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सत्ता, संपत्ति और सन टीवी का विवाद: मारन बंधुओं के बीच हुआ 'युद्धविराम'?
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए करुणानिधि-मारन परिवार के वरिष्ठ सदस्य और डीएमके अध्यक्ष व तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने हस्तक्षेप किया।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago
वी.सी. भारती, एक्सपर्ट, तमिल टेलीविजन इंडस्ट्री ।।
तमिलनाडु की सियासी और कारोबारी हलचल उस वक्त हिल गई जब देश की सबसे प्रभावशाली मीडिया कंपनियों में से एक सन टीवी नेटवर्क के उत्तराधिकारी- कलानिधि मारन और दयानिधि मारन के बीच पारिवारिक और कॉर्पोरेट स्तर पर तीखा विवाद सामने आया। इस टकराव का केंद्र है वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप, शेयरों के फर्जी आवंटन को लेकर कानूनी लड़ाई, और एक ऐसे मीडिया साम्राज्य पर नियंत्रण की जंग जिसकी अनुमानित कीमत जून 2025 तक ₹24,400 करोड़ से अधिक आंकी गई है।
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए करुणानिधि-मारन परिवार के वरिष्ठ सदस्य और डीएमके अध्यक्ष व तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने न सिर्फ पार्टी की छवि को संभावित नुकसान से बचाने की कोशिश की बल्कि पारिवारिक साख को भी सुरक्षित रखने की पहल की।
दरअसल, मामला डीएमके के लिए पीआर डिजास्टर बन सकता था। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, स्टालिन, जो कि न सिर्फ सीएम हैं बल्कि इस पारिवारिक नाटक में खुद भी गहरे जुड़े हैं, ने दोनों भाइयों को एक समझौते की ओर लाने की भरपूर कोशिश की। बताया जाता है कि जून 2025 से पहले तीन महीनों में कम से कम दो बार स्टालिन ने इस सुलह की कोशिश की थी। और क्यों न करते? परिवार का झगड़ा अगर चुनाव से पहले मीडिया में सुर्खियों में आ जाता, तो पार्टी की साख पर बट्टा लगना तय था।
सूत्रों के अनुसार, स्टालिन की कोशिश थी कि दयानिधि को एक मोटी वित्तीय राशि देकर शांत किया जाए, जबकि कलानिधि को सन टीवी का संचालन जारी रखने दिया जाए। माना जाता है कि कलानिधि और उनकी बहन अंबुकरसी इस प्रस्ताव को लेकर कुछ हद तक तैयार थे, यहां तक कि अंबुकरसी को बतौर शांति प्रस्ताव ₹500 करोड़ तक की राशि भी मिली। लेकिन दयानिधि? उन्होंने इस डील को सीधे खारिज कर दिया और कानूनी रास्ता चुन लिया। एक वरिष्ठ डीएमके नेता के शब्दों में, यह "ज्यादा फायदा न देने वाला राजनीतिक जुआ" था क्योंकि पहले से ही पारिवारिक दौलत को लेकर जनता की नजर उन पर टिकी हुई थी।
दयानिधि की मांग थी कि सब कुछ 2003 से पहले की स्थिति में लौटाया जाए ताकि वह, अंबुकरसी और बाकी करुणानिधि परिवार मिलकर सन टीवी पर नियंत्रण हासिल कर सकें। लेकिन कलानिधि, जिन्होंने बीते तीन दशकों में इस मीडिया साम्राज्य को खड़ा किया है, अपने हाथ से इसकी चाबी इतनी आसानी से नहीं सौंपने वाले थे। यानी स्थिति जैसे थी, वैसे ही बनी रही: एक ठहराव।
हालांकि 6 जुलाई 2025 के बाद से मुख्यमंत्री स्टालिन की मध्यस्थता फिर से तेज़ हो गई। एक समय पर दयानिधि की मांग थी कि उन्हें 'दिनकरन' अखबार और सुमंगली पब्लिकेशंस का स्वामित्व दे दिया जाए, लेकिन कलानिधि ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
भले ही इस संभावित समझौते की शर्तें अब तक सार्वजनिक नहीं हुई हैं, लेकिन सूत्रों की मानें तो दयानिधि को नकद मुआवज़ा देने की बात सामने आई है। कानाफूसी ये भी है कि उन्हें और अंबुकरसी को लाभांश के ज़रिए या शेयर होल्डिंग स्ट्रक्चर को दोबारा गढ़कर एक मोटी रकम दी जा सकती है, बशर्ते दयानिधि कोर्ट केस वापस ले लें। इसके अलावा, उन्हें डीएमके के साथ जोड़े रखने की भी कोशिश की जा रही है, क्योंकि चेन्नई सेंट्रल से सांसद होना और स्टालिन के बेटे उदयनिधि के साथ सीधा संपर्क उनकी पार्टी में स्थिति को बनाए रखने का जरिया हैं।
फिलहाल जो संकेत हैं, वे यही बताते हैं कि दोनों पक्षों के बीच एक तरह का युद्धविराम है। सार्वजनिक तौर पर विवाद शांत है, लेकिन यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि यह लड़ाई अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है या नहीं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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