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टीवी प्रजेंटेशन के ‘हेडमास्टर’ थे विनोद दुआ जी: सतीश के.सिंह

विनोद जी का जाना, जीवंत पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। भाषा, सौम्यता, अध्ययन और प्रस्तुति के लिहाज से उन्हें मैं बहुत बड़ा मानता रहा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

सतीश के सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।।

विनोद जी का जाना, जीवंत पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। भाषा, सौम्यता, अध्ययन और प्रस्तुति के लिहाज से उन्हें मैं बहुत बड़ा मानता रहा। चुटीले अंदाज में, मुहावरों के जरिये और मुस्कुराते हुए गंभीर टिप्पणी कर देना, जैसे उनके डीएनए में था और बहुत ही स्वभाविक लगता था। अगर टीवी पत्रकारों ने या खास तौर से एंकर्स ने उनसे कुछ नहीं सीखा तो कुछ नहीं सीखा। दुआ सर टीवी प्रजेंटेशन के हेडमास्टर थे।

मैंने विनोद दुआ सर को सबसे पहले 1984 में ‘डीडी‘ पर चुनाव प्रसारण में नोटिस किया था। अंग्रेजी का अनुवाद और हिंदी में सूचना कितनी सहजता और सटीक देते थे, क्या कहना। एक शब्द भी फालतू नहीं। ये खूबी और कला किसी में मैंने आज तक नहीं पाई ।

दुआ सर मेरी नजर में इतने बड़े थे कि एक ही संस्थान के लिए काम करते हुए पहली बार तो मैं उन्हें दूर से ही निहारता था, शायद बात 1996 या 1997 की है। लेकिन, दिसंबर 1999 में कुछ ऐसा हुआ कि वह भी मुझे जानने लगे, जब मैं एक रिपोर्टर के रूप में इस इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 के हाईजैक पर रिपोर्टिंग कर रहा था और वह मैराथन एंकरिंग।

विनोद सर दूर से ही सही, लेकिन मुझे जानते-पहचानते थे। अक्सर वह खुद ही मुझे बुलाकर बात करते थे। लेकिन, बस IC 814 प्रकरण तक सीमित रहा। दरअसल, मैं उनसे इतना प्रभावित था कि दुआ सर के नजदीक जाने की हिम्मत ही नहीं हुई, जबकि उनका स्वभाव, शिष्टाचार किसी से मिलने, मिलाने का था ।

दुआ सर के साथ दूसरी बार एक दूसरे चैनल में काम करते वक्त वर्ष 2005 में संपर्क हुआ। वह शाम के वक्त आते थे, टोकते जरूर थे और  मजाक, हंसी उनके निरंतर स्वभाव का हिस्सा थी। ये सिलसिला लगभग दो साल चला ।

मैं ऐसा दावा तो नहीं कर सकता कि मैं उनका नजदीकी था, मगर ये कह सकता हूं कि उनके हुनर, ज्ञान, वाकपटुता, प्रजेंटेशन और टिप्पणियों का कायल जरूर था। विनोद जी ने जिंदगी अपनी शर्तो पर जी, नहीं तो वह भी एक मीडिया एम्पायर के महामानव होते, दरअसल, वह एक पत्रकार और प्रजेंटर ही रह गए, न बंधे और न बांधा।

एक मौका ऐसा भी आया जब मैंने उनसे एक चैनल के लिए डेली शो करना चाहा, बात भी हो गई, लेकिन वह चालू नहीं हो पाया। मुझे लगता है कि धर्मपत्नी के निधन के बाद दुआ सर टूट गए थे। इतने जीवंत आदमी ने जीने की तमन्ना ही छोड़ दी थी ।

सच कहूं तो संतोष भारतीय जी के साथ एक इंटरव्यू को देखकर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था। काफी कमजोर लग रहे थे। आवाज भी फंसी और रुंधी हुई, लेकिन वाणी बिल्कुल विनोद दुआ सिग्नेचर। दुआ सर चले गए, लेकिन पत्रकारों, एंकर्स, डिबेट करने और इंटरव्यू देने वालों नेताओं के लिए आईना, पाठ्यक्रम और मिसाल बनकर। दुआ साहब की तैयारी पूरी रहती थी,शायद वह दूसरे से भी यही अपेक्षा रखते थे। दुआ सर, विनम्र श्रद्धांजलि, रेस्ट इन पीस चीफ।


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