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न्यूज चैनल्स की रेटिंग को लेकर डॉ. अनुराग बत्रा ने उठाए ये ‘अनसुलझे सवाल’

न्यूज चैनल्स की रेटिंग्स को दोबारा शुरू हुए 10 हफ्ते हो चुके हैं। माना जाता है कि रेटिंग्स से सभी हितधारकों के प्रदर्शन और मुद्रीकरण को एक नया आयाम मिलता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

डॉ. अनुराग बत्रा ।।

अलग-अलग न्यूज चैनल्स की रेटिंग्स को दोबारा शुरू किए हुए 10 हफ्ते का समय हो चुका है। माना जाता है कि स्टेकहोल्डर्स को अपने बिजनेस को आगे बढ़ाने, उसमें पारदर्शिता लाने और रेवेन्यू जुटाने में रेटिंग्स और मीजरमेंट काफी फायदेमंद होती है। हालांकि, ये टीवी रेटिंग्स कम से कम कहने के लिए तो काफी चौंकाने वाली और मनोरंजक है। मौजूदा स्वरूप में तमाम सवालों के जवाब मिलने और इसकी विश्वसनीयता हासिल करने के बजाय इस रेटिंग ने अपने पीछे कई अनुत्तरित सवाल छोड़ दिए हैं। ऐसा लगता है कि मौजूदा व्यवस्था रेटिंग्स की ‘चमक’ को कम करती दिख रही है और रेटिंग्स व इसके मैकेनिज्म के बारे में बहुत सारे सवाल उठाती है।

पहला सवाल तो यही है कि क्या लैंडिंग पेज व्युअरशिप को वैध व्युअरशिप के रूप में गिना जाना चाहिए और क्या इस डेटा को रेटिंग में शामिल किया जाना चाहिए? अतीत में एक ब्रॉडकास्टर ने ऐसा किया था और रेटिंग्स मैकेनिज्म के तत्कालीन सीईओ ने इसकी अनुमति दी थी।

इसके साथ ही रेटिंग मैकेनिज्म के टेक्निकल बोर्ड ने लैंडिंग पेज के डेटा को रेटिंग के रूप में प्रदर्शित करने की अनुमति देना जारी रखा है और इसे रेटिंग्स में इनपुट के रूप में माना है। मैं हितधारकों से दृढ़ता से आग्रह करता हूं कि वे लैंडिंग पेज को इनपुट के रूप में निर्धारित करने की अनुमति देने पर पुनर्विचार करें या इसके वेटेज को कम से कम किया जाए। विज्ञापनदाता वास्तविक व्युअर्स के लिए भुगतान कर रहा है, न कि ऐसे आकस्मिक व्युअर्स के लिए जिन्हें एक निश्चित पेज पर अपनी छाप छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। लैंडिंग पेज के डेटा को वैध किया जाना एक बहुत ही परेशान करने वाला चलन है।

दूसरा मुद्दा जो मुझे ज्यादा चिंतित करता है, यह है कि न्यूज चैनल के मालिक, जो इससे दूर रहे और लैंडिंग पेजों की इस तरह की व्यवस्था की आलोचना की, उन्होंने थोड़े समय में आगे रहने के लिए इस तरह की व्यवस्थाओं को अपनाना शुरू कर दिया है। कुछ न्यूज संस्थानों ने उन प्रोफेशनल्स को भी अपनाया है जो विवादों में घिरे रहे हैं और जो पहले इस तरह के कदाचार के लिए आलोचना का शिकार हो रहे थे। यह काफी परेशान करने वाली स्थिति है। हमें अपने कंटेंट और प्रक्रिया पर भरोसा रखना होगा, बजाय इसके कि हम उन प्रोफेशनल्स को नियुक्त करें जो पहले सार्वजनिक रूप से कदाचार के आरोपी रहे हों। यह दोतरफा स्थित है और न्यूज मीडिया मालिकों की छोटी नैतिकता और कम समय में बेहतर करने की उनकी उत्सुकता को दर्शाता है। आदर्श रूप से ऐसे प्रोफेशनल्स को अलग रखा जाना चाहिए था और औपचारिक तरीके से उन्हें दरकिनार कर दिया जाना चाहिए था। हमें सिस्टम को साफ करने की जरूरत है।

तीसरा मुद्दा डेटा संग्रहण (data collection) का है। डेटा एकत्रित करने वाली एक एजेंसी के तमाम एंप्लॉयी जो किसी न किसी रूप में कदाचार के आरोपी थे, उन्होंने एक नई एजेंसी जॉइन कर ली है, जो डेटा को जुटाने और संरक्षित करने वाली है। यह बड़ी विडंबना है। यह किसी भी निरीक्षण की कमी को दर्शाता है और ऐसा लगता है कि डेटा के साथ छेड़छाड़ करना काफी आसान है।

मैंने अपने जीवन में दो चीजें काफी जल्दी सीख लीं और मैं वास्तव में उन पर यकीन करता हूं। सबसे पहले प्रदर्शन मायने रखता है लेकिन यह प्रयास और योग्यता का मिला-जुला प्रभाव है, जो मायने रखता है। यह न केवल आपके अंकों और एकेडमिक उपलब्धि के बारे में है बल्कि यह समग्र विकास के बारे में भी है। कुछ जगह एकेडमिक उपलब्धि मायने रखती है, जब आप उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं या आगे पढ़ाई करते हैं। दूसरा मेरा मानना है कि ईश्वरीय आशीर्वाद मदद करता है। अगर आपके पास आशीर्वाद है तो सब कुछ काम करता है।

पिछले 10 हफ्तों में न्यूज रेटिंग्स फिर से शुरू हुई है और एक अपेक्षाकृत नए चैनल की अच्छी रेटिंग रही है। इसके पीछे युद्ध की कवरेज (war coverage) को कारण बताया गया है। कुछ साल पहले लॉन्च हुए एक अन्य चैनल ने भी अच्छा प्रदर्शन किया है। संयोग से ये दो चैनल रेटिंग दोबारा शुरू किए जाने को लेकर बहुत उत्साहित थे और इन दोनों ने अच्छा प्रदर्शन किया है।

मैं हमेशा एक बात कहता हूं जो मैंने अपने एक खास दोस्त के पिताजी से सुनी थी कि ‘इत्तेफाक भी कभी इत्तेफाकन नहीं होते हैं’ (Coincidences are also not so coincidental)। फरवरी के पहले सप्ताह में रेटिंग फिर से शुरू होने की घोषणा के दो दिन बाद इन दोनों चैनल्स ने भी व्युअरशिप में अच्छा प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था।

आइए, संवंर्धित डेटा (augmented data) को लेकर जारी न्यूजलेटर में AMAs (average minute audience in ‘000s) , Reach और TSPV  (Time Spent Per Viewer) को भी देखें। सात फरवरी को न्यूज रेटिंग्स दोबारा शुरू करने की घोषणा की गई और सबसे नया न्यूज चैनल जिसे अच्छी रेटिंग मिली है, वह तुरंत सातवें सप्ताह में ही अच्छा प्रदर्शन करना शुरू कर देता है।

इस चैनल के टाइम स्पेंड डेटा (चैनल पर बिताया जाने वाला समय) जिसने अचानक बड़े पैमाने पर व्युअरशिप हासिल कर ली, अन्य बहुत ही प्रतिष्ठित चैनल्स की तुलना में बेहद असामान्य है। बेशक, एक तार्किक कारण है कि इसका युद्ध कवरेज बेहतरीन था, जिसकी वजह से उसने ऐसा किया। पहुंच (Reach) के मामले में दूसरा हिंदी न्यूज चैनल जिसने अच्छा प्रदर्शन किया है, अब नवीनतम 12वें सप्ताह में नंबर एक बन गया है, जबकि दूसरा जो डेटा में सातवें स्थान पर था, उसे अब तीसरे नंबर पर दिखाया गया है। आइए, अब ज्यादा व्युअर्स की बात करते हैं। हिंदी चैनल जो नंबर एक बन गया है, उसके 2 घंटे से अधिक के व्युअरशिप सप्ताह दर सप्ताह बढ़ रहे हैं, जीआरपी योगदान दो घंटे से अधिक के व्युअर्स के साथ पहले सप्ताह में 11 प्रतिशत से बढ़कर 11वें सप्ताह में यह 21 प्रतिशत हो गया है।

आइए, अब टैम एनसीटी डेटा (TAM NCT data) की समीक्षा करें और इस साल के नौवें व 12वें सप्ताह में हिंदी न्यूज जॉनर में कंटेंट का अंतर देखें। यूपी और उत्तराखंड के मार्केट में नए नंबर एक के लिए असाधारण बढ़त हो रही है। ये वे दो राज्य हैं, जहां इस दौरान चुनाव होने वाले थे। क्या दर्शकों को उनके स्थानीय चुनावों की तुलना में यूक्रेन युद्ध में अधिक दिलचस्पी थी। आपको यह सवाल उन दो राज्यों में पूछना है, जहां चुनावों में यूपी और यूके के मार्केट्स में भी बहुत अधिक भागीदारी है। नए आंकड़ों में इसे रोल्ड डेटा में सभी तीन हफ्तों के अलावा अन्य सभी चैनल्स के मुकाबले समय खर्च (time spend) में अप्रत्याशित वृद्धि हासिल होती है, जिसमें गिनती के सप्ताह शामिल हैं।

पंजाब और चंडीगढ़ मार्केट में एएमए (AMA) के ट्रेंड पर नजर डालें तो इस बार पंजाब व चंडीगढ़ मार्केट में इस नए अग्रणी चैनल के लिए और भी अधिक फायदें हैं, जब एक नया राजनीतिक दल पंजाब में भारी अंतर से जीत रहा हो। अब टीएसपीवी (TSPV) ट्रेंड्स पर नजर डालें तो यह नया प्रमुख चैनल पंजाब के अलावा पंजाब और चंडीगढ़ मार्केट में अप्रत्याशित टाइम स्पेंट (time spent) स्तर दिखा रहा है, जबकि ‘आप’ द्वारा पूर्ण बहुमत प्राप्त करके नया राजनीतिक इतिहास बनाया जा रहा है और सरकार गठन हो रहा है, लेकिन दर्शक एक विशेष चैनल पर युद्ध कवरेज से चिपके हुए हैं।

आइए, अब हिंदी भाषी मार्केट (HSM) में 11वें हफ्ते की तुलना में 40वें हफ्ते में चार सप्ताह के रोलिंग डेटा को मिलियन में देखते हैं। एक सप्ताह में इसकी पहुंच (reach) में 40 मिलियन की वृद्धि हुई है, जो मुझे असंभव लगता है। खासकर मेरे जैसे ऐसे व्यक्ति के लिए जो न्यूज देखने के लिए उत्सुक रहता हो और साथ ही साथ 21 साल से अधिक समय से मीडिया देख रहा हो।

अब दूसरे जॉनर बांग्ला न्यूज की बात करते हैं। यहां यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि यह नया हिंदी लीडर बांग्ला जॉनर से बाहर निकलने का विकल्प चुनता है। फिर से इस तरह का संयोग अकस्मात नहीं हो सकता है। सात फरवरी को जब न्यूज जॉनर का डेटा जारी करने की घोषणा हुई तब हिंदी के दूसरे चैनल ने अपने बांग्ला चैनल भी भारी वृद्धि देखी है। जबकि जब इसे लॉन्च किया गया तो इसने बांग्ला शैली में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था।

अब पश्चिम बंगाल के ग्रामीण मार्केट में ‘टीएसपीवी’ (time spent per viewer) यानी व्युअर द्वारा चैनल पर बिताए जाने वाले समय के ट्रेंड को देखते हैं। कोई भी यह स्पष्ट देख सकता है कि जैसे ही रेटिंग एजेंसी द्वारा 10वें सप्ताह (4 सप्ताह के रोलिंग औसत पर) में डेटा जारी किया जाता है, इस बांग्ला चैनल को पश्चिम बंगाल के ग्रामीण बाजारों में चैनल पर बिताए गए समय के मामले में असाधारण रूप से लाभ होता है। अब इसकी पहुंच के ट्रेंड को देखते हैं। बांग्ला जॉनर में बढ़त दिखाने वाला यह चैनल अब पश्चिम बंगाल के ग्रामीण मार्केट्स में भी आगे है। यह एक ऐसा बाजार है जो एक हिंदी चैनल के लिए एक घरेलू मैदान (home ground) जैसा है और कई वर्षों में बड़े पैमाने पर निवेश और बहुत गहरी संपादकीय पैठ के साथ उसने यह पहुंच बनाई है।

पश्चिम बंगाल में 75 लाख से कम आबादी वाले शहरी बाजारों में बढ़त हासिल करने वाला यह नया बांग्ला चैनल TSPV यानी चैनल पर बिताए गए समय के मामले में भी आगे है और वर्ष 2022 के 10वें सप्ताह में पहली बार डेटा जारी होने के बाद इसमें यह उछाल आया है। पश्चिम बंगाल में पहुंच के मामले में ये ट्रेंड्स बताते हैं कि यह नया लीडर मौजूदा लीडर चैनल से आगे निकलने वाला है।

अब दूसरे रीजनल न्यूज जॉनर कन्नड़ और तेलुगु की बात करते हैं। हिंदी का यह नया लीडर, जिसकी कन्नड़ में मौजूदगी है, ‘एवरेज मिनट ऑडियंस’ (average minute audience in ‘000s) ट्रेंड्स में युद्ध के हफ्तों के दौरान भी स्थिर बना हुआ है। हिंदी में बढ़त हासिल करने वाले इस चैनल की कर्नाटक में युद्ध के हफ्तों के दौरान TSPV ट्रेंड में कन्नड़ अवतार में कोई बढ़ोतरी नहीं देखी गई है। ये सभी ट्रेंड स्थिर हैं। अब कन्नड़ न्यूज में पहुंच की प्रवृत्ति पर भी नजर डालते हैं, इस कन्नड़ अवतार में युद्ध के बाद के सप्ताह में इस कन्नड़ चैनल में थोड़ी गिरावट देखी गई है।

अब तेलुगु न्यूज जॉनर को देखें तो इसी युद्ध के कंटेंट के मामले में आंध्र प्रदेश के मार्केट में इस चैनल के तेलुगु अवतार को कोई फायदा नहीं हुआ है। यह भी उल्लेखनीय है कि आंध्र प्रदेश के मार्केट में वॉर कवरेज के साथ ही वॉक कवरेज के दौरान चैनल पर बिताए जाने वाले समय में कमी आई है। 

मैं यह ट्रेंड्स और डेटा पिछले 10 हफ्ते की रेटिंग्स के शेयर कर रहा हूं। मैं आपको कई और उदाहरण और डेटा दे सकता हूं, लेकिन मुझे उम्मीद है कि आप उन सवालों को लेकर मेरे साथ हैं, जो मैं मूल रूप से पूछने की कोशिश कर रहा हूं। ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब बाकी हैं। इस बारे में सोचने के लिए बहुत है, लेकिन जवाब नहीं आ रहे हैं।

अधिकांश चैनल अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और दो चैनलों को छोड़कर या तो वे अपने अंग्रेजी या हिंदी प्लेटफॉर्म को अच्छा प्रदर्शन करते हुए देख रहे हैं। हम जानते हैं कि ये कौन से हैं। मैं बता दूं कि ये एबीपी न्यूज और आजतक हैं।

आजतक और एबीपी न्यूज ही ऐसे दो चैनल हैं जिन्होंने लगातार गिरावट देखी है। हमें सवाल पूछना है कि आखिर ऐसा क्यों? यह एक जायज सवाल है। प्रत्येक पैरामीटर में पहुंच (cumulative reach) के संदर्भ में रेटिंग मैकेनिज्म में रोल्ड और अनरोल्ड डेटा (rolled vs unrolled data) में बहुत बड़ा अंतर है। कोई इसकी कैसे व्याख्या करेगा?

मैं यह भी दोहराना चाहूंगा कि जिन दो चैनल्स को फायदा हुआ है, वे बहुत आक्रामक तरीके से रेटिंग को वापस लाने पर जोर दे रहे थे। वे इतने आश्वस्त कैसे थे कि वे रेटिंग में बढ़ेंगे? नए हिंदी चैनल के सीईओ में से एक अपनी टीम और अन्य बाहरी स्टेकहोल्डर्स को सटीक सप्ताह बता रहा है कि वह व्युअऱशिप में कब आगे होंगे। स्पष्ट रूप से, सीईओ या तो एक दूरदर्शी और भविष्यवादी है या संभवतः एक बहुत अच्छा ज्योतिषी है।

प्रश्न यह उठते हैं कि कैसे दो चैनल जो परंपरागत रूप से अच्छा प्रदर्शन करते थे और नंबर 1 और नंबर तीन पर थे वह नंबर दो और नंबर सात पर आ गए हैं। संयोग से ये दोनों चैनल्स अपनी कवरेज में ज्यादा ऑब्जेक्टिव नजर आ रहे हैं। ये वही हैं, जो अच्छा नहीं कर रहे हैं। क्या यह इन दो चैनल्स को बदनाम करने और दो नए चैनल्स को लीडर के रूप में प्रचारित करने का खेल हो सकता है? मैं सिर्फ एक सवाल पूछ रहा हूं जो मेरे दिमाग में आ रहा है।

पूर्व में रेटिंग मैकेनिज्म ने मैनुअल रूप से डेटा में छेड़छाड़ देखी है और चिंता है कि इस बार भी ऐसा हो सकता है। ऐसे में हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि डेटा के साथ फिर से छेड़छाड़ न हो। जिन सवालों को लेकर चिंता जताई जा रही है, उनके जवाब ईमानदारी से और सही तरीके से दिए जाने की जरूरत है। मेरे विचार से एडवर्टाइजर्स, मीडिया बायर्स और मीडिया प्लानर्स को नई रेटिंग के बारे में रेटिंग मैकेनिज्म के बोर्ड से अधिक प्रश्न पूछने चाहिए।

रेटिंग एजेंसी के नए चेयरमैन ऐसे व्यक्ति हैं, जो काफी अनुभवी और बहुत सम्मानित है। उसके पास काफी मुश्किल काम है और मुझे यकीन है कि वह सही काम करेंगे, क्योंकि उनका इरादा सही है। पूर्व में इस रेटिंग तंत्र के सीईओ या तो इन सबसे अनजान रहे हैं या किसी विशेष मामले में उन पर हेरफेर करने का आरोप लगाया गया है।

न्यूज चैनल्स द्वारा सामूहिक रूप से रेटिंग्स से बाहर निकलना एक विकल्प है। हालांकि, यह रेटिंग्स की इस भूलभुलैया का जवाब नहीं हो सकता है। क्या इस दोषपूर्ण मैकेनिज्म को बंद करना सही तरीका है? क्या दो-तीन और प्लेयर्स को रेटिंग्स देने की अनुमति देना सही तरीका है? ऐसे कई सवालों के जवाब मेरे पास नहीं हैं। हालांकि, रेटिंग का मौजूदा मैकेनिज्म सारे पानी को गंदा कर रहा है और खुद को बदनाम कर रहा है और इस बारे में सभी स्टेकहोल्डर्स को मिलकर एक साथ आना चाहिए। रेटिंग्स के मौजूदा तरीके को जारी रखने के बजाय सही पद्धतियों को फिर से शुरू किया जाना चाहिए। किसी न किसी को इस बारे में सवाल पूछने की जरूरत है क्योंकि सभी संयोग इतने इत्तेफाकन नहीं होते। यह रेटिंग्स में विश्वसनीयता और चमक वापस लाने का समय है।

(लेखक ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं। लेखक दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया पर लिख रहे हैं।)


टैग्स डॉ. अनुराग बत्रा मीडिया चैनल रेटिंग
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