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किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

एडिटर्स गिल्ड ने इस बारे में चिंता जताई है कि पत्रकारों का एक वर्ग किसान आंदोलन के पीछे खलिस्तानी आतंकवादियों का हाथ बता रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

एडिटर्स गिल्ड ने इस बारे में चिंता जताई है कि पत्रकारों का एक वर्ग किसान आंदोलन के पीछे खलिस्तानी आतंकवादियों का हाथ बता रहा है। उसके पास कोई सुबूत नहीं है। लाखों किसान ठिठुरते मौसम में गेंहू की फसल सेवा छोड़कर कोरोना के भयावह दौर में बचाव की बंदिशों को धता बताते हुए जान जोखिम में डालकर छह महीने का राशन लेकर सड़कों पर उतरे हैं तो उनका अभिनंदन क्यों नहीं होना चाहिए? इससे तो लोकतंत्र अधिक जीवंत और स्वस्थ्य होता है। इसलिए एडिटर्स गिल्ड का अपने सरोकारों के प्रति संवेदनशील होना पूरी तरह जायज है। सवाल तो यह है कि आंदोलन को विपक्ष की साजिश और उग्रवाद-पोषित बताने वाली बेसिर पैर की पत्रकारिता की भर्त्सना कहां और किस प्लेटफॉर्म पर होनी चाहिए? 

याद आ रहा है कि एक दो दिन पहले किसान आंदोलन के बारे में वॉट्सऐप के एक समाचार समूह पर चर्चा चल रही थी। एक वरिष्ठ मीडियाकर्मी किसान आंदोलन को पहले खालिस्तानी ठहराते रहे, फिर आतंकवादियों का हाथ बताते रहे, फिर उन्होंने चीन और पाकिस्तान को जिम्मेदार बताया, इसके बाद कांग्रेस का हाथ बताया और जब उनके तरकश के सारे तीर खाली गए तो वे मुझ पर ही आक्रामक हो गए। बोले, ‘आप तो विपक्ष की भाषा बोलते हैं।’ मेरे लिए उनके हमलावर होने की वजह बेतुकी थी। सवाल यह है कि क्या एक पत्रकार को सिर्फ सरकारी जबान बोलनी चाहिए? यदि ऐसा होता तो 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने से पहले लोकनायक जेपी के आंदोलन को पत्रकारों का कोई समर्थन ही नहीं मिलता। दूसरी बात यह कि अगर पत्रकारिता विपक्ष की भाषा बोल भी रही है तो उसमें क्या कोई राजद्रोह जैसा पाप छिपा है? लोकतंत्र में चौथे स्तंभ की अवधारणा का अर्थ ही यह है जब सरकार की गाड़ी पटरी से उतरे तो उसके कान उमेठने का काम पत्रकारिता करे?

भारतीय पत्रकारिता के कालजयी संपादक राजेंद्र माथुर मानते थे कि सौ फीसदी निष्पक्षता जैसी कोई चीज नहीं होती। आखिर आपातकाल के दरम्यान पत्रकार सड़कों पर सरकार के खिलाफ ही तो उतरे थे। उसके बाद बिहार प्रेस बिल तथा मानहानि विधेयक के विरोध में भी अखबारनवीस सड़कों पर आए थे। पालेकर अवॉर्ड के लिए, भचावत और मणिसाना आयोग की सिफारिशों के लिए जब पत्रकारों ने संघर्ष छेड़ा तो उसे श्रम संगठनों, रेलवे यूनियनों और तमाम औद्योगिक कर्मचारी संगठनों ने अपना भरपूर समर्थन दिया था। राजेंद्र माथुर के मुताबिक एक संपादक या पत्रकार के पेशेवर जीवन में अक्सर निष्पक्षता पर चुनौती आती है। पत्रकारिता को कोई एक पक्ष लेने की नैतिक जिम्मेदारी बनती है। ऐसे में उसे सरकार का नहीं, बल्कि आम अवाम का पक्ष लेना चाहिए। यही पत्रकारिता का धरम है। वैसे तो इस मुल्क का अतीत गवाह है कि राष्ट्रीय संकट की घड़ी में पत्रकारिता हरदम निर्वाचित हुकूमत के साथ खड़ी रही है। चाहे वह 1962, 1965, 1971 और कारगिल की जंगें रहीं हों अथवा पोखरण में परमाणु परीक्षण, अंतरिक्ष अनुसंधानों से मिले गर्व के पल हों अथवा कोरोना जैसे भयावह दौर का मुकाबला। गुजरात का भूकंप हो या सुनामी का कहर। हर स्थिति में पत्रकारिता ने अपनी व्यवस्था का साथ दिया है। लेकिन अगर चुनी हुई सरकार गलत फैसले लेती है तो उसका विरोध भी पत्रकारिता का राष्ट्रीय कर्तव्य है। अगर हुकूमत सोचती है कि पत्रकारिता हरदम उसकी बजाई धुन पर नृत्य करती रहेगी तो यह उसकी ग़लतफहमी है। पत्रकारिता दलदल में नहीं जाए, इसके लिए जरूरी है कि वह किसी दल के दामन में नहीं बंधे मिस्टर मीडिया! 

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

  


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