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विदेशी दबाव से बेहतर है भारतीय छात्र बसाओ अपना देश: आलोक मेहता

शिक्षा के क्षेत्र को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देकर हार्वर्ड, ऑक्सफ़ोर्ड जैसे विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखाएं खोलने और उनकी तरह श्रेष्ठ शिक्षा के केंद्र बनाने को भी प्राथमिकता दी जाये।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 8 months ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

अमेरिका और ब्रिटिश सरकारें भारतीय छात्रों से करोड़ों की कमाई के बाद अधिकांश युवाओं को फरमान जारी कर रही हैं कि अपने घर लौट जाएं। राष्ट्रपति ट्रम्प और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के सत्ता में आने के बाद नए नियम कानून थोपकर अन्य विदेशियों के साथ भारतीय युवाओं को भी कुछ तनाव और मुसीबत पैदा कर दी है। हजारों छात्र और उनके माता पिता लाखों या एक से पांच करोड़ तक के खर्च या कर्ज का इंतजाम करते हैं। बहुतों को यह आशा या विश्वास रहता है कि पढाई ख़त्म करने के बाद दो चार साल परदेस में नौकरी या कोई काम करके कमाई से कर्ज पूरा कर देंगें।

भारत में भी अच्छे उच्च शिक्षित युवाओं के लिए रोजगार की संभावनाएं बढ़ी हैं। भारतीय कंपनियों के अलावा बड़े पैमाने पर विदेशी कंपनियां उन्हें नौकरियां दे रही हैं लेकिन वे भारतीय बाजार क्षमता के अनुसार प्रारम्भ में उतना वेतन नहीं देती हैं। इसी तरह स्व रोजगार के लिए अच्छी खासी बड़ी धनराशि की जरुरत होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता के 11 साल पूरे होने पर अब तक की उपलब्धियों के साथ भविष्य के लिए विभिन्न क्षेत्रों में आत्म निर्भरता के साथ विकसित भारत 2047 का लक्ष्य सामने रखा है।

इसलिए दुनिया की चौथी बड़ी अर्थ व्यवस्था के साथ डिजिटल क्रांति, रक्षा क्षेत्र के उत्पादन, विज्ञानं टेक्नोलॉजी, अंतरिक्ष ,स्वास्थ्य चिकित्सा आदि में आत्म निर्भरता के अभियान चलाए जा रहे हैं। तब शिक्षा की नई नीति लाने के बाद शिक्षा के क्षेत्र को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देकर हार्वर्ड ऑक्सफ़ोर्ड जैसे विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखाएं खोलने और भारत के अपने चुनिंदा विश्वविद्यालयों को उनकी तरह श्रेष्ठ शिक्षा के केंद्र बनाने को भी प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा सकती है? हाल के महीनों में यह तथ्य सामने आए हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका में पढ़ाई के बाद रुकना अब कठिन हो रहा है।

छात्रों के वीज़ा रद्द होने और देश से निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। करीब 3 लाख से अधिक भारतीय छात्र अमेरिका में पढ़ाई के बाद पुराने नियम की ऑप्शनल ट्रेनिंग योजना के अंतर्गत काम करना चाहते हैं, लेकिन अब इसे बंद करने का प्रस्ताव सामने आया है। इससे छात्रों को पढ़ाई के तुरंत बाद भारत लौटने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। मई 2025 तक 69,000 भारतीय छात्रों को अधिकारियों द्वारा चेतावनी पत्र मिले हैं कि वे बेरोजगारी की सीमा पार कर चुके हैं, जिससे उनका वीजा रद्द हो सकता है और देश छोड़ने के आदेश दिए जा सकते हैं।

छोटे-मोटे नियम उल्लंघन या राजनैतिक गतिविधियों (जैसे फिलिस्तीन समर्थन) के कारण कई छात्रों का वीजा तुरंत रद्द किया जा रहा है। इसी तरह "सेल्फ-डीपोर्ट" (स्वेच्छा से देश छोड़ने) का दबाव बनाया जा रहा है। जिन छात्रों का वीजा रद्द हुआ है, उन्हें 15 दिनों के भीतर अमेरिका छोड़ने का आदेश दिया गया है। कई छात्र नौकरियाँ छोड़ रहे हैं या डर के कारण कोई नौकरी नहीं ले पा रहे हैं। इसी तरह ब्रिटेन में पढ़ाई के बाद नौकरी मिलना अब और मुश्किल हो रहा है।

पहले की तरह नियमानुसार काम करने की अनुमति का समय घटा दिया गया है। पहले पढाई के साथ हफ्ते में निर्धारित घंटे किसी तरह के पार्ट टाइम काम करने का प्रावधान रहा है। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय छात्रों के लिए ग्रेजुएट रुट वीसा की अवधि 2 साल से घटाकर 18 महीने कर दी है। साथ ही, परिवार के साथ वीजा लेने पर भी कई नई बंदिशें लगाई गई हैं। हाल की रिपोर्ट्स के अनुसार, 90% से अधिक भारतीय छात्र पढ़ाई के बाद भारत लौट आए, क्योंकि उन्हें नौकरी नहीं मिली या वीज़ा विस्तार नहीं मिला।

इससे मानसिक तनाव बढ़ रहा और पढ़ाई अधूरी लग रही है। दूसरी तरफ ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि रिज़र्व बैंक के रिकॉर्ड के अनुसार 2023–24 में भारतीय छात्र और अन्य उद्देश्य के लिए भारत से भेजी गई शिक्षा एवं यात्रा सम्बंधित राशि $3.47 बिलियन थी। 2024–25 में इससे जुड़ी कुल धनराशि करीब $31.7 बिलियन है और इस में कुल शिक्षा संबंधित राशि करीब $3.5 बिलियन है।

एक मोटे अनुमान के अनुसार भारतीय छात्रों द्वारा विदेश में शिक्षा के लिए सालाना लगभग ₹30–₹35 हजार करोड़ (US $3.4–3.5 B) का विदेशी मुद्रा खर्च किया जा रहा है। 2025 में भारत में करीब 1,150 विश्वविद्यालय और 40,000 से अधिक कॉलेज चल रहे हैं। इनमें केंद्रीय विश्वविद्यालय 55, राज्य विश्वविद्यालय 479 , डीम्ड विश्वविद्यालय 137 और निजी विश्वविद्यालय 455 बताए जाते हैं।

वित्त वर्ष 2025–26) में कुल शिक्षा बजट: ₹1,28,650 करोड़ है। इसमें स्कूल शिक्षा को ₹78,572 करोड़ (61%) और उच्च शिक्षा को ₹50,078 करोड़ (39%) आवंटित किया गया है। भारत ने आधिकारिक तौर पर विदेशी विश्वविद्यालयों को 2023 में शाखा कैंपस खोलने की अनुमति दे दी है। इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमानुसारवैश्विक प्रतिष्ठित (टॉप 500 रैंकिंग) विश्वविद्यालय भारत में स्वतंत्र कैंपस खोल सकते हैं। ये संस्थान स्व निर्धारित प्रवेश नीति, शुल्क संरचना, और बुनियादी ढांचे के साथ पूरी स्वायत्तता में काम करेंगे।

ऑन कैंपस शुरुआत होगी, 10% से अधिक ऑनलाइन शिक्षा की अनुमति नहीं है। एक विश्वविद्यालय एक से अधिक कैंपस खोल सकता है। अब तक 5 विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति मिल चुकी है। इनमें अमेरिका की इलिनोइस इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी , Illinois Institute of Technology , ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ लीवरपूल ( University of Liverpool ) ऑस्ट्रेलिया की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी (Victoria यूनिवर्सिटी ) और वेस्टर्न सिडनी Western Sydney University ) और इटली की इंस्टिट्यूट यूरोपा डी डिज़ाइन शामिल है।

अगले चरण में अब तक लगभग 15 विश्वविद्यालयों को भारत में शाखा कैंपस खोलने के लिए अनुमति जारी हुई है। ये 2025–26 में परिचालन शुरू कर सकते हैं। भारत में हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज जैसे विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए सिर्फ बुनियादी ढांचे या इमारतों की जरूरत नहीं होती। इसके लिए एक नीति, संस्कृति और संसाधनों की अनुकूल स्थितियों की आवश्यकता है।

जैसे शैक्षणिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता और विश्वविद्यालयों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना होगा। फिर कोर्स डिज़ाइन, प्रवेश प्रक्रिया, नियुक्ति और शोध दिशा में स्वतंत्रता आवश्यक है। मौजूदा नियामकों यू जी सी और ए आई सी टी ई को सुधार कर विश्वविद्यालयों को अधिक स्वतंत्रता देनी होगी। विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों को प्रति विद्यार्थी ₹25–50 लाख तक सालाना निवेश की जरूरत होती है। भारत को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल अपनाना चाहिए।

एंडॉवमेंट फंड्स की संस्कृति विकसित करनी होगी। जैसे हार्वर्ड के पास $50 बिलियन से अधिक है। भारत को विश्व स्तर की फैकल्टी को आकर्षित करने के लिए: ₹1–2 करोड़ का वेतन देना होगा। रिसर्च फंडिंग, आवास और स्वतंत्रता देना होगा। प्रवासी भारतीय शिक्षाविद, नोबेल विजेता, और भारतीय मूल के प्रोफेसरों को भारत लौटने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। अनुसंधान और नवाचार को प्राथमिकता देनी होगी।

भारत के विश्वविद्यालयों को विश्व रैंकिंग के मानदंडों और पारदर्शिता पर ध्यान देना होगा। जैसे छात्र-शिक्षक अनुपात, अंतरराष्ट्रीय विविधता, रिसर्च प्रभाव भारत के विश्वविद्यालयों का 90% ध्यान अभी पढ़ाने पर है, रिसर्च पर बहुत कम है। केंद्र सरकार को टॉप विश्वविद्यालयों को रिसर्च बजट 500 से 1000 करोड़ देना चाहिए।यह काम बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां भी कर सकती हैं। यही नहीं शिक्षा के लिए धार्मिक संस्थानों ट्रस्टों से अरबों रुपया मिल सकता हैं। वहां तो उनके खजाने में अरबों का सोना चांदी भरा है। उसका उपयोग बैंकों से धन लेने में हो सकता है। शिक्षा से बड़ा पुण्य क्या हो सकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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