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ऐसे में बीस-पच्चीस साल पुराने अरुण जेटली याद आते थे, बोले वरिष्ठ पत्रकार आलोक जोशी

जान लगा देने का जज्बा ही था कि लंबी बीमारी के बावजूद वो मोदी सरकार में न सिर्फ महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालते रहे, बल्कि तमाम मोर्चों पर संकट मोचक की भूमिका भी निभाते रहे

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार।।

मेरा अरुण जेटली से कभी कोई निजी रिश्ता नहीं रहा। पच्चीस साल पहले एक रिपोर्टर के तौर पर बड़े मुकदमों के सिलसिले में उनकी छोटी टिप्पणियां रिकॉर्ड करने से लेकर पिछले कुछ वर्षों में वित्तमंत्री के इंटरव्यू करने तक चंद औपचारिक मुलाकातें ही हैं। इनमें भी ज़्यादातर भागते दौड़ते, कट टू कट बातचीत। जिंदगी अक्सर सांस लेने का भी वक्त नहीं देती।

दो-चार मौकों पर संपादकों से बातचीत वाले औपचारिक भोज सत्रों में भी मुलाकातें हुईं, लेकिन पिछले कुछ सालों में ये साफ दिखता था कि सेहत उन्हें परेशान कर रही है। बैठक या इंटरव्यू के दौरान भी ये दबाव महसूस होने लगा था। ऐसे में बीस-पच्चीस साल पुराने अरुण जेटली याद आते ही आते थे। हंसते, मुस्कुराते, जिंदादिल अरुण जेटली। शुरुआती दिनों में जिसने भी उन्हें देखा, वो उनकी शख्सियत के जादू से अछूता नहीं रह सकता। मुस्कुराहट, हंसी, तर्क की ताकत और मुकदमों में जान लगा देने का जज्बा।

जान लगा देने का जज्बा ही था कि लंबी बीमारी के बावजूद वो मोदी सरकार में न सिर्फ महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालते रहे, बल्कि तमाम मोर्चों पर संकट मोचक की भूमिका भी निभाते रहे। पार्टी के बाहर और राजनीति के बाहर भी अरुण जेटली बहुतों के दोस्त, हितैषी और मददगार थे। बैठकबाज भी थे। इसलिए पत्रकारों की एक मंडली भी थी, जो निरंतर उनके आसपास देखी जाती थी और इस नज़दीकी का फायदा भी उठाती थी। लेकिन किस्सा इस मंडली तक का नहीं है।

बहुत से पत्रकार हैं और गैर पत्रकार भी, जिनकी वक्त जरूरत जेटली जी ने मदद की। खासकर बुरे वक्त पर उनके पास जाने वाले निराश नहीं लौटते थे। मदद तो उन्होंने राजनीति में भी की। ऐसे लोगों की काफी मदद की जो फर्श से अर्श तक पहुंचे और उन्हें जेटली जी हमेशा मित्र और हितैषी दिखते रहे।

राजनीति में भी उन्होंने एक अलग अंदाज से ही अपना मुक़ाम बनाया। लोग सोचते रहे, कहते रहे और लिखते रहे कि अब जेटली कमजोर पड़ रहे हैं, लेकिन वो लगातार मजबूत होते रहे। नरेंद्र मोदी उन पर कितना भरोसा करते रहे, ये कम ही लोगों को पता है, मगर अब धीरे-धीरे ज्यादा लोगों को महसूस होगा, जैसे-जैसे उनके न रहने से पैदा हुआ खालीपन सामने आएगा।


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