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गांधी की विरासत को बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी: समीर चौगांवकर
महात्मा गांधी अपने जीवन में पहली बार दिल्ली 12 अप्रैल 1915 को आए थे। बिडला हाउस में गांधी पहली बार 1939 में रूके थें। अपने जीवन में कुल 14 मर्तबा गांधी दिल्ली के बिडला हाउस में रूके।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 year ago
समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार।
आज 30 जनवरी हैं। 30 जनवरी 1948 को आज ही के दिन हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की गई थी। विडंबना देखिये। जो गांधी दक्षिण अफ़्रीका में इक्कीस साल गोरों की सरकार से जूझने और सन 1915 से 1947 तक भारत में निरंकुश अंग्रेजों को चुनौती देने के बावजूद जीवित ,सकुशल बने रहे वो गांधी स्वतंत्र भारत में सिर्फ़ 169 दिन ज़िंदा रहे। भारत ने महात्मा गांधी को खो दिया।
अब इस देश में कोई दूसरा गांधी पैदा नहीं होगा। लेकिन गांधी मर भी नहीं सकता। गांधी को मारने वाले गोडसे की चाहे जितनी मूर्तियां बना लें, वे गोडसे को जिंदा नहीं कर सकते। जबकि गांधी को वे जितनी गोलियां मारें, गांधी मर नहीं सकते। गांधी की धार्मिकता के सामने धर्म के नाम पर पलने वाली सांप्रदायिकता खुद को कुंठित पाती थी। गोडसे इस कुंठा का प्रतीक पुरुष था जिसने गोली धर्मनिरपेक्ष नेहरू या सांप्रदायिक जिन्ना को नहीं, राम का सबसे पवित्र भाव से नाम लेने वाले सच्चे हिंदू गांधी को मारी।
गांधी हमारे राष्ट्रपिता हैं। गांधी हमारे सम्मान, राष्ट्रीय गर्व और गौरव के प्रतीक हैं। गोड़से राष्ट्रीय शर्म का प्रतीक हैं। महात्मा गांधी अपने जीवन में पहली बार दिल्ली 12 अप्रैल 1915 को आए थे। बिडला हाउस में गांधी पहली बार 1939 में रूके थें। अपने जीवन में कुल 14 मर्तबा गांधी दिल्ली के बिडला हाउस में रूके। अंतिम बार दिल्ली के बिड़ला हाउस में गांधी 9 सिंतबर 1947 को आए थे और 30 जनवरी 1948 को हत्या के दिन तक थे।
बिडला हाउस में गांधी का चरखा है, चरण पादुका है। कमर घड़ी है। राम कहकर इसी बिड़ला हाउस में गिरे। यही गांधी का खून बहा। गांधी आज भी बिड़ला हाउस में जिंदा है। बिड़ला हाउस हमें सच्ची लज्जा से भर देता है। भावुक कर देता है। दिल्ली में एक दिन बिरला हाउस जाकर वह अहाता देखना, जहां महात्मा गांधी के पांव पड़े थे।
वह बरामदा देखना, जहा अधनंगे फकीर ने अपना आखिरी फाका किया था। जिस दिल्ली के बिड़ला हाउस में महात्मा ने शरीर त्यागा, वह स्थान भारत का तीर्थ है। पुण्यभूमि हैं। शांति निंकुज है। कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्हें महात्मा कहा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें राष्ट्रपिता कहा। हिन्दुस्तान ने उन्हें प्यार से बापू कहा।
विस्टन चर्चिल ने उन्हें नंगा फकीर कहा। नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग जैसी विभूतियों ने उन्हें अंहिसा का पूजारी कहा। अल्बर्ट आइंस्टीन ने सच ही लिखा था कि 'भावी पीढ़ियों को विश्वास ही नहीं होगा कि इस धरती पर हाड़ मांस का कोई गांधी कभी जन्मा भी था।
गांधी सिर्फ बिड़ला हाउस के प्रांगण में नहीं मरे थे, वे आज भी तिल-तिल कर मारे जा रहे हैं और हम सभी इसके तमाशबीन हैं। गांधी की विरासत और विचारों को बचाने की जिम्मेंदारी हम सबकी हैं। जब तक यह दुनिया रहेगी, हमारे बापू भी रहेंगे।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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