पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने आरोप लगाया कि दिल्ली में पटाखों पर प्रतिबंध लगे होने के कारण साजिश करके हरियाणा और यूपी से पटाखे दिल्ली लाए गए।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
रजत शर्मा, चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ (इंडिया टीवी)
दिवाली के बाद दिल्ली की हवा एक बार फिर बेहद खराब कैटेगरी में पहुंच गई। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक़, आनंद विहार का एयर क्वालिटी इंडेक्स 296, पंजाबी बाग का 280, और ITO का 263 तक पहुंच गया। वहीं पूसा रोड का AQI 362 और आर.के. पुरम का AQI 290 रिकॉर्ड किया गया। दिल्ली पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटी का कहना है कि पिछले साल की तुलना में इस बार दिवाली के बाद दिल्ली की हवा में प्रदूषण का स्तर 45 परसेंट बढ़ गया।
प्रदूषण की वजह पटाखों को बताया जा रहा है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरमेंट CSE के वैज्ञानिकों ने बताया कि रात दो बजे दिल्ली के कुछ इलाक़ों का एयर क्वालिटी इंडेक्स 900 से एक हज़ार तक पहुंच गया था हालांकि सोमवार को दोपहर बाद इसमें कुछ कमी आई। DPCC की रिपोर्ट के मुताबिक़, दिवाली के बाद दिल्ली की हवा में 2.5 पार्टिकुलेट मैटर्स यानी PM 2.5 33 परसेंट बढ़ गए थे, तो PM 10 का लेवल पिछले साल की दिवाली की तुलना में 45 परसेंट तक बढ़ा हुआ रिकॉर्ड किया गया। PM 2.5 को फेफड़ों के लिए बेहद नुक़सानदेह माना जाता है।
दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने आरोप लगाया कि दिल्ली में पटाखों पर प्रतिबंध लगे होने के कारण साज़िश करके हरियाणा और यूपी से पटाखे दिल्ली लाए गए ताकि दिल्ली की हवा को ख़राब किया जा सके। गोपाल राय ने इसमें भी बीजेपी नेताओं का हाथ बताया। बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने राय के आरोपों को बेतुका बताया।
दिलचस्प बात ये है कि इस बार पंजाब सरकार ने दावा किया है कि पूरे पंजाब में दिवाली के बाद एयर क्वालिटी इंडेक्स 2022 की तुलना में लगभग 8 परसेंट सुधर गया। वहीं, 2021 के मुक़ाबले इस बार दिवाली के बाद पंजाब का एयर क्वालिटी इंडेक्स क़रीब 23 परसेंट बेहतर रहा। पंजाब सरकार पिछले आंकड़ों से तुलना करके अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन सच्चाई ये है कि दिवाली से पहले की तुलना में पंजाब का एयर क्वालिटी इंडेक्स, दिवाली के बाद 30 परसेंट तक ख़राब हो गया।
11 नवंबर को पंजाब के कई शहरों का AQI 100 के आस-पास था लेकिन दिवाली के बाद पटियाला का AQI 169, लुधियाना का 166, अमृतसर का एयर क्वालिटी इंडेक्स 161 और संगरूर का 167 दर्ज किया गया। साफ है कि पंजाब की भगवंत मान सरकार पिछले दो साल के आंकड़ों से तुलना करके अपनी तारीफ़ कर रही है। मगर,सच्चाई ये है कि पंजाब में भी दिवाली के बाद हवा ख़राब हुई। फिलहाल,आम आदमी पार्टी ने ये नहीं बताया है कि पंजाब की एयर क्वालिटी ख़राब होने के पीछे ज़िम्मेदार कौन है।
ये सोचकर भी अजीब लगता है कि दिल्ली का प्रदूषण सियासी टकराव का मसला बन गया है। दिल्ली में रहने वाले दो करोड़ लोग ज़हरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं और दिल्ली की सरकार के मंत्री इसका हल निकालने की बजाय ये बताने में लगे हैं कि दिवाली की रात पटाखे बीजेपी वालों ने चलाए। दूसरी तरफ के लोग ये समझाने में लगे हैं कि पटाखों और आतिशबाजी पर पाबंदी लगाने का कोई फायदा नहीं हुआ, न दिल्ली में, न मुंबई में।
ये भी कहा गया कि पटाखों पर पाबंदी का समर्थन करने वाले हिंदू विरोधी हैं। असलियत है कि किसी को नहीं पता कि दिल्ली में वायु प्रदूषण की असली वजह क्या है, पंजाब की पराली या दिल्ली की आतिशबाजी? न ही किसी को ये पता है कि वायु प्रदूषण का हल क्या है? आसमान से बरसात हुई तो दिल्ली की हवा साफ हो गई, हवा चली तो प्रदूषण कम हो गया, बरसात बंद हुई, हवा रुकी तो प्रदूषण फिर लौट आया। अच्छा तो ये होगा कि सभी पार्टियों के लोग मिलकर अपना दिमाग लगाएं, मिलकर बैठें और सोचें कि वायु प्रदूषण का समाधान क्या है, ताकि अगले साल फिर इसी तरह की बयानबाज़ी न करनी पड़े।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
दोनों फिल्मों की शुरुआत धीमी रही, लेकिन बाद में दर्शकों के बीच ऐसी पकड़ बनी कि बॉक्स ऑफिस का पूरा गणित ही बदल गया।
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Samachar4media Bureau
डॉ. संदीप गोयल, Mogae Group के फाउंडर व चेयरमैन।
फिल्मी दुनिया में आमतौर पर बड़े सितारे, बड़ा बजट और शानदार ओपनिंग किसी फिल्म की सफलता का पैमाना माने जाते हैं। लेकिन ‘जय संतोषी मां’ और वर्ष 2026 की ‘हनुमान अंश’ ने इस सोच को अलग तस्वीर दिखाई। दोनों फिल्मों की शुरुआत धीमी रही, लेकिन बाद में दर्शकों के बीच ऐसी पकड़ बनी कि बॉक्स ऑफिस का पूरा गणित ही बदल गया। डॉ. संदीप गोयल ने अपने लेख में इन दोनों फिल्मों की सफलता के पीछे की वजहों को विस्तार से समझाया है।
30 मई 1975 को रिलीज हुई ‘जय संतोषी मां’ का निर्देशन विजय शर्मा ने किया था और इसे सतराम रोहरा ने 2.75 लाख रुपये के बजट में बनाया था। फिल्म में कानन कौशल, अनिता गुहा और भरत भूषण जैसे कलाकार थे। ये कलाकार 1950 के दशक में स्टार रह चुके थे, लेकिन 1975 तक उनकी लोकप्रियता पहले जैसी नहीं थी।
वहीं, 7 अगस्त 2026 को रिलीज हुई ‘हनुमान अंश’ का निर्देशन विशाल चतुर्वेदी ने किया है। यह उनकी किताब ‘डिवाइन डिटूर’ पर आधारित है। फिल्म का बजट 1.75 से 2 करोड़ रुपये बताया गया है और इसमें शोभिनाव सत्या मुख्य भूमिका में हैं, जो कोई जाना-पहचाना चेहरा नहीं थे।
डॉ. संदीप गोयल के मुताबिक, ‘जय संतोषी मां’ ने 1975 में 5 करोड़ रुपये की कमाई की और उस साल ‘शोले’ के बाद दूसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। वहीं ‘हनुमान अंश’ ने 41वें दिन तक भारत में 280 करोड़ रुपये का ग्रॉस कलेक्शन और दुनियाभर में 300.25 करोड़ रुपये का कारोबार कर लिया था।
जब थिएटर बन गए मंदिर: दोनों फिल्मों की सबसे खास बात यह रही कि दर्शकों ने उन्हें केवल फिल्म की तरह नहीं देखा, बल्कि उनके साथ धार्मिक आस्था भी जुड़ गई। 1975 में उत्तर प्रदेश और बिहार से ऐसी खबरें सामने आईं कि महिलाएं ‘जय संतोषी मां’ देखने के लिए नंगे पैर सिनेमाघरों में पहुंचती थीं और अपने साथ आरती की थाली भी लाती थीं। ‘मैं तो आरती उतारूं रे’ गीत के दौरान दर्शक स्क्रीन के सामने खड़े होकर फूल और सिक्के चढ़ाते थे। कुछ सिनेमाघरों के बाहर दानपात्र भी रखे गए थे।
2026 में ‘हनुमान अंश’ को लेकर भी इंदौर, लखनऊ और सूरत से इसी तरह के दृश्य सामने आए। दर्शक सिनेमाघर के बाहर जूते-चप्पल उतार रहे थे और फिल्म के क्लाइमैक्स के बाद स्क्रीन के सामने आरती कर रहे थे। सूरत में एक प्रदर्शक ने ‘हनुमान अंश’ के शो घटाकर केवल एक कर दिए थे। लेकिन दर्शकों को रोते और जयकारे लगाते देखकर उसने शो बढ़ाकर सात कर दिए। यह कहानी प्रदर्शकों के वॉट्सऐप ग्रुप में वायरल हुई और फिल्म के शो 29 से बढ़कर 41वें दिन 9,203 तक पहुंच गए।
फिल्म ने आस्था को नया रूप दिया: डॉ. गोयल के मुताबिक, 1975 से पहले संतोषी मां की पूजा बहुत सीमित स्तर पर होती थी। फिल्म के बाद शुक्रवार का व्रत देशभर में लोकप्रिय हुआ और संतोषी मां के मंदिर बनने लगे। ‘मैं तो आरती उतारूं रे’ गीत फिल्म से निकलकर वास्तविक पूजा का हिस्सा बन गया और पांच दशक बाद भी इसे आरती के तौर पर गाया जाता है।
इसी तरह 2026 से पहले नीम करोली बाबा की पहचान एक सीमित लेकिन खास अनुयायी वर्ग के बीच थी। ‘हनुमान अंश’ के बाद कैंची धाम को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी। लेख के मुताबिक, ‘कैंची धाम हाउ टू रीच’ जैसे सर्च में 400 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और कैंची में भीड़ नैनीताल की मॉल रोड से लंबी होने लगी।
दोनों फिल्मों में स्टार पावर नहीं थी: ‘जय संतोषी मां’ और ‘हनुमान अंश’ की एक और समानता यह रही कि दोनों फिल्मों में कोई बड़ा सुपरस्टार नहीं था। डॉ. गोयल का मानना है कि धार्मिक फिल्मों में दर्शकों के लिए कलाकार का चेहरा बहुत ज्यादा हावी नहीं होना चाहिए।
उनके मुताबिक, अगर ‘जय संतोषी मां’ में अमिताभ बच्चन होते तो दर्शक अमिताभ को देखते, संतोषी मां को नहीं। इसी तरह अगर ‘हनुमान अंश’ में रणबीर कपूर होते तो दर्शकों का ध्यान रणबीर पर जाता, महाराज जी पर नहीं। कानन कौशल और शोभिनाव सत्या जैसे चेहरों ने दर्शकों को अपनी मां, अपने गुरु या अपनी खुद की आस्था को उस किरदार में देखने की जगह दी।
बॉक्स ऑफिस का बदला हुआ गणित: आमतौर पर फिल्मों की शुरुआत बड़ी होती है और इसके बाद कमाई में गिरावट आती है। लेकिन ‘जय संतोषी मां’ का सफर इसके उलट रहा। फिल्म ने धीमी शुरुआत के बाद कई सेंटरों में 50 सप्ताह तक प्रदर्शन किया। उत्तर भारत के कई छोटे शहरों में यह महीनों तक ‘शोले’ से भी आगे रही।
‘हनुमान अंश’ की शुरुआत भी बेहद धीमी रही। पहले सप्ताह में फिल्म ने 1.08 करोड़ रुपये और दूसरे सप्ताह में 40 लाख रुपये कमाए। 14 दिनों के बाद इसका कुल कलेक्शन 1.48 करोड़ रुपये था। इसके बाद तीसरे सप्ताह में फिल्म ने 10.40 करोड़ रुपये, चौथे सप्ताह में 61 करोड़ रुपये, पांचवें सप्ताह में 90.25 करोड़ रुपये और छठे सप्ताह में 80.25 करोड़ रुपये कमाए। लेख के मुताबिक, यह किसी भी हिंदी फिल्म का अब तक का सबसे बड़ा छठा सप्ताह था।
सबसे बड़ी नहीं, लेकिन बेहद मुनाफे वाली फिल्में: डॉ. गोयल के मुताबिक, ‘जय संतोषी मां’ को सबसे बड़ी हिट नहीं कहा गया, क्योंकि ‘शोले’ की कमाई ज्यादा थी। लेकिन इसे सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली फिल्मों में गिना गया। 2.75 लाख रुपये के बजट वाली फिल्म ने 5 करोड़ रुपये की कमाई की और लेख में इसे 20 गुना बजट तथा 2,000 प्रतिशत मुनाफे के तौर पर बताया गया है। ‘हनुमान अंश’ की तुलना भी इसी आधार पर की गई है। करीब 2 करोड़ रुपये के बजट वाली इस फिल्म ने 300 करोड़ रुपये का कारोबार किया, जिसे लेख में 150 गुना और 15,000 प्रतिशत रिटर्न बताया गया है।
1975 में संतोष और 2026 में शांति: डॉ. संदीप गोयल के मुताबिक, 1975 का दौर ‘दीवार’ और ‘शोले’ जैसी फिल्मों का था, जिनमें व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा दिखाई देता था। दर्शकों को यह पसंद आया, लेकिन लगातार गुस्से से थकने के बाद उन्होंने ‘जय संतोषी मां’ जैसी फिल्म में संतोष तलाशा। संतोषी का अर्थ भी संतोष से जुड़ा है। वहीं, 2026 में ‘धुरंधर’, ‘बॉर्डर 2’ और ‘मिर्जापुर’ जैसी फिल्मों में एक्शन, हिंसा और बड़े स्तर का रोमांच देखने को मिल रहा है। ऐसे दौर में ‘हनुमान अंश’ दर्शकों को शांति और आध्यात्मिकता की ओर ले जाती है। निष्कर्ष है कि हर दौर में बॉलीवुड दर्शकों की पसंद को बड़े और भव्य सिनेमा से जोड़कर देखता है, लेकिन समय-समय पर छोटी बजट की कोई धार्मिक फिल्म यह दिखा देती है कि दर्शक मनोरंजन के साथ सुकून और आस्था भी तलाशते हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
पत्रकार लोकतंत्र का प्रहरी है, इसकी निष्पक्षता और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए जरूरी है कि वह स्वयं भी विधि, प्रक्रिया और जवाबदेही के सर्वोच्च मानकों के प्रति प्रतिबद्ध हो।
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Samachar4media Bureau
जितेन्द्र बच्चन, राष्ट्रीय पत्रकार वेलफेयर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष।
पत्रकार अपने अधिकारों की रक्षा, सत्ता से स्वतंत्रता और कानूनी पुलिसिया दांवपेच से बचने के लिए समय-समय पर अपनी आवाज बुलंद करते रहते हैं। समाचार संकलन और लिखने- छापने की स्वतंत्रता के साथ-साथ पत्रकारों की रक्षा होनी भी जरूरी है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं हो सकता।
स्वतंत्रता पत्रकारों को बाहरी दबाव से मुक्त होकर पत्रकारिता करने की ताकत देती है, जबकि जवाबदेही सुनिश्चित करती है कि उस शक्ति का प्रयोग निष्पक्षता और नैतिकता के अनुसार हो। एक पत्रकार के लिए भारतीय संविधान में भी यही व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है कि गंभीर आचरण-संबंधी शिकायतों की जांच के लिए प्रभावी व्यवस्था की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है। अगर किसी पत्रकार की शिकायत पुलिस को मिलती है तो आंतरिक जांच और आपराधिक जांच उसके दायरे में शामिल हैं।
हां, इसके बीच सीमाएं और कार्रवाई की परिस्थितियां अधिक स्पष्ट होनी चाहिए। कोई भी पत्रकार स्वयं को जांच-पड़ताल से ऊपर नहीं रख सकता पर इसका यह मतलब भी नहीं हैं कि कानूनी दांवपेच में फंसाकर एक पत्रकार को नर्क में धकेल दिया जाए। उसके मामले को मनगढ़ंत कहानी में बदलकर सार्वजनिक कर दिया जाए। शिकायतकर्ता की गोपनीयता, पत्रकार की प्रतिष्ठा, जांच की निष्पक्षता और प्रेस की आजादी, सभी का ध्यान रखना जरूरी है।
पत्रकारों की मांग है कि उन पर होने वाले हमलों और उत्पीड़न को रोकने के लिए देश और विभिन्न राज्यों में कड़ा 'पत्रकार सुरक्षा कानून' लागू किया जाए। यह मांग हम हरहाल में जायज मानते हैं। केंद्र की मोदी सरकार को इसे जल्द लागू कर देना चाहिए। लेकिन उसकी संरचना ऐसी होनी चाहिए, जिसमें पत्रकारों की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, पुलिस की भूमिका संतुलित हो, कानूनी प्रक्रिया में पारदर्शिता आए और किसी एक जांच-पड़ताल करने वाली संस्था को अनुचित नियंत्रण प्राप्त न हो।
पत्रकारों को भी कानूनी प्रक्रिया का पूर्णतया पालन करना चाहिए, तभी उसकी स्वतंत्रता को अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकेगा। पत्रकारिता के लिए जहां आजादी लोकतंत्र की मूल संरचना का महत्वपूर्ण तत्व है, वहीं पत्रकारों की जवाबदेही की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए, जो बाहरी नियंत्रण के बजाय स्वतंत्रता के भीतर उत्तरदायित्व सुनिश्चित करे। जैसे निराधार आरोपों से पत्रकारों की रक्षा जरूरी है, वैसे ही गंभीर व विश्वसनीय आरोपों की निष्पक्ष जांच भी आवश्यक है। इन दोनों के बीच संतुलन ही संवैधानिक गरिमा की वास्तविक कसौटी है।
आज आवश्यकता किसी पत्रकार या पत्रकारिता संस्थान को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें पत्रकारों को लिखने व समाचार संकलन में पूर्ण स्वतंत्रता मिले और वह निष्पक्षता व जवाबदेही के साथ-साथ चले।
क्योंकि यदि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, तो उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए जरूरी है कि वह स्वयं भी विधि, प्रक्रिया और जवाबदेही के सर्वोच्च मानकों के प्रति उतना ही प्रतिबद्ध हो, जितनी प्रतिबद्धता वह पुलिस, कानून और सरकार से अपेक्षा करता है। पत्रकारों की प्रतिष्ठा बचाने के लिए उनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए। वह समाज का ही नहीं सरकार का भी विश्वसनीय संरक्षक है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
दुनिया भर के स्कूल कॉलेज यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि बच्चों को AI का इस्तेमाल करने दिया जाए या नहीं। इतना सब मान रहे हैं कि पहले की तरह होमवर्क देने का फ़ायदा नहीं।
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Samachar4media Bureau
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
AI (आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस) को लेकर एक और बहस चल पड़ी है कि हम ‘दिमाग़ी सरेंडर’ कर रहे हैं। यह बात MIT की रिसर्च रिपोर्ट से सामने आई है। हिसाब-किताब में समझेंगे कि क्या AI सचमुच हमारी सोचने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है।
MIT ने दो तरह की रिसर्च की हैं। पहली रिसर्च में MIT ने तीन ग्रुप बनाए। एक को ChatGPT से निबंध लिखने दिया, दूसरे को सिर्फ़ Google से, तीसरे को कुछ भी नहीं दिया, सिर्फ़ अपना दिमाग़। कुछ मिनट बाद जब ChatGPT वाले ग्रुप से पूछा गया, “अभी जो लिखा, उसकी एक लाइन तो बताओ” तो 10 में से 8 लोग बता ही नहीं पाए। यह वैसी ही बात हुई कि आपने किसी से पूछा कि अभी-अभी जो मैसेज टाइप करके भेजा, उसमें क्या लिखा था और वो याद ही न कर पाए। काम हो गया, पर दिमाग़ में कुछ बैठा नहीं।
दुनिया भर के स्कूल-कॉलेज यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि बच्चों को AI का इस्तेमाल करने दिया जाए या नहीं। इतना सब मान रहे हैं कि पहले की तरह होमवर्क देने का फ़ायदा नहीं, क्योंकि बच्चे AI से निबटा देते हैं। कुछ सीख नहीं पाते हैं।
दूसरी रिसर्च में MIT ने AI की मदद से Fake न्यूज़ पकड़ने का प्रयोग किया। इसके चलते रिसर्च करने वाले वो बातें पकड़ने लगे जो पहले पकड़ में नहीं आ रही थीं। AI का फ़ायदा तो मिला, लेकिन जब AI के बिना काम करने के लिए कहा तो वो लोग ग़लतियाँ करने लगे। मतलब जैसे कोई कैलकुलेटर से जोड़-घटाना इतना करे कि पेन-पेपर पर सामान्य जोड़ भी भूल जाए, वैसा ही यहां फ़ेक न्यूज़ पकड़ने की क़ाबिलियत के साथ हुआ।
दोनों रिसर्च इस बात की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि हमारी सोचने की क्षमता AI के कारण प्रभावित हो रही है।
तो क्या AI हमारा दिमाग़ ख़राब कर देगा? दरअसल, जब-जब नई टेक्नोलॉजी आई है, इस तरह की बातें होती रही हैं। चाहे Calculator हो, Computer हो। गणित में दुनिया आगे ही बढ़ी है। Google के आने के बाद कोई चीज़ याद रखना ज़रूरी नहीं रह गया है। एक क्लिक पर सारी जानकारी मिलने लगी। GPS के कारण आपको रास्ता याद नहीं रखना पड़ता है। और अब तो AI लगभग वो सारा काम कर सकता है जिसमें दिमाग़ का इस्तेमाल होता है।
हमने जब हाथ की जगह टाइपराइटर से लिखना शुरू किया, तब भी यही डर था। 1904 में Atlantic Monthly में एक लेखक ने लिखा था कि टाइपराइटर के बेतहाशा इस्तेमाल से लिखने की कला कमज़ोर हो जाएगी, लेकिन आज यह डर ग़लत साबित हुआ है।
100 साल बाद न तो गणित कमज़ोर हुआ है, ना ही भाषा। टाइपराइटर की यात्रा कम्प्यूटर तक पहुँची और अब AI तक। हमें इसका इस्तेमाल सहयोगी के तौर पर करना चाहिए, इसका गुलाम बनेंगे तो सोचने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
इस सप्ताह 18 सितंबर को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए संशोधन विधेयक पर विचार कर रही 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति की पहली बैठक हुई।
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Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
मोदी सरकार ने 2020 में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए 2010 में संशोधन करके गैर-सरकारी संगठनों के लिए नियमों को अधिक सख्त और पारदर्शी बनाया। एनजीओ के एफसीआरए प्रमाण पत्र की वैधता की जांच और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नवीनीकरण नियमों को कड़ा किया गया। अब 2026 में सरकार ने इस कानून में संशोधन का विधेयक पेश किया।
संसद में विरोध होने पर विधेयक संयुक्त संसदीय समिति की समीक्षा के लिए भेजा गया, ताकि शीतकालीन सत्र में इसे पेश किया जा सके। नए प्रस्तावित कानून के अनुसार, पंजीकरण रद्द होने पर एनजीओ की बची संपत्ति और फंड के प्रबंधन के लिए 'नामित प्राधिकारी' का प्रावधान है। साथ ही एनजीओ को अपने सोशल मीडिया खातों और गतिविधियों के भौगोलिक दायरे की जानकारी देना अनिवार्य किया गया। इसका उद्देश्य विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकना और डिजिटल निगरानी को मजबूत करना है।
इस सप्ताह 18 सितंबर को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए संशोधन विधेयक पर विचार कर रही 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति की पहली बैठक हुई। समिति के अध्यक्ष के रूप में संजय जायसवाल, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की बैठक में उपस्थिति और समिति को शीतकालीन सत्र से पहले रिपोर्ट देने की संभावना है। गृह मंत्रालय द्वारा एफसीआरए को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर प्रस्तुत किए जाने का दावा भी है।
बताया जाता है कि भारत में विदेशी चंदा लेने वाले एनजीओ की संख्या लगभग 29,000 से घटकर 14,000 रह गई है। गृह मंत्रालय की प्रस्तुति में विदेशी योगदान ₹17,832 करोड़ से बढ़कर ₹22,974 करोड़ होने का दावा किया गया है।
देश में गैर-सरकारी संगठनों यानी एनजीओ की भूमिका महत्वपूर्ण है। ये संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, आदिवासी विकास, महिला सशक्तीकरण, बाल कल्याण, पर्यावरण, गरीबी उन्मूलन और मानवाधिकार जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं। दूसरी ओर, जब इन्हीं संस्थाओं को विदेशों से बड़ी मात्रा में धन मिलता है और वे सरकार की नीतियों, बड़े विकास-परियोजनाओं या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों पर सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो विदेशी धन के स्रोत, उद्देश्य, उपयोग और निगरानी पर सवाल उठते हैं।
2010 में लगभग 29,700 संगठनों के पास एफसीआरए पंजीकरण होने का आंकड़ा एक रिपोर्ट में दिया गया था। 2017 तक सरकार ने संसद में बड़ी संख्या में एफसीआरए पंजीकरण रद्द किए जाने की जानकारी दी थी। हालांकि, रद्दीकरण के कारण अलग-अलग थे। कुछ मामलों में वार्षिक रिटर्न न देना, कुछ में नवीनीकरण के लिए आवेदन न करना और कुछ में कथित उल्लंघन शामिल थे। 2017 में लगभग 11,319 एनजीओ के पंजीकरण समाप्त होने की बात सामने आई।
2026 में लगभग 14,449 सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण होने का दावा किया गया। 2010 के बाद एफसीआरए पंजीकृत संगठनों की संख्या में बड़ी कमी आई। यदि ₹17,832 करोड़ से ₹22,974 करोड़ की तुलना आधिकारिक गृह मंत्रालय के आंकड़ों से प्रमाणित होती है, तो इससे यह संकेत मिलता है कि कम संख्या में संगठन अपेक्षाकृत अधिक विदेशी धन प्राप्त कर रहे हैं। विदेशी अनुदान से चलने वाले अनेक संगठन अस्पताल, स्कूल, राहत कार्य, ग्रामीण विकास, विकलांगता सहायता, महिला एवं बाल कल्याण तथा आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं।
समस्या तब पैदा होती है जब धन के वास्तविक स्रोत को छिपाया जाए; धन का उपयोग घोषित उद्देश्य के बजाय किसी अन्य उद्देश्य में हो; एनजीओ विदेशी संस्था के राजनीतिक या रणनीतिक एजेंडे का माध्यम बन जाए; विदेशी धन का उपयोग हिंसक या गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए हो; धन का इस्तेमाल कानून-विरुद्ध धार्मिक गतिविधियों में हो; या संगठन घोषित सामाजिक कार्य की आड़ में प्रतिबंधित गतिविधियों में शामिल हो।
एफसीआरए मूल रूप से 1976 में बनाया गया था। इसका उद्देश्य विदेशी योगदान और विदेशी आतिथ्य को नियंत्रित करना था, ताकि विदेशी धन भारतीय राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन को अनुचित रूप से प्रभावित न करे। 2010 में नया एफसीआरए कानून लागू हुआ। इसके तहत विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले पात्र संगठनों को पंजीकरण, नवीनीकरण, बैंकिंग, लेखांकन और वार्षिक रिपोर्टिंग से जुड़े नियमों का पालन करना पड़ता है।
2020 में कानून में महत्वपूर्ण बदलाव हुए। इनमें विदेशी योगदान के लिए निर्दिष्ट बैंक खाते की व्यवस्था, प्रशासनिक खर्च पर सीमा और विदेशी योगदान के हस्तांतरण पर प्रतिबंध शामिल थे। सरकार का तर्क रहा है कि विदेश से आने वाले धन का स्रोत और उपयोग स्पष्ट होना चाहिए। सरकार के अनुसार, उद्देश्य इन संगठनों को समाप्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन भारतीय कानूनों के अनुरूप खर्च हो।
सरकार की ओर से आरोप लगाया गया कि कुछ विदेशी-वित्तपोषित गतिविधियां भारत के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। 18 सितंबर 2026 को गृह मंत्रालय द्वारा संयुक्त संसदीय समिति के सामने कुडनकुलम परमाणु संयंत्र और सरदार सरोवर बांध से जुड़े विरोधों का उल्लेख हुआ। सरकार की चिंता यह हो सकती है कि यदि विदेशी धन प्राप्त करने वाला संगठन भारत की ऊर्जा या इंफ्रास्ट्रक्चर को प्रभावित करने के उद्देश्य से अभियान चलाता है, तो उसकी फंडिंग और गतिविधियों की जांच की जाए।
यदि जांच में प्रमाणित हो कि कोई संस्था विदेशी धन छिपाकर प्रतिबंधित गतिविधि में लगा रही है, हिंसा को वित्त दे रही है, विदेशी राजनीतिक हस्तक्षेप का माध्यम बन रही है या एफसीआरए के उद्देश्य के विरुद्ध धन का उपयोग कर रही है, तो सरकार के पास कानून के अनुसार कार्रवाई का आधार हो सकता है। बहस का एक हिस्सा धार्मिक संस्थाओं से संबंधित है। धार्मिक संगठन भी अन्य संगठनों की तरह एफसीआरए के वित्तीय और प्रशासनिक नियमों के अधीन हैं। विदेशी धन और धार्मिक गतिविधियों के बीच संबंध होने मात्र से उल्लंघन सिद्ध नहीं होता।
संसद में महत्वपूर्ण कानूनी परिवर्तन से सामाजिक क्षेत्र में स्वच्छता और स्वयंसेवी का चोला पहनकर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियां चलाने वाले कुछ संगठनों पर नियंत्रण पर हंगामा होता है। गरीबों, विकास, मानव अधिकार के नाम पर विदेशी मुद्रा में करोड़ों रुपया लेकर आलीशान बंगलों, कारों, होटलों में ऐश करने और सम्मेलन, संगोष्ठी के बहाने विदेशों की सैर करने वालों को अब अपना धंधा बंद करना पड़ रहा है।
सचमुच समाज की सेवा के लिए समर्पित संस्थाओं को अधिक गरिमा और विश्वसनीयता से काम करने की सुविधा होगी। माओवादियों और आतंकवादी समूहों को संदिग्ध एनजीओ से पर्दे के पीछे मिलने वाली मदद पर अंकुश लग सकेगा।
यह मुद्दा नया नहीं है। कई लोगों को गलतफहमी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ही पूर्वाग्रही है। मनमोहन सिंह सरकार के गृह मंत्री ने भी 2010 में संसद में माना था कि 'विदेशी फंड लेने वाले अनेक एनजीओ न तो बाहर से आने वाली धनराशि का पूरा विवरण देते हैं और न ही कोई हिसाब देते हैं। स्थिति इतनी अजीब रही कि विदेशी मुद्रा में इन संगठनों के पास बीस हजार करोड़ रुपयों का फंड आया और उन्होंने दस हजार करोड़ कहां खर्च किया, इसकी कोई जानकारी किसी को नहीं दी।' इस स्वीकारोक्ति के बावजूद सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इसलिए एनजीओ के पास विदेश फंड की धनराशि बढ़ती रही।
गैर-सरकारी स्वयंसेवी संगठनों को प्रारंभिक वर्षों में सरकार ने उदारतापूर्वक विदेशी अनुदान लेने दिया। 1976 में विदेशी मुद्रा लेने वाले संगठनों को सौ प्रतिशत प्रशासनिक खर्च दिखाने की सुविधा मिली। बड़ी संख्या में ऐसे एनजीओ के हिसाब-किताब और गतिविधियों की जानकारियां मिलने के बाद सरकार ने प्रशासनिक खर्च की सीमा पचास प्रतिशत कर दी। फिर भी प्रभावशाली लोगों के नाम साथ में जोड़कर कई संस्थाएं मौज-मस्ती के साथ धन का दुरुपयोग करती रहीं।
आप कल्पना नहीं कर सकते कि देश के 26 राज्यों में करीब 31 लाख एनजीओ रहे हैं। सरकार ने संसद में भी माना था कि पिछले दशकों में एनजीओ को लगभग दो लाख करोड़ रुपये उनसे मिले। गृह मंत्रालय के पास भी कुछ राज्यों से यह रिपोर्ट मिली कि कुछ संगठनों ने धर्म परिवर्तन, नक्सली आंदोलनों, जाति-धर्म या समस्याओं के नाम पर लोगों को भड़काने के लिए विदेशी चंदे का इस्तेमाल किया।
इस पृष्ठभूमि में मोदी सरकार ने बाकायदा महीनों तक विभिन्न दलों की संसदीय समिति में विचार-विमर्श के बाद विदेशी अभिदाय विनियमन 2010 में संशोधन कर विधेयक को संसद के इस स्तर में बहस के साथ पारित करवा लिया और एनजीओ की सीमाएं तय कर दीं। इसमें कोई शक नहीं कि सैकड़ों स्वयंसेवी संगठन ईमानदारी से काम कर रहे हैं। उन्हें इस कानून से अधिक लाभ होगा। देश-विदेश में उनकी साख भी बढ़ेगी। अन्यथा भारत में एनजीओ की छवि निरंतर बिगड़ रही थी।
केंद्र सरकार ने करीब बीस हजार फर्जी किस्म के एनजीओ का पंजीकरण रद्द किया। अब तक कई संस्थाएं करोड़ों की धनराशि मंगाने के बाद दुकान की तरह संस्था बंद कर देती थीं और उसकी जानकारी भी सरकार को नहीं देती थीं। नया कानून बनने से अब उन्हें पंजीकरण रद्द करने के लिए बाकायदा सरकार को सूचित करना है। इसके तब तक के कामकाज की पूरी रिपोर्ट राज्य सरकार के अधिकारी देंगे, तब उसे बंद किए जाने का अधिकृत प्रमाण पत्र दिया जाएगा।
इसी तरह नियमानुसार सरकारी अधिकारी किसी एनजीओ में नहीं रह सकते हैं, लेकिन चतुर अधिकारी किसी परिजन के नाम पर संस्था चलाकर अपने प्रभाव से करोड़ों रुपये का विदेशी चंदा मंगवा लेते थे। नए कानून के लागू होने के बाद उनकी ऐसी गतिविधि पकड़े जाने पर दंडित होना पड़ेगा। अब अधिकारी ही नहीं, 'पब्लिक सर्वेंट' की श्रेणी वाले लोगों पर भी यह नियम लागू हो गया। एक और तिकड़म कुछ एनजीओ करते रहे। वे चंदा एक संस्था के नाम से मंगाते और कुछ समय में उसे दूसरी संस्था में ट्रांसफर कर देते थे।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
हिंदी के प्रति अमित शाह का लगाव केवल औपचारिक राजभाषा-नीति तक सीमित नहीं दिखाई देता। वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के अवसर पर उन्होंने हिंदी को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ा था।
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Samachar4media Bureau
प्रो. संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की हिंदी सेवा एक नहीं, अनेक दृष्टियों से ध्यान देने योग्य है। मूलतः गुजरातीभाषी श्री शाह स्वयं हिंदी में काम करते हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर हिंदी में सरकारी कामकाज बढ़ा है। श्री शाह के कारण सरकारी पत्रावलियां हिंदी में बनती हैं। श्री शाह के मार्गदर्शन में केंद्रीय गृह मंत्रालय राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं, अनुवाद-कार्य और हिंदी-सलाहकार समितियों के माध्यम से लगातार प्रयासरत है। श्री शाह हिंदी को प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, पत्रकारिता और उच्च ज्ञान-विमर्श की भाषा बनाने के लिए गुणवत्तापूर्ण सामग्री, आधुनिक शब्दावली और अनुवाद की मजबूत व्यवस्था की अनवरत हिमायत करते हैं।
हिंदी के प्रति अमित शाह का लगाव केवल औपचारिक राजभाषा-नीति तक सीमित नहीं दिखाई देता। वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के अवसर पर उन्होंने हिंदी को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ा था। गत वर्ष 2025 में भी श्री शाह ने हिंदी दिवस पर आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में हिंदी के संवर्धन से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर बल दिया था।
पिछले एक वर्ष में माननीय गृह मंत्री जी के नेतृत्व में राजभाषा विभाग ने हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के लिए भी कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। जून 2025 में भारतीय भाषा अनुभाग की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाना और उन्हें तकनीक तथा प्रशासन से जोड़ना है। इस पहल से राजभाषा विभाग के काम का दायरा भी व्यापक हुआ है। विभाग ने नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों यानी नराकासों के काम को प्रोत्साहित करने के लिए ‘नराकास प्रोत्साहन सम्मान’ की व्यवस्था भी शुरू की है। इससे उन नराकासों को आगे आने का अवसर मिलेगा, जो अपने क्षेत्र में राजभाषा के काम को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा रही हैं।
तकनीक के क्षेत्र में भी राजभाषा विभाग ने नई पहल की है। ‘भारती - बहुभाषी अनुवाद सारथी’ के माध्यम से हिंदी से भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को आसान बनाने की दिशा में काम हुआ है। इसके साथ ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ जैसे शब्दकोश को भी विकसित किया गया है। ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ में विभिन्न भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य हिंदी को दूसरी भारतीय भाषाओं से जोड़ना है, न कि उनसे अलग करना। इन प्रयासों से साफ है कि राजभाषा का काम अब केवल सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग तक सीमित नहीं है। यह भाषा, तकनीक और भारतीय भाषाओं के बीच नए संबंध बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
श्री शाह के हिंदी प्रेम का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि वे हिंदी को भारतीय भाषाओं की प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके साथ चलने वाली भाषा के रूप में देखते हैं। अमित शाह का हिंदी प्रेम हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के रूप में आगे बढ़ता है। कहना न होगा कि यह दृष्टि भारतीय भाषायी एकता को मजबूत करनेवाली है।
हिंदी की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मीयता, समावेशिता और संवादधर्मिता में है। भारत में हिंदी का विस्तार तभी सार्थक होगा, जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान और संवाद का भाव लेकर आगे बढ़े। हिंदी का भारतीय भाषाओं से संबंध वर्चस्व का नहीं, आदान-प्रदान का होना चाहिए। भारतीय भाषाओं का इतिहास भी प्रतिस्पर्धा का इतिहास नहीं, बल्कि परस्पर आदान-प्रदान का इतिहास है।
हिंदी ने दूसरी भारतीय भाषाओं से असंख्य शब्द, मुहावरे, साहित्यिक संस्कार और विचार ग्रहण किए हैं। दूसरी ओर हिंदी के माध्यम से भी अनेक भारतीय भाषाओं का साहित्य व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचा है। इसलिए हिंदी को संपर्क और सेतु की भाषा के रूप में विकसित किया जा सका है।
श्री शाह का यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है कि हिंदी की समृद्धि भारतीय भाषाओं की समृद्धि से जुड़ी है। भारतीय भाषाओं की विविधता का सम्मान बनाए रखना ही भारत की भाषायी वास्तविकता के अनुरूप है। श्री अमित शाह का यह विचार आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। श्री शाह के लिए हिंदी का समर्थन किसी एक क्षेत्रीय पहचान का विस्तार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर संचार की एक साझा भाषा को मजबूत करने का प्रयास है।
भारत की भाषायी परंपरा में हिंदी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उसे देश के बड़े भूभाग में समझा और बोला जाता है, बल्कि इसलिए भी है कि उसने विभिन्न प्रदेशों, समुदायों और भाषायी संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम बनने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रकाशन के दौर में हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर हैं।
यदि हिंदी में उच्चस्तरीय वैज्ञानिक, तकनीकी, दार्शनिक और सामाजिक विज्ञान संबंधी सामग्री का पर्याप्त निर्माण होता है, तो वह ज्ञान की भाषा के रूप में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकती है। साथ ही यही तकनीक अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए भी इस्तेमाल की जानी चाहिए।
श्री शाह उन गुजरातीभाषी मनीषियों की पांत में आ गए हैं जिनमें स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक की हिंदी के प्रति आग्रह की एक ऐसी परंपरा दिखाई देती है, जिसमें हिंदी को राष्ट्रीय संवाद और जनजागरण की भाषा बनाने की आकांक्षा प्रमुख रही है।
हिंदी के अनेक हिंदीतरभाषियों ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी को अपनाया। दयानंद सरस्वती ने संस्कृत के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद अपने सामाजिक और धार्मिक सुधार के संदेश को केवल संस्कृत के विद्वत् वर्ग तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जनसाधारण तक पहुँचने के लिए हिंदी का सहारा लिया। उनकी प्रसिद्ध कृति सत्यार्थ प्रकाश मूलतः हिंदी में लिखी गई।
इसी तरह महात्मा गांधी मूलतः गुजरातीभाषी थे किंतु हिंदी में अखबार निकाले और हिंदी के महत्व को एक अलग राजनीतिक और राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान किया। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए उन्होंने अपने पुत्र देवदास गांधी को भेजा और 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना के प्रयासों को आगे बढ़ाया।
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक संवाद में हिंदी का व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। वे देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों से संवाद करते हुए हिंदी का प्रयोग करते हैं और भारतीय भाषाओं के महत्व पर भी जोर देते रहे हैं।
दयानंद सरस्वती, गांधी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह - इन चारों की हिंदी संबंधी दृष्टियों को एक साथ देखने पर हिंदी के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र निकलता है: हिंदी जितनी जनभाषा होगी, उतनी ही प्रभावी होगी; जितनी समावेशी होगी, उतनी ही स्वीकार्य होगी; और जितनी भारतीय भाषाओं से जुड़ेगी, उतनी ही समृद्ध होगी।
हिंदी प्रेम का सर्वोच्च रूप हिंदी को दूसरों पर थोपना नहीं, बल्कि उसे ऐसा सक्षम माध्यम बनाना है जो भारत की विविध आवाजों को एक-दूसरे तक पहुँचाए। दयानंद ने हिंदी को जनजागरण का माध्यम बनाया, गांधी ने उसे राष्ट्रीय संवाद की शक्ति दी और आज हिंदी के सामने डिजिटल युग में विश्वव्यापी संवाद की नई संभावनाएँ हैं।
इन पड़ावों को जोड़कर देखा जाए तो हिंदी की यात्रा केवल एक भाषा की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में संवाद, जागरण और आत्मविश्वास की यात्रा भी है। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, वह समाज की स्मृति, संस्कृति और सामूहिक चेतना को भी अपने भीतर संजोए रहती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा का प्रश्न इसलिए और अधिक संवेदनशील हो जाता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
पत्रकारिता के दौरान मैंने नेताओं को बनते, बदलते और वक्त के साथ राजनीतिक पहचान गढ़ते देखा है। मेरे लिए ‘ब्रैंड मोदी’ को छह शब्दों में समझा जा सकता है- व्यक्ति, कहानी, संदेश, संचार, संगठन और डिलीवरी।
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Samachar4media Bureau
शमशेर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।।
पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन मना रहा है। इस मौके पर पीछे मुड़कर देखें तो एक सवाल बेहद दिलचस्प है- आखिर कोई राजनेता सिर्फ नेता से एक राजनीतिक ब्रैंड कैसे बनता है?
करीब तीन दशक की अपनी पत्रकारिता के दौरान मैंने नेताओं को बनते, बदलते और वक्त के साथ अपनी राजनीतिक पहचान गढ़ते देखा है। इसी दौरान मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को भी सीधे तौर पर देखने, कवर करने और करीब से समझने का अवसर मिला है। गुजरात से दिल्ली, फिर दिल्ली से गुजरात और फिर गुजरात से दिल्ली। गुजरात की राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक।
इस दौरान मैंने सिर्फ एक नेता को बदलते नहीं देखा, बल्कि बढ़ते, चमकते, एक राजनीतिक ब्रैंड को बनते और लगातार विकसित होते देखा है। लेकिन मोदी ने सिर्फ राजनीति नहीं की, अपने नाम को एक ब्रैंड में बदला। मेरे लिए ‘ब्रैंड मोदी’ को छह शब्दों में समझा जा सकता है- व्यक्ति, कहानी, संदेश, संचार, संगठन और डिलीवरी।
एक व्यक्ति के तौर पर उनकी एक अलग पहचान है, अपनी अलग शैली है और प्रेजेंटेशन भी बिल्कुल अलग है। उनकी कहानी और भी दिलचस्प और प्रेरणादायक है- वडनगर से दिल्ली तक का सफर, जो लगातार उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बना। संदेश भी साफ है- विकास, राष्ट्र निर्माण, गरीब कल्याण, आत्मनिर्भरता और विकसित भारत जैसे स्पष्ट और दोहराए जाने वाले नैरेटिव। संचार तो जबरदस्त है। भाषण, सभा से सोशल मीडिया तक, टीवी से ‘मन की बात’ तक।
संगठन, व्यक्ति की पहचान को कार्यकर्ता और बूथ स्तर तक पहुंचाने वाला मजबूत राजनीतिक नेटवर्क है। रही बात डिलीवरी की, तो वह दुनिया के सामने है। नीतियां, योजनाएं, फैसले, दुनिया के मंच पर भारत की छवि और बड़े राष्ट्रीय आयोजन। ब्रिक्स इसका ताजा उदाहरण है।
दरअसल, किसी नेता की असली कहानी सिर्फ उसके भाषणों में नहीं होती। लोगों के बीच उनकी मौजूदगी, लोगों से उनका संवाद, मीडिया से उनका रिश्ता और समय के साथ बदलती उनकी कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजी- ये सब मिलकर उनकी राजनीतिक पहचान बनाते हैं। और नरेंद्र मोदी के मामले में यह प्रक्रिया लगातार दिखाई देती रही है। तभी तो ‘मोदी’ अब सिर्फ एक नाम नहीं है; यह एक पूरा पॉलिटिकल कम्युनिकेशन आर्किटेक्चर है।
सिर्फ लोकप्रियता से कोई राजनेता ब्रैंड नहीं बन सकता। ब्रैंड बनने के लिए अपनी Identity, Credibility, Consistency, Visibility और Public Connection बेहद जरूरी है। ये Political Brand के Pillars हैं। इनमें एक भी कमजोर हो, तो ब्रैंड का लंबे समय तक टिकना मुश्किल होता है।
मोदी ने राजनीति को सिर्फ नीतियों और भाषणों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपने सार्वजनिक संचार में एक ऐसी भाषा विकसित की, जो राजनीतिक मंच से निकलकर आम बातचीत का हिस्सा बनी। “मन की बात”, सोशल मीडिया, बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम, रेडियो, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सीधे जनता से संवाद- इन सभी माध्यमों का लगातार इस्तेमाल इस ब्रैंड की पहचान बना।
ब्रैंड भाषणों से बन सकता है, लेकिन लंबे समय तक टिकता है तो उसके पीछे नीतियां, निर्णय, संगठन और जनता का अनुभव भी होना चाहिए। “ब्रैंड मोदी” की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यह केवल एक नेता की कहानी नहीं है। यह भारतीय राजनीति के बदलते Communication Landscape की भी कहानी है। मजबूत Communication और Governance Experience के बीच लगातार तालमेल की कहानी है।
करीब 25 वर्षों की सार्वजनिक यात्रा को इसलिए केवल सत्ता और चुनावों की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा। यह भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व, संचार और राजनीतिक ब्रैंडिंग के बदलते स्वरूप की भी कहानी है। और एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए शायद यही ‘ब्रैंड मोदी’ का सबसे दिलचस्प पहलू है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक 'टाइम्स नेटवर्क' में मैनेजिंग एडिटर-डिजिटल (हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाएं) के पद पर कार्यरत हैं।)
नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। मेरी कामना है कि उन्हें भारत ही नहीं, बल्कि विश्व राजनीति में शांति और समाज की प्रगति के लिए भी बड़ी सफलता मिले।
by
Alok Mehta
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।।
राजनीति में 25 साल का समय काफी लंबा होता है। सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक नारे गायब हो जाते हैं, मीडिया की तकनीक बदल जाती है और लोगों की धारणाएं लगातार बदलती रहती हैं। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी करीब ढाई दशक से भारत की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं। 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से लेकर 2026 में प्रधानमंत्री के तौर पर 12 साल पूरे करने तक उनकी राजनीतिक यात्रा लगातार चर्चा में रही है।
‘Brand Modi’ का विकास केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक कहानी नहीं है। यह राजनीतिक संचार, लेखन, संगठन, मीडिया संबंधों, तकनीक और एक ऐसी राजनीतिक पहचान को लगातार नए रूप में पेश करने की कहानी भी है, जिसमें मूल पहचान को बरकरार रखा गया।
नरेंद्र मोदी केवल ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं हैं, जिन्हें एक पत्रकार के तौर पर देखा गया है। उनसे और उनके परिवार के सदस्यों से लंबे समय से जुड़ाव रहा है। इस संबंध का एक साहित्यिक पक्ष भी रहा है। नरेंद्र मोदी ने ‘नमन नर्मदा’ और ‘सोशल रिफॉर्म इन इंडिया’ पुस्तकों की भूमिका लिखी। जनवरी 2026 में ‘रिवोल्यूशनरी राज: नरेंद्र मोदीज 25 इयर्स’ नामक कॉफी-टेबल बुक जारी हुई, जिसमें नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को तस्वीरों, घटनाओं और पत्रकारिता के अनुभवों के माध्यम से दर्ज किया गया है।
इसकी भूमिका गृहमंत्री अमित शाह ने लिखी है, जो नरेंद्र मोदी के करीबी राजनीतिक सहयोगियों में से एक और भाजपा के संगठनात्मक विस्तार से जुड़े महत्वपूर्ण नेताओं में रहे हैं। यह व्यक्तिगत जुड़ाव ‘Brand Modi’ को केवल चुनावी घटना के तौर पर नहीं, बल्कि एक बदलती संचार शैली के रूप में देखने का एक अलग नजरिया देता है।
लेखन में भी रही नरेंद्र मोदी की रुचि: नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष है, जो उनकी राजनीतिक यात्रा के सामने अक्सर पीछे छूट जाता है और वह है लेखन में उनकी लंबे समय से रही रुचि। उनका शुरुआती लेखन मुख्य रूप से गुजराती में रहा, जो उनकी मातृभाषा है। उनकी पहली पुस्तक ‘संघर्ष मा गुजरात’ आपातकाल के बाद लिखी गई और 1978 में गुजराती में प्रकाशित हुई। इसमें आपातकाल के दौरान गुजरात में राजनीतिक संघर्ष से जुड़े उनके अनुभवों और टिप्पणियों को दर्ज किया गया था। बाद में इस पुस्तक के कई संस्करण भी आए। यह पहलू नरेंद्र मोदी की बाद की संचार शैली को समझने में महत्वपूर्ण है। राजनीतिक कम्युनिकेटर बनने से पहले ही उनके अनुभव में लेखक की भूमिका जुड़ी हुई थी।
आपातकाल के दौरान नरेंद्र मोदी युवा आरएसएस प्रचारक के तौर पर भूमिगत रहकर काम कर रहे थे। उस समय गुप्त तरीके से संवाद करना, साहित्य का वितरण करना और आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच संपर्क बनाए रखना उनके अनुभवों का हिस्सा रहा। बाद में इन अनुभवों ने उनकी नजर से उस दौर का एक राजनीतिक इतिहास भी तैयार किया।
2025 में अमित शाह ने ‘द इमरजेंसी डायरीज: ईयर्स दैट फोर्ज्ड अ लीडर’ पुस्तक का विमोचन किया। इसमें आपातकाल विरोधी आंदोलन के दौरान नरेंद्र मोदी के अनुभवों को शामिल किया गया है। इस पुस्तक में सेंसरशिप, दमन और व्यापक आंदोलन से जुड़े अनुभवों के साथ एक युवा प्रचारक के भूमिगत जीवन का भी उल्लेख है। इस तरह नरेंद्र मोदी के टेलीविजन व्यक्तित्व या डिजिटल कम्युनिकेटर बनने से काफी पहले ही उनके राजनीतिक अनुभव में लेखक, संगठनकर्ता और भूमिगत कम्युनिकेटर की भूमिकाएं मौजूद थीं।
कविता और चिंतन से भी जुड़ा रहा लेखन: नरेंद्र मोदी का लेखन केवल राजनीतिक दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कविताएं, चिंतन और व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ समाज और सार्वजनिक जीवन से जुड़े विषयों पर भी लिखा। उनके गुजराती लेखन में प्रकृति, आध्यात्मिकता, अनुशासन, एकांत, सामाजिक सरोकार और व्यक्तिगत अनुभव जैसे विषय बार-बार दिखाई देते हैं। यह उनके व्यक्तित्व के उस चिंतनशील पक्ष को सामने लाता है, जो एक सामान्य राजनीतिक प्रचारक की छवि से अलग है।
नरेंद्र मोदी की ओर से ‘नमन नर्मदा’ और ‘सोशल रिफॉर्म इन इंडिया’ की भूमिकाएं लिखा जाना भी इस साहित्यिक संबंध का हिस्सा है। नर्मदा, सामाजिक सुधार और बदलता भारतीय समाज ऐसे विषय रहे, जिन पर एक राजनीतिक नेता और पत्रकार-लेखक के बीच पुस्तकों के माध्यम से संवाद हुआ।
गुजरात से शुरू हुआ मीडिया संवाद: जब नरेंद्र मोदी 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब राजनीतिक संचार का वातावरण आज से काफी अलग था। टेलीविजन न्यूज चैनल और अखबार राजनीतिक संवाद के प्रमुख माध्यम थे। उस दौर में पत्रकारों और संपादकों के साथ सीधे संवाद पर जोर दिया गया। इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जो भाजपा संगठन का हिस्सा नहीं थे। गुजरात में खासकर वाइब्रेंट गुजरात जैसे आयोजनों के दौरान पत्रकारों और संपादकों को आमंत्रित किया जाता था।
इन आयोजनों के जरिए गुजरात को निवेश और विकास के गंतव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। साथ ही, मीडिया के जरिए गुजरात के विकास की कहानी को राष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने और घटनाओं पर सीधे अपनी बात रखने का अवसर भी मिला। मीडिया के साथ यह संवाद कई स्तरों पर काम करता था। पत्रकारों को राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंच मिलती थी, गुजरात के विकास का नैरेटिव राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचता था और नरेंद्र मोदी को घटनाओं पर अपनी व्याख्या सीधे रखने का अवसर मिलता था। राजनीतिक संचार को उन लोगों के साथ संबंधों से अलग नहीं किया जा सकता, जो राजनीति को जनता तक पहुंचाते हैं।
विकास बना राजनीतिक पहचान का हिस्सा: गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पहचान में विकास एक केंद्रीय विषय बन गया। निवेश सम्मेलन, बुनियादी ढांचा, औद्योगीकरण, शासन और प्रशासनिक दक्षता जैसे विषय गुजरात की सार्वजनिक छवि का हिस्सा बनते गए।
वाइब्रेंट गुजरात एक अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में महत्वपूर्ण हुआ, जहां राज्य ने निवेश और अपनी पहचान को सामने रखा। इस संचार रणनीति की खासियत यह थी कि एक ही आयोजन सरकारी कार्यक्रम, आर्थिक बैठक, मीडिया इवेंट और राजनीतिक संदेश का रूप ले सकता था। 2014 के बाद यह तरीका राष्ट्रीय स्तर पर कहीं ज्यादा व्यापक रूप में सामने आया।
संगठन और व्यक्तित्व का मेल: ‘Brand Modi’ को भाजपा के संगठन से अलग करके नहीं समझा जा सकता। आरएसएस कार्यकर्ता और भाजपा संगठनकर्ता के रूप में नरेंद्र मोदी ने नेटवर्क बनाने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और जमीनी स्तर पर राजनीतिक संचार को समझने का अनुभव हासिल किया।
बाद के दौर में अमित शाह के साथ उनकी साझेदारी भी महत्वपूर्ण रही। एक तरफ नरेंद्र मोदी का बेहद पहचान योग्य सार्वजनिक चेहरा था, तो दूसरी तरफ संगठन के पास ऐसा नेटवर्क था जो संदेश को दिल्ली से राज्यों, जिलों, गांवों और डिजिटल समुदायों तक पहुंचा सकता था। संगठन और व्यक्तित्व का यह मेल मोदी दौर की भाजपा राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक रहा।
‘मन की बात’: रेडियो से राष्ट्रीय संवाद तक: नरेंद्र मोदी की संचार रणनीति का सबसे प्रमुख उदाहरण ‘मन की बात’ है। डिजिटल दौर में सोशल मीडिया को राजनीतिक संवाद का प्रमुख माध्यम माना जा रहा था, लेकिन नरेंद्र मोदी ने रेडियो की पहुंच और प्रभाव को भी पहचाना। 2014 में शुरू हुआ ‘मन की बात’ प्रधानमंत्री और नागरिकों के बीच नियमित सीधे संवाद का माध्यम बना। बाद में पत्रों, फोन कॉल, मायगव के सुझावों, ऐप पर आने वाली प्रतिक्रियाओं और सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं को भी इस संवाद का हिस्सा बनाया गया।
2023 में कार्यक्रम के 100वें एपिसोड के समय आईआईएम रोहतक की एक स्टडी में बताया गया कि सर्वे में शामिल 96 प्रतिशत आबादी ‘मन की बात’ से परिचित थी और 100 करोड़ लोगों ने इसे कम से कम एक बार सुना था। इसी अध्ययन में 23 करोड़ नियमित श्रोताओं का अनुमान लगाया गया। ये आंकड़े कार्यक्रम की पहुंच और जागरूकता को मापते हैं, राजनीतिक समर्थन को नहीं। इस तरह पारंपरिक मीडिया को डिजिटल माध्यमों से अलग करने के बजाय उन्हें एक साथ इस्तेमाल किया गया। रेडियो, टेलीविजन, अखबार, वेबसाइट, मोबाइल एप्लिकेशन, सोशल मीडिया और सीधे सार्वजनिक संवाद एक व्यापक संचार व्यवस्था का हिस्सा बने।
बदलती राजनीतिक भाषा, कायम रही पहचान: ‘Brand Modi’ की एक और विशेषता यह रही कि समय के साथ राजनीतिक भाषा और सार्वजनिक छवि बदलती रही, लेकिन मूल पहचान बनी रही। अलग-अलग दौर में नरेंद्र मोदी की पहचान गुजरात के प्रशासक, विकास पर जोर देने वाले मुख्यमंत्री, भाजपा संगठनकर्ता, चुनाव प्रचारक, ‘चायवाला’, प्रधानमंत्री, तकनीक-केंद्रित नेता, राष्ट्रवादी कम्युनिकेटर और वैश्विक नेता के रूप में सामने आई। इन बदलती पहचानों के बीच व्यक्तिगत प्रयास, अनुशासन, राष्ट्रसेवा, सीधे संवाद, आम नागरिकों से जुड़ाव और भारत की सभ्यतागत एवं राष्ट्रीय पहचान पर जोर जैसे तत्व लगातार बने रहे।
एक राजनीतिक नेता जो लिखता है, वह अपनी कहानी को शब्दों में रख सकता है। जो मीडिया को समझता है, वह उस कहानी को लोगों तक पहुंचा सकता है। राजनीतिक संगठन उस संदेश को जमीनी स्तर तक ले जा सकता है और डिजिटल तकनीक उसे बहुत तेजी से बड़े स्तर पर पहुंचा सकती है। नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा में ये चारों स्तर दिखाई देते हैं।
‘Brand Modi’ की जड़ें सोशल मीडिया से पहले की हैं: ‘Brand Modi’ को केवल सोशल मीडिया के दौर की उपज नहीं माना जा सकता। इसकी जड़ें गुजराती लेखन, राजनीतिक संगठन, आपातकाल के अनुभव, पत्रकारों के साथ संबंध, सार्वजनिक सभाओं और इस समझ में देखी जा सकती हैं कि संचार केवल भाषण देने का नाम नहीं है, बल्कि लोगों के साथ लगातार संबंध बनाने की प्रक्रिया है। ‘मन की बात’ इस सोच का एक प्रमुख उदाहरण है। इसमें रेडियो जैसे पुराने माध्यम को आधुनिक राजनीतिक संचार के मंच में बदला गया और टेलीविजन तथा डिजिटल मीडिया के जरिए उसका विस्तार किया गया।
नरेंद्र मोदी के साथ लंबे समय के जुड़ाव उनकी गुजराती और साहित्यिक रुचियों से लेकर उनकी पुस्तकों की भूमिकाओं और फिर ‘रिवोल्यूशनरी राज: नरेंद्र मोदीज 25 इयर्स’ तक—इस व्यापक यात्रा को देखने का एक व्यक्तिगत नजरिया भी देता है। यह कॉफी-टेबल बुक केवल तस्वीरों का संग्रह नहीं है, बल्कि नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को तस्वीरों, राजनीतिक घटनाओं और पत्रकारिता के अनुभवों के जरिए दर्ज करने का प्रयास है। अमित शाह की भूमिका व्यक्तिगत नेतृत्व और राजनीतिक संगठन के बीच एक कड़ी का काम करती है।
25 साल की इस यात्रा को केवल किसी एक नारे, चुनाव या माध्यम से नहीं समझा जा सकता। इसमें लेखक, आरएसएस संगठनकर्ता, भाजपा रणनीतिकार, गुजरात के मुख्यमंत्री, विकास के कम्युनिकेटर, मीडिया व्यक्तित्व, प्रधानमंत्री, रेडियो ब्रॉडकास्टर और डिजिटल दौर के राजनीतिक कम्युनिकेटर जैसे कई स्तर शामिल हैं।
नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर यह यात्रा उस बदलाव को भी सामने रखती है, जिसमें भारत में राजनीतिक संचार प्रिंट और व्यक्तिगत मीडिया संबंधों से आगे बढ़कर रेडियो, टेलीविजन, स्मार्टफोन और सीधे डिजिटल संवाद तक पहुंचा है। नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। मेरी कामना है कि उन्हें भारत ही नहीं, बल्कि विश्व राजनीति में शांति और समाज की प्रगति के लिए भी बड़ी सफलता मिले।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर डॉ. अनुराग बत्रा लिखते हैं कि ‘ब्रैंड मोदी’ की 25 साल की यात्रा बड़े स्तर पर काम करने, निरंतरता और नेतृत्व के बारे में क्या सीख देती है।
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डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
“जब सपने और संकल्प ऊंचे होते हैं, तो हमारी क्षमता की ऊंचाई भी बढ़ जाती है।” — नरेंद्र मोदी
राजनीति में कुछ करियर होते हैं, कुछ नेतृत्व की विरासत बनते हैं और कुछ ऐसी पहचान बन जाते हैं, जिन्हें उस दौर से अलग करना मुश्किल हो जाता है, जिसमें वे काम कर रहे होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी तीसरी श्रेणी में आते हैं।
नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन के मौके पर दिलचस्प सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वह कितने लंबे समय से भारतीय राजनीति के केंद्र में हैं। बड़ा सवाल यह है कि गुजरात से शुरू हुई एक राजनीतिक पहचान किस तरह राज्य प्रशासन से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंची, चुनावी रैलियों से अंतरराष्ट्रीय मंचों तक गई और शासन की भाषा से निकलकर उस भाषा का हिस्सा बनी, जिसके जरिए भारत खुद को दुनिया के सामने पेश कर रहा है।
7 अक्टूबर 2026 को नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार पद संभालने के 25 साल पूरे हो जाएंगे। उन्होंने 7 अक्टूबर 2001 को मुख्यमंत्री पद संभाला था। इसके बाद 2014 में वह दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री बने। जून 2024 में उन्होंने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली।
आज की सार्वजनिक जिंदगी में 25 साल बहुत लंबा समय होता है। इस दौरान कंपनियां खत्म हो जाती हैं, तकनीक पुरानी पड़ जाती है, लोगों की पसंद बदल जाती है, राजनीतिक मुद्दे बनते और खत्म होते हैं, नेतृत्व बदलता है और पूरे-पूरे उद्योग नई दिशा में चले जाते हैं, लेकिन मोदी की राजनीतिक पहचान ने अपना दायरा लगातार बढ़ाया है, जबकि उसके कुछ मूल तत्व लगातार बने रहे हैं। यही शायद ‘ब्रैंड मोदी’ की सबसे अहम कहानी है।
टिके रहने की ताकत
लंबे समय तक नेतृत्व में बने रहना सिर्फ मौजूद रहने का नाम नहीं है। असली चुनौती यह है कि आपके आसपास की दुनिया बदलती रहे और आप बदलते माहौल में प्रासंगिक बने रहें। 2000 के दशक की शुरुआत वाले गुजरात के मोदी और 2026 में देश का नेतृत्व कर रहे मोदी एक जैसे नहीं हो सकते। जिम्मेदारियां बढ़ी हैं, लोगों का दायरा बदला है और दुनिया की राजनीति भी काफी बदल चुकी है। फिर भी विकास, आकांक्षा, राष्ट्रीय पहचान, प्रशासन का बड़ा स्तर, तकनीक, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और बदलाव जैसे कुछ विषय लगातार उनकी राजनीतिक भाषा में दिखाई देते हैं।
कारोबारी दुनिया के लिए भी इसमें एक सीख है। हर लंबे समय तक चलने वाली संस्था के सामने यही चुनौती होती है। बहुत ज्यादा बदलेंगे तो अपनी पहचान खो सकते हैं और बहुत कम बदलेंगे तो दुनिया आगे निकल सकती है। मोदी की राजनीतिक स्थिति ने बार-बार इन दोनों के बीच जगह बनाने की कोशिश की है।
परंपरा के साथ तकनीक, कल्याण योजनाओं के साथ आकांक्षाएं, सांस्कृतिक पहचान के साथ वैश्विक महत्वाकांक्षा और स्थानीय राजनीतिक समझ के साथ अंतरराष्ट्रीय पहचान—इन सभी को एक साथ रखने की कोशिश दिखाई देती है। यही संतुलन उनकी राजनीतिक पहचान को समझने में अहम है।
क्रिएटर, प्रिजर्वर और डिसरप्टर
मोदी के नेतृत्व मॉडल को समझने का एक और तरीका है—उसे तीन भूमिकाओं में देखना। क्रिएटर, प्रिजर्वर और डिसरप्टर। यह किसी धार्मिक तुलना के तौर पर नहीं, बल्कि नेतृत्व को समझने के एक तरीके के तौर पर देखा जा सकता है।
क्रिएटर यानी ऐसी चीज तैयार करना, जो पहले उस रूप में मौजूद नहीं थी। मोदी के मामले में इसका उदाहरण एक ऐसी व्यक्तिगत और बड़े पैमाने वाली राजनीतिक संचार शैली के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें सीधे संवाद, तकनीक, बड़े सार्वजनिक मंच और बार-बार दोहराए जाने वाले स्पष्ट संदेशों का इस्तेमाल होता है।
प्रिजर्वर यानी उन चीजों को बनाए रखना, जिन्हें लोग अपनी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। मोदी की राजनीतिक भाषा में भारतीय सभ्यता, परंपरा, सांस्कृतिक प्रतीकों और राष्ट्रीय पहचान की बात लगातार दिखाई देती है। इसी के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, डिजिटल भुगतान, बुनियादी ढांचे और विकसित भारत जैसे विषय भी सामने आते हैं।
इसके बाद आता है डिसरप्टर यानी पुरानी धारणाओं को चुनौती देना। मसलन, यह धारणा कि तकनीक मुख्य रूप से शहरों में रहने वाले संपन्न लोगों तक सीमित है। या यह सोच कि बड़े पैमाने पर कल्याण योजनाओं और डिजिटल व्यवस्था को एक साथ नहीं चलाया जा सकता। इसी तरह विदेशों में भारतीय राजनीतिक संवाद के पारंपरिक तरीके से अलग बड़े और व्यापक सार्वजनिक कार्यक्रम भी देखने को मिले।
यह बदलाव की एक अहम सोच को दिखाता है। बदलाव सिर्फ कुछ नया बनाने का नाम नहीं है। कई बार बदलाव की शुरुआत यह तय करने से होती है कि पुरानी सीमा को अब सीमा मानने की जरूरत नहीं है।
‘स्केल’ है ब्रैंड मोदी की बड़ी भाषा
अगर मोदी के दौर से जुड़ा एक शब्द चुना जाए तो वह ‘स्केल’ यानी बड़े स्तर पर काम करना हो सकता है।
वित्तीय समावेशन को ही देखें। अगस्त 2026 तक प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 59.09 करोड़ खाते खोले जा चुके थे। वित्त मंत्रालय के मुताबिक, इनमें 55.7 फीसदी खाताधारक महिलाएं थीं और 77.8 फीसदी खाते ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में थे।
डिजिटल भुगतान की बात करें तो अगस्त 2026 में यूपीआई के जरिए 24.51 अरब लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 29.82 लाख करोड़ रुपये रही। यह यूपीआई के जरिए एक महीने में हुए लेनदेन का रिकॉर्ड स्तर था। इन योजनाओं को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और नीतिगत नजरिए हो सकते हैं, लेकिन प्रबंधन के नजरिए से एक बात साफ दिखाई देती है- भारत में किसी भी विचार को बहुत बड़े स्तर पर काम करने की चुनौती से गुजरना पड़ता है।
10 हजार लोगों के लिए काम करने वाला समाधान एक प्रयोग हो सकता है। 10 लाख लोगों तक पहुंचने वाला समाधान एक बड़ी उपलब्धि बन जाता है। लेकिन जब कोई व्यवस्था करोड़ों लोगों के लिए बनाई जाती है तो मामला सिर्फ योजना का नहीं रहता, बल्कि पूरी व्यवस्था तैयार करने का हो जाता है। मोदी के दौर में इस बड़े पैमाने को भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की कोशिश भी हुई है।
2023 के जी20 शिखर सम्मेलन में डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को नई दिल्ली नेताओं की घोषणा में जगह मिली। इसमें ऐसे डिजिटल सिस्टम की क्षमता को सेवा पहुंचाने और बड़े स्तर पर नवाचार में उपयोगी माना गया। यहीं घरेलू नीतियां वैश्विक पहचान से जुड़ने लगती हैं। बात सिर्फ यह कहने की नहीं रह जाती कि ‘देखिए हमने क्या बनाया।’ बल्कि संदेश यह बनता है कि ‘देखिए, हमारे जैसे बड़े स्तर पर क्या बनाया जा सकता है।’
स्थानीय नेता से वैश्विक मंच तक
मोदी के अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संवाद ने भी भारतीय प्रधानमंत्रियों की पारंपरिक सार्वजनिक छवि से अलग एक नया तरीका दिखाया। 2014 में न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में उनके भारतीय समुदाय के कार्यक्रम में 18 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए थे। इसके पांच साल बाद ह्यूस्टन में हुए ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में 50 हजार से ज्यादा लोगों की मौजूदगी रही। इन कार्यक्रमों की अहमियत सिर्फ भीड़ की संख्या में नहीं थी। इनके जरिए भारतीय प्रवासी समुदाय को भारत की वैश्विक राजनीतिक मौजूदगी के एक बड़े हिस्से के रूप में पेश किया गया।
प्रधानमंत्री अब सिर्फ राजनयिकों से मुलाकात, संसदों में भाषण या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में हिस्सा लेने तक सीमित नहीं थे। भारतीय राजनीतिक संवाद खुद एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच का हिस्सा बनता दिखाई दिया। यहीं मोदी की वैश्विक पहचान कुछ अलग नजर आती है।
योग और डिजिटल सार्वजनिक ढांचे की बात, भारतीय सभ्यता और सेमीकंडक्टर की महत्वाकांक्षा, मंदिर और तकनीक, ग्लोबल साउथ और वैश्विक निवेश- इन सभी विषयों को एक ही व्यापक राजनीतिक कहानी में जोड़ा गया। परंपरा और आधुनिकता को एक-दूसरे के विरोध में रखने के बजाय उन्हें एक-दूसरे के साथ जोड़ने की कोशिश की गई। यही ‘ब्रैंड मोदी’ के केंद्र में दिखाई देने वाला संतुलन है।
समावेश को व्यवस्था का हिस्सा बनाना
मोदी की राजनीतिक पहचान को बड़े स्तर पर बनाने में एक और चीज महत्वपूर्ण रही है- समावेशन को सिर्फ कल्याण योजना के रूप में नहीं, बल्कि लोगों को व्यवस्था से जोड़ने के रूप में पेश करना। जैसे- एक बैंक खाता, एक डिजिटल पहचान, एक मोबाइल कनेक्शन, एक भुगतान व्यवस्था और सीधे लाभ पहुंचाने की व्यवस्था।
जी20 की भारत की अध्यक्षता के दौरान भी डिजिटल सार्वजनिक ढांचे को समावेशी विकास के एक माध्यम के तौर पर सामने रखा गया और भारत के अनुभव को दूसरे विकासशील देशों के लिए उपयोगी बताया गया। इससे समावेशन का मतलब भी बदलता है। यह सिर्फ लोगों तक सहायता पहुंचाने की बात नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें व्यवस्था में शामिल करने की बात बन जाती है। जितने ज्यादा लोग व्यवस्था से जुड़ते हैं, व्यवस्था का आकार उतना ही बड़ा होता जाता है।
कॉरपोरेट जगत के लिए भी इसमें एक महत्वपूर्ण सीख है। अगले एक अरब उपभोक्ताओं को सिर्फ पहले 10 करोड़ उपभोक्ताओं का छोटा रूप मानकर नहीं देखा जा सकता। उत्पाद, भुगतान व्यवस्था, वितरण, इंटरफेस और कीमतों को बड़े स्तर पर लोगों की भागीदारी को ध्यान में रखकर तैयार करना होगा।
लगातार एक जैसी पहचान की ताकत
राजनीति में ‘बैंकएबिलिटी’ का मतलब कारोबार से अलग है। यह उस भरोसे से जुड़ा है कि किसी खास नाम के सामने आने पर लोगों को मोटे तौर पर पता होता है कि उस नाम से किस तरह की राजनीतिक सोच और संदेश जुड़े हैं।
आज की भारतीय राजनीति में मोदी की पहचान लगातार दोहराए गए संदेशों और एक तय राजनीतिक भाषा के साथ बनी है। समय के साथ शब्द बदले हैं। महत्वाकांक्षाएं बढ़ी हैं। चुनावी अभियान बदले हैं। सरकार की प्राथमिकताएं भी बदली हैं। लेकिन विकास, बदलाव, राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और बड़े भविष्य की ओर बढ़ने की बात लगातार दिखाई देती रही है। इस निरंतरता का असर चुनावी राजनीति में भी दिखाई दिया। मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 और 2019 में केंद्र में सरकार बनाई और 2024 में एनडीए गठबंधन के नेतृत्व में उन्होंने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला। लेकिन लंबे समय तक किसी राजनीतिक पहचान को बनाए रखने के लिए सिर्फ चुनावी सफलता काफी नहीं होती। उसके लिए लगातार भविष्य की एक नई तस्वीर भी सामने रखनी पड़ती है।
भविष्य इस कहानी का अहम हिस्सा है
मोदी के संचार की एक खास बात यह रही है कि कहानी अक्सर वर्तमान पर खत्म नहीं होती। आगे का कोई न कोई लक्ष्य हमेशा दिखाई देता है। जैसे- डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, विकसित भारत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मैन्युफैक्चरिंग, बुनियादी ढांचा, ग्लोबल साउथ में भारत की बड़ी भूमिका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की ज्यादा दिखाई देने वाली मौजूदगी। यानी मंजिल लगातार आगे बढ़ती रहती है।
सीईओ, संस्थापक और संस्थाएं बनाने वाले लोगों के लिए मोदी की यात्रा से एक महत्वपूर्ण बात समझी जा सकती है। नेतृत्व सिर्फ आज की जरूरतें पूरी करने का नाम नहीं है। इसमें निरंतरता बनाए रखना और लोगों को अगले अध्याय के लिए उत्साहित रखना भी शामिल है। यही हमें फिर उन तीन भूमिकाओं पर ले आता है- क्रिएटर, प्रिजर्वर, डिसरप्टर।
नई संभावना तैयार करना, लोग जिस पहचान को जानते हैं, उसे बनाए रखना और यह चुनौती देना कि जो स्तर अभी तक सबसे बड़ा माना जाता था, वही आखिरी सीमा है।
नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार पद संभालने के 25 साल पूरे होने के मौके पर उनकी राजनीतिक पहचान को सिर्फ एक चुनाव, एक योजना, एक नारे या एक दौर तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसकी कहानी लगातार अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश में दिखाई देती है। गुजरात से दिल्ली तक, राष्ट्रीय राजनीति से वैश्विक मंच तक, कल्याण योजनाओं से डिजिटल बुनियादी ढांचे तक, सभ्यता और संस्कृति की भाषा से तकनीकी महत्वाकांक्षा तक।
अगर ‘ब्रैंड मोदी’ को सिर्फ एक नेतृत्व केस स्टडी के तौर पर देखा जाए तो दिलचस्प बात सिर्फ यह नहीं है कि यह पहचान इतने लंबे समय तक बनी रही। दिलचस्प बात यह है कि जैसे-जैसे मंच बड़ा होता गया, यह पहचान भी खुद को उस बड़े मंच के मुताबिक ढालती गई।
“सुधार करके व्यवस्था को आसान बनाओ, काम करके नतीजे दो और बदलाव के जरिए असर पैदा करो।” — नरेंद्र मोदी
संदेश के अंत में सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए उन्हें ‘India’s pride’ बताया।
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Samachar4media Bureau
वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके जन्मदिन पर खास अंदाज में शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपने संदेश में नरेंद्र मोदी के वडनगर से वाराणसी तक के सफर का जिक्र किया और चाय की दुकानों से लेकर सेमीकंडक्टर के सपनों तक की यात्रा को याद किया।
सुधीर चौधरी ने अपने संदेश में जनधन, UPI, GST, अनुच्छेद 370, CAA, तीन तलाक, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट, राम मंदिर, महिला आरक्षण और नए संसद भवन का जिक्र किया। इसके साथ ही उन्होंने G20, मेक इन इंडिया, स्पेस और सेमीकंडक्टर जैसे विषयों को भी अपने पोस्ट में शामिल किया।
उन्होंने लिखा कि कुछ फैसलों ने इतिहास बनाया, कुछ ने सुर्खियां बटोरीं और कुछ ने विपक्ष को निश्चित तौर पर अतिरिक्त मेहनत करने पर मजबूर किया। संदेश के अंत में सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए उन्हें ‘India’s pride’ बताया।
From Vadnagar to Varanasi, from tea stalls to semiconductor dreams - what a journey!
— Sudhir Chaudhary (@sudhirchaudhary) September 17, 2026
Jan Dhan, UPI, GST,
Article 370, CAA, Triple Talaq,
Surgical strikes, Balakot,
Ram Mandir, Women’s Reservation, New Parliament.
G20, Make in India, Space, Semiconductors…
Some decisions made… pic.twitter.com/CDut7YQPss
कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी।
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विनोद अग्निहोत्री,
सलाहकार संपादक, अमर उजाला।।
आज हिंदी दिवस है। हर साल की तरह इस बार भी हिंदी के प्रचार प्रसार के दावों और वादों के साथ देश में सरकारी गैर सरकारी कार्यक्रम आयोजित हैं। रविवार की छुट्टी होने के कारण इस बार सरकारी दफ़्तरों में हिंदी में कामकाज का ढोंग नहीं हो पा रहा है वरना एक दिन के लिए ये भी हो जाता और साल भर के लिए हिंदी के प्रयोग को विदा कह दिया जाता।
हिंदी की स्वीकार्यता और प्रसार में दो तीन बड़ी बाधायें हैं। पहली हिंदी को कथित सरकारी सरंक्षण जिसने हिंदी को न सिर्फ़ सरकारों पर आश्रित बना कर उसे वैसा लाड़ला बच्चा बना दिया जिसकी संघर्ष क्षमता कमजोर पड़ती है साथ ही वो दूसरों की ईर्ष्या का पात्र भी बनता है। हिंदी के साथ यही हुआ। कथित सरकारी सरंक्षण ने उसे सरकारी कामकाज और संस्थानों में अनुवाद की भाषा बना कर उसके विकास को पंगु कर दिया और अन्य भारतीय भाषा भाषी उसे अपने ऊपर थोपे जाने के भय से उसके अकारण विरोधी हो गये। सरकारी शब्दकोषीय अनुवाद की भाषा ने हिंदी के प्रयोग को दुरूह और अरुचिकर बना दिया।
इसके साथ ही कथित सरकारी सरंक्षण ने हिंदी के विकास के नाम पर भाषायी ठेकेदारों की ऐसी जमात भी पैदा की जो सरकारी अनुदानों पद और सम्मानों के लिए हिंदी की नहीं अपनी चिंता गुटबाज़ी में उलझे रहे। इसने हिंदी को कई मठों में बदल दिया और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं की अस्मिता भी हिंदी से टकराने लगी। उनके समर्थकों का आग्रह हिंदी से ज़्यादा अपनी बोलियों और भाषाओं को मान्यता दिलाने के लिए हो गया। जब देश में मुस्लिम बादशाहों और अंग्रेजों का राज था तब हिंदी स्वाभाविक और सहज ढंग से फूली फली।
कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी। गांधी, पटेल, सुभाष, नेहरू जैसे नेताओं ने हिंदी को संवाद और संप्रेषण की भाषा के रूप में स्वीकार किया। अनेक कालजयी रचनाओं ने हिंदी और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं को एक सूत्र में पिरोया।
अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी का स्वाभाविक रिश्ता बना। कोई टकराव नहीं बहनों जैसा प्रेम विकसित होने लगा। ये सिलसिला आज़ादी के कुछ वर्षों तक जारी रहा। लेकिन जैसे-जैसे हिंदी को सरकारी सरकारी सरंक्षण और उसे राष्ट्रभाषा बनाने का आग्रह बढ़ा हिंदी का विरोध और उसकी दुर्दशा का दौर भी शुरू हो गया। भाषाई राजनीति और मठवाद ने हिंदी को सिर्फ़ हिंदी क्षेत्र की भाषा में बदल दिया और रही सही कसर बाज़ार की भाषा के नाम पर शुरू हुए हिंग्लिश के प्रयोग ने हिंदी को बाजारू भाषा में बदलना शुरू कर दिया।
हिंदी के सहज शब्दों की जगह ज़बरन अंग्रेज़ी के शब्दों को ठूँसने से भाषा का वर्ण संकरीकरण होने लगा।बचाव की जगह रेस्क्यू और विस्फोट या धमाके की जगह ब्लास्ट जैसे शब्दों का प्रयोग इसका उदाहरण है। हिंदी की रचनाओं को अंग्रेज़ी रचनाओं की तुलना में कमतर मानना अंग्रेज़ी ज्ञान से ज़्यादा अंग्रेज़ीयत झाड़ना हिंदी भाषी मध्यवर्ग की आम प्रवृत्ति है। जब तक हिंदी क्षेत्र इस हीन भावना से मुक्त होकर बिना सरकारी सरंक्षण के हिंदी के समृद्ध रचना संसार को अपनी पूँजी और थाती नहीं बनाता तब तक कितने भी हिंदी दिवस मना लीजिए हिंदी की दशा नहीं सुधरेगी।
इसकी पहल हिंदी भाषियों को अपने घरों परिवारों से करनी होगी। अपने घरों परिजनों के साथ बोलचाल पठन पाठन में हिंदी का प्रयोग बेहिचक करना होगा। बच्चे अंग्रेज़ी और अन्य भाषायें सीखें पर हिंदी न छोड़ें। हिंदी अख़बार पढ़ें हिंदी साहित्य जानें और हिंदी में कामकाज में हीनता नहीं गौरव का भाव रखें। सिर्फ़ मजबूरी में सब्ज़ी वाले रिक्शे वाले से हिंदी में बात न करें बल्कि जब तक मजबूरी और ज़रूरी न हो अंग्रेज़ी न बोलें। हिंदी भाषियों से हिंदी में ही बात करें। अपने अध्ययन कक्ष में तुलसी कबीर प्रेमचंद प्रसाद दिनकर समेत सभी हिंदी के महान रचनाकारों की रचनाएँ प्रमुखता से रखें।
हिंदी क्षेत्र की बोलियों भाषाओं को हिंदी के मुक़ाबले खड़ा करने की बजाय उन्हें सहोदरी बनायें।जिस दिन से हम हिंदी भाषी ये सब करने लगेंगे तब हिंदी को किसी सरकारी सरंक्षण दिवस मनाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। वरना मानते रहिए हिंदी दिवस का कर्मकांड। वैसे भी पितृ पक्ष चल रहा है जो कर्मकांड का ही समय है। आख़िर में हिंदी कर्मकांड दिवस की बधाई।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)