‘अतुल को याद कर अब जेहन में उभरती है गुलजार की ये नज्म’

चिमनबाग में अतुल के प्रगति पुस्तक भंडार के पीछे जीता-जागता एक कमरा था, जो दुकान से ज्यादा चलता था

Last Modified:
Friday, 02 August, 2019
Atul Lagoo


बात लगभग चालीस बरस पुरानी है। उन दिनों मैं नईदुनिया में मुलाजिम था। शाम होते ही मैं दफ्तर पहुंच जाता। हमारे नसीब में न पंछी होना बदा था और न अजगर। रात...
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