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‘छोटे पर्दे के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो रहा बॉलीवुड, उठाने होंगे बड़े कदम’

इन सबसे ऊपर, किसी फिल्म या स्टार के बहिष्कार की घोषणा करने का नया चलन ताबूत में आखिरी कील साबित हो रहा है। किसी भी फिल्म या फिल्म स्टार के बहिष्कार का आह्वान पूरी तरह से अलोकतांत्रिक हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

मार्कंड अधिकारी।।

बॉलीवुड कई वजहों से पिछड़ रहा है और इसे आगे बढ़ाने के लिए हम सभी को मिलकर तमाम कदम उठाने पड़ेंगे। यदि वर्ष 2022 की बात करें तो इस साल की बॉलीवुड की आखिरी उम्मीद ‘जयेशभाई जोरदार’ से थी, लेकिन यह ठीक वैसा ही हुआ, जैसे कोई स्वत: ही 35,000 फीट की ऊंचाई से उड़ते हुए विमान से कूद गया हो। मेरा मानना है कि यदि उस फिल्म के मुख्य स्टार ने अपनी छुट्टियों की तस्वीरें इंस्टाग्राम पर पोस्ट की होतीं, तो उस फिल्म को देखने के लिए सिनेमाघरों में जाने वाले दर्शकों की तुलना में उन पोस्ट को अधिक लाइक्स मिलते।

इस साल सिर्फ तीन फिल्में- ‘भूल भुलैया’, ‘दृश्यम 2’ (मलयालम मूवी का रीमेक) और ‘द कश्मीर फाइल्स’ (कई लोगों को इसकी सफलता के बारे में संदेह है, लेकिन आंकड़े खुद बोलते हैं) हिट साबित हुईं। 400 करोड़ रुपये की एक फिल्म ‘डिजाइनर’ (designer) भी हिट थी। इसका आधा बजट इसे हिट साबित करने में खर्च किया गया था।

इसके बाद भी बॉलीवुड फिल्म निर्माता ज्यादा चिंतित नहीं हैं। उन्हें केवल अपनी प्रिंट और विज्ञापन (P&A) लागत या अपने बजट का अधिकतम 20-25 प्रतिशत वसूलना है, बाकी ‘ओटीटी’ मालिक है। कम शब्दों में कहूं तो तमाम बॉलीवुड मेकर्स के लिए फिल्म की रिलीज महज औपचारिकता बन गई है, क्योंकि सिनेमाघरों में फिल्म के प्रदर्शन के बावजूद लागत का 75 प्रतिशत ‘ओटीटी’ से आता है। इसे यूं कह सकते हैं कि बड़े पर्दे ने एक तरह से छोटे पर्दे के आगे घुटने टेक दिए हैं और पूरी तरह से उस पर निर्भर हो गए हैं। यह विडंबना है, क्योंकि अतीत की बात करें तो वे इसे हेय दृष्टि से देखते थे और कमतर समझते थे।  

पिछले एक-दो महीनों में कुछ फिल्में ऐसी भी रही हैं, जो अगर सिनेमाघरों में रिलीज होतीं तो डबल डिजिट में भी कमाई नहीं कर पातीं, लेकिन वे सीधे ओटीटी पर रिलीज हुईं और अपने बजट से आठ से दस गुना तक कमाई की।

मार्केट में चल रही चर्चाओं के मुताबिक एक ओटीटी प्लेटफॉर्म ने एक बी+ ग्रेड के एक्शन हीरो के दो प्रोजेक्ट उसके मूल्य से तीन गुना अधिक कीमत पर खरीदे हैं, यहां तक ​​कि थिएटर में रिलीज से पहले। इंडस्ट्री में यह भी चर्चा है कि दीपावली सीजन के दौरान रिलीज हुई एक फिल्म का बजट 70 करोड़ रुपये होने का दावा किया गया था, लेकिन वास्तव में यह 270 करोड़ रुपये था, क्योंकि ओटीटी पर एक एक्शन गेम शो के लिए मुख्य स्टार को 200 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। जब वह प्रोजेक्ट परवान नहीं चढ़ सका, तो भुगतान की गई राशि को समायोजित करने के लिए प्लेटफॉर्म को फिल्म का निर्माण करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इंडस्ट्री में यह एक तरह का नया चलन बन गया है। जब कोई फिल्म बन रही होती है, तो उसका बजट 150 करोड़ रुपये बताया जाता है, रिलीज के दिन यह 75 करोड़ रुपये हो जाता है और जैसे-जैसे रिलीज आगे बढ़ती है, तो कलेक्शन के आंकड़ों से मिलान करने के लिए यह आंकड़ा हर दिन पांच करोड़ रुपये कम होता जाता है।

यानी यह फिल्म को हिट साबित करने की तरकीब है, क्योंकि तमाम फिल्म मेकर्स को भरोसा है कि उनकी मुख्य कमाई ओटीटी से होगी। गुजराती में कहा जाता है, ‘Kona baapni diwali?’ (किसके बाप की दिवाली है? यानी पैसा किसका है?)

आंकड़ों से ‘खेलना’ कोई नई बात नहीं है। कुछ साल पहले जब फिल्मों के 'सैटेलाइट अधिकार' पारंपरिक रैखिक टीवी चैनल्स (linear TV channels) को बेचे जाते थे, तब भी यही ‘तरकीब’ चलन में थी। उस समय भी 'सैटेलाइट राइट्स' की लागत फिल्म के बजट के करीब आ गई थी और सौदे एडवांस में किए गए थे। लेकिन ऐसा ज्यादा समय तक नहीं चला। एक दिन ‘असली’ चैनल मालिक जाग गए और इस तरह की आपसी खरीदारी पर रोक लग गई। ओटीटी को उस हश्र के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि दर्शक सिनेमाघर नहीं जाना चाहते। अगर ऐसा होता तो हमें 'अवतार' के आधी रात के शो और कई दक्षिण भारतीय फिल्मों के शो खचाखच भरे नहीं दिखते। लोग थिएटर में उन फिल्मों को देखने के लिए जाते हैं, जिनके निर्माण में ईमानदारी झलकती है और जहां कंटेंट ही सबसे अहम होता है।

हमारा बॉलीवुड जरूरत से ज्यादा प्रमोटेड है। प्रमुख प्लेयर्स केवल सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनल्स पर लाखों लाइक्स लेने में रुचि रखते हैं। उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि हमारी आबादी सिर्फ कुछ मिलियन में नहीं है। यहां 140 करोड़ लोग हैं। उनके पास पहले के मुकाबले ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर मजबूत कंटेंट के विकल्प मौजूद हैं।

वर्तमान में, जब समीक्षाओं की बात आती है तो मीडिया बॉलीवुड के लिए उदार और सहयोगी बन गया है। यह एक अच्छा संकेत है, लेकिन पहले वीकेंड के बाद क्या? सोमवार फिर अपनी कहानी खुद कह देता है।

इन सबसे ऊपर, किसी फिल्म या स्टार के बहिष्कार की घोषणा करने का नया चलन ताबूत में आखिरी कील साबित हो रहा है। किसी भी फिल्म या फिल्म स्टार के बहिष्कार का आह्वान पूरी तरह से अलोकतांत्रिक हैं। हर किसी को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन कोई भी दूसरों को सिनेमाघरों में जाने से नहीं रोक सकता। यदि कोई किसी के दृष्टिकोण से असहमत है, तो इस बारे में किसी भी फैसले को हमारी मजबूत न्यायपालिका पर छोड़ देना चाहिए।

संक्षेप में कहूं तो हमारा बॉलीवुड प्रतिभा और क्रिएटिव लोगों से भरा हुआ है, अब इसे मिलकर और ऊपर उठाना चाहिए और मजबूत व उच्च-गुणवत्ता वाला कंटेंट प्रदान करना चाहिए। अन्यथा, केवल अंग्रेजी और दक्षिण भारतीय फिल्में ही वास्तविक बिजनेस कर पाएंगी और वह दिन दूर नहीं होगा, जब मल्टीप्लेक्स स्क्रीन सामुदायिक हॉल में बदल जाएंगे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक ‘सब ग्रुप’ के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।)


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