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सत्ता से मीडिया की निकटता और मित्रता कोई नई नहीं: आलोक श्रीवास्तव

अक्सर इसकी एक वजह बाज़ार भी बताई जाती है, जिसके चलते अब समाचार पत्रों या न्यूज़ चैनलों में संपादक नहीं, प्रबंधन होते हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

आलोक श्रीवास्तव, लेखक व कवि।

राजस्थान की गौरवशाली माटी मेवाड़ में कविता की एक विधा रही है~ ‘चूंग्टया’, जिसमें कवि अपने महाराणा को भविष्य की किसी घटना की चेतावनी देने के लिए दो पंक्तियां लिख कर सुना देता था और कवि की दृष्टि का सम्मान करने वाले महाराणा अर्थात् राजा तुरंत सचेत हो जाते थे। पर अब न वैसी तनी-रीढ़ के क़लमकार रहे और नाहीं वैसे आत्म-जागृत राजा। अब जो राजा कहे वही सही अन्यथा कारागार, जेल ! कहने का काम मीडिया का भी है, सो यह समय मुख्यधारा के मीडिया के लिए भी आत्मावलोकन की चेतावनी है और उस मीडिया के लिए भी सोचने का समय है जो स्वयं को सत्ता के प्रभाव से दूर बताता है।

बचपन में कोई जब हमसे झगड़ा करता था और हम घर आकर अम्मा से उसकी शिकायत करते थे, तो अम्मा उस बच्चे के परिवार से लड़ने नहीं जाती थीं, बल्कि हमें ही समझाती थीं, 'आप ऐसे गंदे बच्चे के साथ खेलने गए ही क्यूं? जो बात-बात पर झगड़ा करता है। न उसके साथ रहते, न उसे झगड़ने का मौका मिलता। ' सत्ता और मीडिया के बीच यही हो रहा है। सत्ता से झाड़ खाने की यह सहूलत, मीडिया ने खुद उसके साथ रह कर उसे दी है। आपने सवाल पूछना छोड़ दिया तो उन्होंने भी आपसे खौफ खाना छोड़ दिया।

लंबे समय से कहा जा है कि, मुख्यधारा के मीडिया का स्वर, चाल, चित्त, चरित्र सब कुछ सत्तामयी हो गया है, वह ‘गोदी मीडिया’ हो गया है। वहीं दूसरी तरफ ‘अ-गोदी मीडिया’ जो स्वयं को निरपेक्ष बताता है, अब उसका भी यह दायित्व हो गया है कि वह भी स्वयं के स्वर को समझे और अपनी दृष्टि को बदले क्योंकि इसी समाज का एक बड़ा वर्ग मानता है कि 'अ-गोदी मीडिया भी निरपेक्ष नहीं है। बस उसकी ‘गोदी’ छिन गई है, इसलिए इसका स्वर सत्ता के प्रवक्ता सा न होकर, उसके विरुद्ध आवाज उठाता सुनाई देता है। '

पुराने या वरिष्ठतम् पत्रकारों से बात कीजिए तो वे आपको बताएँगे कि “सत्ता से मीडिया की निकटता ने ऐसे गुल पहले भी खिलाए हैं। दोनों की यह ‘मित्रता’ नई नहीं है। हर सत्ता के पास उसके अपने हिस्से का ‘गोदी मीडिया’ रहा है। यह और बात कि तब हमारे पास अपनी पसंद-नापसंद व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया नहीं था, इसलिए हम अपने आसपास जो भी काला-सफ़ेद महसूस करते थे, वह आज की तरह तुरंत व्यक्त नहीं कर पाते थे। लिहाज़ा हम इस सच्चाई से नहीं भाग सकते कि सत्ता के प्रवक्ता के रूप में हमारे समक्ष खड़े मीडिया का यह रूप, नया है। मौजूदा पत्रकारिता के दोनों धड़ों की भीड़ में, सत्ता से सवाल पूछने वाले और सत्ता के साथ खड़े होने वाले दोनों स्वरों में से हम एक तठस्थ स्वर नहीं निकाल सकते।'

अक्सर इसकी एक वजह बाजार भी बताई जाती है, जिसके चलते अब समाचार पत्रों या न्यूज चैनलों में संपादक नहीं, प्रबंधन होते हैं। अकबर इलाहाबाद का शेर है, 'खींचो न कमानों को न तलवार निकालो / जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। 'आज के कुछ मीडिया समूहों ने इसे अपनी सहूलत से कुछ यूं कर लिया है 'देखो न उसूलों को, न सच्चाई खंगालो / बाज़ार ये कहता है कि अखबार निकालो।'

हमें समझ लेना चाहिए कि यहां बात मात्र सत्ता के पक्ष या विपक्ष में खड़ी पत्रकारिता की हो रही है। जिस तरह पक्ष में खड़े होना निरपेक्ष होना नहीं है, ठीक वैसे ही हर बात का सिर्फ विरोध करना भी निरपेक्ष पत्रकारिता का सिद्धांत नहीं है। तो निरपेक्ष होना क्या है? किसी भी विषय को तठस्थ व पूर्वाग्रह-रहित भाव से देखना, उसे उसके मानक, पूर्ण और सही रूप में सबके समक्ष रखना, यह निरपेक्षता का मूल सिद्धांत है। किंतु अब निरपेक्षता या तठस्थता रही कहां? समाज का एक बड़ा वर्ग आज खुले आम कहता है कि, 'आज का मीडिया ‘गोदी मीडिया’ कहलाना डिजर्व करता है।' इसकी बीसियों मिसालें भी वह देता है। वहीं दूसरे धड़े की भी ऐसी मिसालें सामने हैं जिन्हें गौर से देखें तो उसका चित्त और चरित्र भी हमारे सामने उधड़ कर आ जाएगा।

दरअसल, हर सत्ता के पास यह सहूलत रही है कि वह अपने हिसाब से अपना गोदी मीडिया तैयार करे और फिर उसके माध्यम से समाज में अपना नेरिटिव सेट करवाए। इसे उन राज्‍यों में झांक कर देख लीजिए जहां केन्द्र की सरकार या सत्ता नहीं रहीं। वहां नेशनल चैनलों के प्रादेशिक संस्करणों की दशा-दिशा उस राज्य की सरकार को साष्टांग प्रणाम करती नज़र आ जाएगी, जबकि उसी प्रादेशिक चैनल का नेशनल न्यूज़ चैनल आपको सत्ता-प्रवक्ता के सुर में समाचार सुना रहा होगा। अब यह स्थाई-भाव बन गया है। अर्थात सत्ता बदलती रहती है, किंतु मीडिया का एक बड़ा धड़ा स्थाई रूप से सत्ता-प्रवक्ता बना रहता है।  

कुछ पत्रकार मित्रों का कहना है, उन्हें कोसने से पहले मीडिया हाउस और पत्रकार को अलग करके देखने कि जरूरत है, सत्ता की गोदी में हाउस होता है पत्रकार नहीं ! लेकिन फिर सवाल यही है कि आपकी रीढ़ कहां है? आपको पत्रकार क्यूं कहा जाए? अर्थात् यहां तठस्थ कोई नहीं है। अधिकांश बहे जा रहे हैं। तट के किनारे खड़े होकर निरपेक्ष भाव से काल-खंड का आकलन करने वाले बहुत कम हैं। ऐसे लोग अब मुख्यधारा के मीडिया में न के बराबर हैं।

संविधान और स्थापनानुसार लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को तठस्थ व लोक हितकारी होना चाहिए जबकि हो यह रहा है कि लोकतंत्र के इस मजबूत स्तंभ का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के सान्निध्य की जमीन पर खड़ा है तो दूसरा हिस्सा सत्ता के विरुद्ध जाकर इस जुगाड़ में है कि वह भी अपनी सुविधानुसार खड़े रहने की जमीन तलाश ले। दोनों का अपना तगड़ा एजेंडा है। तब इसमें लोकतंत्र का स्वर और पक्ष कहां गया? आपको पता भी नहीं चला और सत्ता के विरोध के नाम से आपसे आपका वह स्वर भी छीन लिया गया जो निरपेक्ष हो सकता था, पर नहीं है। तो अब हम इन दोनों से उम्मीद की बात सोच भी कैसे सकते हैं ? क्योंकि बात तो वहीं संभव होती है जहां संभावना हो।

कोई एक व्यक्ति जब कोई बात कहता है तो उसके आग्रह-पूर्वाग्रह हो सकते हैं, किंतु जब समाज का एक बड़ा वर्ग एक-सी सोच रखने लगे तो यह सचमुच चिंतन व आत्मावलोकन की चेतावनी हो जाता है, और इस चेतावनी के दायरे में कोई एक नहीं, बल्कि मीडिया के दोनों धड़े आते हैं। पहला वह जो अपनी जमीन के लालच में सत्ता-पक्ष का विरोध करते करते, इतना दूर निकल गया है कि वह अब अपनी लोक हितकारी जिम्मेदारी तक भूल चुका है। विरोध उसका एक मात्र स्वर बन गया है और दूसरा वह जो पूरी तरह से सत्ता-प्रवक्ता की भूमिका में आकर गोदी मीडिया कहलाने लगा है। डॉ. बशीर बद्र का शेर है, 'बड़े शौक से मेरा घर जला, कोई आंच तुझपे न आएगी / ये ज़ुबां किसी ने खरीद ली, ये कलम किसी का गुलाम है।'

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


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