माफ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर भी नहीं जानते: राजेश बादल

भगत सिंह जिसने असेंबली में बम फेंका था और हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। अगर आप भी यही जानते हैं तो माफ़ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर नहीं जानते।

राजेश बादल by
Published - Monday, 28 September, 2020
Last Modified:
Monday, 28 September, 2020
bhagat singh

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सरदार भगत सिंह का नाम ज़ेहन में आते ही एक ऐसे जोशीले नौजवान का चेहरा उभरता है, जो अकेले दम पर हिन्दुस्तान की धरती को गोरी हुकूमत से मुक्त कराने का हौसला और जज़्बा रखता था। वही भगत सिंह जिसने असेंबली में बम फेंका था और हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। अगर आप भी यही जानते हैं तो माफ़ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर नहीं जानते। आज मैं आपको भगत सिंह का वह रूप दिखाना चाहता हूं जो आपके लिए एकदम नया है। यह रूप एक ऐसे पत्रकार और लेखक का है, जो अपने विचारों के तेज़ से देश की देह में हरारत पैदा कर देता था। हम और आप को वहां तक पहुंचने के लिए कई उमरें चाहिए, जहां भगत सिंह सिर्फ़ तेईस-चौबीस साल की आयु में जा पहुंचा था।

दरअसल इंसान को संस्कार सिर्फ माता पिता या परिवार से ही नहीं मिलते। समाज भी अपने ढंग से संस्कारों के बीज बोता है। पिछली सदी के शुरुआती साल कुछ ऐसे ही थे। उस दौर में संस्कारों और विचारों की जो फसल समाज और देश में उगी,  उसका असर आज भी  कहीं कहीं दिखाई देता है। उन दिनों गोरी हुक़ूमत ने ज़ुल्मों की सारी सीमाएं तोड़ दीं थीं। देशभक्तों को कीड़े मकौड़ों की तरह मारा जा रहा था। किसी को भी फांसी चढ़ा देना सरकार का शग़ल बन गया था। ऐसे में जब आठ साल के बालक भगत सिंह ने किशोर क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा को वतन के लिए हंसते हंसते फांसी के तख़्ते चढ़ते देखा तो हमेशा के लिए करतार देवता की तरह उसके बालमन के मंदिर में प्रतिष्ठित हो गए। चौबीस घंटे करतार सिंह की तस्वीर भगत सिंह के साथ रहती थी। सराभा की फांसी के रोज़ क्रांतिकारियों ने जो गीत गाया था,  वो भगत सिंह अक्सर गुनगुनाया करता।  इस गीत की कुछ पंक्तियां थीं- 

फ़ख्र है भारत को ऐ करतार तू जाता है आज / जगत औ पिंगले को भी साथ ले जाता है आज / हम तुम्हारे मिशन को पूरा करेंगे संगियो / क़सम हर हिंदी तुम्हारे ख़ून की खाता है आज  

कुछ बरस ही बीते थे कि जलियां वाला बाग़ का बर्बर नरसंहार हुआ। सारा देश बदले की आग में जलने लगा। भगत सिंह का ख़ून खौल उठा। अवचेतन में कुछ संकल्प और इरादे समा गए। अठारह सौ सत्तावन के ग़दर से लेकर कूका विद्रोह तक जो भी साहित्य मिला, अपने अंदर पी लिया। एक एक क्रांतिकारी की कहानी किशोर भगत सिंह की ज़ुबान पर थी। होती भी क्यों न? परिवार की कई पीढ़ियां अंग्रेज़ी राज से लड़तीं आ रहीं थीं। दादा अर्जुन सिंह,  पिता किशन सिंह,  चाचा अजीत सिंह और चाचा स्वर्ण सिंह को देश के लिए मर मिटते भगत सिंह ने देखा था। चाचा स्वर्ण सिंह सिर्फ तेईस साल की उमर  में जेल की यातनाओं का विरोध करते हुए शहीद हो चुके थे। दूसरे चाचा अजीत सिंह को देश निकाला दिया गया था। दादा और पिता आए दिन आंदोलनों की अगुआई करते जेल जाया  करते थे। पिता गांधी और कांग्रेस के अनुयायी थे तो चाचा गरम दल की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे। घर में घंटों बहसें होतीं थीं। भगत सिंह के ज़ेहन में विचारों की फसल पकती रही। इसीलिए 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ा तो भगत सिंह भी दसवीं की पढ़ाई छोड़ आंदोलन में कूद पड़े थे। जब आंदोलन वापस लिया गया तो सारे नौजवानों से पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए कहा गया। तब इन नौजवानों के लिए लाला लाजपत राय ने नेशनल कॉलेज खोले। उनमें देशभक्त युवकों ने एडमिशन लिया था। ज़रा सोचिए! भगत सिंह पंद्रह-सोलह साल के थे और नेशनल कॉलेज लाहौर में पढ़ रहे थे। आज़ादी कैसे मिले- इस पर अपने शिक्षकों और सहपाठियों से चर्चा  किया करते थे। जितनी अच्छी हिन्दी और उर्दू,  उससे बेहतर अंग्रेज़ी और पंजाबी। इसी कच्ची आयु में भगत सिंह ने पंजाब में उठे भाषा विवाद पर झकझोरने वाला लेख लिखा। लेख पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने पचास  रूपए का इनाम दिया। भगत सिंह की शहादत के बाद 28 फ़रवरी,  1933 को हिंदी संदेश में यह लेख प्रकाशित हुआ था। लेख की भाषा और विचारों का प्रवाह अदभुत है। एक हिस्सा यहां प्रस्तुत है -

"इस समय पंजाब में उर्दू का ज़ोर है। अदालतों की भाषा भी यही है। यह सब ठीक है परन्तु हमारे सामने इस समय मुख्य प्रश्न भारत को  एक राष्ट्र बनाना है। एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा होना आवश्यक है,  परन्तु यह एकदम नहीं हो सकता। उसके लिए क़दम क़दम चलना पड़ता है। यदि हम अभी भारत  की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम लिपि तो एक बना देना चाहिए। उर्दू लिपि सर्वांग -संपूर्ण नहीं है। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसका आधार फारसी पर है। उर्दू कवियों की उड़ान चाहे वो हिन्दी (भारतीय) ही  क्यों न हो- ईरान के साक़ी और अरब के खजूरों तक जा पहुंचती है। क़ाज़ी नज़र -उल-इस्लाम की कविता में तो धूरजटी,  विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार बार है,  लेकिन हमारे उर्दू, हिंदी,  पंजाबी कवि उस ओर ध्यान तक न दे सके। क्या यह दुःख की बात नहीं? इसका मुख्य कारण भारतीयता और भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता  है। उनमें भारतीयता आ ही नहीं पाती,तो फिर उनके रचे गए साहित्य से हम कहां तक भारतीय बन सकते हैं? ..तो उर्दू अपूर्ण है और जब हमारे सामने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित सर्वांग-संपूर्ण हिंदी लिपि विद्यमान है, फिर उसे अपने अपनाने में हिचक क्यों? ...हिंदी के पक्षधर सज्जनों  से हम कहेंगे कि हिंदी भाषा ही अंत में एक दिन भारत की भाषा बनेगी, परंतु पहले से ही उसका प्रचार करने से बहुत सुविधा होगी।"

 

सोलह-सत्रह बरस के भगत सिंह की  इस भाषा पर आप  क्या टिप्पणी करेंगे? इतनी सरल और कमाल के संप्रेषण वाली भाषा भगत सिंह ने चौरानवे -पंचानवे साल पहले लिखी थी। आज भी भाषा के पंडित और पत्रकारिता के पुरोधा इतनी आसान हिंदी नहीं लिख पाते और माफ़ कीजिए हमारे अपने घरों के बच्चे क्या सोलह-सत्रह की उमर में आज इतने परिपक्व हो पाते हैं? नर्सरी- के जी - वन, के जी - टू के रास्ते पर चलकर इस उमर में वे दसवीं या ग्यारहवीं में पढ़ते हैं और उनके ज्ञान का स्तर क्या होता है - बताने की ज़रूरत नहीं। इस उमर तक भगत सिंह विवेकानंद, गुरुनानक, दयानंद सरस्वती, रवींद्रनाथ ठाकुर और स्वामी रामतीर्थ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों का एक-एक शब्द घोंट कर पी चुके थे। यही नहीं विदेशी लेखकों,  दार्शनिकों  और व्यवस्था बदलने वाले महापुरुषों में गैरीबाल्डी और मैजिनी, कार्ल मार्क्स, क्रोपाटकिन, बाकुनिन और डेनब्रीन तक भगत सिंह की आंखों के साथ अपना सफ़र तय कर चुके थे। उमर के इसी पड़ाव पर परंपरा के मुताबिक़ परिवार ने उनका ब्याह रचाना चाहा तो पिता जी को एक चिठ्ठी लिखकर चुपचाप घर छोड़ दिया। सोलह साल के भगत सिंह ने लिखा,

पूज्य पिता जी,

नमस्ते !

मेरी ज़िंदगी भारत की आज़ादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी ज़िंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो पूज्य बापू जी (दादा जी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है। लिहाज़ा मैं उस समय की उनकी प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं। उम्मीद है आप मुझे माफ़ कर देंगे

आपका ताबेदार

भगत सिंह 

घर छोड़कर भगत सिंह उत्तर प्रदेश के  कानपुर जा पहुंचे। महान देशभक्त पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी उन दिनों कानपुर से प्रताप का प्रकाशन करते थे। उन दिनों वे बलवंत सिंह के नाम से लिखा करते थे। उनके विचारोतेजक लेख प्रताप में छपते।  उन्हें पढ़कर लोगों के दिलो दिमाग़ में क्रांति की चिनगारी फड़कने लगती। उन्हीं दिनों कलकत्ते से साप्ताहिक ‘मतवाला’ निकलता था। ‘मतवाला’ में लिखे उनके दो लेख बेहद चर्चित हुए। एक का शीर्षक था- ‘विश्व प्रेम’। पंद्रह और बाईस नवंबर 1924  को दो किस्तों में यह लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख के एक हिस्से में देखिए भगत सिंह के विचारों की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति -

"जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शासित, अमीर-ग़रीब, छूत -अछूत आदि शब्दों का प्रयोग होता है, तब तक कहां विश्व बंधुत्व और कहां विश्व प्रेम? यह उपदेश स्वतंत्र जातियां दे सकती हैं। भारत जैसा ग़ुलाम देश तो इसका नाम भी नहीं ले सकता। फिर उसका प्रचार कैसे होगा ? तुम्हें शक्ति एकत्र करनी होगी। शक्ति एकत्रित करने के लिए अपनी एकत्रित शक्ति ख़र्च कर देनी पड़ेगी। राणा प्रताप की तरह ज़िंदगी भर दर-दर ठोकरें खानी होंगी, तब कहीं जाकर उस परीक्षा में उतीर्ण हो सकोगे ....तुम विश्व प्रेम का दम भरते हो। पहले पैरों पर खड़े होना सीखो। स्वतंत्र जातियों में अभिमान के साथ सिर ऊंचा करके खड़े होने के योग्य बनो। जब तक तुम्हारे साथ कामागाटा मारु जहाज़ जैसे दुर्व्यवहार होते रहेंगे, तब तक डैम काला मैन कहलाओगे, जब तक देश में जालियांवाला बाग़ जैसे भीषण कांड होंगे, जब तक वीरागंनाओं का अपमान होगा और तुम्हारी ओर से कोई प्रतिकार न होगा, तब तक तुम्हारा यह ढ़ोंग कुछ मानी नहीं रखता। कैसी शान्ति,   कैसा सुख और कैसा विश्व प्रेम? यदि वास्तव में चाहते हो तो पहले अपमानों का प्रतिकार करना सीखो। मां को आज़ाद कराने के लिए कट मरो। बंदी मां को आज़ाद कराने के लिए आजन्म काले पानी में ठोकरें खाने को तैयार हो जाओ। मरने को तत्पर हो जाओ।" 

मतवाला में ही भगत सिंह का दूसरा लेख सोलह मई, 1925 को बलवंत सिंह के नाम से छपा। ध्यान दिलाने की ज़रूरत नहीं कि उन दिनों अनेक क्रांतिकारी छद्म नामों से लिखा करते थे। युवक शीर्षक से लिखे गए इस लेख के एक हिस्से में भगत सिंह कहते हैं -

"अगर रक्त की भेंट चाहिए तो सिवा युवक के कौन देगा? अगर तुम बलिदान चाहते हो तो तुम्हे युवक की ओर देखना होगा। प्रत्येक जाति के भाग्य विधाता युवक ही होते हैं...सच्चा देशभक्त युवक बिना झिझक मौत का आलिंगन करता है, संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुंह पर बैठकर मुस्कुराता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फांसी के तख्ते पर हंसते हंसते चढ़ जाता है। अमेरिकी युवा पैट्रिक हेनरी ने कहा था, 'जेल की दीवारों के बाहर ज़िंदगी बड़ी महंगी है। पर, जेल की काल कोठरियों की ज़िंदगी और भी महंगी है क्योंकि वहां यह स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य रूप में चुकाई जाती है। ऐ! भारतीय युवक! तू क्यों गफ़लत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है। उठो! अब अधिक मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रहो .....धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर। तेरे पूर्वज भी नतमस्तक हैं  इस नपुंसत्व पर। यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो तो उठकर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आंसुओं की एक एक बूंद की सौगंध ले, उसका बेड़ा पार कर और मुक्त कंठ से बोल -

वंदे मातरम !

प्रताप में भगत सिंह की पत्रकारिता  को पर लगे। बलवंत सिंह के नाम से छपे इन लेखों ने धूम मचा दी। शुरुआत में तो स्वयं  गणेश शंकर विद्यार्थी  को पता नहीं था कि असल में बलवंत सिंह कौन है ? और एक दिन जब पता चला तो भगत सिंह को उन्होंने गले से लगा लिया। भगत सिंह अब प्रताप के संपादकीय विभाग में काम कर रहे थे। इन्हीं दिनों दिल्ली में तनाव बढ़ा। दंगे भड़क उठे। विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को रिपोर्टिंग के लिए दिल्ली भेजा। विद्यार्थी जी दंगों की निरपेक्ष रिपोर्टिंग चाहते थे। भगत सिंह उनकी  उम्मीदों पर खरे उतरे। प्रताप में काम करते हुए उन्होंने महान क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल की आत्मकथा बंदी जीवन का पंजाबी में अनुवाद किया। इस अनुवाद ने पंजाब में देश भक्ति की एक नई लहर पैदा की।इसके बाद आयरिश क्रांतिकारी डेन ब्रीन की आत्मकथा का अँगरेजी से हिंदी अनुवाद किया। प्रताप में यह अनुवाद आयरिश स्वतंत्रता संग्राम शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस अनुवाद ने भी देश में चल रहे आज़ादी के आंदोलन को एक वैचारिक मोड़ दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी के लाड़ले  थे भगत सिंह। उनका लिखा एक एक शब्द विद्यार्थी जी को गर्व से भर देता। ऐसे ही किसी भावुक पल में विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को भारत में क्रांतिकारियों के सिरमौर चंद्रशेखर आज़ाद से मिलाया। आज़ादी के दीवाने दो आतिशी क्रांतिकारियों का यह अदभुत मिलन था। भगत सिंह अब क्रांतिकारी गतिविधियों में भरपूर भाग लेने लगे। साथ में पूर्ण कालिक पत्रकारिता भी चल रही थी। जब गतिविधियां बढ़ीं तो पुलिस को भी शंका हुई। खुफिया चौकसी और कड़ी कर दी गई। विद्यार्थी जी ने पुलिस से बचने के लिए भगत सिंह को अलीगढ़ ज़िले के शादीपुर गांव के स्कूल में हेडमास्टर बनाकर भेज दिया। पता नहीं शादीपुर के लोगों को आज इस तथ्य की जानकारी है या नहीं। भगत सिंह शादीपुर में थे तभी विद्यार्थी जी को उनकी असली पारिवारिक कहानी पता चली थी। दरअसल भगत सिंह के घर छोड़ने के बाद उनकी दादी की हालत बिगड़ गई थी। दादी को लगता था कि शादी के लिए उनकी ज़िद के चलते ही भगत सिंह ने घर छोड़ा है। इसके लिए वो अपने को कुसूरवार मानती थीं। भगत सिंह को पता लगाने के लिए पिताजी ने अख़बारों में इश्तेहार दिए थे। ये इश्तेहार विद्यार्थी जी ने भी देखे थे,  लेकिन तब उन्हें पता नहीं था कि उनके यहां काम करने वाला बलवंत ही भगत सिंह है।बताते हैं कि इश्तेहार प्रताप में भी छपे थे। इनमें कहा गया था कि,  'प्रिय भगत सिंह अपने घर लौट आओ। तुम्हारी दादी बीमार हैं। अब तुम पर शादी के लिए कोई दबाव नहीं डालेगा। जब विद्यार्थी जी ने विज्ञापन देखा तो उनका माथा ठनका। विज्ञापन में भगत सिंह की फोटो भी छपी थी। चेहरा बलवंत सिंह से मिलता जुलता था। उन्हें लगा कि उनके यहां काम करने वाला ही असल में भगत सिंह था। इसी के बाद उन्होंने भगत सिंह के पिता को बुलाया। दोनों शादीपुर जा पहुंचे। विद्यार्थी जी ने भगत सिंह  को मनाया कि वो अपने घर लौट जाएँ।भगत सिंह विद्यार्थी जी का अनुरोध कैसे टालते। फौरन घर रवाना हो गए। दादी की सेवा की और कुछ समय बाद पत्रकारिता की पारी शुरू करने के लिए दिल्ली आ गए। दैनिक वीर अर्जुन में नौकरी शुरू कर दी। जल्द ही एक तेज तर्राट रिपोर्टर और विचारोतेजक लेखक के रूप में उनकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई। 

इसके अलावा भगत सिंह पंजाबी पत्रिका ‘किरती’ के लिए भी रिपोर्टिंग और लेखन कर रहे थे। ‘किरती’ में वे विद्रोही के नाम से लिखते थे। दिल्ली से ही प्रकाशित पत्रिका ‘महारथी’ में भी वे लगातार लिख रहे थे। विद्यार्थी जी से नियमित संपर्क बना हुआ था। इस कारण प्रताप में भी वो नियमित लेखन कर रहे थे। पंद्रह मार्च 1926 को प्रताप में उनका झन्नाटेदार आलेख प्रकाशित हुआ। एक पंजाबी युवक के नाम से लिखे गए इस आलेख का शीर्षक था - भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का परिचय और उप शीर्षक था- होली के दिन रक्त के छींटे। इस आलेख की भाषा और भाव देखिए-

"असहयोग आंदोलन पूरे यौवन पर था। पंजाब किसी से पीछे नहीं रहा। पंजाब में सिक्ख भी उठे। ख़ूब ज़ोरों के साथ। अकाली आंदोलन शुरू हुआ। बलिदानों की झड़ी लग गई।"

काकोरी केस के सेनानियों को भगत सिंह ने सलामी देते हुए एक लेख लिखा। विद्रोही के नाम से। इसमें वो लिखते हैं- "हम लोग आह भरकर समझ लेते हैं  कि हमारा फ़र्ज पूरा हो गया। हमें आग नहीं लगती। हम तड़प नहीं उठते। हम इतने मुर्दा हो गए  हैं। आज वे भूख हड़ताल कर रहे हैं । तड़प रहे  हैं। हम चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल और शक्ति दे कि  वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएं।"

जनवरी 1928 में लिखा गया यह आलेख 'किरती' में छपा था। इन दो तीन सालों में भगत सिंह ने लिखा और खूब लिखा। अपनी  पत्रकारिता के ज़रिए वो लोगों के दिलो दिमाग पर छा गए। फ़रवरी 1928 में उन्होंने कूका विद्रोह पर दो हिस्सों में एक लेख लिखा। यह लेख उन्होंने बीएस संधु के नाम से लिखा था। इसमें भगत सिंह ने ब्यौरा दिया था कि किस तरह छियासठ कूका विद्रोहियों को तोप के मुंह से बांध कर उड़ा दिया गया था। इसके भाग- दो में उनके लेख का शीर्षक था- युग पलटने वाला अग्निकुंड। इसमें वो लिखते हैं  - "सभी आंदोलनों का इतिहास बताता है कि आज़ादी के लिए लड़ने वालों का एक अलग ही वर्ग बन जाता है,  जिनमें न दुनिया का मोह होता है और न पाखंडी साधुओं जैसा त्याग। जो सिपाही तो होते थे,  लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नहीं,  बल्कि अपने फ़र्ज़ के लिए निष्काम भाव से लड़ते मरते थे। सिख इतिहास यही कुछ था। मराठों का आंदोलन भी यही बताता है। राणा प्रताप के साथी राजपूत भी ऐसे ही योद्धा थे और बुंदेलखंड के वीर छत्रसाल और उनके साथी भी इसी मिट्टी और मन से बने थे"। 

यह थी भगत सिंह की पढ़ाई। बिना संचार साधनों के देश के हर इलाक़े का इतिहास भगत सिंह को कहां से मिलता था- कौन जानता है? मार्च से अक्टूबर 1928 तक किरती में ही उन्होंने एक धारावाहिक श्रृंखला लिखी। शीर्षक था आज़ादी की भेंट शहादतें । इसमें भगत सिंह ने बलिदानी क्रांतिकारियों की गाथाएं लिखीं थी। इनमें एक लेख मदनलाल धींगरा पर भी था। इसमें  भगत सिंह के शब्दों का कमाल देखिए- "फांसी के तख़्ते पर खड़े मदन से पूछा जाता है - कुछ कहना चाहते हो ? उत्तर मिलता है - वन्दे मातरम ! मां ! भारत मां तुम्हें नमस्कार और वह वीर फांसी पर लटक गया। उसकी लाश जेल में ही दफ़ना दी गई। हम हिन्दुस्तानियों को  दाह क्रिया तक नहीं करने दी गई। धन्य था वो वीर। धन्य है उसकी याद। मुर्दा देश के  इस अनमोल हीरे को बार बार प्रणाम। भगत सिंह की पत्रकारिता का यह स्वर्णकाल था। उनके लेख और रिपोर्ताज़ हिन्दुस्तान भर में उनकी कलम का डंका बजा रहे थे। वो जेल भी गए तो वहां से उन्होंने लेखों की झड़ी लगा दी। लाहौर के साप्ताहिक वन्दे मातरम में उनका एक लेख पंजाब का पहला उभार प्रकाशित हुआ। यह जेल में ही लिखा गया था। इसकी भाषा उर्दू थी। इसी तरह किरती में तीन लेखों की लेखमाला अराजकतावाद प्रकाशित हुई। इस लेखमाला ने  व्यवस्था के नियंताओं के सोच पर हमला बोला। उनीस सौ अट्ठाइस में तो भगत सिंह की कलम का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोला। ज़रा उनके लेखों के शीर्षक देखिए- धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम,  साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज,  सत्याग्रह और हड़तालें,  विद्यार्थी और राजनीति,  मैं नास्तिक क्यों हूं, नए नेताओं के अलग अलग विचार और अछूत का सवाल जैसे रिपोर्ताज़ आज भी प्रासंगिक हैं।इन दिनों दलितों की समस्याएं और धर्मांतरण के मुद्दे देश में गरमाए हुए हैं,  लेकिन देखिए भगत सिंह ने 90  साल पहले इस मसले पर क्या लिखा था- "जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया बीता समझोगे तो वो ज़रूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे। उन धर्मों में उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे,  उनसे इंसानों जैसा व्यवहार किया जाएगा फिर यह कहना कि देखो जी ईसाई और मुसलमान हिन्दू क़ौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं,  व्यर्थ होगा। कितनी सटीक टिप्पणी है ? एकदम तिलमिला देती है।"

इसी  तरह एक और टिप्पणी देखिए- "जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमें फसाद हो रहे हैं । हर कोई उन्हें अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग और संगठित ही क्यों न हो जाएं? हम मानते हैं  कि उनके अपने जन प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगें। उठो ! अछूत भाइयो उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोबिंद सिंह की असली ताक़त तुम्ही थे। शिवाजी तुम्हारे भरोसे ही कुछ कर सके। तुम्हारी क़ुर्बानियां स्वर्ण अक्षरों में लिखीं हुईं हैं। संगठित हो जाओ। स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिलेगा। तुम दूसरों की खुराक न बनो। सोए हुए शेरो ! उठो और बग़ावत खड़ी कर दो। 

इस तरह लिखने का साहस भगत सिंह ही कर सकते थे। गोरी हुक़ूमत  ने चांद के जिस ऐतिहासिक फांसी अंक पर पाबंदी लगाईं थी,  उसमें भी भगत सिंह  ने छद्म नामों से अनेक आलेख लिखे थे। इस अंक को भारतीय पत्रकारिता की गीता माना जाता है।और अंत में उस पर्चे का ज़िक्र,  जिसने गोरों की चूलें हिला दी थीं। आठ अप्रैल, 1929  को असेम्बली में बम के साथ जो परचा फेंका गया,  वो भगत सिंह ने ही अपने हाथों से लिखा था। यह परचा कहता है - बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है... जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियमेंट का पाखंड छोड़कर अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ क्रांति के लिए तैयार करें... हम अपने विश्वास को दोहराना चाहते हैं  कि व्यक्तियों की हत्या करना सरल है,  लेकिन विचारों की हत्या नहीं की जा सकती। 

इंक़लाब ! ज़िंदाबाद ! 

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मीडिया की आजादी और अंकुश की सीमा पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने यूं रखी ‘मन की बात’

एक बार फिर गंभीर विवाद। प्रिंट, टीवी चैनल, सीरियल, फिल्म, सोशल मीडिया को कितनी आजादी और कितना नियंत्रण? सरकार, प्रतिपक्ष और समाज कभी खुश, कभी नाराज।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 25 January, 2021
Last Modified:
Monday, 25 January, 2021
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

एक बार फिर गंभीर विवाद। प्रिंट, टीवी चैनल, सीरियल, फिल्म, सोशल मीडिया को कितनी आज़ादी और कितना नियंत्रण? सरकार, प्रतिपक्ष और समाज कभी खुश, कभी नाराज। नियम-कानून, आचार संहिताएं,पुलिस व  अदालत के सारे निर्देशों के बावजूद समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ रही हैं। सूचना संसार कभी सुहाना, कभी भूकंप की तरह डगमगाता, कभी ज्वालामुखी की तरह फटता दिखाई देता है। आधुनिकतम टेक्नोलॉजी ने नियंत्रण कठिन कर दिया है। सत्ता व्यवस्था ही नहीं, अपराधी-

माफिया, आतंकवादी समूह से भी दबाव, विदेशी ताकतों का प्रलोभन और प्रभाव सम्पूर्ण देश के लिए खतरनाक बन रहा है। इन परिस्थितियों में विश्वसनीयता तथा भविष्य की चिंता स्वाभाविक है।

मुंबई उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों मीडिया को लेकर लगभग ढाई सौ पृष्ठों का ऐतिहासिक फैसला  दिया है, जिस पर स्वयं मीडिया ने प्रमुखता से नहीं बोला, दिखाया और प्रकाशित किया। सिने कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की मौत की घटना के संबंध में आशंकाओं एवं दो टीवी न्यूज चैनल्स की कवरेज पर दायर जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जी.एस कुलकर्णी ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। सबसे अच्छी बात यह है कि मीडिया की कवरेज पर कई आपत्तियों को रेखांकित करने के बावजूद उन्होंने स्वतंत्रता पर प्रहार कर कोई सजा नहीं दी। उन्होंने मीडिया की स्वतंत्रता और सीमाओं की विस्तार से व्याख्या कर कुछ मार्गदर्शी नियम भी सुझाए हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि सुशांत सिंह प्रकरण में मीडिया की व्यापक कवरेज से प्रामाणिक तथ्यों के लिए सीबीआई की जांच संभव हुई। पुलिस के कामकाज और राजनेताओं की विश्वसनीयता कम होने से परिवार और समाज ऐसे मामलों में विस्तार से जांच चाहता है। पिछले दशकों में जेसिका लाल और प्रियदर्शिनी हत्याकांड में मीडिया कवरेज से अपराधियों को दण्डित करवाने में सहायता मिली। आरुषि तलवार हत्याकांड को भी मीडिया ने बहुत जोर से उठाया, लेकिन मीडिया के एक वर्ग ने जांच एजेंसी और अदालत से पहले निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी भी कर दी। यही बात भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में लगातार हो रही है। समुचित प्रमाणों के बिना सीधे किसी नेता, अधिकारी अथवा व्यक्ति और संस्था को दोषी बताना अदालत कैसे उचित मानेगी?

हाल के वर्षों में सत्ताधारियों द्वारा कुछ खास लोगों, पूंजीपतियों और कंपनियों को लाभ पहुंचाने के कई गंभीर आरोप सामने आए। संभव है कुछ सही भी हों। पर्याप्त प्रमाण अदालत तक पहुंचने पर दोषियों को दण्डित भी किया गया है। अन्यथा लालू यादव, ओमप्रकाश चौटाला जैसे नेता जेल में नहीं बैठे होते। इन्हें सजा मिलने में देरी अवश्य हुई और वे आज भी अपने अपराध स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। यही नहीं, हम जैसे पत्रकारों ने उनके कारनामों को प्रमाण सहित उजागर किया था  तो हमें ही पूर्वाग्रही बताकर उनके समर्थकों ने हमले किये थे। नीरव मोदी देश से भाग जरूर गया, लेकिन ब्रिटेन की जेल में बंद है। इन दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राफेल विमान खरीदी से लेकर किसानों के लिए संसद से पारित कानूनों के आधार पर केवल चार-पांच पूंजीपतियों को सारा मुनाफा, किसानों की सारी जमीन देने, हर निर्माण में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप निरंतर कुप्रचारित करने का माध्यम बनने से न केवल सामान्य जनता के बीच, वरन पूरी दुनिया में भारतीय व्यवस्था को बदनाम किया जा रहा है।

केवल प्रतिपक्ष के बयान कहकर क्या मीडिया अपनी मर्यादा और आचार संहिता के पालन से बच सकता है? यह वैसा ही है, जैसे कोई डॉक्टर किसी नेता के बयान या सलाह के आधार पर क्लिनिक में आए व्यक्ति का ऑपरेशन और इलाज करने लगे अथवा अदालतें प्रमाण के बिना सजा सुनाने लगे। हां, जिन आरोपों के प्रमाण उपलब्ध हों, उन्हें रिपोर्ट की तरह पेश कर कानूनी कार्रवाई और सजा का काम अदालत पर ही छोड़ा जाना चाहिए।

मीडिया की समस्या बढ़ने का एक कारण यह भी है कि तथ्य, खबर को आरोपात्मक टिप्पणियों के घालमेल के साथ पाठक और दर्शकों के सामने रख दिया जाता है। दूसरे गंभीर मुद्दे को अधिक प्रसार के लोभ में सनसनीखेज ढंग से उछाला जाता है। अमेरिका अथवा यूरोप में खोजी खबर के लिए महीनों तक दस्तावेजों को जुटाकर क़ानूनी राय लेकर प्रस्तुत किया जाता है। अपने देश में अधिकांश सूचनाएं किसी पक्ष या व्यक्ति विशेष के अपने निहित उद्देश्य से मिली होती हैं अथवा जांच पड़ताल के लिए समय और धन खर्च नहीं किया जाता है। यही कारण है कि सुशांत सिंह मामले में न्यायाधीशों ने मृत व्यक्ति के चरित्र हनन जैसे आरोपों के प्रसारण को अनुचित बताया। उनका यह निर्देश सही है कि ऐसे मामलों में तथ्य सार्वजनिक किए जा सकते हैं, लेकिन उन पर कुछ लोगों को बिठाकर टीवी बहस आरोपबाजी अनुचित है।  उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि ब्रिटेन में केबल टीवी एक्ट का प्राधिकरण है। भारत में जब तक ऐसी नियामक संस्था नहीं हो, तब तक भारतीय प्रेस परिषद् द्वारा निर्धारित नियमों, आचार संहिता का पालन टीवी-डिजिटल मीडिया में भी किया जाए।

संभवतः माननीय अदालत को यह जानकारी नहीं होगी कि फिलहाल प्रिंट मीडिया का प्रभावशाली वर्ग ही प्रेस परिषद् के नियम-संहिता की परवाह नहीं कर रहा है, क्योंकि उसके पास दंड देने का कोई अधिकार नहीं है, जबकि प्रेस परिषद् के अध्यक्ष

सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायाधीश ही होते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान में हर नागरिक के लिए है। पत्रकार उसी अधिकार का उपयोग करते हैं। समाज में हर नागरिक के लिए मनुष्यता, नैतिकता, सच्चाई और ईमानदारी के साथ कर्तव्य के सामान्य सिद्धांत लागू होते हैं। पत्रकारों पर भी वह लागू होने चाहिए। सरकार से नियंत्रित कतई नहीं हों, लेकिन संसद, न्यायपालिका और पत्रकार बिरादरी द्वारा बनाई गई पंचायत यानी मीडिया परिषद् जैसी संस्था के मार्गदर्शी नियम, लक्ष्मण रेखा का पालन तो हो।

न्यायपालिका के सामने एक गंभीर मुद्दा भी उठाया जाता रहा है कि मानहानि कानून का दुरुपयोग भी हो रहा है, जिससे ईमानदार मीडियाकर्मी को नेता, अधिकारी या अपराधी तंग करते हैं। अदालतों में मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि समय रहते सरकार, संसद, न्यायपालिका, मीडिया नए सिरे से मीडिया के नए नियम-कानून, आचार संहिता को तैयार करे। नया मीडिया आयोग, मीडिया परिषद् बने। पुराने गोपनीयता अथवा मानहानि के कानूनों की समीक्षा हो। तभी तो सही अर्थों में भारतीय गणतंत्र को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ साबित किया जा सकेगा। गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं सहित।

(यह लेखक के निजी विचार हैं) 

(लेखक एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय प्रेस परिषद् के पूर्व सदस्य हैं। नवभारत टाइम्स,  हिंदुस्तान, नई दुनिया, दैनिक भास्कर, आउटलुक हिंदी सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में संपादक रहे हैं। पद्मश्री और गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी सम्मानित हैं|)

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इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

भारतीय पत्रकारिता के तमाम रूपों में इस नेक व्यवसाय की आड़ में ऐसी ढेरों कलंक कथाएं बिखरी पड़ी हैं।

राजेश बादल by
Published - Friday, 15 January, 2021
Last Modified:
Friday, 15 January, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक कारोबारी चैनल के लोकप्रिय एंकर को पेशागत बेईमानी के लिए जिम्मेदार पाया है। पूरी पड़ताल के बाद पता चला कि इस एंकर ने पत्रकारिता की आड़ में अपने धंधे का विस्तार किया और शेयरों की खरीद-फरोख्त के जरिये करोड़ों रुपये कमाए। अब ये रुपये इस एंकर को लौटाने होंगे। सेबी ने एंकर और उसके परिवार के दो सदस्यों पर शेयर व्यापार की वित्तीय बंदिशें भी लगा दी हैं। त्वरित कार्रवाई करते हुए चैनल प्रबंधन ने एंकर को नौकरी से निकाल दिया है। निश्चित रूप से इस कार्रवाई का स्वागत किया जाना चाहिए। यह मामला जांच की मांग करता है क्योंकि भारतीय पत्रकारिता के तमाम रूपों में इस नेक व्यवसाय की आड़ में ऐसी ढेरों कलंक कथाएं बिखरी पड़ी हैं। मेरी दृष्टि में इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में अपने किस्म का यह अनूठा मामला सा लगता है, मगर तमाम कारोबारी चैनलों और समाचारपत्रों में व्यापार डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों-संपादकों के लिए इस खबर पर चौंकने जैसी कोई नई जानकारी नहीं है। बिजनेस कवर करने वाले अधिकांश पत्रकारों की प्रतिक्रिया यही है कि इसमें नया क्या है? इस प्रोफेशन में तो ऐसा होता है अथवा वर्षों से हो रहा है। यानी शेयर की सूचना होने और उसके आधार पर खरीदने-बेचने वाली प्रक्रिया भले ही न अपनाई जाए, मगर यह भी सच है कि बिजनेस कवर करने वाले तमाम पत्रकारों के पास वेतन के अतिरिक्त कमाई करने के अनेक रास्ते होते हैं। वे अपनी पत्रकारिता का इस्तेमाल अपने बैंक बैलेंस को गुब्बारे की तरह फुलाने में करते हैं। इसे एक तरह से छल की श्रेणी में रखा जाना चहिए। सेबी जैसी संस्था ने शुचिता बनाए रखने के लिए झटपट फ़ैसला लिया, किन्तु पत्रकारिता का सहारा लेकर अनेक क्षेत्रों में अभी भी यह धड़ल्ले से चल रहा है। व्यक्तिगत मुनाफे को न देखें तो टीआरपी घोटाला भी इसी प्रकार की कालिख कहानी है। वह संस्थान की ओर से प्रोत्साहित करने वाली साज़िश है।

पत्रकारिता में इस प्रवृति का प्रवेश दशकों पहले ही हो गया था । तब समाचार पत्र की अन्य डेस्क के पत्रकार बिजनेस डेस्क के संवाददाताओं/संपादकों की तरफ़ बड़ी ईर्ष्या भरी नजरों से देखा करते थे। लगभग हर रिपोर्टर कारोबारी रिपोर्टिंग की बहती गंगा में हाथ धोना चाहता था। जब पत्रकारों का औसत वेतन हजार रुपये भी नहीं होता था तो वाणिज्य, खेल, सिनेमा और महानगरों के सिटी डेस्क पर काम करने वाले तमाम लोग महीने भर का वेतन यूं ही कमा लेते थे। कोई मिट्टी मोल जमीन खरीद लेता तो कोई सोना-चांदी। किसी को बिना मूल्य चुकाए फ्लैट की चाबी मिल जाती तो कोई महंगी कार का मालिक बन जाता था। इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है। क्या पेशे की आड़ में चल रहा गोरखधंधा कभी रुकेगा मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

इस ओर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन भारी ब्लंडर हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

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मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

अजब दौर है। भारतीय पत्रकारिता का अंधकार युग। कब तक चलेगा? कोई नहीं जानता। विचार और निरपेक्ष-निर्भीक विश्लेषण की क्षमता खोते जाने का नतीजा क्या होगा।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 29 December, 2020
Last Modified:
Tuesday, 29 December, 2020
rajeshbadal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।। 

अजब दौर है। भारतीय पत्रकारिता का अंधकार युग। कब तक चलेगा? कोई नहीं जानता। विचार और निरपेक्ष-निर्भीक विश्लेषण की क्षमता खोते जाने का नतीजा क्या होगा। पत्रकारिता के मूक और चौपाया युग की ओर बढ़ते जाने का अर्थ यही है कि मूल्यों और सरोकारों की संचित निधि का खजाना अब रीतने वाला है और हमारे पास दोबारा उस पात्र को लबालब भरने की कोई सूरत नहीं दिखाई देती। आपस की होड़ और गलाकाट और रंजिश भरे माहौल ने सोचने पर विवश कर दिया है कि अतीत की गौरवशाली परंपराओं को भूलकर आने वाली नस्लों के लिए हम क्या छोड़कर जा रहे हैं?

जब भारत में प्रेस काउंसिल का गठन हुआ, तब भी पत्रकारिता में कोई निर्मल गंगा की धारा नहीं बहती थी, लेकिन उन दिनों इस पेशे में अपने समर्पण और सेवा भाव से काम करने वालों की तादाद इतनी अधिक थी कि रास्ते से भटकने के इक्का दुक्का उदाहरण ही सामने आते थे। इसी कारण प्रेस काउंसिल को अधिक ताकतवर और अधिकार संपन्न बनाने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। साल में एकाध नमूना ही देखने को मिलता था, जब यह शिखर संस्था किसी संपादक या संस्थान की भर्त्सना या निंदा करती थी। निंदा का यह निर्णय बड़ा अभूतपूर्व होता था। वह संपादक या संस्थान एक तरह से जग-हंसाई का केंद्र बन जाता था। प्रेस काउंसिल के निंदा करने का अर्थ ही भरे चौराहे पर निर्वस्त्र कर देने जैसा होता था। पत्रकार और संपादक इस संस्था से खौफ खाते थे। इसके मुखिया निर्विवाद और निष्पक्ष हुआ करते थे। उनकी एक टिप्पणी साल भर तक चर्चा का विषय बनी रहती थी। वह पत्रकारिता संस्था अरसे तक एक नैतिक अपराध बोध से ग्रस्त रहती थी, लेकिन बाद के वर्षों में क्या हुआ? पत्रकारिता के नए नए अवतार आते गए और हम स्वभाव से पत्रकार कम, चतुर व्यापारी, निरंकुश, बेशर्म और खूंखार अधिक होते गए। अत्याधुनिक संचार साधनों, तकनीक, बाजार और सियासत ने हमें अपना गुलाम बना लिया। यह गुलामी अंग्रेजी राज से कहीं ज्यादा खतरनाक और भयानक है, क्योंकि यह हमारे अपने आजाद तंत्र में विकसित हुई है। इसके लिए हम गोरी हुकूमत को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। पहले इस गुलामी ने हमें आर्थिक जंजीरों से जकड़ा, फिर उसकी चाबी राजनीति के पैरोकारों को दे दी। अब छटपटाहट ही नियति बन गई है। चाहकर इस जाल से बाहर निकलना हमारे बूते से बाहर है, तो क्या हिन्दुस्तान की पत्रकारिता इसी तरह बेड़ियों में रहेगी?

हम जानते हैं कि सत्ता पर काबिज कोई भी पार्टी अपनी आलोचना के तीखे स्वर बर्दाश्त नहीं कर सकती। इसलिए वह लगातार पत्रकारिता पर अंकुश लगाने की कोशिश करती है। पहले वह लालच की रोटियां इस व्यवसाय (अप्रिय किन्तु आज के हाल के लिए सही शब्द) पर फेंकती है। मालिक और पेशेवर पत्रकार- संपादक उसमें फंस जाते हैं। इस पर भी बात नहीं बनती तो वह सियासी सुविधाओं का लालच देती है। उसका भी असर न हो तो वह आपस में लड़ाती है। तरकश के सारे तीर बेकार हो जाएं तो वह उत्पीड़न और अत्याचार का अंतिम हथियार चलाती है। आज की पत्रकारिता में परदे के पीछे की यही कहानी है। 

तो अब क्या किया जाए?  इसके बाद भी हमें निर्वाचित सरकार की ओर ही ताकना पड़ेगा। वह भारतीय संविधान से बंधी है। प्रेस काउंसिल जब अस्तित्व में आई, तब केवल अखबार ही पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करते थे। रेडियो तब सरकारी नियंत्रण में था। इसके बाद टेलिविजन, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के कई प्लेटफॉर्म समाज के दिलो दिमाग पर छा गए। अब प्रेस काउंसिल हाथी के दांत जैसी रह गई है। उसके दायरे में नए अवतार नहीं आते। अब एक सशक्त, सर्वांग, संपूर्ण और शक्तियों से लबरेज मीडिया काउंसिल की दरकार है। हम यह भी जानते हैं कि बीते चालीस-पैंतालीस साल में सरकार की ओर से आचार संहिता थोपे जाने का लगातार विरोध करते रहे हैं। मगर अब हालात बेकाबू हो रहे हैं तो सुप्रीम कोर्ट के किसी निष्पक्ष न्यायाधीश (निष्पक्षता का पैमाना कैसे तय होगा) की अगुआई में तत्काल इसका गठन हो। यह सीधे राष्ट्रपति को रिपोर्ट करे। काउंसिल में पत्रकार हों, वकील हों, बुद्धिजीवियों के प्रतिनिधि हों और स्वयंसेवी संगठन भी हों। उनकी छवि विवादों से परे हो, तभी इस तरह की आला संस्था काम कर पाएगी। देखते हैं बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो चौथे स्तंभ की साख पर घने काले बादल तो मंडरा ही रहे हैं मिस्टर मीडिया!  

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यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

लगातार दो दिन। दिल दहलाने वालीं वीभत्स और जघन्य तस्वीरें अखबारों के पन्नों पर छपीं। एक घटना राजस्थान की थी।

राजेश बादल by
Published - Monday, 14 December, 2020
Last Modified:
Monday, 14 December, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

लगातार दो दिन। दिल दहलाने वालीं वीभत्स और जघन्य तस्वीरें अखबारों के पन्नों पर छपीं। एक घटना राजस्थान की थी। उसमें एक स्कूल शिक्षिका दुपहिया वाहन पर स्कूल जा रही थी। अचानक हाईटेंशन लाइन वाला तार उस पर आ गिरा। शिक्षिका धू-धू कर जलने लगी। देखते ही देखते उसने सबके सामने छटपटाते हुए दम तोड़ दिया। कोई बचाव के लिए नहीं आया। लोग दर्शक बने चुपचाप देखते रहे। उल्टे प्रेस फोटोग्राफर ने जलती महिला की तस्वीरें क्लिक कीं और एक राष्ट्रीय अखबार ने छाप दीं। बड़ी-तीन कॉलम में। उसके अगले दिन फिर एक ऐसी ही तस्वीर। वह भी राजस्थान से ही। एक सड़क दुर्घटना में कई लोग कुचलकर मर गए। वे जीप में सवार थे। इनमें तीन नवविवाहित युगल थे। अखबार ने क्लोज अप में उन कुचले-पिचले शवों की बड़ी तस्वीर प्रकाशित कीं। खौफनाक और बेहद दर्दनाक। एक पाठक होने के नाते कह सकता हूं कि सपने में भी कोई ऐसी फोटो समाचार पत्र के पन्नों में सुबह-सुबह देखना पसंद नहीं करेगा।

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं? जैसे-जैसे पत्रकार आधुनिक, साक्षर और विचारवान होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे अधिक अभद्र,शर्मनाक़ तथा बेशर्म पत्रकारिता के बियाबान में भटकते जा रहे हैं। क्या किसी सभ्य लोकतंत्र में चौथे स्तंभ का यह बरताव जिम्मेदार कहा जा सकता है? हम अनेक अवसरों पर पाश्चात्य और यूरोपीय संस्कृति तथा सोच का उपहास उड़ाते हुए भारतीय संस्कृति पर गर्वबोध करते दिखाई देते हैं। लेकिन यह भी सच है कि पश्चिम और यूरोप के मुल्कों में अखबार के पन्नों और चैनलों में तस्वीरें तथा वीडियो नहीं दिखाए जाते और न ही वहां के दर्शक-पाठक इसे पसंद करते हैं। उनकी पत्रकारिता इस मामले में हमारी पत्रकारिता से बेहतर और साफ सुथरी है। हम किस मुंह से सामाजिक सरोकारों वाली पत्रकारिता की बात करें?

करीब पैंतीस-चालीस साल पहले समाचार पत्रों की गैरजिम्मेदार पत्रकारिता के खिलाफ वातावरण बना था और अखबारों में आंतरिक लोकपाल की व्यवस्था पर जोर दिया जाने लगा था। मैं उन दिनों एक राष्ट्रीय समाचार पत्र समूह में मुख्य उप संपादक था। उस समूह ने अपनी प्रेरणा से लोकपाल की नियुक्ति भी की थी। कुछ साल तक अखबारनवीसी में शुचिता और नैतिकता की गंध पन्नों पर पसरी नजर आई। थोड़े दिन ही सिलसिला चला और यह गंध कपूर की तरह उड़ गई। बाद में वही ढाक के तीन पात। इसके बाद उपग्रह क्रांति हुई। खबरें, फोटो और वीडियो पलक झपकते समंदर पार पहुंचने लगे तो समाचार दर्शकों-पाठकों तक जल्द भेजने की होड़ में उचित-अनुचित, जायज-नाजायज, नैतिक-अनैतिक कंटेंट परोसा जाने लगा। अब किसी भी स्तर पर कोई छन्नी लगी नहीं दिखाई देती। इसके भयावह परिणाम दिखाई देने लगे हैं।

टेलिविजन चैनलों में फूहड़पन, अतिरंजित और अश्लीलता भरी सामग्री रोकने के लिए प्रेस काउंसिल जैसी कोई संस्था नहीं है, मगर अखबारों के लिए तो यह एजेंसी सिर्फ हाथी का दांत साबित हुई है। तो इस तरह की क्रूर, अमानवीय और लोमहर्षक सामग्री का प्रकाशन रोकने की जिम्मेदारी कौन लेगा? डर है कि अगर यह क्रम जारी रहा तो एक दिन पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में भी कहीं यह डरावना अध्याय न पढ़ाया जाने लगे मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

इस ओर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन भारी ब्लंडर हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

अरनब की गिरफ्तारी पर बोले वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल, अनुचित था पुलिस का यह तरीका

सरकार की गोद में बैठना या हरदम तलवार तानना संतुलित पत्रकारिता नहीं मिस्टर मीडिया!

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देश की बेहतरी में मीडिया का इस्तेमाल कैसे करें, सीखने की जरूरत: श्रीपाद नाईक

यह विचार रक्षा राज्य मंत्री श्रीपाद नाईक ने गुरुवार को भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा सैन्य अधिकारियों के लिए आयोजित मीडिया संचार पाठ्यक्रम के समापन समारोह में व्यक्त किए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 11 December, 2020
Last Modified:
Friday, 11 December, 2020
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'भारत विरोधी ताकतों से निपटने में मीडिया की अहम भूमिका है। इसलिए मीडियाकर्मियों सहित हम सभी की यह जिम्मेदारी है कि भारत विरोधी ताकतें हमारे देश के खिलाफ मीडिया का दुरुपयोग न कर पाएं।' यह विचार रक्षा राज्य मंत्री श्रीपाद नाईक ने गुरुवार को भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा सैन्य अधिकारियों के लिए आयोजित मीडिया संचार पाठ्यक्रम के समापन समारोह में व्यक्त किए।

इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, अपर महानिदेशक (प्रशासन) के. सतीश नंबूदिरीपाड व अपर महानिदेशक (प्रशिक्षण) ममता वर्मा भी उपस्थित थीं।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के तौर पर पर बोलते हुए श्रीपाद नाईक ने कहा कि आज जब फेक न्यूज और हेट न्यूज का चलन बढ़ रहा है, तब मीडिया साक्षरता की आवश्यकता प्रत्येक व्यक्ति को है। न्यू मीडिया के इस दौर में सिर्फ संचारकों के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए मीडिया साक्षरता अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आज जब लगभग हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफोन है, तब मीडिया के दुरुपयोग की संभावना कई गुना बढ़ गई है और इसे केवल मीडिया साक्षरता के माध्यम से ही नियंत्रित किया जा सकता है।

रक्षा राज्य मंत्री के अनुसार, मीडिया साक्षरता से हमें उस मनोवैज्ञानिक युद्ध का मुकाबला करने में भी मदद मिलेगी, जिसे आज हम पूरी दुनिया में देख रहे हैं। हमें भारत विरोधी ताकतों द्वारा एक उपकरण के रूप में अपनाए जा रहे इस मनोवैज्ञानिक युद्ध से सचेत रहना होगा। हमें यह सीखना होगा कि देश और देशवासियों की बेहतरी के लिए मीडिया की ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाए।

नाईक ने कहा कि भारतीय रक्षा बलों का साहस, वीरता, प्रतिबद्धता और समर्पण अद्वितीय है। लेकिन देश में कुछ ऐसे तत्व हैं, जो भारतीय सेना की छवि को धूमिल करने के लिए चौबीस घंटे सक्रिय रहते हैं। हम सही मीडिया दृष्टिकोण अपनाकर और संगठित तरीके से विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करके रक्षा बलों के खिलाफ ऐसे शातिर अभियानों का मुकाबला कर सकते हैं।

इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि आज पूरा विश्व कोरोना महामारी का सामना कर रहा है। कोरोना के इस दौर में एक शब्द अत्यंत प्रचलित हुआ है और उसके अनेक परिणाम और दुष्परिणाम भी देखने को मिले हैं। ये शब्द है - ‘इन्फोडेमिक (Infodemic)’। इस शब्द का तात्पर्य अतिशय सूचना या आम बोलचाल की भाषा में सूचनाओं के विस्फोट से है। उन्होंने कहा कि जब इन अतिशय सूचनाओं में से जब यह चुनना मुश्किल हो जाए कि किस सूचना पर विश्वास करें और किस पर नहीं, तो ऐसी स्थिति एक विमर्श को जन्म देती है और इस विमर्श नाम है मीडिया एवं सूचना साक्षरता।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि आज फेक न्यूज अपने आप में एक बड़ा व्यापार बन गई है और डिजिटल मीडिया ने भी इसे प्रभावित किया है। ऐसे में मीडिया साक्षरता की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

कार्यक्रम का संचालन विष्णुप्रिया पांडे ने किया। आईआईएमसी प्रतिवर्ष सैन्य अधिकारियों के लिए मीडिया एवं संचार से जुड़े शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग कोर्सेज का आयोजन करता है। इन पाठ्यक्रमों में तीनों सेनाओं के कैप्टन लेवल से लेकर ब्रिगेडियर लेवल तक के अधिकारी हिस्सा लेते हैं। कोरोना के कारण इस वर्ष पहली बार ये ट्रेनिंग प्रोग्राम ऑनलाइन आयोजित किया गया है। इस वर्ष लोक मीडिया से लेकर न्यू मीडिया एवं आधुनिक संचार तकनीकों की जानकारी सैन्य अधिकारियों को प्रदान की गई है। इसके अलावा न्यू मीडिया के दौर में किस तरह सेना एवं मीडिया के संबंधों को बेहतर बनाया जा सकता है, इसका प्रशिक्षण भी अधिकारियों को दिया गया है।

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पंजाब-हरियाणा के ही किसान क्यों हैं आंदोलित, समझने की जरूरत: पूरन डावर

देश में बड़े बदलाव आवश्यक हैं और एक-एक करके सभी किए जा रहे हैं। हर बदलाव में गहराई है, दूरदर्शिता है। अभी बात कृषि सुधारों पर हो रही है।

पूरन डावर by
Published - Wednesday, 09 December, 2020
Last Modified:
Wednesday, 09 December, 2020
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

देश में बड़े बदलाव आवश्यक हैं और एक-एक करके सभी किए जा रहे हैं। हर बदलाव में गहराई है, दूरदर्शिता है। अभी बात कृषि सुधारों पर हो रही है। समझने की जरूरत है कि पंजाब और हरियाणा के ही किसान क्यों आंदोलित हैं। इसकी जड़ ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी), मंडियां और मंडियों पर राजनीतिक नियंत्रण है। देश की एमएसपी पर कुल खरीद में पंजाब का हिस्सा 40 प्रतिशत से अधिक और हरियाणा का 15-20 प्रतिशत है।

एमएसपी पर खरीद केवल गेहूं और चावल की होती है, इसलिए पंजाब में अधिकांश खेती गेहूं और चावल की ही जाती है और एमएसपी पर मंडी के माध्यम से सरकार को बेच दी जाती है। यही बड़ा ‘खेल’ है। मंडियों पर राजनीतिज्ञों का वर्चस्व है। मनमाफिक एमएसपी दलालों के माध्यम से तय होता है। किसान से मोटा कमीशन, साथ ही सरकार से 2.5 प्रतिशत कमीशन। ये अनाज सरकार के गोदामों में सड़ता है। सरकार के पास पर्याप्त गोदाम हैं भी नहीं। पेपर पर खरीद भी हो जाती है और सड़ा भी दिखाया जा सकता है। पंजाब की पूरी राजनीति इसी पर आधारित है।

नए प्रावधानों से ‘खेल’ पूरी तरह बंद तो नहीं होगा, लेकिन इससे बड़ी चोट अवश्य लग सकती है। कृषि सुधार कानून में तीन प्रावधान किए गए हैं। पहला है 'कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020'। इसमें किसान अब अपनी फसल को मात्र मंडी के माध्यम से ही बेचने को बाध्य नहीं हैं। अब वह सीधे भी देश में कहीं भी अपनी फसल को बेच सकते हैं। मंडियो के चंगुल से मुक्त हो सकते हैं। अपनी खेती कांट्रैक्ट पर भी दे सकते हैं। बोने से पहले ही फसल का सौदा कर सकते हैं। इससे उसका स्वतः बीमा हो सकता है और वह सुरक्षित हो सकते हैं।    

एसडीएम व्यवस्था: सरकार ने किसी भी विवाद की स्थिति में हल के लिए एसडीएम को अधिकृत किया है, क्योंकि वही एक अधिकारी है जो सीधे किसान से जुड़ा होता है। प्राकृतिक स्थितियों और विपत्ति में हानि-लाभ तय करता है। अदालतों के झंझट से मुक्त रखता है। नई व्यवस्था का उद्देश्य अदालत की लंबी प्रक्रिया में किसान को उलझाना नहीं है। एसडीएम के साथ जन प्रतिनिधि भी मदद कर सकते हैं और प्रक्रिया आसान की गई है।

आवश्यक वस्तु सेवा अधिनियम 1955 में परिवर्तन के बिना बदलाव नहीं हो सकता। यह तब बना था जब देश में अन्न की काफ़ी कमी थी। व्यापारी अनुचित भंडारण कर फसल रोककर दाम बढ़ाते थे। आज स्थिति बदल चुकी है। खाद्यान बहुतायत में है। सरकार के पास खरीदकर भंडारण की व्यवस्था भी नहीं है और की भी क्यों जाए, जब निस्तारण ही नहीं है और पूरी व्यवस्था में बड़ा झोल भी है।

इस अधिनियम में छूट दी गई है कि अब आप आपातकाल और युद्ध को छोड़कर भंडारण कर सकते हैं। कृषि उत्पाद और उनके उत्पादनों का निर्यात भी कर सकते हैं। इससे किसानों की आय भी बढ़ेगी। भंडारण की व्यवस्था व्यापारी स्वयं करेंगे, सरकार पर भंडारण और एमएसपी पर खरीद का दबाव भी कम होगा। किसानों के विश्वास के लिए अभी दोनो प्रक्रियाएं चलेंगीं। सच्चाई यही है। बाकी सब अटकलें और विपक्ष विलाप है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

एडिटर्स गिल्ड ने इस बारे में चिंता जताई है कि पत्रकारों का एक वर्ग किसान आंदोलन के पीछे खलिस्तानी आतंकवादियों का हाथ बता रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 04 December, 2020
Last Modified:
Friday, 04 December, 2020
RajeshBadal7

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

एडिटर्स गिल्ड ने इस बारे में चिंता जताई है कि पत्रकारों का एक वर्ग किसान आंदोलन के पीछे खलिस्तानी आतंकवादियों का हाथ बता रहा है। उसके पास कोई सुबूत नहीं है। लाखों किसान ठिठुरते मौसम में गेंहू की फसल सेवा छोड़कर कोरोना के भयावह दौर में बचाव की बंदिशों को धता बताते हुए जान जोखिम में डालकर छह महीने का राशन लेकर सड़कों पर उतरे हैं तो उनका अभिनंदन क्यों नहीं होना चाहिए? इससे तो लोकतंत्र अधिक जीवंत और स्वस्थ्य होता है। इसलिए एडिटर्स गिल्ड का अपने सरोकारों के प्रति संवेदनशील होना पूरी तरह जायज है। सवाल तो यह है कि आंदोलन को विपक्ष की साजिश और उग्रवाद-पोषित बताने वाली बेसिर पैर की पत्रकारिता की भर्त्सना कहां और किस प्लेटफॉर्म पर होनी चाहिए? 

याद आ रहा है कि एक दो दिन पहले किसान आंदोलन के बारे में वॉट्सऐप के एक समाचार समूह पर चर्चा चल रही थी। एक वरिष्ठ मीडियाकर्मी किसान आंदोलन को पहले खालिस्तानी ठहराते रहे, फिर आतंकवादियों का हाथ बताते रहे, फिर उन्होंने चीन और पाकिस्तान को जिम्मेदार बताया, इसके बाद कांग्रेस का हाथ बताया और जब उनके तरकश के सारे तीर खाली गए तो वे मुझ पर ही आक्रामक हो गए। बोले, ‘आप तो विपक्ष की भाषा बोलते हैं।’ मेरे लिए उनके हमलावर होने की वजह बेतुकी थी। सवाल यह है कि क्या एक पत्रकार को सिर्फ सरकारी जबान बोलनी चाहिए? यदि ऐसा होता तो 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने से पहले लोकनायक जेपी के आंदोलन को पत्रकारों का कोई समर्थन ही नहीं मिलता। दूसरी बात यह कि अगर पत्रकारिता विपक्ष की भाषा बोल भी रही है तो उसमें क्या कोई राजद्रोह जैसा पाप छिपा है? लोकतंत्र में चौथे स्तंभ की अवधारणा का अर्थ ही यह है जब सरकार की गाड़ी पटरी से उतरे तो उसके कान उमेठने का काम पत्रकारिता करे?

भारतीय पत्रकारिता के कालजयी संपादक राजेंद्र माथुर मानते थे कि सौ फीसदी निष्पक्षता जैसी कोई चीज नहीं होती। आखिर आपातकाल के दरम्यान पत्रकार सड़कों पर सरकार के खिलाफ ही तो उतरे थे। उसके बाद बिहार प्रेस बिल तथा मानहानि विधेयक के विरोध में भी अखबारनवीस सड़कों पर आए थे। पालेकर अवॉर्ड के लिए, भचावत और मणिसाना आयोग की सिफारिशों के लिए जब पत्रकारों ने संघर्ष छेड़ा तो उसे श्रम संगठनों, रेलवे यूनियनों और तमाम औद्योगिक कर्मचारी संगठनों ने अपना भरपूर समर्थन दिया था। राजेंद्र माथुर के मुताबिक एक संपादक या पत्रकार के पेशेवर जीवन में अक्सर निष्पक्षता पर चुनौती आती है। पत्रकारिता को कोई एक पक्ष लेने की नैतिक जिम्मेदारी बनती है। ऐसे में उसे सरकार का नहीं, बल्कि आम अवाम का पक्ष लेना चाहिए। यही पत्रकारिता का धरम है। वैसे तो इस मुल्क का अतीत गवाह है कि राष्ट्रीय संकट की घड़ी में पत्रकारिता हरदम निर्वाचित हुकूमत के साथ खड़ी रही है। चाहे वह 1962, 1965, 1971 और कारगिल की जंगें रहीं हों अथवा पोखरण में परमाणु परीक्षण, अंतरिक्ष अनुसंधानों से मिले गर्व के पल हों अथवा कोरोना जैसे भयावह दौर का मुकाबला। गुजरात का भूकंप हो या सुनामी का कहर। हर स्थिति में पत्रकारिता ने अपनी व्यवस्था का साथ दिया है। लेकिन अगर चुनी हुई सरकार गलत फैसले लेती है तो उसका विरोध भी पत्रकारिता का राष्ट्रीय कर्तव्य है। अगर हुकूमत सोचती है कि पत्रकारिता हरदम उसकी बजाई धुन पर नृत्य करती रहेगी तो यह उसकी ग़लतफहमी है। पत्रकारिता दलदल में नहीं जाए, इसके लिए जरूरी है कि वह किसी दल के दामन में नहीं बंधे मिस्टर मीडिया! 

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

  

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एक बेमिसाल मोती थे राजीव कटारा, जिन्हें हमने असमय ही खो दिया: क़मर वहीद नक़वी

राजीव कटारा जैसे बेमिसाल मोती आसानी से नहीं मिलते। उन्हें हमने ऐसे खो दिया, इसका बड़ा मलाल है और रहेगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
rajivkatara5

क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

राजीव कटारा जैसे बेमिसाल मोती आसानी से नहीं मिलते। उन्हें हमने ऐसे खो दिया, इसका बड़ा मलाल है और रहेगा।

1986 में जब हम लोग साप्ताहिक ‘चौथी दुनिया’ को शुरू करने के लिए ऐसे पत्रकार ढूँढ रहे थे, जिन्हें पत्रकारिता का कोई अनुभव हो या न हो, लेकिन जिनमें पत्रकारिता को लेकर एक अलग तरह का जज़्बा हो, तब पहली बार राजीव कटारा से मुलाक़ात हुई और तुरन्त ही वह ‘चौथी दुनिया’ का हिस्सा बन गये।

‘चौथी दुनिया’ केवल एक अख़बार नहीं था, बल्कि हिन्दी पत्रकारिता में एक विलक्षण प्रयोग था, सिर्फ़ कंटेंट के तौर पर ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता के पेशेगत ढाँचे को लेकर भी वह एक प्रयोग था, छोटी-सी टीम, मामूली संसाधन लेकिन कहीं कोई दफ़्तरशाही नहीं।

राजीव बेहद ख़ुशनुमा और जीवन के हर मामले में 100 टंच खरे और ईमानदार इनसान थे। अपने काम को लेकर पूरी तरह गम्भीर, कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते थे। पढ़ना-लिखना, समझना, सीखना और पत्रकारिता के उसूलों से इंच भर भी नहीं डिगना, राजीव पूरी ज़िन्दगी इसी तरह जिये। न किसी के प्रति कभी कोई दुर्भावना, न क्रोध और न किसी प्रकार की राजनीति में शामिल होना। लेकिन जो बात ग़लत है, आप राजीव से कभी उसे ‘सही’ नहीं कहलवा सकते थे। जो ग़लत है, सो ग़लत है, चाहे वह बात कहीं से भी आयी हो।

वह कुछ दिनों के लिए टीवी में भी आये और  1995 में ‘आज तक’ की शुरुआती टीम का हिस्सा बने, लेकिन उन दिनों टीवी की 90 सेकेंड की स्टोरी की सीमा में बँधना उन्हें कभी अच्छा नहीं लगा और वह प्रिंट में वापस लौट गये। इस तरह की सीमाओं से उन्हें हमेशा ही परेशानी होती थी।

राजीव जैसे प्रतिभासम्पन्न, प्रतिबद्ध, पेशे और जीवन के हर सम्बन्धों के प्रति सौ फ़ीसदी ईमानदार और बेहद संवेदनशील पत्रकार बिरले ही मिलते हैं। वह वाक़ई एक बेमिसाल मोती थे, जिन्हें हमने असमय ही खो दिया। श्रद्धाँजलि।

(साभार: वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी की फेसबुक वाल से)

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इस ओर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन भारी ब्लंडर हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

गुरुवार को एक खबर भारत की प्रतिष्ठित एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ से प्रसारित हुई। इसके मुताबिक भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एयर स्ट्राइक की है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 20 November, 2020
Last Modified:
Friday, 20 November, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

गुरुवार को एक खबर भारत की प्रतिष्ठित एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) से प्रसारित हुई। इसके मुताबिक भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एयर स्ट्राइक की है। देखते ही देखते जंगल में आग की तरह यह समाचार फैल गया। सोशल मीडिया के तमाम अवतारों पर और कुछ टीवी चैनलों ने इसे ब्रेक कर दिया। लेकिन शाम होते होते डायरेक्टर जनरल (मिलिट्री ऑपरेशंस) ने इसका खंडन जारी कर दिया।

‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ भारत की ऐसी समाचार एजेंसी है, जिसकी साख दशकों से दुनिया भर में है। इसकी खबर सौ फ़ीसदी सत्यता की गारंटी मानी जाती रही है। सरकारी मंत्रालय और आला अफसर तक पीटीआई के समाचार पर आंख मूंदकर भरोसा करते रहे हैं। जब ऐसी संस्था से गलत जानकारी जारी हो जाती है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी प्रतिक्रिया कैसी होगी? ताज्जुब है कि इस समाचार संस्था ने खंडन तो जारी किया मगर खेद प्रकट करने की जरूरत तक नहीं समझी। इन दिनों ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ पर वैसे भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में असत्य सूचना से उसकी छवि पर यकीनन आंच आएगी। एजेंसी से यह देश जानने का हक रखता है कि इतना संवेदनशील समाचार उसने किस आधार पर जारी किया?

गौरतलब यह है कि जम्मू कश्मीर प्रदेश में आने वाले दिन स्थानीय चुनाव की सरगर्मियों से भरे होंगे। इसके बाद बंगाल राज्य के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। इस चुनावी माहौल में सियासी फ़ायदा उठाने के लिए कुछ राजनीतिक दल और असामाजिक तत्व अक्सर झूठे समाचारों के जरिये अफ़वाहों का बाजार गर्म करने का प्रयास करते हैं। जाहिर है कि वे पत्रकारों के कंधे पर से बंदूक चलाते हैं। उनका उल्लू सीधा हो जाता है,  लेकिन पत्रकारिता को नुक़सान हो जाता है।

गंभीर प्रश्न यह है कि पत्रकारिता में हमेशा तथ्य की दोबारा पड़ताल करने और जांचने की समझाइश दी जाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा और सैनिक ऑपरेशन जैसे संवेदनशील मामलों में तो यह और भी आवश्यक है कि प्राप्त सूचना को क्रॉस चेक किया जाए। एजेंसी को अपनी साख के कारण इस पर ध्यान देना जरूरी था। यह नहीं हुआ। पीटीआई की खबर थी, इसलिए चैनलों के पास अविश्वास करने का कोई आधार नहीं था। गनीमत थी कि यह समाचार उसने दिन में जारी किया। इससे अखबारों में छपने से पहले ही डीजीएमओ ने उसके गलत होने का प्रतिवाद जारी कर दिया। यदि यही सूचना रात में जारी होती तो बेहद मुश्किल हो जाती। अखबारों और सोशल मीडिया के तमाम अवतारों को भी अब यह ध्यान देना पड़ेगा कि एजेंसी की खबर की भी सरकारी या अधिकृत प्रवक्ता से पुष्टि कर ली जाए। बिना जांच पड़ताल के खबर प्रकाशित और प्रसारित करना तो अपराध ही है। इस पर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन भारी ब्लंडर हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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भारत-अमेरिकी संबंध: रिश्ते देश से होते हैं न कि किसी व्यक्ति से: पूरन डावर

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में विश्व में उस देश की छवि बिगड़ी है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 November, 2020
Last Modified:
Saturday, 07 November, 2020
PuranDabar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अमेरिका की छवि विश्व में बिगड़ी है। पहले चुनाव में जब अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के लिए ट्रम्प की प्रत्याशी के रूप में घोषणा हुई थी। मैं अमेरिका में ही व्यावसायिक भ्रमण पर था और उनका पहला भाषण टीवी पर सुनकर लगा कि ऐसा व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति कभी हो ही नहीं सकता। भारतीय राजनीति से भी कहीं नीचा स्तर और मेरे दिमाग में अमेरिका की इमेज सदैव ब्रह्मा जी की तरह रही। मेरा मानना था कि अमेरिकी जनता ऐसे व्यक्ति को कभी स्वीकार कर ही नहीं सकती।

उसके बाद पूरा चुनाव फॉलो ही नहीं किया। यदा कदा मेरे एक मित्र मुझे बताते थे कि ट्रम्प जीत रहा है तो मैं उन पर बिगड़ जाता और कहता कि अमेरिका भारत नहीं है, ऐसा हो ही नहीं सकता, लेकिन ऐसा ही हुआ। अमेरिका में अधिकांशतः हर राष्ट्रपति को दो टर्म मिले हैं। अमेरिका ने गलती सुधारी और एक टर्म में उतरना पड़ा। हालांकि जो बिडेन का स्तर भी कमोबेश एक सा है।

विश्व में अमेरिका के आधिपत्य के ह्रास के लक्षण हैं। स्पष्ट है कि जहां तक भारत के अमेरिका से संबंध की बात है तो दोनों विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। दोनों को सदैव एक-दूसरे की आवश्यकता है। ओबामा से भी उतने ही संबंध थे, ट्रम्प से भी हैं और अब बिडेन से भी रहेंगे। वैसे भारत सहित एशियंस ने ट्रम्प को कतई वोट नहीं किया। उनके रहते सबकी नौकरियां-वीजा खतरे में थे। जहां तक मोदी जी की बात है, उन्हें ट्रम्प हों या बिडेन कोई फर्क नहीं पड़ता। रिश्ते देश से होते हैं, न कि किसी व्यक्ति से। कल ट्रम्प थे, आज मोदी हैं कल कोई और...।

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