‘अतुल को याद कर अब जेहन में उभरती है गुलजार की ये नज्म’

चिमनबाग में अतुल के प्रगति पुस्तक भंडार के पीछे जीता-जागता एक कमरा था, जो दुकान से ज्यादा चलता था

Last Modified:
Friday, 02 August, 2019
Atul Lagoo

बात लगभग चालीस बरस पुरानी है। उन दिनों मैं नईदुनिया में मुलाजिम था। शाम होते ही मैं दफ्तर पहुंच जाता। हमारे नसीब में न पंछी होना बदा था और न अजगर। रात जब दफ्तर से लौटता तो जिंदगी आंखें खोलती। कभी दोस्त भी साथ हो लेते। मेरा एक अदद कमरा हुआ करता था, पीली मिट्टी-गोबर से लिपा हुआ। मैंने उसे बड़े जतन से संवारा था। वहीँ दोस्तों का डेरा लगा रहता। देर रात महफिलें सजतीं, दुनिया जहान की बातें होतीं। गाना-बजाना होता, कभी-कभार यूं ही करते-करते सुबह हो जाती। अखबार आ जाता, दूधवाला भैया आ जाता। फिर हड़बड़ी में सब सोने की तैयारी करते। बेगम अख्तर की आवाज कमरे में, दिल में गूंजती रहती।

अहदे जवानी रो-रो काटा, पीरी में ली आंखें मूंद

यानी रात बहोत थे जागे सुबह हुई आराम किया

खूब किताबें पढ़ी जातीं और उन पर बहस-मुबाहिसा होता। ये भी होता कि कोई एक पढ़ता और दूसरे सुनते। कभी कोई पढ़ते-पढ़ते फफककर रो पड़ता। संगीत और साहित्य के वलवले का लोबान सुलगता रहता। मंटो का पारायण होता। मीरो गालिब के दीवान सिरहाने रखे रहते। साहिर की परछाइयों में हयात बसर होती। किताबें सारी अतुल के यहां से आतीं। इसरार से मांगकर किताब पढ़ने-पढ़ाने का चलन था। मेरा एक दोस्त गोरांग बड़े फख्र से कहता, `हमारे बंगाल में किताब चुराना बुरा नहीं माना जाता`। महसूस करें तो कितनी बड़ी बात है।

उन दिनों मैं नहीं था, फ़कत इश्क था। मत पूछो जालिम मुझसे क्या-क्या कराते रहता था। रात देर से सोता, सुबह देर से उठता। लेकिन दोपहर अपनी जेब में रखता। उसे जैसा जी करे, खर्च करता। ऐसे में कई बार अतुल के साथ दोपहर गुजरती। रशियन साहित्य से तो कई पाठकों को अतुल ने ही रूबरू कराया था। किताबें इतनी सस्ती होती थीं कि मेरे जैसा आदमी भी किताबें खरीद सकता था। रशियन किताबों का कागज, जिल्द,प्रिंट और फॉन्ट बहुत खूबसूरत होता था और लेखक की तस्वीर भी। जैसे राजा रवि वर्मा ने हमारे जेहन में देवी-देवताओं के रूप पैबस्त किए हैं, वैसे ही रशियन लेखक हमें ताउम्र वैसे ही नजर आते रहेंगे, जैसे हमने उन किताबों पर देखे थे।

एक दोपहर मैंने चंद किताबें चुनीं और गुलजार की `कुछ और नज्में` सरसरी नजर से देखने लगा। एक-दो नज्में ही पढ़ी होंगी कि मैं बैठने की जगह तलाशने लगा। बैठकर कुछ और नज्में पढ़ीं। पहले ही इश्क की बेल मुझ पर चढ़ी-लिपटी, उस पर फूल खिल आए। मैं क्या तो लिखूं, मेरी क्या दशा-दुर्दशा हो गई। मैंने सारी किताबें रखीं और चलता बना। `अरे सुबोध! क्या हुआ? अतुल की आवाज ने मेरा कंधा थाम लिया। `कुछ नहीं यार, किताबें ज्यादा हो गईं, पैसे कम हैं।` अतुल का कहना था, `पैसे-वैसे तो आते रहेंगे, किताबें तो ले जा`

मैं किताबों के साथ हो लिया। फिर बड़े दिनों तक `कुछ और नज्में` और चंद दीगर किताबें मेरे झोले में रखी रहतीं। उससे टिक कर कोई पेय पदार्थ भी अपनी बारी का इंतजार करते बैठा रहता। पेय से कविताएं गेय हो जातीं। फिर आवाज दिखाई देती, रंग सुनाई पड़ते। कभी ये भी होता कि पेय ही किताब पढ़ लेता। आज भी वो किताब देखेंगे तो समझ जाएंगे।

तेरी आवाज के पैकर को लिपट जाऊं कभी

तेरी खुशबू को कभी हाथ से छूकर देखूं

बाद मुद्दत के ये हुआ कि किताब का पेपरबॅक आ गया। मैंने लपककर कुछ किताबें खरीद लीं। फिर बड़ी हसरतों से उन सब को भेंट कर दीं, जो मेरी नजर में सरापा दिल थे और सरापा दिलों पर ये दुनिया क्या कहर ढाती है-बापरे! बिल्कुल निरीह और निरापद, इश्क में डूबे लोगों से क्या दुनिया को अलग बर्ताव नहीं करना चाहिए! उनके लिए खिड़की की सीट रिजर्व, रेस्त्रां में शोर से दूर सांवला कोना, उसी गली में दस बार भी जाएं तो जाने दिए जाना, जैसी छोटी-मोटी सहूलियतें ही तो दिल के मारों के लिए बड़ी सौगातें हैं। या कुछ न बन पड़े तो दुनिया बस इतना करे कि उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ दे।

बंद शीशों के परे देख दरीचों के उधर

सब्ज पेड़ों पे घनी शाखों पे फूलों पे वहां

कैसे चुपचाप बरसता है मुसलसल पानी

 

कितनी आवाजें हैं, यह लोग हैं, बातें हैं मगर

जहन के पीछे किसी और ही सतह पे कहीं

जैसे चुपचाप बरसता है तसव्वुर तेरा

चूंकि मुझे शामें कम नसीब होती थीँ, सो अतुल से निस्बतन कम ही मुलाकातें हो पातीं, लेकिन पिछले कुछ बरसों में जब दिल्ली से राजेश बादल आता तो सारे कार्यक्रम निपट जाने के बाद रात किसी होटल का कमरा रौशन होता। फिर अतुल, राजेश और मैं नाचीज आतिशबाजी करते। एक बात पक्की है कि माथुर साहब का जिक्र जरूर निकलता और खूब किस्से सुने-सुनाए जाते। कभी किसी बात पर अट्टहास गूंजता और कमरे से बाहर निकल जाता, बात कमरे में रह जाती।

चिमनबाग में अतुल के प्रगति पुस्तक भंडार के पीछे जीता-जागता एक कमरा था, जो दुकान से ज्यादा चलता था। चंद दोस्त वहां अक्सर इकट्ठा होते। वहां एक मटकी पानी हमेशा रखा रहता। कभी-कभार देर रात मैं वहां पहुंचा हूं। वहां देखे चंद चेहरे आंखों में अब भी चमकते हैँ। अब क्या उनका नाम लूं।

सब कहां, कुछ लाला ओ गुल में नुमायां हो गईं

खाक में क्या सूरतें होंगी के पिनहां हो गईं

महफिलों के हंगामे में जब शोर बरपा होता, चाय-वाय के दौर चलते, दोस्त ऊंची आवाज में बात करते, बहसें होतीं.. अतुल हमेशा धीमी आवाज में बात करता। हां, जब चार-पांच अध्याय के बाद लोग-बाग अंग्रेजी में बात करना शुरू करते, अतुल मुझसे मराठी में बात करता। महफिलों से जब सब उड़ जाते, सबसे आखिर में जानेवाला अतुल ही होता। लेकिन अब जाने क्यों, अचानक, पहले चला गया। महफिलों में अब तेरे नहीं होने का होना हमेशा बना रहेगा।

गुलजार की एक नज्म जेहन में उभरती है

छोटे थे, मां उपले थापा करती थी

हम उपलों पर शक्लें गूंधा करते थे

आंख लगाकर-कान बनाकर

नाक सजाकर-

पगड़ी वाला, टोपी वाला

मेरा उपला

तेरा उपला

अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से

उपले थापा करते थे

हंसता-खेलता सूरज रोज सवेरे आकर

गोबर के उपलों पे खेला करता था

मेरा उपला सूख गया--

उसका उपला टूट गया--

रात को आंगन में जब चूल्हा जलता था

हम सारे चूल्हा घेरके बैठे रहते थे

किस उपले की बारी आई

किसका उपला राख हुआ

वह पंडित था--

वह मास्टर था--

इक मुन्ना था--

इक दशरथ था--

बरसों बाद--

श्मशान में बैठा सोच रहा हूं

आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में

इक दोस्त का उपला और गया!

(वरिष्ठ पत्रकार सुबोध होलकर की फेसबुक वॉल से)

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'हमारी तरफ से नीलम शर्मा को यही होगी सच्ची श्रद्धांजलि'

आज नीलम शर्मा कैंसर की गिरफ्त में आ गईं, अगर हम नहीं सुधरे तो कल हम में कोई और इसकी गिरफ्त में आ जाएगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 17 August, 2019
Last Modified:
Saturday, 17 August, 2019
Neelum sharma

कैंसर एक सजा है, महिला हो या पुरुष हर किसी को अपनी चपेट में लिए हुए है। लोग कहते हैं कि यह बीमारी जीवन शैली से जुड़ी हुई है फिर Breast Cancer का इससे क्या लेना? दूरदर्शन न्यूज में वर्षों से कार्यरत एक वर्सटाईल एंकर नीलम शर्मा हमारे बीच नहीं रहीं, वो Breast Cancer से पीड़ित थीं और जिंदगी की जंग में कैंसर से हार गई। मेरी कभी उनसे मुलाकात नहीं हुई, लेकिन हम दोनों एक-दूसरे को जानते थे। एकाध बार हम दोनों की फोन पर बात भी हुई है और उन्होंने मेरे से कहा था कि- Cancer is Curable !!!. लेकिन आज एहसास हुआ कि शायद वो गलत बोल रहीं थी या फिर मैने गलत सुन लिया था, लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि -Cancer is partially Curable !!

The most common cancer in India is breast cancer !! The rate of incidence was found to be 25.8 in 100,000 women and the mortality rate is 12.7 per 100,000 women। डाक्टरों की अगर मानें तो इसे रोका जा सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि 26 वर्ष की आयु के बाद लड़कियों को डाक्टर से मिलकर इसकी जांच करा लेनी चाहिए। बीमारी है, किसी से पता पूछकर तो लगेगी नहीं, बेहतर होगा कि हम खुद डाक्टर का पता पूछकर उनसे मिल लें। क्या पता लाईफ स्टाइल में सुधार करने से यह बीमारी कभी हो ही नहीं।

ब्रेस्ट कैंसर के सबसे प्रमुख लक्षणों में-Change in the look or feel of the breast OR A change in the look or feel of the nipple OR Nipple discharge आदि प्रमुख हैं लेकिन अगर आप डाक्टर से हर छह महीने में मिलती रहेंगी तो इस बीमारी को जानलेवा होने से रोका जा सकता है।

एक अपील है दोस्तों से, जानने वाले लोगों से कि अगर आप DD News की Anchor नीलम शर्मा को वास्तव में सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो कैंसर को चुनौती देना अपने घर से शुरू कीजिए और डाक्टर से मिलने में जरा भी मत हिचकिचाइए आज नीलम कैंसर की गिरफ्त में आ गईं, अगर हम नहीं सुधरे तो कल हम में कोई और इसकी गिरफ्त में आ जाएगा।

(वरिष्ठ पत्रकार केएम शर्मा की फेसबुक वॉल से)

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मिस्टर मीडिया: यह कार्यशैली दिखाती है पत्रकारों का अधकचरापन

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने उठाया सवाल, एक ही संस्थान में एक समाचार प्रसारण के कितने पैमाने हो सकते हैं?

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 14 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 14 August, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

कभी-कभी हम लोग भारतीय मीडिया के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार पर क्षोभ प्रकट करते हैं। कहते हैं कि उसे और परिपक्व होना चाहिए, लेकिन भारत में काम कर रहा अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भी शिकायतों का भरपूर अवसर देता है। बेहद संवेदनशील मामले पर भी जब उसके पत्रकार चलताऊ अंदाज में काम करते हैं तो स्पष्ट होता है कि उनके अपने देश में भी पत्रकारिता की कोई परिष्कृत प्रशिक्षण प्रणाली नहीं है।

इधर भारतीय मीडिया भी एक अपराध बोध से ग्रस्त हो जाता है, जब वह देखता है कि परदेसी पत्रकार तो धड़ल्ले से बिना कोई आत्म अनुशासन दिखाए अपनी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। यह कार्यशैली अभिव्यक्ति की आजादी या निष्पक्षता नहीं, बल्कि उन पत्रकारों का अधकचरापन प्रदर्शित करती है।

इस सप्ताह कश्मीर से अनुच्छेद 370 की विदाई के बाद कुछ हलकों में नाराजगी स्वाभाविक थी। भारत सरकार ने इसके लिए अपने एहतियाती उपाय भी किए थे। लेकिन शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद परदेसी माध्यमों में जिस तरह से खबरें प्रसारित की गईं, वे चिंता में डालने वाली हैं। सबसे पहले मुस्लिम जगत से संबद्ध एक अंतर्राष्ट्रीय चैनल अल जजीरा ने कश्मीर में विरोध जुलूस की खबरें दिखाईं। इन खबरों में तटस्थता नदारद थी। इसके बाद विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित मीडिया संगठन ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन (बीबीसी) ने इन समाचारों को स्थान दिया।

विडंबना यह कि इस संस्थान के दक्षिण एशिया ब्यूरो ने तो यह समाचार प्रसारित कर दिया, लेकिन हिंदी सेवा ने इस सच की पड़ताल करने के लिए खबर का प्रसारण रोक लिया और इसी संस्थान के वर्ल्ड टेलिविजन ने बिना वक्त गंवाए यह सूचना दिखा दी। एक ही संस्थान में एक समाचार प्रसारण के कितने पैमाने हो सकते हैं? यह भी अटपटा लगता है कि दक्षिण एशिया ब्यूरो ने इस पर प्रो एक्टिव कॉल लिया और ट्वीट की दुनिया में भी विस्तार दे दिया।

इस ब्यूरो की वरिष्ठ सदस्य ब्राजील मूल से हैं और हाल ही में भारत आई हैं। पाकिस्तान से भी उनका कुछ रिश्ता बताया जाता है। भारत विरोधी खबरें देना उनका स्थाई भाव माना जाता है। इसी प्रतिष्ठित प्रसारण समूह ने बाद में पाकिस्तान के स्वतंत्र पत्रकार वुसतउल्ला खान की साप्ताहिक रेडियो डायरी पर भारत में पाबंदी लगा दी। यह पत्रकार महोदय डायरी में रिपोर्टिंग न करते हुए पाकिस्तान की ओर से हिन्दुस्तान को सख्त संदेश दे रहे थे। मेरी जानकारी में तो पाकिस्तान में इसका प्रसारण किया गया। इसके अलावा अनेक यूरोपीय चैनलों, रॉयटर्स और डॉन ने भी इस तरह की खबरें प्रसारित कीं। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की मुख्य धारा की नीतियां क्षेत्रीय नीतियों से अलग कैसे हो सकती हैं। यह कौन सी पत्रकारिता है?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस काम में किसी सूचना को क्रॉस चेक करना पहला धर्म होता है। अगर क्रॉस चेक के बाद भी कोई संवाददाता अपनी रिपोर्ट पर कायम है तो फिर अगला कर्तव्य यह है कि दूसरे पक्ष से उसकी टिप्पणी ली जाए। कश्मीर के मामले में क्या इस ज़िम्मेदार परदेसी मीडिया ने भारत सरकार, कश्मीर सरकार या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का पक्ष जानने का प्रयास किया? शायद नहीं। भारत सरकार ने भी अपनी ब्रीफ़िंग में सुस्ती दिखाई। परिणाम यह कि सरकार को विदेशी संवाददाताओं के बारे में निर्देश जारी करने पड़े।

बेशक इस पर बहस की जा सकती है कि क्या सरकार को अंतर्राष्ट्रीय समाचार माध्यमों पर कार्रवाई का अधिकार है, पर यह तो देखना ही होगा कि क्या विदेशों से आए पत्रकार भारत को पूरी तरह समझते हैं? अथवा यह कि भारत के लिए अत्यंत नाजुक मसले उनके लिए कितने गंभीर हैं। परदेसी पत्रकारिता संस्थानों को अपने पत्रकारों की किसी देश में तैनाती से पहले उनके ओरियंटेशन या उस देश के बारे में प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी ही चाहिए।

याद नहीं आता कि अंतर्राष्ट्रीय संवाद समिति प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया के विदेशों में जो संवाददाता हैं, वे उन मुल्कों के संवेदनशील मामलों पर कितने खिलाफ़ जाते हैं। हम मीडिया की आजादी के पक्षधर हैं, लेकिन किसी देश के विखंडन को प्रोत्साहित करने वाली खबरों से यक़ीनन बचेंगे। इस मत से असहमत होने के आपके  अधिकार का भी मैं सम्मान करता हूं। लब्बोलुआब यह कि हिन्दुस्तान में बसे विदेशी संवाददाताओं को पत्रकारिता का न्यूनतम कर्तव्य तो निभाना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: अनुच्छेद 370: मीडिया कवरेज से दिल बाग-बाग नहीं हुआ

मिस्टर मीडिया: एक बार फिर इसी सत्याग्रह की जरूरत है

संपादक की दुविधा हम समझते हैं, पर कोई समाधान निकालिए मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: ऐसे में क्या खाक निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की उम्मीद करेंगे?

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श्रद्धांजलि: इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया था शकुंतला काजमी ने

मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि बिटिया की स्कूली पढ़ाई पूरी हो गयी, जिसके बाद उन्होंने मीडिया में करियर बनाने के बारे में सोचा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Wednesday, 14 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 14 August, 2019
Shakuntala Kazmi

करीब 20 साल पहले की बात है। आंखों देखी के न्यूज-रूम में पहुंचा तो एक छोटे कद की गोरी सी महिला इंटर्नशिप करने वालों के साथ बैठी थी। क्योंकि मैं न्यूज-रूम का इंचार्ज था, इसलिये उन्हें मुझसे मिलवाया गया, ये कहते हुए कि ये कैमरा विभाग में इंटर्नशिप करने आयी हैं। मैं चौंक गया। एक तो कैमरा पारंपरिक तौर पर पुरुष वर्चस्व वाला क्षेत्र और उन दिनों सौ में एक-दो ही कैमरापर्सन महिलाएं दिखती थीं। दूसरी चौंकाने वाली बात थी उनकी उम्र। अमूमन इंटर्नशिप करने नये ग्रेजुएट या स्टूडेंट्स आते हैं, लेकिन उनकी उम्र लगभग मेरी जितनी थी।

मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि बिटिया की स्कूली पढ़ाई पूरी हो गयी, जिसके बाद उन्होंने मीडिया में करियर बनाने के बारे में सोचा है। तीसरी बार तब चौंका, जब उन्होंने अपना नाम 'शकुन काजमी' बताते हुए खुद को बिहार से जुड़ा बताया। हिन्दू-मुस्लिम मिक्स नाम और खड़ी हरियाणवी बोली वाली बिहारन?

मेरे चेहरे के भावों को पढ़ते हुए हमारे कैमरापर्सन Aijaz उर्फ जॉर्ज ने हंसते हुए राज खोला, ‘ये शकुंतला जी हैं तो मूल रूप से हरियाणा की, लेकिन अपने NDTV वाले नदीम भाई की पत्नी हैं।’ नदीम भाई उर्फ नदीम काजमी से प्रेस क्लब में Manoranjan जी के साथ कुछ मुलाकातें हुई थीं। मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार किया तो हंसते हुए बोलीं, ‘यहां तो मैं सिर्फ ट्रेनी कैमरापर्सन हूं।’

बाद में मेरी पुरानी मित्र Anju Grover ने बताया कि शकुन सोशल एक्टिविस्ट भी रह चुकी हैं और कई आंदोलनों में प्रमुख भूमिका निभा चुकी हैं। बेहद डाउन टू अर्थ और बिंदास स्वभाव। वे जब तक हमारे यहां रहीं, दिन भर बड़े लगन से टीवी कैमरा ऑपरेट करने के साथ उसकी बारीकियों को सीखा। वे बेहद ऊर्जावान और एक्टिव थीं। कभी बाहर भी मुलाकात हुई तो उनके बेबाक और मिलनसार स्वभाव ने काफी प्रभावित किया। समाज और राजनीति पर भी चर्चा होती।

फिर वे कुछ महीनों बाद इंटर्नशिप पूरा कर वापस चली गयीं, लेकिन मिलना-जुलना होता रहा। अक्सर प्रेस क्लब या वूमेन प्रेस क्लब में। जब नोएडा शिफ्ट हुआ तो दिल्ली जाने का सिलसिला कम होता चला गया। वैसे भी मैं फील्ड रिपोर्टिंग में था नहीं, तो कभी-कभी ही बाहर जाना होता था। कुछ सालों बाद पता चला कि वे बिहार चली गयी हैं। कल रात अचानक अंजू का संक्षिप्त सा वॉट्सऐप मैसेज मिला जिसमें लिखा था, ‘शकुन नहीं रही।‘ एक मित्र, हमदर्द और अच्छी इंसान का अचानक सदा के लिये चले जाना वाकई दुःखद होता है।

नदीम काजमी जी के होम टाउन दरभंगा के उनके गांव में वे मुखिया बन गयी थीं। हाल ही में बाढ़ राहत की उनकी तस्वीरें देखीं तो समझ में आया कि वे कितनी मेहनती और दरियादिल थीं। हालांकि समझौता न करने वाले उनके तेवर बरकरार रहे। बिहार के एक पिछड़े से गांव की मुस्लिम महिला टी शर्ट व पेंट में दिखे, जन समर्थन भी पाये, वह भी तब, जबकि उनकी भाषा हरियाणवी हो, ये सारी बातें असंभव लगती हैं... लेकिन इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया था शकुंतला काजमी ने।

हालांकि वे प्रगतिशील विचारों वाली सुशिक्षित महिला थीं, लेकिन पिछड़ी हुई व्यवस्था और स्वार्थी डॉक्टरों की चालबाज साजिशों का शिकार बन गयीं। कुछ सालों से दरभंगा के डॉक्टर उन्हें किडनी की बीमारी की दवाइयां दे रहे थे, जबकि मर्ज उनके दिल में था। पता तब चला, जब अचानक हार्ट अटैक आने पर उन्हें पटना ले जाया गया। दिल्ली आना चाहती थीं, लेकिन अचानक वेंटिलेटर पर शिफ्ट होना पड़ गया।

फिर कल रात खबर आयी कि वे जीते जी नहीं आ पायी, लेकिन नदीम काजमी उनके शव को दिल्ली लाकर यहीं अंतिम संस्कार करवाने की कोशिश में हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार धीरज कुमार की फेसबुक वॉल से)

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370 के हटने के बाद वरिष्ठ पत्रकार दिनेश पाठक ने कुछ यूं जानी इमरान खान के ‘मन की बात’

मैं कंफ्यूज था। समझ नहीं आ रहा था कि कश्मीर को लेकर जो हम हिंदुस्तानी सोच रहे थे, वह सही है या यह जो मैं देख रहा हूं

Last Modified:
Monday, 12 August, 2019
IMRAN KHAN

मेरी पाकिस्तान यात्रा और इमरान से मुलाकात

दिनेश पाठक, वरिष्ठ पत्रकार

कश्मीर से अनुच्छेद 370 की रवानगी के बाद मन में आया कि पाकिस्तान हो आया जाए। सो,मैं चला गया। लाहौर-कराची घूमने के बाद अपने पाकिस्तानी दोस्त प्रधानमंत्री जनाब इमरान खान साहब से मुलाकात करने की दिली तमन्ना जागी। उनसे अपनी एक बार की मुलाकात थी। वे पहले विदेशी क्रिकेटर रहे, जिनसे पत्रकारिता में आने के बाद मेरी मुलाकात हुई थी दिल्ली में। खैर, समय तय हुआ। मैं पहुंच गया। स्वागत बहुत जोरदार हुआ।

मैं कंफ्यूज था। समझ नहीं आ रहा था कि कश्मीर को लेकर जो हम हिंदुस्तानी सोच रहे थे, वह सही है या यह जो मैं देख रहा हूं। अब मैं इमरान साहब के सामने था। खैर-मकदम के बाद उन्होंने कुछ देर क्रिकेट, भारत-पाकिस्तान की बातें कीं। फिर मैंने पूछा-जम्मू-कश्मीर से 370 हटने के बाद पाकिस्तानी चैनल्स बड़े चिंतित हैं। चीख रहे हैं भारत की अवाम के खिलाफ, हमारी सरकार के खिलाफ।

हिंदुस्तान में तो यह भी चर्चा है कि आप भी काफी खफ़ा हैं मोदी सरकार के इस कदम से। इमरान बोले-हां, ख़फ़ा तो हूं, लेकिन कर क्या सकता हूं। मोदी जी ने तो मोटा भाई को लगा दिया है मेरी बैंड बजाने के लिए। वह बजा रहा है। देश अलग नहीं जीने दे रहा है। सेना भी सुबह-शाम पानी भर रही है। वह बाजवा, जब न तब धमकी देता रहता है। आतंकवादी भाई तो चौके-छक्के वाली बाल की तरह उछल रहे हैं।

पुराने दोस्त हो, इसलिए दिल का हाल बता रहा हूं। मोदी जी ने जो मेरी लंका लगाई है न, अब तक किसी ने नहीं लगाई। सब कुछ सुकून से चल रहा था। अब उन्होंने लगा दी है तो सब पीछे पड़े हैं। मुझे तो अपना भविष्य अंधकार में दिख रहा है लेकिन क्या करूं। जनता का हित देखते हुए चुप हूं। हमारी इंटेलिजेंस भी अब काम नहीं कर पा रही है। भारत से सूचनाएं लाने में इनके पसीने छूट रहे हैं। पूरी दुनिया हमारी ओर ही आंख तरेरे जा रही है। इतना बड़ा काण्ड हो गया, कहीं से किसी ने समर्थन नहीं किया। कोई हमारे साथ खड़ा नहीं हुआ। अब तुम्हीं बताओ। मैं क्या करूं?

मैंने कहा, ‘मोदी जी से बात करके उन्हें मना क्यों नहीं लेते। पीओके, बलूचिस्तान जैसे इलाके ऑफर कर दीजिए।’ ‘अब तुम मजे ले रहे हो’, इमरान साहब ने कहा। मैंने कहा, ‘मैं तो दोनों देशों के बीच शांति चाहता हूं और मेरी नजर में यह समस्या हल भी हो सकती है। आप अपने आतंकी दोस्तों को शांत कर लो, चाहे गोली से या बातों से और सेना से कहो कि रोज-रोज सीज फायर का उल्लंघन न करे। क्योंकि अब मोटा भाई के हाथ में इंडिया की आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा है। उस बंदे के पास डोवाल भी हैं। ये दोनों मिलकर वैसे ही घुस जाएंगे, जैसे पटेल जी ने हैदराबाद में निजाम के विरोध के बाद भी सेना भेज दी थी। मोटा भाई तो मोदी जी को यह काम करके ही बताएंगे। इन्हें हल्के में नहीं लेना।‘

मैंने कहा, ‘एक दिन मेरी बात हो रही थी मोटा भाई से। उनका बहुत बड़ा सपना है इंडिया को लेकर। वे वृहत्तर भारत का सपना लेकर चल रहे हैं। बैंड बजाने को तैयार हैं। आपके सावधान रहने का वक्त है। दोस्ती में ही बता रहा हूं|’ इस पर इमरान खान बोले, ‘सही कह रहे हो। मैं क्रिकेटर ही अच्छा था। पूरी दुनिया में सम्मान था। प्रधानमंत्री होने के बाद घर के अंदर से लेकर बाहर तक बैंड बजी हुई है। सब हमें केवल और केवल राय देते हैं। क्या दिन थे, जब हम एक क्रिकेटर के रूप में इंडिया घूमते थे। आज जाने पर ही लफड़ा है।‘

इमरान का कहना था, ‘राजनयिक सम्बंध खत्म करने का दबाव था। कर दिया। फिर सबने कहा-व्यापारिक सम्बंध भी खत्म कर दो। वो भी कर दिया। इन्हें इतने से ही संतोष नहीं हुआ। समझौता एक्सप्रेस बंद करवा दिया। अब तो मेरा ये हाल है कि न घर में चल रही है और न ही देश में। मन में आ रहा है कि मैं भी कहीं चला जाऊं। या अल्लाह! किस मनहूस घड़ी में मैंने यह मुई कुर्सी संभाली थी। अब नहीं हो रहा मुझसे। ये आजवा-बाजवा किसी भी दिन मुझे लटका देंगे। मोदी जी और मोटा भाई भी नहीं सुनने को तैयार हैं। देश भी नहीं सुनने को तैयार हैं। सेना तो सुनती ही नहीं और आतंकी लफंगे तो अलग ही सरकार चला रहे हैं।’ मैं क्या करूं? यह कहते हुए इमरान साहब लिपट गए। बड़े असहज दिख रहे थे और मजबूर भी। मुझे तो बड़ी दया भी आ रही थी, लेकिन जब तक मैं कुछ करता, ससुरी आंख खुल गई।

नोट-यह मौजूदा व्यवस्था पर व्यंग्य है| इसे दिल पर न लें| पढ़ें। अच्छा लगे तो लेखक का उत्साहवर्द्धन करें, नहीं तो पढ़ने के बाद शान्ति से पतली गली से मुस्कुराते हुए निकल लें|

 

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अनुच्छेद 370: मीडिया कवरेज से दिल बाग-बाग नहीं हुआ

अनुच्छेद 370 की विदाई कोई आसान काम नहीं था। कमोबेश हर दल इसके पक्ष में था, लेकिन सत्ता में रहते हुए उसे हटाने का साहस कोई नहीं कर पाया

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इस आलेख को शुरू करने से पहले दो ऐसी शख्सियतों को नमन करना आवश्यक है,जिनका भारतीय पत्रकारिता में बड़ा योगदान है। पहले सुषमा स्वराज की याद। अस्वस्थ्य थीं, लेकिन अचानक विदा ले लेंगी, यह अंदाजा नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में सूचना प्रसारण मंत्री रहते हुए उन्होंने निजी सैटेलाइट चैनलों के लिए भारत में द्वार खोले।

उससे पहले भारतीय जमीन से यह स्वतंत्रता निजी मीडिया समूहों को नहीं थी। इसी फैसले का नतीजा है कि आज भारत में दुनिया की सबसे बड़ी और तेज गति से बढ़ी टीवी इंडस्ट्री कायम है। भारतीय खबरिया चैनल उद्योग इसके लिए सुषमा जी का हमेशा ऋणी रहेगा।

दूसरी शख्सियत भारत के महान हिंदी संपादक राजेन्द्र माथुर हैं। आज उनका जन्मदिवस है। अपने धारदार और निष्पक्ष लेखन के लिए उनको सदैव याद किया जाएगा। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर उन्होंने अद्भुत प्रामाणिक लेखन किया। सरोकारों वाली पत्रकारिता करने के लिए उन्होंने अनेक पीढ़ियां तैयार कीं।

और अब बात मिस्टर मीडिया की। यह सप्ताह निस्संदेह आजादी के बाद भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। अनुच्छेद 370 की विदाई कोई आसान काम नहीं था। कमोबेश हर दल इसके पक्ष में था, लेकिन सत्ता में रहते हुए उसे हटाने का साहस कोई नहीं कर पाया। भारतीय जनता पार्टी ने जोखिम मोल लिया है। इसके लिए उसे अवाम का समर्थन भी मिला है। इस अवसर पर यह पड़ताल भी जरूरी है कि पत्रकारों-संपादकों ने इस ऐतिहासिक फैसले की कवरेज किस तरह की।

अगर मुझे इस कवरेज का निर्णायक चुना जाए तो भरोसे से कह सकता हूं कि इससे दिल बाग-बाग नहीं हुआ। हम इससे कई गुना बेहतर कर सकते थे, लेकिन नहीं कर सके। समूचे करियर में एक पत्रकार को इतिहास के अनमोल पलों का साक्षी होने के अनेक अवसर नहीं मिलते। आज के भारत में कितने पत्रकार ऐसे होंगे, जिन्होंने भारत की आजादी, बंटवारा, महात्मा गांधी की हत्या, बासठ,पैंसठ और इकहत्तर के युद्धों की कवरेज की होगी।

आपातकाल, जनता पार्टी की सरकार, गुट निरपेक्ष देशों का सम्मेलन, इंदिरा गांधी की शहादत, कारगिल बचाव और अंतरिक्ष अभियानों को कवर करने जैसा ही एक मौका सोमवार को इस देश के पत्रकारों ने पाया था। लेकिन हम उत्साह,आवेग और भावना पर काबू न रख सके। खांटी खबर, तथ्यात्मक विश्लेषण, अंतर्राष्ट्रीय असर और दूरगामी परिणामों के मद्देनजर अपनी रिपोर्टिंग में हम गहराई नहीं ला सके।

इसके दो कारण समझ में आते हैं। एक तो इस तरह के मामलों में हम पाकिस्तान फोबिया से ग्रस्त हो जाते हैं। यह पड़ोसी हमारे अवचेतन पर इस तरह हावी हो जाता है कि हर कदम हमें ब्रह्मास्त्र लगने लगता है। मानो हिन्दुस्तान अभी पलक झपकते ही पाकिस्तान को राख कर देगा। दूसरा कारण मुझे लगता है कि हम खबर आते ही पुराने दस्तावेजों, किताबों, प्रामाणिक संदर्भों की खोजबीन नहीं करते। अपनी सहूलियत के मुताबिक विशेषज्ञों का चुनाव करते हैं और हल्के फुल्के सतही ज्ञान का अंबार लगा देते हैं। एक दर्शक आठ घंटे तक उस बहस को देखता रहे तो भी संतोष नहीं होता और अगर सार्थक चर्चा हो तो एक घंटे में ही डकार आ जाती है। अब इसका क्या किया जाए मिस्टर मीडिया?

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: एक बार फिर इसी सत्याग्रह की जरूरत है

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कश्मीरी पत्रकार ने कश्मीरी पंडितों पर की 'तीखी' टिप्पणी, बोलीं-अलविदा कश्मीरियत!

इतने वर्षों से हमारी अपनी जमीन पर हमारी अलग पहचान बनी हुई थी, लेकिन अब जब पूरे देश से यहां लोग आकर बसेंगे तो आप सब लोग दिल्ली की किसी कॉलोनी के हिस्से की तरह नजर आएंगे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
Kashmiri Pandit

सागरिका किस्सू, पत्रकार।।  

मैं सिडनी में रह रही हूं और जहां हूं, वहां खुश हूं। कश्मीरी पंडित होने के नाते मेरा भी इस मामले में कुछ कहना है। मेरी अपनी राय है और उसे कहने का मुझे पूरा हक है। कश्मीरी पंडित बेशक बहुत शांत और दयालु माने जाते हों, लेकिन उनकी मतलबपरस्ती और घमंडीपन भी कम नहीं है। कश्मीर में पंडितों की तादाद भले ही अल्पसंख्यक हो, लेकिन शिक्षा के मामले में बहुसंख्यक हैं। सरकारी नौकरियों में महत्वपूर्ण पदों पर उनका कब्जा है। कश्मीरी पंडितों के बच्चों के बस तीन ही सपने होते हैं-डॉक्टर, इंजीनियर और बैंक अफसर (ज्यादतर प्रोबेशनरी अफसर)।

कश्मीरी पंडितों ने मुसलमानों को हमेशा दूसरे दर्जे का नागरिक माना है। दफ्तरों में उनकी संख्या ज्यादा होने के बावजूद अल्पसंख्यक पंडित उन पर अपनी हुकूमत चलाते हैं। कश्मीरी पंडित शेष भारत के लोगों का जिस तरह मजाक उड़ाते हैं, वह अजीबोगरीब है। हर तरह के लोगों की हैसियत तय करने का उनका अपना पैमाना है।

चाहे वो डोगरा हों, दक्षिण भारतीय हों या सिख हों, कश्मीरी पंडित उनका मजाक किसी न किसी बहाने उड़ाते रहते हैं जो सुनने में नस्लवादी फिकरे होते हैं। चूंकि पूरा जम्मू कश्मीर राज्य भारत और पाकिस्तान समर्थकों में बंटा हुआ है तो कश्मीरी पंडित मौका पाते ही कह देते हैं-तो पाकिस्तान चले जाओ।

मैं किसी भी तरह के सशस्त्र संघर्ष का समर्थन नहीं करती, लेकिन सोचती हूं कि जो गालियां और अत्याचार हम दूसरों पर करते हैं, वो हमेशा वापस लौटकर मिलता है। मुझे ऐसा क्यों महसूस हो रहा है कि जो कश्मीरी पंडित आज डांस कर रहे हैं, उन्हें जल्द ही अपनी गलती का पछतावा होगा।

इतने वर्षों से हमारी अपनी जमीन पर हमारी अलग पहचान बनी हुई थी, लेकिन अब जब पूरे देश से यहां लोग आकर बसेंगे तो आप सब लोग दिल्ली की किसी कॉलोनी के हिस्से की तरह नजर आएंगे। आपकी कोई अलग पहचान नहीं होगी। अब तुम्हें मुसलमानों से भी ज्यादा ऐसी चीजें बर्दाश्त करना पड़ेंगी, जो पक्का तुम्हारे लिए नाकाबिले बर्दाश्त होंगी।

कश्मीरी पंडितों की एक पूरी पीढ़ी घाटी के बाहर पैदा हुई और बड़ी हुई है, जिनका सपना अपने वतन (कश्मीर) लौटना था, लेकिन अब की पीढ़ी शायद ही वतन लौटना चाहे। अनुच्छेद 370 और 35ए भले ही भारत को कश्मीर (जमीन से जमीन) के करीब लाया हो, लेकिन यह कश्मीरियत को मिटाने की कीमत के नाम पर किया गया है।

कश्मीरियत का मतलब ऐसे कश्मीरियों के अस्तित्व से है, जो विभिन्न धर्मों और समुदायों से हैं और जो एक-दूसरे से नफरत किए बिना साथ-साथ रहते हों। जब राज्य में कश्मीरियों की अलग तादाद ही बाहर से आने वाले बाकी लोगों के मुक़ाबले महत्वहीन हो जाएगी तो कश्मीरियत भी उसी के साथ खत्म हो जाएगी। एक केंद्र शासित कश्मीर में भले ही इन्फ़्रास्ट्रक्चर का जाल खड़ा हो जाएगा, लेकिन कश्मीर की आबोहवा (पर्यावरण) बर्बाद हो जाएगी।

यहां विभिन्न समुदायों के लोग तो होंगे, लेकिन यहां का अपना मूल कल्चर खत्म हो जाएगा। सफलता की लंबी सूची बन जाएगी, लेकिन जिस बूते कश्मीर कश्मीरियत खड़ी थी, वह खत्म हो जाएगी। अलविदा कश्मीरियत।।

(सागरिका किस्सू के कजिन यूसुफ किरमानी की फेसबुक वॉल से साभार)

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पत्रकारों के एक वर्ग के लिए सुकून भरा मनोरंजन होती हैं इस तरह की 'हरकतें'

वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय ने उठाया बड़ा सवाल, क्या हमने कश्मीर के पत्रकारों को भी देश विरोधी और पाकिस्तान समर्थक मान लिया है?

संतोष भारतीय by संतोष भारतीय
Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
Santosh Bhartiya

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुषमा स्वराज जी के निधन और उनके अंतिम संस्कार से पहले मैं यह पंक्तियां लिख रहा हूं। वैसे तो कभी कोई राजनेता पत्रकारों से दूरी नहीं बनाता, पर उनसे मन के संबंध भी नहीं बनाता। भारतीय जनता पार्टी में सिर्फ दो नेता ऐसे रहे, जिन्होंने पत्रकारों से कभी दूरी नहीं बनाई और उनके साथ जब भी बात की, अच्छे माहौल में बात की। इनमें पहली सुषमा स्वराज हैं और दूसरे अरुण जेटली हैं।

सुषमा जी अब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन अरुण जेटली हैं। दोनों ने जिन पत्रकारों को नहीं पसंद किया, उन्हें भी कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि वह उन्हें पसंद नहीं करते हैं। जब भी दोनों सेंट्रल हॉल में आते थे तो पत्रकार उनके आसपास आ जाते थे। हंसी-ठिठोली के साथ वे जितनी देर पत्रकारों के साथ रहते, माहौल को खुशनुमा बनाए रखते। अब सुषमा जी कभी सेंट्रल हॉल नहीं आएंगी, लेकिन अरुण जेटली के संसद के सेंट्रल हॉल में आने की संभावना बनी हुई है और उनका इंतजार भी पत्रकार वहां कर रहे हैं।

इन दिनों अरुण जेटली का स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं है, लेकिन इसे समय की या राजनीति की विडंबना ही कहेंगे कि जो व्यक्ति हमेशा सक्रिय रहा, भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के दिशा निर्देशकों में रहा, आज उसका नाम न तो भारतीय जनता पार्टी के लोग लेते हैं और न ही उन्हें सेंट्रल हॉल में याद किया जाता है। शायद यही जिंदगी है और यही दुनिया की रीति है, जो बहुत ही बेरहम है।

इन दिनों पत्रकारिता की नई परिभाषा लिखी जा रही है। एंकर अब पत्रकार और संपादक हो गए हैं, जिनकी पत्रकारिता सिर्फ यहां तक सीमित है जो पूछते हैं कि यह श्रीमान यह कह रहे हैं, आपका क्या कहना है? आज तक हमने कभी उनके मुंह से भारतीय राजनीति के अंतर्विरोध, भारतीय राजनीति के विकास, भारतीय राजनीति के पतन और भारतीय राजनीति के खूबसूरत चेहरे के बारे में एक शब्द नहीं सुना।

देखने में तो यह आ रहा है कि सभी पत्रकार की जगह एक विशेष राजनीतिक पार्टी के विशेष प्रधान प्रवक्ता बन गए हैं। इनमें से किसी को यह देखकर नहीं लगता यह पत्रकार हैं और इन्हें दोनों पक्षों की जानकारी है। हालत अब यहां तक पहुंच गए हैं कि एक पत्रकार अपनी बात कहने की जगह दूसरे पत्रकार का मजाक उड़ाने लगा है।

यह मजाक सिर्फ खिल्ली उड़ाने वाला नहीं है, बल्कि अपमान करने वाला है और यह बताता है कि पत्रकार भी भारतीय राजनीति की उसी बीमारी का शिकार हो गए हैं, जो बीमारी कहती है कि जो हमारे साथ नहीं है, वह देशद्रोही है और देशप्रेमी सिर्फ हम ही हैं। यानी पत्रकार सिर्फ हम ही हैं, आप तो सारी जिंदगी पत्रकार बन ही नहीं पाए। मैंने एक बार और कहा था यह भी विडंबना है कि इनमें से 90 प्रतिशत की जिंदगी में कोई भी एक रिपोर्ट ऐसी नहीं है, जिसे हम रिपोर्ट कह सकते हैं।

टेलिविजन पत्रकारिता के उदाहरण में एक खास पहलू यह है कि रिपोर्ट तो पत्रकार करता है या जिले का अंशकालिक संवाददाता करता है, उसका फायदा या उसका श्रेय एंकर उठाता है। जिसने रिपोर्ट की है, वह उसका नाम ही नहीं लेता। उसे पर्दे पर ही नहीं आने देता, बल्कि इस तरह प्रस्तुत करता है कि मानो यह उसका कमाल हो। यह नई पत्रकारिता की नई परिभाषा लिखने की शुरुआत हो चुकी है।

टेलिविजन की पत्रकारिता और सोशल मीडिया की पत्रकारिता लगभग एक खाने में आती दिखाई दे रही हैं। वायरल सच के नाम पर दूसरे को झूठा साबित करना और खुद उस चैनल ने अपने दर्शकों को कितना झूठ परोसा है, इसकी वास्तविकता न बताना ही आज असली पत्रकारिता है।

आज की इसी पत्रकारिता ने हमें यह भी बताया है रवीश कुमार, जिन्हें मैगसायसाय पुरस्कार मिला, दरअसल वे विदेशी एजेंट हैं और उन्हें 2014 में यह काम सौंपा गया था कि वे 2014 के बाद बनी सरकार के वादों का पर्दाफाश करते रहें। इसके लिए किन-किन देशों की किन-किन ताकतों ने उन्हें धन मुहैया कराया?

रवीश कुमार को देशद्रोही पत्रकार घोषित करने में सोशल मीडिया पर प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई और दूसरी तरफ भारत के टेलिविजन चैनलों के कुछ अपवादों को छोड़कर किसी ने इसे पत्रकारों के लिए गर्व का विषय नहीं माना। यही कारण रहा कि जो हमारे साथ है, वही सही पत्रकार है, बाकी सब देश विरोधी हैं।

बहुत सारी घटनाओं की तरह कश्मीर के सवाल पर कश्मीर के पत्रकारों की जगह दिल्ली के पत्रकारों की राय देश के सामने आई। कश्मीर के जर्नलिस्ट क्या बोलते हैं, उनकी राय क्यों प्रमुखता से सामने नहीं आई। क्या हमने कश्मीर के पत्रकारों को भी देश विरोधी और पाकिस्तान समर्थक मान लिया है? यह स्थिति क्या स्वस्थ समाज का लक्षण है?

एक और विलक्षण स्थिति है। अगर विनोद दुआ, अभिसार शर्मा, पुण्य प्रसून बाजपेयी, रवीश कुमार, अशोक वानखेडे, बरखा दत्त, उर्मिलेश जैसे पत्रकारों को सोशल मीडिया पर गालियां दी जाएं, उनके ट्विटर, वॉट्सऐप या मैसेज पर भद्दी-भद्दी धमकियां दी जाएं तो पत्रकारों के एक वर्ग के लिए बहुत सुकून भरा मनोरंजन हो जाता है जो उन्हें मानसिक संतुष्टि देता है। राजनीतिक विचारधाराएं पहले भी होती थी, लेकिन वह रिपोर्ट के तथ्यात्मक हिस्से में नहीं झलकती थीं।

आज तो एंकर जैसे ही स्क्रीन पर आया, एक साधारण आदमी भी अंदाजा लगा लेता है कि क्या बोलने वाला है और कैसे सवाल पूछने वाला है? पहले ऐसे नेता होते थे, जो स्वयं अपने खिलाफ छद्म नाम से एडिट पेज पर आर्टिकल लिखते थे। ऐसे पत्रकार होते थे, जो अपने घनिष्ठ राजनीतिक मित्र के विरुद्ध भी बेहिचक रिपोर्ट करते थे और अपनी दोस्ती भी नहीं तोड़ते थे।

अंग्रेजों जमाने में भी दो तरह के पत्रकार होते थे। एक वो जो गवर्नर जनरल या लाट साहब के यहां चाय पीना अपने लिए गर्व की बात मानते थे, दूसरे वह जो देश के लिए और देश की जनता के लिए पत्रकारिता करते थे। आज भी ऐसे लोग हैं और ऐसे लोग बेशर्मी से पत्रकारिता की नई परिभाषा लिख रहे हैं। आइए और इस नई परिभाषा को समझिए और मुस्कुराइए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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राजेंद्र माथुर जी के उस दिन दफ्तर आने पर मैं बेहद घबरा गया था: विनोद अग्निहोत्री

यह जानने के बाद कि मैं जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एमफिल कर रहा हूं तो उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर तमाम सवाल पूछे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
Vinod agnihotri

विनोद अग्निहोत्री, कंसल्टिंग एडिटर, अमर उजाला।।

आज पत्रकारिता में 34 वर्षों के लंबे अंतराल के बावजूद मुझे वह दिन बहुत अच्छी तरह याद है, जब मैं दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग स्थित टाइम्स हाउस की चौथी मंजिल पर नवभारत टाइम्स के लिए साक्षात्कार देने गया था। राजेंद्र माथुर जी से मेरी यह पहली मुलाकात थी। मैंने उनका नाम भी सुन रखा था और उनका लिखा पढ़ता भी था। उन दिनों मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एम.फिल कर रहा था और किसी ऐसी नौकरी की तलाश में था, जिसमें मैं अपनी पढ़ाई भी बेरोकटोक जारी रख सकूं।

जब नवभारत टाइम्स में पत्रकारों की जगह निकली तो मैंने भी आवेदन किया। लिखित परीक्षा पास करने के बाद इंटरव्यू देने आया था। इंटरव्यू के दौरान सबसे ज्यादा सवाल राजेंद्र माथुर जी ने ही पूछे। यह जानने के बाद कि मैं जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एमफिल कर रहा हूं तो उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर तमाम सवाल पूछे।

इंटरव्यू के लिए आए तमाम दूसरे अभ्यर्थियों को देखकर मुझे नहीं लग रहा था कि मेरा चयन होगा, क्योंकि मुझे तब पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं था, जबकि अन्य अभ्यर्थी पांच से दस साल तक का अनुभव लेकर आए थे। लेकिन नवभारत टाइम्स में मेरा चयन हुआ और मुझे लखनऊ संस्करण भेज दिया गया। जहां से एक साल बाद मुझे फिर दिल्ली बुला लिया गया और तब मुझे माथुर जी के साथ सीधे काम करने का मौका मिला।

ये वो दौर था जब अंग्रेजी अखबारों और पत्रिकाओं का बोलबाला था। राजनीति के गलियारों से लेकर सरकारी अफसरों तक के यहां अंग्रेजी वालों की तूती बोलती थी। लेकिन इसी दौर में राजेंद्र माथुर के संपादन में निकलने वाले नवभारत टाइम्स, जिसमें कुछ समय बाद सुरेंद्र प्रताप सिंह कार्यकारी संपादक के रूप में आ गए, ने हिंदी पत्रकारिता को जो तेवर और धार दी, जिससे अंग्रेजी वाले भी उसका लोहा मानने लगे।

राजेंद्र माथुर जी के साथ मेरे कई निजी अनुभव भी हैं, जिनमें कुछ मैं यहां साझा कर रहा हूं। माथुर जी बेहद सहज और सरल व्यक्तित्व के इंसान थे। असहमति को सम्मान देना कोई उनसे सीखे। उनकी लेखनी और उसकी व्यंजना अद्भुत थी। उनके संपादकीय और लेख समय के दस्तावेज हैं। पंजाब में आतंकवाद के दौरान जब उनके प्रखर लेखन से खफा आतंकवादियों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी और सरकार ने उन्हें सुरक्षा मुहैया करानी चाही तो माथुर जी ने यह कहते हुए साफ मना कर दिया कि जिस दिन लेखक और पत्रकार पुलिस की सुरक्षा में चलेंगे उस दिन कलम मर जाएगी। जरा तुलना कीजिए, आज उन पत्रकारों और संपादकों से जो पुलिस की सुरक्षा पाने के लिए मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के आगे किस तरह नतमस्तक होते हैं।

नए और युवा पत्रकारों की रुचियों और प्रतिभा की पहचान करके उन्हें आगे बढ़ने का मौका देना राजेंद्र माथुर जी की प्रकृति थी। मेरे जैसे और मुझसे वरिष्ठ न जाने कितने पत्रकार आज जहां भी हैं, उसके पीछे माथुर जी का संरक्षण और प्रोत्साहन ही बुनियाद है। उन दिनों जब मैं और मेरे ही हमउम्र कई संपादकीय साथी जो डेस्क पर थे, नभाटा के संपादकीय पृष्ठ पर तमाम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और समसामयिक विषयों पर पहला लेख लिखते थे और छपते थे।

अगर कभी लेख लिखने में ढिलाई हो जाए तो माथुर साहब खुद टोक देते थे कि क्या बात है, लिखना बंद कर दिया क्या। माथुर साहब की परिकल्पना थी कि अखबार एक गुलदस्ते की तरह होता है, जिसमें हर रंग हर किस्म और हर महक के फूल होने चाहिए। इसीलिए राजेंद्र माथुर की टीम में एस पी सिंह, विष्णु खरे, आलोक मेहता, मधुसूदन आनंद, राजकिशोर, विष्णु नागर, सूर्यकांत बाली, प्रयाग शुक्ल, रामबहादुर राय जैसे दिग्गज और हर विचारधारा के पत्रकार थे। उन दिनों नभाटा के संपादकीय पेज पर किसी भी धारा के लेख छपने की आजादी थी।

एक बेहद दिलचस्प वाक्या। राजेंद्र यादव के संपादन में निकलने वाली हंस पत्रिका में जनवादी पत्रकार आनंदस्वरूप वर्मा ने एक लेख लिखकर राजेंद्र माथुर के लेखन पर आलोचनात्मक टिप्पणी की। माथुर साहब ने उस लिख को इनलार्ज कराकर नोटिस बोर्ड पर लगवाया और अपनी आलोचना को हाईलाइटर से रेखांकित करके टिप्पणी लिखी कि सभी संपादकीय साथी इसे अवश्य पढ़ें। खुद आनंदस्वरूप वर्मा बताते हैं कि लेख लिखने के बाद उन्होंने संकोचवश माथुर साहब से मिलना बंद कर दिया, जबकि पहले खूब मिलते थे। इसी दौरान वर्मा को दक्षिण अफ्रीका के पहले आम चुनाव में वहां जाने का मौका मिला.। यह बात जब माथुर साहब को पता चली तो उन्होंने वर्मा को बुलाया और पहले तो कहा कि मिलना क्यों बंद कर दिया। फिर बोले कि सुना है दक्षिण अफ्रीका जा रहे हो, वहां से नभाटा के लिए लिखिए। आनंद स्वरूप वर्मा ने लिखा और राजेंद्र माथुर ने छापा। कल्पना कीजिए आज के दौर में क्या यह मुमकिन है।

और भी बहुत सारे अनुभव हैं राजेंद्र माथुर जी के साथ मेरे और तमाम साथियों के। उन दिनों बहादुरशाह जफर मार्ग में टाइम्स और एक्सप्रेस के दफ्तरों में काम करने वाले पत्रकारों का आपस में खूब आना-जाना होता था। नवभारत टाइम्स में राजेंद्र माथुर और जनसत्ता में प्रभाष जोशी हिंदी के दो शिखर संपादक यहीं बैठते थे। अखबारों के दफ्तर आज के दौर की तरह कार्पोरेट कार्यालय नहीं थे। तब न्यूज रूम जीवंत होते थे और खबरों पर राजनीति पर मुद्दों पर गरमा गरम बहस होती थी। कई बार हम युवा पत्रकार किसी मुद्दे पर बहस करते थे तो अचानक पता चलता था कि बगल में चुपचाप माथुर साहब खड़े सुन रहे हैं। हम लोग उन्हें देखकर झेंप जाते थे तो वह कहते थे आप लोग बातचीत करते रहिए और मुझे सुनने दीजिए।

उन दिनों नभाटा में लेख और रिपोर्ट लिखने की होड़ होती थी। मुझे डेस्क से जब रिपोर्टिंग के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश संवाददाता बनाकर मेरठ भेजा गया तो एक बार राजेंद्र माथुर जी को मेरठ में एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आना था। लेकिन उसी दिन मुझे अचानक एक रिपोर्टिंग के सिलसिले में मुजफ्फरनगर के दूर दराज देहात में जाना पड़ गया। जब लौटा तो रात के नौ बज चुके थे। मेरठ आफ्रिस आने पर पता चला कि माथुर साहब कार्यक्रम के बाद कुछ देर के लिए दफ्तर भी आए थे। मैं बेहद घबरा गया कि प्रधान संपादक आए और मैं नहीं मिला। मैंने रात में ही उन्हें टेलीप्रिंटर से संदेश भेजकर बताया कि मैं एक बड़ी खबर के सिलसिले में गया था, लेकिन लौटने में देर हो गई,इसलिए आपसे नहीं मिल सका। आशा है कि आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे।

अगले दिन सुबह साढ़े ग्यारह बजे मेरी मेज पर माथुर साहब का जवाब टेलीप्रिंटर संदेश रखा था, जिसमें लिखा था कि मेरी खातिरदारी से ज्यादा जरूरी है खबर पर काम करना। मैं इसे बिल्कुल अन्यथा नहीं लूंगा लेकिन अगर तुम खबर छोडकर मेरे लिए रुकते तो जरूर अन्यथा लेता। ऐसे थे राजेंद्र माथुर, जिन्हें मैं हिंदी पत्रकारिता के स्वर्णकाल का महानायक मानता हूं। उनकी स्मृतियां हमेशा मेरे जैसे तमाम उन पत्रकारों के साथ रहेंगी, जिनकी पत्रकारिता की बुनियाद में राजेंद्र माथुर की शिक्षा दीक्षा है।

(आज स्व. राजेंद्र माथुर जी की 84वीं जयंती है)

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कुछ यूं पाठकों के दिल-दिमाग में उतर जाती है जयंती रंगनाथन की किताब ‘रूह की प्यास’

मुझे लगता है कि हिंदी साहित्य में यह शायद पहला प्रयोग है। अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करूं तो ‘horror’ के साथ ‘lust’ का अनूठा संगम

Last Modified:
Monday, 05 August, 2019
Jayanti Rangnathan

रेखा बब्बल।।

जयंती के कई उपन्यास और तमाम कहानियां पढ़ने के बाद जब ‘रूह की प्यास’ की कहानियां पढ़नी शुरू की तो कहानी-दर-कहानी पढ़ते हुए और उन कहानियों के साथ आगे बढ़ते हुए मन में कौतूहल जागा कि इस किताब को लिखने वाली कोई और जयंती तो नहीं? मुझे लगता है कि हिंदी साहित्य में यह शायद पहला प्रयोग है। अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करूं तो ‘horror’ के साथ ‘lust’ का अनूठा संगम। बड़ी बहादुरी के साथ जयंती ने इस पुस्तक को आकार दिया है और पाठकों को वहां तक ले जाने में कामयाब हुई हैं, जहां तक वो ले जाना चाहती थीं।

हरेक कहानी की ये खासियत है कि वो बीच में आपको रुकने नहीं देती।’ अबकी बार क्या होगा?’ इस उत्सुकता के साथ अंजाम तक पहुंचते-पहुंचते स्वाभाविक रूप से एक डर आकर घेर लेता है। अंधेरे में चमकती सियार की आंखें, नर्गिस की तलाश में सिड का स्टेशन पहुंचना,सुनेत्रा का श्यामा हो जाना,चमेलीगढ़ के मंदिर में देवी की मूर्ति,रम्या का अटपटा व्यवहार और रंगिनी-राजवीर से गौतम का रिश्ता देर तक दिमाग में घूमता रहता है। सारी की सारी कहानियां दृश्यात्मक हैं। मैं अपने कार्यक्षेत्र में जिस विधा से जुड़ी हुई हूं, वहां विषयवस्तु का दृश्यात्मक होना बहुत बड़ी सफलता मानी जाती है।

एक मलाल है कि काश! जयंती अपने किसी एक पात्र को भी रूप और जिस्म के जाल में फंसने से बचा पातीं। डूबते-डूबते किनारे पर ले आतीं तो थोड़ी तसल्ली होती मन को। कुल मिलाकर इस नए प्रयोग और इस प्रयोग को सफलतापूर्वक निभा जाने के लिए जयंती निश्चय ही बधाई की पात्र हैं।

(साभार: फेसबुक)

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वरिष्ठ पत्रकार अजय शुक्ल बोले, आज तमाम अखबारों में दिखी पत्रकारिता की ये 'दरिद्रता'

आज के दौर में पत्रकारिता के कुछ बुनियादी प्रश्नों का जवाब खोजा जाना बहुत जरूरी है। क्या चेहरा देखकर सम्मान की गरिमा बढ़ती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 03 August, 2019
Last Modified:
Saturday, 03 August, 2019
Press

अजय शुक्ल, प्रधान संपादक, आईटीवी नेटवर्क।।

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को रैमन मैगसायसाय जैसा प्रतिष्ठित अवार्ड मिला है। पांच लोगों में रवीश अकेले भारतीय हैं, जिन्हें यह अवार्ड मिला है। अब तक भारत के पांच पत्रकारों को यह सम्मान हासिल हुआ है और किसी हिंदी पत्रकार को यह पहला सम्मान है। पर हिंदी पट्टी की पत्रकारिता में दरिद्रता कितनी है, यह आज के तमाम हिंदी पट्टी के बड़े अखबारों को देखकर समझा जा सकता है। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले तमाम हिंदी अखबारों के पहले पेज पर यह खबर नहीं है। सिर्फ ‘आज समाज’ ने इस खबर को प्रथम पेज पर स्थान दिया है। रोज सुबह तमाम अखबारों पर अपना सुबह का एक घंटा देता हूं, पर आज का एक घंटा कुछ अटपटा सा लगा कि क्या सही में हमारी पत्रकारिता में इतनी दरिद्रता आ गई है कि एक पत्रकार को मिले इतने बड़े सम्मान की खबर सिरे से गायब हो। क्या चेहरा देखकर सम्मान की गरिमा बढ़ती है।

पत्रकार रवीश से तमाम लोगों की वैचारिक विभिन्नता हो सकती है। मैं भी उनमें से एक हूं। उनकी पत्रकारिता से भी बहुत लोग इत्तेफाक नहीं रखते हैं। पर रैमन मैगसायसाय जैसे सम्मानित पुरस्कार से कैसी मत विभिन्नता? किसी भारतीय को मिला यह सम्मान क्या हमारे लिए गर्व की बात नहीं? क्यों इससे पहले मिले रैमन मैगसायसाय पुरस्कार पेज वन की महत्वपूर्ण खबरों में शुमार हुए और क्यों आज यह खबर तमाम अखबारों के पहले पेज से गायब मिली, इस पर मंथन जरूरी है।

1. क्या पत्रकार रवीश की जगह किसी भारतीय समाजसेवी को यह पुरस्कार मिला होता, तब भी यह खबर प्रथम पेज पर नहीं होती?

2. क्या इस पुरस्कार का महत्व सिर्फ इस बात से कम हो गया क्योंकि यह हमारे प्रोफेशन से जुड़े किसी साथी को मिला है?

3. हिंदी पट्टी के पत्रकार और संपादक खुद को इस सम्मान के लायक ही नहीं समझते?

4. हिंदी अखबारों के संपादक इस कॉम्प्लेक्स में चले गए कि लंबे चौड़े ज्ञान तो वो देते हैं, फिर किसी अन्य पत्रकार को यह पुरस्कार कैसे मिल गया?

5. अगर पत्रकार को मिले पुरस्कार से दिक्कत थी, तब भी एनडीटीवी और पत्रकार शब्द हटाकर सिर्फ रवीश कुमार के नाम से यह खबर प्रकाशित की जा सकती थी या नहीं?

6. क्या सिर्फ किसी समाजसेवी को मिला रैमन मैगसायसाय पुरस्कार ही पेज वन की स्टोरी हो सकती है, क्यों नहीं पत्रकार खुद को समाजसेवी के रूप में देख सकने की हिम्मत पैदा करते हैं?

7. और अंतिम बात... क्या अगर रवीश या किसी अन्य पत्रकार को कभी नोबल पुरस्कार मिल जाए तो क्या वह खबर भी अखबारों के प्रथम पेज के लायक होगी या नहीं?

पत्रकार रवीश को मिला सम्मान देश का सम्मान है, इसका सेलिब्रेशन ठीक वैसे ही बनता है जैसे किसी नेता या अभिनेता को मिला सम्मान।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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