‘अतुल को याद कर अब जेहन में उभरती है गुलजार की ये नज्म’

चिमनबाग में अतुल के प्रगति पुस्तक भंडार के पीछे जीता-जागता एक कमरा था, जो दुकान से ज्यादा चलता था

Last Modified:
Friday, 02 August, 2019
Atul Lagoo

बात लगभग चालीस बरस पुरानी है। उन दिनों मैं नईदुनिया में मुलाजिम था। शाम होते ही मैं दफ्तर पहुंच जाता। हमारे नसीब में न पंछी होना बदा था और न अजगर। रात जब दफ्तर से लौटता तो जिंदगी आंखें खोलती। कभी दोस्त भी साथ हो लेते। मेरा एक अदद कमरा हुआ करता था, पीली मिट्टी-गोबर से लिपा हुआ। मैंने उसे बड़े जतन से संवारा था। वहीँ दोस्तों का डेरा लगा रहता। देर रात महफिलें सजतीं, दुनिया जहान की बातें होतीं। गाना-बजाना होता, कभी-कभार यूं ही करते-करते सुबह हो जाती। अखबार आ जाता, दूधवाला भैया आ जाता। फिर हड़बड़ी में सब सोने की तैयारी करते। बेगम अख्तर की आवाज कमरे में, दिल में गूंजती रहती।

अहदे जवानी रो-रो काटा, पीरी में ली आंखें मूंद

यानी रात बहोत थे जागे सुबह हुई आराम किया

खूब किताबें पढ़ी जातीं और उन पर बहस-मुबाहिसा होता। ये भी होता कि कोई एक पढ़ता और दूसरे सुनते। कभी कोई पढ़ते-पढ़ते फफककर रो पड़ता। संगीत और साहित्य के वलवले का लोबान सुलगता रहता। मंटो का पारायण होता। मीरो गालिब के दीवान सिरहाने रखे रहते। साहिर की परछाइयों में हयात बसर होती। किताबें सारी अतुल के यहां से आतीं। इसरार से मांगकर किताब पढ़ने-पढ़ाने का चलन था। मेरा एक दोस्त गोरांग बड़े फख्र से कहता, `हमारे बंगाल में किताब चुराना बुरा नहीं माना जाता`। महसूस करें तो कितनी बड़ी बात है।

उन दिनों मैं नहीं था, फ़कत इश्क था। मत पूछो जालिम मुझसे क्या-क्या कराते रहता था। रात देर से सोता, सुबह देर से उठता। लेकिन दोपहर अपनी जेब में रखता। उसे जैसा जी करे, खर्च करता। ऐसे में कई बार अतुल के साथ दोपहर गुजरती। रशियन साहित्य से तो कई पाठकों को अतुल ने ही रूबरू कराया था। किताबें इतनी सस्ती होती थीं कि मेरे जैसा आदमी भी किताबें खरीद सकता था। रशियन किताबों का कागज, जिल्द,प्रिंट और फॉन्ट बहुत खूबसूरत होता था और लेखक की तस्वीर भी। जैसे राजा रवि वर्मा ने हमारे जेहन में देवी-देवताओं के रूप पैबस्त किए हैं, वैसे ही रशियन लेखक हमें ताउम्र वैसे ही नजर आते रहेंगे, जैसे हमने उन किताबों पर देखे थे।

एक दोपहर मैंने चंद किताबें चुनीं और गुलजार की `कुछ और नज्में` सरसरी नजर से देखने लगा। एक-दो नज्में ही पढ़ी होंगी कि मैं बैठने की जगह तलाशने लगा। बैठकर कुछ और नज्में पढ़ीं। पहले ही इश्क की बेल मुझ पर चढ़ी-लिपटी, उस पर फूल खिल आए। मैं क्या तो लिखूं, मेरी क्या दशा-दुर्दशा हो गई। मैंने सारी किताबें रखीं और चलता बना। `अरे सुबोध! क्या हुआ? अतुल की आवाज ने मेरा कंधा थाम लिया। `कुछ नहीं यार, किताबें ज्यादा हो गईं, पैसे कम हैं।` अतुल का कहना था, `पैसे-वैसे तो आते रहेंगे, किताबें तो ले जा`

मैं किताबों के साथ हो लिया। फिर बड़े दिनों तक `कुछ और नज्में` और चंद दीगर किताबें मेरे झोले में रखी रहतीं। उससे टिक कर कोई पेय पदार्थ भी अपनी बारी का इंतजार करते बैठा रहता। पेय से कविताएं गेय हो जातीं। फिर आवाज दिखाई देती, रंग सुनाई पड़ते। कभी ये भी होता कि पेय ही किताब पढ़ लेता। आज भी वो किताब देखेंगे तो समझ जाएंगे।

तेरी आवाज के पैकर को लिपट जाऊं कभी

तेरी खुशबू को कभी हाथ से छूकर देखूं

बाद मुद्दत के ये हुआ कि किताब का पेपरबॅक आ गया। मैंने लपककर कुछ किताबें खरीद लीं। फिर बड़ी हसरतों से उन सब को भेंट कर दीं, जो मेरी नजर में सरापा दिल थे और सरापा दिलों पर ये दुनिया क्या कहर ढाती है-बापरे! बिल्कुल निरीह और निरापद, इश्क में डूबे लोगों से क्या दुनिया को अलग बर्ताव नहीं करना चाहिए! उनके लिए खिड़की की सीट रिजर्व, रेस्त्रां में शोर से दूर सांवला कोना, उसी गली में दस बार भी जाएं तो जाने दिए जाना, जैसी छोटी-मोटी सहूलियतें ही तो दिल के मारों के लिए बड़ी सौगातें हैं। या कुछ न बन पड़े तो दुनिया बस इतना करे कि उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ दे।

बंद शीशों के परे देख दरीचों के उधर

सब्ज पेड़ों पे घनी शाखों पे फूलों पे वहां

कैसे चुपचाप बरसता है मुसलसल पानी

 

कितनी आवाजें हैं, यह लोग हैं, बातें हैं मगर

जहन के पीछे किसी और ही सतह पे कहीं

जैसे चुपचाप बरसता है तसव्वुर तेरा

चूंकि मुझे शामें कम नसीब होती थीँ, सो अतुल से निस्बतन कम ही मुलाकातें हो पातीं, लेकिन पिछले कुछ बरसों में जब दिल्ली से राजेश बादल आता तो सारे कार्यक्रम निपट जाने के बाद रात किसी होटल का कमरा रौशन होता। फिर अतुल, राजेश और मैं नाचीज आतिशबाजी करते। एक बात पक्की है कि माथुर साहब का जिक्र जरूर निकलता और खूब किस्से सुने-सुनाए जाते। कभी किसी बात पर अट्टहास गूंजता और कमरे से बाहर निकल जाता, बात कमरे में रह जाती।

चिमनबाग में अतुल के प्रगति पुस्तक भंडार के पीछे जीता-जागता एक कमरा था, जो दुकान से ज्यादा चलता था। चंद दोस्त वहां अक्सर इकट्ठा होते। वहां एक मटकी पानी हमेशा रखा रहता। कभी-कभार देर रात मैं वहां पहुंचा हूं। वहां देखे चंद चेहरे आंखों में अब भी चमकते हैँ। अब क्या उनका नाम लूं।

सब कहां, कुछ लाला ओ गुल में नुमायां हो गईं

खाक में क्या सूरतें होंगी के पिनहां हो गईं

महफिलों के हंगामे में जब शोर बरपा होता, चाय-वाय के दौर चलते, दोस्त ऊंची आवाज में बात करते, बहसें होतीं.. अतुल हमेशा धीमी आवाज में बात करता। हां, जब चार-पांच अध्याय के बाद लोग-बाग अंग्रेजी में बात करना शुरू करते, अतुल मुझसे मराठी में बात करता। महफिलों से जब सब उड़ जाते, सबसे आखिर में जानेवाला अतुल ही होता। लेकिन अब जाने क्यों, अचानक, पहले चला गया। महफिलों में अब तेरे नहीं होने का होना हमेशा बना रहेगा।

गुलजार की एक नज्म जेहन में उभरती है

छोटे थे, मां उपले थापा करती थी

हम उपलों पर शक्लें गूंधा करते थे

आंख लगाकर-कान बनाकर

नाक सजाकर-

पगड़ी वाला, टोपी वाला

मेरा उपला

तेरा उपला

अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से

उपले थापा करते थे

हंसता-खेलता सूरज रोज सवेरे आकर

गोबर के उपलों पे खेला करता था

मेरा उपला सूख गया--

उसका उपला टूट गया--

रात को आंगन में जब चूल्हा जलता था

हम सारे चूल्हा घेरके बैठे रहते थे

किस उपले की बारी आई

किसका उपला राख हुआ

वह पंडित था--

वह मास्टर था--

इक मुन्ना था--

इक दशरथ था--

बरसों बाद--

श्मशान में बैठा सोच रहा हूं

आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में

इक दोस्त का उपला और गया!

(वरिष्ठ पत्रकार सुबोध होलकर की फेसबुक वॉल से)

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इस कानून से हिंदू क्यों नाराज हैं?

जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, वहां भी शहरों और गांवों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। भीड़ लूटपाट और तोड़-फोड़ से भी बाज नहीं आ रही है

डॉ. वेद प्रताप वैदिक by
Published - Friday, 13 December, 2019
Last Modified:
Friday, 13 December, 2019
Dr Ved Pratap Vaidik

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार।।

गृहमंत्री अमित शाह ने जो नया नागरिकता विधेयक संसद से पारित करवाया है, उसका विरोध भारत के मुसलमान नहीं, बल्कि हिंदू कर रहे हैं। ये हिंदू पूर्वोत्तर राज्यों असम, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल के हैं। इन राज्यों में रहने वाले मूल निवासियों को डर है कि नए नागरिकता कानून का फायदा उठाकर बांग्लादेश के बंगाली हिंदू उनके शहरों और गांवों में छा जाएंगे। वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हिंदू और सिखों की तरह सैकड़ों और हजारों में नहीं आएंगे, बल्कि वे अब तक हजारों और लाखों में आ चुके हैं और आते जा रहे हैं। वे कई जिलों में बहुमत में हो गए हैं। कुछ वर्षों में इन प्रदेशों के मूल निवासी अल्पमत में हो जाएंगे। उनके मन पर इस बात का कोई खास प्रभाव दिखाई नहीं पड़ रहा है कि इस नए नागरिकता विधेयक में पड़ोसी देशों के मुसलमानों को शरण देने की बात नहीं कही गई है। इस विधेयक ने पूर्वोत्तर में तूफान खड़ा कर दिया है।

जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, वहां भी शहरों और गांवों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। सरकारें हतप्रभ हैं। भीड़ लूटपाट और तोड़-फोड़ से भी बाज नहीं आ रही है। हजारों फौजी तैनात किए जा रहे हैं। कई शहरों में कर्फ्यू लग गया है। हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन ठप हो गए हैं। 34 साल बाद इतना बड़ा आंदोलन असम में फिर उठ खड़ा हुआ है।

यह आंदोलन कहीं पूर्वोत्तर क्षेत्र से भाजपा का सफाया ही न कर दे। यदि कुछ लोग हताहत हो गए तो मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी का रविवार को जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे से गुवाहाटी में मिलने का कार्यक्रम भी रद्द करना पड़ेगा। इस विधेयक ने एक तरफ पूर्वोत्तर के हिंदुओं को नाराज कर दिया है और दूसरी तरफ तमिलों को भी।

श्रीलंका से जो तमिल मुसलमान और हिंदू भारत में शरण लेना चा​हते हैं, यह विधेयक उनके बारे में भी चुप है। यह ठीक है कि इस विधेयक से भारत के मुसलमानों को कोई सीधा नुकसान नहीं है, लेकिन बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मुसलमानों पर शक की छाप लगा देने का असर क्या हमारे मुसलमानों पर नहीं पड़ेगा? इसके अलावा इन मुस्लिम देशों से जो गैर-मुसलमान भारत में आकर जमना चाहते हैं, क्या वे सब सताए हुए ही होते हैं?

क्या हमारी सरकार को यह पता है कि इन मुस्लिम देशों से बाहर जाकर बसनेवालों में मुसलमान ही सबसे ज्यादा हैं? वहां से हिंदू, सिख और ईसाई भी बाहर निकले हैं, लेकिन जिनके पांवों में दम था, वे अमेरिका, यूरोप और सुदूर एशिया में जा बसे हैं। हम इस विधेयक के द्वारा भारत को अनाथालय क्यों बनाना चाहते हैं? किसी को भी भारत की नागरिकता चाहिए तो उसका पैमाना मजहब, जाति या वर्ग नहीं, बल्कि उसके गुण, कर्म और स्वभाव होना चाहिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘मोदीजी, जन्मदिन पर तोहफे में आप इतना तो दे ही सकते हैं’

रिपब्लिक भारत की पत्रकार ज्योत्सना बेदी ने रखी मांग-जो करना है, जहां जरूरत है कराइए, क्योंकि इससे देश की छवि बहुत खराब होती है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 11 December, 2019
Last Modified:
Wednesday, 11 December, 2019
Narendra Modi

नरेंद्र मोदी सर, आज मेरा जन्मदिन है। मैं कई दिनों से रेप की खबरें पढ़ती रही, जिससे मन उदास रहा। बधाई मुझे नहीं चाहिए, तोहफों का मुझे शौक नहीं, पर आज मैं आपसे एक चीज चाहती हूं, वो ये कि बहुत बुरा लगता है, जब मैं जंतर मंतर पर रेप की वारदात को लेकर विरोध प्रदर्शन कवर करने गई तो विदेशी मीडिया के लोग वहां थे और पूछ रहे थे कि चल क्या रहा है और क्यों..? बहुत बुरा लगता है जब कोई बेटी शिकायत करने जाती है तो पुलिस एफआईआर  दर्ज करने में आनाकानी करती है, मन दुखता है जब ये खबरें देखकर घर वाले सहम जाते हैं। मन दुखता है जब नेता लोग लड़कियों की गलती निकालते हैं। मन परेशान हो जाता है जब आपकी पार्टी के नेता हादसे होने के बाद, वारदात होने के बाद पॉलिटिकल टूरिज्म करते हैं और कहते हैं कि हम खास कार्यक्रम में जाते हैं, हर रोज, हर गली में नहीं जा सकते, पर वोट मांगने के लिए हर घर जाएंगे, रोज क्यों न जा पड़े।

आपकी भी आत्मा कांपती होगी, जब रेप, दरिंदगी की खबर सुनते होंगे सर। किसी मुद्दे पर काम हो न हो, पर रेप,  छेड़खानी जैसी वारदातें बंद कराइए, अब इसके लिए काउंसलिंग करवाइए (क्योंकि बदलाव लोगों की सोच में जरूरी है)। पुलिस की सख्ती बढ़ाइए (क्योंकि कई मामलों में पुलिस बिना जांच के गुनहगारों को क्लीनचिट देती नजर आती है। (इस पर ‘रिपब्लिक भारत’ स्टिंग भी कर चुका है उन्नाव वाले मामले में) जो करना है, जहां जरूरत है कराइए, क्योंकि इससे देश की छवि बहुत खराब होती है

नरेंद्र मोदीजी, तोहफे में आप इतना तो दे ही सकते हैं। देश के प्रधानसेवक हैं और बेटी सेवा से बड़ा कुछ नहीं है। अभी शाम में आधा घंटा मां के साथ अकेले बैठी तो लड़कियों की काबिलियत की बात होने लगी। फिर कुछ चीजों का जिक्र हुआ तो ध्यान में उन्नाव, मालदा, दरभंगा, दिल्ली, दमोह, हैदराबाद, जौनपुर जैसी वारदातें आईं तो सोचा आपसे बैठके बात की जाए। बस आपको उदास मन से चिट्ठी लिख डाली।

(रिपब्लिक भारत की पत्रकार ज्योत्सना बेदी की फेसबुक वॉल से साभार)

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मिस्टर मीडिया: दंड तो यही बनता था, लेकिन क्या ये 'एनकाउंटर' है?

जब न्याय विलंब से मिलता है या चांदी के सिक्कों में खरीदा-बेचा जाता है तो समाज सड़कों पर अपने तरीके से मुजरिम को सजा देता है

राजेश बादल by
Published - Friday, 06 December, 2019
Last Modified:
Friday, 06 December, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हैदराबाद की डॉक्टर बेटी के साथ जो कुछ हुआ, वह हमें शर्मसार करता है। हमारे अनपढ़ पूर्वजों के भी अपने कुछ संस्कार थे, मगर जैसे-जैसे हम सभ्य होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ अधिक क्रूर,जंगली,वहशी और उन्मादी नहीं हो रहे हैं? संयुक्त परिवार के बिखराव का दर्द लिए हम रेडियो और टीवी पर विज्ञापनों में अपनी बेटियों को समझाइश देते हैं  कि घर में करीबी पुरुष संबंधियों से बचो। उनके गुड टच और बैड टच में फर्क करना सीखो। यह कैसा समाज हम बना रहे हैं। हैदराबाद की नृशंस घटना इसका उदाहरण है।

अव्वल तो यह घटना ही हमारे माथे पर कलंक है। पुलिस ने अपराधियों को टपका दिया। पीड़ित परिवार और हम सबने कलेजे में ठंडक महसूस की। काश! हमारी अदालतें इतनी जल्दी न्याय करने लग जाएं। जब न्याय विलंब से मिलता है या चांदी के सिक्कों में खरीदा या बेचा जाता है तो समाज सड़कों पर अपने तरीके से मुजरिम को सजा देता है ।

एक मीडियाकर्मी होने के नाते जहां अपराधियों के साथ इस सुलूक पर संतोष हो रहा है तो दूसरी तरफ कुछ गंभीर सवाल भी खड़े होते हैं। मीडिया में हम इसे मुठभेड़ कह रहे हैं। तकनीकी तौर पर यह मुठभेड़ कैसे है? भले ही वे मुजरिम थे, लेकिन दोष सिद्ध होने तक वे आरोपित थे। तो आरोपितों को रात तीन बजे चोरों की तरह पुलिस वारदात स्थल पर क्यों ले गई?

जाहिर है कि वे पुलिस हिरासत में थे तो हथकड़ी लगी थी। नाट्य रूपांतरण के लिए हथकड़ी खोली गई होंगी। यानी वे निहत्थे थे। मुठभेड़ तो तब होती है, जब दोनों ओर से गोलीबारी हो। अपराधी भी पुलिस पर फायरिंग कर रहे हों। निहत्थे आरोपित भाग भी रहे थे तो उन पर गोलीचालन मुठभेड़ नहीं कहा जाता। दूसरी बात, कानूनन भागते मुजरिमों पर सबसे पहले गोली पैरों पर मारी जाती है, ताकि वे भाग न सकें और पकड़ लिए जाएं। उनकी जान लेने का इरादा या अधिकार पुलिस को नहीं होता। यह कैसा अचूक निशाना था कि चारों मारे गए। कोई गंभीर रूप से घायल भी नहीं हुआ।

स्पष्ट है कि पुलिस, प्रशासन और सरकार पर इस शर्मनाक घटना का इतना सामाजिक दबाव था कि इस मामले में समूची पटकथा कानून के नजरिये से लचर ढंग से लिखी गई। जनभावना के मुताबिक काम करना एक बात है और कानून हाथ में लेना दूसरी बात। क्या अदालतों और भारतीय दण्ड संहिता का इस मामले में मखौल नहीं उड़ाया गया? अपनी भावनाएं परदे पर या अखबार के पन्नों पर प्रकट करने से पहले हमें वैधानिक स्वरूप का भी अध्ययन करना चाहिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल

मिस्टर मीडिया: महाराष्ट्र में क्यों चूके मीडिया के महारथी?

स्टर मीडिया: आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया कवरेज के लिए निकला है यह अनोखा ‘फॉर्मूला’

मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

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वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक की नजर से: चीनी मुसलमानों का बुरा हाल

यहां के मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर भारत, पाकिस्तान और रूस की भी बोलती बंद है, सिर्फ अमेरिका बोलता रहता है

डॉ. वेद प्रताप वैदिक by
Published - Friday, 29 November, 2019
Last Modified:
Friday, 29 November, 2019
DR Ved Pratap

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार।।

चीन के सिंक्यांग (शिन्च्यांग) नामक प्रांत में जो लोग रहते हैं, उनका नाम उइगर है। ये लोग मुसलमान हैं। वहां चीन की हान जाति के लोग पहले बहुत कम थे, लेकिन अब लगभग ढाई करोड़ की आबादी में वे डेढ़ करोड़ हैं। अपने ही प्रांत में उइगर मुसलमान लगभग एक करोड़ ही रह गए हैं। ये मुसलमान न तो वहां खुलेआम नमाज पढ़ सकते हैं, न मस्जिद में भीड़ लगा सकते हैं, न रमजान में रोजा रख सकते हैं, न सलवार-कमीज और तुर्की टोपी पहन सकते हैं और न ही दाढ़ी रख सकते हैं। बुर्के पर रोक है। देखने में ये चीनियों जैसे भी नहीं लगते हैं। ये लोग तुर्की और मध्य एशिया के मुसलमानों की तरह दिखते हैं। इनकी भाषा भी चीनी नहीं है। वह तुर्की और फारसी जैसी है। सिंक्यांग में कई लोग मुझसे फारसी में बात किया करते थे। मेरी चीनी अनुवादिका भौचक रह जाती थी।

मैं जब करीब 25 साल पहले सिंक्यांग के कुछ शहरों और गांवों में गया तो मुझे देखने और मिलने के लिए उइगरों की भीड़ लग जाती थी, क्योंकि चीनी सरकार विदेशियों को सिंक्यांग नहीं जाने देती थी। आजकल तो विदेशियों के लिए सख्त प्रतिबंध लगा हुआ है। यों भी सौ-सवा सौ साल पहले तक सिंक्यांग चीन का हिस्सा नहीं था। अब भी चीन अपने इस सबसे बड़े प्रांत को स्वायत्त-क्षेत्र कहता है। इस स्वायत्त-क्षेत्र की हालत किसी गुलाम देश भी बदतर है। यह इलाका चीन के एकदम पश्चिम में है। इसकी सीमाएं आठ देशों को छूती हैं, जिनमें भारत, पाकिस्तान और रूस भी हैं। लेकिन इन तीनों देशों की भी बोलती बंद है। ये उइगरों पर हो रहे अत्याचारों पर आंख मींचे रहते हैं। सिर्फ अमेरिका बोलता रहता है।

इस समय लगभग दस लाख उइगर ‘शिक्षा-शिविरों’ में बंद हैं। उन्हें सभ्य बनाया जा रहा है। उन्हें मंडारिन भाषा सिखाई जा रही है। उन्हें मार-मारकर अपने रीति-रिवाजों से छुटकारा पाना सिखाया जा रहा है। उन्हें शारीरिक काम-धंधों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, चाहे वे डॉक्टर, इंजीनियर या प्रोफेसर ही क्यों न हों? चीनी सरकार का कहना है कि वे अपनी उइगर जनता को देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं। उन्हें सभ्य और उन्नत नागरिक बना रहे हैं। उन्हें आतंकवाद से दूर रहना सिखा रहे हैं। चीनी सरकार ऐसा सब कुछ पांच-दस साल में इसलिए करने लगी है कि 2009 में एक दंगे के दौरान उइगरों ने 200 चीनियों की हत्या कर दी थी। 2014 में जब राष्ट्रपति शी चिन फिंग उरुमची गए थे, उइगरों ने एक रेलवे स्टेशन पर बम लगा दिया था।

इस तरह की दर्जनों छोटी-मोटी घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। मुझे 15-20 साल पहले एक बौद्धिक संवाद के दौरान पेइचिंग और शंघाई के कई चीनी नेताओं ने उइगर उग्रवादियों के बारे में काफी विस्तार से सावधान किया था। उन्हें शंका थी कि उनके चीनी उइगर मुसलमान, अफगान, तालिबान और पाकिस्तान के मुजाहिद्दीन से भी जुड़े हुए हैं। जहां तक भारत, पाक और अफगानिस्तान का सवाल है, इन देशों के अल्पसंख्यकों का हाल चीनी अल्पसंख्यकों के मुकाबले बहुत ज्यादा अच्छा है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘विश्वविद्यालयों में एक्टिविज्म को लेकर हमें समझनी होगी ये अहम बात’

प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा। यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा

डॉ. सिराज कुरैशी by
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Dr. Siraj Qureshi

डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार।।

आगरा के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में आए उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने बीएचयू में होने वाले आंदोलन पर कटाक्ष करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाषा को जाति-वर्ग से दूर रखते हुये समझा जाये कि विश्वविद्यालय-कॉलेज और स्कूल ही राष्ट्रीय निर्माण की प्रयोगशाला होते हैं। इन संस्थानों में भाषा और जाति-वर्ग को लेकर जो विद्यार्थी आंदोलन करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिये।

इसी तरह की बात एक सीनियर सिटीजन ने छात्रों से कही। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का तात्पर्य केवल एक निश्चित भूभाग में स्थित किसी भौतिक अवसंरचना से नहीं होता और न ही हम इसका मूल्यांकन वहां मिलने वाली आर्थिक सुविधाओं से कर सकते हैं, जैसा कि वर्तमान में दिखाई देता है। यह सौ प्रतिशत सच है कि जब किसी विश्वविद्यालय में सस्ती शिक्षा की वकालत की जाती है तो उसका अर्थ किसी चैरिटी को संचालित करना नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण को धार देने के समान कहा जा सकता है। अगर बीएचयू या एएमयू की गतिविधियों पर विशेष गौर किया जाये तो यह इस तरह के शिक्षा संस्थान कहे जा सकते हैं, जहां पढ़ाई कम तथा ‘एक्टिविज्म’ पर अधिक ध्यान देते हैं। हमें ऐसे विश्वविद्यालयों की गतिविधियों को देखने के बाद समझना होगा कि जिसको हम ‘एक्टिविज्म’ कहकर उपहास उड़ाते हैं, वह दरअसल शिक्षा का ही रूप होता है, जो अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में व्यक्त होता है।

ऐसी परिस्थिति से अनुमान लगाया जाता है कि इस तरह की ‘एक्टिविज्म’ परिस्थितियां सुधार की वाहक न होकर कहीं पूर्व निर्धारित राजनीतिक विचारों की पुनरावृत्ति बनकर न रह जाएं। दिल्ली स्थित जेएनयू की गतिविधियों को उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है। यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि बीएचयू, एएमयू, जेएनयू आदि विश्वविद्यालयों को जो सुविधायें मिल रही हैं और उनके बदले मिलने वाले अनुदान का संतुलन बिगड़ा हुआ है। ऐसे विश्वविद्यालयों के उद्देश्यों का एक बार अवश्य स्मरण करना चाहिये।

एक समाजशास्त्री ने जब मुझसे कहा कि एक विश्वविद्यालय, चाहे वह कितना भी उपयोगितावादी क्यों न हो, यदि वह अपने आदर्श, मौलिक सच, सौंदर्य और मानव मस्तिष्क को सुसंस्कृत करने के लिये अपनी खोज को छोड़ देता है, तो उसे विश्वविद्यालय ही नहीं कहा जा सकता। अगर इसी को सरल रूप में कहें तो रोजगार उत्पन्न करना, विश्वविद्यालय नहीं रह जाता, जबकि व्यावहारिकता का निषेध नहीं बल्कि इसे परिष्कार के उदात्त स्तर पर ले जाना ही एक विश्वविद्यालय की विशेषता होनी चाहिये। इसी को कह सकते हैं कि हम विश्वविद्यालय कैम्पस को सिर्फ रोजगार की आस से ही नहीं देखें, बल्कि उसके सभ्यतागत विकास की शक्ति को भी चिन्हित करें।

यह भी पूरी तरह सच है कि हम किसी भी तर्क से एक गरीब देश में महंगी उच्च शिक्षा का पक्ष-पोषण नहीं कर सकते, वर्तमान शिक्षा ही वह सीढ़ी है, जिसके सहारे आसानी से ऊपर चढ़ा जा सकता है, इसलिये राज्यों की भी जिम्मेदारी है कि देश के गरीब एवं वंचित नागरिकों की पहुंच इस पीढ़ी तक सुनिश्चित कराएं। उच्च शिक्षा केवल मुट्ठी भर लोगों की जागीर नहीं है, बल्कि समावेशी विकास का एक टूल है, इसका स्वरूप बने रहना ही बेहतर होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा कि ‘सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास।‘  यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा। अगर व्यक्ति ने उच्च शिक्षा ग्रहण कर ली और अच्छी नौकरी भी पा ली, परन्तु मोदीजी का मंत्र दिमाग में नहीं रखा तो मेरा विश्वास है कि न ही वह व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता और न ही देश-प्रदेश एवं अपने जिले को आगे बढ़ा सकता है। यही वजह है कि स्वयं मेादीजी इस मंत्र को ही लेकर देश को विश्व पटल की प्रथम पंक्ति में ला रहे हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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कार्टूनिस्ट सुधीर धर: दुनिया को ‘बदसूरत’ बनाने वाला इंसान

उनके निधन की इतनी बड़ी खबर को शायद हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने टीआरपी लायक नहीं समझा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Sudhir Dhar Irfan Khan

इरफान खान, मशहूर कार्टूनिस्ट।।

कार्टून जगत के सुपरस्टार सुधीर धर का दुनिया से विदा होना ऐसे समय हुआ, जब कार्टून जगत को मजबूती और संबल की सख्त जरूरत है। उनके निधन की इतनी बड़ी खबर को शायद हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने टीआरपी लायक नहीं समझा। सुधीर धर साहब से मेरी पहली मुलाकात 1989 में हुई थी। उन दिनों मेरी कार्टून प्रदर्शनी श्रीधरणी गैलरी में लगी थी, मुझे पता चला कि ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के प्रख्यात कार्टूनिस्ट सुधीर धर रोजाना लंच करने त्रिवेणी में आते हैं। यह सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अगले ही दिन मैंने उन्हें त्रिवेणी के गेट पर रोका। अपना परिचय दिया।

मैंने उनसे अपनी कार्टून प्रदर्शनी देखने का आग्रह किया, वह फौरन तैयार हो गए। सभी कार्टून देखकर मुझ कस्बाई कार्टूनिस्ट को प्रोत्साहन दिया। यह मेरे लिए तब बहुत बड़ी बात थी। बड़े-बड़ो का 'कार्टून' बनाने वाले वह देखने में बेहद खूबसूरत, ऊंची कद-काठी के कश्मीरी ब्राह्मण थे। मजाक-मजाक में कई बार हम दोस्त कह ही देते हैं कि खूबसूरत चेहरों को 'बदसूरत' बना देते हैं कार्टूनिस्ट। वे अंग्रेजी फर्राटे से बोलते थे। शायद अपने स्टारडम की वजह से ही उन्हें एक बार फेमिना मिस इंडिया की जूरी का मेंबर बनाया गया था, ऐसा सुना है। 

अपने साफ-सुथरे और फनी सोशल कार्टूनों से उन्होंने घर-घर में अपनी जगह बना ली थी। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ उस समय दिल्ली का सबसे ज्यादा बिकने वाला अंग्रेजी अखबार था, वहां 20 साल उनका एकछत्र राज कायम रहा। उनकी कलम कई बार कार्टून के जरिए ऐसा तीखा प्रहार करती थी कि बड़े बड़े खूबसूरत चेहरे 'बदसूरत' नजर आने लगते थे भारत में जब भी कभी कार्टूनिस्टों का जिक्र होता था, तो लोग छूटते ही कहते थे कि ‘एक तो लक्ष्मण हैं और एक सुधीर धर  कार्टूनिस्ट हैं।’

सुधीर धर और लक्ष्मण में वही फर्क है, जो लता मंगेशकर और आशा भोसले में है। अगर आशा भी लता की तरह गाना गातीं तो शायद उन्हें वो मुकाम नहीं मिलता, जिसकी वो हकदार थीं। इसलिए उन्होंने गाने की अपनी एक अलग शैली ईजाद की। उसी तरह चूंकि राजनीतिक कार्टूनों में उस वक्त लक्ष्मण का बोलबाला था, उन्होंने अपने कार्टूनों का माध्यम सोशल खबरें चुना। यकीनन इसमें उनकी महारत थी। चाहे वह दिल्ली की बसों में अव्यवस्था हो, सड़कों के गड्ढे, बिजली-पानी की किल्लत हो अथवा अन्य समस्याएं।

ऐसे तमाम मुद्दे थे, जिनसे लोग आज भी रोजमर्रा तौर पर दो-चार होते हैं। वह रोजाना इन मुद्दों पर कार्टून बनाते थे। एक कार्टून जो मुझे हमेशा याद रहता है, एक ऑफिस में नेताजी के सामने कई अफसर खड़े हैं। नेताजी अपने सहायक से पूछते हैं, ‘क्या तुम्हें लगता है कि यह सब ‘फ्री एंड फेयर इलेक्शन’ करवा पाएंगे?’ सहायक बोला-जी, बिलकुल। नेताजी बोले, तो इन सबका तबादला कर दो।

मुझे एक बार उनका साक्षात्कार करने का मौका मिला, जिसमें उन्होंने बताया, ‘मैं मर्लिन मुनरो का बहुत बड़ा फैन हूं और शुरुआत में रेडियो में था। मैं अपनी आवाज के जरिये उन्हीं की तरह मशहूर होना चाहता था।‘

वह राजनैतिक डिस्प्ले (बड़े बॉक्स नुमा) कार्टून कम ही बनाते थे। उनके कार्टून के ऊपर कोने में खबर लिखना पाठक को कार्टून से जुड़ने में आसानी देता था। बाद में बहुत से कार्टूनिस्टों ने इस शैली को अपनाया।  उनकी स्केचिंग ऐसी थी कि कोई भी नया कार्टूनिस्ट उसे देखकर आसानी से कार्टून बनाना सीख सकता है। हाल ही में कई नामी कार्टूनिस्टों अबू, रंगा, लक्ष्मण, राजिंधरपुरी, सुधीर तैलंग के बाद अब सुधीर धर के भी जाने से कार्टून जगत में कार्टूनिस्टों की कमी का अहसास और गहरा हो गया है, जो कभी नहीं भर सकता।

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मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल

सिर्फ अपने गाल बजाने के लिए अपने आप को हम चौथा स्तंभ कहते हैं, अन्यथा कोई भी संवैधानिक प्रावधान हमें चौथे खंभे के रूप में संरक्षण नहीं देता

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

महाराष्ट्र का सियासी प्रहसन अभी जारी है। जितनी होड़ पक्ष और प्रतिपक्षी गठबंधनों में है, उससे अधिक टेलिविजन चैनलों में इस सप्ताह दिखाई दी। कुर्सी के लिए घमासान का एक केंद्र प्रदेश की राजधानी मुंबई, दूसरा देश की राजधानी दिल्ली, तीसरा भारत का सर्वोच्च न्याय मंदिर सुप्रीम कोर्ट और चौथा टीवी का परदा रहा। जितने तर्क, कुतर्क, वितर्क, नियम,कायदे,कानून सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जा रहे थे, चैनलों में उससे ज्यादा ही परोसे जा रहे थे। यहां तक कि अनेक हलकों में कहा गया कि इतना मीडिया ट्रायल भी ठीक नहीं है। मीडिया अदालत नहीं है। इसलिए छोटे परदे पर हो रहे शास्त्रार्थ सर्वोच्च अदालत का ध्यान भटका सकते हैं।

देखा जाए तो एक नजरिये से बात ठीक लगती है। सिर्फ अपने गाल बजाने के लिए अपने आप को हम चौथा स्तंभ कहते हैं, अन्यथा कोई भी संवैधानिक प्रावधान हमें चौथे खंभे के रूप में संरक्षण नहीं देता। दूसरी ओर अगर कार्यपालिका और विधायिका की गाड़ी पटरी से उतर गई हो तो क्या मीडिया को हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिए? हमारे राजनेता संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाएं भूलकर सड़कों पर गैरजिम्मेदारी का प्रदर्शन करें तो माफ कीजिए, मीडिया को एक बार नहीं, सौ बार मीडिया ट्रायल का अधिकार है। आज की पत्रकारिता के विकृत चेहरे के बावजूद समाज का बड़ा वर्ग इस पेशे के प्रति अच्छी धारणा रखता है। इसलिए कम से कम मैं तो मीडिया ट्रायल को उचित और जायज मानता हूं। इससे सत्ता प्रतिष्ठान अथवा प्रतिपक्ष खफा हो तो सौ बार हो जाए। अपनी बला से। हम तो मीडिया ट्रायल करते रहेंगे। राजनेताओं को ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान में वे नायक नहीं खलनायक के तौर पर देखे जाने लगे हैं।

 लेकिन, मैं हमारे उन साथियों, पत्रकारों और एंकरों का कतई समर्थन नहीं करूंगा, जो बीते दिनों महाराष्ट्र के घटनाक्रम को लेकर अपने-अपने दिल की जबान से बोल रहे थे। वे एंकर कम पार्टी प्रवक्ता अधिक लग रहे थे। उनके इस विधवा विलाप का क्या अर्थ निकला? उनके कुतर्क से न किसी को बहुमत मिला और न किसी का छीना गया। फिर हमारे पत्रकार साथी अपनी दुर्गति अपने ही हाथों क्यों कर बैठते हैं। उन्हें समझना होगा कि जब वे अपने गढ़े गए तर्कों के साथ परदे पर बहस करते हैं तो माफ़ कीजिए,पत्रकार या एंकर कम, पार्टी के अभिभाषक अधिक लगते हैं। उन्हें यह भ्रम कतई नहीं होना चाहिए कि वे बैलगाड़ी के नीचे चल रहे हैं, इसलिए गाड़ी भी वही खींच रहे हैं। पत्रकारों के किसी दल के पक्ष या विपक्ष में बोलने से राजनीति की नाव उस दिशा में नहीं मुड़ जाती। यह भी सच है कि बहस का चरित्र निरपेक्ष और तटस्थ रखने के लिए उन्हें किसी डॉक्टर की पर्ची नहीं चाहिए। समझदार को इतना इशारा ही काफी है।

एक और अजीब-बेतुकी पत्रकारिता दो-चार दिनों में दिखी। दो-तीन समाचार चैनल ऐसे भी थे, जो महाराष्ट्र के इस शिखर घटनाक्रम के दिनों में भी उसके कवरेज से दर्शक को वंचित कर रहे थे। जब एक-एक मिनट दर्शक सांस साधे महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे को देख रहा था, तो ये चैनल चीन की चाल, पाक की मिसाइल या ऐसा ही कोई रिकॉर्ड किया हुआ मनोरंजन का कार्यक्रम दिखा रहे थे। ऐसा एकाध घंटे नहीं, पूरे तीन-चार दिन करते रहे। मैं आगाह करना चाहता हूं कि प्रतिष्ठा कमाने में बरसों लग जाते हैं और एक भी गलत फैसला धड़ाम से नीचे पटक देता है। दूसरी बात यह कि न्यूज चैनल ऑन एयर होने के बाद किसी की निजी संपत्ति नहीं रह जाता। वह दर्शक का हो जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे कोई अखबार छपने के बाद पाठकों का हो जाता है।

गनीमत है कि अच्छी सड़क, बिजली या पानी मांगने के लिए जिस तरह लोग सड़कों पर आ जाते हैं, उस तरह अखबारों और चैनलों से अच्छी खबरें मांगने के लिए सड़कों पर नहीं आते। जिस दिन उन्हें लगा कि पत्रकारिता के जरिये परोसी जा रही खबरें किसी सड़ी ब्रेड की तरह बदबूदार और पक्षपाती हैं, तो वे भी आपके खिलाफ आंदोलन पर उतर आएंगे। अपने उपभोक्ता अधिकार के लिए भी सड़कों पर लड़ने का उनका हक अभी जिंदा है मिस्टर मीडिया।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: महाराष्ट्र में क्यों चूके मीडिया के महारथी?

स्टर मीडिया: आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया कवरेज के लिए निकला है यह अनोखा ‘फॉर्मूला’

मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

मिस्टर मीडिया: किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का मौका न मिले तो अच्छाआप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

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‘राष्ट्रीय सहारा' की परीक्षा में सुप्रिय का असफल होना, उस युग की एक दस्तक थी’

सुप्रिय की उपलब्धियां जानने के लिए कोई सर्च इंजन तलाशने की जरूरत नहीं, बल्कि फिलवक्त ‘आजतक’ जो भी है, उसमें सुप्रिय की निष्ठा, ईमानदारी और कर्मठता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 25 November, 2019
Last Modified:
Monday, 25 November, 2019
Supriya-Prasad-Aajtak

संस्थान के संगियों में एक और नाम है सुप्रिय प्रसाद। जिंदगी में ऐसे बहुत कम मौके आते हैं, जब मेरी भाषा और शैली, मेरी सोच, संवेदना और सृजनशीलता के सामने जवाब देने लगती है। आज अपने संस्थान के इस संगी सुप्रिय प्रसाद के बारे में लिखते हुए सालों बाद मेरी शब्द सम्पदा और शैली खुद को कमजोर महसूस कर रही है। मतलब सुप्रिय की उपलब्धि मेरी सोच, शैली और शब्द से बहुत आगे है।

आज हम सोचने को जरूर मजबूर हैं कि कार्यशैली के किस गुर ने सुप्रिय को इतना सफल और नामवर बनाया। एक प्रसंग याद करता हूं कि 1995 में दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' के उप संपादक (प्रशिक्षु) पद की जांच परीक्षा में सुप्रिय का असफल होना हम सहपाठियों के लिए खबर थी। मगर वह उसकी असफलता नहीं थी और न ही योग्यता, बल्कि जो भी हुआ, वह उस युग की एक दस्तक थी, जो युग सुप्रिय के नाम लिखा जाना था।

यह विचित्र संयोग है कि झारखण्ड से आईं दो हस्तियां लोकमानस में अपना विशिष्ट स्थान बनाकर देश-दुनिया और समाज को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पहला-रांची के महेंद्र सिंह धोनी और दूसरा-दुमका शहर के सुप्रिय प्रसाद। आईआईएमसी से पत्रकारिता करने के बाद सुप्रिय प्रसाद ने कमर वहीद नकवी के अधीन एक ट्रेनी के तौर पर ‘आजतक’ जॉइन किया था। तब ‘आजतक’ एसपी सिंह के निर्देशन में ‘दूरदर्शन’ पर प्रसारित होने वाला एक बुलेटिन भर था। आज की तारीख में ‘टीवी टुडे’ ग्रुप के चारों चैनलों-‘आजतक’, ‘तेज’, ‘हेडलाइंस टुडे’ और ‘दिल्ली आजतक’ की जिम्‍मेदारी सुप्रिय के कंधों पर है। इसे कहते हैं सफलता।

करीब 25 साल पहले झारखंड के एक कस्बानुमा शहर दुमका के टीन बाजार से बतौर स्ट्रिंगर पत्रकारिता का अपना सफर शुरू करने वाले सुप्रिय आज हिंदी टीवी पत्रकारिता के उन चार संपादकों (आशुतोष, दीपक चौरसिया और अजीत अंजुम) में शुमार हैं, जिनके नाम से चैनल का रुतबा है। तभी तो टीवी की दुनिया में कहा जाता है कि सुपिय्र केवल टीआरपी मास्‍टर ही नहीं, बल्कि तकनीक के भी जानकार हैं। अपनी टीम से कैसे काम लिया जाता है, इसको भी वे भली-भांति जानते हैं। इससे आगे यह भी कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि सुप्रिय की उपलब्धियां जानने के लिए कोई सर्च इंजन तलाशने की जरूरत नहीं, बल्कि फिलवक्त ‘आजतक’ जो भी है, उसमें सुप्रिय की निष्ठा, ईमानदारी और कर्मठता है। ‘आजतक’ का इतिहास सुप्रिय का इतिहास है।

जनसंचार संस्थान की एक घटना याद आती है। ‘दूरदर्शन’ के वरिष्ठ अधिकारी मयंक अग्रवाल आये थे-खोजी पत्रकारिता पढ़ाने और अभ्यास करवाने। विषय था ‘विमान खरीद सौदे में दलाली’। हमें उस दलाली का पर्दाफाश करना था। उस अभ्यास में जो टीम अव्वल रही, उसकी अगुआई सुप्रिय कर रहे थे।

सुप्रिय खबरों को जानने वाला और उनकी अहमियत समझने वाला इंसान है। इसी वजह से वह हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे सफल और सिद्ध संपादक है। वह खबरों को जीवन मानता है, उनके लिए शिल्प सजाता है, जो शिल्प आपके जीवन का कोई हिस्सा है, अनदेखा हिस्सा। समय के साथ खबरें कैसे अपना रंग बदलती हैं, ढंग बदलती हैं और अपना तर्ज बदलती हैं, कोई सुप्रिय से पूछे। उसके लिए खबरों का ट्रीटमेंट पूजा है, इबादत है।

इसके बावजूद सुप्रिय की पत्रकारिता से जुडी कई ख्वाहिशें हैं, ढेरों मन्नतें हैं, जिन्हें वह पूरा करना चाहते हैं। हम मित्रों की दुआ है कि वे तमाम ख्वाहिशें सुप्रिय के कदम चूमें और मन्नतें उसका सिर चूमें।

(वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र किशोर की फेसबुक वॉल से साभार)

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मिस्टर मीडिया: महाराष्ट्र में क्यों चूके मीडिया के महारथी?

राजनीति में किसी भी घटना के अनेक पहलू होते हैं। पत्रकार के रूप में काम करते हुए हर कदम पर इन पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है

राजेश बादल by
Published - Saturday, 23 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 23 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

महाराष्ट्र की राजनीति बारह घंटे में उलट गई। त्रिकोणीय गठबंधन को शरद पवार के भतीजे ने पटखनी दे दी। बीते एक सप्ताह से अजित पवार अपनी खिचड़ी पका रहे थे। उनके वाद्य यंत्रों से अलग सुर निकल रहे थे। लेकिन मीडिया के तमाम अवतार मंच पर होने वाले नाटक और उसके अभिनेताओं की भूमिका पर ही नज़र बनाए हुए थे। परदे के पीछे चल रहे घटनाक्रम की वे उपेक्षा करते रहे। आमतौर पर हर छोटी-बड़ी कवरेज में ड्रेस से लेकर बॉडी लैंग्वेज तक के बारीक तार निकालने वाले मीडिया महारथी इस बार कुछ भी नहीं भांप सके।

राजनीति में किसी भी घटना के अनेक पहलू होते हैं। पत्रकार के रूप में काम करते हुए हर कदम पर इन पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है। महाराष्ट्र के मामले में साफ कहा जा सकता है कि अखबार और टेलिविजन के संवाददाता चूक गए। सवाल यह खड़ा होता है कि पत्रकारिता में यह लड़खड़ाहट क्या एक दिन में आई है अथवा विश्लेषण या आकलन का अभ्यास धीरे-धीरे चटकता जा रहा है। यदि हां, तो इस चटकन का कारण क्या है?

इतने घंटे बीत जाने के बाद भी महाराष्ट्र के राजनीतिक ड्रामे की पटकथा के अनेक पन्ने मीडिया के मंचों पर फड़फड़ा रहे हैं, लेकिन उसमें लिखे संवाद किसी भी चैनल में अब तक नहीं आए हैं। रातों रात इस नाटकीय परिवर्तन के पीछे कुछ सवाल भी उभरते हैं। इन सारे प्रश्नों को अभी तक छोटे परदे पर स्थान नहीं मिला है। अजित पवार कुछ समय से अपने अलग रंग में थे। खोजी राजनीतिक पत्रकार इन रंगों को नहीं देख सके।

जब सरकार ही अस्तित्व में नहीं है  तो किसानों के नाम पर शरद पवार की करीब घंटे भर प्रधानमंत्री से गोपनीय बैठक का कोई और कारण क्यों नहीं हो सकता? इसे किसी ने नहीं पढ़ा। आमतौर पर बेहद आक्रामक और बयान युद्ध में बाजी मारने वाली भारतीय जनता पार्टी  ने चंद रोज से अप्रत्याशित खामोशी क्यों ओढ़ ली थी? क्या किसी ने इसकी पड़ताल करने की कोशिश की? यह भी कि शांति से चल रहे राष्ट्रपति शासन पर ऐसा क्या आपातकाल आ पड़ा कि राजभवन और राष्ट्रपति भवन को अपने प्रोटोकॉल व परंपरा से हटना पड़ा।

अंधेरी काली रात में किसी ने बहुमत का दावा किया। आधी रात को राज्यपाल को जगाकर उन्हें समर्थन देने वाले राजनेता मिलते हैं। राज्यपाल रात में ही राष्ट्रपति भवन को खबर देते हैं। तड़के ही राष्ट्रपति भवन का सचिवालय हरकत में आता है। राष्ट्रपति शासन हटा लिया जाता है। नोटिफिकेशन हो जाता है। नए मुख्यमंत्री की शपथ भी हो जाती है।

राजनीतिक शिष्टाचार का पालन नहीं करते हुए सन्नाटे में शपथ का यह अनूठा नमूना है। राजभवन इससे अपने आपको सवालों के घेरे में लाया है। मीडिया के कितने मंचों पर इस बारे में खुलकर चर्चा हुई? अजित पवार को तो त्रिकोणीय गठबंधन में भी उप मुख्यमंत्री पद मिलना था। उसके पीछे की कहानी क्या है? अभी भी एनसीपी के 54 विधायकों के हस्ताक्षर, देवेंद्र फडणवीस को बहुमत, उनकी संवैधानिक स्थिति और दलबदल कानून के अनेक पृष्ठों को पलटने की आवश्यकता है।   

दरअसल बीते एक दशक में पत्रकारिता धर्म निभाने में वैचारिक और संपादकीय पक्ष कमजोर पड़ता दिखाई दिया है। सिर्फ सूचना प्रधान पत्रकारिता ही अस्तित्व में रही है। मैनेजमेंट भी अपने रोल पर काम कर रहे पत्रकारों से यही चाहता रहा है कि वह जिस राजनीतिक दिशा में जा रहा है, वे सब उसका पालन करें। पत्रकारों और संपादकों की अपनी योग्यता तथा सियासी समीक्षा इससे अत्यंत दुर्बल होती गई। बीट पर काम कर रहे संवाददाता भी यह सोचकर खबर छोड़ देते हैं कि उनकी जानकारी को समाचारपत्र या समाचार चैनल में जगह नहीं मिलेगी।

इसका नुकसान यह हुआ कि जमीनी सूचनाओं, विश्लेषणों व निष्कर्षों के लिए दरवाज़ा बंद हो गया। दोनों ही स्थितियों में क्षति पत्रकारिता को हुई और राजनीति ने इसका फायदा उठाया। एक तरह से किसी राजनीतिक दल को कवर करने वाले पत्रकार के लिए उस पार्टी को पसंद आने वाली खबरों को परोसना ही कर्तव्य हो गया। उसे अपनी बीट वाले दल के भीतर चल रही उठापटक और खींचतान से आंखें मूंदना पड़ा। अपने इस गंभीर आंतरिक संकट को समझने का प्रयास कीजिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

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'यह संपादक छपने से पहले अपने चपरासी को संपादकीय पढ़ाते थे'

पिछले 27 साल से मराठी दैनिक अखबार 'नवाकाल' के संपादक की जिम्मेदारी निभा रहे थे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 22 November, 2019
Last Modified:
Friday, 22 November, 2019
Nilkanth Khadilkar

वरिष्ठ मराठी पत्रकार नीलकंठ खाडिलकर का शुक्रवार तड़के निधन हो गया। 85 वर्षीय खाडिलकर कुछ समय से बीमार थे। उन्होंने मुंबई के उपनगर बांद्रा स्थित एक निजी अस्पताल में आखिरी सांस ली। खाडिलकर पिछले 27 साल से मराठी दैनिक अखबार 'नवाकाल' के संपादक की जिम्मेदारी निभा रहे थे।   

खाडिलकर के निधन पर 'एनडीटीवी इंडिया' में कार्यरत पत्रकार सुनील सिंह ने उन्हें अपनी श्रध्दांजलि देते हुए लिखा है, 'नीलकंठ खाडिलकरजी से (जिनका आज देहांत हो गया) ‘नवाकाल’ के दफ्तर में एक-दो बार मिलने का मौका मिला था। अक्सर वह अपना संपादकीय लिखकर छपने से पहले अपने चपरासी मधु (मुझे यही नाम याद है) और आर्टिस्ट को पढ़ने के लिए देते थे, उनकी राय लेते थे। फिर छापते थे। ऐसा वह आम आदमी की रुचि जानने के लिए करते थे।'

सुनील सिंह के अनुसार, 'शायद यही वजह थी कि उन दिनों उनका संपादकीय आम जनमानस में बेहद लोकप्रिय था। सिर्फ संपादकीय के बल पर अखबार सर्कुलेशन में नंबर 1 पर था। इसलिए उन्हें अग्रलेख का बादशाह कहा जाता था। ऐसे अनोखे संपादक को शत-शत नमन। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।'

बता दें कि नीलकंठ खाडिलकर ने ‘प्रैक्टिकल सोशलिज्म: म्यूजिंग्स फ्रॉम ए टूर ऑफ रशिया’ समेत कुछ किताबें भी लिखीं हैं।

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