भारत विभाजन के समय उनके परिवार के शरणार्थी की तरह पाकिस्तान से आने की दास्तान सुनकर हिल गया था।

आज नैयर जी की देह हमारे साथ नहीं है। पर वे मेरे साथ हमेशा रहेंगे। मेरी श्रद्धांजलि।

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TV न्यूज बिजनेस और बॉलीवुड के वर्तमान परिदृश्य पर डॉ. अनुराग बत्रा ने उठाए ये बड़े सवाल

वर्ष 2020 में जब कोविड-19 ने दस्तक दी थी, उसके बाद के 12 महीने न्यूज चैनल्स के लिए काफी अनुकूल रहे और यह एक तरह से विजेता बनकर उभरे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 November, 2022
Last Modified:
Thursday, 03 November, 2022
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डॉ. अनुराग बत्रा ।।

वर्ष 2020 में जब कोविड-19 ने दस्तक दी थी, उसके बाद के 12 महीने न्यूज चैनल्स के लिए काफी अनुकूल रहे और यह एक तरह से विजेता बनकर उभरे, वहीं इस दौरान दर्शक न आने से सिनेमा हॉल्स की हालत खराब रही और धीरे-धीरे इन हालातों ने हिंदी और बॉलीवुड सिनेमा में भी अपने पैर पसार लिए।

दरअसल, जब कोविड आया तो पहले साल में लोग इस महामारी के बारे में और देश-दुनिया में क्या हो रहा है, यह जानने के लिए टीवी चैनल्स से चिपके रहते थे। लोगों में यह जानने की उत्सुकता भी काफी रहती थी कि कोविड से जुड़े अपडेट्स कैसे मिलें और इसकी रोकथाम के क्या उपाय हैं। ऐसे में घरों से बाहर न निकलने की मजबूरी में अपडेट्स के लिए ज्यादातर लोग न्यूज चैनल्स का ही सहारा लेते थे। इस दौरान न्यूज रिपोर्टर्स, कैमरामैन और न्यूजरूम से जुड़े तमाम प्रोफेशनल्स ने दिन-रात लगातार मेहनत कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि लोगों को कोविड से जुड़े तमाम अपडेट्स और देश-दुनिया की खबरें मिलती रहें।

इसके विपरीत कोविड को लेकर तमाम पाबंदियों के कारण देशभर के सिनेमा हॉल बंद कर दिए गए, फिर चाहे वे मल्टीप्लेक्स हों अथवा सिंगल थियेटर्स। दर्शकों के लिए सिनेमा हॉल्स में सिनेमा देखना मुश्किल हो गया, ऐसे में सिनेमा के शौकीनों ने ‘ओवर द टॉप’ (OTT) प्लेटफॉर्म का रुख कर लिया। ओटीटी ने व्युअर्स के लिए सभी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट खोजने के लिए प्रेरित किया और उन्हें अपने घर में सुरक्षित माहौल में कंटेंट देखने का आदी बना दिया।

इसके बाद सरकार द्वारा चलाए गए टीकाकरण अभियान और कोविड में कमी के कारण धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था पटरी पर पटरी पर लौटने लगी। मैरिज हॉल, होटल्स, रेस्टोरेंट्स, एयरलाइंस, मॉल्स, स्कूल और कार्यालय आदि फिर खुल गए और अपने पुराने रूप में लौटने लगे, लेकिन उत्तर भारत के सिनेमा हॉल्स में यह ट्रेंड दिखाई नहीं दिया। ऐसा लगने लगा कि हिंदी फिल्मों और बॉलीवुड कंटेंट के लिए सिनेमाघरों में आने वाले व्युअर्स की कमी हो गई है। इसके विपरीत दक्षिण भारत के मार्केट ने एक के बाद एक हिट फिल्में देना जारी रखा और इसने सिनेमा हॉल्स में रिकॉर्ड संख्या में दर्शकों को आकर्षित किया। बॉक्स ऑफिस पर अपने कलेक्शन के कारण दक्षिण भारत का सिनेमा मार्केट और बड़ा होता चला गया। दक्षिण भारतीय फिल्में देखने के लिए सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़ उमड़ रही थी। 'आरआरआर' (RRR), 'पीएस 1' (Ponniyin Selvan 1) और 'पुष्पा' (Pushpa: The Rise) जैसी फिल्में बहुत बड़ी हिट साबित हुईं। बॉलीवुड की सबसे बड़ी हिट मूवी भी इनके पास तक नहीं ठहर रही थी। इस स्थिति ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर हो क्या रहा है और दक्षिण सिनेमा की तुलना में बॉलीवुड के इस तरह के कमजोर प्रदर्शन के पीछे क्या कारण है?

सिनेमा प्रेमी होने के नाते मुझे सिनेमा हॉल में जाकर फिल्में देखना पसंद है। फरवरी 2021 में जब कोरोना की लहर थम सी गई और प्रतिबंधों में कुछ समय के लिए ढील दी गई तो मैं साउथ दिल्ली के एक सिनेमा हॉल में हिंदी मूवी देखने गया। वहां सिनेमा हॉल में मुझे अपने साथ सिर्फ छह दर्शक और मिले। इस घटना ने मुझे तब सोचने पर मजबूर कर दिया और पिछले लंबे समय से मैं इस बारे में लगातार सोच रहा हूं। अपनी इंडस्ट्री के तमाम लोगों की तरह मैं हतप्रभ था कि आखिर यह हो क्या रहा है और क्यों हो रहा है? मैं सोच रहा था कि आखिर बॉलीवुड का आकर्षण कहां खत्म हो गया?

वहीं, न्यूज चैनल्स ने बेहतर प्रदर्शन करना जारी रखा और उनका रेवेन्यू स्थिर रहा। देखा जाए तो कोविड के पहले 21 महीनों में उनके रेवेन्यू में वास्तव में बढ़ोतरी ही हुई है। हालांकि इस साल अप्रैल के बाद कुछ प्रमुख न्यूज चैनल्स के व्युअर्स की संख्या में गिरावट आई और मैंने टीवी रेटिंग मैकेनिज्म पर कुछ बुनियादी सवाल पूछते हुए एक लेख भी लिखा, जिसका अभी भी कोई जवाब नहीं मिला है।

यह भी पढ़ें: न्यूज चैनल्स की रेटिंग को लेकर डॉ. अनुराग बत्रा ने उठाए ये ‘अनसुलझे सवाल’

मेरा अब भी मानना है कि रेटिंग सिस्टम में सुधार और इसे छेड़छाड़ से बचाने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। हालांकि, जो बात मुझे सबसे ज्यादा परेशान कर रही थी, वह यह थी कि रेटिंग रिसर्च के अनुसार न्यूज चैनल/टीवी दर्शकों की संख्या नहीं बढ़ रही है। अब हमें इसकी जांच करनी होगी कि इसके लिए कौन से कारक जिम्मेदार हैं। मैं दिन में दो से तीन घंटे न्यूज देखता हूं। मैं सिनेमा के बिना तो रह सकता हूं, लेकिन टीवी न्यूज के बिना नहीं। मैं 1991 से ऐसा कर रहा हूं। पहले दूरदर्शन, फिर सीएनएन और पिछले 20 वर्षों से सभी प्रमुख न्यूज चैनल्स को देख रहा हूं। न्यूज देखना भी मेरा काम है और मैं इसे गंभीरता से लेता हूं लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि मुझे टीवी न्यूज देखना अच्छा लगता है।

यदि इसके ऐतिहासिक संदर्भ को देखें तो भारतीय टीवी न्यूज बिजनेस मुख्यत: ‘चार सी’ (Crime, Cricket, Cinema और पिछले छह वर्षों से Cacophony) पर निर्भर है। Cacophony से मेरा आशय स्टूडियो में होने वाली टीवी डिबेट्स से है। सवाल यह है कि टीवी न्यूज के बारे में ऐसा क्या बदल गया है जो इसे अपने व्युअर्स को बढ़ाने में मदद नहीं कर रहा है? क्या दर्शकों के मापन को व्यवस्थित करने के तरीके में किसी तरह की समस्या है? क्या यह सिस्टम एंटरटेनमेंट चैनल्स का फेवर करता है? मुझे नहीं पता। मुझे ऐसा नहीं लगता। हालांकि, मैं केवल इस बारे में एक सवाल पूछ रहा हूं।  

वास्तव में करीब चार साल पहले संभवत: सबसे प्रसिद्ध भारतीय मीडिया लीडर जो देश के सबसे बड़े बिजनेस के मालिक और दुनिया के अग्रणी मीडिया मालिक के साथ पार्टनरशिप कर एंटरप्रिन्योर में बदल गए हैं, ने भारतीय टीवी पर एंटरटेनमेंट कंटेंट के गिरते स्वरूप के बारे में शिकायत की थी और कुछ कठिन व गंभीर सवाल पूछे थे। यह मीडिया लीडर उन चुनिंदा लोगों में थे, जो व्युअरशिप रेटिंग मैकेनिज्म के फाउंडिंग मेंबर यानी संस्थापक सदस्य थे और मीडिया इंडस्ट्री में उनका दबदबा व विश्वसनीयता रखते थे। सवाल यह है कि एक प्रसिद्ध मीडिया लीडर ने कुछ सीधे बुनियादी सवालों के साथ एंटरटेनमेंट टीवी कंटेंट को लेकर क्यों दर्शकों की संख्या में गिरावट पर सवाल उठाया? क्या वह इससे संतुष्ट नहीं थे? क्या उनके सवालों का समाधान किया गया? केवल एक चीज जिस पर आप ध्यान देना चाहेंगे, वह यह है कि वह अब एक प्रमुख स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टर में शेयरधारक हैं, जो एंटरटेनमेंट प्लेटफॉर्म पर एक शेयरधारक भी है। मुद्दा यह है कि ये प्रश्न सभी टीवी न्यूज मालिकों, सीईओ और संपादकों द्वारा भी उठाए जाने चाहिए, क्योंकि ये बुनियादी सवाल हैं। टीवी न्यूज व्युअरशिप क्यों घट रही है?

यदि हम थोड़ी देर के लिए टीवी न्यूज व्युअरशिप डेटा और उसके यूनिवर्स को देखें, तो हमें पूछना होगा कि टीवी न्यूज व्युअरशिप न बढ़ने के क्या कारण हैं? यदि व्युअरशिप में ठहराव या कमी की बात वास्तव में सच है तो सभी को एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराने और इसे ईमानदारी से रिपोर्ट करने वाले बिजनेस मीडिया को दोष देने के बजाय टीवी न्यूज के प्रमोटर्स, सीईओ और संपादकों को आत्मनिरीक्षण करना होगा। उन्हें जवाब मिल जाएगा और अगर वे सही सवाल पूछते हैं तो उम्मीद है कि समाधान भी होगा। हालांकि मेरे विचार में टीवी न्यूज के दर्शकों की संख्या नहीं बढ़ रही है और सिनेमा हॉल दर्शकों को अपनी ओर खींचने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं, उसके पीछे एक ही तरह के कारण हैं।

1:  कंटेंट के पुराने फॉर्मूले से चिपके रहना और उसमें नयापन न लाना। कुछ नया न करना और पुराने ढर्रे पर भी चलना। बॉलीवुड और टीवी न्यूज दोनों के लिए तेजी से और बड़े पैमाने पर कंटेंट में नयापन लाने की जरूरत है।

2:  नए चैलेंजर्स मौजूदा प्लेयर्स को चकमा दे रहे हैं। नई प्रतिभाओं और विचारों को अधिक महत्व देना होगा और कंटेंट के साथ प्रयोग करने के अलावा कंटेंट की बोल्डनेस प्रदर्शित करनी होगी। यदि यह काम करती है तो इसका विस्तार किया जाना चाहिए। WION इसका एक बड़ा उदाहरण है। WION के अच्छे प्रदर्शन के पीछे कई कारण हैं, लेकिन डिजिटल की तरफ झुकाव और कंटेंट में विविधता इसके दो मुख्य कारण हैं।

3: हमें टीवी न्यूज से जुड़े सभी क्रियाकलापों खासकर एडिटोरियल और बॉलीवुड में युवा लीडर्स की जरूरत है।

4: दोनों को शॉर्टकट लेना बंद करना होगा। इसे इस तरह समझ सकते हैं। टीवी न्यूज की बात करें तो कुछ टीवी न्यूज ब्रॉडकास्टर्स इस तथ्य के बावजूद काफी हो-हल्ला कर रहे हैं कि वे नंबर वन इसलिए हैं कि उनकी अधिकांश रेटिंग लैंडिंग पेजों में किए गए निवेश से आती है, न कि कंटेंट या मार्केटिंग से। बॉलीवुड में शॉर्टकट की बात करें तो बड़े स्टार्स, बड़े डायरेक्टर्स और सेफ स्क्रिप्ट्स हैं। 

5: टीवी न्यूज और बॉलीवुड ने ‘नया स्वाद’ चख लिया है। आजकल व्युअर्स न्यूज स्टार्टअप्स से वीडियो कंटेंट ले रहे हैं, जो न सिर्फ डिजिटल है बल्कि बोल्ड भी है। यही बात बॉलीवुड पर भी लागू होती है। नए डायरेक्टर्स बोल्ड थीम्स और स्क्रिप्ट्स पर प्रयोग कर रहे हैं। वह वर्जित (taboo) मुद्दों को उठा रहे हैं जो वास्तविक हैं और लोगों को आकर्षित करते हैं। 

6:  पैमाना कई गुना बड़ा होना चाहिए और कंटेंट व डिस्ट्रीब्यूशन को बढ़ाया जाना चाहिए। टीवी न्यूज में भारतीय न्यूज ब्रॉडकास्टर्स को मेरे पसंदीदा टीवी न्यूज चैनल ‘सीएनएन’ से सीखना होगा कि वे कैसे किसी कार्यक्रम को कवर करते हैं, एंकर्स और ब्रैंड्स को आगे बढ़ाते हैं और दर्शकों को अपनी ओर खींचने के लिए एक चेहरे पर निर्भर नहीं होते हैं। वहीं बॉलीवुड को दक्षिण भारतीय सिनेमा प्रेरित कर सकता है कि कैसे उनकी क्वालिटी होती है और किस तरह का उनका प्रॉडक्शन होता है।

हालांकि ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम को ठीक करने और अधिक ईमानदार बनाने की आवश्यकता है, प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स अपने वास्तविक व्युअर्स के बारे में और अधिक ईमानदार होने के लिए लैंडिंग पृष्ठों को छोड़ सकते हैं। आप केवल वही सुधार सकते हैं जो आप माप सकते हैं। जब लैंडिंग पेज आपको व्युअरशिप देते हैं, तब अगर आप पूरे पेज के विज्ञापन निकालते हैं तो ऐसे में आप किससे मजाक कर रहे हैं? 

यह झूठी उपलब्धि की भावना है और आप चुप हैं। आप अपनी टीमों और ईकोसिस्टम को बता रहे हैं कि यह ठीक है और जो कोई भी लैंडिंग पृष्ठों पर अधिक खर्च कर सकता है, वह अपने प्रमोटरों, आंतरिक सहयोगियों और विज्ञापनदाताओं को मूर्ख बना सकता है। न,न यह गलत है। वास्तविकता को अपनाना चाहिए। इससे केवल वही लोग लाभान्वित होते हैं जो टीवी न्यूज ईकोसिस्टम को प्रभावित करना चाहते हैं। उनके झांसे में न आएं। सत्य की जीत होनी चाहिए और उसकी जीत अवश्य होगी।

(मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे इस आर्टिकल को आप exchange4media.com पर पढ़ सकते हैं। लेखक ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं। लेखक दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया पर लिख रहे हैं।)

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पत्रकारिता वही है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी नहीं झुके मिस्टर मीडिया!

यह दो घटनाएं इस बात का सुबूत हैं कि सरकार की गोद में बैठने या उसके खिलाफ एजेंडे की हद तक निंदा करना अब खतरे से खाली नहीं रहा है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 02 November, 2022
Last Modified:
Wednesday, 02 November, 2022
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

विपक्ष का समर्थन यानी पत्रकारिता में हत्या का सबब!

पाकिस्तान में पत्रकारों की जान पर बन आई है। पक्ष और प्रतिपक्ष की सियासत में पत्रकार पिस रहे हैं। हालिया दिनों में दो प्रतिभाशाली युवा पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। एक की अप्राकृतिक व रहस्यमय तरीके से मौत मुल्क में हुई और दूसरे की बहुत दूर कीनिया में हुई। दोनों पत्रकारों की सहानुभूति पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ बताई जाती है। यह दो घटनाएं इस बात का सुबूत हैं कि सरकार की गोद में बैठने या उसके खिलाफ एजेंडे की हद तक निंदा करना अब खतरे से खाली नहीं रहा है। हिंदुस्तान जैसे देश के लिए भी इसमें चेतावनी छिपी है, जहां कहा जाता है कि पत्रकार काफी हद तक आजाद हैं। यह चेतावनी दोनों पक्षों के लिए है। यह कहती है कि पत्रकारों को कमर कसकर मोर्चे पर डटने की जरूरत है तो हुकूमत के लिए संदेश यह है कि अब पत्रकारिता अपने ऑर्केस्ट्रा पर उसकी मर्जी की धुन निकालने के लिए मजबूर नहीं है।

पाकिस्तान के तेजतर्रार पत्रकार अरशद शरीफ वहां के एआरवाई चैनल में थे। उन्होंने एक शो में इमरान खान के चीफ ऑफ स्टाफ रहे शाहबाज गिल को साक्षात्कार के लिए बुलाया। गिल ने आईएसआई और वहां की सेना को जमकर कोसा। इसके बाद फौज ने गिल को गिरफ्तार कर लिया। वह अरशद को भी घेरे में लेना चाहती थी, लेकिन इमरान खान की मदद से अरशद कीनिया भाग गए। वहां वे कीनिया पुलिस की गोली का निशाना बन गए। खबरें हैं कि आईएसआई ने कीनिया पुलिस से कहा था कि अरशद अपराधी हैं। गौरतलब यह है कि इस चैनल के मालिक सलमान इकबाल भी इमरान के करीबी हैं। वे अपने चैनल पर इमरान का समर्थन करते रहे हैं। जब फौज और आईएसआई ने उन पर शिकंजा कसा तो वे भी बचने के लिए देश छोड़कर भाग गए थे।

पाकिस्तान में ही एक और इमरान समर्थक महिला पत्रकार सदफ नईम चैनल 5 की निर्भीक संवाददाता थीं। एक रात पहले ही उन्होंने इमरान ख़ान का इंटरव्यू लिया था और उनके पक्ष में सरकार पर तीखी टिप्पणियां की थीं। वे इमरान खान के लाहौर से इस्लामाबाद तक के लॉन्ग मार्च की रिपोर्टिंग कर रही थीं। इस दरम्यान वे इमरान खान की गाड़ी के पीछे चल रहे मीडिया वाले कंटेनर में सवार थीं। जब वे कंटेनर पर अपना पीस टू कैमरा रिकॉर्ड कर रही थीं, तभी एक व्यक्ति कंटेनर पर चढ़ा और उन्हें धक्का देकर भाग गया। सदफ नीचे गिरीं और कंटेनर के नीचे उनका शरीर आ गया। उन्होंने वहीं दम तोड़ दिया। प्रसंग के तौर पर बता दूं कि इमरान के लॉन्ग मार्च का प्रसारण करने पर सरकार ने सारे चैनलों पर रोक लगा दी है। अखबारों में भी उतना ही छपता है, जितना सरकार चाहती है।

पाकिस्तान की इस घटना से समूचे उप महाद्वीप को सबक लेने की आवश्यकता है। असहमति के सुरों को बंद करना और दबाना किसी सभ्य समाज या देश के हित में नहीं होता। इन दिनों भारत में भी इस तरह के अनेक षड्यंत्र किए जा रहे हैं। हुकूमतों ने मीडिया को दो खेमों में बांट दिया है। इस तरह सत्ता के समर्थन में खड़े पत्रकारों के लिए एक चेतावनी है कि जब कभी सत्ता विपक्ष में आएगी तो उनका क्या अंजाम होगा और जो सत्ता के विरोध में हैं, उनके लिए भी विरोध के एजेंडे पर निरंतर टिके रहना पेशे के संतुलन के सिद्धांत के खिलाफ है। कोई एक वर्ग सत्ता के समर्थन में है तो विरोध करना उनका धर्म नहीं बन जाता। गुण दोष के आधार पर निष्पक्ष पत्रकारिता के उसूलों का पालन करना इस दौर में बहुत जरूरी है। यह काम बेहद कठिन और चुनौती भरा है। मगर, ऐसी चुनौतियां किस जमाने में नहीं रही हैं? पत्रकारिता वही है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्रेशर में नहीं आए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: खबरदार! सजा के कोड़े के लिए हो जाइए तैयार

इन ‘अवतारों’ का दर्शक भी अब ठगा जा रहा है, इसे समझना होगा मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: सच्चे पत्रकारों का क्या वाकई इतना अकाल है?

राजेश बादल ने उठाया सवाल, यह हमारी टीवी पत्रकारिता का कौन सा चेहरा है मिस्टर मीडिया!

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‘नैना’ के बहाने टीवी चैनलों का काला सच उजागर करते संजीव पालीवाल को सलाम!

बचपन से ही मुझे पढ़ने का शौक रहा है। राम चरित मानस से लेकर महाभारत और रामचंद्र गुहा से लेकर मस्तराम कपूर तक की किताबें।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 29 October, 2022
Last Modified:
Saturday, 29 October, 2022
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

बचपन से ही मुझे पढ़ने का शौक रहा है। राम चरित मानस से लेकर महाभारत और रामचंद्र गुहा से लेकर मस्तराम कपूर तक की किताबें। गांधी से लेकर नेहरू और टैगोर से लेकर शेक्सपियर तक। वे भी, जो किसी जमाने में बंबई वीटी के इर्द गिर्द फुटपाथ पर मिला करती थीं और बनारस से होली पर निकलने वाले विशेषांक भी। चूंकि रामचरित मानस तो साल भर रोज पांच दोहे पढ़े जाते थे और वर्षों तक पढ़े गए। लेकिन कुछ ग्रन्थ या पुस्तकें ही याद आती हैं, जो कई कई बार पढ़ी गईं। इनमें ‘गीतांजलि’, ‘गुनाहों का देवता’, ‘मृगनयनी’, ‘चित्रलेखा’, ‘वे आंखें’, ‘तुम फिर आना’ तथा इसी तरह की करीब एक दर्जन किताबें होंगीं, जिनको पढ़ा और कई बार पढ़ा। हालांकि किशोरावस्था में जासूसी उपन्यास भी कम नहीं पढ़े। इब्ने सफी, बी ए, कर्नल रंजीत से लेकर जेम्स हेडली चेइज का- ‘आय वुड रादर स्टे पुअर’ जैसा घनघोर जासूसी नॉवेल तक। उनके अनेक पात्र जैसे कर्नल विनोद, कैप्टन हामिद, कासिम, सुधीर, डोरा और सोनिया आज भी मेरे जेहन में अक्सर जिंदा हो जाते हैं। कुछ किरदार दिलों में धड़कते भी हैं।

मेरा ख्याल है कि वह उमर होती ही ऐसी है। मैं कह सकता हूं कि चालीस-पचास साल पहले पढ़े जासूसी उपन्यासों की तरह कोई उपन्यास बाद में पढ़ने को नहीं मिला।

बीते दिनों मित्र संजीव पालीवाल का जासूसी उपन्यास ‘नैना’ पढ़ने को मिला। बेहद रोमांचक, सनसनीखेज और आखिरी पन्ने तक बांधकर रखने वाला। दावा कर सकता हूं कि पिछले चार दशकों में ऐसा कोई जासूसी उपन्यास कम से कम मैंने तो नहीं पढ़ा। यह एक मर्डर मिस्ट्री है। भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय टीवी चैनल की एक खूबसूरत स्टार एंकर नैना की हत्या, सुबह की सैर के वक्त हो जाती है। इसके बाद कहानी टीवी चैनल के कामकाज, उनमें काम करने वालों के अंतरंग किस्सों के इर्द गिर्द घूमती है और संदेह की सुई एक के बाद एक पात्रों पर आकर रूकती जाती है।एक घरेलू गृहणी के तेज़ तर्राट ,महत्वाकांक्षी और उन्मुक्त यौन संबंधों के जरिए करियर आगे बढ़ाने वाली युवती में बदलने की कहानी पल-पल रहस्य और उत्सुकता जगाती है।

चूंकि मैंने भी अपनी छियालीस साल की पत्रकारिता में पैंतीस बरस टेलिविजन की दुनिया में बिताए हैं इसलिए एक एक लफ्ज मेरी यादों में एक फिल्म की तरह चलता रहा। कहां हम लोगों ने मुल्क के पहले चैनल की शुरुआत की थी। उन दिनों के मापदंड कैसे थे। स्वस्थ पत्रकारिता के कीर्तिमान रचे गए और कैसे चैनल इंडस्ट्री आज एक स्याह और भयानक अंधी सुरंग में समा गई है। पत्रकारिता के सरोकार गुम हो चुके हैं। नैना मौजूदा दौर का एक दस्तावेज है, जिसे संजीव ने अद्भुत किस्सागोई के जरिए हमारे सामने पेश किया है। इसमें शॉर्ट कट सक्सेस के फार्मूले, प्यार की कारोबारी परिभाषाएं, बिखरते परिवार, रिश्तों की टूटन, जिस्म और भावना के घिनौने रिश्ते- सब कुछ आप इसमें पाएंगे। मुझे नहीं लगता कि भाई संजीव पालीवाल ने इसमें चैनलों की अंतर कथाओं का कोई अतिरंजित रूप पेश किया है। बहुत कुछ तो मेरे सामने घटता रहा है।

कह सकता हूं कि संजीव ने कमाल का लिखा है। मैंने कहानियां कम ही लिखी हैं। शायद चार या पांच। एक कहानी सत्रह साल पहले राजेंद्र यादव जी के अनुरोध पर ‘हंस’ के लिए लिखी थी- ‘उसका लौटना’। हंस के उस विशेषांक में टीवी चैनलों के भीतर की ऐसी ही बदशक्ल होती दुनिया पर टीवी पत्रकारों ने कहानियां लिखी थीं। नैना पढ़ते हुए कई बार उस विशेषांक की याद आई। 

बहरहाल! इस चैनल इंडस्ट्री की जब तस्वीर बदल रही थी, तो मैंने लगभग अठारह साल पहले एक तुक बंदी लिखी थी। उसकी कुछ पंक्तियां अभी तक याद हैं -

ये है भट्टी, हम हैं ईंधन, बाकी सब कुछ जन गण मन ।

न कुछ तेरा, न कुछ मेरा, बीवी बच्चे जन गण मन

काम किए जा, काम किए जा और झोंक दे तन मन धन

क्योंकि चैनल दौड़ रहा है, इसीलिए सब जन गण मन

ढूंढते रह जाओगे खबरें, बरस रहे हैं विज्ञापन

बनी जिंदगी एक मशीन, चैनल बन गया नंबर वन

और भी इससे आगे लंबी रचना है। फिर कभी उसके परदे के पीछे की कहानी सुनाऊँगा। फिलवक्त तो यही कहूंगा कि ‘नैना’ आज की टीवी इंडस्ट्री के सच को उजागर करने वाला नायाब शाहकार है। जो भी इस पेशे से जुड़े हैं, उनके लिए भी संग्रहणीय है।

किताबों की इस श्रृंखला में अगली किताबें डॉक्टर मुकेश कुमार की ‘मीडिया मंडी’ पर और यशवंत व्यास की पुस्तक ‘गुलज़ार’ पर।

 

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'इन्हीं खूबियों से चित्रा त्रिपाठी लिख रही कामयाबी की इबारत'

नई पीढ़ी की लड़कियां उससे सीख सकती हैं कि अगर मेहनत और लगन है तो सफलता दूर नहीं है। मीडिया में जितनी भी नई लड़कियां आ रही हैं, उनमें ज्यादातर का सपना चित्रा त्रिपाठी जैसी एंकर बनने का है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 13 October, 2022
Last Modified:
Thursday, 13 October, 2022
Chitra Tripathi

18 सितंबर 2007 को मैंने न्यूज 24 चैनल ज्वाइन किया था। मुझसे पहले कई लोग आ चुके थे। कुछ पुराने साथी थे, कुछ नए साथियों से परिचय हुआ। न्यूज रूम में मैंने देखा कि एक खूबसूरत लड़की सिर झुकाए कुछ पढ़ रही थी। अगले दिन जब मैं दफ्तर आया तो वो लड़की फिर कुछ पढ़ते नजर आई। सीट से उठी नमस्कार किया, बोली- सर मैं चित्रा त्रिपाठी Chitra Tripathi। मैं भी गोरखपुर से हूं। विमलेश शुक्ला जी ने कहा था आप भी यहां आ रहे हैं। यहां से परिचय शुरू हुआ था।

चैनल का काम धाम शुरू हुआ। एंकरिंग की रिहर्सल भी शुरू हुई। मैंने चित्रा को किसी से ज्यादा बात करते नहीं देखा। वो कुछ न कुछ पढ़ती रहती थी या फिर एंकरिंग की प्रैक्टिस करती थी। गपबाजी नहीं करती थी। खांटी पूर्वांचल की लड़की। अंग्रेजी लिखनी-पढ़नी, समझनी तो ठीक से आती थी, लेकिन जुबान पर नहीं चढ़ पाई थी। अंग्रेजी सीखने और बोलने की ललक थी तो मेहनत सबसे ज्यादा अंग्रेजी पर ही की। समय बीतता रहा, हमारे घरेलू रिश्ते हो गए। कुछ साल बाद चित्रा जैसे परिवार में ही शामिल हो गई।

चित्रा गोरखपुर विश्वविद्यालय की उपज है। एनसीसी का सी सर्टिफिकेट उसके पास है। एमए में गोल्ड मेडलिस्ट रही। परिवार में लड़कियों के आगे जाने का कोई इतिहास नहीं था। संपन्नता से कोई करीबी नाता नहीं था। पढ़ाई के साथ उसे मौका मिला गोरखपुर के एक केबल चैनल- 'सत्या' में काम करने का। एक दिन की एंकरिंग के शायद 300 रुपये मिलते थे। फिर ईटीवी यूपी-उत्तराखंड में सेलेक्शन हुआ 5 हजार रुपये की तनख्वाह पर। वहां काम करने के बाद न्यूज-24 में 16 हजार रुपये की तनख्वाह पर उसने ज्वाइन किया था। आज चित्रा शायद देश की सबसे ज्यादा तनख्वाह पाने वाली महिला एंकर है। चित्रा को एबीपी न्यूज चैनल ने चर्चा के मुताबिक करीब 1 करोड़ 20 लाख रुपये के सालाना पैकेज पर रखा है। हालांकि चित्रा से मैंने इस चर्चा की पुष्टि नहीं की है।

जिन्हें चित्रा की ये तनख्वाह दिख रही है, ये मुकाम दिख रहा है, शायद उन्होंने उसका संघर्ष नहीं देखा है। यहां तक पहुंचने के लिए उसके पैरों में न जाने कितनी बार कितने छाले पड़े हैं। पीड़ा झेली है, अपमान भी सहा है। करियर में कई उतार चढ़ाव आए। कोई और लड़की होती तो शायद टूट जाती, लेकिन संघर्षों की आग में तपकर निकली इस लड़की ने हार नहीं मानी। 

'सहारा समय' न्यूज चैनल से हटने के बाद चित्रा ने बहुत संघर्ष किया। कई चैनलों में कोशिश की, लेकिन नौकरी नहीं मिली। अच्छे रिश्तों का दावा करने वालों ने भी मुंह फेर लिया। एक चैनल में मैंने ही उसे भेजा था अपने एक मित्र के पास। तब शायद चित्रा वहां 50 हजार रुपये की तनख्वाह पर भी ज्वाइन कर लेती, लेकिन उसके विरोधियों ने वहां उसका चयन होने नहीं दिया।

जब इंडिया न्यूज में उसने कामयाबी की पटकथा लिखनी शुरू की तो उसी चैनल से उसे एक लाख रुपये की सैलरी का ऑफर मिला। मजे की बात सुनिए। अभी करीब साल भर पहले मेरे उसी मित्र का मेरे पास फोन आया, जो तब उस चैनल के हेड बन गए थे। उन्होंने मुझसे कहा कि चित्रा से बात कीजिए। अगर वो यहां आती है तो 10 लाख रुपये महीने का ऑफर तो चैनल की तरफ से है, अगर वो ज्यादा मांगेगी तो चैनल पीछे नहीं हटेगा। यानी जहां 50 हजार रुपये की नौकरी नहीं मिली थी, वहां से 10 लाख रुपये महीने का ऑफर मिला था। अगर वो चाहती तो उस वक्त वो डेढ़ करोड़ रुपये के पैकेज पर भी जा सकती थी, लेकिन  उसने विनम्रता से मना कर दिया।

लंबे संघर्ष के बाद चित्रा को इंडिया न्यूज में काम मिला और वहां 'बेटियां' नाम से उसका शो शुरू हुआ। चैनल से ज्यादा चित्रा के उस शो को पहचान मिली। पत्रकारिता जगत का सबसे प्रतिष्ठित 'रामनाथ गोयनका' अवार्ड भी मिला।  उसके बाद एबीपी न्यूज में चित्रा ने स्टूडियो में एंकरिंग और न्यूजरूम से बाहर रिपोर्टिंग में अपनी धाक जमाई।

जब आजतक में उसे मौका मिला तो फिर वो शोहरत की बुलंदी पर पहुंची। उसकी मेहनत, लगन की बदौलत उसे आजतक का प्रतिष्ठित 'चेयरमैन अवार्ड' भी मिला। आजतक के चैनल हेड सुप्रिय प्रसाद ने 'बुलेट रिपोर्टर' शो शुरू किया तो ये मौका उन्होंने चित्रा को दिया। चित्रा की बुलेट चली तो वो लड़कियों के लिए बुलेट की ब्रांड एंबेसडर बन गई। लड़कियों में बुलेट चलाने का पैशन हो गया। उसी तर्ज पर दूसरे चैनल्स ने बाइक और स्कूटी पर लड़कियों को चुनावी कवरेज  में उतारा। 

चित्रा दूसरी पीढ़ी की एंकर्स में फिलहाल टॉप-3 में है। कामयाबी की सीढ़ियां काफी तेज चढ़ी है, इसी वजह से उसे कई बार समकक्षों की ईर्ष्या का पात्र भी बनना पड़ा है। कई एंकर्स उसके साथ एंकरिंग नहीं करना चाहती थीं, लेकिन उसकी मेहनत और लगन का हर कोई कायल रहा। अभी कुछ ही दिन पहले एक महिला एंकर से बात हो रही थी। चित्रा को बहुत पसंद नहीं करती थी, मैं ये बात जानता हूं, लेकिन उसने कहा-सर चित्रा बहुत मेहनती है। करियर को लेकर बहुत ही गंभीर है। किसी भी मोर्चे पर कभी भी जाने के लिए तैयार रहती है, ऐसे में उसे ऊंचाई पर तो जाना ही है।

मैं जातिवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद से दूर रहता हूं, लेकिन आज एक क्षेत्रवादी बात भी कहना चाहता हूं। चित्रा आज जिस मुकाम पर है वो गोरखपुर और पूर्वांचल के लिए गौरव की बात है। पूर्वांचल की जिन लड़कियों को बारहवीं पास करने के  बाद शादी-ब्याह और चूल्हे-चौके में झोंकने के लिए तैयार कर दिया जाता है। चित्रा उन सबके लिए रोल मॉडल है। पूर्वांचल की लड़कियां कह सकती हैं-मैं पढ़ना चाहती हूं क्योंकि मैं चित्रा त्रिपाठी बनना चाहती हूं। मीडिया में जितनी भी नई लड़कियां आ रही हैं, उनमें ज्यादातर का सपना चित्रा त्रिपाठी जैसी एंकर बनने का है।

महिला एंकर्स के साथ एटीट्यूड का एक ऐसा रिश्ता है, जिसे अमूमन उनसे अलग नहीं किया जा सकता है। चित्रा में कोई एटीट्यूड नहीं है। कुछ भी गलत होता है तो वो माफी मांगने में देर नहीं लगाती। कामयाबी ने उसका दिमाग खराब नहीं किया। आज भी वो जमीन से जुड़ी है। पॉजिटिव है तो निगेटिव चीजों को नजरअंदाज कर देती है। कोई जिद नहीं, किसी से कोई बड़ी अपेक्षा नहीं, कोई शर्त नहीं, किसी से कोई शिकायत भी नहीं। वो चुनौतियां लेती है और उसे कामयाबी से अंजाम तक पहुंचाती है।

श्वेता सिंह की जबर्दस्त फैन चित्रा आज भी अपने शो से पहले विषय का पूरा अध्ययन करती है, रिसर्च तैयार करती है। नई पीढ़ी की लड़कियां उससे  सीख सकती हैं कि अगर मेहनत और लगन है तो कामयाबी दूर नहीं है। मैं जानता हूं कि चित्रा अभी रास्ते में है। मंजिल अभी दूर है। अभी तमाम मुकाम आएंगे, तमाम मंजिले आनी बाकी हैं। चित्रा को एबीपी न्यूज की इस पारी के लिए मेरी तरफ से ढेर सारी बधाइयां। ऐसे ही जीतती रहो। 

(वरिष्ठ टीवी पत्रकार और ‘न्यूज नेशन’ में एग्जिक्यूटिव एडिटर विकास मिश्र की फेसबुक वॉल से साभार)

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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, अपनी उपयोगिता क्यों खो रहा है संयुक्त राष्ट्र

संसार की सर्वोच्च पंचायत संयुक्त राष्ट्र पर सवालिया निशान और विकराल होते जा रहे हैं। इसकी हर बैठक अपने पीछे ऐसे सवालों का एक गुच्छा छोड़ जाती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 September, 2022
Last Modified:
Tuesday, 27 September, 2022
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

संसार की सर्वोच्च पंचायत संयुक्त राष्ट्र पर सवालिया निशान और विकराल होते जा रहे हैं। इसकी हर बैठक अपने पीछे ऐसे सवालों का एक गुच्छा छोड़ जाती है। यह गुच्छा सुलझने के बजाय और उलझता जाता है। फिलहाल, इसके सुलझने की कोई सूरत नजर नहीं आती, क्योंकि अब इस शिखर संस्था पर हावी देशों की नीयत और इरादे ठीक नहीं हैं।

किसी जमाने में वे वैश्विक कल्याण के नजरिये से काम करते रहे होंगे, लेकिन आज वे संयुक्त राष्ट्र को अपना-अपना हित साधने का मंच बना चुके हैं। जिस पंचायत में पंच और सरपंच अपने गांव या कुनबे के खिलाफ काम करने लगें तो उनके प्रति अविश्वास प्रस्ताव लाकर हटाने की जुर्रत कौन कर सकता है? कई पंचों की आपस में नहीं बनती तो कुछ पंच मिलकर सरपंच के खिलाफ हैं। जो पंच अल्पमत में हैं, वे सीधे-सीधे अपने मतदाताओं से मिलकर गुट बना रहे हैं।

ऐसे में सार्वजनिक कल्याण हाशिये पर चला जाता है और सारा जोर निजी स्वार्थ सिद्ध करने पर हो जाता है। संस्था की साख पर कोई ध्यान नहीं देता। संयुक्त राष्ट्र कुछ ऐसी ही बदरंग तस्वीर बनकर रह गया है।

संयुक्त राष्ट्र की हालिया बैठक साफ-साफ संकेत देती है कि अब इसके मंच पर समूचा विश्व दो धड़ों में बंटता जा रहा है। पश्चिम और यूरोप के गोरे देश एशिया और तीसरी दुनिया के देशों को बराबरी का दर्जा नहीं देना चाहते। विडंबना यह है कि एशियाई देश भी इसे समझते हैं, मगर एकजुट होकर प्रतिकार भी नहीं करना चाहते। प्रतिकार तो छोड़िए, वे सैद्धांतिक आधार पर एक-दूसरे का साथ नहीं देते।

रिश्तों में आपसी कड़वाहट और विवाद से वे उबर नहीं पाते। जिस चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दिलाने में भारत ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया, वही अब सुरक्षा परिषद की स्थायी समिति के लिए भारत की राह में रोड़े अटकाता है। अतीत गवाह है कि भारत ने एक तरह से सुरक्षा परिषद में अपनी सीट चीन को सौंपी थी, उसी चीन का व्यवहार लगातार शत्रुवत है। वह न केवल भारत के खिलाफ अभियान छेड़ने में लगा हुआ है, बल्कि पाकिस्तान पोषित आतंकवाद को भी संरक्षण दे रहा है।

इस मसले पर उसने अपने वीटो का दुरुपयोग करने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 1267 को उसने एक तरह से अप्रासंगिक बना दिया है। पंद्रह अक्तूबर 1999 को यह प्रस्ताव अस्तित्व में आया है। इसके मुताबिक कोई भी सदस्य देश किसी आतंकवादी को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव रख सकता है। लेकिन उसे सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की मंजूरी लेनी होगी। यहां चीन हर बार अपनी टांग अड़ा देता है। ऐसे में यह प्रस्ताव कोई मायने नहीं रखते।

भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने चीन और पाकिस्तान का नाम लिए बिना उनको आक्रामक अंदाज में घेरा तो सही, लेकिन उससे चीन के रुख में अंतर नहीं आया। भारत के इस रवैये पर अब यूरोपीय और पश्चिमी देश भी ज्यादा ध्यान नहीं देते। जब उनके अपने मुल्क में आतंकवादी वारदात होती है तो कुछ समय वे चिल्ल-पों मचाते हैं, मगर भारत की तरह वे हमेशा यही राग नहीं अलापते। भारत की स्थिति इसलिए भी अलग है कि पाकिस्तान ने कश्मीर में बारहों महीने चलने वाला उग्रवादी अप्रत्यक्ष आक्रमण छेड़ा हुआ है इसलिए यूरोपीय और पश्चिमी राष्ट्रों की प्राथमिकता सूची में यह मसला कभी नहीं आता।

दिलचस्प है कि उसी चीन को हद में रखने के लिए अब यूरोपीय देश और अमेरिका तक सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन भी भारत की सदस्यता के पक्ष में बयान तो देते हैं लेकिन ठोस कुछ नहीं करते। वे भारत की कारोबारी और रणनीतिक प्राथमिकता को ध्यान में नहीं रखना चाहते। अब वे संयुक्त राष्ट्र के बहाने हिंदुस्तान को चीन और रूस से अलग करने पर जोर दे रहे हैं।

भारत एक बार चीन के बारे में सोच सकता है, लेकिन रूस से वह कुट्टी नहीं कर सकता। उसकी अपनी क्षेत्रीय परिस्थितियां हैं, जिन पर गोरे देश ध्यान नहीं देना चाहते। कमोबेश रूस के हाल भी ऐसे ही हैं। वह इसीलिए भारत के विरोध में नहीं जा सकता। हिदुस्तान के साथ ऐतिहासिक संबंधों का रूस ने हमेशा गरिमामय ध्यान रखा है।

यही कारण है कि यूक्रेन के साथ रूस की जंग में भारत खुलकर रूस विरोधी खेमे में शामिल नहीं हुआ है। जिस तरह भारत पीओके में चीन की सेनाओं की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं कर सकता, उसी तरह रूस भी यूक्रेन के बहाने अपनी सीमा पर नाटो फौजों की तैनाती कैसे पसंद कर सकता है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र महाशक्तियों के अपने-अपने हितों का अखाड़ा बन गया है। सदस्य देश इन बड़ी ताकतों के मोहरे बनकर रह गए हैं।

तो संयुक्त राष्ट्र अब क्या कर सकता है? अमीर और रौबदार देशों के हाथ की कठपुतली बनने के सिवा उसके पास विकल्प ही क्या है? गोरे देश एशियाई मुल्कों के आपसी झगड़ों का लाभ उठाते हुए दादागीरी कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के धन पर पल रहा है। अमेरिका के इशारे पर ही संयुक्त राष्ट्र की दिशा निर्धारित होती है।

मौजूदा परिस्थितियों में इस शीर्ष संस्था की विश्वसनीयता निश्चित रूप से दांव पर लग गई है। भारत लंबे समय से इस शिखर संस्था की कार्यप्रणाली और ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन की मांग करता आ रहा है। उसकी मांग को अभी तक विश्व बिरादरी का व्यापक समर्थन नहीं मिला है। मगर देर-सबेर यह सवाल अंतरराष्ट्रीय मंच पर अवश्य उभरेगा कि यदि कोई शिखर संस्था अपनी उपयोगिता खो दे तो फिर उसका विसर्जन ही उचित है।

(साभार: लोकमत हिन्दी)

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न्यूज चैनलों की हालत जैसी है, वैसी रही तो खोखला हो सकता है लोकतंत्र: डॉ. वैदिक

हमारे टीवी चैनलों की दशा कैसी है, इसका पता सर्वोच्च न्यायालय में आजकल चल रही बहस से चल रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 23 September, 2022
Last Modified:
Friday, 23 September, 2022
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हमारे टीवी चैनलों की दशा कैसी है, इसका पता सर्वोच्च न्यायालय में आजकल चल रही बहस से चल रहा है। अदालत ने सरकार से मांग की है कि टीवी चैनलों पर घृणा फैलाने वाले बयानों को रोकने के लिए उसे सख्त कानून बनाने चाहिए। पढ़े हुए शब्दों से ज्यादा असर, सुने हुए शब्दों का होता है। टीवी चैनलों पर उंडेली जानेवाली नफरत, बेइज्जती और अश्लीलता करोड़ों लोगों को तत्काल प्रभावित करती है।

अदालत ने यह भी कहा है कि टीवी एंकर अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए उटपटांग बातें करते हैं, वक्ताओं का अपमान करते हैं, ऐसे लोगों को बोलने के लिए बुलाते हैं, जो उनकी पनपसंद बातों को दोहराते हैं। अदालत ने एंकरों की खिंचाई करते हुए यह भी कहा है कि वे लोग वक्ताओं को कम मौका देते हैं और अपनी दाल ही दलते रहते हैं। असलियत तो यह है कि आजकल भारत के लगभग सारी टीवी चैनल अखाड़ेबाजी में उलझे हुए हैं। एक-दो चैनल अपवाद हैं लेकिन ज्यादातर चैनल चाहते हैं कि उनके वक्ता एक-दूसरे पर चीखे-चिल्लाएं और दर्शक लोग उन चैनलों से चिपके रहें।

हमारे चैनलों पर आजकल न तो विशेषज्ञों को बुलाया जाता है और न ही निष्पक्ष बुद्धिजीवियों को! पार्टी-प्रवक्ताओं को बुलाकर चैनलों के मालिक अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे रहते हैं। इसीलिए हमारे टीवी चैनलों को, जैसे अमेरिका में पहले कहा जाता था, ‘इडियट बॉक्स’ याने ‘मूरख बक्सा’ कहा जाने लगा है। भारत के विधि आयोग ने सुझाव दिया था कि भारतीय दंड संहिता में एक नई धारा जोड़कर ऐसे लोगों को दंडित किया जाना चाहिए, जो टीवी चैनलों से घृणा, अश्लीलता, अपराध, फूहड़पन और सांप्रदायिकता फैलाते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय और विधि आयोग की यह चिंता और सलाह ध्यान देने योग्य है लेकिन उस पर ठीक ढंग से अमल होना लगभग असंभव है। टीवी पर बोला गया कौन सा शब्द उचित है या अनुचित, यह तय करना अदालत के लिए आसान नहीं है और अत्यंत समयसाध्य है। कोई कानून बने तो अच्छा ही है लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि टीवी चैनल खुद ही आत्म-संयम का परिचय दें। पढ़े-लिखे और गंभीर लोगों को ही एंकर बनाया जाए। उन्हीं लोगों को बहस के लिए बुलाएं, जो विषय के जानकार और निष्पक्ष हों। पार्टी-प्रवक्ताओं के दंगलों से बाज आएं। यदि उन्हें बुलाया जाए तो उनके बयानों को पहले रेकॉर्ड और संपादित किया जाए। एंकरों को सवाल पूछने का अधिकार हो लेकिन अपनी राय थोपने का नहीं।

हमारे टीवी चैनल भारतीय लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। यदि इनकी हालत जैसी है, वैसी ही रही तो हमारा लोकतंत्र खोखला भी हो सकता है।

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