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वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री ने बताया, कल्याण सिंह-अटल बिहारी के बीच क्यों था मनमुटाव
कल्याण सिंह अब नहीं रहे लेकिन उनके साथ जुड़ी तमाम कहानियां लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं की स्मृतियों में बनी रहेंगी।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago
विनोद अग्निहोत्री, सलाहकार संपादक, अमर उजाला ग्रुप
कल्याण सिंह अब नहीं रहे लेकिन उनके साथ जुड़ी तमाम कहानियां लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं की स्मृतियों में बनी रहेंगी। इनमें सबसे दिलचस्प कहानी है कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनने की। बहुत कम लोगों को पता होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी के इनकार के बाद ही कल्याण सिंह का नाम मुख्यमंत्री के लिए आगे किया गया था। वर्ना भाजपा नेतृत्व की देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अपने पहले मुख्यमंत्री के रूप में पहली पसंद पार्टी के सर्वमान्य नेता अटल बिहारी वाजपेयी थे।
उत्तर प्रदेश में 1991 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने बलबूते पर बनी थी। केंद्र में कांग्रेस ने पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बना दिया था। यह राम मंदिर आंदोलन के चरमोत्कर्ष का दौर था। चुनाव से कुछ महीने पहले ही अयोध्या में विवादित स्थल पर जमा कारसेवकों को नियंत्रित करने के लिए तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार के आदेश पर पुलिस ने गोली चलाई थी जिसमें कई कारसेवक मारे गए और घायल हुए थे। माहौल बेहद गर्म और उत्तेजनात्मक था। ऐसे माहौल में भाजपा को विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में पहली बार पूर्ण बहुमत मिला था। पार्टी और पूरे संघ परिवार के लिए देश के सबसे बड़े राज्य आजादी के बाद अपनी सरकार बनना भावी राजनीति के लिए बहुत बड़ी कामयाबी थी। इसलिए भाजपा इस सफलता को किसी परिपक्व हाथों में सौंपना चाहती थी। इसके लिए अटल बिहारी वाजपेयी से बेहतर कोई दूसरा नाम नहीं था।
भाजपा के एक प्रमुख नेता बताते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेतृत्व और भाजपा नेतृत्व के बीच तय हुआ कि अटल बिहारी वाजपेयी को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाए, क्योंकि देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री की हैसियत प्रधानमंत्री के बाद दूसरी मानी जाती रही है और केंद्र में कांग्रेस ने दक्षिण भारत के एक विद्वान और वरिष्ठ ब्राह्रण नेता को प्रधानमंत्री बनाया है, इसलिए उनके मुकाबले के लिए वैसा ही वरिष्ठ और परिपक्व ब्राह्रण नेता भाजपा की तरफ से उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। इसलिए वाजपेयी के नाम पर चर्चा हुई, लेकिन वाजपेयी ने केंद्रीय राजनीति छोड़कर प्रदेश की राजनीति में जाकर सरकार चलाने में अनिच्छा जाहिर की। सूत्रों का यह भी कहना है कि वाजपेयी ने सीधे तौर पर मना करने की बजाय शर्त रख दी कि वह तभी यह जिम्मेदारी संभालेंगे अगर संघ नेतृत्व वचन दे कि अगले चार साल तक मंदिर का मुद्दा नहीं उठाया जाएगा और उन्हें निर्बाध काम करने दिया जाएगा। यह शर्त संघ और विहिप को कतई मंजूर नहीं थी और अटल ने मुख्यमंत्री बनकर लखनऊ जाने से इनकार कर दिया।
बताया जाता है कि इसके बाद दूसरे नाम पर विचार शुरू हुआ और तब तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी को इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त पाया गया, क्योंकि जोशी उत्तराखंड जो तब उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था, के मूल निवासी हैं और इलाहाबाद उनकी कर्मभूमि रही है। उनकी विद्वता और ज्ञान असंदिग्ध है। वह ब्राह्ण होने के साथ साथ मंदिर आंदोलन का एक बड़ा चेहरा भी थे और धर्म संस्कृति पर उनकी पकड़ निर्विवाद थी, लेकिन डॉ.जोशी कुछ महीने पहले ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे, इसलिए उन्होंने कहा कि उनके जाने से संदेश जाएगा कि पार्टी के पास प्रदेश में कोई नेता नहीं है, इसलिए अपने अध्यक्ष को ही भेज दिया। इसके बाद प्रदेश नेताओं के नाम पर मंथन शुरू हुआ और तब मंडलवादी राजनीति के मुकाबले के लिए डॉ.जोशी ने ही कल्याण सिंह के नाम का प्रस्ताव किया। कल्याण सिंह इसके पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी थे और उन्हें डॉ. जोशी का आशीर्वाद था। यह वही दौर था जब भाजपा ने अपने सोशल इंजीनियरिंग के सिद्धांत के तहत पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाना शुरू किया था। इसको देखते हुए जोशी की सलाह को अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने भी मंजूर कर लिया और संघ नेतृत्व भी राजी हो गया। इसके बाद कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश में भाजपा की पहली सरकार के मुख्यमंत्री बने।
कुछ समय के लिए भाजपा का दामन छोड़ मुलायम के साथ गए थे
अयोध्या में बाबरी मस्जिद टूटने के वक्त कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और अपनी सरकार गिरने के बाद उन्होंने उसकी जिम्मेदारी लेते हुए सुप्रीम कोर्ट तक में यही कहा कि इस घटना के लिए वह अकेले जिम्मेदार हैं, लेकिन उनके करीबी रहे कुछे अधिकारियों की अगर मानें तो वह नहीं चाहते थे कि बाबरी मस्जिद को कोई नुकसान हो। चार दिसंबर 1992 को जब तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह लखनऊ आकर उनसे मिले थे तो कल्याण सिंह ने उन्हें भरोसा दिया था कि अयोध्या में ऐसा कुछ भी नहीं होने दिया जाएगा जिससे देश के संविधान और सर्वोच्च न्यायालय की मर्यादा भंग हो, लेकिन जिस तरह विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल आदि संगठन अयोध्या में कार सेवा को लेकर उग्र थे, उससे कल्याण सिंह को आशंका थी कि कहीं न कहीं राम मंदिर से ज्यादा उनकी सरकार गिरवाने का भी षड़यंत्र भाजपा और संघ परिवार की यथास्थितिवादी सवर्ण लॉबी कर रही है क्योंकि उसे देश के सबसे बड़े राज्य में एक पिछड़ा मुख्यमंत्री सहन नहीं हो रहा है। उन्होंने अपनी यह आशंका अपने कुछ बेहद करीबी लोगों से साझा भी की थी और भाजपा छोड़ने के बाद वह खुद इस बात को कहा करते थे। भाजपा छोड़ने के बाद जब वह मुलायम सिंह यादव के साथ आए तो अक्सर अयोध्या मुददे पर अपने बचाव में यही तर्क देते थे कि उन्हें अंधेरे में रखकर अयोध्या की घटना हुई, लेकिन बाद में जब भाजपा में उनका पुनर्वास हो गया तो वह इस मुद्दे पर खामोश हो गए।
कल्याण सिंह पर पार्टी के भीतर पिछड़े वर्गों को जरूरत से ज्यादा तरजीह देने के आरोप भी लगे। दिलचस्प है कि भाजपा के तत्कालीन सवर्ण नेताओं ने तो हमेशा कल्याण सिंह को निशाने पर लिया ही कई पिछ़ड़े नेता भी उनके बढ़ते कद को सहन नहीं कर पाते थे। इनमें से कुछ ने तो केंद्रीय नेतृत्व से यहां तक दुहाई दी कि आखिर वो भी तो पिछड़े वर्ग से आते हैं,लेकिन कल्याण सिंह के मुकाबले उन्हें वह तरजीह क्यों नहीं मिलती, जो उन्हें दी जाती है।आगे चलकर कल्याण के पार्टी से बाहर जाने के बाद ऐसे कुछ नेता भाजपा और सरकार में शीर्ष पदों तक भी पहुंचे, लेकिन कल्याण सिंह ने कभी भी किसी तरह के विरोध की परवाह नहीं की।
मुलायम सिंह यादव के साथ उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के बावजूद बेहद गहरी दोस्ती भी थी, इसे भी तब बहुत कम लोग जानते थे, लेकिन बाद में यह सार्वजनिक हो गई। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव दो ध्रुव बन गए थे, लेकिन 1995 से एक तीसरे ध्रुव के रूप में मायावती का उदय हुआ और इस तीसरे ध्रुव ने कल्याण और मुलायम को और भी करीब ला दिया था। 1997 में जब कल्याण को विश्वास में लिए बिना भाजपा और बसपा के बीच छह छह महीने के लिए मुख्यमंत्री पद के लिए समझौता हुआ तो इससे सबसे ज्यादा विचलित मुलायम सिंह यादव हुए। मुलायम सिंह यादव ने तब मुझसे यह कहा था कि उन्हें अब कल्याण सिंह की चिंता है क्योंकि जिस तरह भाजपा मायावती को आगे बढ़ा रही है उससे कल्याण सिंह की राजनीति की गाड़ी पटरी से उतर जाएगी। मैने कहा इससे तो आपको खुश होना चाहिए क्योंकि कल्याण सिंह ही भाजपा के अकेले नेता हैं जो आपसे मुकाबला करते हैं। तब मुलायम ने कहा था कि राजनीतिक मुकाबला अपनी जगह है, लेकिन वह कल्याण सिंह का बेहद सम्मान करते हैं और उनकी राजनीति बिगड़ने से उन्हें तकलीफ होती है। आगे चलकर कल्याण और मुलायम की दोस्ती सबके सामने आ गई ।
विवादों से कल्याण सिंह का रहा नाता
विवादों से भी कल्याण सिंह का नाता रहा, लेकिन वह कभी विवादों से घबराए नहीं। पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपराध मुक्त करने का अभियान छेड़ा और कई कुख्यात माफिया सरगना या तो प्रदेश छोड़ गए या जेलों में बंद हो गए। कल्याण सिंह पर योगी सरकार की तरह पुलिस मुठभेड़ों को लेकर विवाद नहीं हुआ, लेकिन उनका पहला कार्यकाल कानून व्यवस्था में सुधार के लिए आज तक लोग याद करते हैं।
लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में कल्याण कानून व्यवस्था और प्रशासन के मामले में वह छाप नहीं छोड़ सके और उनके दौर में कई ऐसे नेता भाजपा में शामिल हुए या भाजपा के साथ आए जिनके खिलाफ गंभीर अपराधिक मुकदमें थे। मायावती के समर्थन वापसी के बाद कल्याण सिंह ने अपनी सरकार कांग्रेस और बसपा को तोड़कर जिस तरह बचाई थी, उससे उत्तर प्रदेश में अपराध को राजनीतिक संरक्षण का नया अध्याय भी कहा जा सकता है। पहले भाजपा यह आरोप मुलायम सिंह यादव पर लगाती थी, लेकिन बाद में उसे खुद इस मामले में रक्षात्मक होना पड़ा जब उसकी सरकार में तमाम दागी नेताओं के साथ एक ऐसे नेता ने भी मंत्री पद की शपथ ली जिसके खिलाफ एक गंभीर अपराधिक मामले में गिरफ्तारी वारंट था। राजभवन में जब यह शपथ ग्रहण हो रहा था तो वहां बैठे अटल बिहारी वाजपेयी समेत सभी वरिष्ठ भाजपा नेताओं के चेहरों पर तनाव साफ देखा जा सकता था।
अटल बिहारी वाजपेयी और कल्याण सिंह के बीच मनमुटाव
अपने दूसरे कार्यकाल में कल्याण सिंह तब भाजपा के शिखर पुरुष और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से सीधे टकराव की मुद्रा में आ गए थे। कल्याण को लगता था कि उनके खिलाफ भाजपा के तमाम सवर्ण नेताओं को वाजपेयी की शह है जबकि वाजपेयी रोज रोज लखनऊ से आने वाली शिकायतों से आजिज थे। लखनऊ से सांसद होने के नाते उनका उत्तर प्रदेश भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं और पत्रकारों से सीधा रिश्ता था। इसलिए हर छोटी बड़ी बात सीधे उन तक पहुंचती थी। यह टकराव इस कदर बढ़ गया था अफवाह तो यहां तक उड़ी कि 1999 के लोकसभा चुनावों में कल्याण सिंह न सिर्फ उत्तर प्रदेश में भाजपा को कमजोर करने में जुटे हैं बल्कि लखनऊ से अटल बिहारी वाजपेयी हार जाएं इसका इंतजाम भी कर रहे हैं। हालांकि वाजपेयी लखनऊ से जीते, लेकिन उनकी जीत का अंतर पहले के मुकाबले में खासा घट गया था और भाजपा जिसने उत्तर प्रदेश में 1998 में लोकसभा की 59 सीटें जीती थीं, घटकर 29 सीटों पर आ गई थी। इसके बाद प्रदेश भाजपा में कल्याण विरोधी नेताओं को उनके खिलाफ गोलबंदी का मौका मिल गया और फिर उन्हें पहले मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा फिर पार्टी से बाहर जाना पड़ा। कल्याण को खोने की कीमत भाजपा ने उत्तर प्रदेश खोकर चुकाई।
(साभार: अमर उजाला)
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