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पत्रकारिता में राष्ट्रवाद के प्रणेता थे राजेन्द्र माथुर : आलोक मेहता

इतिहास की परतें निकालने के साथ 21वीं सदी की रेखाओं को असाधारण ढंग से कागज पर उतार देने की क्षमता भारत के किसी हिंदी संपादक में देखने को नहीं मिल सकती।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 6 months ago

आलोक मेहता, एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष।

राजेन्द्र माथुर का जन्म 7 अगस्त, 1935 को मध्यप्रदेश के धार जिले की बदनावर तहसील में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा धार में हुई। इंदौर से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। अंग्रेजी साहित्य और दर्शन में गहरी रुचि रही। शिक्षा पूरी होने के पहले ही 1955 में इंदौर की ‘नई दुनिया’ में लिखना प्रारंभ कर दिया। 60 के दशक में उनके साप्ताहिक लेख ‘पिछला सप्ताह’ बहुत प्रसिद्ध हुए। 1970 तक वह इंदौर में एक कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन भी करते रहे। 1970 में उन्होंने कॉलेज में अध्यापन-कार्य छोड़ दिया और ‘नई दुनिया’ के संपादन विभाग में आ गए। 1980 में उन्हें द्वितीय प्रेस आयोग का सदस्य मनोनीत किया गया। 1981 में ‘नई दुनिया’ के प्रधान संपादक बने। अक्टूबर 1982 में दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक का पद संभाला। 9 अपै्रल 1991 को उनका आकस्मिक निधन हो गया।

मूर्धन्य पत्रकार राजेन्द्र माथुर के लेखन की समय सीमा तय नहीं हो सकती। इतिहास की परतें निकालने के साथ 21वीं सदी की रेखाओं को असाधारण ढंग से कागज पर उतार देने की क्षमता भारत के किसी हिंदी संपादक में देखने को नहीं मिल सकती। इसलिए 1963 से 1969 के बीच राजेन्द्र माथुर द्वारा लिखे गए लेख आज भी सामयिक और सार्थक लगते हैं। अगस्त, 1963 में उन्होंने लिखा था-‘हमारे राष्ट्रीय जीवन में दो बुराइयां घर कर गई हैं जिन्होंने हमें सदियों से एक जाहिल देश बना रखा है। पहली तो अकर्मण्यता, नीतिहीनता और संकल्पहीनता को जायज ठहराने की बुराई, दूसरी पाखंड की बीमारी, वचन और कर्म के बीच गहरी दरार की बुराई।’

कलम के सिपाहियों का महानायक सेनापति संपादक ही कहा जा सकता है। जमाना तलवार, तोप, टैंक, लड़ाकू विमान या जहाज अथवा मिसाइलों का हो, सेनापति निरंतर तैयारी करते हैं। उन्हें युद्ध अवश्य लगातार नहीं करने होते लेकिन संपादक का वैचारिक द्वंद्व व्यूह रचना, अपनी कलम के चमत्कार दिखाते हुए अपनी संपादकीय टीम को निरंतर सजग, सटीक, संयमित धारदार, ईमानदार, निष्पक्ष और सफल बनाने की चुनौती हर दिन बनी रहती है। सैनिकों के घाव दिखते ही उपचार की व्यवस्था होती है। लेकिन संपादक के घाव-दर्द को देखना-समझना आसान नहीं और उपचार भी बहुत कठिन। कलम के चमत्कार देखकर लाखों-करोड़ों लोग अभिभूत होते हैं- प्रशंसा करते हैं, असहमत रहने पर आलोचना भी करते हैं। संपादक की निष्पक्षता और गरिमा से उन्हें ‘स्टार’ मानते हैं। लेकिन उनके संघर्ष की भनक बहुत कम लोगों को मिलती है।

आधुनिक भारत के श्रेष्ठतम हिन्दी संपादकों में अग्रणी अपने संपादक राजेन्द्र माथुर से जुड़ी संघर्ष यात्रा की एक झलक पेश करना जरूरी है। इंदौर के प्रतिष्ठित कॉलेज में प्राध्यापक रहते हुए राजेन्द्र माथुर ने प्रदेश के प्रमुख अखबार नई दुनिया में लिखना प्रारंभ किया। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मामलों पर उनकी टिप्पणियों ने पाठकों को ही नहीं प्रबंधकों और उनके वरिष्ठतम पार्टनर प्रधान संपादक राहुल बारपुते को भी चमत्कृत कर दिया। इसलिये 1970 में अखबार की पृष्ठ संख्या 8 से 12 तक रखने के लिए संपादकीय विस्तार के साथ राजेन्द्र माथुर को प्राध्यापक की नौकरी छोड़ पूर्णकालिक संपादक के रूप में जोड़ लिया गया।

कुछ ही महीनों बाद एक वर्कशाप में लिखित प्रतियोगिता के आधार पर मुझे उज्जैन के अंशकालिक संवाददाता के बजाय इन्दौर में संपादकीय विभाग में उप संपादक-संवाददाता की तरह जुड़ने का प्रस्ताव मिला। इतनी कम उम्र में इतना आकर्षक प्रस्ताव स्वीकारना ही था। राजेन्द्र माथुर को इंदौर नई दुनिया में रखने के लिए 1981 में प्रधान संपादक बना दिया गया। लेकिन उन्हें भी अखबार के विस्तार के बिना छटपटाहट होती रही। 1990 या 2000 के बाद जो लोग संपादक के वर्चस्व का मुद्दा उठाते हैं, उन्हें ऐसे तथ्यों पर भी देखना चाहिए कि अज्ञेय, राजेन्द्र माथुर, मनोहर श्याम जोशी, एस. निहाल सिंह, कुलदीप नैयर, बी.जी. वर्गीज, खुशवंत सिंह जैसे नामी संपादकों को भी प्रबंधकीय सीमाओं से निपटना पड़ता था और देर सबेर संस्थान छोड़ने भी पड़े।

मैं 1971 में दिल्ली आया। हिन्दुस्थान समाचार, साप्ताहिक हिन्दुस्तान में काम करने के बाद जर्मनी रेडियो (डॉयचे वेले) के हिन्दी विभाग का संपादक रहने के बाद 1982 में दिल्ली वापस आया। राजेन्द्र माथुर अक्टूबर 1982 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनकर आ गए। उन्होंने मेरी खबरें नवभारत टाइम्स में छापनी शुरू कर दीं। स्वाभाविक है कि माथुर साहब तो अखबार के कायाकल्प के लिए आए थे। उन्होंने पुरानी मशीनों की तरह घिसी-पिटी पत्रकारिता को बदलने के लिए सारे मोर्चे खोल दिए। लगभग एक वर्ष के अंतराल में मुझे विशेष संवाददाता के रूप में नवभारत टाइम्स में लाए। राजेन्द्र माथुर की विशेषता यह थी कि राजनेता या प्रबंधकों के विचार या संबंध कैसे भी हों, अपनी बात की निष्पक्षता और पैनेपन में कमी नहीं आने देते थे।

अपने से जुड़े दो-तीन किस्से। सत्ता से जुड़े चन्द्रास्वामी का असली नाम नेमीचन्द जैन था। इसलिये टाइम्स के मालिक जैन परिवार से भी उसने अपने थोड़े संबंध जोड़ लिए थे और कभी कभार उनके बंगले के गेस्ट रूम में ठहर भी जाता था। एक बार मैंने चन्द्रास्वामी के राजनीतिक षडयंत्रों को उजागर करने वाली विस्फोटक खबर लिखी। पहले समाचार संपादक पारसदास जैन की नजर पड़ी। वह दौड़ते हुए मेरी मेज के पास आकर बोले- ‘जानते हैं यह कौन है?’ मैंने सहजता से कहा- ‘हां, वर्षों से जानता हूं- राजनीतिज्ञों को ठगने वाला चन्द्रास्वामी।’

समाचार संपादक ने झुंझलाते हुए कहा- ‘अरे भाई, जरा समझो- यह जो भी हो- मालिकांे के गेस्ट हाउस में भी रहता है। समझते हो छपने पर क्या होगा?’ मैंने फिर सहजता से उत्तर दिया- ‘क्या होगा- यह माथुर साहब जानें। समाचार संपादक ने माथुर साहब के सामने जाकर अपनी बात कही और रिपोर्ट की कापी दिखा दी। माथुर साहब ने पढ़कर बिना कुछ काटे ‘टिक’ लगाया और कहा कि आप इसे छाप दीजिए। अब उनसे बहस की हिम्मत किसे होती? अब वैसी एक नहीं, कम से कम पांच-सात खबरें चन्द्रास्वामी के भंडाफोड़ पर छपीं।

दूसरा किस्सा राष्ट्रपति भवन से जुड़ा हुआ है। ज्ञानी जैल सिंह राष्ट्रपति थे। वह हिन्दी के संपादकों और पत्रकारों के साथ बड़ा सम्मान और स्नेहमय व्यवहार रखते थे। नवभारत टाइम्स के संपादक के नाते राजेन्द्र माथुर की इज्जत करते थे और नियमित रूप से अखबार भी पढ़ते थे। पंजाब में आतंकवादी घटनाएं बढ़ने के बाद मैंने नवभारत टाइम्स के लिए एक रिपोर्ट लिखी जिसमें राष्ट्रपति भवन में आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े एक व्यक्ति को अतिथि कक्ष में रखे जाने जैसी गंभीर सूचनाओं का विवरण था।

माथुर साहब ने उस रिपोर्ट में भी एक पंक्ति नहीं काटी और पहले पृष्ठ पर प्रमुखता से खबर छप गई। सीधे ज्ञानीजी को उत्तरदायी नहीं ठहराया गया था लेकिन राष्ट्रपति भवन के प्रेस सचिव ज्ञानीजी के वरिष्ठ विश्वसनीय सहयोगी का नाम उसमें आया था। यह खबर भी सरकार के ही प्रवर्तन निदेशालय द्वारा न्यायालय तक पहुंचाए गए प्रकरण से ली गई थी।

इसलिए इसकी प्रामाणिकता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं था लेकिन भारत में संभवतः यह पहला अवसर था जबकि सीधे राष्ट्रपति भवन और आतंकवादी गतिविधियों के सूत्रों की सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किसी अखबार प्रकाशित हुआ। हंगामा स्वाभाविक था। अगले दिन प्रधान संपादक के अलावा कंपनी के अध्यक्ष और कार्यकारी निदेशक तक राष्ट्रपति भवन से नाराजगी पहुंचाई गई। लेकिन वह राजेन्द्र माथुर ही थे जिन्होंने इस मुद्दे पर निडरता दिखाई और किसी तरह की क्षमा-याचना या भूल सुधार जैसी बात नहीं छापी।

चन्द्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने पर टाइम्स संस्थान के एक कार्यक्रम में उनकी ही उपस्थिति में माथुर साहब ने अपने भाषण में कुछ व्यंग्यात्मक टिप्पणियां कर दीं। जे.पी. आंदोलन और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के समर्थक होने के बावजूद चन्द्रशेखर सरल सहज स्वभाव से की गई टिप्पणी को बर्दाश्त नहीं कर सके और अगले दिन प्रबंधकों के समक्ष अपना कड़ा विरोध प्रकट किया। प्रबंधकों ने उनकी नाराजगी माथुर साहब तक पहुंचाई। संवेदनशील माथुर साहब को यह जानकर बेहद दुःख हुआ। उन्हें चन्द्रशेखर से ऐसी उम्मीद नहीं थी। वह अंदर ही अंदर दुःखी रहे।

दूसरी तरफ विश्वनाथ प्रताप सिंह और चन्द्रशेखर के साथ अच्छे संबंध रखने वाले संपादकीय सहयोगी अपने ढंग से प्रबंधन के समक्ष माथुर साहब के नेतृत्व को लेकर अपनी असहमतियां भी बताते रहे। दुर्भाग्य यह था कि जिन वरिष्ठ सहयोगियों को माथुर साहब ने ही अखबार के साथ जोड़ा था, वे अपने निजी स्वार्थों के लिए जाने-अनजाने माथुर साहब को किनारे करने के अभियान चलाते रहे।

नवभारत टाइम्स में व्यापक बदलाव से हिन्दी पत्रकारिता को एक नई दिशा मिल रही थी। राजेन्द्र माथुर के प्रस्तावों और प्रयासों को प्रबंधन का समर्थन मिल रहा था। इसलिए लखनऊ, पटना और जयपुर से भी अखबार के संस्करण शुरू हुए। मुंबई में तो पहले से ही संस्करण था। माथुर साहब दफ्तर के अंदर और सार्वजनिक मंचों से भी यह कहते रहे कि कोई अखबार राष्ट्रीय अखबार होने का दावा तभी कर सकता है, जबकि देश के अधिकांश राज्यों में उसके संस्करण हों। 1990 के आसपास कुछ सहयोगियों ने समीर जैन के दिमाग में यह विचार फूंका कि नवभारत टाइम्स के साथ-साथ टाइम्स ऑफ इंडिया की भी सामग्री बाजार में पहुंचाने के लिए टाइम्स का एक हिन्दी संस्करण अलग से निकाला जाए। उस समय नवभारत टाइम्स में टाइम्स की एकाध कोई विशेष खबर होने पर अवश्य छप जाती थी, लेकिन अपनी मौलिकता बनाई हुई थी।

सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने तो एक बार यह सुझाव दिया था कि माथुर साहब एक बड़े बुद्धिजीवी संपादक हैं इसलिए उन्हें नवभारत टाइम्स के बजाय रीडर्स डाइजेस्ट जैसी एक श्रेष्ठतम पत्रिका निकालने का दायित्व सौंप दिया जाए। लेकिन धर्मयुग और दिनमान के रहते कंपनी के अध्यक्ष या कार्यकारी निदेशक इस तरह की पत्रिका के लिए सहमत नहीं हो सकते थे। तब टाइम्स के अनुदित अखबार के लिए बड़ी चतुराई से माथुर साहब द्वारा ही लाए गए सहायक संपादक विष्णु खरे को आगे बढ़ा दिया गया। विष्णु खरे के साथ दो सहायक संपादकों की भी नियुक्ति कर दी गई।

अनुदित अखबार की इस योजना के लिए राजेन्द्र माथुर से किसी तरह का विचार-विमर्श नहीं होता था। अपने ही संस्थान में इस तरह के अखबार निकाले जाने की तैयारी पर माथुर साहब और रमेशचन्द्र जैन बेहद दुःखी थे। यह अप्रसन्नता कंपनी के अध्यक्ष अशोक जैन तक भी पहुंची और कुछ महीनों के बाद इसे पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। वह अनुदित अखबार कभी नहीं निकला।

पटना का संपादक रहते हुए मैंने बहुचर्चित चारा कांड का भंडाफोड़ करने वाली प्रामाणिक और दस्तावेजी खबरें सबसे पहले नवभारत टाइम्स में ही छापी। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के समर्थकों ने टाइम्स की प्रिंटिंग यूनिट पर हमला कर आग लगाने का प्रयास भी किया। लेकिन राजेन्द्र माथुर की संपादकीय दृढ़ता का ही नतीजा था कि मुझे या किसी संपादकीय सहयोगी को प्रबंधन से कभी किसी हस्तक्षेप या विरोध की सूचना नहीं मिली।

माथुर साहब के लेखन में गांधी, नेहरू, मार्क्स, लोहिया के विचारों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आप उन्हें किसी धारा से नहीं जोड़ सकते। वह भारतीय परंपराओं और संस्कृति का हवाला देते हुए संकीर्णता की बेड़ियां काट आधुनिक दृष्टिकोण अपनाने पर भी जोर देते रहे। वह सभ्यता को अक्षुण्ण रखने के लिए जंगली जिंदादिली को जरूरी मानते थे। माथुर साहब ने देश के संपादकों की संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के महासचिव के रूप में भी पत्रकारिता के आदर्श मूल्यों तथा अभिव्यक्ति की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।

राजेन्द्र माथुर ने फरवरी 1990 में ‘नवभारत टाइम्स’ के पटना संस्करण से जुड़े मेरे सहयोगी पत्रकारों के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अपने सहज अंदाज में कहा थाः ‘जीवन से ज्यादा चरित्र महत्वपूर्ण माना जाता है। जिंदगी क्या है, आदमी मर जाना पसंद करेगा, लेकिन अपने यश का मर जाना मर जाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी की यश-हत्या कोई आसानी से कैसे कर सकता है।’

1981 से 1991 के बीच पूरे दशक में भारतीय राजनीति और सामाजिक बदलाव के दौर में माथुरजी के द्वारा लिखे गए लेख निश्चित रूप से पत्रकारिता के इतिहास में सदैव याद रखे जाएंगे। इस दौर में पंजाब का आतकवाद चरम सीमा पर पहुंचा और ‘ब्ल्यू स्टार आपरेशन’ के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या हुई। फिर राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह तथा चंद्रशेखर सत्ता में आए। देश के इतिहास ने इस अवधि में अनेक करवटें लीं। आर्थिक उदारीकरण का सिलसिला भी इन्हीं वर्षों में शुरू हुआ। रूस, चीन और अमेरिका जैसै देशों में भी बड़ी उथल-पुथल हुई।

माथुर साहब ने हर घटना में आशा की एक नई किरण दिखाई। सिद्धांतपरक राजनीति में उनकी गहरी आथा के कारण ही उन्होंने लिखाः ‘यूरोप में भले ही विचारधारा की लड़ाइयां खत्म हों और इतिहास का अंत हो गया हो, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में इतिहास का अंत अभी नहीं हुआ, क्योंकि सारा खेल लंबी प्रतीक्षा का है। इसलिए जिसका धैर्य टूटेगा, वह हार जाएगा।’ यह माथुर साहब की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान द्वारा परमाणु बम बनने से पंद्रह वर्ष पहले ही लिख दिया थाः ‘आज नहीं तो कल पाकिस्तान और भारत दोनों के पास एटम बम होगा और हमें सोच रखना चाहिए कि तब क्या होगा?... एटम बम तैयार कर लेने के बाद दोनों देशों का अपना घर ज्यादा संभालना होगा। संभले हुए देश की एकता को एटम बम मजबूत करेगा, लेकिन टूटते देश की टूटन को वह अधिक सुगम बना सकता है...।’

राजीव गांधी की निर्मम हत्या के बाद जब कई पत्रकार देश के टूटने तक की बात लिख रहे थे, तब माथुर साहब ने लिखा: ‘वरदान हैं अस्थिरिता की भविष्यवाणियां।’ इसी शीर्षक से एक लेख में उन्होंने कहा- ‘विनोबा ने एक धर्मग्रंथ का हवाला देते हुए कभी पूछा था कि यदि आपको यह जानकारी हो कि कल ही मरना है तो आज का दिन आप कितनी सात्विक हड़बड़ी में बिताएंगे? और उन्होंने सलाह दी थी कि आदमी को अपनी जिंदगी का हर दिन इसी अहसास के साथ जीना चाहिए कि यही आखिरी दिन है...खिलकर मुरझाने वाली कुमुदिनी तीन सौ साल तक खड़े रहने वाले बरगद से कहीं ज्यादा सुंदर है। यदि खिले हुए फूल की पंखुड़ियों पर इस फिक्र की सलवटें पड़ने लगीं कि सारी खूबसूरती आनी-जानी है तो बताइए इस संसार का क्या होगा!’

इस तरह के विचार लिखते समय माथुर साहब को क्या कभी यह महसूस होता था कि अचानक भारतीय पत्रकारिता का सूर्य सुदूर बादलों में कहीं छिप जाएगा? किसी ने कल्पना नहीं की थी कि सैकड़ों पत्रकारों को अदम्य विश्वास देने वाला महान संपादक केवल 56 वर्ष की आयु में अचानक उनके बीच से चला जाएगा। ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘दिनमान टाइम्स’ में नियमित रूप से छप रहे माथुर साहब के लेखों पर देश-भर में बड़ी संख्या में पाठकों के पत्र आते थे। एक दिन अचानक खबर मिली कि वह अनंत विश्राम के लिए चले गए हैं और उनके दर्शन अब कभी नहीं होंगे। यह हम सबके लिए निजी आघात तो था ही, संपूर्ण हिंदी पत्रकारिता के लिए एक सुनहरे अध्याय पर आकस्मिक पटाक्षेप जैसी स्थिति थी।

( यह लेखकके निजी विचार हैं)


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