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अपना घर ठीक कीजिए, हिंदी आपको दुआएं देगी: राजेश बादल

इन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में अनेक स्तरों पर जानकार विलाप करते नजर आते हैं।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 14 September, 2021
Last Modified:
Tuesday, 14 September, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में अनेक स्तरों पर जानकार विलाप करते नजर आते हैं। अगर उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए तो लगता है कि हिंदी आखिरी सांसें गिन रही है। अगर अब ध्यान न दिया गया तो करोड़ों दिलों में धड़कने वाली ये भाषा जैसे विलुप्त हो जाएगी। करीब चालीस बरस से हिंदी के अस्तित्व पर आशंका जताने वालों को मैं खुद देख रहा हूं। पुरानी पीढ़ी के लोगों से भी हिंदी की चिंता सुनता आया हूं। ताज्जुब है कि दशकों से इस प्रलाप के बाद भी हिंदी किसी अमरबेल की तरह फैलती नजर आ रही है। आज जिस इलाके में हिंदी बोली, समझी और पढ़ी जा रही है। क्या सौ साल पहले भी यही स्थिति थी? उत्तर है-बिलकुल नहीं।

तब के हिन्दुस्तान में हिंदी के पंडित थे ही कितने? राज काज की भाषा उर्दू थी और उस पर फारसी का असर था। हिंदी का परिष्कार और प्रयोग तो पिछली सदी में ही पनपा और विकसित हुआ है। गुलाम भारत में भी हिंदी कभी जन-जन की भाषा नहीं रही। अलबत्ता यह अवश्य महसूस किया जाने लगा था कि अगर किसी भाषा में हिन्दुस्तान की संपर्क भाषा बनने की संभावना है तो वो हिंदी ही है। भोजपुरी, अवधी, बृज, बुंदेली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी और राजस्थान की अनेक बोलियों की छोटी छोटी नदियों ने आपस में मिलकर हिंदी की गंगा बहाई। संस्कृत का मूल आधार तो था ही। इसके बाद उर्दू और अंग्रेजी ने भी हिंदी के अनुष्ठान में अपनी-अपनी आहुतियां समर्पित कीं। अगर आप डेढ़-दो सौ साल की हिंदी-यात्रा देखें तो पाते हैं कि शुरुआती दौर की हिंदी आभिजात्य वर्ग के लिए थी। कठिन और संस्कृतनिष्ठ। आज के बच्चे अगर पढ़ें तो शायद उसे हिंदी ही न मानें।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, हिंदी बोलचाल की या यूं कहें आम अवाम की भाषा बनती गई। पूरब से रविन्द्रनाथ टैगोर हों या पश्चिम से महात्मा गांधी, उत्तर से भारतेंदु  हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हजारीप्रसाद द्विवेदी हों या फिर दक्षिण से-चक्रवर्ती राजगोपालाचारी। आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाने वाले क्रांतिकारी भी हिंदी को संपर्क की भाषा बना चुके थे। यकीन न हो तो सरदार भगतसिंह के विचार पढ़ लीजिए। सभी ने हिंदी को देश की प्रतिनिधि भाषा स्वीकार कर लिया था।

जरा याद कीजिए उस दौर के हिन्दुस्तान में अभिव्यक्ति के माध्यम कितने थे? सिर्फ़ एक माध्यम था और वो था मुद्रित माध्यम। किताबों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं के जरिये उस काल में हिंदी लोगों तक पहुंचती थी। साक्षरता का प्रतिशत कम था। इसलिए लिखा गया साहित्य आम आदमी तक आसानी से पहुंचाना मुश्किल काम था। मगर आजादी के आंदोलन में हिंदी अभिव्यक्ति का एक बड़ा जरिया बन चुकी थी। कहा जा सकता है कि पूरे देश को आजादी के लिए एकजुट करने में हिंदी की बड़ी भूमिका थी। जो भाषा हजारों में लिखी जाती थी और लाखों में बोली जाती थी, वो करोड़ों की भाषा बन गई थी।

आजादी के बाद प्रिंट माध्यम के साथ आकाशवाणी ने भी कंधे से कंधा मिलकर काम शुरू कर दिया। रेडियो ने तो हिंदी को प्रसारित करने में क्रांतिकारी काम किया। रेडियो सुनने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं था। लिहाजा आकाशवाणी सुन-सुन कर लोगों ने हिंदी को जन-जन की भाषा और बोली बना दिया। तीसरा माध्यम आया भारतीय सिनेमा। हिंदी चलचित्रों ने तो वो काम किया, जो हिंदी के लिए करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करके भी सरकारें नहीं कर सकतीं थीं। दुनिया का अव्वल कारोबार बन चुके भारतीय सिनेमा ने दक्षिण भारत के उन इलाकों में भी लोगों को हिंदी सिखा दी, जो राजनीति का शिकार होकर हिंदी का उग्र विरोध करते आए थे। आज सारे विश्व में बोली और लिखी जाने वाली भाषाओं के जानकारों की संख्या देख लीजिए। हमारी हिंदी अलग से सितारों की तरह चमकती दिखाई देती है। भारतीय सिनेमा का यह कर्ज हिंदी प्रेमी शायद ही कभी उतार पाएं।

मैं इस लेख को आंकड़ों से भरकर उबाऊ और बोझिल नहीं बनाना चाहता। पाठक तमाम स्रोतों से इन्हें हासिल कर सकते हैं। आशय सिर्फ यह है कि हम हिंदी के विस्तार और प्रसार के नजरिये से आगे ही गए हैं। पीछे नहीं लौटे। मिसाल के तौर पर  पत्र-पत्रिकाओं को देख लीजिए। आजादी मिलने के समय हिंदी की मैगजीन और अखबार कितने थे? आप सौ तक की गिनती में समेट सकते थे। आज यह संख्या हजारों में है। समाचारपत्रों का हिसाब-किताब देखने के लिए एक भारी भरकम विभाग तैनात है। जिन अखबारों की प्रसार संख्या तीस-चालीस बरस पहले कुछ लाख होती थी, आज वो करोड़ों में जा पहुंची है। जाहिर है इन्हें पढ़ने वाले पेड़-पौधे अथवा मवेशी नहीं हैं? फिर कौन हैं जो हिंदी के मुद्रित प्रकाशनों की तादाद बढ़ाते जा रहे हैं। सिर्फ प्रकाशनों की नफरी ही नहीं बढ़ रही, उनके कारोबार के ग्राफ में भी जबरदस्त उछाल आया है। दुनिया का कौन सा देश छूटा है, जहां हिंदी की किताबें नहीं मिलतीं। भारत के आधा दर्जन से ज़्यादा प्रकाशकों के विदेशों में अपनी किताबों के शोरूम हैं। हिन्दुस्तान में आज भी पचास फीसदी विश्वविद्यालय हिंदी नहीं पढ़ाते और दुनिया भर में पचास से ज़्यादा विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। इसका क्या अर्थ निकाला जाए।

यहां याद दिलाना जरूरी है कि जिस पाकिस्तान में उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद से देवनागरी और हिंदी पर बंदिश है, उसी देश में पिछले साल छह भागों में अठारह सौ पन्नों की एक उपन्यास श्रृंखला हिंदी में छपी है। ‘दरवाजा खुलता है’ नाम से यह उपन्यास लाहौर के संगेमील प्रकाशन ने छापा है। पाकिस्तान में इसकी भारी मांग है और लोगों को भले ही समझ न आए, ड्राइंग रूम में सजा कर रखने के लिए वे इसे खरीद रहे हैं। अच्छी बात ये है कि उर्दू से हिंदी में इसका अनुवाद जाने माने भारतीय लेखक डॉक्टर केवल धीर ने किया है। हिंदी प्रेमियों के लिए क्या ये उदाहरण गर्व के कुछ पल उपलब्ध नहीं कराता?

हिंदी के लिए करिश्मा तो उस माध्यम ने किया, जिसे किसी जमाने में बुद्धू बक्सा कहा गया था और जिसके भारत में प्रवेश का भरपूर विरोध हुआ था। यह माध्यम है टेलिविजन। करीब करीब तीस साल से टेलिविजन भारत में घर-परिवार का सदस्य बन गया है। बेशक आज के भारत में सभी भारतीय भाषाओं में छोटे परदे ने अपनी घुसपैठ की है लेकिन सबसे आगे तो हिंदी ही है। खबरिया हों या मनोरंजन चैनल-हिंदी के दर्शक सबसे आगे की कतार में बैठे हैं। यही नहीं, अहिंदी भाषी प्रदेशों में भी हिंदी के चैनल, हिंदी के गाने और धारावाहिक उतनी ही दिलचस्पी से देखे जाते हैं, जितने उन प्रदेशों की अपनी भाषा के चैनल। एक अनुमान के मुताबिक छोटे परदे ने इतने बरस में करीब पंद्रह करोड़ लोगों को हिंदी का जानकार बना दिया है। जब अहिंदी भाषी राज्यों के लोगों को राष्ट्रीय महत्त्व की कोई भी सूचना लेनी होती है और उन्हें अपनी भाषा के चैनल पर नहीं मिलती तो वे तुरंत हिंदी के चैनलों की शरण लेते हैं। बरसों से यह क्रम  चल रहा है। इस वजह से वो हिंदी समझने और बोलने भी लगे हैं।

टेलिविजन से आगे जाएं तो इन दिनों नई नस्ल की जीवन शैली सोशल मीडिया के इर्द गिर्द सिमट कर रह गई है। इंटरनेट, वेबसाइट ट्विटर, वॉट्सऐप, ब्लॉग, यू-ट्यूब और अन्य नए माध्यम अवतारों ने जिंदगी का रंग बदल कर रख दिया है। कारोबारी हितों ने हिंदी के बाजार देखा है, इसलिए सोशल मीडिया के सभी रूप हिंदी में उपलब्ध हैं। गांव, कस्बे और शहरों की नौजवान पीढ़ी इन सारे रूपों से एक दिन में अनेक घंटे रूबरू होती है। क्या आपको यकीन है कि हमारे लड़के-लडकियां अंग्रेजी में इतना महारथ हासिल कर चुके हैं कि उन्हें हिंदी की जरुरत ही नहीं है? कम से कम मैं तो नहीं सोचता। हिंदी में मोबाइल पर संदेश जाते हैं, मेल जाते हैं, गूगल बाबा हर भाषा से हिंदी में अनुवाद की सुविधा मुहैया कराते हैं तो जो लोग इस सुविधा का लाभ उठाते हैं वो कोई दक्षिण अफ्रीकी या ऑस्ट्रेलिया के लोग नहीं हैं। यह सब हिंदी की श्रीवृद्धि नहीं तो और क्या है।

फिर आज के दौर में हिंदी के सामने चुनौतियों की बात क्यों की जाती है? क्यों भाषाविद् और पंडित छाती कूटते नजर आते हैं। अगर देश -विदेश में हिंदी जानने वाले लोग बढ़ रहे हैं, कारोबार बढ़ रहा है, पैसा भी कमाया जा रहा है तो फिर चिंता करने वाले कौन हैं? इसका उत्तर वास्तव में हमारे घरों में मौजूद है। चिंता का कारण हिंदी का सिकुड़ना नहीं, बल्कि उसके स्वाद में हो रही मिलावट है। हम लोग रेडियो पर पुराने हिंदी गाने सुनकर झूमने लगते हैं लेकिन जब बेटा या बेटी आकर उसे बंद कर अंग्रेजी के गाने सुनने लगता है तो हमें लगता है ये लोग अपनी मातृभाषा से प्यार नहीं करते या इन्हें हिंदी क्यों अच्छी नहीं लगती। जब आप बाजार जाते हैं, पुस्तक मेलों में जाते हैं तो आप प्रेमचंद, वृन्दावनलाल वर्मा और धर्मवीर भारती की किताबें देखने रुक जाते हैं और आपके बच्चे अंग्रेजी की किताबें खरीद कर उसका बिल ले रहे होते हैं। आप हैरानी से और कुछ बेगानेपन से बच्चों को घूरते हैं। आप टेलिविजन पर कोई हिंदी का सीरियल या गाना देखना चाहते हैं तो आपका बच्चा रिमोट आपके हाथ से लेकर चैनल बदल देता है। आप देखते रह जाते हैं। आप बच्चों के साथ हिंदी फिल्म देखना चाहते हैं और बच्चे आपके सामने अंग्रेजी फिल्म का प्रस्ताव रख देते हैं। आप जैसे-तैसे सिनेमा जाते भी हैं तो फिल्म की भाषा आपके ऊपर से निकल जाती है। बच्चे फिल्म के डायलॉग पर झूमते हैं, गानों पर खुद भी गाते हैं और आप बच्चों को विदेशियों की तरह देखते हैं।

जरा याद कीजिए। उन बच्चों की स्कूलिंग के दौरान आपने कभी उनके हिंदी में कम अंक आने पर चिंता की? मैथ्स, फिजिक्स, कैमिस्ट्री या अंग्रेजी में अनुतीर्ण होने पर निश्चित ही आपने टोका होगा, लेकिन हिंदी कमजोर होने पर शायद ही ध्यान दिया हो। जिन लोगों ने ध्यान दिया भी होगा तो उनका प्रतिशत बहुत कम है। बचपन में उस बच्चे के गलत अंग्रेजी बोलने पर भी आप पड़ोसियों के सामने गर्व से मुस्कराया करते थे। आप उसमें आधुनिक भारत के भविष्य की तस्वीर देखते थे।

दरअसल, ये उदाहरण आपको अटपटे लग सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि हमारी मानसिकता में ये नमूने घुल-मिल गए हैं।दिन में दस बार हम राष्ट्रभाषा का तिरस्कार होते अपनों के बीच देखते हैं और चूं तक नहीं करते। इस दुर्दशा पर अब तो आह या ठंडी सांस भी नहीं निकलती। हमारे स्कूलों में शुद्ध हिंदी के जानकार शिक्षक नहीं मिलते। उनकी व्याकरण कमजोर है। कॉलेजों में हिंदी के प्राध्यापक स्तरीय नहीं हैं। आधे से ज़्यादा यूनिवर्सिटीज में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती। शिक्षक ठेके पर रखे जाते हैं। उन्हें एक एक पीरियड के हिसाब से पैसे मिलते हैं। ऐसे में ज्ञानवान लोग आपको कहां से मिलेंगे? क्या आप अपने बच्चे को हिंदी शिक्षक बनाना चाहेंगे? मैं जानता हूं। आपका उत्तर न में होगा।

अशुद्ध और मिलावटी भाषा का खतरा गंभीर है। मोबाइल और इंटरनेट पर विकृत हिंदी हमें नजर आती है। हम देखते रहते हैं। न केवल देखते रहते हैं बल्कि चंद रोज बाद उसी विकृत भाषा का हम भी इस्तेमाल करने लगते हैं। शास्त्रीय जानकारों की फसल हम नहीं उगा रहे हैं। हिंदी की अमरबेल तो फैलती रहेगी। उसे किसी सरकार या समाज के संरक्षण की जरुरत नहीं है। उसे आपकी मेहरबानी भी नहीं चाहिए। इतने माध्यमों का आविष्कार होने के बाद उसका विस्तार कोई नहीं रोक सकता। साल दर साल हिंदी के जानने समझने वाले बढ़ते ही जाएंगे। उसके लिए किसी तरह के विलाप की आवश्यकता नहीं है। बचाना है तो उसकी शुद्धता को बचाइये। उसकी आत्मा और उसकी मिठास को बचाइए। आने वाली पीढ़ियों को बताइए कि असल हिंदी कौन सी है? सरकारी मदद पर होने वाले कागजी सम्मेलनों में छाती पीटने से कुछ नहीं होगा। अपना घर ठीक कीजिए, हिंदी आपको दुआएं देगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैंं)

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'नई नहीं है मीडिया में पूंजीपति घरानों और सत्ता की भूमिका'

एक बार फिर हंगामा। मीडिया में कारपोरेट समूह और सत्ता की राजनीति के प्रभाव को लेकर सोशल मीडिया तथा अन्य मंचों पर विवाद जारी है।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 05 December, 2022
Last Modified:
Monday, 05 December, 2022
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

एक बार फिर हंगामा। मीडिया में कारपोरेट समूह और सत्ता की राजनीति के प्रभाव को लेकर सोशल मीडिया तथा अन्य मंचों पर विवाद जारी है। न्यूज चैनल एनडीटीवी कंपनी को अडानी ग्रुप द्वारा ख़रीदे जाने पर एक वर्ग आशंका व्यक्त कर रहा है कि यह काम सत्ता के इशारे पर हो रहा है, क्योंकि यह चैनल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियों, कामकाज पर निरंतर अभियान सा चलाते दिखता रहा है।

कुछ अति प्रगतिशील लोग इसे मीडिया में पूंजीपतियों के समूहों द्वारा प्रभावित होने के खतरे की आवाज उठा रहे हैं। लेकिन क्या भारत में पहली बार औद्योगिक व्यापारिक समूह मीडिया में प्रवेश कर रहा है? असली पृष्ठभूमि का अध्ययन किया जाए तो यही तथ्य सामने आएगा कि आजादी के बाद से बिड़ला, डालमिया, गोयनका और टाटा जैसे बड़े समूह मीडिया और राजनीति से जुड़े रहे हैं। नब्बे के दशक से अंबानी समूह भी मैदान में आ गया। इसी तरह मोदी के समर्थन और विरोध को लेकर मीडिया में विभाजन पर भी क्यों आश्चर्य होना चाहिए? क्या पहले सत्तारूढ़ कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों और सरकारों के प्रबल समर्थन और विरोध वाला मीडिया या संपादक नहीं थे?

इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में बिड़ला, गोयनका, डालमिया-जैन परिवारों के मीडिया संस्थानों का दबदबा और कुछ हद तक टाटा समूह और ट्रस्ट के प्रभाव वाले प्रकाशन का असर था। दिलचस्प बात यह थी कि ऐसे बड़े पूंजीपति और उनके मीडिया संस्थान कभी सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और सरकार के शीर्ष नेताओं के करीब रहे और कभी सबसे बड़े विरोधी बनकर उभरे। इनमें रामनाथ गोयनका और उनके इंडियन एक्सप्रेस को सबसे अग्रणी कहा जा सकता है।

यों रामनाथ गोयनका को सत्ता से टकराने वाले बड़े सेनापति के रूप में याद कराया जाता है, लेकिन असलियत यह है कि वह स्वयं कांग्रेस पार्टी की आंतरिक राजनीति के भागीदार भी थे। नेहरू युग से वह कांग्रेस नेतृत्व की खींचातानी में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। लाल बहादुर शास्त्री के बाद मोरारजी देसाई के बजाय इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने के अभियान में शामिल रहे। फिर कुछ वर्षों के बाद घोर विरोधी बनकर मोरारजी देसाई और जयप्रकाश नारायण के साथ सक्रिय राजनीति तथा अपने अखबारों का उपयोग करते रहे। गोयनका स्वयं लोक सभा के चुनाव भी लड़े। इस दृष्टि से इंदिरा गांधी और उनके समर्थक एक्सप्रेस की पत्रकारिता को पूरी तरह निष्पक्ष नहीं मानकर राजनीतिक पूर्वाग्रहों पर आधारित एवं सत्ता विरोधी ठहराते रहे।

गोयनका के विरोधाभासी कदमों का अहसास बहुत रोचक है। जब वह नेहरू के करीबी थे, तो उन्होंने उनके एसोसिएटेड प्रेस लिमिटेड के अखबार नेशनल हेराल्ड के लिए लखनऊ में करीब दो लाख रुपये की प्रिटिंग प्रेस उपहार में दे दी। फिर उनके दामाद फिरोज गांधी को एक्सप्रेस के प्रबंधन में नौकरी दे दी। फिरोज गांधी आधे दिन एक्सप्रेस में काम करते और बाद में संसदीय कामकाज करते। इसका लाभ यह हुआ कि उन्होंने संसदीय कार्यवाही के उचित प्रकाशन पर अखबारों को विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई से बचाने का ‘निजी विधेयक’ संसद में रखा।

फिरोज गांधी ने नेहरू से पारिवारिक रिश्तों के बावजूद अपनी सरकार की गड़बड़ियों के विरुद्ध आवाज उठाई। दूसरी तरफ बीमा कंपनयों पर नियंत्रण के लिए बीमा संशोधन विधेयक लाने में अहम भूमिका निभाई। इससे डालमिया बीमा कंपनी जांच-पड़ताल के घेरे में आ गई। मूंधड़ा समूह को सरकार से अनुचित लाभ मिलने का मुद्दा उठाने से वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी रामनाथ गोयनका के मित्र थे, नाराज होकर गोयनका ने फिरोज गांधी को नौकरी से बर्खास्त कर दिया।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असली हमले सत्ताधारियों के साथ बड़े मालिकों द्वारा होते रहे हैं। बहरहाल, इंदिरा गांधी ने मुश्किल के दिनों में अपने पति फिरोज गांधी को नौकरी देने का अहसान हमेशा याद रखा। गंभीर मामलों और सीधे टकराव के बावजूद इमरजेंसी में गोयनका की गिरफ्तारी जैसे कदम नहीं उठाए गए। इसी तरह बाद में संजय गांधी की दुर्घटना में असामयिक मृत्यु पर गहरी संवदेना देने के लिए गोयनका भी पहुंचे। गोयनका ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के प्रारंभिक सत्ताकाल में उनका समर्थन किया।

नेहरू-इंदिरा परिवार से संबंधों के बावजूद राजनीतिक धारा अपने अनुकूल नहीं होने के कारण गोयनका और एक्सप्रेस समूह ने 1973-74 से इंदिरा सरकार की कुछ विफलतओं तथा भ्रष्टाचार के मामलों के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया। गोयनका श्रीमती गांधी द्वारा नीलम संजीव रेड्डी के बजाय वी.वी. गिरि को राष्ट्रपति बनवाए जाने से भी खफा थे। ललित नारायण मिश्र-तुलमोहन राम भ्रष्टाचार कांड, गुजरात और बिहार में महंगाई,बेरोजगारी और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को लेकर एक्सप्रेस के तेवर गर्म होते चले गए।

इसका असर दिल्ली तथा प्रादेशिक राजधानियों के अखबारों-पत्रिकाओं पर भी देखने को मिला। गुजरात के नव निर्माण आंदोलन में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इसी तरह बिहार में छात्र युवा संघर्षवाहिनी को जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व मिल गया। जयप्रकाश जी के अभियान के समर्थन के लिए रामनाथ गोयनका ने इंडियन एक्सप्रेस के अलावा साप्ताहिक अखबार ‘एवरीयेन्स’ और हिंदी में ‘प्रजानिति’ शुरू किए। गांधीवादी पत्रकार अजीत भट्टाचार्य को अंग्रेजी तथा दिनमान के संस्थापक संपादक अज्ञेय को हिंदी साप्ताहिक का संपादक नियुक्त किया गया। दोनों बुद्धजीवी सैद्धांतिक आधार पर तीखी टिप्पणियों से पाठकों को सत्ता की गड़बड़ियों के विरोध की आवश्यकता निरुपित करते रहे।

जनता पार्टी बिखरने और इंदिरा गांधी की वापसी,राजीव गांधी के अभ्युदय,वी.पी. सिंह, नरसिंह राव, इंदर कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के सत्ता काल तक मीडिया अलग-अलग खेमों के साथ या विरोध में खड़ा दिखने लगा। बदलती उदारवादी अर्थव्यवस्था के साथ मीडिया विचारधाराओं की अपेक्षा बैलेन्स शीट की चिंता करने लगा। सत्ताधारियों से अधिकाधिक लाभ पाने की होड़ हो गई। मतलब अब सत्ताधारी मीडिया की चौखट पर नहीं, अधिकांश बड़े मालिक और संपादक सरकार के दरवाजे पर दस्तक देने लगे। कुछ क्षेत्रीय प्रकाशन इसके अपवाद हैं। उन्होंने अपनी तटस्थता,निष्पक्षता बरकरार रखी। इसे प्रेम-नफरत रिश्तों का दौर कहा जा सकता है। यानी अवसर,लाभ-हानि के साथ सत्ता और मीडिया के रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे।

इस पृष्ठभूमि में एक और बिजनेस समूह के मीडिया जगत में प्रवेश पर कष्ट क्यों होना चाहिए? कोई अखबार या न्यूज चैनल वित्तीय संकट में आने पर बिकता है और नया प्रबंधन नए-पुराने स्टाफ को रखकर नए लक्ष्य रखता है तो इससे देश-विदेश में मीडिया का प्रभाव और भारत की छवि ही बनेगी। सत्ता के पक्ष-विपक्ष की स्वतंत्रता पर भी किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन मीडिया की आड़ में अवैध व्यापार, कमाई और संदिग्ध विदेशी फंडिंग होने पर तो कानूनी कार्रवाई उचित ही कही जाएगी। लोकतंत्र में अमृत मंथन होने पर जहर भी निकलता है तो उसे पीने के बजाय नष्ट करना भी जरूरी होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक आईटीवी नेटवर्क, इंडिया न्यूज और दैनिक आज समाज के संपादकीय निदेशक हैं।)

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पत्रकारिता का अनमोल दस्तावेज है राजेंद्र माथुर के ये सात मुद्दे: राजेश बादल

एनडीटीवी के बारे में कल मैंने जो टिप्पणी की, उस पर अनेक मित्रों ने कहा कि इसमें रवीश कुमार का जिक्र होना चाहिए था।

राजेश बादल by
Published - Friday, 02 December, 2022
Last Modified:
Friday, 02 December, 2022
rajendramathur45412

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

प्रसंग : अस्ताचल की ओर एनडीटीवी, लेख पार्ट- 2

व्यक्ति को संस्था, समाज और देश गढ़ता है

एनडीटीवी के बारे में कल मैंने जो टिप्पणी की, उस पर अनेक मित्रों ने कहा कि इसमें रवीश कुमार का जिक्र होना चाहिए था। वे सच हो सकते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति का निर्माण करने वाली संस्था बड़ी होती है। इसलिए चिंता इन संस्थाओं के क्षीण और दुर्बल होते जाने पर करनी चाहिए। कुछ संस्थान ऐसे भी हैं, जो सत्ता समर्थक मीडिया की फसल उगा रहे हैं। अर्थ यह कि यदि कोई संस्था चाह ले तो वह लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का प्रतीक बन सकती है और ढेर सारे गिरि लाल जैन, राजेंद्र माथुर, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, एसपी सिंह, विनोद दुआ, प्रभाष जोशी, अरुण शौरी से लेकर रवीश कुमार तक को रच सकती हैं। मैंने स्वयं भी कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

यह भी पढ़ें: अस्ताचल की ओर एनडीटीवी, लेख पार्ट- 1

मेरे पत्रकारिता संस्कारों की जब नींव पड़ रही थी तो उसमें राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, एसपी सिंह, प्रभाष जोशी, रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती का बड़ा योगदान रहा। दूसरी ओर हम कुछ संस्थानों के प्रतीक पुरुषों को सत्ता प्रतिष्ठानों की जी हुजूरी करते पाते हैं। वे अपने मातहत ऐसे ही पत्रकारों की पौध विकसित करते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे तथाकथित पत्रकार पीआर या लाइजनिंग तो कर सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता का कर्तव्य अलग है।  

आपातकाल के बाद राजेंद्र माथुर के लिखे सात गंभीर मुद्दे याद आ रहे हैं। भारतीय हिंदी पत्रकारिता का यह अदभुत दस्तावेज है और भारत में अधिनायकवाद पर अंकुश लगाता है। माथुर जी तब ‘नईदुनिया’ में संपादक थे और उनके प्रधान संपादक राहुल बारपुते थे।  करोड़ों नागरिकों के दिलो दिमाग को मथने वाले सवाल राजेंद्र माथुर को भी झिंझोड़ते थे।  उन दिनों बड़े नामी गिरामी पत्रकार व्यवस्था के आगे घुटने टेक चुके थे। लेकिन ‘नईदुनिया’ ने ऐसा नहीं किया। उसके विज्ञापन बंद करने की नौबत आ गई, लेकिन उस समय के प्रबंधन और प्रधान संपादक ने पत्रकारिता के मूल्यों को बचाने का फैसला किया। इस तरह राजेंद्र माथुर का वह अनमोल दस्तावेज सामने आया। मैं अपनी पत्रकारिता के सफर में उस पड़ाव का साक्षी हूं।

आगे बढ़ते हैं। उन्नीस सौ तिरासी में बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र प्रेस बिल लाए। एक बार फिर अभिव्यक्ति के प्रतीकों पर हमला हमने देखा। देशभर में हम लोग सड़कों पर आए। तब टीवी से अधिक अखबार प्रभावी थे। इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर नेत्री प्रधानमंत्री थीं। आपातकाल में सेंसरशिप के लिए खेद प्रकट कर चुकी थीं। उन्होंने सबक सीखा था।  फिर इस देश के लोकतंत्र ने बिहार सरकार को निर्देश दिया कि प्रेस बिल वापस लिया जाए। ऐसा ही हुआ। संस्था ने पत्रकारिता को संरक्षण दिया था।

इसके बाद उन्नीस सौ सतासी आया। तब तक  देश में ‘दूरदर्शन’ जोरदार दस्तक दे चुका था। राजीव गांधी सरकार मानहानि विधेयक लाई। एक बार फिर हम लोगों ने मोर्चा संभाला। राजीव गांधी की सरकार को झुकना पड़ा। विधेयक रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया। आज तो संपादक प्रधानमंत्री के कदमों में बिछ जाते हैं। उस समय पूरा पीएमओ राजेंद्र माथुर से विराट बहुमत वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी का साक्षात्कार लेने का आग्रह करता रहा। लेकिन राजेंद्र माथुर नहीं गए। उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को बता दिया कि पेशेवर कर्तव्य कहता है कि साक्षात्कार कोई संवाददाता लेगा अथवा संवाददाताओं की टीम का प्रमुख। यह संपादक का काम नहीं है। ऐसा ही हुआ।  

इन्हीं दिनों दूरदर्शन अपनी निष्पक्षता की छटा बिखेर रहा था। एक उदाहरण उसका भी। विनोद दुआ तब एक कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। उसमें महत्वपूर्ण लोगों के साक्षात्कार दिखाए जाते थे। अशोक गहलोत नए नए केंद्रीय मंत्री बने थे। विनोद जी ने उन्हें बुलाया। अशोक जी को अपने मंत्रालय के बारे में कोई अधिक जानकारी नहीं थी, न ही उन्होंने तैयारी की थी। परिणाम यह कि वे अधिकतर सवालों का उत्तर ही न दे सके। रुआंसे हो गए।  दूरदर्शन पर वैसा ही प्रसारण हुआ। अशोक जी की छबि पर प्रतिकूल असर पड़ा। कुछ राजनेता, मंत्री और सरकार के शुभचिंतक प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पास गए। उनसे कहा कि एक बाहरी प्रस्तोता पत्रकार विनोद दुआ हमारे मंच, संसाधन और पैसे का उपयोग करता है और हमारे ही मंत्री का उपहास होता है। राजीव गांधी ने कहा, सवाल उपहास का नहीं है।  मंत्री की काबिलियत का है। अगर किसी मंत्री को अपने मंत्रालय की जानकारी नहीं है तो वह कैसे देश भर का प्रशासन करेगा। अगले दिन अशोक गहलोत का इस्तीफा हो गया। तो यहां संस्था दूरदर्शन और सरकार, दोनों ही पत्रकारिता के अधिकार को संरक्षण दे रही थीं।

क्या आज आप कल्पना कर सकते हैं ? इसी दौर में चुनाव परिणाम तीन चार दिन तक आते थे और दूरदर्शन उनका सजीव प्रसारण करता था। प्रणॉय रॉय और विनोद दुआ की जोड़ी सरकार के कामकाज और मंत्रियों पर ऐसी तीखी टिप्पणियां करती थी कि सत्ताधीश बिलबिला कर रह जाते थे। लेकिन कुछ नही करते थे। स्वतंत्र पत्रकारिता का अर्थ यही था।

कितने उदाहरण गिनाऊं। भारत की पहली साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘परख’ हम लोगों ने 1992 में शुरू की। विनोद दुआ ही उसके प्रस्तोता थे। मैं इस पत्रिका में विशेष संवाददाता था।  दूरदर्शन पर हर सप्ताह प्रसारित होने वाली यह पत्रिका करीब साढ़े तीन साल चली।  मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश से मेरी कम से कम पचास रिपोर्टें ऐसी थीं, जिनसे केंद्र और राज्य सरकारें हिल जाती थीं। परंतु कोई रिपोर्ट न रोकी गई और न सेंसर हुई। हां पत्रकारिता की निष्पक्षता और संतुलन के धर्म का हमने हरदम पालन किया। तो संस्था और सरकार की ओर से कभी दिक्कत नहीं आई।

इसके बाद सुरेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में ‘आजतक’ शुरू हुआ।  दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर।  दूरदर्शन का नियम था कि प्रसारण से पूर्व एक बार ‘आजतक’ का टेप देखा जाना चाहिए था।  मगर एसपी की इतनी धमाकेदार प्रतिष्ठा थी कि कभी कोई अंक रोका नहीं गया और सरकार के साथ-साथ समूचे तंत्र की विसंगतियों और खामियों पर हम लोग करारे हमले करते थे।  हमारी नीयत में खोट नहीं था, इसलिए सरकार और ब्यूरोक्रेसी ने कभी अड़ंगा नही लगाया।  आज तो चुनाव आयोग ही कटघरे में है। हमने टीएन शेषन का दौर देखा है, जब प्रधानमंत्री से लेकर सारे मंत्री, मुख्यमंत्री और नौकरशाह थर-थर कांपते थे। ऐसा तब होता है, जब हुकूमतें भी लोकतांत्रिक परंपराओं और सिद्धांतों का आदर करती हैं। पर जब बागड़ ही खेत को खाने लग जाए तो कोई क्या करे ?

एक अंतिम उदाहरण। भारत का पहला स्वदेशी चैनल ‘आजतक’ हम लोगों ने शुरू किया।  तब एनडीए सरकार थी। चूंकि उपग्रह प्रसारण की अनुमति उस समय की सूचना-प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज ने दी थी, इसलिए कभी-कभी सरकार की अपेक्षा होती थी कि संवेदनशील मामलों में हम सरकार का समर्थन करें। पर ऐसा कभी नहीं हुआ। हमारी स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता पर एसपी सिंह का प्रभाव बना रहा। जब भारत के पहले टीवी ट्रेवलॉग के तहत मैने अरुणाचल से लेकर कन्याकुमारी तक यात्रा की तो एनडीए के पक्ष में कोई फील गुड नहीं पाया। मैंने प्रसारण में साफ ऐलान कर दिया था कि सरकार जा रही है।  उस समय सारे अखबार और चैनल एनडीए की वापसी करा रहे थे। आशय यह कि सच कहने, बोलने और लिखने की आजादी का स्वर्णकाल हमने देख लिया है। आज का दौर भी देख रहे हैं और यह भी गुजर जाएगा।

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मीडिया इंडस्ट्री में प्रणय-राधिका रॉय के योगदान को राजदीप सरदेसाई ने यूं किया याद

'इंडिया टुडे' के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने मीडिया इंडस्ट्री में प्रणय और राधिका रॉय के योगदान को उत्साहपूर्वक याद किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 01 December, 2022
Last Modified:
Thursday, 01 December, 2022
rajdeep sardesai

अडानी समूह द्वारा ‘एनडीटीवी’ (NDTV) के अधिग्रहण के बाद हाल के दिनों में भारतीय मीडिया परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आया है। मीडिया समूह की प्रमोटर फर्म आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड (RRPR Holding Private Limited) ने अपने शेयरों का 99.5% शेयर अडानी समूह को हस्तांतरित कर दिया, जिसके बाद फाउंडर्स प्रणय और राधिका रॉय ने डायरेक्टर्स के पद से इस्तीफा दे दिया, जो कि भारतीय न्यूज मीडिया की दुनिया में एक ऐतिहासिक क्षण था।

रॉय परिवार ने भारतीय न्यूज मीडिया के ईकोसिस्टम को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1984 में उन्होंने NDTV की सह-स्थापना की, जिसने भारत में स्वतंत्र न्यूज ब्रॉडकास्ट करने का बीड़ा उठाया। इन दोनों ने देश का पहला 24X7 न्यूज चैनल और लाइफस्टाइल चैनल भी लॉन्च किया। उनके पद छोड़ने के बाद से मीडिया बिरादरी में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है, जिनमें 'इंडिया टुडे' के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई का नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने मीडिया इंडस्ट्री में रॉय के योगदान को उत्साहपूर्वक याद किया है।

उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट साझा किया, जिसमें उन्होंने रॉय परिवार के साथ काम करने की सुखद यादें ताजा कीं।

उन्होंने लिखा, ‘जिंदगी में कई बार आप पूछते हैं: ये कहां आ गए हम! पिछली रात कुछ ऐसी ही थी। दिन भर गुजरात की सड़कों पर घूम-घूमकर थका-मांदा जब मैं वापस होटल के कमरे में एनडीटीवी होल्डिंग कंपनी के बोर्ड से प्रणय और राधिका रॉय के इस्तीफा देने की खबर पढ़ने के लिए लौटा, तो उनसे जुड़ीं भावनाएं उमड़ने लगीं और पुरानी यादों की एक लहर दौड़ गई लेकिन इससे बढ़कर मेरे अंदर थी एक उदासी की भावना।

जब भारतीय टीवी न्यूज का इतिहास लिखा जाएगा, तो रॉय परिवार को अरुण पुरी जैसे शुरुआती दिग्गजों के साथ खड़े होने का गौरव प्राप्त होगा। रॉय एक न्यूज संस्था का निर्माण करने के लिए प्रतिबद्ध थे, जिन्होंने कई प्रतिभाओं को निखारा व हम जैसे कई लोगों को ऊंची उड़ान भरने के लिए पंख दिए, अब वह चिरस्थाई विरासत बनी रहेगी। विशेष तौर पर मैं हमेशा उस मानवीय तरीके का सम्मान करूंगा, जिसमें प्रत्येक स्टाफ मेंबर के साथ अच्छे और बुरे समय में व्यवहार किया गया। यही एक कारण है कि इतने सारे लोगों के लिए एनडीटीवी हमेशा एक 'परिवार' रहा है। यहां एक समानाधिकारवादी वाली कार्य नीति रही, जहां एक कैमरापर्सन या ओबी ड्राइवर भी अकसर जिंदगी भर के लिए आपके दोस्त बन जाते थे।

व्यक्तिगत स्तर पर कहूं तो डॉ. रॉय के साथ लाइव चुनाव करना एक अविस्मरणीय स्मृति बनी हुई है। क्योंकि मुझे उस टीम का हिस्सा बनने का मौका मिला था, जिसने एक ऐसा नेटवर्क बनाया जो घर-घर में जाना जाने वाला नाम बन चुका था। मैं उन दिनों का हिस्सा बनने के लिए आभारी हूं। शायद यह बेहद ही शांति भरा वो समय था, जब प्रतिस्पर्धा बहुत ही कम थी। हो सकता है कि हम इसे हमेशा सही न समझें, लेकिन यह निश्चित रूप से एक ऐसा समय था, जब हमें इस बात की चिंता करने के लिए ऊपर देखने की जरूरत नहीं थी कि सत्ता में कौन किस खबर या लाइव डिबेट में तीखी टिप्पणी से नाराज हो सकता है।

 मुझे नहीं पता कि एनडीटीवी और रॉय परिवार के लिए आगे की राह क्या है। लेकिन मैं हमेशा उनका शुभचिंतक और प्रशंसक रहूंगा। आठ साल पहले, मैंने एक चैनल/नेटवर्क देखा, जिसे बनाने के लिए किसी की रातों की मेहनत थी। जिसे मुझे मजबूरन छोड़ना पड़ा। इससे उबरने में मुझे कुछ समय लगा। मुझे एहसास हुआ कि वास्तव में मेरे दोस्त कौन हैं। लेकिन अब मुझे विश्वास है कि यह सब जीवन की अनिश्चित यात्रा का हिस्सा है। ऐसा ही एक गाना याद आ रहा है, ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया....।

भले ही ‘एनडीटीवी’ के अब नए मालिक होंगे, जिनके अपने आइडियाज होंगे, लेकिन चैनल का नाम हमेशा के लिए रॉय परिवार के साथ जुड़ा रहेगा, जिन्होंने जीके-1 बेसमेंट से एक छोटे से ऑपरेशन से इसे शुरू किया और इसके लिए अपना पसीना बहाया और कड़ी मेहनत की। मैं पहली बार 1994 में एक जीवंत नेशनल नेटवर्क में शामिल हुआ था। इस समय मैं बहुत अधिक नहीं कहना चाहिए, लेकिन इस पोस्ट को एक तस्वीर के साथ छोड़ रहा हूं, जो बहुत कुछ कहती है, जोकि 1998-99 के आम चुनाव की है।

बाईं ओर बैठे शख्स का अनुमान लगाइए! जैसा कि मैंने कहा: कहां गए वो दिन जब एक टीवी स्टूडियो वैकल्पिक दृष्टिकोण के साथ बुद्धिमत्ता बातचीत के लिए जगह थी और किसी को भी 'राष्ट्र-विरोधी' का तमगा नहीं दिया जाता था!  

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई का पूरा फेसबुक पोस्ट आप यहां भी पढ़  सकते हैं-

 

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उम्मीद है कि NDTV अपनी इन Values और Standards को बनाए रखेगा: तहसीन जैदी

‘एनडीटीवी’ (NDTV) बोर्ड से प्रणय रॉय और राधिका रॉय के अलग होने के बाद Syngenta India की मैनेजर (Public Affairs) तहसीन जैदी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखी है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 01 December, 2022
Last Modified:
Thursday, 01 December, 2022
Tehseen Zaidi

‘एनडीटीवी’ (NDTV) बोर्ड से प्रणय रॉय और राधिका रॉय के अलग होने के बाद ‘सिन्जेंटा इंडिया’ (Syngenta India’ की मैनेजर (Public Affairs) तहसीन जैदी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखी है। ‘लिंक्डइन’ पर लिखी अपनी इस पोस्ट में तहसीन जैदी ने उन दिनों को भी याद किया है, जब वह ‘एनडीटीवी’ का हिस्सा हुआ करती थीं। इसके अलावा उन्होंने उम्मीद जताई है कि एनडीटीवी पूर्व की तरह अपने मानकों को बनाए रखेगा। तहसीन जैदी ने लिखा है-

एक युग का अंत!!!!!! प्रणय रॉय द्वारा संचालित और पोषित एक ईमानदार टेलीविजन पत्रकारिता का अंत। यदि डॉ. रॉय के इस्तीफे की खबर सच है तो यह एक संस्था और एक बड़े परिवार का अंत है, जिसे डॉ. रॉय और श्रीमती रॉय ने मिलकर तैयार किया और उसे सींचा। एनडीटीवी में जब मेरा आखिरी दिन था, तो उस समय मेरी आंखों में आंसू आ गए थे। उस समय डॉ. रॉय, श्रीमती रॉय और मेरी मार्गदर्शक सोनिया सिंह बड़ी ही गर्मजोशी से मुझसे मिले और मुझे नया काम करने के लिए प्रोत्साहित किया। उस दौरान मैंने एक प्रतिद्वंद्वी संस्थान में काम करने से इनकार कर दिया, हालांकि, उन्होंने मुझे 40 प्रतिशत सैलरी बढ़ोतरी की पेशकश की थी, लेकिन मुझे लगा कि मुझमें एनडीटीवी का प्रतियोगी बनने की हिम्मत नहीं होगी और मैंने एक एनजीओ में शामिल होने का फैसला किया। यहां से गुडबाय कहते समय मेरा सिर्फ एक ही वाक्य था कि मुझे इन सीढ़ियों से प्यार हो गया था।

एनडीटीवी का अधिग्रहण होते हुए देखना मेरे लिए भूकंप के बाद अपने बचपन के घर को मलबे में तब्दील होते हुए देखने जैसा है। मुझे पता है कि ये सब चीजें बेहतरी के लिए हो रही हैं, लेकिन इससे हमारी पुरानी यादें जुड़ी हुई हैं, इससे मन में थोड़ा विषाद है। एनडीटीवी की विरासत हम में से हर एक के अंदर है, हम जहां भी जाते हैं, एनडीटीवी की सीख और मूल्यों को अपने साथ ले जाते हैं।

एनडीटीवी एक ऐसा परिवार है और रहेगा, जिसमें प्रणय रॉय और राधिका रॉय (प्यार से हम उन्हें श्रीमती रॉय बुलाते हैं) की ओर से हम में से हर एक के लिए बहुत सारा प्यार, स्नेह और देखभाल है। मैं कुछ प्वाइंटस के जरिये अपनी बात रखूंगी।

1: मीडिया के प्रति पैशन और एनडीटीवी के प्रति प्यार के चलते एक युवा के रूप में यहां जॉइन करना मेरे लिए एक सपने के सच होने जैसा था। एनडीटीवी के साथ काम करने के कुछ महीनों बाद मैंने नैतिक रिपोर्टिंग (ethical reporting) सीखी। ऐसी रिपोर्टिंग जो तथ्यात्मक रूप से सही हो। हमने टीआरपी के बारे में कभी चिंता नहीं की। हमारे लिए कंटेंट और नैतिक रिपोर्टिंग सबसे महत्वपूर्ण थी। डॉ. रॉय ने 26/11 के विजुअल्स को यह कहते हुए स्टोरी में डालने से इनकार कर दिया था कि उन्हें टीआरपी नहीं चाहिए और मुझसे कहा था कि इस तरह की गलती न करें, क्योंकि इससे कई लोगों की जान दांव पर लग जाएगी।  

2: मुझे एनडीटीवी में ही अपना जीवनसाथी मिला। सिर्फ यही ऐसा मीडिया संस्थान था, जिसने हमारे जैसे जोड़ों को प्रोत्साहित किया। यहां क्रेच की सुविधा थी, जहां डॉ. नाजली छोटे बच्चों की पढ़ाई और खेलने-कूदने समेत उनकी सभी जरूरतों का व्यक्तिगत रूप से ध्यान रखती थीं। चौबीसों घंटे बच्चों की हर जरूरत की पूर्ति के लिए सात एम्प्लॉयीज की ड्यूटी लगाई गई थी। हमें एनडीटीवी क्रेच में जाकर बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताने की पूरी आजादी थी। तमाम सुविधाओं के साथ छह महीने का मातृत्व अवकाश केवल एनडीटीवी द्वारा प्रदान किया गया था।

3: हमारे भोजन पानी का एनडीटीवी द्वारा पूरा ध्यान रखा जाता था। यह एक बड़ा परिवार था, जो हमेशा मदद और समर्थन के लिए मौजूद रहता था। डॉ. रॉय ने हमें ऑफिस के सहायकों और ड्राइवर को 'सर' के रूप में संबोधित करने के लिए कहा था। इस तरह के मूल्य हमने एनडीटीवी में सीखे। एनडीटीवी में हमारा जन्मदिन विशेष रूप से मनाया जाता था, हम साथ में केक काटते थे। डॉ. रॉय हम सभी को व्यक्तिगत रूप से जानते थे और हमें हमारे नाम से संबोधित करते थे। जब भी हम मिलते थे, वह मेरे लिए अंदर आने के लिए दरवाजा खोल देते थे और फिर अपने विनम्र स्वर में पूछते थे, आप हमारे लिए कबाब कब बना रही हैं?

देर रात तक काम करने वाली महिला एंप्लॉयीज को घर से लाने-ले जाने के लिए विशेष सुविधा थी। गार्ड्स को निर्देश थे कि महिला एंप्लॉयीज को उनके घर के दरवाजे तक सुरक्षित छोड़कर आएं। किसी मंत्री अथवा बड़ी हस्ती के घर के बाहर इंटरव्यू की प्रतीक्षा करते समय हमें अपना भोजन, जूस और फल अच्छी तरह से पैक करके मिलते थे। मुझे उम्मीद है कि प्रणय रॉय के साथ अथवा उनके बिना एनडीटीवी इन मानकों (Standards) को बनाए रखने में सक्षम होगा।

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‘रवीश कुमार सर, जहां रहेंगे चमक बिखेरते रहेंगे’

कल रात इस्तीफे के बाद से रवीश कुमार सर के बारे में इतनी बातें दिमाग के फ्लैशबैक में चल रही हैं कि सबकुछ कई बार गड्डमड्ड् हो जा रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 01 December, 2022
Last Modified:
Thursday, 01 December, 2022
Ravish Shukla

कल रात इस्तीफे के बाद से रवीश कुमार सर के बारे में इतनी बातें दिमाग के फ्लैशबैक में चल रही हैं कि सबकुछ कई बार गड्डमड्ड् हो जा रहा है। अब तक जो कुछ भी मीडिया करियर में किया या करने की कोशिश कर रहा हूं, उसमें उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है।

एक बॉस से बढ़कर वो मेरे लिए एक मार्गदर्शक हैं। कई बार उनसे डांट खाई, बहुत से मौके पर सराहना भी। हर बार जब कंधे पर हाथ रखते तो अपने आप को बहुत जिम्मेदार होने का अहसास बस ऐसे ही हो जाता था।

रवीश कुमार के विचारों से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं। उनको प्यार करने वालों की भी बहुत बड़ी तादात है और नफरत करने वालों की भी। लेकिन लोकप्रियता के शिखर पर होने के बावजूद उनकी ईमानदारी, उनकी लेखनशैली, बोलने का अंदाज, उनकी समझदारी और उनके साफ चरित्र पर किसी को रंच मात्र भी शक नहीं होना चाहिए। ये बात 20 साल से जान-पहचान के आधार पर पूरी जिम्मेदारी से लिख रहा हूं।

खैर, कभी सोचा नहीं था कि NDTV और रवीश कुमार अलग होंगे। कभी सोचा नहीं था कि उनके इस्तीफे पर लिखना पड़ेगा, कभी सोचा नहीं था कि हमारी पीढ़ी इस पल का भी गवाह बनेगी। लेकिन जिंदगी यही है...। रवीश कुमार सर, जहां रहेंगे चमक बिखेरते रहेंगे। गांव गिंराव और अभावों में पले गरीब युवाओं को प्रभावित करते रहेंगे। फिर मिलेंगे संघर्ष के तूफानों में...

(एनडीटीवी में सीनियर स्पेशल करेसपॉन्डेंट रवीश शुक्ला की फेसबुक पोस्ट से साभार)

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NDTV का हो रहा विलोप, ऐसे शानदार व नायाब संस्थान को सलाम करिए मिस्टर मीडिया!

संस्था के नाम पर भले ही एनडीटीवी (NDTV) मौजूद रहे, लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक सुनहरे अध्याय लिखने वाले इस संस्थान का विलोप हो रहा है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 30 November, 2022
Last Modified:
Wednesday, 30 November, 2022
NDTV54874

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अस्ताचल की ओर एनडीटीवी 

संस्था के नाम पर भले ही एनडीटीवी (NDTV) मौजूद रहे, लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक सुनहरे अध्याय लिखने वाले इस संस्थान का विलोप हो रहा है। हम प्रणय रॉय और राधिका रॉय की पीड़ा समझ सकते हैं। छोटे से प्रॉडक्शन हाउस को जन्म देकर उसे चैनलों की भीड़ में नक्षत्र की तरह चमकाने वाले इस दंपत्ति का नाम यकीनन परदे पर पत्रकारिता की दुनिया में हरदम याद किया जाएगा। उनके कोई बेटा नहीं था, लेकिन एनडीटीवी पर उन्होंने जिस तरह सर्वस्व न्यौछावर किया, वह एक  मिसाल है। लेकिन जिस ढंग से इस संस्था की आत्मा को बाहर निकालकर उसे प्रताड़ित किया गया, वह भी एक कलंकित कथा है। चाहे कितने ही शिखर संपादक आ जाएं, चाहे कितने भी बड़े प्रबंधक आ जाएं, उसे हीरे मोती पहना दें, लेकिन यश के शिखर पर वे उसे कभी नहीं पहुंचा सकेंगे। ठीक वैसे ही, जैसे एसपी सिंह के बाद कोई संपादक ‘रविवार’ को वह ऊंचाई नहीं दे सका और ‘आजतक’ की मांग में तो सिंदूर ही एसपी का लगा हुआ है। बाद के संपादक एसपी की अलौकिक आभा के सामने कुछ भी नहीं हैं।

कहने में कोई हिचक नहीं कि एक व्यक्ति किसी भी संस्थान को बुलंदियों पर ले जाता है और एक व्यक्ति उसे पतन के गर्त में धकेल देता है। टीवी पत्रकारिता के पिछले पच्चीस बरस में हमने ऐसा देखा है। इसलिए एनडीटीवी का सूर्यास्त बेहद तकलीफदेह अहसास है।   

जेहन में यादों की फिल्म चल रही है। स्वस्थ्य पत्रकारिता के अनगिनत कीर्तिमान इस समूह ने रचे। अपने पत्रकारों को आसमानी सुविधाएं और आजादी दी। क्या कोई दूसरी कंपनी आपको याद आती है, जो लंबे समय तक अपने साथियों के काम करने के बाद कहे कि आपका शरीर अब विश्राम मांगता है। कुछ दिन संस्थान के खर्च पर सपरिवार घूमने जाइए। आज किसी चैनल को छोड़ने के बाद उसके संपादक या रिपोर्टर को चैनल पूछता तक नहीं है। लेकिन इस संस्था ने सुपरस्टार एसपी सिंह के अचानक निधन पर बेजोड़ श्रद्धांजलि दी थी और अपना बुलेटिन उनकी एंकरिंग की रिकॉर्डिंग से खोला था।

प्रतिद्वंद्वी चैनल के शिखर संपादक को ऐसी श्रद्धांजलि एनडीटीवी ही दे सकता था। गैस काण्ड के नायक रहे मेरे दशकों तक दोस्त रहे राजकुमार केसवानी जब साल भर पहले इस जहां से कूच कर गए, तो इस संस्था ने ऐसी श्रद्धांजलि दी कि बरबस आंसू निकल पड़े। तब केसवानी को यह संस्थान छोड़े बरसों हो चुके थे।  ऐसा ही अप्पन के मामले में हुआ। कितने ही उदाहरण हैं, जब उनके साथियों ने संकट काल देखा तो प्रणय रॉय संकट मोचक बनकर सामने आए। अनेक प्रतिभाओं को उन्होंने गढ़ा और सिफर से शिखर तक पहुंचाया। 

पत्रकारिता में कभी दूरदर्शन के परदे पर विनोद दुआ के साथ हर चुनाव में विश्लेषण करने वाले प्रणय रॉय का ‘वर्ल्ड दिस वीक’ अद्भुत था। जब एक परदेसी समूह के लिए चैनल प्रारंभ किया तो उसके कंटेंट पर कभी समझौता नहीं किया। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं, लेकिन एनडीटीवी ने उसूलों को नहीं छोड़ा। हर हुकूमत अपनी नीतियों की समीक्षा इस चैनल के विश्लेषण को ध्यान में रखते हुए किया करती थी। एक धड़कते हुए सेहतमंद लोकतंत्र का तकाजा यही है कि उसमें असहमतियों के सुरों को संरक्षण मिले और पत्रकारिता मुखर आलोचक के रूप में प्रस्तुत रहे। इस नजरिए से इस समूह ने हमेशा पेशेवर धर्म और कर्तव्य का पालन किया।

मेरे छियालीस साल की पत्रकारिता में एक दौर ऐसा भी आया था, जब मैं ‘आजतक’ को जन्म देने वाली एसपी सिंह की टीम का हिस्सा बना था और इस संस्था से भावनात्मक लगाव सिर्फ एसपी के कारण रहा। उनके नहीं रहने पर भी यह भाव बना रहा। दस साल बाद जब मैं ‘आजतक’ का संपादक, सेंट्रल इंडिया था तो मेरे पास एनडीटीवी समूह का खुला प्रस्ताव आया था कि अपनी पसंद का पद और वेतन चुन लूं और उनके साथ जुड़ जाऊं। तब एसपी सिंह की निशानी से मैं बेहद गहराई से जुड़ा हुआ था। इसलिए अफसोस के साथ मैंने उस प्रस्ताव को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था, पर उसका मलाल हमेशा बना रहा। एक अच्छे संस्थान की यही निशानी होती है।

प्रणय और राधिका की जोड़ी ने जिंदगी में बहुत उतार चढ़ाव देखे हैं। यह दौर भी वे देखेंगे। मैं यही कह सकता हूं कि चाहेंगे तुमको उम्र भर, तुमको न भूल पाएंगे। ऐसे शानदार और नायाब संस्थान को सलाम करिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

पत्रकारों के लिए तो ऐसे फैसले बहुत ही दुख भरे होते हैं मिस्टर मीडिया!

पत्रकारिता वही है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी नहीं झुके मिस्टर मीडिया!

इन ‘अवतारों’ का दर्शक भी अब ठगा जा रहा है, इसे समझना होगा मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: सच्चे पत्रकारों का क्या वाकई इतना अकाल है?

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शशि शेखर वेम्पति ने बताया, समय के साथ तालमेल बिठाने में क्यों विफल रहा प्रसार भारती

प्रसार भारती के पूर्व CEO शशि शेखर वेम्पति ने एक लेख में बताया कि प्रसार भारती समय के साथ तालमेल बिठाने में क्यों विफल रहा और अब अपने पैरों पर कैसे खड़ा हो सकता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 24 November, 2022
Last Modified:
Thursday, 24 November, 2022
PrasarBharati5454

प्रसार भारती अपनी स्‍थापना की रजत जयंती मना रहा है। इसका गठन वर्ष 1997 में 23 नवंबर के दिन एक सांविधिक स्‍वायत्‍त इकाई के रूप में किया गया था। इसमें दूरदर्शन और आकाशवाणी शामिल हैं। इस मौके पर प्रसार भारती के पूर्व मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी (Ex CEO) शशि शेखर वेम्पति ने एक लेख लिखा है, जिसे 23 नवंबर को ‘नवभारत टाइम्स’ में प्रकाशित किया गया है, जिसमें उन्होंने बताया कि प्रसार भारती समय के साथ तालमेल बिठाने में क्यों विफल रहा और अब अपने पैरों पर कैसे खड़ा हो सकता है। उनका ये लेख आप यहां ज्यों का त्यों पढ़ सकते हैं-

कुछ दिन पहले हुआ एक सर्वे बताता है कि कोविड-19 लॉकडाउन के समय से लेकर अभी तक लोगों का विश्वास दूरदर्शन और आकाशवाणी पर बाकी सबसे कहीं ज्यादा बना हुआ है। इसी विश्वास के साथ आज प्रसार भारती अपना रजत जयंती समारोह मना रहा है। 1997 में प्रसार भारती की स्थापना की गई थी। वैसे प्रसार भारती की पिछले 25 वर्षों की यात्रा को दो दशकों के खोए हुए अवसरों की गाथा के रूप में वर्णित किया जा सकता है, जिसका पिछले पांच वर्षों में पुनरुद्धार हुआ है। आकाशवाणी और दूरदर्शन के पूर्ववर्ती सरकारी विभागों से यह संगठन बना। फिर वैधता के लिए हुआ संघर्ष काफी हद तक बताता है कि प्रसार भारती समय के साथ तालमेल बिठाने में क्यों विफल रहा। 

एक महत्वपूर्ण गलती यह हुई कि पूर्ववर्ती एआईआर और डीडी के कर्मचारियों को इसमें सरकारी कर्मचारियों के रूप में बनाए रखा गया। अब रिटायरमेंट के करीब पर पहुंच चुके लोगों को दर्शकों की संख्या और राजस्व के लिए निजी मीडिया के साथ कॉम्पिटिशन की चुनौती दी जा रही है। 

दुनिया के सार्वजनिक प्रसारक कमाई का बड़ा हिस्सा लाइसेंस शुल्क जैसे सुनिश्चित स्रोतों से प्राप्त करते हैं, तो प्रसार भारती इसके लिए निजी क्षेत्र के साथ कॉम्पिटिशन करने में अद्वितीय है। यह सार्वजनिक सेवा प्रसारक पर व्यावसायिक रूप से प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ अपने सार्वजनिक सेवा दायित्वों के कारण भारी बोझ डालता है। एक उदाहरण के रूप में बीबीसी मुट्ठी भर चैनलों और सेवाओं का संचालन करता है, जबकि लाइसेंस शुल्क में हजारों करोड़ रुपए प्राप्त करता है। इससे उसे डीडी या आकाशवाणी की तुलना में प्रति चैनल या सर्विस बेस पर सौ गुना से अधिक निवेश करने की परमिशन मिलती है। यह एक महत्वपूर्ण अंतर है जो बीबीसी और प्रसार भारती जैसे वैश्विक सार्वजनिक प्रसारक के बीच गलत तुलना के चलते छूट गया है।

वैसे डीडी फ्री डिश- डीटीएच की कामयाबी के 4.5 करोड़ से अधिक घरों तक पहुंचने के साथ परिचालन खर्च का बोझ कुछ हद तक कम हो गया है। लेकिन लगभग 20,000 सरकारी कर्मचारियों का जो वेतन सालाना 2000 करोड़ से अधिक बैठता है, उसके लिए अनुदान सहायता के रूप में सरकार से समर्थन की आवश्यकता है। वैसे सार्वजनिक सेवा दायित्व के तहत अनिवार्य चुनाव प्रसारण से लेकर सौ से अधिक भाषाओं-बोलियों में दूरदर्शन और आकाशवाणी बाकी दुनिया में कहीं आगे हैं।

इस रजत जयंती के समय प्रसार भारती को आगे बढ़ने में कुछ चुनौतियों का सामना करना होगा-

* शानदार प्रोग्राम बनाकर दर्शकों को डिजिटल माध्यमों से आकर्षित करना होगा। संचालन को और आधुनिक बनाने के लिए पिछले पांच वर्षों के सुधार में और तेजी चाहिए।

अगले कुछ वर्षों में सालाना लगभग 2000 कर्मचारियों के रिटायर होने के कारण उनकी जगह और लोगों को लाना होगा।

नए लोगों को भी लाना एक चुनौती है, क्योंकि इसके लिए सेल्स, मार्केटिंग, डिजिटल और आईटी सहित अन्य क्षेत्रों में विशेष कार्यों के लिए प्रतिस्पर्धी, प्रफेशनल टैलंट का समावेश सुनिश्चित करना होगा।

जनशक्ति परिवर्तन को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए प्रसार भारती अधिनियम के भीतर भर्ती नियमों और प्रावधानों में संशोधन के प्रयासों को तार्किक निष्कर्ष पर ले जाना होगा।

अगले दो दशकों में सार्वजनिक प्रसारक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप रोडमैप बनाना होगा।

स्मार्टफोन पर मीडिया की खपत, ऑटोमेशन और आईटी बेस्ड सिंक्रोनाइजेशन का मैनेजमेंट करना होगा। क्लाउड बेस्ड प्रसारण मैनेजमेंट तो बदलना ही होगा, ताकि ऑन-डिमांड खपत और तेज हो सके।

प्रसार भारती को आत्मनिर्भर बनना होगा। जो चीजें मौजूद हैं, उनसे बिजनेस के नए रास्ते बनाने होंगे। डायरेक्ट टू मोबाइल ब्रॉडकास्टिंग (डी2एम) के साथ, डीडी फ्री-डिश जैसा बिजनेस मॉडल सीधे स्मार्टफोन और बाकी स्मार्ट उपकरणों पर फ्री टू एयर ब्रॉडकास्टिंग सर्विस दे सकता है। यह प्रसार भारती के लिए अगले 25 वर्षों तक खुद को आत्मनिर्भर बनाए रखने का महत्वपूर्ण जरिया है।

(साभार: नवभारत टाइम्स)

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वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष चतुर्वेदी ने बताया, क्यों हैं भारतीय टीम में बदलाव की जरूरत

कई वरिष्ठ खिलाड़ियों ने टीम के चयन पर सवाल उठाये थे। जब मुकाबला बेहद कड़ा हो, तो खिलाड़ियों का चयन बहुत अहम हो जाता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 14 November, 2022
Last Modified:
Monday, 14 November, 2022
PrabhatKhabar4548541

आशुतोष चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कहा जाता है कि इस देश पर दो बुखार ‘चुनाव और क्रिकेट’ बड़ी तेजी से चढ़ते हैं। हम सब जानते हैं कि यह देश क्रिकेट का दीवाना है, लेकिन टी-20 विश्व कप के सेमीफाइनल में इंग्लैंड से भारत की शर्मनाक हार से क्रिकेट प्रेमी निराश हैं। सभी विश्व कप में टीम से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद लगाये बैठे थे। विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में आपको हर मैच में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होता है। माना जा रहा है कि सीमित ओवरों की क्रिकेट प्रतियोगिता में यह भारतीय टीम का सबसे खराब प्रदर्शन है।

पहली बार टी-20 विश्व कप के सेमीफाइनल में कोई टीम 10 विकेट से हारी है, लेकिन यह कोई रहस्य नहीं है कि भारतीय टीम के पहले तीन-चार खिलाड़ी आप जल्दी आउट कर दीजिए, उसके बाद टीम को धराशायी होने में देर नहीं लगती है। वैसे तो टीम को तैयार करने में काफी दिनों से मशक्कत चल रही थी, लेकिन जब टीम घोषित हुई, तो पता चला कि एशिया कप में खेलने वाले ज्यादातर खिलाड़ियों को ही जगह दे दी गयी, जबकि इन खिलाड़ियों का प्रदर्शन स्तरीय नहीं रहा था।

कई वरिष्ठ खिलाड़ियों ने टीम के चयन पर सवाल उठाये थे। जब मुकाबला बेहद कड़ा हो, तो खिलाड़ियों का चयन बहुत अहम हो जाता है, पर भारतीय चयनकर्ता हमेशा से ही प्रदर्शन के बजाय नामों की चमक पर ज्यादा ध्यान देते आये हैं। राहुल द्रविड़ की अगुआई में भारतीय टीम में इतने प्रयोग हो रहे थे कि कहा जा सकता है कि भारतीय टीम प्रयोगों की कहानी बन गयी है। पता ही नहीं चलता कि कौन खिलाड़ी कब खेलेगा और क्यों खेलेगा।

यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि विश्व कप में भारतीय टीम की हार में चयनकर्ताओं की गलतियों का भी योगदान रहा है। चयनकर्ताओं ने 2021 टी-20 विश्व कप के बाद सात कप्तान बदले हैं और यह सिलसिला जारी है। इस पर चिंतन जरूरी है कि 2011 के बाद हम कोई बड़ा टूर्नामेंट क्यों नहीं जीत पाये हैं। सचिन तेंदुलकर ने कहा है कि सेमीफाइनल में इंग्लैंड के हाथों भारत की शर्मनाक हार से वह काफी निराश हैं, लेकिन उन्होंने आग्रह किया है कि टीम का आकलन एक हार के आधार पर न किया जाए।

तेंदुलकर ने कहा कि एडीलेड पर 168 रन अच्छा स्कोर नहीं था। उस मैदान पर बाउंड्री बहुत छोटी है, लिहाजा 190 के आसपास रन बनाने चाहिए थे। हमारे गेंदबाज भी विकेट नहीं ले पाये। इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल वॉन ने कहा कि भारतीय टीम ने पुरानी शैली का क्रिकेट खेला। उन्होंने लंदन के अखबार द टेलीग्राफ में लिखे अपने लेख में कहा कि टी-20 प्रतियोगिता में खेलने वाली यह भारत की सबसे कमजोर टीम है।

उनका कहना है कि इंडियन प्रीमियर लीग में खेलने वाला हर खिलाड़ी कहता है कि इससे उसके खेल में सुधार हुआ है, लेकिन भारतीय टीम को इससे क्या हासिल हुआ है। वॉन ने कहा कि भारत के पास गेंदबाजी के विकल्प बहुत कम हैं। उनकी बल्लेबाजी में भी गहराई नहीं है। एक-डेढ़ दशक पहले भारत के सभी शीर्ष बल्लेबाज गेंदबाजी कर सकते थे। सचिन तेंदुलकर, सुरेश रैना, वीरेंद्र सहवाग और यहां तक कि सौरव गांगुली भी गेंदबाजी कर लेते थे। अब कोई भी बल्लेबाज गेंदबाजी नहीं करता, इसलिए कप्तान के पास केवल पांच ही विकल्प थे।

लेग स्पिनर युजवेंद्र चहल को न खिलाने का खामियाजा भी भारत को भुगतना पड़ा। जाने-माने ऑलराउंडर कपिल देव ने मौजूदा भारतीय टीम को चोकर्स करार दिया है। चोकर्स ऐसी टीमों को कहा जाता है, जो अहम मैचों को जीतने में नाकाम रहती हैं। पिछले छह विश्व कप में भारतीय टीम पांचवीं बार नॉकआउट चरण में हार कर टूर्नामेंट से बाहर हुई है। कपिल देव ने एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहा कि वह ज्यादा कड़े शब्दों में आलोचना नहीं करेंगे, क्योंकि ये वही खिलाड़ी हैं, जिन्होंने हमें अतीत में जश्न मनाने का मौका दिया है, लेकिन हां, हम उन्हें चोकर्स कह सकते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से टीम इंडिया के लिए अंतिम मौके पर हार बड़ी समस्या बनी हुई है। टीम 2014 के टी-20 विश्व कप के फाइनल में पहुंची थी, पर श्रीलंका से हार गयी। साल 2015 और 2016 के विश्व कप में भी टीम सेमीफाइनल में हारी थी। साल 2017 के चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में भी उन्हें पाकिस्तान से बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा टीम 2019 के विश्व कप सेमीफाइनल में भी हार गयी थी। वर्ष 2021 के टी-20 विश्व कप से टीम पहले ही दौर से बाहर हो गयी थी। अब 2022 में भी भारतीय टीम एक बार फिर सेमीफाइनल में हार गयी।

जब पुरवइया हवा चलती है, तो दर्द उभर आता है। उसी तरह जब भारतीय टीम हारती है, तो महेंद्र सिंह धौनी की कमी याद आती है। पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर ने भारतीय टीम हार के बाद धौनी को याद किया है। उन्होंने कहा कि धौनी जैसा कप्तान दोबारा टीम को नहीं मिलेगा। धौनी भारत के सबसे सफल कप्तान रहे हैं। ऐसी कोई ट्रॉफी नहीं है, जो उन्होंने अपनी कप्तानी में न जीती हो।

उनकी कप्तानी में टीम ने सबसे पहले 2007 में टी-20 विश्व कप जीता, 2011 में वनडे का विश्व कप जीता और 2013 में चैंपियंस ट्रॉफी भी जीती थी। गौतम गंभीर ने कहा कि कोई खिलाड़ी आयेगा और रोहित शर्मा व विराट कोहली से ज्यादा शतक लगा देगा, लेकिन उन्हें नहीं लगता है कि कोई भी भारतीय कप्तान आईसीसी की तीनों ट्रॉफी जीत पायेगा। खेल विशेषज्ञ भी मानते हैं कि एक दौर में भारतीय टीम के लगातार टूर्नामेंट जीतने की एक बड़ी वजह धौनी की कप्तानी रही थी।

कप्तानी छोड़ने के बाद उनकी बनायी टीम अगले कुछ साल खेलती रही। नतीजतन 2018 में रोहित शर्मा की कप्तानी में भी हम एशियाई चैंपियन बनने में सफल रहे। लेकिन उसके बाद टीम का प्रदर्शन गिरता चला गया। बतौर कप्तान धौनी जानते थे कि किस खिलाड़ी का कब इस्तेमाल करना है और कैसे खिलाड़ियों पर दबाव को हावी नहीं होने देना है। उनके जाने के बाद परिदृश्य बदल गया। अब भारतीय टीम दो देशों की सीरीज तो जीत जाती है, लेकिन बड़ी प्रतियोगिताओं में हार जाती है।

अब समय आ गया है कि खिलाड़ियों के चयन में नामों की चमक के बजाय प्रदर्शन पर ध्यान दिया जाए। टी-20 युवा खिलाड़ियों का खेल है। चयनकर्ताओं को चाहिए कि वे उम्रदराज खिलाड़ियों को विश्राम दें और युवा खिलाड़ियों को खेलने का मौका दें।

(साभार: प्रभात खबर)

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पत्रकारों के लिए तो ऐसे फैसले बहुत ही दुख भरे होते हैं मिस्टर मीडिया!

स्वस्थ पत्रकारिता को समर्पित पत्रकारों के लिए ऐसे फैसले बड़े दुख भरे होते हैं। जो दुनिया भर के लिए लड़ते हैं, उनके लिए कोई नही लड़ता।

राजेश बादल by
Published - Saturday, 12 November, 2022
Last Modified:
Saturday, 12 November, 2022
rajeshbadal

राजेश बादल,  वरिष्ठ पत्रकार ।।

बड़े इरादे हमेशा कामयाब नहीं होते

फेसबुक, इंस्टाग्राम, वॉट्सऐप और ट्विटर से बड़ी तादाद में छंटनी इन दिनों सुर्खियों में है। अभिव्यक्ति के इन अंतरराष्ट्रीय मंचों में प्रबंधन की इस कार्रवाई पर अलग अलग राय व्यक्त की जा रही है। फेसबुक के कर्ता धर्ता मार्क जुकरबर्ग ने अपनी दीर्घकालिक कारोबारी नीति में खामियों को जिम्मेदार माना है। उसकी सजा पेशेवर अधिकारियों और कर्मचारियों को मिल रही है। बोलचाल की भाषा में कहें तो कंपनी के मालिकों की अक्षमता का दंड उनको मिल रहा है, जो उसके लिए दोषी नहीं हैं। यह अन्याय का चरम है। खुद जुकरबर्ग ने कहा कि उनकी योजना ने काम नहीं किया और वे स्वयं इसके लिए जिम्मेदार हैं। यह सवाल उनसे जरूर पूछा जाना चाहिए कि उनकी पेशेवर नैतिकता कहां गई। कंपनी को आर्थिक नुकसान के लिए वे अपने को दोषी मानते हैं और सजा कर्मचारियों को देते हैं।

कंपनी के मुताबिक, कोविड के लॉकडाउन काल में लोग समय काटने के लिए इन अवतारों पर देर तक टिके। इस कारण विज्ञापन बढ़े और कंपनी के कई खर्चे बचे। इससे मैनेजमेंट ने ख्याली पुलाव पकाया कि कोविड के बाद भी यही स्थिति बनी रहेगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। उसने मुनाफे के मद्दे नजर लंबी महत्वाकांक्षी योजनाएं बना लीं। जब हालात सामान्य हो गए, तो कंपनियों की कमाई घट गई। करीब साल भर ऐसा चलता रहा। तब प्रबंधन नींद से जागा और वैकल्पिक मंझोली या छोटी कारोबारी नीति तैयार करने के बजाय उसने कर्मचारियों पर गाज गिरा दी। वे समर्पित प्रोफेशनल, जिन्होंने दिन रात मेहनत करके संस्था को एक ब्रैंड बनाया, एक झटके में ही सड़क पर आ गए।

कुछ नए संस्थानों को भी ऐसा करना पड़ा। उनकी भी योजना दोषपूर्ण थी। आमतौर पर कोई पौधा जड़ों से अंकुरित होता है और फिर ऊपर जाता है। जड़ जितनी मजबूत होगी, पौधा उतना ही ऊंचे जाएगा। आप पत्तों को सींच कर पौधे को मजबूत नहीं कर सकते। लेकिन इन नई कंपनियों ने इस बुनियादी सिद्धांत का पालन नहीं किया। उन्होंने छोटे आकार से शुरुआत करके शिखर छूना गवारा नहीं किया। उन्होंने भारी भरकम निवेश से आगाज किया। पहले दिन से ही अपने आसमानी खर्चे रखे। नतीजा यह कि मुनाफा लागत के अनुपात में नहीं निकला और निवेश का धन भी समाप्त हो गया। इसलिए भी छटनी और कटौती की तलवार चल गई।

कोई पंद्रह बरस पहले एक टीवी चैनल समूह ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ के नाम से बाजार में आया। फाइव स्टार कल्चर से यह प्रारंभ हुआ और कुछ महीनों बाद मालिकों के पास वेतन देने के लिए लाले पड़ गए। चैनल बंद करना पड़ा। मैं उसमें समूह संपादक था। मेरे भी लाखों रुपए डूब गए।

मुझे याद है कि उससे भी पंद्रह साल पहले रिलायंस समूह ने हिंदी और अंग्रेजी में साप्ताहिक ‘संडे ऑब्जर्वर’ प्रारंभ किया था। शानदार शुरुआत हुई। तड़क भड़क के साथ। आज से तीस साल पहले उस अखबार में ट्रेनी पत्रकार को पांच हजार रुपए दिए जाते थे। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस भव्यता के साथ यह अखबार शुरू हुआ होगा। इसका परिणाम भी वही ढाक के तीन पात। तीन साल पूरे होते होते ताला पड़ गया।

स्वस्थ्य पत्रकारिता को समर्पित पत्रकारों के लिए ऐसे फैसले बड़े दुख भरे होते हैं। जो दुनिया भर के लिए लड़ते हैं, उनके लिए कोई नही लड़ता। कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों की डगर आसान नहीं है मिस्टर मीडिया।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

पत्रकारिता वही है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी नहीं झुके मिस्टर मीडिया!

इन ‘अवतारों’ का दर्शक भी अब ठगा जा रहा है, इसे समझना होगा मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: सच्चे पत्रकारों का क्या वाकई इतना अकाल है?

राजेश बादल ने उठाया सवाल, यह हमारी टीवी पत्रकारिता का कौन सा चेहरा है मिस्टर मीडिया!

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इंसान के रूप में फरिश्ता थे रमेश नैयर, अब ऐसे लोग कहां हैं: राजेश बादल

बयालीस-तैंतालीस साल तो हो ही गए होंगे, जब मैं रायपुर में रमेश नैयर जी से पहली बार मिला था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 07 November, 2022
Last Modified:
Monday, 07 November, 2022
ramesnayar785455

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

नहीं याद आता कि उनसे पहली बार कब मिला था, पर यह जरूर कह सकता हूं कि पहली भेंट में ही उन्होंने दिल जीत लिया था। एकदम बड़े भाई या स्नेह से भरे एक अभिभावक जैसा बरताव। निश्छल और आत्मीयता से भरपूर। आजकल तो देखने को भी नहीं मिलता।

बयालीस-तैंतालीस साल तो हो ही गए होंगे, जब मैं रायपुर में रमेश नैयर जी से पहली बार मिला था। एक शादी में रायपुर गया था। मैं उन दिनों ‘नईदुनिया’ में लिखा करता था और राजेंद्र माथुर के निर्देश पर शीघ्र ही सह संपादक के तौर पर वहां जॉइन करने जा रहा था। वहां नैयर जी और ललित सुरजन जी की शुभकामनाएं लेना मेरे लिए आवश्यक था। मैं ‘देशबंधु’ में भी तब बुंदेलखंड की डायरी लिखा करता था। नैयर साब के पास डाक से ‘नईदुनिया’ पहुंचता था और ‘देशबंधु’ तो वे पढ़ते ही थे। फिर वे मेरा आलेख पढ़कर चिट्ठी लिखकर अपनी राय प्रकट करते थे। उनके खत हौसला देते थे। फिर जहां-जहां भी गया, कभी फोन तो कभी चिट्ठी के जरिए संवाद बना रहा।

अपने उसूलों की खातिर उन्होंने कई बार नौकरियां छोड़ीं थीं और आर्थिक दबावों का सामना किया था। लेकिन कभी भी उनकी पीड़ा जबान पर नही आई। कुछ-कुछ मेरे साथ भी ऐसा ही था। जब भी मैंने अपने सरोकारों और सिद्धांतों के लिए इस्तीफे दिए तो वे नैयर साब ही थे, जो सबसे पहले फोन करके पूछते थे कि भाई घर कैसे चला रहे हो। कोई मदद की जरूरत हो तो बताओ। मैं कहता था कि जब तक आपका हाथ सिर पर है तो मुझे चिंता करने की क्या आवश्यकता है?

एक उदाहरण बताता हूं। मैं उन दिनों एक विख्यात समाचार पत्र में समाचार संपादक था। सितंबर 1991 के अंतिम सप्ताह में प्रख्यात श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी की हत्या छत्तीसगढ़ के पूंजी पतियों ने करा दी। वे मेरे मित्र भी थे। इसके बाद मेरे हाथ कुछ दस्तावेज लगे। वे संदेह की सुई सही दिशा में मोड़ते थे। मैंने आशा भाभी (श्रीमती नियोगी) से संपर्क किया। संयोग से उनके पास भी कुछ ठोस सुबूत थे। मैंने उन्हें राज्यपाल और पुलिस महानिदेशक को ज्ञापन सौंपने की सलाह दी। उन्होंने ऐसा ही किया। इसके बाद मैंने उन सारे सुबूतों और दस्तावेजों को आधार बनाकर पहले पन्ने की पट्टी (बॉटम) छह कॉलम छाप दी। छपते ही जैसे तूफान आ गया। संवाद समितियों ने मेरी खबर को आधार बनाकर देशभर में इसका विस्तार कर दिया। एक दिन बाद रात को लगभग ग्यारह बजे उन कंपनियों की ओर से एक जनसंपर्क अधिकारी आए। उनके हाथ में एक ब्रीफकेस था। उन्होंने खोलकर दिखाया तो ठसाठस नोट भरे थे। उनका कहना था कि मैं अपनी खबर का खंडन छाप दूं तो यह आपके लिए लाया हूं। मैने गुस्से पर काबू रखते हुए उन्हें दरवाजा दिखा दिया। वे बोले, सोच लीजिए। कंपनियों की पहुंच ऊपर तक है। खंडन तो छपना ही है। मैंने लगभग चीखते हुए कहा कि फिर तो आप जाइए। संपादक और मालिक को यह पैसा दे दीजिए। मैं भी देखता हूं कि सच खबर का खंडन कैसे छपता है। वे मुस्कुराए। बोले, देखिए। पैसा तो देना ही है। संपादक और मालिक को पांच लाख रुपए और बढ़ाने पड़ेंगे। मैनें उन्हें फिर एक तरह घर से निकाल दिया। उस रात मूसलाधार बरसात हो रही थी और वे भीगते हुए नोटों भरा ब्रीफकेस लेकर अपना सा मुंह लेकर लौट गए।

अगले दिन दफ्तर पहुंचा तो मालिक याने प्रबंध संपादक और संपादक ने बुलाया और बड़े प्रेम से खबर का खंडन छापने का अनुरोध किया। मैंने उन्हें रात का किस्सा बयान किया और बताया कि पूंजीपतियों का पक्ष तो छापने के लिए तैयार हूं। यह पत्रकारिता का तकाजा है। पर खंडन, वह भी अपनी खबर का, जिसके बारे में मैं सौ फीसदी आश्वस्त हूं, कैसे छाप सकता हूं। प्रबंध संपादक मुस्कुराए। बोले, वे लोग अखबार को विज्ञापनों से मदद करने के लिए तैयार हैं। आप जानते हैं कि आजकल हम आप लोगों की वेतन कितनी मुश्किल से दे पा रहे हैं। अखबार का बंटवारा हुआ है। पैसा उलझा हुआ है। मैं मुस्कुराया। रात वाले दूत की बात सच साबित हो रही थी। इसके बाद संपादक से कुछ गरमागरम संवाद हुए। वे पूंजीपतियों के दलाल की भाषा बोल रहे थे। अंततः मैंने कहा,  मेरे रहते तो खंडन नहीं छप सकता और उठकर अपनी टेबल पर आ गया। अगले दिन से संपादक ने दफ्तर आना बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि राजेश बादल की खबर का खंडन प्रकाशित होगा, मैं तभी कार्यालय आऊंगा। उनकी शर्त यह भी थी कि मुझे गलत समाचार प्रकाशित करने के लिए अखबार को माफीनामा लिखकर देना होगा। माफी नामे को पूरे संपादकीय विभाग की बैठक में पढ़कर सुनाया जाएगा। कोई भी पत्रकार ऐसी ऊटपटांग शर्त को कैसे स्वीकार कर सकता था। मेरे लिए यह इशारा काफी था । फिर भी मैं जाता रहा और संपादक घर बैठे आराम फरमाते रहे । क़रीब एक सप्ताह बीत गया । उधर खंडन नहीं छपने से पूंजीपतियों का गिरोह भी परेशान था। एक दिन मालिक याने प्रबंध संपादक ने बुलाया और कहा, राजेश! मैं तुमको खोना नही चाहता और उन संपादक के बिना समाचार पत्र चल नहीं सकता। इसलिए ऐसा कब तक चलेगा। मैंने उनसे कहा, मैं कल सुबह आपके घर आता हूं और बात करता हूं।

अगले दिन आठ अक्तूबर, 1991 को सुबह 9.20 बजे मैं उनके घर गया और इस्तीफा सौंप दिया। उन्होंने रोकने का बहुत प्रयास या अभिनय किया, पर जहां  पैसा, विवेक और सिद्धांतों पर हावी हो जाए, वहां काम करने का कोई मतलब नहीं था। बाहर निकलते हुए लोहे का दरवाजा बंद करते हुए मेरे कुछ आंसू गिरे। धुंधलाई आंखों से स्कूटर स्टार्ट करके मैं घर आ गया। मैं सड़क पर आ गया था।

मैं इस अखबार में आने से पहले राष्ट्रीय दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ में मुख्य उप संपादक था। अब सोच रहा था कि कौन सी घड़ी में त्यागपत्र दिया। मुझे प्रोविडेंट फंड का कुछ पैसा मिला था। उससे मैंने स्कूटर खरीद लिया था। अब मैं ठन ठन गोपाल था। उस दिन के बाद मेरे दुर्दिन शुरू हो गए। मेरा फोन छह सौ रुपए बिल नहीं भरने के कारण काट दिया गया। स्कूटर के पेट्रोल तक के लिए पैसे नहीं थे। यहां तक कि सब्जी खरीदने के लाले पड़ गए। अकेला रहता था। खाना खुद बनाता था। पत्रकार वार्ताओं में जाता था। चार-पांच  किलोमीटर पैदल चलकर। उन दिनों सारी पत्रकार वार्ताएं पत्रकार भवन में हुआ करती थीं। उस दौर का संघर्ष याद करके रूह कांप जाती है। यद्यपि कई अखबारों से चीफ रिपोर्टर से लेकर संपादक के पद तक के प्रस्ताव आए, मगर मैंने आठ अक्तूबर को ही फैसला ले लिया था कि अब किसी समाचार पत्र में नौकरी नहीं करूंगा। धीरे-धीरे फ्री लांसर के तौर पर काम शुरू कर दिया। वह मेरी शून्य से शुरुआत थी। संघर्ष की वह मार्मिक और घनघोर संकटों वाली दास्तान फिर कभी सुनाऊंगा। लौटता हूं रमेश नैयर जी पर।  

उस दौर में रमेश नैयर जी मेरा बड़ा संबल बने। फोन कटा था मगर आने वाले कॉल आ सकते थे। नैयर जी को न जाने कैसे इस पूरी कहानी की भनक लग गई। फिर तो प्रायः रोज ही उनके फोन आने लगे। वे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा देते। मैं सोचा करता था कि ईश्वर को किसी ने नहीं देखा, लेकिन अगर उसका कोई अंश है तो वह नैयर जी में है। राजेंद्र माथुर जी के असामयिक निधन के बाद वे मेरे सबसे बड़े शुभ चिंतक थे। याद करता हूं कि उस दौर में भोपाल के बड़े नामी गिरामी पत्रकारों ने मुझसे मिलना बंद कर दिया था, जिनका मैं आदर करता था। वे बेरुखी दिखाने लगे थे। उन पत्रकारों के प्रति मेरे मन में आज भी कोई श्रद्धा नहीं है। अब मैं केवल अधिक आयु के कारण उनका सम्मान करता हूं। उनमें से अधिकांश को उन पूंजीपतियों ने खरीद लिया था। वे उस रिश्वतखोर संपादक के साथ मंच साझा करते थे। उनकी हकीकत जानते थे। मगर मुझे कोई दुःख नहीं था। दुःख था तो यही कि जिन लोगों का पत्रकारिता के कारण सम्मान करता था, उनके मुखौटे उतर गए थे। रमेश नैयर फरिश्ते की तरह मेरी जिन्दगी में आए थे। वे उन दिनों संडे ऑब्जर्वर, हिंदी में सहायक संपादक थे। उनके अलावा राजीव शुक्ल भी ‘ऑब्जर्वर’ में थे। लगभग दस बारह बरस पहले वे और मैं ‘रविवार’ में रिपोर्टिंग कर चुके थे। एक दिन मैंने देखा कि मेरी संघर्ष समाचार कथा उसमें प्रकाशित हुई थी। उसमें  हवाला दिया गया था कि मुझे कैसे अखबार की नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा था। नैयर जी का फोन तो अब रोज ही आने लगा था। एक दिन उनका सुबह सुबह फोन आया कि आप नियमित रूप से ‘संडे ऑब्जर्वर’ के लिए लिखिए। हम आपको उतना पारिश्रमिक तो दे ही देंगे, जितनी आपकी वेतन पिछले अखबार में थी। मेरी बांछें खिल गई। मेरा पुनर्जन्म हुआ था। संडे ऑब्जर्वर से हर महीने पहले सप्ताह में पैसे आने लगे थे। नैयर जी इसके बाद मेरी हर प्रगति की हर गाथा पर नजर रखते थे। मैं भी उन्हें अपनी हर बात बताया करता था। जब तक वे संडे ऑब्जर्वर में रहे, मैं लिखता रहा। हालांकि बाद में मेरी नियति ने करवट बदली और दो तीन साल दिन रात एक करने के बाद मैं अपने सहकर्मियों को करीब लाख रुपए का पेशेवर पारिश्रमिक देने में सक्षम था। मेरी स्थिति से नैयर साब प्रसन्न थे। उनके चेहरे पर खुशी देखकर जो अहसास होता था मैं नहीं बता सकता। इसके बाद जब भी रायपुर गया, उनसे मिलने का कोई अवसर नहीं गंवाया। कोई दस बरस पहले उन्होंने अपनी किताब- धूप के शामियाने भेंट की थी। मैं भारत विभाजन के समय उनके परिवार के शरणार्थी की तरह पाकिस्तान से आने की दास्तान सुनकर हिल गया था।

आज नैयर जी की देह हमारे साथ नहीं है। पर वे मेरे साथ हमेशा रहेंगे। मेरी श्रद्धांजलि।

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