माफ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर भी नहीं जानते: राजेश बादल

भगत सिंह जिसने असेंबली में बम फेंका था और हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। अगर आप भी यही जानते हैं तो माफ़ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर नहीं जानते।

राजेश बादल by
Published - Monday, 28 September, 2020
Last Modified:
Monday, 28 September, 2020
bhagat singh

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सरदार भगत सिंह का नाम ज़ेहन में आते ही एक ऐसे जोशीले नौजवान का चेहरा उभरता है, जो अकेले दम पर हिन्दुस्तान की धरती को गोरी हुकूमत से मुक्त कराने का हौसला और जज़्बा रखता था। वही भगत सिंह जिसने असेंबली में बम फेंका था और हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। अगर आप भी यही जानते हैं तो माफ़ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर नहीं जानते। आज मैं आपको भगत सिंह का वह रूप दिखाना चाहता हूं जो आपके लिए एकदम नया है। यह रूप एक ऐसे पत्रकार और लेखक का है, जो अपने विचारों के तेज़ से देश की देह में हरारत पैदा कर देता था। हम और आप को वहां तक पहुंचने के लिए कई उमरें चाहिए, जहां भगत सिंह सिर्फ़ तेईस-चौबीस साल की आयु में जा पहुंचा था।

दरअसल इंसान को संस्कार सिर्फ माता पिता या परिवार से ही नहीं मिलते। समाज भी अपने ढंग से संस्कारों के बीज बोता है। पिछली सदी के शुरुआती साल कुछ ऐसे ही थे। उस दौर में संस्कारों और विचारों की जो फसल समाज और देश में उगी,  उसका असर आज भी  कहीं कहीं दिखाई देता है। उन दिनों गोरी हुक़ूमत ने ज़ुल्मों की सारी सीमाएं तोड़ दीं थीं। देशभक्तों को कीड़े मकौड़ों की तरह मारा जा रहा था। किसी को भी फांसी चढ़ा देना सरकार का शग़ल बन गया था। ऐसे में जब आठ साल के बालक भगत सिंह ने किशोर क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा को वतन के लिए हंसते हंसते फांसी के तख़्ते चढ़ते देखा तो हमेशा के लिए करतार देवता की तरह उसके बालमन के मंदिर में प्रतिष्ठित हो गए। चौबीस घंटे करतार सिंह की तस्वीर भगत सिंह के साथ रहती थी। सराभा की फांसी के रोज़ क्रांतिकारियों ने जो गीत गाया था,  वो भगत सिंह अक्सर गुनगुनाया करता।  इस गीत की कुछ पंक्तियां थीं- 

फ़ख्र है भारत को ऐ करतार तू जाता है आज / जगत औ पिंगले को भी साथ ले जाता है आज / हम तुम्हारे मिशन को पूरा करेंगे संगियो / क़सम हर हिंदी तुम्हारे ख़ून की खाता है आज  

कुछ बरस ही बीते थे कि जलियां वाला बाग़ का बर्बर नरसंहार हुआ। सारा देश बदले की आग में जलने लगा। भगत सिंह का ख़ून खौल उठा। अवचेतन में कुछ संकल्प और इरादे समा गए। अठारह सौ सत्तावन के ग़दर से लेकर कूका विद्रोह तक जो भी साहित्य मिला, अपने अंदर पी लिया। एक एक क्रांतिकारी की कहानी किशोर भगत सिंह की ज़ुबान पर थी। होती भी क्यों न? परिवार की कई पीढ़ियां अंग्रेज़ी राज से लड़तीं आ रहीं थीं। दादा अर्जुन सिंह,  पिता किशन सिंह,  चाचा अजीत सिंह और चाचा स्वर्ण सिंह को देश के लिए मर मिटते भगत सिंह ने देखा था। चाचा स्वर्ण सिंह सिर्फ तेईस साल की उमर  में जेल की यातनाओं का विरोध करते हुए शहीद हो चुके थे। दूसरे चाचा अजीत सिंह को देश निकाला दिया गया था। दादा और पिता आए दिन आंदोलनों की अगुआई करते जेल जाया  करते थे। पिता गांधी और कांग्रेस के अनुयायी थे तो चाचा गरम दल की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे। घर में घंटों बहसें होतीं थीं। भगत सिंह के ज़ेहन में विचारों की फसल पकती रही। इसीलिए 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ा तो भगत सिंह भी दसवीं की पढ़ाई छोड़ आंदोलन में कूद पड़े थे। जब आंदोलन वापस लिया गया तो सारे नौजवानों से पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए कहा गया। तब इन नौजवानों के लिए लाला लाजपत राय ने नेशनल कॉलेज खोले। उनमें देशभक्त युवकों ने एडमिशन लिया था। ज़रा सोचिए! भगत सिंह पंद्रह-सोलह साल के थे और नेशनल कॉलेज लाहौर में पढ़ रहे थे। आज़ादी कैसे मिले- इस पर अपने शिक्षकों और सहपाठियों से चर्चा  किया करते थे। जितनी अच्छी हिन्दी और उर्दू,  उससे बेहतर अंग्रेज़ी और पंजाबी। इसी कच्ची आयु में भगत सिंह ने पंजाब में उठे भाषा विवाद पर झकझोरने वाला लेख लिखा। लेख पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने पचास  रूपए का इनाम दिया। भगत सिंह की शहादत के बाद 28 फ़रवरी,  1933 को हिंदी संदेश में यह लेख प्रकाशित हुआ था। लेख की भाषा और विचारों का प्रवाह अदभुत है। एक हिस्सा यहां प्रस्तुत है -

"इस समय पंजाब में उर्दू का ज़ोर है। अदालतों की भाषा भी यही है। यह सब ठीक है परन्तु हमारे सामने इस समय मुख्य प्रश्न भारत को  एक राष्ट्र बनाना है। एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा होना आवश्यक है,  परन्तु यह एकदम नहीं हो सकता। उसके लिए क़दम क़दम चलना पड़ता है। यदि हम अभी भारत  की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम लिपि तो एक बना देना चाहिए। उर्दू लिपि सर्वांग -संपूर्ण नहीं है। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसका आधार फारसी पर है। उर्दू कवियों की उड़ान चाहे वो हिन्दी (भारतीय) ही  क्यों न हो- ईरान के साक़ी और अरब के खजूरों तक जा पहुंचती है। क़ाज़ी नज़र -उल-इस्लाम की कविता में तो धूरजटी,  विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार बार है,  लेकिन हमारे उर्दू, हिंदी,  पंजाबी कवि उस ओर ध्यान तक न दे सके। क्या यह दुःख की बात नहीं? इसका मुख्य कारण भारतीयता और भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता  है। उनमें भारतीयता आ ही नहीं पाती,तो फिर उनके रचे गए साहित्य से हम कहां तक भारतीय बन सकते हैं? ..तो उर्दू अपूर्ण है और जब हमारे सामने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित सर्वांग-संपूर्ण हिंदी लिपि विद्यमान है, फिर उसे अपने अपनाने में हिचक क्यों? ...हिंदी के पक्षधर सज्जनों  से हम कहेंगे कि हिंदी भाषा ही अंत में एक दिन भारत की भाषा बनेगी, परंतु पहले से ही उसका प्रचार करने से बहुत सुविधा होगी।"

 

सोलह-सत्रह बरस के भगत सिंह की  इस भाषा पर आप  क्या टिप्पणी करेंगे? इतनी सरल और कमाल के संप्रेषण वाली भाषा भगत सिंह ने चौरानवे -पंचानवे साल पहले लिखी थी। आज भी भाषा के पंडित और पत्रकारिता के पुरोधा इतनी आसान हिंदी नहीं लिख पाते और माफ़ कीजिए हमारे अपने घरों के बच्चे क्या सोलह-सत्रह की उमर में आज इतने परिपक्व हो पाते हैं? नर्सरी- के जी - वन, के जी - टू के रास्ते पर चलकर इस उमर में वे दसवीं या ग्यारहवीं में पढ़ते हैं और उनके ज्ञान का स्तर क्या होता है - बताने की ज़रूरत नहीं। इस उमर तक भगत सिंह विवेकानंद, गुरुनानक, दयानंद सरस्वती, रवींद्रनाथ ठाकुर और स्वामी रामतीर्थ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों का एक-एक शब्द घोंट कर पी चुके थे। यही नहीं विदेशी लेखकों,  दार्शनिकों  और व्यवस्था बदलने वाले महापुरुषों में गैरीबाल्डी और मैजिनी, कार्ल मार्क्स, क्रोपाटकिन, बाकुनिन और डेनब्रीन तक भगत सिंह की आंखों के साथ अपना सफ़र तय कर चुके थे। उमर के इसी पड़ाव पर परंपरा के मुताबिक़ परिवार ने उनका ब्याह रचाना चाहा तो पिता जी को एक चिठ्ठी लिखकर चुपचाप घर छोड़ दिया। सोलह साल के भगत सिंह ने लिखा,

पूज्य पिता जी,

नमस्ते !

मेरी ज़िंदगी भारत की आज़ादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी ज़िंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो पूज्य बापू जी (दादा जी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है। लिहाज़ा मैं उस समय की उनकी प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं। उम्मीद है आप मुझे माफ़ कर देंगे

आपका ताबेदार

भगत सिंह 

घर छोड़कर भगत सिंह उत्तर प्रदेश के  कानपुर जा पहुंचे। महान देशभक्त पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी उन दिनों कानपुर से प्रताप का प्रकाशन करते थे। उन दिनों वे बलवंत सिंह के नाम से लिखा करते थे। उनके विचारोतेजक लेख प्रताप में छपते।  उन्हें पढ़कर लोगों के दिलो दिमाग़ में क्रांति की चिनगारी फड़कने लगती। उन्हीं दिनों कलकत्ते से साप्ताहिक ‘मतवाला’ निकलता था। ‘मतवाला’ में लिखे उनके दो लेख बेहद चर्चित हुए। एक का शीर्षक था- ‘विश्व प्रेम’। पंद्रह और बाईस नवंबर 1924  को दो किस्तों में यह लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख के एक हिस्से में देखिए भगत सिंह के विचारों की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति -

"जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शासित, अमीर-ग़रीब, छूत -अछूत आदि शब्दों का प्रयोग होता है, तब तक कहां विश्व बंधुत्व और कहां विश्व प्रेम? यह उपदेश स्वतंत्र जातियां दे सकती हैं। भारत जैसा ग़ुलाम देश तो इसका नाम भी नहीं ले सकता। फिर उसका प्रचार कैसे होगा ? तुम्हें शक्ति एकत्र करनी होगी। शक्ति एकत्रित करने के लिए अपनी एकत्रित शक्ति ख़र्च कर देनी पड़ेगी। राणा प्रताप की तरह ज़िंदगी भर दर-दर ठोकरें खानी होंगी, तब कहीं जाकर उस परीक्षा में उतीर्ण हो सकोगे ....तुम विश्व प्रेम का दम भरते हो। पहले पैरों पर खड़े होना सीखो। स्वतंत्र जातियों में अभिमान के साथ सिर ऊंचा करके खड़े होने के योग्य बनो। जब तक तुम्हारे साथ कामागाटा मारु जहाज़ जैसे दुर्व्यवहार होते रहेंगे, तब तक डैम काला मैन कहलाओगे, जब तक देश में जालियांवाला बाग़ जैसे भीषण कांड होंगे, जब तक वीरागंनाओं का अपमान होगा और तुम्हारी ओर से कोई प्रतिकार न होगा, तब तक तुम्हारा यह ढ़ोंग कुछ मानी नहीं रखता। कैसी शान्ति,   कैसा सुख और कैसा विश्व प्रेम? यदि वास्तव में चाहते हो तो पहले अपमानों का प्रतिकार करना सीखो। मां को आज़ाद कराने के लिए कट मरो। बंदी मां को आज़ाद कराने के लिए आजन्म काले पानी में ठोकरें खाने को तैयार हो जाओ। मरने को तत्पर हो जाओ।" 

मतवाला में ही भगत सिंह का दूसरा लेख सोलह मई, 1925 को बलवंत सिंह के नाम से छपा। ध्यान दिलाने की ज़रूरत नहीं कि उन दिनों अनेक क्रांतिकारी छद्म नामों से लिखा करते थे। युवक शीर्षक से लिखे गए इस लेख के एक हिस्से में भगत सिंह कहते हैं -

"अगर रक्त की भेंट चाहिए तो सिवा युवक के कौन देगा? अगर तुम बलिदान चाहते हो तो तुम्हे युवक की ओर देखना होगा। प्रत्येक जाति के भाग्य विधाता युवक ही होते हैं...सच्चा देशभक्त युवक बिना झिझक मौत का आलिंगन करता है, संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुंह पर बैठकर मुस्कुराता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फांसी के तख्ते पर हंसते हंसते चढ़ जाता है। अमेरिकी युवा पैट्रिक हेनरी ने कहा था, 'जेल की दीवारों के बाहर ज़िंदगी बड़ी महंगी है। पर, जेल की काल कोठरियों की ज़िंदगी और भी महंगी है क्योंकि वहां यह स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य रूप में चुकाई जाती है। ऐ! भारतीय युवक! तू क्यों गफ़लत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है। उठो! अब अधिक मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रहो .....धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर। तेरे पूर्वज भी नतमस्तक हैं  इस नपुंसत्व पर। यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो तो उठकर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आंसुओं की एक एक बूंद की सौगंध ले, उसका बेड़ा पार कर और मुक्त कंठ से बोल -

वंदे मातरम !

प्रताप में भगत सिंह की पत्रकारिता  को पर लगे। बलवंत सिंह के नाम से छपे इन लेखों ने धूम मचा दी। शुरुआत में तो स्वयं  गणेश शंकर विद्यार्थी  को पता नहीं था कि असल में बलवंत सिंह कौन है ? और एक दिन जब पता चला तो भगत सिंह को उन्होंने गले से लगा लिया। भगत सिंह अब प्रताप के संपादकीय विभाग में काम कर रहे थे। इन्हीं दिनों दिल्ली में तनाव बढ़ा। दंगे भड़क उठे। विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को रिपोर्टिंग के लिए दिल्ली भेजा। विद्यार्थी जी दंगों की निरपेक्ष रिपोर्टिंग चाहते थे। भगत सिंह उनकी  उम्मीदों पर खरे उतरे। प्रताप में काम करते हुए उन्होंने महान क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल की आत्मकथा बंदी जीवन का पंजाबी में अनुवाद किया। इस अनुवाद ने पंजाब में देश भक्ति की एक नई लहर पैदा की।इसके बाद आयरिश क्रांतिकारी डेन ब्रीन की आत्मकथा का अँगरेजी से हिंदी अनुवाद किया। प्रताप में यह अनुवाद आयरिश स्वतंत्रता संग्राम शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस अनुवाद ने भी देश में चल रहे आज़ादी के आंदोलन को एक वैचारिक मोड़ दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी के लाड़ले  थे भगत सिंह। उनका लिखा एक एक शब्द विद्यार्थी जी को गर्व से भर देता। ऐसे ही किसी भावुक पल में विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को भारत में क्रांतिकारियों के सिरमौर चंद्रशेखर आज़ाद से मिलाया। आज़ादी के दीवाने दो आतिशी क्रांतिकारियों का यह अदभुत मिलन था। भगत सिंह अब क्रांतिकारी गतिविधियों में भरपूर भाग लेने लगे। साथ में पूर्ण कालिक पत्रकारिता भी चल रही थी। जब गतिविधियां बढ़ीं तो पुलिस को भी शंका हुई। खुफिया चौकसी और कड़ी कर दी गई। विद्यार्थी जी ने पुलिस से बचने के लिए भगत सिंह को अलीगढ़ ज़िले के शादीपुर गांव के स्कूल में हेडमास्टर बनाकर भेज दिया। पता नहीं शादीपुर के लोगों को आज इस तथ्य की जानकारी है या नहीं। भगत सिंह शादीपुर में थे तभी विद्यार्थी जी को उनकी असली पारिवारिक कहानी पता चली थी। दरअसल भगत सिंह के घर छोड़ने के बाद उनकी दादी की हालत बिगड़ गई थी। दादी को लगता था कि शादी के लिए उनकी ज़िद के चलते ही भगत सिंह ने घर छोड़ा है। इसके लिए वो अपने को कुसूरवार मानती थीं। भगत सिंह को पता लगाने के लिए पिताजी ने अख़बारों में इश्तेहार दिए थे। ये इश्तेहार विद्यार्थी जी ने भी देखे थे,  लेकिन तब उन्हें पता नहीं था कि उनके यहां काम करने वाला बलवंत ही भगत सिंह है।बताते हैं कि इश्तेहार प्रताप में भी छपे थे। इनमें कहा गया था कि,  'प्रिय भगत सिंह अपने घर लौट आओ। तुम्हारी दादी बीमार हैं। अब तुम पर शादी के लिए कोई दबाव नहीं डालेगा। जब विद्यार्थी जी ने विज्ञापन देखा तो उनका माथा ठनका। विज्ञापन में भगत सिंह की फोटो भी छपी थी। चेहरा बलवंत सिंह से मिलता जुलता था। उन्हें लगा कि उनके यहां काम करने वाला ही असल में भगत सिंह था। इसी के बाद उन्होंने भगत सिंह के पिता को बुलाया। दोनों शादीपुर जा पहुंचे। विद्यार्थी जी ने भगत सिंह  को मनाया कि वो अपने घर लौट जाएँ।भगत सिंह विद्यार्थी जी का अनुरोध कैसे टालते। फौरन घर रवाना हो गए। दादी की सेवा की और कुछ समय बाद पत्रकारिता की पारी शुरू करने के लिए दिल्ली आ गए। दैनिक वीर अर्जुन में नौकरी शुरू कर दी। जल्द ही एक तेज तर्राट रिपोर्टर और विचारोतेजक लेखक के रूप में उनकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई। 

इसके अलावा भगत सिंह पंजाबी पत्रिका ‘किरती’ के लिए भी रिपोर्टिंग और लेखन कर रहे थे। ‘किरती’ में वे विद्रोही के नाम से लिखते थे। दिल्ली से ही प्रकाशित पत्रिका ‘महारथी’ में भी वे लगातार लिख रहे थे। विद्यार्थी जी से नियमित संपर्क बना हुआ था। इस कारण प्रताप में भी वो नियमित लेखन कर रहे थे। पंद्रह मार्च 1926 को प्रताप में उनका झन्नाटेदार आलेख प्रकाशित हुआ। एक पंजाबी युवक के नाम से लिखे गए इस आलेख का शीर्षक था - भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का परिचय और उप शीर्षक था- होली के दिन रक्त के छींटे। इस आलेख की भाषा और भाव देखिए-

"असहयोग आंदोलन पूरे यौवन पर था। पंजाब किसी से पीछे नहीं रहा। पंजाब में सिक्ख भी उठे। ख़ूब ज़ोरों के साथ। अकाली आंदोलन शुरू हुआ। बलिदानों की झड़ी लग गई।"

काकोरी केस के सेनानियों को भगत सिंह ने सलामी देते हुए एक लेख लिखा। विद्रोही के नाम से। इसमें वो लिखते हैं- "हम लोग आह भरकर समझ लेते हैं  कि हमारा फ़र्ज पूरा हो गया। हमें आग नहीं लगती। हम तड़प नहीं उठते। हम इतने मुर्दा हो गए  हैं। आज वे भूख हड़ताल कर रहे हैं । तड़प रहे  हैं। हम चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल और शक्ति दे कि  वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएं।"

जनवरी 1928 में लिखा गया यह आलेख 'किरती' में छपा था। इन दो तीन सालों में भगत सिंह ने लिखा और खूब लिखा। अपनी  पत्रकारिता के ज़रिए वो लोगों के दिलो दिमाग पर छा गए। फ़रवरी 1928 में उन्होंने कूका विद्रोह पर दो हिस्सों में एक लेख लिखा। यह लेख उन्होंने बीएस संधु के नाम से लिखा था। इसमें भगत सिंह ने ब्यौरा दिया था कि किस तरह छियासठ कूका विद्रोहियों को तोप के मुंह से बांध कर उड़ा दिया गया था। इसके भाग- दो में उनके लेख का शीर्षक था- युग पलटने वाला अग्निकुंड। इसमें वो लिखते हैं  - "सभी आंदोलनों का इतिहास बताता है कि आज़ादी के लिए लड़ने वालों का एक अलग ही वर्ग बन जाता है,  जिनमें न दुनिया का मोह होता है और न पाखंडी साधुओं जैसा त्याग। जो सिपाही तो होते थे,  लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नहीं,  बल्कि अपने फ़र्ज़ के लिए निष्काम भाव से लड़ते मरते थे। सिख इतिहास यही कुछ था। मराठों का आंदोलन भी यही बताता है। राणा प्रताप के साथी राजपूत भी ऐसे ही योद्धा थे और बुंदेलखंड के वीर छत्रसाल और उनके साथी भी इसी मिट्टी और मन से बने थे"। 

यह थी भगत सिंह की पढ़ाई। बिना संचार साधनों के देश के हर इलाक़े का इतिहास भगत सिंह को कहां से मिलता था- कौन जानता है? मार्च से अक्टूबर 1928 तक किरती में ही उन्होंने एक धारावाहिक श्रृंखला लिखी। शीर्षक था आज़ादी की भेंट शहादतें । इसमें भगत सिंह ने बलिदानी क्रांतिकारियों की गाथाएं लिखीं थी। इनमें एक लेख मदनलाल धींगरा पर भी था। इसमें  भगत सिंह के शब्दों का कमाल देखिए- "फांसी के तख़्ते पर खड़े मदन से पूछा जाता है - कुछ कहना चाहते हो ? उत्तर मिलता है - वन्दे मातरम ! मां ! भारत मां तुम्हें नमस्कार और वह वीर फांसी पर लटक गया। उसकी लाश जेल में ही दफ़ना दी गई। हम हिन्दुस्तानियों को  दाह क्रिया तक नहीं करने दी गई। धन्य था वो वीर। धन्य है उसकी याद। मुर्दा देश के  इस अनमोल हीरे को बार बार प्रणाम। भगत सिंह की पत्रकारिता का यह स्वर्णकाल था। उनके लेख और रिपोर्ताज़ हिन्दुस्तान भर में उनकी कलम का डंका बजा रहे थे। वो जेल भी गए तो वहां से उन्होंने लेखों की झड़ी लगा दी। लाहौर के साप्ताहिक वन्दे मातरम में उनका एक लेख पंजाब का पहला उभार प्रकाशित हुआ। यह जेल में ही लिखा गया था। इसकी भाषा उर्दू थी। इसी तरह किरती में तीन लेखों की लेखमाला अराजकतावाद प्रकाशित हुई। इस लेखमाला ने  व्यवस्था के नियंताओं के सोच पर हमला बोला। उनीस सौ अट्ठाइस में तो भगत सिंह की कलम का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोला। ज़रा उनके लेखों के शीर्षक देखिए- धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम,  साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज,  सत्याग्रह और हड़तालें,  विद्यार्थी और राजनीति,  मैं नास्तिक क्यों हूं, नए नेताओं के अलग अलग विचार और अछूत का सवाल जैसे रिपोर्ताज़ आज भी प्रासंगिक हैं।इन दिनों दलितों की समस्याएं और धर्मांतरण के मुद्दे देश में गरमाए हुए हैं,  लेकिन देखिए भगत सिंह ने 90  साल पहले इस मसले पर क्या लिखा था- "जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया बीता समझोगे तो वो ज़रूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे। उन धर्मों में उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे,  उनसे इंसानों जैसा व्यवहार किया जाएगा फिर यह कहना कि देखो जी ईसाई और मुसलमान हिन्दू क़ौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं,  व्यर्थ होगा। कितनी सटीक टिप्पणी है ? एकदम तिलमिला देती है।"

इसी  तरह एक और टिप्पणी देखिए- "जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमें फसाद हो रहे हैं । हर कोई उन्हें अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग और संगठित ही क्यों न हो जाएं? हम मानते हैं  कि उनके अपने जन प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगें। उठो ! अछूत भाइयो उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोबिंद सिंह की असली ताक़त तुम्ही थे। शिवाजी तुम्हारे भरोसे ही कुछ कर सके। तुम्हारी क़ुर्बानियां स्वर्ण अक्षरों में लिखीं हुईं हैं। संगठित हो जाओ। स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिलेगा। तुम दूसरों की खुराक न बनो। सोए हुए शेरो ! उठो और बग़ावत खड़ी कर दो। 

इस तरह लिखने का साहस भगत सिंह ही कर सकते थे। गोरी हुक़ूमत  ने चांद के जिस ऐतिहासिक फांसी अंक पर पाबंदी लगाईं थी,  उसमें भी भगत सिंह  ने छद्म नामों से अनेक आलेख लिखे थे। इस अंक को भारतीय पत्रकारिता की गीता माना जाता है।और अंत में उस पर्चे का ज़िक्र,  जिसने गोरों की चूलें हिला दी थीं। आठ अप्रैल, 1929  को असेम्बली में बम के साथ जो परचा फेंका गया,  वो भगत सिंह ने ही अपने हाथों से लिखा था। यह परचा कहता है - बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है... जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियमेंट का पाखंड छोड़कर अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ क्रांति के लिए तैयार करें... हम अपने विश्वास को दोहराना चाहते हैं  कि व्यक्तियों की हत्या करना सरल है,  लेकिन विचारों की हत्या नहीं की जा सकती। 

इंक़लाब ! ज़िंदाबाद ! 

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हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है मिस्टर मीडिया!

कमाल है। ऐसे पत्रकार तो कभी नहीं थे। हर सूचना को सच मान लेना और उसके आधार पर निष्कर्ष भी निकाल लेना कौन सा पेशेवर धर्म है?

राजेश बादल by
Published - Friday, 11 June, 2021
Last Modified:
Friday, 11 June, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

कमाल है। ऐसे पत्रकार तो कभी नहीं थे। हर सूचना को सच मान लेना और उसके आधार पर निष्कर्ष भी निकाल लेना कौन सा पेशेवर धर्म है? बीते दिनों कई उदाहरण सामने आए। एक नमूना यह कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री दिल्ली आए तो मान लिया गया कि उनका इस्तीफा होने ही जा रहा है। इस आशय की खबरें प्रसारित होने लगीं। यह भी मान लिया गया कि दिल्ली से भेजे गए नौकरशाह उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने ही जा रहे हैं।

डिजिटल मीडिया के कुछ मंचों से प्रधानमंत्री का चित्र गायब हो गया तो कहा गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ है। फिर खबर फैली कि अलग पूर्वांचल प्रदेश बनाया जा रहा है। उसमें गोरखपुर भी आएगा। मुख्यमंत्री को उस छोटे से राज्य के बस्ते में ही बंद कर दिया जाएगा। अतीत का उदाहरण दिया गया कि नारायण दत्त तिवारी के साथ भी ऐसा हुआ था। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। फिर एक समय ऐसा आया, जब उन्हें प्रधानमंत्री का चेहरा समझा जाने लगा। लेकिन वे नए नवेले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन गए। उत्थान और पतन की यह गाथा योगी के साथ भी चस्पा कर दी गई।

पत्रकारिता में सियासत के परदे के पीछे की कहानी समझने और उसका विश्लेषण करने का हुनर क्यों नदारद हो गया? इन दिनों प्रत्येक सूचना या अफवाह के आधार पर नया काल्पनिक सच गढ़ने की शैली क्यों विकसित हो गई। हमारे राजनीतिक विश्लेषक इतने बौने हो गए कि वे सियासी सूचना की तह तक जाने का प्रयास तक नहीं करते। पत्रकारिता में दशकों से एक मंत्र प्रचलित है कि जो कहा जाता है, वह किया नहीं जाता और जो किया जाता है, वह होठों से नहीं फूटता। बेशक यह बुर्जुआ लोकतंत्र की निंदनीय परंपरा है, मगर आज के आधुनिक हिन्दुस्तान ने इसे अभी तक छोड़ा नहीं है।

फिर हमारे खबरनवीस या जानकार इस मंत्र का जाप क्यों नहीं करते। वे ऐसा करें तो टीवी चैनलों में प्रसारित होने वाली आधी ब्रेकिंग न्यूज बंद हो जाएं, जो आगे जाकर गलत साबित होती हैं। कम से कम तीस फीसदी ऐसी बहसें बंद हो जाएं, जो काल्पनिक सच पर हुआ करती हैं। मसलन, अगर योगी हट गए तो उनके उत्तराधिकारी कौन होंगे। इसी तरह मध्य प्रदेश में सिंधिया ग्वालियर से भोपाल जाएं तो यह छप जाए कि शिवराज का इस्तीफा होने ही जा रहा है।

हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है, जो खून में हरारत नहीं चाहता, एक शर्तिया उबाल चाहता है। अफीम के नशे की तरह। नए पत्रकारों की पौध तैयार करने वाले तमाम विश्वविद्यालयों पर यह करारा तमाचा भी है, जो उन्हें पॉलिटिकल रिपोर्टिंग और राइटिंग पढ़ाते हैं। अखबारों और टीवी चैनलों के मालिकों- संपादकों के लिए भी यह एक गंभीर चुनौती है। अधकचरी जानकारियों को सच बता देना और फिर उस सच का विश्लेषण करना उन्हें मूषक बनाता है। पत्रकारिता को यह मूषक फिर विदूषक बना देता है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

पत्रकारिता में हो रही इस गंभीर चूक को कैसे रोका जाए मिस्टर मीडिया?

भारतीय पत्रकारिता को मुख्य न्यायाधीश को शुक्रिया तो कहना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

इस तरह का व्यवहार दूषित और अमानवीय मानसिकता का प्रतीक है मिस्टर मीडिया!

कृपया अपनी जिम्मेदारी तलाश कीजिए मिस्टर मीडिया!

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सांप-छछूंदर के जैसी हो गई है ट्विटर की स्थिति: राजेश बादल

केंद्र सरकार और सूचना-सामग्री विस्तार करने वाली परदेसी कंपनियों के बीच तनातनी अब निर्णायक मोड़ पर है। इस चरण में भारतीय बुद्धिजीवी समाज का दखल अब जरूरी दिखाई देने लगा है।

Last Modified:
Tuesday, 08 June, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

डिजिटल माध्यमों से टकराव कितना घातक 

केंद्र सरकार और सूचना-सामग्री विस्तार करने वाली परदेसी कंपनियों के बीच तनातनी अब निर्णायक मोड़ पर है। इस चरण में भारतीय बुद्धिजीवी समाज का दखल अब जरूरी दिखाई देने लगा है। कंपनियों के साथ विवाद का सीधा सीधा समाधान अदालत के जरिए नहीं हो तो अच्छा। दोनों पक्षकारों को ही किसी व्यावहारिक निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। केंद्र सरकार चाहे तो इस पचड़े से बाहर निकलने के लिए किसी तीसरे तटस्थ पक्ष को मध्यस्थ बना सकती है। इसका कारण यह है कि दूरगामी नजरिए से बीजेपी के लिए इसके सियासी परिणाम मुश्किल भरे हो सकते हैं।

ऊपर से देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ट्विटर को चेतावनी में कुछ अनुचित नहीं लगता। भारतीय क्षेत्र में सक्रिय सूचना विस्तार करने वाले किसी भी अवतार को भारत के नए आईटी नियमों का पालन करना चाहिए। इससे पहले ट्विटर को तीन महीने की मोहलत दी गई थी कि वह नए नियमों को लागू करे। इनमें एक नोडल संपर्क व्यक्ति की नियुक्ति करना भी शामिल है, जो उपभोक्ताओं की शिकायतों का निराकरण करने में सक्षम हो। यह मामला न्यायालय में लंबित है। मुकदमों के बोझ तले दबे न्यायालय से निर्णय आने में वक्त तो लगेगा ही। यकीनन केंद्र सरकार चाहती होगी कि फैसले से पहले ही मामले का पटाक्षेप हो जाए तो बेहतर।

दरअसल सरकार की शीघ्रता का एक कारण सियासी भी हो सकता है। इसका एक उदाहरण तो हाल ही में आया, जब भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा और बी एल संतोष ने ट्विटर पर दो दस्तावेज परोसे। इन पर कांग्रेस पार्टी ने एतराज किया। ट्विटर की अपनी अंदरूनी पड़ताल में पाया गया कि एक दस्तावेज में कांग्रेस के लेटरपैड के साथ छेड़छाड़ की गई है। तब उसने मैन्युपुलेटेड की मोहर लगा दी। तथ्यों की पड़ताल करने वाली प्रामाणिक संस्था ऑल्ट न्यूज ने भी अपनी जांच में इस इरादतन शरारत को सच पाया। जाहिर है कि बीजेपी को यह रास नहीं आना था। उसे कैसे मंजूर हो सकता था कि सारी दुनिया जाने कि उसके प्रवक्ता ने दस्तावेज में शरारत करके ट्विटर के मंच का दुरुपयोग किया है। बता दूं कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भले ही मैन्युपुलेटेड सामग्री प्रचलन में हो, भारतीय दंड संहिता में इसे फर्जीवाड़ा अथवा जालसाजी माना जा सकता है। इसकी वैधानिक व्याख्या का नतीजा गैर जमानती वारंट या गिरफ्तारी भी हो सकती है।

अब ट्विटर की स्थिति सांप-छछूंदर जैसी हो गई है। वह मैन्युपुलेटड टैग हटाती है तो इस अपराध की मुजरिम बनती है कि वह जानबूझकर नकली दस्तावेज के जरिए भारत के करोड़ों उपभोक्ताओं को वैचारिक ठगी का निशाना बना रही है। इसके अलावा संसार में फैले भारतीय मूल के करोड़ों लोग अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत ट्विटर के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई कर सकते हैं कि वह नकली दस्तावेज बिना मैन्युपुलेटेड का टैग लगाए दे रही है। लोग उस पर आंख मूंदकर भरोसा कर सकते हैं। दूसरी ओर ट्विटर यदि टैग नहीं हटाती तो भी भारत में फर्जी और भ्रामक प्रचार की मुजरिम बनती है। कांग्रेस पार्टी या कोई अन्य उसके विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करा सकता है। इसके अलावा भारत सरकार का कोप भाजन भी उसे बनना पड़ेगा।

इस समूचे घटनाक्रम का राजनीतिक पहलू यह है कि आठ विधानसभाओं के चुनाव सर पर हैं। हमने देखा है कि चुनावों के दरम्यान सोशल-डिजिटल माध्यमों का भरपूर उपयोग-दुरुपयोग होता है। हाल ही के बंगाल विधानसभा चुनाव इसकी उम्दा बानगी हैं। इन मंचों से झूठी सूचनाएं भी फैलाई जाती हैं। राजनीतिक विरोधियों का चरित्र हनन किया जाता है। सभी दल इसमें शामिल होते हैं। अनुभव कहता है कि इसमें भारतीय जनता पार्टी बाजी मार ले जाती है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना समेत अनेक दल इसमें पिछड़ जाते हैं। ऐसे में ट्विटर, वॉट्सऐप या अन्य डिजिटल अवतारों से यदि बीजेपी की जंग जारी रही तो आने वाले चुनाव उसके लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। निश्चित रूप से पार्टी यह जोखिम उठाना पसंद नहीं करेगी? अतीत में उसने कभी अपने जिस श्रेष्ठतम तीर का इस्तेमाल सियासी विरोधियों को निपटाने में किया था, वह अब उलट कर आ लगा है और उसके गले की हड्डी बन गया है। शायद इसीलिए आईटी के नए नियमों पर न तो संसद में बहस हुई और न कानूनी जामा पहनाया गया। नए नियमों के तहत भारत में एक संपर्क अधिकारी की नियुक्ति से सरकार की उस तक सीधी पहुंच हो जाएगी। वह उस अधिकारी को येन केन प्रकारेण प्रभावित भी कर सकेगी।

वैसे इक्कीसवीं सदी में आए दिन विकसित हो रहे नए नए डिजिटल मंचों का सौ फीसदी साक्षरता वाले पश्चिम और यूरोप के कई देश सार्थक, सकारात्मक और रचनात्मक उपयोग कर रहे हैं। भारत ही इतना बड़ा राष्ट्र है, जहां के राजनेता डिजिटल संप्रेषण और अभिव्यक्ति की पेशेवर संस्कृति नहीं सीख पाए हैं। वे सियासी विरोधियों को पटखनी देने के लिए किसी भी भाषा में ट्वीट कर सकते हैं। इन नए नए मंचों पर कम शब्दों पर अपने को व्यक्त करना होता है, जो भारतीय नेताओं को नहीं आता। ज्यादातर राजनेता पढ़ते लिखते नहीं हैं। वे भाषा के मामले में एक जंगलीपन या गंवारू अभिव्यक्ति करते हैं। आखिर दुनिया का विराट और प्राचीनतम लोकतंत्र इन असभ्यताओं को क्यों स्वीकार करे? अपने को एक भद्र और शालीन तरीके से अभिव्यक्त करने का ढंग इन राजनेताओं को कब आएगा?

(साभार: लोकमत समाचार)

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‘जिन गैर हिंदी भाषियों ने इतने प्रेम से हिंदी सीखी, उन्हें हिंदी का दुश्मन बना रहे हैं’

आप अहिंदीभाषियों पर हिंदी थोपने का अनैतिक काम कर रहे हैं। जिन अहिंदीभाषियों ने इतने प्रेम से हिंदी सीखी है, उन्हें आप हिंदी का दुश्मन बना रहे हैं।

Last Modified:
Monday, 07 June, 2021
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डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

दिल्ली सरकार के गोविंदवल्लभ पंत अस्पताल और शोध-संस्थान में केरल की नर्सों को लिखित आदेश दिया गया है कि वे अस्पताल में मलयालम में बातचीत न करें। वे या तो हिंदी बोलें या अंग्रेजी बोलें, क्योंकि दिल्ली के मरीज मलयालम नहीं समझते। नर्सों को यह भी कहा गया है कि इस आदेश का उल्लंघन करनेवालों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

जिस अफसर ने यह आदेश जारी किया है, क्या वह यह मानकर चल रहा है कि केरल की नर्सें दिल्ली के मरीजों से मलयालम में बात करती हैं? यह संभव ही नहीं है। किसी नर्स का दिमाग क्या इतना खराब हो सकता है कि वह मरीज से उस भाषा में बात करेगी, जो उसका एक वाक्य भी नहीं समझ सकता? ऐसा क्यों करेगी? हमें गर्व होना चाहिए कि केरल के लोग काफी अच्छी हिंदी बोलते हैं। शर्म तो हम हिंदीभाषियों को आनी चाहिए कि हम मलयालम तो क्या, दक्षिण या पूरब की एक भी भाषा न बोलते हैं और न ही समझते हैं। पंत अस्पताल में लगभग 350 मलयाली नर्सें हैं। वे मरीजों से हिंदी में ही बात करती हैं। अगर वे अंग्रेजी में ही बात करने लगें तो भी बड़ा अनर्थ हो सकता है, क्योंकि ज्यादातर साधारण मरीज अंग्रेजी भी नहीं समझते। उन नर्सों का ‘दोष’ बस यही है कि वे आपस में मलयालम में बात करती हैं।

इस आपसी बातचीत पर भी यदि अस्पताल का कोई अधिकारी प्रतिबंध लगाता है तो यह तो कानूनी अपराध है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कानून का स्पष्ट उल्लंघन है। केरल की नर्सें यदि आपस में मलयालम में बात करती हैं तो इसमें किसी डॉक्टर या मरीज को कोई आपत्ति क्यों हो सकती है? यदि पंजाब की नर्सें पंजाबी में और बंगाल की नर्सें बंगाली में आपसी बात करती हैं और आप उन्हें रोकते हैं, उन्हें हिंदी या अंग्रेजी में बात करने के लिए मजबूर करते हैं तो आप एक नए राष्ट्रीय संकट को जन्म दे रहे हैं।

आप अहिंदीभाषियों पर हिंदी थोपने का अनैतिक काम कर रहे हैं। जिन अहिंदीभाषियों ने इतने प्रेम से हिंदी सीखी है, उन्हें आप हिंदी का दुश्मन बना रहे हैं। इसका एक फलितार्थ यह भी है कि किसी भी अहिंदीभाषी प्रांत में हिंदी के प्रयोग को हतोत्साहित किया जाएगा। यह लेख लिखते समय मेरी बात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से हुई और पंत अस्पताल में डॉक्टरों से भी। सभी इस आदेश को किसी अफसर की व्यक्तिगत सनक बता रहे थे। इसका दिल्ली सरकार से कोई संबंध नहीं है। मुख्यमंत्री केजरीवाल को बधाई कि इस आदेश को रद्द कर दिया गया है।

(लेखक, भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष हैं)

(साभार: नया इंडिया)

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अभिव्यक्ति पर राजद्रोह का अंकुश अनुचित, पर स्वीकारनी होगी लक्ष्मण रेखा: आलोक मेहता

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से देशभर के पत्रकारों को बड़ी राहत महसूस हुई है, लेकिन राज्य सरकारों, उनकी पुलिस को भी अपनी सीमाओं को समझकर मनमानी की प्रवृत्ति को बदलना होगा।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 07 June, 2021
Last Modified:
Monday, 07 June, 2021
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा की और राजद्रोह का कठोरतम कानून  सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों पर लागू करने के राज्य सरकारों के प्रयासों को नितांत अनुचित ठहरा दिया। न्याय के मंदिर से यही अपेक्षा थी। सर्वोच्च अदालत ने यह अवश्य स्पष्ट कर दिया कि हिंसा के जरिये अराजकता पैदा करने वाली उत्तेजक देशद्रोह जैसी प्रचार सामग्री पर इस कानून का प्रयोग संभव है। इस निर्णय से देशभर के पत्रकारों को बड़ी राहत महसूस हुई है, लेकिन राज्य सरकारों, उनकी पुलिस को भी अपनी सीमाओं को समझकर मनमानी की प्रवृत्ति को बदलना होगा।

यह फैसला देश के एक नामी पत्रकार विनोद दुआ के एक टीवी कार्यक्रम में की गई टिप्पणी पर हिमाचल प्रदेश में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज होने के विरुद्ध दायर याचिका पर आया है। लेकिन कुछ अन्य राज्यों में भी ऐसे मुकदमे दर्ज हुए हैं। संभवतः कुछ गंभीर हिंसा के प्रमाणित मामलों को छोड़कर अन्य प्रकरणों में निचली अदालतों से ही पत्रकार दोषमुक्त घोषित हो जाएंगे।  यह विवाद एक बार फिर इस तथ्य को रेखांकित करता है कि राजद्रोह,  सरकारी गोपनीयता के नाम पर ब्रिटिश राज के काले कानूनों में आवश्यक संशोधन संसद द्वारा सर्वानुमति से शीघ्र होने चाहिए।

इसके साथ ही यह मुद्दा भी गंभीर है कि प्रिंट, टीवी चैनल, सीरियल, फिल्म,  सोशल मीडिया को कितनी आजादी और उन पर कितना नियंत्रण हो? सरकार, प्रतिपक्ष और समाज कभी खुश, कभी नाराज। नियम-कानून, आचार संहिताएं,पुलिस व  अदालत  के सारे निर्देशों के बावजूद समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ रही हैं। सूचना संसार कभी सुहाना, कभी भूकंप की तरह डगमगाता हुआ तो  कभी ज्वालामुखी की तरह फटता दिखाई देता है। आधुनिकतम टेक्नोलॉजी ने नियंत्रण कठिन कर दिया है। सत्ता व्यवस्था ही नहीं, अपराधी-माफिया, आतंकवादी समूह से भी दबाव, विदेशी ताकतों का प्रलोभन और प्रभाव संपूर्ण देश के लिए खतरनाक बन रहा है।  इन परिस्थितियों में विश्वसनीयता तथा भविष्य की चिंता स्वाभाविक है। यह भी सही है कि कश्मीर के आतंकवादी समूह और छत्तीसगढ़,  झारखंड,  उड़ीसा के आदिवासी क्षेत्रों में हिंसा, अत्याचार और आतंक फैलाने वाले नक्सली संगठनों या उनके सरगनाओं को मानव अधिकार के नाम पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए, फिर भले ही पत्रकारिता या चिकित्सा अथवा स्वयंसेवीसेवी संस्था का चोगा पहने हुए हों। कार्यपालिका, न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र तय हैं तो पत्रकारिता की भी लक्ष्मण रेखा को स्वीकारना होगा।

ब्रिटेन में केबल टीवी एक्ट का प्राधिकरण है।  भारत में जब तक ऐसी नियामक संस्था नहीं हो, तब तक भारतीय प्रेस परिषद् द्वारा निर्धारित नियमों, आचार संहिता का पालन टीवी-डिजिटल मीडिया में भी किया जाए।  फिलहाल, प्रिंट मीडिया का प्रभावशाली वर्ग ही प्रेस परिषद् के नियम-संहिता की परवाह नहीं कर रहा है, क्योंकि उसके पास दंड देने का कोई अधिकार नहीं है, जबकि प्रेस परिषद् के अध्यक्ष सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायाधीश ही होते हैं। इन दिनों तो परिषद् ही गंभीर विवादों में उलझ गई है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान में हर नागरिक के लिए है। पत्रकार उसी अधिकार का उपयोग करते हैं। समाज में हर नागरिक के लिए मनुष्यता, नैतिकता, सच्चाई और ईमानदारी के साथ कर्तव्य के सामान्य सिद्धांत लागू होते हैं। पत्रकारों पर भी वह लागू होने चाहिए। सरकार से नियंत्रित व्यवस्था नहीं हो, लेकिन संसद, न्याय पालिका और पत्रकार बिरादरी द्वारा बनाई गई पंचायत यानी मीडिया परिषद् जैसी संस्था के मार्गदर्शी नियम, लक्ष्मण रेखा का पालन तो हो।

न्यायपालिका के सामने एक गंभीर मुद्दा भी उठाया जाता रहा है कि मानहानि कानून का दुरुपयोग भी हो रहा है, जिससे ईमानदार मीडियाकर्मी को तमाम नेता, अधिकारी या अपराधी तंग करते हैं। अदालतों में मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि समय रहते सरकार, संसद, न्यायपालिका, मीडिया नए सिरे से मीडिया के नए नियम कानून, आचार संहिता को तैयार करे। नया मीडिया आयोग,  मीडिया परिषद् बने। पुराने गोपनीयता अथवा मानहानि के कानूनों की समीक्षा हो। तभी तो सही अर्थों में भारतीय गणतंत्र को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ साबित किया जा सकेगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री से सम्मानित संपादक और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

सरकार के लिए सबक है। बड़ा सबक। वह सीखे या न सीखे। विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह का मामला आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत ने समाप्त कर दिया।

Last Modified:
Saturday, 05 June, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सरकार के लिए सबक है। बड़ा सबक। वह सीखे या न सीखे। विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह का मामला आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत ने समाप्त कर दिया। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि पत्रकारों का उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। इसके अलावा उसने आंध्र प्रदेश के दो टेलिविजन चैनलों के खिलाफ राज्य सरकार के राजद्रोह मामले पर भी सकारात्मक रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने तो यहां तक कहा है कि राजद्रोह से संबंधित धारा 124 ए की स्पष्ट व्याख्या करने की आवश्यकता है। संपादकों की सर्वोच्च संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक बयान में सुप्रीम कोर्ट की इस भावना का सम्मान किया है। अब मीडिया में बहस छिड़ गई है कि वास्तव में अंग्रेजों के जमाने के इस कानून की इस देश को जरूरत है अथवा नहीं। इसके लिए इतिहास के कुछ पन्ने पलटने होंगे।

दरअसल जब 1857 का गदर नाकाम हो गया तो गोरी हुकूमत बौखला गई। बगावत की असफलता उस दौर के बुद्धिजीवियों की कुंठा का सबब बन गई थी। वे लिखत-पढ़त में अपना असंतोष खुलकर व्यक्त करने लगे थे। मौलाना बाकर अली पहले पत्रकार थे, जिन्हें गोरों ने 1858 में अभिव्यक्ति की आजादी से घबराकर फांसी दे दी थी। तब तक कोई राजद्रोह कानून भारत में नहीं था। इस फांसी का भी बड़ा विरोध हुआ। इसके बाद मैकाले ने 1860 में आज के राजद्रोह कानून की नींव रखी। इस कानून का उसी ने प्रारूप तैयार किया था। दस साल बाद यह कानून गुलाम हिन्दुस्तान में भारतीय दंड संहिता में शामिल किया गया। जाहिर है कि इसके पीछे मंशा यह थी कि अंग्रेजी राज के प्रति कोई अपने विचारों को खुलकर व्यक्त नहीं कर सके। क्रांतिकारी चाफेकर बंधुओं (दोनों सगे भाई थे) के खिलाफ इसी कानून का इस्तेमाल किया था। बाद में दो अंग्रेज अफसरों की हत्या के आरोप में उनको फांसी दी गई थी। चाफेकर बंधु महाराष्ट्र में गणपति समारोहों में गोरी सत्ता के खिलाफ प्रवचन -कीर्तन करते थे। बाल गंगाधर तिलक के विरुद्ध मुकदमा भी इसी कानून के अनुसार चलाया गया था। महात्मा गांधी के खिलाफ 1922 में कार्रवाई के लिए इसी का सहारा लिया गया। उन्होंने यंग इंडिया में लेखन से सरकार की नींद हराम कर दी थी। आजादी के बाद संविधान सभा की बैठकें हुईं तो नेहरू ने इसका विरोध किया लेकिन नेहरू विरोधियों ने इसका समर्थन किया। इस कारण यह आजाद भारत में भी बना रहा। यह भी याद रखने की बात है कि खुद अंग्रेजों ने अपने मुल्क में यह कानून समाप्त कर दिया है। 

यह तर्क तो समझ में आता है कि हिन्दुस्तान पर हुकूमत कर रही परदेसी बरतानवी सत्ता यहां के नागरिकों पर गुलामी की नकेल डाले रखने के लिए यह कानून बनाए रखे। मगर स्वतंत्र भारत में लोकतान्त्रिक ढंग से निर्वाचित सरकारों को अपने ही मतदाताओं से आखिर बगावत की आशंका क्यों है। सरकार से असहमति के लिए पत्रकारिता माध्यम अपने मंच का इस्तेमाल क्यों न करे और फिर हर पांच साल बाद तो मतदाताओं के पास यह अधिकार है कि वे अपने मत से सरकार को हटा दें। इस तरह राजद्रोह का चाबुक सरकार को चलाने की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती। फिर भी हमने देखा है कि पिछले पांच-छह साल में इस कानून का इस्तेमाल बढ़ा है। यदि सरकार अपनी नीतियों की तीखी आलोचना को राजद्रोह मानती है तो फिर एक जमाने में ‘ब्लिट्ज’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘रविवार’ और ‘नई दुनिया’ ने जो पत्रकारिता की है, उनके संपादकों को तो फांसी पर लटका पर दिया जाना चाहिए था। संसार भर के कार्टूनिस्टों के आदर्श आरके लक्ष्मण यदि आज सक्रिय पारी खेल रहे होते तो उन्हें भी शायद सूली चढ़ा दिया जाता। समझ से परे है कि जो गठबंधन और पार्टी अपने दम पर स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई हो, उसे किसी तूती की आवाज से क्यों कांपना चाहिए?

बीते छह साल के आंकड़े डराने वाले हैं। एक साल में में विनोद दुआ के अलावा आठ पत्रकारों के विरुद्ध राजद्रोह के मामले दर्ज किए गए हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के दस्तावेज कहते हैं कि साल 2014 में 58, 2015 में 30, 2016 में 35, 2017 में 51, 2018 में 70 और 2019 में 93 राजद्रोह के मामले पंजीबद्ध किए गए थे। इनमें सिर्फ 10 लोगों को ही न्यायालय ने दोषी माना। अधिकतर मामलों में तो चार्जशीट तक ही दाखिल नहीं हो पाती।

शुभ संकेत है कि न्यायपालिका ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी भावना प्रकट की है। भारतीय पत्रकारिता यकीनन 124 ए जैसे अन्य कानूनों के समापन का स्वागत करेगी। सरकार को भी इस मुद्दे पर प्रगतिशील रवैया अपनाना चाहिए। लेकिन यदि उसका रुख नहीं बदलता तो राजद्रोह की तलवार तो मीडिया पर तनी ही है मिस्टर मीडिया!

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'यह तस्वीर सारी राजनीतिक पार्टियों की है, देखने में बहुत छोटी, मगर अत्यंत गंभीर’

दुनियाभर में कोरोना महामारी एक भयावह त्रासदी की शक्ल में सामने है। डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, राजनेताओं, प्रशासकों और कारोबारियों से लेकर आम आदमी तक मौत के इस विकराल हरकारे से थर्रा उठे हैं।

Last Modified:
Thursday, 03 June, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

छवि चमकाने के तरीके कितने अलोकतांत्रिक

दुनियाभर में कोरोना महामारी एक भयावह त्रासदी की शक्ल में सामने है। डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, राजनेताओं, प्रशासकों और कारोबारियों से लेकर आम आदमी तक मौत के इस विकराल हरकारे से थर्रा उठे हैं। लेकिन सियासी जमातों को इससे शायद अधिक अंतर नहीं पड़ता दिखाई देता। वे उसी ढर्रे पर जिंदगी जी रहे हैं और इस देश को चला रहे हैं। यहां तक कि उनके अपने निजी उत्सवों पर भी कोई शोक या मातम की छाया नहीं दिखाई देती। अवाम के बीच वे अपनी छवि चमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में दबे पांव दाखिल हो गई इस सामंती मनोवृति को इरादतन क्रूरता की श्रेणी में क्यों नहीं रखा जाना चाहिए।

हाल ही में एक हिंदी भाषी प्रदेश में जाना हुआ। उस दिन सत्ताधारी पार्टी के एक तीसरी पंक्ति के युवा नेता का जन्मदिन था। पूरी राजधानी बड़े-बड़े कट आउट और बैनरों से पटी पड़ी थी। उस नेता के समर्थकों ने शहरभर में अपनी जेब से खर्च करके यह आडम्बर किया था। इन बैनरों में लिखा हुआ था कि जन-जन के लाडले नेता को अमुक की ओर से मुबारकबाद। इसके बाद ढेर सारी तस्वीरें उस विशाल पोस्टर में दिखाई दे रही थीं। यह एक व्यक्ति को जम्हूरियत का पर्याय बनाने का भौंडा उपक्रम था। उससे भी अधिक बेशर्म प्रदर्शन नेताजी के घर के सामने था। एक ढोल पर चंद नौजवान नाच रहे थे। किसी के चेहरे पर मास्क नहीं। सामाजिक दूरी का पालन नहीं। याने कोरोना से बचाव का कोई बंदोबस्त नहीं। पास में चार-छह पुलिसकर्मी खड़े थे। वह नेता मुस्कुराते हुए डिब्बे में लड्डू लेकर बाहर आया। स्थानीय चैनलों के पेड कैमरामैन और पत्रकार दौड़ पड़े। बाइट ली, फुटेज बनाया, लड्डू खाए और चल दिए। किसी भी संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रतीक, व्यक्ति अथवा संस्था को उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा।

यह तस्वीर कमोबेश सारी राजनीतिक पार्टियों की है। देखने में बहुत छोटी, मगर अत्यंत गंभीर। किसी सियासी संगठन में कोई पदाधिकारी बन जाए। नियुक्ति के बाद पहली बार शहर में आए। किसी का जन्मदिन आ जाए और केंद्रीय नेता प्रदेश के दौरे पर आए- इस तरह के बैनर, पोस्टर, समर्थक समूहों या फैन्स क्लबों के नारों से सार्वजनिक स्थान पट जाते हैं। शहर की पर्यावरण चिंता पर आंसू बहाने वाले आम के पत्तों और डालियों से स्वागत द्वार बना देते हैं। कई क्विंटल गुलाब और अन्य फूलों का छिड़काव हो जाता है। न केंद्रीय नेता को कुछ ऐतराज होता है और न संगठन की ओर से कोई कार्रवाई होती है। बल्कि कभी-कभी तो केंद्रीय नेता खुद ही ऐसा करने के निर्देश देते हैं। ऐसे आयोजनों की इन विद्रूपताओं पर समाज की तरफ से भी कोई नोटिस नहीं लिया जाता। गंभीर सवाल यह है कि जब लोकतंत्र में सामूहिक नेतृत्व ही सब कुछ माना जाता है तो किसी एक व्यक्ति को महिमामंडित करने की परंपरा किसी राष्ट्र के लिए कितनी उचित है। क्या हम मध्यकाल की राजा या बादशाह- पूजन की मानसिकता पर फिर लौट रहे हैं, जिसमें महाराजा या सुल्तान को ईश्वर की तरह माना जाता था। उस धारणा के पीछे यही मंशा होती थी कि राजा कभी गलत कर नहीं सकता तथा हर मामले में वही अधिनायक निर्णय लेगा। भले ही वह देश के हित में हो या नहीं। इस संक्रमित और दूषित मानसिकता की वापसी भारत के लिए बेहद गंभीर चेतावनी है।

इस मानसिकता की पुनर्स्थापना के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? स्वतंत्रता के बाद हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने वाले लीडर आजादी के आंदोलन से निकले खरे-खरे नेता थे। चाहे वे पक्ष के रहे हों या प्रतिपक्ष के। लोग उनके आचरण पर भरोसा करते थे। उन नेताओं के चरित्र पर शंका नहीं होती थी। बाद की सियासी पीढ़ियों ने कुछ इस तरह गुलगपाड़ा किया कि राजशाही को संवैधानिक रूप से दफनाने के बाद भी भारत की मिट्टी से सामंती अंकुरण निकल आए। नवोदित नेताओं ने अपने महिमामंडन को राज करने की शैली का ही एक हिस्सा मान लिया। वे अपनी छवि चमकाने के लिए फैन्स क्लब बनाने लगे। काली कमाई से प्राप्त धन का इस्तेमाल इस तरह का प्रोपेगंडा करने में होने लगा। जिस देश में गांधी, नेहरू, लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी को सुनने के लिए लोग कई किलोमीटर दूर से पैदल चलकर आया करते थे, उसी देश में रैलियों के लिए एक ही पार्टी के नेता अपने अपने अनुयाइयों को बसों और ट्रैक्टरों में ढोकर ले जाने लगे। भले ही पार्टी एक है, पर आजकल उसकी रैली में बसों या ट्रैक्टरों पर उस नेता की तस्वीर के साथ बैनर लगे होते हैं, जो उन्हें भरकर लाता है। उन्हें लंच पैकेट देता है और सौ से पांच सौ रुपए की दक्षिणा भी देता है। विडंबना है कि यही राजनीतिक दल अपने नेताओं की करतूत का बचाव यह कहते हुए करते हैं कि असल लोकतंत्र तो यही है। पार्टी के भीतर सबको स्थान मिलना चाहिए। कह सकते हैं कि सामंतशाही का युग फिर लौट रहा है। जिस क्षेत्रीय राजा की जितनी बड़ी सेना और समर्थक, उसका उतना ही बड़ा लोकतांत्रिक आधार। इस पर हम गर्व करें या शर्म।

गणतंत्र के खोल में पनपते इन विषाक्त नमूनों को नियंत्रित नहीं किया गया, तो दिन दूर नहीं, जब भारतीय लोकतंत्र किसी अधिनायक के कब्जे में होगा और फिर हम टुकुर टुकुर देखते रहेंगे। हाथ मलते रहेंगे। यह संघर्ष तो हमारी जमीन से निकले सियासतदानों के खिलाफ होगा। इसके लिए बरतानवी सत्ता को दोषी नहीं ठहरा सकेंगे। फिर जहरीली मानसिकता के इस उभार को दबाने का तरीका क्या हो- यह यक्ष प्रश्न है।

(साभार: लोकमत समाचार)

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हिंदी पत्रकारिता दिवस: चुनौतियों से चुनौतियों तक का सफर

बड़े घरानों के हितों-स्वार्थों का संरक्षण करना आज के दौर की पत्रकारिता का विद्रूप चेहरा है। पत्रकारिता परदे के पीछे है और तमाम मीडिया घरानों के धंधे सामने हैं।

राजेश बादल by
Published - Sunday, 30 May, 2021
Last Modified:
Sunday, 30 May, 2021
HindiJournalismDay45

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

करीब 195 साल पहले जब कानपुर से गए पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने देश की राजधानी कलकत्ता (अब कोलकाता) से हिंदी में साप्ताहिक ‘उदन्त मार्तंड’ निकालने का निर्णय लिया तो वे जानते थे हठयोग साधना बहुत आसान नहीं है। अंग्रेजी तथा कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में रिसाले प्रकाशित हो रहे थे, लेकिन वे नक्कारखाने में तूती की आवाज ही थे। उस दौर के विराट देश में धुर पूरब के किनारे से कोई समाचारपत्र निकाल कर बंबई (अब मुंबई) के पश्चिम तट तक पहुंचाना या दक्षिण में कन्याकुमारी और उत्तर में लद्दाख तक गोरों के खिलाफ आवाज पहुंचाना किसी भी उद्योगपति के लिए टेढ़ी खीर था तो फिर शुक्ल जी की बिसात ही क्या थी। (माफ कीजिए यह काम तो आज भी सरल नहीं है)

इसके बावजूद पंडित जी ने दुस्साहस किया और खूब किया। बंगला भाषियों के बीच खड़ी हिंदी जानने, समझने और पढ़ने वाले उंगलियों पर गिने जा सकते थे। ऐसे में पांच सौ प्रतियां भी यदि कोई अखबार छाप रहा था तो यकीनन उसके लिए एक सलाम तो बनता था। पंडित जी ने उदन्त मार्तंड तीस मई, 1826 को शुरू तो कर दिया मगर डाक के जरिए उसे दूर-दूर तक भेजना दुष्कर ही था। वे सरकारी डाक प्रणाली पर निर्भर थे। अरसे तक वे डाक शुल्क में रियायत की मांग करते रहे पर किसी ने नहीं सुनी। यह रियायत सिर्फ ईसाई मिशनरियों के प्रकाशनों को दी जाती रही। कोई भी शासन तंत्र अपनी आलोचना के सुरों को मुल्क भर में विस्तार देने के लिए 'आ बैल मुझे मार' की नीति को क्यों बढ़ावा देता। जब बरतानवी हुकूमत ने देखा कि हिंदी का यह नवेला समाचार पत्र हिंदी भाषी इलाकों से गए उनके कर्मचारियों में लोकप्रिय हो रहा है तो उनकी पेशानी पर बल आए। वे अपने कर्मचारियों में अपने हक के लिए सुर फूटते कैसे देख सकते थे। लिहाजा उन्होंने फरमान जारी किया कि जिसके पास उदन्त मार्तंड के अंक मिलेंगे, उनको और उनके रिश्तेदारों को नौकरी से निकाल दिया जाएगा। इसके बाद इलाहाबाद, कानपुर, पटना, रांची और भागलपुर से गए हिंदी भाषियों की शामत आ गई। उत्तर से गए उद्योगपतियों और अमीरों ने विज्ञापन देने बंद कर दिए। छापाखाने को प्रिंटिंग का जॉब वर्क मिलना ठप्प हो गया। दुखी पंडित जी ने सरकारी समाचार भी छपने शुरू किए लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला। हारकर पंडितजी को दिसंबर 1827 आते आते समाचार पत्र बंद करने का फैसला लेना पड़ा। तब तक कुल 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए थे। पंडित जी ने आखिरी अंक में अपनी वेदना कुछ इस प्रकार प्रकट की -

आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त /

अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत /

इस तरह हिंदुस्तान का यह पहला हिंदी साप्ताहिक दम तोड़ गया। इसके बाद के साल अंग्रेजों से मोर्चा लेती पत्रकारिता के थे। विचारों की आग  फैलाने वाले अनगिनत क्रांतिकारियों और देशभक्तों ने इस मिशन में अपनी आहुतियां दीं। आजादी के बाद नेहरू युग अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक धारा को मजबूत करने वाला दौर था। लेकिन उसके बाद नए किस्म की चुनौतियों ने सिर उठाया। भले ही राजशाही स्वतंत्रता के बाद कानूनी रूप से अस्तित्व में नहीं रही, लेकिन सियासत में भ्रष्टाचार के चलते नए ढंग की सामंतशाही पनपी। उससे मुकाबला साल दर साल कठिन होता जा रहा है। नए जमाने के तमाम राजनेता सामंती मनोवृति को बढ़ावा देते नजर आते हैं। यह अपने तरह की बड़ी चुनौती है। चुनौती बाजार और तकनीक की भी है। आधुनिकतम तकनीक के कारण पत्रकारिता को भी नए नवेले मीडिया अवतारों के साथ कदमताल करना कांटों भरा ताज पहनना है। इसी तरह बाजार के दबाव भी अनंत हैं।

बड़े घरानों के हितों-स्वार्थों का संरक्षण करना आज के दौर की पत्रकारिता का विद्रूप चेहरा है। पत्रकारिता परदे के पीछे है और तमाम मीडिया घरानों के धंधे सामने हैं। धंधे चमकाने के लिए अखबार और चैनल मंच पर हैं। बाकी सब कुछ नेपथ्य में है। इसके अलावा संपादक नाम की संस्था के दिनों दिन बारीक और महीन होते जाने से पत्रकारिता की नई पीढ़ियों का नुकसान हो रहा है। अधिकतर पेशेवर रीढ़विहीन हैं, जो सत्ता प्रतिष्ठान को पोसते हैं। इसी कारण सियासी मानसिकता पत्रकारिता को बंधक बनाकर या बांटकर राज करने की होती जा रही है। यही काम तो गोरी सरकार करती थी। अब हमारी संस्थाएं कर रही हैं। पत्रकारिता नए तरह की चुनौतियों के घेरे में है। भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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'हिंदी के पत्रकारों की दशा दयनीय होती जा रही है, इस पर चिंता की जानी चाहिए'

एक पत्रकार के लिए आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी होती है और जब किसी पत्रकार को अपनी यह पूंजी गंवानी पड़े या गिरवी रखनी पड़े तो उसकी मन:स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है।

Last Modified:
Sunday, 30 May, 2021
HindiJournalismDay9565

मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

एक पत्रकार के लिए आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी होती है और जब किसी पत्रकार को अपनी यह पूंजी गंवानी पड़े या गिरवी रखनी पड़े तो उसकी मन:स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। फिर आप किसी भी पत्रकार के लिए कोई दिन-दिवस मनाते रहिए, सब बेमानी है। हर साल हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई को मनाते हैं। यह हमारे स्वाभिमान का दिवस है। हिंदी की श्रेष्ठता का दिवस। अंग्रेजों को देश निकाला देने का हिंदी पत्रकारिता का गौरव दिवस लेकिन साल-दर-साल हिंदी पत्रकारिता का क्षरण होता रहा, इसमें भी कोई दो राय नहीं है। हालांकि भारत के एक बड़े वर्ग की आवाज आजादी से लेकर अब तक हिंदी पत्रकारिता रही है और शायद आगे भी हिंदी पत्रकारिता का ओज बना रहेगा। हिंदी पत्रकारिता का वैभव अमर रहे, यह हम सबकी कोशिश होती है और होनी भी चाहिए, लेकिन हिंदी के पत्रकारों की दशा दयनीय होती जा रही है। इस पर चिंता की जानी चाहिए। यह शायद पहली-पहली बार हो रहा होगा, जब हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर भोपाल और इंदौर के पत्रकारों ने ऐसी पहल की कि हिंदी के पत्रकारों का आत्मसम्मान भी कायम रहा और आर्थिक दिक्कतों से भी राहत महसूस हुई। आजादी के बाद हिंदी पत्रकारिता दिवस का गौरव कायम रखने में भोपाल और इंदौर के पत्रकारों ने जो कार्य किया, वह वंदनीय है, अभिनंदनीय है।

कोरोना ने सभी सामाजिक और आर्थिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया है। एक साल में कोरोना के दो बार हमले ने जैसे जिंदगी को शून्य से शुरू करने के लिए मजबूर कर दिया है। दूसरे प्रोफेशन के लोगों के पास आर्थिक संबल था और वे कम से कम गिरे नहीं। तनाव और परेशानियां उनके हिस्से में भी रहीं, लेकिन पत्रकारों को जिन मुसीबतों का सामना करना पड़ा या पड़ रहा है, वह अकथ कथा है। एक तरफ अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए जान दांव पर लगाना, तो दूसरी तरफ परिवार की जरूरतों को पूरी करने के लिए आर्थिक संबल नहीं मिल पाने का संकट। सरकार और सत्ता के सामने गिड़गिड़ाना या झुकना मंजूर नहीं और जिन संस्थानों के लिए कार्य कर रहे हैं, वे इस तरफ से लगभग आंखें मींचे हुए हैं। आत्मसम्मान कायम रहे और संकट का समाधान भी मिले, यह एक चुनौतीपूर्ण टास्क था। विवेकानंद जी ने कहा है कि जीते जी खुद का बोझ खुद को उठाना पड़ेगा और मरने के बाद चार कंधे तो मिल जाएंगे। इसे आप 'समस्या है, तो समाधान है’ की नजर से भी देख सकते हैं।

तकरीबन आठ वर्ष पहले पत्रकारों के एक समूह ने इस बात पर विमर्श किया कि पत्रकारों को हेल्थ को लेकर आर्थिक सुरक्षा कैसे दी जाए। इस सोच के साथ ‘भोपाल हेल्थ केयर सोसायटी’ का जन्म हुआ। सदस्य पत्रकारों से एक हजार रुपए वार्षिक सदस्यता शुल्क का प्रावधान रखा गया था, जिसे बाद में घटाकर 500 रुपए कर दिया गया। भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार और संस्था के गार्जियन डॉ. सुरेश मेहरोत्रा लगातार बड़ा आर्थिक योगदान करते रहे हैं। सोसायटी के नियमानुसार किसी भी पत्रकार को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए अन्य पत्रकारों की सहमति जरूरी है। संभवत: देश में अपनी तरह की इस इकलौती संस्था ने दिवंगत पत्रकारों को बिना किसी बड़ी औपचारिकता के दो लाख की राशि उपलब्ध करायी है। अन्य स्थितियों पर निर्भर करते हुए 15 हजार से एक लाख तक की राशि का सहयोग सदस्यों को मिलता रहा है। इस कोरोना काल में तो सोसायटी ने आगे बढ़कर पत्रकारों को आर्थिक सहायता दी।

भोपाल के पत्रकारों की पहल के बाद इंदौर के पत्रकारों ने कोरोना काल में पत्रकारों को आर्थिक मदद के साथ स्वास्थ्यगत सुविधा दिलाने के लिए प्रयास शुरू किया। आईएमयू (इंदौर मीडिया यूनाइटेड) नाम से संस्था बनाकर जरूरतमंद पत्रकारों को न केवल आर्थिक सहायता दी गई बल्कि कोरोना पीड़ित पत्रकारों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने में यथासंभव सहयोग किया गया। आईएमयू वॉट्सऐप ग्रुप पर प्रतिदिन बुलेटिन जारी कर पत्रकारों के स्वास्थ्य की जानकारी प्रदान करता रहा। यह पहल अनोखी थी। आईएमयू की पहल से बड़ी संख्या में न सिर्फ पत्रकारों को बल्कि उनके परिजनों को भी स्वास्थ्य लाभ मिला। ऐसे संकटकाल में आईएमयू संकटमोचक बनकर पत्रकारों के जीवन रक्षक का दायित्व निभाता रहा।

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने चिंता कर पहले अधिमान्य पत्रकारों को कोरोनापीड़ित होने की दशा में राज्य शासन की ओर से सहूलियत देने का ऐलान किया था। बाद में इसका विस्तार कर गैर-अधिमान्य पत्रकारों को भी इस योजना में शामिल कर लिया गया। कहना न होगा कि कोरोना काल में पत्रकारों के हितचिंतक के रूप में संचालक जनसम्पर्क श्री आशुतोष प्रताप सिंह उपस्थित रहे। पीड़ित पत्रकारों को अस्पताल में बेड दिलाने, दवा-इंजेक्शन से लेकर ऑक्सीजन और वेंटिलेटर के इंतजाम की भरसक कोशिश करते रहे। सबसे बड़ी बात यह रही कि अपनी व्यस्तता के बाद भी व्यक्तिगत रूप से पीड़ित पत्रकार और उनके परिजनों को फोन कर उनकी खैरियत पता करते रहे। अपने इस दायित्व में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि आशुतोष प्रताप सिंह ने छोटे-बड़े पत्रकारों में भेद न करते हुए सभी से बात की। जनसम्पर्क की छवि सुधारने और शासन से मीडिया के दोस्ताना रिश्ते को मजबूत करने में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान एवं संचालक जनसम्पर्क की विशेष भूमिका रही। किसी भी राज्य में इस तरह की पहल करने वाला भी शायद मध्य प्रदेश ही इकलौता राज्य है।

कोरोना ने रिश्तों का ताना-बाना तोड़ा तो नए और मजबूत रिश्तों का श्रीगणेश भी किया। हिंदी पट्टी के पत्रकारों का पहली बार एक नए अनुभव से सामना हुआ। इसका श्रेय मध्य प्रदेश में भोपाल की ‘जर्नलिस्ट हेल्थ केयर सोसायटी’ और इंदौर की आईएमयू (इंदौर मीडिया यूनाइटेड) को जाता है। पत्रकार सामूहिक पहल करें तो सोसायटी उनकी मदद के लिए आगे आती है, यह बात भोपाल-इंदौर ने स्थापित कर दी है। इस तरह की पहल देश के हर राज्य और शहर में किए जाने की आवश्यकता है ताकि पत्रकारिता पर आंच न आए और पत्रकारों का आत्मस्वाभिमान कायम रहे। इस बार दिल से हिंदी पत्रकारिता दिवस की जय बोलिये।

(लेख ‘समागम’ पत्रिका के संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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हिंदी पत्रकारिता का भविष्य डिजिटल युग में भी बहुत ही उज्जवल है: प्रो. के.जी. सुरेश

आज पूरे विश्व में हिंदी को जो सम्मान मिला है, उसमें हिंदी पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है

Last Modified:
Sunday, 30 May, 2021
HindiJournalismDay9854

 प्रो. के.जी. सुरेश ।।

आज ही के दिन 1826 में पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने साप्ताहिक पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का पहला संस्करण भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित किया था। तब से लेकर अब तक हिंदी पत्रकारिता की एक ऐतिहासिक यात्रा रही है। इस यात्रा में संघर्ष भी रहा है, इस यात्रा में सफलताएं भी रही हैं। आज पूरे विश्व में हिंदी को जो सम्मान मिला है, उसमें हिंदी पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है, फिर चाहे वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हो या स्वतंत्रता के पश्चात जो एक नए राष्ट्र के निर्माण के लिए संघर्ष रहा, उसके लिए हो या आपातकाल में तानाशाही के विरोध का हो। हिंदी पत्रकारिता का जो इतिहास है, उसे स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जा सकता है।

मैं तो अंग्रेजी पत्रिकारिता के अपने छात्रों को भी बताता हूं कि वे नियमित रूप से हिंदी पत्रकारिता के लिए एक हिंदी अखबार जरूर पढ़ें और एक चैनल भी जरूर देखें। इसका कारण यह है कि हिंदी पत्रकारिता जन सरोकार की पत्रकारिता है। हिंदी पत्रकारिता में मिट्टी की खुशबू आती है। वो ग्रामीण अंचलों से, हमारे खेत-खलिहानों से हम तक समाचार पहुंचाती है। जन-जन के, जिसमें गरीब, निर्धन, संघर्षशील, मजदूर सभी के मुद्दों को राष्ट्र के सामने, सरकार के सामने लाती है और सरकार व जनता के बीच में एक मजबूत सेतु का कार्य करती रही है।  

हिंदी पत्रकारिता का भविष्य डिजिटल युग में भी बहुत ही उज्जवल है। आज बहुत बड़ी संख्या में युवा पाठक, दर्शक, श्रोता डिजिटल मीडिया की ओर आकर्षित हुए हैं और यदि आप आंकड़े देखेंगे तो हिंदी पत्रकारिता ने भारत में सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी को अपनी ओर अकर्षित किया है। कुछ समस्याएं जरूर हैं, कुछ कठिनाइयां हैं, कुछ कमियां हैं, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाला भविष्य बहुत उज्जवल है और हम सब मिलकर हिंदी पत्रकारिता में नए मील के पत्थर को जरूर स्थापित कर पाएंगे।  

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)

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'सकारात्‍मक खबरें देकर पाठकों में विश्वास पैदा करे मीडिया'

भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस के उपलक्ष्‍य में आयोजित ‘शुक्रवार संवाद’ में 'कोरोना काल के बाद की पत्रकारिता’ विषय पर मीडिया छात्रों को संबोधित कर रहे थे

Last Modified:
Saturday, 29 May, 2021
Media5451

'तन का कोरोना यदि तन से तन में फैला, तो मन का कोरोना भी मीडिया के एक वर्ग ने बड़ी तेजी से फैलाया। मीडिया को लोगों के सरोकारों का ध्‍यान रखना होगा, उनके प्रति संवेदनशीलता रखनी होगी। यदि सत्‍य दिखाना पत्रकारिता का दायित्‍व है, तो ढांढस देना, दिलासा देना, आशा देना, उम्‍मीद देना भी उसी का उत्‍तरदायित्‍व है। अमेरिका में 6 लाख मौते हुईं, लेकिन वहां हमारे चैनलों जैसे दृश्‍य नहीं दिखाए गए। 11 सितम्‍बर के आतंकवादी हमले के बाद भी पीड़ितों के दृश्‍य नहीं दिखाए गए थे। हमारे यहां कुछ वर्जनाएं हैं, जिन पर ध्‍यान देना होगा। सत्‍य दिखाएं, लेकिन कैसे दिखाएं, इस पर गौर करना जरूरी है। चाकू चोर की तरह चलाना है, या सर्जन की तरह यह तय करना होगा,' यह कहना है वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय का। वे भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस के उपलक्ष्‍य में आयोजित ‘शुक्रवार संवाद’ में 'कोरोना काल के बाद की पत्रकारिता’ विषय पर मीडिया छात्रों को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर ‘अमर उजाला’ डिजिटल के संपादक जयदीप कर्णिक, ‘दैनिक ट्रिब्‍यून’ चंडीगढ़ के संपादक राजकुमार सिंह और ‘हिन्दुस्‍तान’ की कार्यकारी संपादक जयंती रंगनाथन ने भी अपने विचार साझा किए।

इससे पहले भारतीय जन संचार संस्‍थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि समाज के अवसाद, चिंताएं कैसे दूर हों, इस पर चिंतन आवश्‍यक है। यह सामाजिक संवेदनाएं जगाने का समय है। सारे काम सरकार पर नहीं छोड़े जा सकते। विद्यार्थियों के लिए इस समय जमीन पर जाकर कर काम करना जरूरी है। वे अपने आसपास के लोगों को संबल दें। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जो इंसान को इंसान बनाए।

जयदीप कर्णिक ने कहा कि तकनीक की दृष्टि से कोरोना ने ‘फास्‍ट फॉरवर्ड’ का बटन दबा दिया है। यूं तो पहले से ही ‘डिजिटल इज़ फ्यूचर’ जुमला बन चुका था, लेकिन जो तकनीकी बदलाव 5 साल में होना था, वह अब पांच महीने में ही करना होगा। तकनीक के साथ चलना होगा, तभी कोई मीडिया घराने के रूप में स्‍थापित हो सकेगा। उन्होने कहा कि इस दौर में पत्रकारिता को भी अपने हित पर गौर करना होगा। कोरोना की पहली लहर में डिजिटल पर ट्रैफिक चार गुना बढ़ा था, जो दूसरी लहर में उससे भी कई गुना बढ़ गया। डिजिटल में यह जानने की सुविधा है कि पाठक क्‍या पढ़ना चाहता है और कितनी देर तक पढ़ना चाहता है। पत्रकार शुतुर्मुर्ग की तरह नहीं बन सकता, जरूरी है कि  सत्‍य दिखाइए, पर इस तरह दिखाइए कि लोग अवसाद में न जाएं। हमें सलीके से सच दिखाना होगा।

राजकुमार सिंह ने कहा कि कोरोना काल ने केवल पत्रकारिता को ही नहीं, बल्कि हमारी जीवन शैली और जीवन मूल्‍यों को भी झकझोर कर रख दिया। पत्रकारिता ने कई अनपेक्षित बदलाव देखे। उस पर कई तरफ से प्रहार हुआ। सबसे ज्‍यादा असर तो यह हुआ कि लोगों ने अखबार लेना बंद कर दिया। कोरोना की पहली लहर के बाद 40 से 50 प्रतिशत पाठक ही अखबारों की ओर लौट पाए। कोरोना काल में अपनी जान गंवाने वाले पत्रकारों का जिक्र करते हुए उन्होने कहा कि देश में ऐसा कोई आंकड़ा नहीं कि कितने पत्रकारों की जान गईं। यह आंकड़ा चिकित्‍सा जगत के लोगों की मौतों के आंकड़े से कहीं ज्‍यादा हो सकता है। पत्रकार भी ‘फ्रंटलाइन योद्धा’ हैं उनकी भी चिंता की जानी चाहिए।

जयंती रंगनाथन ने कहा कि मीडिया को सकारात्‍मक खबरें देनी होंगी। उसे लोगों को बताना होगा कि पुराने दिन लौट कर आएंगे, लेकिन उसमें थोड़ा वक्‍त लगेगा। हमारा डीएनए पश्चिमी देशों से भिन्‍न है, जैसा वहां है, यहां ऐसा नहीं होगा। हमें भी अपने पाठकों की मदद करनी होगी। हमें लोगों के सरोकारों से जुड़ना होगा। सकारात्‍मक खबरों का दौर लौटेगा और प्रिंट मीडिया मजबूती से जमा रहेगा।

कार्यक्रम का संचालन 'अपना रेडियो' और आईटी विभाग की विभागाध्‍यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) संगीता प्रणवेंद्र ने किया। डीन (अकादमिक) प्रो. (डॉ.) गोविन्‍द सिंह ने धन्‍यवाद ज्ञापन किया।

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