IIMC के DG प्रो.संजय द्विवेदी ने बताया, पत्नी संग मिलकर कैसे जीती कोरोना से जंग

मुझे और मेरी पत्नी श्रीमती भूमिका को एक ही दिन बुखार आया। बुखार के साथ खांसी भी तेज थी। जो समय के साथ तेज होती गई।

विकास सक्सेना by
Published - Tuesday, 04 May, 2021
Last Modified:
Tuesday, 04 May, 2021
ProfSanjayDwivedi

-प्रो.संजय द्विवेदी,

महानिदेशक (DG), भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली ।।

ये सच में बहुत कठिन दिन हैं। डरावने, भय और आशंकाओं से भरे हुए। मीडिया में आती खबरें दहशत जगा रही थीं। कई मित्रों, शुभचिंतकों और जानने वालों की मौत की खबरें सुनकर आंखें भर आती थीं। लगता था यह सिलसिला कब रूकेगा? बुखार आया तो लगा कि हमारे भी बुरे दिन आ गए हैं। रात में सोना कठिन था। फिल्में देखने और पढ़ने-लिखने में भी मन नहीं लग रहा था। बुखार तो था ही, तेज खांसी ने बेहाल कर रखा था। एक रोटी भी खा पाना कठिन था। मुंह बेस्वाद था। कोरोना का नाम ही आतंकित कर रहा था। मन कहता था ‘मौसमी बुखार ही है, ठीक हो जाएगा।’ बुद्धि कहती थी ‘अरे भाई कोरोना है, मौसमी बुखार नहीं है।’ अजीब से हालात थे। कुछ अच्छा सोचना भी कठिन था।

मुझे और मेरी पत्नी श्रीमती भूमिका को एक ही दिन बुखार आया। बुखार के साथ खांसी भी तेज थी। जो समय के साथ तेज होती गई। टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद मैंने तत्काल गंगाराम अस्पताल, दिल्ली के डॉक्टर अतुल गोगिया से ऑनलाइन परामर्श लिया। उनकी सुझाई दवाएं प्रारंभ कीं। इसके साथ ही होम्योपैथ और आर्युवेद की भी दवाएं लीं। हम लगभग 20 दिन बहुत कष्ट में रहे। साढ़े छः साल की बेटी शुभ्रा की ओर देखते तो आंखें पनीली हो जातीं। कुछ आशंकाएं और उसका अकेलापन रूला देता। करते क्या, उसे अलग ही रहना था। मैं और मेरी पत्नी भूमिका एक कक्ष में आइसोलेट हो गए। वह बहुत समझाने पर रोते हुए उसी कमरे के सामने एक खाट पर सोने के लिए राजी हो गयी। किंतु रात में बहुत रोती, मुश्किल से सोती। दिन में तो कुछ सहयोगी उसे देखते, रात का अकेलापन उसके और हमारे लिए कठिन था। एक बच्चा जो कभी मां-पिता के बिना नहीं सोया, उसके यह कठिन था। धीरे-धीरे उसे चीजें समझ में आ रही थीं। हमने भी मन को समझाया और उससे दूरी बनाकर रखी।

लीजिए लिक्विड डॉइटः

दिन के प्रारंभ में गरम पानी के साथ नींबू और शहद, फिर ग्रीन टी, गिलोय का काढ़ा और हल्दी गरम पानी। हमेशा गर्म पानी पीकर रहे। दिन में नारियल पानी, संतरा या मौसमी का जूस आदि लेते रहे। आरंभ के तीन दिन लिक्विड डॉइट पर ही रहे। इससे हालात कुछ संभले। शरीर खुद बताता है, अपनी कहानी। लगा कुछ ठीक हो रहा है। फिर खानपान पर ध्यान देना प्रारंभ किया। सुबह तरल पदार्थ लेने के बाद फलों का नाश्ता जिसमें संतरा, पपीता, अंगूर, किवी आदि शामिल करते थे। 

खुद न करें इलाजः

खान-पान, संयम और धीरज दरअसल एक पूंजी है। किंतु यह तब काम आती हैं, जब आपका खुद पर नियंत्रण हो। मेरी पहली सलाह यही है कि बीमारी को छिपाना एक आत्मछल है। खुद के साथ धोखा है। अतिरिक्त आत्मविश्वास हमें  कहीं का नहीं छोड़ता। इसलिए तुरंत डॉक्टर की शरण में जाना आवश्यक है। होम आइसोलेशन का मतलब सेल्फ ट्रीटमेंट नहीं है। यह समझन है। प्रकृति के साथ, आध्यात्मिक विचारों के साथ, सकारात्मकता के साथ जीना जरूरी है। योग- प्राणायाम की शरण हमें लड़ने लायक बनाती है। हम अपनी सांसों को साधकर ही अच्छा, लंबा निरोगी जीवन जी सकते हैं।

 इन कठिन दिनों के संदेश बहुत खास हैं। हमें अपनी भारतीय जीवन पद्धति, योग, प्राणायाम, प्रकृति से संवाद को अपनाने की जरूरत है। संयम और अनुशासन से हम हर जंग जीत सकते हैं। भारतीय अध्यात्म से प्रभावित जीवन शैली ही सुखद भविष्य दे सकती है। अपनी जड़ों से उखड़ने के परिणाम अच्छे नहीं होते। हम अगर अपनी जमीन पर खड़े रहेंगें तो कोई भी वायरस हमें प्रभावित तो कर सकता है, पराजित नहीं। यह चौतरफा पसरा हुआ दुख जाएगा जरूर, किंतु वह जो बताकर जा रहा है, उसके संकेत को समझेंगें तो जिंदगी फिर से मुस्कराएगी।

मेरे सबकः

1.    होम आईसोलेशन में रहें किंतु सेल्फ ट्रीटमेंट न लें। लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

2.    पौष्टिक आहार, खासकर खट्टे फलों का सेवन करें। संतरा, अंगूर, मौसम्मी, नारियल पानी, किन्नू आदि।

3.    नींबू, आंवला, अदरक, हल्दी, दालचीनी, सोंठ को अपने नियमित आहार में शामिल करें।

4.    नकारात्मकता और भय से दूर रहें। जिस काम में मन लगे वह काम करें। जैसे बागवानी, फिल्में देखना, अच्छी पुस्तकें पढ़ना।

5.    यह भरोसा जगाएं कि आप ठीक हो रहे हैं। सांसों से जुड़े अभ्यास, प्राणायाम, कपाल भाति, भस्त्रिका, अनुलोम विलोम 15 से 30 मिनट तक अवश्य करें।

6.    दो समय पांच मिनट भाप अवश्य लें। हल्दी-गुनगुने पानी से दो बार गरारा भी करें।

7.    दवा के साथ अन्य सावधानियां भी जरूरी हैं। उनका पालन अवश्य करें। शरीर को अधिकतम आराम दें। ज्यादा से ज्यादा नींद लें, क्योंकि इसमें कमजोरी बहुत आती है और शरीर को आराम की जरूरत होती है।

8.   अगर सुविधा है तो बालकनी या लान में सुबह की गुनगुनी धूप जरूर लें। साथ ही सप्ताह में एक बार डॉक्टर की सलाह से विटामिन डी की गोलियां भी लें। साथ ही विटामिन सी और जिंक की टेबलेट भी ले सकते हैं।

 

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मैं सुनील जी की प्रतिभा का कायल था, उन्हें कभी नहीं भूल पाउंगा: सिद्धार्थ जराबी

‘फाइनेंसियल एक्सप्रेस' (Financial Express) के मैनेजिंग एडिटर सुनील जैन के निधन पर वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ जराबी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनसे जुड़ी बातों को याद किया है।

Last Modified:
Monday, 17 May, 2021
siddharth578

‘फाइनेंसियल एक्सप्रेस' (Financial Express) के मैनेजिंग एडिटर सुनील जैन के निधन पर वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ जराबी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनसे जुड़ी बातों को याद किया है। सुनील जैन को श्रद्धांजलि देते हुए सिद्धार्थ जराबी का कहना है कि मैं सुनील जी की प्रतिभा का कायल था और उन्हें कभी नहीं भूल पाउंगा।  

सुनील जैन से जुड़ी हुई बातों को याद करते हुए जराबी का कहना है, जब मैंने एक स्टोरी आइडिया के साथ ब्यूरो चीफ के छोटे से केबिन में प्रवेश किया तो मैंने देखा कि एक व्यक्ति उनके सामने कुर्सी पर बैठा है और उनसे दोस्ताना बातचीत कर रहा है। यह वर्ष 1997 की बात है, जब वह दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग में फाइनेंसियल एक्सप्रेस के ऑफिस में बैठे हुए थे।

इस बिल्डिंग का काफी पुराना इतिहास था। जिसने कामगारों के कई आंदोलन देखे थे। तमाम दिग्गज राजनेता अखबार के तत्कालीन एडिटर शेखर गुप्ता से मिलने आते थे, जो इंडियन एक्सप्रेस का बिजनेस भी देखते थे। रामनाथ गोयनका (अब दिवंगत) भी वहीं बैठते थे और अरुण शौरी की लेखन कला भी युवाओं को इस प्रोफेशन में आने के लिए प्रेरित करती थी। 

जब मैं अपनी स्टोरी के लिए विशाल बख्शी मामले में फैसले का इंतजार कर रहा था, तो वहां बैठे व्यक्ति ने अचानक कहा, अपने बॉस से मिलने का आपका यही तरीका है? आपको खड़े रहना चाहिए। मैं एकाएक इस तरह सवाल के लिए तैयार नहीं था। मेरी जबान लड़खड़ा गई और मुझे लगा कि समय जैसे ठहर सा गया है, तभी उस व्यक्ति ने फिर कहा, ‘घबराओ नहीं, मैं तो बस तुम्हारी टांग खींच रहा था।’

मेरी बेचैनी पर मुस्कुराते हुए विशाल ने उस व्यक्ति से परिचय कराया, ‘इनसे मिलो, ये सुनील जैन हैं। यह इंडियन एक्सप्रेस के बिजनेस एडिटर हैं। उस समय मैं पहली बार सुनील से मिला था।’ कुछ महीनों बाद मुझे टेलिकॉम बीट दे दी गई, जो बाद में देश के विकास की कहानी को आगे बढ़ाने वाले सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक बन गया और तमाम विवाद इससे जुड़ गए। कई वर्षों तक सुनील की इस बीट पर गहरी रुचि रही। टेलिकॉम बीट पर काम करते हुए सुनील के साथ मेरे अच्छे संबंध हो गए। बाद में वर्ष 2000 में मैं एक्सप्रेस से 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में चला गया। सुनील भी वहां से चले गए, लेकिन हमारा संपर्क बना रहा। उन्होंने एक्सप्रेस की शैली में टेलिकॉम सेक्टर के विवादों से जुड़ी खबरें दी, जबकि मैंने इस इंडस्ट्री को आगे बढ़ने के बारे में रिपोर्टिंग की। इसी बीच सुनील को एचटी के बिजनेस ब्यूरो की कमान संभालने का ऑफर मिला, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया।

कई वर्षों बाद बिजनेस स्टैंडर्ड में हमने फिर साथ काम किया। समय के साथ सुनील के लेखन में और धार आ गई थी और रिपोर्टिंग का दायरा भी बढ़ गया था। ऐसा कोई विषय नहीं था, जिस पर वह लिख नहीं सकते थे। जहां तक मेरी बात है, सुनील का मानना था कि मैंने पत्रकार बनकर अपना एमबीए बर्बाद कर दिया है। उन्होंने मुझे और एक अन्य सहयोगी- नयनतारा राय, जो अब 'ईटी नाउ' के जाने-माने एंकर हैं,से कहते थे कि हमें रियल एस्टेट में जाना चाहिए। सुनील न्यूज़ रूम में सहयोगी थे, हालांकि बाहरी लोगों के साथ उनका झगड़ा भी होता था।

अन्य लोगों के साथ अरुण जेटली (अब दिवंगत) सुनील के जबर्दस्त प्रशंसक थे। बिजनेस व टेलिकॉम विषयों पर उनकी पकड़ ऐसी थी कि यह चर्चा होती थी कि दिल्ली के एक दिग्गज कॉर्पोरेट अधिकारी उन्हें हर साल बजट के बारे में अपना दिमाग लगाने के लिए बुलाते थे और फिर अपने आकाओं को आइडिया देते थे। सुनील प्रसिद्धि से दूर रहते थे। वह टीवी पर दिखने के बजाय प्रिंट में स्टोरी से खुश थे।

मैं इस बात का गवाह रहा हूं, जब बिजनेस स्टैंडर्ड में एडिटर्स राउंड टेबल के दौरान उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से किए थे। उस समय अखबार की पॉलिटिकल एडिटर अदिति फडनीस ने मोदी से हम लोगों की मुलाकात कराई थी। यह डिबेट काफी तीखी रहे और उनमें सुनील सबसे ज्यादा मुखर थे। मैंने भी तत्कालीन केंद्रीय भाजपा नेतृत्व के विनिवेश और भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर मनमोहन सिंह की नीतियों का मुखर विरोध करने के रुख के बारे में एक सवाल पूछा था।

मोदी के साथ करीब दो घंटे चली इस मीटिंग के बाद जब हम वाटर कूलर के पास मिले तो सुनील ने मेरे द्वारा पूछे गए सवाल पर अपने विचार मुझे बताए। उन्होंने कहा, ‘यह एक तीखा पॉइंट था और इसलिए भाजपा आसानी से नहीं जीत सकती।‘ यह सुनील थे, जिन्हें मैं हमेशा याद रखना चाहूंगा।

दूसरी दुनिया में अच्छी तरह से रहो मेरे दोस्त और भगवान से कहो कि अब बहुत हो गया है और इस घातक वायरस के हाथों अच्छे लोगों को नहीं मरना चाहिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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इन सराहनीय कार्यों के लिए देश हमेशा रखेगा इंदुजी को याद: आरके शरण

‘टाइम्स समूह’ की चेयरपर्सन और देश की जानी-मानी मीडिया शख्सियत इंदु जैन के निधन पर ‘कृषि उद्यमी कृषक विकास चैंबर’ के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर आरके शरण ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी है।

Last Modified:
Monday, 17 May, 2021
InduJain787

‘टाइम्स समूह’ (The Times Group) की चेयरपर्सन और देश की जानी-मानी मीडिया शख्सियत इंदु जैन के निधन पर ‘कृषि उद्यमी कृषक विकास चैंबर’ (Krishi Udyami Krishak Vikas Chamber) के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर आरके शरण ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी है। इंदु जैन को श्रद्धांजलि देते हुए आरके शरण ने उनसे जुड़ी यादों को हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ साझा किया है। 

आरके शरण का कहना है कि इंदु जैन के निधन से हमने एक आध्यात्मिक साधक, कला की संरक्षक, प्रसिद्ध भारतीय मीडिया एग्जिक्यूटिव, परोपकारी और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने वाली शख्सियत को खो दिया है।

हम उन्हें और उनकी फैमिली को निजी तौर पर जानते थे, क्योंकि मेरे दादाजी (अब दिवंगत) आचार्य शिवपूजन सहाय (जिन्हें 1961 में पद्मभूषण मिला था), एक जाने-माने लेखक थे और साहू शांति प्रसाद जैन जी के परिवार के काफी करीब थे, जिनका बिहार में डालमिया नगर में बिजनेस था।

‘माताजी’ लोकप्रिय साहू जैन फैमिली से ताल्लुक रखती थीं। वह काफी दूरदर्शी थीं, जिन्हें वर्ष 2016 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। वह ‘द टाइम्स फाउंडेशन’ की अध्यक्ष थीं, जो उनके नेतृत्व में स्थापित किया गया था।

मुझे दिसंबर 1995 में ग्रुप के तत्कालीन चेयरमैन अशोक कुमार जैन (अब दिवंगत) के साथ दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित उनके ऑफिस में मिलने का सौभाग्य मिला था, जहां उन्होंने मुझे लखनऊ के लिए जॉब की पेशकश की, जिसे मैंने स्वीकार कर लिया। मैंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मीडिया संस्थान में करीब 15 साल तक काम किया, जो अपने एम्प्लॉयीज का काफी ध्यान रखता है।

एक बार की बात है, जब वर्ष 2003 में मेरी मां काफी बीमार थीं और दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती थीं। जब चेयरमैन को मेरी मां की बीमारी के बारे में पता चला तो उन्होंने मेरी मां के इलाज में काफी मदद की। हम उनके इस सपोर्ट को हमेशा याद रखेंगे। तमाम लोग अक्सर पूछते थे कि टाइम्स ग्रुप के एम्प्लॉयीज क्यों यहां वर्षों तक टिके रहते हैं और यहां से छोड़कर नहीं जाते, इसका सीधा सा जवाब था कि जैन फैमिली अपने एम्प्लॉयीज का काफी ध्यान रखती है। 

वह भारतीय ज्ञानपीठ ट्रस्ट की अध्यक्ष भी थीं, जो प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान करती है। इसके अलावा वह FICCI की महिला विंग (FLO) की फाउंडर प्रेजिडेंट भी थीं। अपनी मानवता और देश भर में कई चैरिटी के लिए पहचानी जाने वाली इंदु जैन ने मीडिया के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देश की प्रगति और संस्कृति में गहरी रुचि के साथ-साथ सामुदायिक सेवा के कार्यों में तमाम पहल के लिए राष्ट्र उन्हें हमेशा याद रखेगा।

वह हमेशा सकारात्मक रहती थीं और मुस्कुराते हुए ग्रुप के सभी एम्प्लॉयीज का ध्यान रखती थीं। जब भी दिल्ली में हमारी उनसे मुलाकात हुई, हमारा काफी स्वागत हुआ। उन महान आत्मा के प्रेम और स्नेह को हम हमेशा याद रखेंगे।

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'इंदु मां का आभामंडल ऐसा था, जैसे मां अपने बच्चों का ध्यान रखती है'

‘टाइम्स समूह’ की चेयरपर्सन इंदु जैन के निधन पर योरनेस्ट वेंचर कैपिटल के मार्केटिंग स्ट्रैटेजी एडवाइजर मोहित हीरा ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनसे जुड़ी यादों को साझा किया है।

Last Modified:
Monday, 17 May, 2021
InduMaa

‘टाइम्स समूह’ (The Times Group) की चेयरपर्सन और देश की जानी-मानी मीडिया शख्सियत इंदु जैन के निधन पर योरनेस्ट वेंचर कैपिटल के मार्केटिंग स्ट्रैटेजी एडवाइजर मोहित हीरा ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनसे जुड़ी यादों को हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ साझा किया है। बता दें कि कोरोना के संक्रमण की चपेट में आकर गुरुवार की देर शाम इंदु जैन का निधन हो गया था। 84 वर्षीय इंदु जैन कुछ दिनों से अस्पताल में भर्ती थीं।

मोहित हीरा का कहना है, ‘कॉन्ट्रैक्ट एडवर्टाइजिंग के कंफर्ट जोन में काम करने के 16 साल बाद 2003 में मेरी मुलाकात दिल्ली में 7, बहादुरशाह जफर मार्ग स्थित टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के मुख्यालय की चौथी मंजिल पर मैं उस लेडी से मिला, जिन्हें हम लोग 'चेयरमैन' कहते थे।’

कई लोगों ने श्रीमती इंदु जैन (यह पहली बार है, जब मैं उनका पूरा नाम ले रहा हूं) को ‘मां’ या ‘मम्मी’ के रूप में उद्धृत किया है। यह उन लोगों को अजीब लग सकता है, जिन्होंने उनसे मुलाकात अथवा बातचीत नहीं की है, लेकिन सच्चाई यह है कि जिस तरह एक मां अपने बच्चों का ध्यान रखती है, इसी तरह का आभामंडल उनका था। यह भी लोगों को अजीब लग सकता है कि मिस्टर समीर जैन और मिस्टर विनीत जैन हमेशा उन्हें चेयरमैन कहकर संबोधित करते थे। वहीं, वह भी उन्हें वीसी (वाइस चेयरमैन) और एमडी (मैनेजिंग डायरेक्टर) कहकर संबोधित करती थीं। यह उनका अपना तरीका था। वह ग्रुप में काम करने वाले सभी लोगों को लिए मां के साथ चेयरमैन भी थीं। वह काफी मृदु थीं, लेकिन जिस लक्ष्य को उन्होंने ठान लिया, उसके लिए वह काफी दृढ़ रहती थीं।

टाइम्स फाउंडेशन के हेड के रूप में मैंने अपने पहले असाइमेंट्स में से एक में उनके साथ मिलकर काम किया था। उनका शांतिमय चेहरा ऐसा था, जो उनके संपर्क में आने वालों को एकदम शांतचित्त कर देता था, जो समूह के मूल में निहित समाचार जुटाने की आपाधापी भरी दुनिया के बिल्कुल विपरीत था। यह मान लेना काफी आसान था कि चेयरमैन को सिर्फ आध्यात्मिक कार्यों में रुचि है, वह जिन लोगों पर भरोसा करती थीं, उनसे बिजनेस के मुद्दों पर दृष्टिकोण अपनाने पर जोर देती थीं। वह काफी उदार थीं और लोगों पर आसानी से भरोसा कर लेती थीं।

वाइस चेयरमैन के साथ उनके घर पर तमाम लंच मीटिंग्स में से एक घटना मुझे अभी भी याद है। एक बार मैंने उनके द्वारा लाए गए गाजर के हलवे की तारीफ करने की ‘गलती’ कर दी थी, जिसे वह सरदार पटेल मार्ग पर अपने घर की रसोई से लाई थीं। वह उस दिन हमारे साथ थीं और उन्होंने मुझे अपने यह बात कहते हुए सुन लिया था कि गाजर का हलवा कितना स्वादिष्ट है। शाम को जब मैं घर जाने के लिए अपनी गाड़ी में बैठा तो सीट पर एक डिब्बा रखा हुआ था। इस डिब्बे में गाजर का हलवा था। (मुझे लगता है कि दो डिब्बे हलवा तैयार हुआ होगा, जिसमें से सिर्फ एक का सेवन हुआ था।) किचन के स्टाफ ने बाद में मुझे बताया कि परिवार के लिए ले जाने के लिए इसे अलग रखा गया था। यह बात मेरे दिल को छू गई, लेकिन शर्मिंदगी भी हुई। अगले दिन जब मैंने इस बात का हल्का सा विरोध किया तो उन्होंने मुस्कराहट के साथ सिर्फ यही पूछा, क्या बच्चों ने गाजर के हलवे का सेवन किया और उन्हें पसंद आया? मैंने जवाब दिया कि बच्चों को वह बहुत पसंद आया, यह सुनकर उनकी आंखों में चमक आ गई।

(मोहित हीरा ने वर्ष 2003 से 2008 के बीच टाइम्स ग्रुप में तमाम जिम्मेदारियां निभाई हैं)

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जानी-मानीं ज्योतिषी नंदिता पांडेय ने ‘श्रीमां’ की इन बातों को किया याद, यूं दी श्रद्धांजलि

टाइम्स समूह’ (The Times Group) की चेयरपर्सन और देश की जानी-मानी मीडिया शख्सियत इंदु जैन का निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है।

Last Modified:
Saturday, 15 May, 2021
induMaa66

‘टाइम्स समूह’ (The Times Group) की चेयरपर्सन और देश की जानी-मानी मीडिया शख्सियत इंदु जैन के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। बता दें कि कोरोना के संक्रमण की चपेट में आकर गुरुवार की देर शाम इंदु जैन का निधन हो गया था। 84 वर्षीय इंदु जैन कुछ दिनों से अस्पताल में भर्ती थीं। इंदु जैन के निधन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जानी-मानी सेलेब्रिटी एस्ट्रोलॉजर, लाइफ कोच, वास्तु/अंकशास्त्री, एनर्जी हीलर और टैरो कार्ड रीडर नंदिता पांडेय ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनसे जुड़ी यादों को हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ साझा किया है। 

नंदिता पांडेय का कहना है कि हम दोनों में उम्र का अंतर होने के बावजूद काफी अच्छी बॉन्डिंग थी। वह प्यार से मुझे ‘मेरी सहेली’ (Meri Saheli) कहती थीं। पहली बार मैं जब इंदु जैन जी से मिली, जिन्हें प्यार से सब 'श्रीमां' कहते थे, तो उनके चारों ओर के आभामंडल को देखकर मैं चकित रह गई थी। यह आभामंडल ऐसा लगा था कि जैसे लेडी बुद्ध ने अपने चारों ओर प्रकाश के साथ कमरे में प्रवेश किया हो। 

एक बार आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर जी लंच के लिए उनके निवास स्थान पर पधारे थे, तब उन्होंने मुझे कॉल कर कहा था कि तुम भी क्यों नहीं आकर हमारे साथ लंच कर लेती हो। 

यह एक ऐसा आमंत्रण था, जिसे शायद ही कोई अस्वीकार करना चाहेगा, लेकिन मुझे मजबूरन इनकार करना पड़ा, क्योंकि मैं अपने एक मित्र के साथ बैठी थी, जिसे मैंने अपने घर लंच पर बुलाया था। इसके बाद मेरे कुछ अपॉइंटमेंट यूके के कुछ क्लाइंट्स के साथ थे, जो सिर्फ मुझसे मिलने के लिए यहां आए थे। मुझे नहीं पता कि मैंने गलत किया या सही, लेकिन इसके बाद हमारे संबंध और मजबूत हो गए। जब मैं अगली बार उनसे मिली तो उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझसे बात की और कहा कि जो व्यक्ति अपने कर्मों के लिए प्रतिबद्ध है, वह सबसे ज्यादा प्रबुद्ध (enlightened) है। मैं उनकी उदारता से काफी प्रभावित थी। 

एक बार वह परिवार के किसी सदस्य के लिए घर की तलाश कर रही थीं और मैं घर का वास्तु देख रही थी। उनकी लीगल टीम मेरे साथ काम करने से असहज हो गई, क्योंकि मैंने उनके द्वारा सलेक्ट की गईं अधिकांश संपत्तियों को रिजेक्ट कर दिया। आखिरकार उन्होंने एक नया वास्तु सलाहकार तलाश लिया, लेकिन इंदु जी ने एक नहीं सुनी और स्पष्ट कह दिया कि पहले मैं अपनी सहेली से पूछूंगी और उसके बाद फैसला लूंगा। मुझ पर उनका इतना ज्यादा भरोसा था।

एक शाम की बात है, जब हम दोनों की मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझे एक कॉफी टेबल बुक दी। यहा ‘स्पीकिंग ट्री विजडम’ (Speaking Tree wisdom) का संग्रह थी। जैसे ही मैंने इसे हाथ में लिया, वह क्षण रुक सा गया। यह गोधूलि की बेला यानी शाम का समय था और अचानक पूरे घर में शंखनाद गूंजने लगा, जो करीब पांच मिनट तक चला। यह भगवान का आशीर्वाद था। एक तो आध्यात्मिक रूप से समृद्ध विचारों का सुंदर संग्रह मुझे स्वयं एक पुण्य आत्मा द्वारा दिया जा रहा था और पृष्ठभूमि में शंख की ध्वनि (शंखनाद) गूंज रही थी, इससे ज्यादा और मुझे क्या चाहिए था।

श्रीमां एक पवित्र आत्मा थीं, जो कभी नहीं चाहती थीं कि कोई उनके निधन पर शोक करे। उन्होंने हमेशा मृत्यु को उत्सव का क्षण माना। श्रीमां, मैंने अपने तरीके से परमात्मा में आपके विलय का जश्न मनाया है। मैंने ज्ञान की देवी मां सरस्वती की पेटिंग तैयार की है, जो मुझे आपकी याद दिलाती है। आपके लिए यह मेरी श्रद्धांजलि है। टाइम्स ग्रुप के साथ मेरी बॉन्डिंग उस तरह कभी नहीं होगी, जैसी आपके साथ थी। हमेशा आपकी याद आएगी। ओउम शांति।

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BCCL के शिवकुमार सुंदरम ने 'इंदु मां' को यूं किया याद, सम्मान में लिखी ये कविता

‘टाइम्स समूह’ की चेयरपर्सन इंदु जैन के निधन पर बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन शिवकुमार सुंदरम ने एक आर्टिकल के जरिये उन्हें श्रद्धांजलि दी है।

Last Modified:
Saturday, 15 May, 2021
InduJain54

देश के बड़े मीडिया समूहों में शुमार ‘टाइम्स समूह’ (The Times Group) की चेयरपर्सन और देश की जानी-मानी मीडिया शख्सियत इंदु जैन के निधन पर बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (बीसीसीएल) की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन शिवकुमार सुंदरम ने एक आर्टिकल के जरिये उन्हें श्रद्धांजलि दी है। अपने इस आर्टिकल में उन्होंने इंदु जैन की बुद्धिमता, उत्साह और भावनाओं को याद करते हुए कहा है कि इंदु मां का जीवन, विश्वास और मूल्य गहन होने के बाद भी काफी सरल थे। अंग्रेजी में लिखे गए इस आर्टिकल का हिंदी अनुवाद आप यहां पढ़ सकते हैं।

चेयरमैन इंदु जैन कहें, माता जी कहें अथवा इंदु माता, वह हम सभी के लिए हमेशा आनंद, उल्लास और खुशी का प्रतीक रहेंगी। उन्होंने टाइम्स ग्रुप में आध्यात्मिक नजरिये से लेकर सभी स्थितियों में समता और संतुलन को अपनाने पर जोर दिया। हमें उनके और उनके माध्यम से तमाम आध्यात्मिक गुरुओं के द्वारा ज्ञान, तमाम जानकारियां और मैनेजमेंट का पाठ सीखने का सौभाग्य मिला।

मैंने उनके समक्ष ओशो के प्रवचनों को सुनने की इच्छा जताई थी और उन्होंने मेरे लिए ओशो के प्रवचनों की 512 जीबी की हार्ड डिस्क का इंतजाम करने के लिए विशेष प्रयास कर मुझे चौंका दिया था।

यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनके साथ तमाम आध्यात्मिक गुरुओं से मिलने का सौभाग्य मिला। जैसे- हम श्रीश्री रविशंकर से उनके बेंगलुरु स्थित आश्रम में मिले। इसके अलावा सद्गुरु जग्गी वासुदेव (जिन्हें मैं अभी फॉलो करता हूं) से उनके कोयंबटूर आश्रम में मिले। इस अनुभव ने हम में से कई को समग्र जीवन के पथ पर चलने के लिए अग्रसर किया और इंदु माता के केवल करीब से देखने भर से आनंद के क्षण में रहने का अर्थ सही से समझ में आ जाता था।

समाज का ज्यादा से ज्यादा भला सुनिश्चित करने के लिए इंदु माता परोपकार और सामुदायिक सेवा में बहुत ज्यादा दिलचस्पी रखती थीं। जब मैं फाइनेंस में था, उन दिनों माता जी ‘टाइम्स फाउंडेशन’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया रिलीफ फंड’ से जुड़ी गतिविधियों में बहुत ज्यादा गहराई से संलग्न रहती थीं। मुझे अभी भी याद है कि कैसे जरूरतमंदों तक सीधे धन पहुंचे, इसके लिए उन्होंने कितना प्रयास किया था। उन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए जवानों के परिजनों तक टाइम्स ऑफ इंडिया रिलीफ फंड के द्वारा मासिक आय योजना तैयार करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके अलावा ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जहां उन्होंने सामाजिक व धार्मिक गतिविधियों में आगे बढ़-चढ़कर अपना योगदान दिया था।

उन्होंने ऑर्गनाइजेशन के कार्य में काफी रुचि ली और हॉस्पिटैलिटी सर्विस (जिसे पहले एडमिनिस्ट्रेशन कहा जाता था) और मैनेजमेंट एश्योरेंस सर्विस (जिसे पहले ऑडिट फंक्शन कहते थे) को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वित्तीय समझदारी और अनुशासन के द्वारा इन सशक्तीकरण माध्यमों से एंप्लॉयीज और ऑर्गनाइजेशन की भलाई सुनिश्चित करने का उनका यह दर्शन था। चेयरमैन अवॉर्ड की शुरुआत उन्होंने ही की थी, जो संस्थान की प्रतिभाओं को आगे लाता है उन्हें नई पहचान देता है।

संस्थान के साथ लंबे समय से मेरे जुड़ाव के कारण मैं इंदु मां के काफी करीब था। परिवार और ऑफिस से जुड़े तमाम मसलों पर उनके साथ काम करने से जुड़ीं मेरे पास तमाम यादें हैं। उनके अंदर कितनी दयालुता थी, इसका मैं एक किस्सा बताना चाहता हूं। जब समीर जैन जी द्वारा ब्रैंड कैपिटल की नई बिजनेस डिवीजन बनाने के लिए मुझे फाइनेंस से जुड़े कामों से अचानक हटा दिया गया था तो उन्होंने मुझे अपने ऑफिस बुलाया और कहा, ‘मैं हैरान हूं कि आप ऐसी क्या गलती कर सकते थे, जो रातों रात आपको फाइनेंस से हटा दिया गया।’ इसके बाद मैंने नई डिवीजन को तैयार करने के बारे में पूरे उत्साह के साथ समझाया। इसके बाद उन्होंने मेरी प्रोग्रेस पर तब तक लगातार नजर रखी, जब तक कि बिजनेस परिपक्व और विकसित नहीं हो गया।

इंदु माता ने कभी हठधर्मिता में विश्वास नहीं किया और उनकी सलाह में पूरी स्वतंत्रता रहती थी। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जीवन में चुनौतियों का सामना करने वाले बहुत से लोग स्वाभाविक रूप से उनकी ओर आकर्षित हुए होंगे और उनकी उपस्थिति में आनंद, संतुलन व समभाव पाया होगा।

लुडविग वान बीथोवेन (Beethoven) की रचना ‘ओड टू जॉय’ (Ode to Joy) युद्ध और हताशा के खिलाफ सार्वभौमिक भाईचारे की विजय का प्रतिनिधित्व करती है। चेयरमैन इंदु माता का जीवन इसी आनंदमय जीवन का प्रतीक है और वर्तमान तनावपूर्ण परिस्थितियों में हमें सभी के लिए जो प्रेम, देखभाल, कल्याण और करुणा चाहिए, इंदु माता उसकी साक्षात प्रतिमूर्ति थीं।

यहां कुछ पंक्तियां हैं, जो मैंने इंदु माता के जीवन का जश्न मनाते हुए उनके सम्मान में लिखी हैं।

Life does not follow a linear pattern
unpredictable transitions defines life's twists and turns
Key disruptors of life changes
Body, mind, career, beliefs & identity it ranges
 
Physiological disruptors in the physical body
emotional upheavals of relationships they embody
Disruptions of life is the norm than exception
Count the roles you have changed since inception
 
Our lives rarely go as planned
Uncertain and overwhelmed
Changes in our belief system
new perspectives from acquired wisdom
 
Spiritual seekers form new constellations
discover their true self in enlightened conversations
abandoning the myth of a linear life
work on your body& mind, that caused the strife
 
Shedding parts of our unhappy selves
with Joy and happiness fill your cells
Live life to the fullest
Always in wonder, like the wandering tourist

उनकी जिंदगी, उनकी मान्यताएं और उनके मूल्य काफी गहरे लेकिन सरल थे। ये कोमल मुस्कान और उल्लास के अलावा और कुछ नहीं थे। यदि आप इंदु मां को महसूस करना चाहते हैं तो वह हर उस जगह हैं, जहां पर खुशी और हंसी है।

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भारतीय पत्रकारिता को मुख्य न्यायाधीश को शुक्रिया तो कहना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का यह कथन स्वागत योग्य है कि पत्रकारों को अदालती कार्रवाई कवर करने के लिए अदालत परिसर तक आने की ज़रूरत नहीं है।

Last Modified:
Saturday, 15 May, 2021
MisterMedia45

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का यह कथन स्वागत योग्य है कि पत्रकारों को अदालती कार्रवाई कवर करने के लिए अदालत परिसर तक आने की ज़रूरत नहीं है। उन्हें इसके लिए आभासी प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया जाएगा। इससे भारतीय पत्रकारिता के लिए सुविधाओं के कई रास्ते खुल जाएंगे। समय, पेट्रोल और ऊर्जा की बचत होगी। कई साल से पत्रकारिता कर रहे संवाददाताओं के बीच यह मुद्दा अरसे से चर्चा में था। अप्रत्यक्ष रूप से मांग भी की जा रही थी। लेकिन तब एक वर्ग इसके खिलाफ़ था और कहता था कि फ़ैसला आने तक न्यायालयीन कार्रवाई मीडिया में आने से ही रोक दी जानी चाहिए। माननीय मुख्य न्यायाधीश की इस पहल से हम उम्मीद कर सकते हैं कि लोकतंत्र के इन दो ज़िम्मेदार संस्थानों के बीच सदभाव और समन्वय अधिक होगा।

कुछ बरस पहले मैं न्यूयॉर्क में था। वहां संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्रवाई के कवरेज का तरीक़ा और पत्रकारों के काम काज की शैली का अध्ययन करने गया। मैंने पाया कि सब कुछ खुला था। जिन टीवी संवाददाताओं को संयुक्त राष्ट्र की कार्रवाई कवर करनी होती थी, उन्हें वीडियो लिंक और फ़ीड भेजने की सुविधाएं दी गई थीं। वे अपने मीडिया सेंटर में बैठकर यह काम कर सकते थे। अलबत्ता जब कोई ख़ास ब्रीफ़िंग का दिन आता तो पत्रकार कवरेज हॉल में पहुंच जाते थे। कई पत्रकार तो महीनों तक अपने चैनल या समाचारपत्र के कार्यालय ही नहीं जाते थे। इसी तरह मैंने देखा कि अदालतों में टीवी यूनिटों के लिए अलग से स्थान आरक्षित रहता था। संवाददाताओं के प्रवेश पर कोई बंदिश नहीं थी। न्यायालय की गरिमा की रक्षा करते हुए सारे संवाददाता अदालत परिसर में घूमते और अपनी रिपोर्टिंग करते थे।

इन दिनों भारतीय न्यायालयों में चल रहे महत्वपूर्ण मामलों के मीडिया ट्रायल की बड़ी चर्चा रहती है। कहा जाता है कि पत्रकार फ़ैसला आने से पहले ही अपने समाचार माध्यमों के ज़रिए तर्कों कुतर्कों से फ़ैसला सुना देते हैं। यह अनुचित तो है, पर यह भी सच है कि अदालत में जब पत्रकारों को प्रवेश नहीं मिलता तो भी उसे अपने पेशेवर दायित्व को तो निभाना ही होता है। लोग जानना चाहते हैं कि आख़िर अमुक मामले में आज क्या हुआ। ऐसी सूरत में वकीलों, सेवानिवृत न्यायाधीशों और क़ानून के जानकारों से बात करके वे ख़बर की तह में जाना चाहते हैं। इस चक्कर में अक्सर तथ्यों को रखने में गलती हो जाती है, क्योंकि किसी मामले के बुनियादी तथ्य तो पता होते हैं, लेकिन अदालत के अंदरूनी रिकॉर्ड में बंद दस्तावेज़ क्या कहते हैं यह संवाददाताओं को पता नहीं होता है। चीफ़ जस्टिस के इस ऐलान से पत्रकारिता की शुद्धता बढ़ जाएगी।

इसी तरह अपेंडिक्स की तरह एक प्रावधान अभी भी न्यायपालिका के साथ चिपका हुआ है। इसे अदालत की अवमानना कहते हैं। पत्रकारिता अदालत के फ़ैसलों की समीक्षा नहीं करना चाहती, मगर यह भी कड़वी सचाईं है कि न्यायपालिका के भीतर की गंदगी अवमानना की आड़ में छिप जाती है। दरअसल यह अंग्रेजी हुकूमत के दिनों का प्रावधान है, जब अदालतें भारतीय क्रांतिकारियों को सनक भरे निर्णयों से फांसी जैसा क्रूर निर्णय सुनाती थीं और पत्रकार अदालत की अवमानना से डरकर उसकी विवेचना भी नहीं कर पाते थे। गोरी सत्ता के दरम्यान कोर्ट भारतीयों के साथ ज़ुल्म करने वाले फ़ैसलों के लिए कुख्यात थे। बरतानवी सरकार इन गैरकानूनी  निर्णयों के प्रति आम अवाम में आक्रोश नहीं पैदा होने देना चाहती थी। इसलिए अवमानना की तलवार पत्रकारिता पर लटकी रहती थी। आज़ाद भारत में इस प्रावधान की कोई ज़रूरत नही है। यदि संविधान के दायरे में कोई फ़ैसला लिया जाता है तो फिर उसकी आलोचना ही कोई क्यों करेगा। अवमानना असल में न्यायालय के अनुचित व्यवहार की ढाल भी है। अब इस पर कौन ध्यानदेता है यह देखना है।

जो भी हो! भारतीय पत्रकारिता को मुख्य न्यायाधीश को शुक्रिया तो कहना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

  

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'डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के लिए तैयार हों नए पत्रकार'

एक समय था जब माना जाता है कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ाकर सिखाई नहीं जा सकती। अब वक्त बदल गया है।

Last Modified:
Tuesday, 11 May, 2021
journalism4

प्रो. संजय द्विवेदी ।।

एक समय था जब माना जाता है कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ाकर सिखाई नहीं जा सकती। अब वक्त बदल गया है। जनसंचार का क्षेत्र आज शिक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। वर्ष 2020 को लोग चाहे कोरोना महामारी की वजह से याद करेंगे, लेकिन एक मीडिया शिक्षक होने के नाते मेरे लिए ये बेहद महत्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष भारत में मीडिया शिक्षा के 100 वर्ष पूरे हुए थे। वर्ष 1920 में थियोसोफिकल सोसायटी के तत्वावधान में मद्रास राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में डॉक्टर एनी बेसेंट ने पत्रकारिता का पहला पाठ्यक्रम शुरू किया था। लगभग एक दशक बाद वर्ष 1938 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को एक सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में शुरू किया गया। इस क्रम में पंजाब विश्वविद्यालय, जो उस वक्त के लाहौर में हुआ करता था, पहला विश्वविद्यालय था, जिसने अपने यहां पत्रकारिता विभाग की स्थापना की। भारत में पत्रकारिता शिक्षा के संस्थापक  कहे जाने वाले प्रोफेसर पीपी सिंह ने वर्ष 1941 में इस विभाग की स्थापना की थी। अगर हम स्वतंत्र भारत की बात करें, तो सबसे पहले मद्रास विश्वविद्यालय ने वर्ष 1947 में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की स्थापना की। 

   इसके पश्चात कलकत्ता विश्वविद्यालय, मैसूर के महाराजा कॉलेज, उस्मानिया यूनिवर्सिटी एवं नागपुर यूनिवर्सिटी ने मीडिया शिक्षा से जुड़े कई कोर्स शुरू किए। 17 अगस्त, 1965 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय जन संचार संस्थान की स्थापना की, जो आज मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में पूरे एशिया में सबसे अग्रणी संस्थान है।  आज भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, रायपुर में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय एवं जयपुर में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय पूर्ण रूप से मीडिया शिक्षण एवं प्रशिक्षण का कार्य कर रहे हैं। भारत में मीडिया शिक्षा का इतिहास 100 वर्ष जरूर पूर्ण कर चुका है, परंतु यह अभी तक इस उलझन से मुक्त नहीं हो पाया है कि यह तकनीकी है या वैचारिक। तकनीकी एवं वैचारिकी का द्वंद्व मीडिया शिक्षा की उपेक्षा के लिए जहां उत्तरदायी है, वहां सरकारी उपेक्षा और मीडिया संस्थानों का सक्रिय सहयोग न होना भी मीडिया शिक्षा के इतिहास की तस्वीर को धुंधली प्रस्तुत करने को विवश करता है।

भारत में जब भी मीडिया शिक्षा की बात होती है, तो प्रोफेसर के. ई. ईपन का नाम हमेशा याद किया जाता है। प्रोफेसर ईपन भारत में पत्रकारिता शिक्षा के तंत्र में व्यावहारिक प्रशिक्षण के पक्षधर थे। प्रोफेसर ईपन का मानना था कि मीडिया के शिक्षकों के पास पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा के साथ साथ मीडिया में काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव भी होना चाहिए, तभी वे प्रभावी ढंग से बच्चों को पढ़ा पाएंगे। आज देश के अधिकांश पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षण संस्थान, मीडिया शिक्षक के तौर पर ऐसे लोगों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिन्हें अकादमिक के साथ साथ पत्रकारिता का भी अनुभव हो। ताकि ये शिक्षक ऐसा शैक्षणिक माहौल तैयार कर सकें, ऐसा शैक्षिक पाठ्यक्रम तैयार कर सकें, जिसका उपयोग विद्यार्थी आगे चलकर अपने कार्यक्षेत्र में भी कर पाएं।  पत्रकारिता के प्रशिक्षण के समर्थन में जो तर्क दिए जाते हैं, उनमें से एक दमदार तर्क यह है कि यदि डॉक्टरी करने के लिए कम से कम एम.बी.बी.एस. होना जरूरी है, वकालत की डिग्री लेने के बाद ही वकील बना जा सकता है तो पत्रकारिता जैसे महत्वपूर्ण पेशे को किसी के लिए भी खुला कैसे छोड़ा जा सकता है?

 दरअसल भारत में मीडिया शिक्षा मोटे तौर पर छह स्तरों पर होती है। सरकारी विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में, दूसरे, विश्वविद्यालयों से संबंद्ध संस्थानों में, तीसरे, भारत सरकार के स्वायत्तता प्राप्त संस्थानों में, चौथे, पूरी तरह से प्राइवेट संस्थान, पांचवे डीम्ड विश्वविद्यालय और छठे, किसी निजी चैनल या समाचार पत्र के खोले गए अपने मीडिया संस्थान। इस पूरी प्रक्रिया में हमारे सामने जो एक सबसे बड़ी समस्या है, वो है किताबें। हमारे देश में मीडिया के विद्यार्थी विदेशी पुस्तकों पर ज्यादा निर्भर हैं। लेकिन अगर हम देखें तो भारत और अमेरिका के मीडिया उद्योगों की संरचना और कामकाज के तरीके में बहुत अंतर है। इसलिए मीडिया के शिक्षकों की ये जिम्मेदारी है, कि वे भारत की परिस्थितियों के हिसाब से किताबें लिखें।

मीडिया शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए आज मीडिया एजुकेशन काउंसिल की आवश्यकता है। इसकी मदद से न सिर्फ पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा के पाठ्यक्रम में सुधार होगा, बल्कि मीडिया इंडस्ट्री की जरुरतों के अनुसार पत्रकार भी तैयार किये जा सकेंगे। आज मीडिया शिक्षण में एक स्पर्धा चल रही है। इसलिए मीडिया शिक्षकों को ये तय करना होगा कि उनका लक्ष्य स्पर्धा में शामिल होने का है, या फिर पत्रकारिता शिक्षण का बेहतर माहौल बनाने का है। आज के समय में पत्रकारिता बहुत बदल गई है, इसलिए पत्रकारिता शिक्षा में भी बदलाव आवश्यक है। आज लोग जैसे डॉक्टर से अपेक्षा करते हैं, वैसे पत्रकार से भी सही खबरों की अपेक्षा करते हैं। अब हमें मीडिया शिक्षण में ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे, जिनमें विषयवस्तु के साथ साथ नई तकनीक का भी समावेश हो।

न्यू मीडिया आज न्यू नॉर्मल है। हम सब जानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण लाखों नौकरियां गई हैं। इसलिए हमें मीडिया शिक्षा के अलग अलग पहलुओं पर ध्यान देना होगा और बाजार के हिसाब से प्रोफेशनल तैयार करने होंगे। नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की बात कही गई है। जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें इस पर ध्यान देना होगा। मीडिया शिक्षण संस्थानों के लिए आज एक बड़ी आवश्यकता है क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करना। भाषा वो ही जीवित रहती है, जिससे आप जीविकोपार्जन कर पाएं और भारत में एक सोची समझी साजिश के तहत अंग्रेजी को जीविकोपार्जन की भाषा बनाया जा रहा है। ये उस वक्त में हो रहा है, जब पत्रकारिता अंग्रेजी बोलने वाले बड़े शहरों से हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शहरों और गांवों की ओर मुड़ रही है। आज अंग्रेजी के समाचार चैनल भी हिंदी में डिबेट करते हैं। सीबीएससी बोर्ड को देखिए जहां पाठ्यक्रम में मीडिया को एक विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। क्या हम अन्य राज्यों के पाठ्यक्रमों में भी इस तरह की व्यवस्था कर सकते हैं, जिससे मीडिया शिक्षण को एक नई दिशा मिल सके।

एक वक्त था जब पत्रकारिता का मतलब प्रिंट मीडिया होता था। अस्सी के दशक में रिलीज हुई अमेरिकी फिल्म Ghostbusters (घोस्टबस्टर्स) में सेक्रेटरी जब वैज्ञानिक से पूछती है कि ‘क्या वे पढ़ना पसंद करते हैं? तो वैज्ञानिक कहता है ‘प्रिंट इज डेड’। इस पात्र का यह कहना उस समय हास्य का विषय था, परंतु वर्तमान परिदृश्य में प्रिंट मीडिया के भविष्य पर जिस तरह के सवाल खड़े किये जा रहे हैं, उसे देखकर ये लगता है कि ये सवाल आज की स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठता है। आज दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों से हमें ये सूचनाएं मिल रही हैं कि प्रिंट मीडिया पर संकट के बादल हैं। ये भी कहा जा रहा है कि बहुत जल्द अखबार खत्म हो जाएंगे। वर्ष 2008 में अमेरिकी लेखक जेफ गोमेज ने ‘प्रिंट इज डेड’ पुस्तक लिखकर प्रिंट मीडिया के खत्म होने की अवधारणा को जन्म दिया था। उस वक्त इस किताब का रिव्यू करते हुए एंटोनी चिथम ने लिखा था कि, ‘यह किताब उन सब लोगों के लिए ‘वेकअप कॉल’ की तरह है, जो प्रिंट मीडिया में हैं, किंतु उन्हें यह पता ही नहीं कि इंटरनेट के द्वारा डिजिटल दुनिया किस तरह की बन रही है।’ वहीं एक अन्य लेखक रोस डावसन ने तो समाचारपत्रों के विलुप्त होने का, समय के अनुसार एक चार्ट ही बना डाला। इस चार्ट में जो बात मुख्य रूप से कही गई थी, उसके अनुसार वर्ष 2040 तक विश्व से अखबारों के प्रिंट संस्करण खत्म हो जाएंगे।  मीडिया शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों में इस तरह के बदलाव करने चाहिए, कि वे न्यू मीडिया के लिए छात्रों को तैयार कर सकें। आज तकनीक किसी भी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मीडिया में दो तरह के प्रारूप होते हैं। एक है पारंपरिक मीडिया जैसे अखबार और पत्रिकाएं और और दूसरा है डिजिटल मीडिया। अगर हम वर्तमान संदर्भ में बात करें तो सबसे अच्छी बात ये है कि आज ये दोनों प्रारूप मिलकर चलते हैं। आज पारंपरिक मीडिया स्वयं को डिजिटल मीडिया में परिवर्तित कर रहा है। जरूरी है कि मीडिया शिक्षण संस्थान अपने छात्रों को 'डिजिटल ट्रांसफॉर्म' के लिए पहले से तैयार करें। देश में प्रादेशिक भाषा यानी भारतीय भाषाओं के बाजार का महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा के उपभोक्ताओं का डिजिटल की तरफ मुड़ना लगभग पूरा हो चुका है। ऐसा माना जा रहा है कि वर्ष 2030 तक भारतीय भाषाओं के बाजार में उपयोगकर्ताओं की संख्या 500 मिलियन तक पहुंच जाएगी और लोग इंटरनेट का इस्तेमाल स्थानीय भाषा में करेंगे। जनसंचार की शिक्षा देने वाले संस्थान अपने आपको इन चुनौतियों के मद्देनजर तैयार करें, यह एक बड़ी जिम्मेदारी है।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)

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‘अगर देश ही नहीं रहा तो पत्रकारिता कहां होगी?’

कोरोना की इस भीषण आपदा में पत्रकारिता के तमाम अवतार यदि व्यवस्था की नाकामियों को उजागर करते हैं तो इसे राष्ट्रीय हित से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

Last Modified:
Tuesday, 11 May, 2021
Reporter554

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

देश के हित और अभिव्यक्ति के सरोकार 

लोकतंत्र में कोई भी महत्वपूर्ण स्तंभ सौ फीसदी निर्दोष नहीं हो सकता। इस निष्कर्ष से शायद ही कोई असहमत हो। न कार्यपालिका, न विधायिका, न न्याय पालिका और न ही पत्रकारिता। वैसे तो पत्रकारिता को संवैधानिक तौर पर इस तरह का कोई दर्जा हासिल नहीं है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अभिव्यक्ति की आजादी का लाभ लेने वाले पत्रकार यदि अवाम का भरोसा जीतते हैं और अपना काम ईमानदारी से करते हैं तो फिर इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि पत्रकारिता संवैधानिक रूप से लोकतंत्र का स्तंभ है अथवा नहीं।

कोरोना की इस भीषण आपदा में पत्रकारिता के तमाम अवतार यदि व्यवस्था की नाकामियों को उजागर करते हैं तो इसे राष्ट्रीय हित से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। बीते दिनों पत्रकारिता का यह धर्म समाज के एक वर्ग में बहस का बिंदु बना हुआ है। उसका मानना है कि मुल्क के अस्पतालों में बिस्तरों की कमी, ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी, कोरोना के परीक्षण तथा बचाव के टीकों की गति में सुस्ती और जलती चिताओं के दृश्य दिखा कर भारतीय पत्रकार अच्छा नहीं कर रहे हैं। वे पश्चिम और यूरोप के देशों का हवाला देते हैं कि वहां भी मुर्दों की तस्वीरें और वीडियो नहीं दिखाए जाते। निस्संदेह वहां इस तरह के विचलित करने वाली सामग्री परदे और पन्नों पर नहीं परोसी जाती। मगर यह भी ध्यान देना होगा कि उन देशों में इलाज के अभाव में दम तोड़ना कितना अमानवीय और क्रूर माना जाता है। एक निर्दोष मौत भी अस्पताल में हो जाए तो सिस्टम को करोड़ों डॉलर का भुगतान करना पड़ जाता है। क्या भारत में हम इतनी सक्षम स्वास्थ्य प्रणाली बना पाए हैं, जो किसी पत्रकार को आलोचना का कोई अवसर ही नहीं दे।

बीते दिनों देखा गया कि एक तरफ तो कमोबेश सारे प्रदेशों में कोरोना के चलते लॉकडाउन की स्थिति है। धारा 144 लगी है, जिसमें चार से ज्यादा व्यक्ति एकत्रित नहीं हो सकते। अधिकांश शहरों में कर्फ्यू लगा है। मास्क जरूरी और दो गज की दूरी से बच्चा बच्चा वाकिफ है। इसके बावजूद चुनाव आयोग की अनुमति से पांच राज्यों में हजारों नागरिक रैलियों में मास्क के बगैर और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करते हुए सियासी पार्टियों में ले जाए गए। जब वे लौटे तो कोरोना का कई गुना विकराल रूप उनके साथ आया। गाँव गाँव में लोग संक्रामक महामारी के शिकार हो गए। इस खतरनाक हालत को देखते हुए यदि मद्रास हाई कोर्ट टिप्पणी करता है कि चुनाव आयोग के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए तो इसमें क्या अनुचित है? भारतीय पत्रकारों ने इस टिप्पणी को प्रकाशित और प्रसारित कर दिया तो इस पर चुनाव आयोग के खिसियाने की कोई वजह नजर नहीं आती। लेकिन आयोग इतना बौखलाया कि सीधे सुप्रीम कोर्ट चला गया। वह मद्रास उच्च न्यायालय की इस मौखिक टिप्पणी के प्रकाशित और प्रसारित होने से खफा था। उसका तर्क था कि जब वह टिप्पणी अदालत के रिकॉर्ड में नहीं रखी गई तो उसे पत्रकार कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय ने उसका अनुरोध ठुकरा दिया। इतना ही नहीं इस आला संस्था ने संवाददाताओं की रिपोर्टिंग को सही ठहराया। उसने कहा कि पत्रकारिता ने अपना धर्म निभाया है। अदालत रिपोर्टिंग नहीं रोक सकती। दरअसल पत्रकारिता की आजादी अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता का ही एक पहलू है। यह स्वतंत्रता तो भारत का संविधान ही देता है। बेहतर होगा कि चुनाव आयोग पत्रकारिता की शिकायत करने के बजाय कुछ बेहतर करे। सच तो यह है कि उच्च न्यायालयों ने कोरोना की जमीनी हकीकत पर लगातार नजर रखकर सराहनीय काम किया है।

उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी ने पिछले दिनों एक वर्ग से प्रायोजित उस बहस को भी विराम दे दिया है, जो कहता था कि कोरोना से निपटने में व्यवस्था की नाकामी उजागर करना देशहित में उचित नहीं है और संविधान प्रदत्त कुछ मौलिक अधिकारों को अस्थाई तौर पर निलंबित कर देना चाहिए। असल में यह चर्चा देशहित और पत्रकारिता का घालमेल कर रही थी। जब सारे संसार के अखबार और टीवी चैनल इस क्रूर काल में भारत की चुनावी  रैलियों और कुम्भ के जमावड़े की खिल्ली उड़ा रहे हैं तो भारत के पत्रकार इसे देश हित का मानकर चुप कैसे रह सकते हैं। यह भारत की सुरक्षा अथवा किसी शत्रु देश का हमला या कोई आतंकवादी वारदात नहीं है, जिसे मुल्क की हिफाजत से जोड़कर देखा जाए।

प्रसंग के तौर पर मुंबई में एक होटल पर आतंकवादी हमले को याद करना आवश्यक है। आतंकवादियों ने मुंबई के अनेक ठिकानों पर हमले किए थे। जवाब में सेना की कमांडो कार्रवाई की गई। उसे भारतीय टीवी चैनलों ने सीधा प्रसारित कर दिया था। पाकिस्तान में बैठे उग्रवादी आकाओं ने उस प्रसारण को देखकर अपने साथियों को निर्देश दिए थे। यह प्रसारण देश हित में कतई उचित नहीं था। इसीलिए भारत सरकार ने इन हमलों के बाद 27 नवंबर 2008 को सभी खबरिया चैनलों को दिशा निर्देश जारी किए थे। मैं स्वयं उन दिनों एक समूह के अनेक चैनलों का प्रमुख था और इन दिशा निर्देशों को जारी किया था। इनमें कहा गया था कि जन हित और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर कोई भी चैनल इस तरह का कवरेज नहीं दिखाएगा, जिससे किसी स्थान और व्यक्ति की लोकेशन पता चलती हो। इतना ही नहीं, घायलों और मृतकों के शवों को भी प्रसारित नहीं किया जाएगा। अन्यथा उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। तब किसी ने सुप्रीम कोर्ट में जाने की नहीं सोची और ईमानदारी से पत्रकारिता के धर्म को निभाया और आज तक उसका पालन हो रहा है। देशहित अलग है और पत्रकारिता के कर्तव्य अलग। अगर देश ही नहीं रहा तो पत्रकारिता कहां होगी?

(साभार: लोकमत समाचार)

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आज हम जिस संकट से घिरे हैं, यह बीमारी कोरोना से भी घातक साबित हो रही है: मनोज कुमार

आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ संकट में समाधान तलाशने की जरूरत है। स्वाधीनता के पहले कुछ सालों के बाद हमारे समाज को भ्रष्टाचार, घोटाले ने निगल लिया है।

Last Modified:
Thursday, 06 May, 2021
Manoj Kumar

मनोज कुमार,

वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक ‘समागम’ ।।

आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ संकट में समाधान तलाशने की जरूरत है। स्वाधीनता के पहले कुछ सालों के बाद हमारे समाज को भ्रष्टाचार, घोटाले ने निगल लिया है। बार-बार और हर बार हम सब इस बात को लेकर चिंता जाहिर करते रहे हैं लेकिन यह लाइलाज बना हुआ है। आज हम जिस चौतरफा संकट से घिरे हुए हैं, उस समय यह बीमारी कोरोना से भी घातक साबित हो रही है। खबरों में प्रतिदिन यह पढऩे को मिलता है कि कोरोना से बचाव करने वाले इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी हो रही है। अस्पताल मनमानी फीस वसूल रहे हैं। जान बचाने के लिए लोग अपने घर और संपत्ति बेचकर अस्पतालों का बिल चुका रहे हैं। हालात बद से बदतर हुए जा रहे हैं। शिकायतों का अम्बार बढ़ा तो सरकार सक्रिय हुई और टेस्ट से लेकर एम्बुलेंस तक की दरें तय कर दी गईं लेकिन तमाम अस्पताल प्रबंधन पर इसका कोई खास असर होता हुआ नहीं दिखा। कोरोना से रोगी बच जा भी जा रहा है तो जर्जर आर्थिक हालत उसे जीने नहीं दे रही है। यह आज की वास्तविक स्थिति है लेकिन क्या इसके लिए अकेले सरकार दोषी है या हमारा भी इसमें कोई दोष है? क्यों हम इस स्थिति से उबरने के लिए सरकार के साथ खड़े नहीं होते हैं? यह बात बहुत साफ है कि सरकार कोई और नहीं, हम हैं क्योंकि हमने उन्हें चुनकर सत्ता सौंपी है। हमारे सामने विकल्प है कि वे हमारे चयन पर खरे नहीं उतरते हैं तो अगली बार उन्हें बेदखल कर सकते हैं। खैर, यह बात तब होगी जब हम इस विकट स्थिति से उबर जाएंगे। अभी कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा करना जरूरी है।

आपदा को अवसर बनाकर जो लोग धन बटोरने में जुटे हुए हैं, उनके खिलाफ खड़े होकर हम संकट में समाधान की पहल कर सकते हैं। इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी से इनकार करना मुश्किल है, लेकिन असल सवाल यह है कि आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? मेरी बात आपको आहत कर सकती है लेकिन सच यही है कि हम अपनी और अपनों की जान बचाने के लिए इस कालेधंधे को बढ़ावा देते हैं। आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि बाजार की कीमत क्या है और हम उसकी कीमत क्या चुका रहे हैं। फर्क पड़ता है उन बहुसंख्यक आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को जिनका हक मारा जा रहा है।

जब हम स्वयं को शिक्षित और जागरूक होने का दावा करते हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि हम इन कालाबाजारियों को ट्रेप करें और पुलिस के हाथों सौंप दें। हमारे भीतर तक डर इतना समा चुका है कि अच्छे खासे शिक्षित लोग भी कोरोना से बचाव की दवा और ऑक्सीजन जैसी जरूरी चीजों का बेवजह भंडारण कर रहे हैं। कालाबाजारियों और जमाखोर दोनों ही समाज के लिए नासूर बन चुके हैं। इन दोनों वृत्तियों के मनोरोगियों के खिलाफ हम और आप खड़े हो जाते हैं तो स्थिति स्वयमेव नियंत्रण में आ जाएगी। सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है और मनमाना वसूले गए बिलों की वापसी कराई गई है। यही नहीं, सरकार का आग्रह है कि ऐसे अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जाए। अब हमें सरकार के साथ खड़ा होकर उन सभी लोगों को बेनकाब करना है जो समाज के लिए नासूर बनते जा रहे हैं।

कोरोना का जो भयावह मंजर है, उससे हम थरथरा रहे हैं, लेकिन इस भयावह मंजर में एक-एक सांस बचाने के लिए डॉक्टर और उनकी मेडिकल टीम जुटी हुई है, उसका हमें धन्यवाद कहना चाहिए। निश्चित रूप से जिस दबाव में डॉक्टर्स और मेडिकल टीम काम कर रही है, उनके व्यवहार में कभी कुछ तल्खी आ सकती है। कभी वे अपनी ड्यूटी पर थोड़ी देर से आते हैं तो पैनिक होने के बजाय उनका सहयोग कीजिए। जो मनमानी वसूली हो रही है, वह अस्पताल प्रबंधन की है, लेकिन आम लोगों में यह धारणा बन चुकी है कि डॉक्टर लूट रहे हैं। यह शिकायत भी दूर होनी चाहिए। अस्पातल प्रबंधन के निर्देश और दबाव में डॉक्टर जरूरत न होने के बाद भी ऐसी दवा लेने की सलाह दे रहे हैं, जिसकी जरूरत ही नहीं है। एक मित्र की सीटी रिपोर्ट एकदम क्लीयर और ऑक्सीजन लेवल 100 होने के बाद भी फेवीफ्लू दवा जिसका डोज पहले दिल 3200 एमजी और बाद के पांच दिन प्रतिदिन 1600 एमजी लेने की सलाह दी गई। यही नहीं, इलाज के लिए गए व्यक्ति का पुराना मेडिकल रिकार्ड भी नहीं पूछा जाता है।

जिस व्यक्ति का मैं उल्लेख कर रहा हूं, वह पहले से लीवर के रोग से पीड़ित है और डॉक्टर द्वारा निर्देशित दवा लेन पर शर्तिया उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। अकारण अस्पताल में भर्ती कराने का भी दबाव बनाया जाता है। एक पत्रकार मित्र को भी जब डॉक्टर ने एडमिट करने की बात कही तो उस मित्र ने पूछ लिया कि आपके अस्पताल के मुख्य द्वार पर ‘नो बेड अवेलेबल’ लिखा है तो आप मुझे कहां एडमिट करेंगे। डॉक्टर निरुत्तर। एक वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा कि उन पर अस्पताल का दबाव रहता है, इसलिए ऐसी दवा लिखी जाती है। यह अपने आपमें दुर्भाग्यजनक है। मेरे एक मित्र को डॉक्टरों के समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने की शिकायत थी लेकिन उनके पास इस बात का जवाब नहीं था कि डॉक्टरों के लौटने का वक्त क्या है? डॉक्टर की आलोचना कर आप उनके मनोबल को तोडक़र अपना नुकसान कर रहे हैं। सिक्के के दो पहलू होते हैं और हमें दोनों तरफ देखना होगा। डॉक्टर और मेडिकल स्टॉफ शिद्दत के साथ मानव सेवा में जुटे हुए हैं।इन सब को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए लेकिन जो संकट के समय भी धन संग्रहण में जुटे हैं, उन्हें  सरकार के संज्ञान में लाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.

एक-एक सांस के लिए लड़ते मरीजों और उनके परिजनों से लाखों का बिल वसूलने वाले अस्तपाल प्रबंधन के खातों की जांच इनकम टेक्स डिपार्टमेंट द्वारा की जानी चाहिए। नकद लेन-देन पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए तथा इस बात की भी जांच हो कि कोरोना बीमारी के पहले अस्पताल की आय और व्यय कितना था और वर्तमान में कितना है, तो स्थिति साफ हो जाएगी। यह किसी को परेशान करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि आम आदमी को राहत दिलाने की और सरकार के प्रयासों को मजबूती दिलाने में एक कदम हो सकता है। बिलिंग काउंटर के पास सीसीटीवी कैमरा लगाना अनिवार्य होना चाहिए ताकि समस्त किस्म के व्यवहार की रिकार्डिंग हो और उन पर नियंत्रण पाया जा सके। वक्त बहुत नाजुक है। सबको सबका सहयोग चाहिए। यह वक्त दोषारोपण का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर आगे बढ़कर मुसीबत से निकलने का है। सरकार की कमियां बताने में गुरेज न हो, लेकिन निंदारस से बाहर आना होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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आज दो गुरुओं के जाने से मन अवसाद में डूबा जा रहा है: मनोज कुमार

आज दो लोगों के जाने से मन अवसाद में डूबा जा रहा है। चलते-चलते सिखाने वाले गुरुओं के जाने से दुखी हूं। चिंता इस बात की है कि अब ये लोग कहां मिलेंगे।

Last Modified:
Tuesday, 04 May, 2021
ManojKumar645

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के संचार विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. दविंदर कौर उप्पल का चार मई की तड़के (करीब ढाई बजे) निधन हो गया। दरअसल वे कोरोना वायरस से संक्रमित थीं और उनका इलाज रेड क्रॉस अस्पताल में रहा था। बता दें कि इस साल 11 अप्रैल को वे अपने घर पर फिसल गईं थीं, जिसकी वजह से उनके पैर में काफी चोट आई थी और उनकी सर्जरी हुई थी।

वहीं दूसरी तरफ इंदौर के प्रसिद्ध साहित्यकार, चित्रकार और पत्रकार प्रभु जोशी का निधन हो गया। वे पिछले कुछ दिनों से कोरोना संक्रमित थे, उनका इलाज चल रहा था। जोशी एक चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता के तौर पर जाने जाते थे।

प्रभु जोशी के चित्र लिंसिस्टोन तथा हरबर्ट में ऑस्ट्रेलिया के त्रिनाले में प्रदर्शित हुए थे। प्रभु जोशी को गैलरी फॉर केलिफोर्निया (यूएसए) का जलरंग के लिए थामस मोरान अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। ट्वेंटी फर्स्ट सैचुरी गैलरी, न्यूयार्क के टॉप सेवैंटी में वे शामिल रहे। भारत भवन का चित्रकला और मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का कथा-कहानी के लिए अखिल भारतीय सम्मान भी उन्हें मिला।

प्रभु जोशी इंदौर आकाशवाणी में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव पद पर भी कार्यरत थे। कई रेडियो प्रोग्रामों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने का श्रेय उन्हें जाता है। इसके लिए उन्हें कई अंततराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुए। वर्तमान में लेखन और चित्रकारी में सक्रिय थे।

इन दोनों को याद करते हुए ‘समागम’ पत्रिका के संपादक व वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार ने लिखा-   

‘अब सुबह खुश खबर नहीं लाती है। आज सुबह फोन की घंटी बजी। दिल धड़का। किसी अनहोनी खबर की आशंका थी, वही हुआ। मैडम उप्पल नहीं रही। अपने पीछे वे अपने चाहने वालों का बडा कुनबा छोड़ गई। मेरा उनसे एक पत्रकार और उनसे उम्र में काफी छोटा होने के कारण अनुज का रिश्ता था। एक वजह देशबंधु से जुड़ा होना भी था।

एमसीयू से रिटायर होने के मुद्दत बाद एक एनजीओ के वर्कशाप में मुलाकात हुई। एक हौले से मुस्कराहट के साथ हालचाल पूछा। उनके घर का पता मिला तो उन्हें ‘समागम’ भेजने लगा। एक दिन उनका फोन आता है कि अच्छी पत्रिका निकाल रहे हो। कुछ पुरानी यादें ताजा हो गई।

एक दिन कम्युनिटी रेडियो के सिलसिले में कुछ जानने के लिये उनका फोन आया। इस बीच मेरे काम की जानकारी लेती रहीं। तारीफ करती। इधर कुछ शारीरिक दिक्कत के चलते उनका पढ़ना पहले की अपेक्षा कम हो गया था लेकिन सोशल मीडिया पर वे सक्रिय रहीं। दीक्षित सर के बाद उप्पल मेम का जाना मेरे लिये व्यक्तिगत क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे। ओम शांति शांति’

वहीं दूसरी तरफ, प्रभु दा के चले जाने की खबर गले से नहीं उतर रही है। प्रभु जोशी मेरे अनाम गुरु थे। बात 90-92 के आसपास की होगी। अखबार में वेतन अल्प था तो फ्री लान्सिंग कर कुछ जुगाड़ कर लिया करते थे। उन दिनों दा भोपाल में पोस्टेड थे। ‘वार्ता’ या कुछ अन्य प्रोग्राम किया करता था। एक दिन मजाक में ‘दा’ कहते हैं ‘मनोज कोई बडा काम कर लो’, जिज्ञासा से पूछा, ‘क्या’ तो हंसी के साथ कहा, ‘शादी कर लो’। उनसे मजाक कर सकूं, यह हैसियत ना तब थी, ना आज है। फिर उन्होने कहा कि कहानी से नाट्य रुपांतरण करो। मैने अपनी विवशता जताई कि यह विधा मुझे नहीं आती है, तो उन्होंने कहा, ‘कुछ नहीं है। कोशिश करो’। मैं भी जुट गया। रात भर घंटों की मेहनत के बाद लिखा, लेकिन मन में डर था कि अब कुटाई होने वाली है। सहमा-सहमा उनके पास स्क्रिप्ट लेकर पहुंचा। मेरी कोशिश थी कि वहां से खिसक लूं, लेकिन यह सम्भव नहीं था। महज 5 मिनट में रिजल्ट आ गया। 'दा ने मुझे पास कर दिया था। सच तो यह है कि उन्होने कॉपी में काफी सुधार किया था। लेकिन मेरा उत्साह बढ़ाते रहे।

इसके बाद 15 -15 मिनट की लघु नाटिका लिखने का अवसर दिया। आज जब फाइल पलट रहा था तो हैरान रह गया कि किस तरह मैने 50 से अधिक नाटक लिख लिया था।

भोपाल से जाने के बाद उनसे जीवन्त रिश्ता नहीं रहा, लेकिन देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में जाना आना लगा रहा। इस दरम्यान कुछ समय चोरी कर उनसे मिलने गया। प्रभु दा वैसे ही थे लेकिन मुझ पर उम्र असर दिखाने लगी थी।

आज दो लोगों के जाने से मन अवसाद में डूबा जा रहा है। चलते-चलते सिखाने वाले गुरुओं के जाने से दुखी हूं। चिंता इस बात की है कि अब ये लोग कहां मिलेंगे। ईश्वर कृपा कर। अब कोई बुरी खबर ना देना। शत-शत नमन

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