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भारत से नफ़रत की आग में हिंदू बने आसान निशाना: नीरज बधवार

78 सालों का इतिहास बताता है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश ने अपने ही हिंदुओं को भारत से अपनी नफ़रत की प्यास बुझाने के लिए एक आसान शिकार के तौर पर देखा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago

नीरज बधवार, पत्रकार, लेखक।

हमारे घर पर पिछले पाँच सालों से बर्तन सफ़ाई के लिए एक बंगाली मुस्लिम महिला आती हैं। वो बताती तो खुद को पश्चिम बंगाल से हैं, मगर एक दिन उनकी ही किसी बात से ये साफ़ हो गया कि वो बांग्लादेशी हैं और काफी साल पहले भारत आईं थीं। वो काम में अच्छी हैं और मन में ऐसा कभी ख़याल आता भी नहीं कि उसकी इस पहचान (बांग्लादेशी मुस्लिम) के आधार पर उसे हटा दिया जाए।

उसके हसबैंड भी पास की ही एक सोसाइटी में मेंटेनेंस टीम में हैं। दोनों पति-पत्नी छोटे-छोटे काम करके घर चलाते हैं। बावजूद इसके बेटा जामिया में हॉस्टल में रहकर पढ़ता है और इस बात के लिए मम्मी ने हमेशा उनकी तारीफ़ की। अभी दो दिन पहले वो सुबह नहीं आईं, तो मम्मी ने उन्हें कॉल किया। पता लगा कि बीती रात उनके पति की तबीयत अचानक बहुत ज़्यादा खराब हो गई थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा।

उन्होंने बताया कि डॉक्टर जिस सर्जरी के लिए बोल रहे हैं, उसमें एक लाख रुपए से ऊपर का ख़र्चा है। ये बात सुबह दस बजे के आसपास की होगी। बारह बजे पता चला कि जिन घरों में वो काम करती थीं, वहीं से उसे ये सारा पैसा मिल गया है। फिर शाम को उसने सर्जरी के बाद अस्पताल से अपने पति की फ़ोटो भी भेजी। ये सारी बात बताने का मक़सद ये है कि भारत जैसा है, उसने वैसा होने की क़ीमत भी चुकाई है, फिर भी वो वैसा होना छोड़ नहीं पाता।

ऐसा तो नहीं है कि सोसाइटी के जिन लोगों ने उनकी मदद की, वो उसकी पहचान नहीं जानते। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें ये नहीं पता कि बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ क्या हो रहा है। बावजूद इसके वो वैसा होना छोड़ नहीं पाते, जैसे वो हैं। लोग अक्सर एक-आध घटना को आगे रखकर उसे देश का असल चरित्र बताने की कोशिश करते हैं। घटना तो एक भी नहीं होनी चाहिए, लेकिन एक-आध या दो-चार घटनाएँ इस देश के चरित्र को डिफ़ाइन नहीं करतीं।

78 सालों का इतिहास बताता है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश ने अपने ही हिंदुओं को भारत से अपनी नफ़रत की प्यास बुझाने के लिए एक आसान शिकार के तौर पर देखा है। शेख़ हसीना का तख़्तापलट हुआ, तो हिंदुओं पर एक साल में ढाई हज़ार हमले कर दिए गए। कश्मीर में भारत-विरोधी आंदोलन हुए, तो वहाँ सबसे पहले कश्मीरी पंडितों को भारत का एजेंट बोलकर भगाया गया।

91 के दौर में जब भारत में राम मंदिर आंदोलन चल रहा था, तो उसके विरोध में पाकिस्तान में सरकारी देख-रेख में वहाँ दर्जनों मंदिर गिरा दिए गए। ये सारे उदाहरण बताते हैं कि भारत से अपनी नफ़रत में पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश और कश्मीर तक जिहादियों ने स्थानीय हिंदुओं को सिर्फ़ उनके हिंदू होने की वजह से टारगेट किया, बिना इसकी परवाह किए कि वो भी तो उसी ज़मीन के वासी हैं।

जैसे कश्मीर के लिए अक्सर मैं कहता हूँ कि कश्मीर में हुई हिंसा अगर कश्मीर की आज़ादी की लड़ाई थी, तो वहाँ के पंडित क्या कश्मीरी नहीं थे? ये कौन-सी आज़ादी थी, जो कश्मीरी मुसलमानों को बिना कश्मीरी पंडितों के चाहिए थी? अब ऐसा तो नहीं है कि भारत में खुद को हिंदू मानने वाला हर आदमी संयम और शांति की प्रतिमूर्ति है। अगर एक हमले के बाद ऑस्ट्रेलिया जैसे देश का मीडिया इस्लामिक आतंकियों के लिए Bastard शब्द इस्तेमाल कर देता है।

अगर यूरोप में इसी कट्टरपंथी इस्लामिक सोच से परेशान होकर वहाँ इस्लाम को लेकर हर तरह की बेहूदा बात की जा रही है, यूरोपीय देशों में इस्लाम को बैन करने की बात की जा रही है, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि उसी कट्टरपंथी इस्लाम से परेशान होकर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं होगी। राजनीतिक तौर पर तो वो प्रतिक्रिया साफ़ दिखती है, लेकिन आपसी व्यवहार में अभी भी हमारे समाज का व्यवहार अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ज़्यादा है, न कि धार्मिक पहचान के आधार पर।

अगर कश्मीर से आए एक मुस्लिम डॉक्टर को नौकरी चाहिए, तो मुज़फ़्फ़रनगर का एक हिंदू डॉक्टर बिना सोचे उसे अपने अस्पताल में पाँच लाख की नौकरी दे देता है कि कश्मीर में हिंदुओं के साथ क्या हुआ। क्योंकि वो उसे काम देते वक्त उसकी क़ाबिलियत देखेगा, उसका व्यवहार देखेगा, न कि उसका फ़ैसला सिर्फ़ उसकी क्षेत्रीय और मज़हबी पहचान के आधार पर होगा।

तभी आप देखिए, पहलगाम जैसी घटना के बाद ऐसा नहीं होता कि लोग देशभर में कश्मीरी मुसलमानों की निशानदेही करके उन्हें इसलिए प्रताड़ित करने लगें कि किसी कश्मीरी मुसलमान ने पाकिस्तानी आतंकियों की मदद करके किसी पहलगाम को अंजाम दे दिया। या पश्चिम बंगाल में बंगाली हिंदू अपनी बस्ती में रह रहे किसी बंगाली मुसलमान को इसलिए सताने लगें क्योंकि बांग्लादेश में वहाँ के जिहादी हिंदुओं को सता रहे हैं। या नोएडा की किसी सोसाइटी में एक गरीब कामवाली की मदद करते वक्त उसकी ज़रूरत से पहले उसकी मज़हबी पहचान देखने लगें।

नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं हो रहा। अपवाद हो सकता है, लेकिन अपवाद को हादसे के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि समाज के चरित्र के रूप में। इसलिए जब कुछ लोग भारत में हुई दो-चार घटनाओं को आगे रखकर पूरे समाज को उसी रंग में रंगने की कोशिश करते हैं, तो वो दो गुनाह एक साथ करते हैं। पहला, वो घटना को घटना के रूप में देखने के बजाय उसका सामान्यीकरण करके पूरे समाज को बदनाम करने की कोशिश करते हैं। और दूसरा, जब आप ये कहते हैं कि भारत तो ऐसा ही है, तो आप दूसरे पक्ष को भी लाइसेंस दे देते हैं कि हाँ, भैया, तुम जो कर रहे हो, वो तो एकदम जायज़ है।

इसीलिए मैं मानता हूँ कि भारत में आरफ़ा जैसे लोग, जो खुद को मुसलमानों का हमदर्द बताकर तिल का ताड़ बनाते हैं और पूरी दुनिया में ये प्रचारित करते हैं कि भारत में तो ये आम हो गया है, तो ऐसे लोग ही पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों से उनका रत्तीभर अपराधबोध भी छीन लेते हैं। उल्टा, ऐसे लोगों के बयान इन देशों को अपने लाखों कुकर्मों को भारत में अपवाद स्वरूप हुई कुछ घटनाओं के बरक्स रखकर उसे रफ़ा-दफ़ा करने की बेशर्मी देते हैं, भारत को बदनाम करने का हौसला देते हैं।

लेकिन देश खुद से जुड़ी अफ़वाहों के आधार पर बर्ताव नहीं करते, वो अपने चरित्र के आधार पर बर्ताव करते हैं। असल भारत झारखंड में एक मुसलमान को उसके मुसलमान होने की वजह से पीटने वाला नहीं है। न ही वो किसी मॉल के बाहर क्रिसमस की तैयारी देखकर हल्ला मचाने वाला है। असल भारत वो है, जो बांग्लादेश से आई एक गरीब मुस्लिम महिला की मदद के लिए दो घंटे में एक लाख रुपए इकट्ठा कर लेता है। और जो लोग ऐसा कर रहे हैं, उनमें कोई किसी को नहीं जानता।

वो ऐसा करते वक्त ये भी नहीं सोच रहा कि वो कोई महान काम कर रहा है। वो ऐसा कर रहा है, तो इसलिए क्योंकि वो ऐसा है। ऐसा होना उसके लिए कोई विकल्प नहीं, बल्कि जीवन जीने का एकमात्र तरीका है। उसके जीवन संस्कार हैं। वो संस्कार, जो तमाम उत्तेजना के बीच भी इंसान की ज़रूरत पर उसकी मज़हबी पहचान को भारी नहीं पड़ने देते। और उससे वो करवाते हैं, जो उसका धर्म है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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