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पत्रकारों के एक वर्ग के लिए सुकून भरा मनोरंजन होती हैं इस तरह की 'हरकतें'

वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय ने उठाया बड़ा सवाल, क्या हमने कश्मीर के पत्रकारों को भी देश विरोधी और पाकिस्तान समर्थक मान लिया है?

संतोष भारतीय 6 years ago

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुषमा स्वराज जी के निधन और उनके अंतिम संस्कार से पहले मैं यह पंक्तियां लिख रहा हूं। वैसे तो कभी कोई राजनेता पत्रकारों से दूरी नहीं बनाता, पर उनसे मन के संबंध भी नहीं बनाता। भारतीय जनता पार्टी में सिर्फ दो नेता ऐसे रहे, जिन्होंने पत्रकारों से कभी दूरी नहीं बनाई और उनके साथ जब भी बात की, अच्छे माहौल में बात की। इनमें पहली सुषमा स्वराज हैं और दूसरे अरुण जेटली हैं।

सुषमा जी अब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन अरुण जेटली हैं। दोनों ने जिन पत्रकारों को नहीं पसंद किया, उन्हें भी कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि वह उन्हें पसंद नहीं करते हैं। जब भी दोनों सेंट्रल हॉल में आते थे तो पत्रकार उनके आसपास आ जाते थे। हंसी-ठिठोली के साथ वे जितनी देर पत्रकारों के साथ रहते, माहौल को खुशनुमा बनाए रखते। अब सुषमा जी कभी सेंट्रल हॉल नहीं आएंगी, लेकिन अरुण जेटली के संसद के सेंट्रल हॉल में आने की संभावना बनी हुई है और उनका इंतजार भी पत्रकार वहां कर रहे हैं।

इन दिनों अरुण जेटली का स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं है, लेकिन इसे समय की या राजनीति की विडंबना ही कहेंगे कि जो व्यक्ति हमेशा सक्रिय रहा, भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के दिशा निर्देशकों में रहा, आज उसका नाम न तो भारतीय जनता पार्टी के लोग लेते हैं और न ही उन्हें सेंट्रल हॉल में याद किया जाता है। शायद यही जिंदगी है और यही दुनिया की रीति है, जो बहुत ही बेरहम है।

इन दिनों पत्रकारिता की नई परिभाषा लिखी जा रही है। एंकर अब पत्रकार और संपादक हो गए हैं, जिनकी पत्रकारिता सिर्फ यहां तक सीमित है जो पूछते हैं कि यह श्रीमान यह कह रहे हैं, आपका क्या कहना है? आज तक हमने कभी उनके मुंह से भारतीय राजनीति के अंतर्विरोध, भारतीय राजनीति के विकास, भारतीय राजनीति के पतन और भारतीय राजनीति के खूबसूरत चेहरे के बारे में एक शब्द नहीं सुना।

देखने में तो यह आ रहा है कि सभी पत्रकार की जगह एक विशेष राजनीतिक पार्टी के विशेष प्रधान प्रवक्ता बन गए हैं। इनमें से किसी को यह देखकर नहीं लगता यह पत्रकार हैं और इन्हें दोनों पक्षों की जानकारी है। हालत अब यहां तक पहुंच गए हैं कि एक पत्रकार अपनी बात कहने की जगह दूसरे पत्रकार का मजाक उड़ाने लगा है।

यह मजाक सिर्फ खिल्ली उड़ाने वाला नहीं है, बल्कि अपमान करने वाला है और यह बताता है कि पत्रकार भी भारतीय राजनीति की उसी बीमारी का शिकार हो गए हैं, जो बीमारी कहती है कि जो हमारे साथ नहीं है, वह देशद्रोही है और देशप्रेमी सिर्फ हम ही हैं। यानी पत्रकार सिर्फ हम ही हैं, आप तो सारी जिंदगी पत्रकार बन ही नहीं पाए। मैंने एक बार और कहा था यह भी विडंबना है कि इनमें से 90 प्रतिशत की जिंदगी में कोई भी एक रिपोर्ट ऐसी नहीं है, जिसे हम रिपोर्ट कह सकते हैं।

टेलिविजन पत्रकारिता के उदाहरण में एक खास पहलू यह है कि रिपोर्ट तो पत्रकार करता है या जिले का अंशकालिक संवाददाता करता है, उसका फायदा या उसका श्रेय एंकर उठाता है। जिसने रिपोर्ट की है, वह उसका नाम ही नहीं लेता। उसे पर्दे पर ही नहीं आने देता, बल्कि इस तरह प्रस्तुत करता है कि मानो यह उसका कमाल हो। यह नई पत्रकारिता की नई परिभाषा लिखने की शुरुआत हो चुकी है।

टेलिविजन की पत्रकारिता और सोशल मीडिया की पत्रकारिता लगभग एक खाने में आती दिखाई दे रही हैं। वायरल सच के नाम पर दूसरे को झूठा साबित करना और खुद उस चैनल ने अपने दर्शकों को कितना झूठ परोसा है, इसकी वास्तविकता न बताना ही आज असली पत्रकारिता है।

आज की इसी पत्रकारिता ने हमें यह भी बताया है रवीश कुमार, जिन्हें मैगसायसाय पुरस्कार मिला, दरअसल वे विदेशी एजेंट हैं और उन्हें 2014 में यह काम सौंपा गया था कि वे 2014 के बाद बनी सरकार के वादों का पर्दाफाश करते रहें। इसके लिए किन-किन देशों की किन-किन ताकतों ने उन्हें धन मुहैया कराया?

रवीश कुमार को देशद्रोही पत्रकार घोषित करने में सोशल मीडिया पर प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई और दूसरी तरफ भारत के टेलिविजन चैनलों के कुछ अपवादों को छोड़कर किसी ने इसे पत्रकारों के लिए गर्व का विषय नहीं माना। यही कारण रहा कि जो हमारे साथ है, वही सही पत्रकार है, बाकी सब देश विरोधी हैं।

बहुत सारी घटनाओं की तरह कश्मीर के सवाल पर कश्मीर के पत्रकारों की जगह दिल्ली के पत्रकारों की राय देश के सामने आई। कश्मीर के जर्नलिस्ट क्या बोलते हैं, उनकी राय क्यों प्रमुखता से सामने नहीं आई। क्या हमने कश्मीर के पत्रकारों को भी देश विरोधी और पाकिस्तान समर्थक मान लिया है? यह स्थिति क्या स्वस्थ समाज का लक्षण है?

एक और विलक्षण स्थिति है। अगर विनोद दुआ, अभिसार शर्मा, पुण्य प्रसून बाजपेयी, रवीश कुमार, अशोक वानखेडे, बरखा दत्त, उर्मिलेश जैसे पत्रकारों को सोशल मीडिया पर गालियां दी जाएं, उनके ट्विटर, वॉट्सऐप या मैसेज पर भद्दी-भद्दी धमकियां दी जाएं तो पत्रकारों के एक वर्ग के लिए बहुत सुकून भरा मनोरंजन हो जाता है जो उन्हें मानसिक संतुष्टि देता है। राजनीतिक विचारधाराएं पहले भी होती थी, लेकिन वह रिपोर्ट के तथ्यात्मक हिस्से में नहीं झलकती थीं।

आज तो एंकर जैसे ही स्क्रीन पर आया, एक साधारण आदमी भी अंदाजा लगा लेता है कि क्या बोलने वाला है और कैसे सवाल पूछने वाला है? पहले ऐसे नेता होते थे, जो स्वयं अपने खिलाफ छद्म नाम से एडिट पेज पर आर्टिकल लिखते थे। ऐसे पत्रकार होते थे, जो अपने घनिष्ठ राजनीतिक मित्र के विरुद्ध भी बेहिचक रिपोर्ट करते थे और अपनी दोस्ती भी नहीं तोड़ते थे।

अंग्रेजों जमाने में भी दो तरह के पत्रकार होते थे। एक वो जो गवर्नर जनरल या लाट साहब के यहां चाय पीना अपने लिए गर्व की बात मानते थे, दूसरे वह जो देश के लिए और देश की जनता के लिए पत्रकारिता करते थे। आज भी ऐसे लोग हैं और ऐसे लोग बेशर्मी से पत्रकारिता की नई परिभाषा लिख रहे हैं। आइए और इस नई परिभाषा को समझिए और मुस्कुराइए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


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