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विपक्षी गठबंधन अब लोकसभा चुनावों में भाजपा का मुकाबला कैसे करेगा?: विनोद अग्निहोत्री
इसके पहले भी 1998 में कांग्रेस ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली में जीत दर्ज की, लेकिन लोकसभा चुनावों में भाजपा से हार गई।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
विनोद अग्निहोत्री, वरिष्ठ सलाहकार संपादक (अमर उजाला समूह), लेखक व स्तंभकार।
लोकसभा चुनावों में अब महज चार महीने का वक्त है। संभावित चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक मार्च के अंतिम या अप्रैल के प्रथम सप्ताह में आचार संहिता लग सकती है। इस चुनावी महाभारत के लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के पास अब उत्तर भारत के तीन राज्यों की हाल ही में हुई जीत का मनोबल, अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का समर्थन और जनवरी में होने वाले अयोध्या में राम मंदिर के लोकार्पण से बने माहौल का आभा मंडल है।
इन तीन अभेद अस्त्रों के साथ भाजपा प्रधानमंत्री मोदी का करिश्माई नेतृत्व, गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा की कड़ी मेहनत, सत्ता तंत्र के लाभ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित स्वयंसेवकों की फौज और पार्टी कार्यकर्ताओं का बल भी है। उधर तीन राज्यों की पराजय से शिकस्त कांग्रेस, आपसी तूतू-मैं मैं और स्वार्थी अहंकारों में उलझे इंडिया गठबंधन के घटक दल और उसके नेता जो अभी तक न न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय कर पाए हैं और न ही लोकसभा सीटों का बंटवारा कर पाये हैं।
क्या ऐसे विपक्ष से ये उम्मीद की जा सकती है कि वो इस तरह 2024 के लोकसभा चुनावों में मोदी और उनकी भाजपा को चुनौती दे पाएगा। यह एक अहम सवाल है, जिसका जवाब फिलहाल अभी बहुत आशावादी नहीं है। लेकिन बनारस में इसी महीने होने वाली है जद(यू) की रैली, जिसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित इंडिया गठबंधन के कई नेता संबोधित करेंगे।
अटकलें हैं कि नीतीश उत्तर प्रदेश की फूलपुर, मिर्जापुर या किसी और लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़ सकते हैं। कहा जा रहा है कि नीतीश और अखिलेश मिलकर उत्तर प्रदेश में अखिलेश के पीडीए समीकरण (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) बनाकर भाजपा को चुनौती देंगे। पिछड़ों में भी इस समूह की दो प्रभावशाली जातियों यादव और कुर्मी और मुस्लिमों को साथ लेकर इंडिया गठबंधन उत्तर प्रदेश में काफी उम्मीदें जता रहा है। जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल के साथ आ जाने से यह सामाजिक समीकरण और ज्यादा मजबूत होने की संभावना हो जाती है।
लेकिन याद रखना चाहिए उत्तर प्रदेश में मोदी-योगी के रूप में भाजपा का असली डबल इंजन है। अयोध्या, मथुरा काशी भी यहीं है और संघ परिवार के हिंदुत्व की सबसे बड़ी रणभूमि भी यही राज्य है। इसलिए यहां पिछले दोनों लोकसभा चुनावों में भाजपा ने जबर्दस्त कामयाबी हासिल की थी। इसलिए यहां मुकाबला आसान नहीं है।
उत्तर भारत के तीन प्रमुख राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जबर्दस्त जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह तीनों राज्यों में एकदम नए चेहरों को मुख्यमंत्री बनाकर न सिर्फ सबको चौंकाया बल्कि इन राज्यों में नया नेतृत्व विकसित करने और लोकसभा चुनावों के मद्देनजर सामाजिक एवं जातीय समीकरण साधने की कवायद भी की है। मध्यप्रदेश में मोहन यादव को कमान देकर भाजपा ने जहां एक तरफ जहां लंबे समय तक चले शिवराज सिंह चौहान युग की समाप्ति की घोषणा की है, वहीं दूसरी तरफ मध्यप्रदेश के साथ साथ उत्तर प्रदेश और बिहार की बड़ी यादव आबादी जो अभी तक भाजपा की पहुंच से बाहर है, को भी साथ आने का संदेश दे दिया है।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी विष्णु नारायण साय और राजस्थान में पहली बार विधायक बने ब्राह्मण नेता भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने देश के आदिवासियों और अपने बेहद ठोस जनाधार ब्राह्मणों को भी खुश कर दिया है। मध्यप्रदेश में विंध्य के कद्दावर ब्राह्मण नेता राजेंद्र शुक्ल और राज्य के दलित नेता जगदीश देवड़ा को उपमुख्यमंत्री बनाकर पिछड़ों के साथ साथ ब्राह्मण और दलित समुदाय को भी संतुष्ट किया गया है।
राजस्थान में जयपुर राजघराने की राजकुमारी दीया कुमारी और प्रेमचंद बेवरा को उपमुख्यमंत्री बनाकर यहां भी राजपूत और दलित समुदाय को सकारात्मक संदेश दिया है। वहीं छत्तीसगढ़ में भी पिछड़े समाज के अरुण साओ और ब्राह्मण विजय शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाकर यहां भी इन दोनों मजबूत समाजों को साथ जोड़े रखने की कवायद की गई है।
अपनी इस किलेबंदी के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जातीय जनगणना और पिछड़ों को उनकी आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी देने के राहुल गांधी के नारे की काट करना चाहते हैं, जिसे इंडिया गठबंधन लोकसभा चुनावों के लिए अपना ब्रह्मास्त्र मानता है। इसके साथ ही अनुच्छेद 370 पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को भी भाजपा लोकसभा चुनावों में भुनाएगी। लेकिन इस फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि जिस दिन जम्मू कश्मीर का भारत में विलय हुआ था, उसी दिन से वह भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है और उसकी कोई स्वायत्ता या संप्रभुता नहीं रह गई थी। अदालत के इस कथन से भाजपा और उनके समर्थकों के इस कथन कि अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद ही जम्मू कश्मीर का भारत में वास्तविक विलय हुआ, को निराधार कर दिया है।
अब सवाल है कि विपक्षी इंडिया गठबंधन कैसे अब लोकसभा चुनावों में भाजपा का मुकाबला कर पाएगा। प्रथम दृष्टया लगता है कि विपक्ष के हाथ से बाजी निकल गई है। लेकिन इतिहास बताता है कि चुनाव से ठीक पहले विधानसभा चुनावों की जीत हमेशा लोकसभा चुनावों में जीत की गारंटी नहीं होती। 2003 में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव जीतने वाली भाजपा 2004 का लोकसभा चुनाव हार गई।
2008 में भी भाजपा ने यह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जीते लेकिन राजस्थान हार गई और 2009 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने ज्यादा सीटें लेकर फिर यूपीए की सरकार बनाई। परंतु 2013 में भाजपा तीनों राज्य जीती और 2014 में लोकसभा चुनावों में भी उसे शानदार जीत मिली। जबकि 2018 में इन्हीं तीनों राज्यों में कांग्रेस जीती लेकिन 2019 का लोकसभा चुनाव हार गई।
इसके पहले भी 1998 में कांग्रेस ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली में जीत दर्ज की, लेकिन लोकसभा चुनावों में भाजपा से हार गई। इसलिए विधानसभा चुनावों जैसे नतीजे ही लोकसभा चुनावों में भी होंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। यही एक उम्मीद है जो कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों को फिर मैदान में डटने की प्रेरणा दे रही है।
19 दिसंबर को होने वाली इंडिया गठबंधन की बैठक में क्या विपक्षी दल 400 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर भाजपा और एनडीए के मुकाबले इंडिया का एक सर्वसम्मत उम्मीदवार देने के लिए सीट बंटवारे का कोई सर्वमान्य फॉर्मूला निकाल पाएंगे और क्या कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम बना पाएंगे। क्या इंडिया गठबंधन किसी नेता को अपना संयोजक बना सकेगी। क्या विधानसभा चुनावों के दौरान पैदा हुई, उनकी तल्खी इस बैठक के बाद खत्म हो जाएगी। क्या संयुक्त प्रचार की कोई रणनीति बनेगी। क्या मोदी के मुकाबले कोई सर्वमान्य चेहरा तय हो सकेगा या मोदी बनाम मुद्दों पर इंडिया गठबंधन चुनाव लड़ेगा।
इन सारे सवालों के जवाब में ही 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्षी गठबंधन की संभावनाओं की कुंजी है। अगर इंडिया गठबंधन ने इन सवालों को सही तरीके से सुलझा लिया, तो निश्चित रूप से लोकसभा चुनावों में वह नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व और मजबूत भाजपानीत एनडीए गठबंधन को चुनौती दे सकेगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत को कोई नहीं रोक सकेगा और विपक्ष महज चुनावी मुकाबले की औपचारिकता पूरी करते हुए इसी तरह संसद में दिखाई देगा जैसे कि अभी दिखता है।
विपक्ष के मुकाबले में आने की सबसे पहली और सबसे बड़ी शर्त है कि कांग्रेस अपने घर को दुरुस्त करे, क्योंकि जिन तीन राज्यों में भाजपा जीती है, वहां कांग्रेस का ही मुकाबला उसके साथ लोकसभा चुनावों में भी मुकाबला होगा।
पिछले चुनाव में इन राज्यों की कुल 65 लोकसभा सीटों में भाजपा ने 62 सीटें जीती थीं। यहां कोई क्षेत्रीय दल मुकाबले में नहीं है, इसलिए कांग्रेस को ही अपने कील कांटे दुरुस्त करके यहां भाजपा से लड़ना होगा। अगर कांग्रेस पिछले चुनाव के मुकाबले भाजपा से कुछ ज्यादा सीटें छीनने में कामयाब होती है, तो भाजपा को उसकी भरपाई कहीं और से करनी होगी। बिहार, महाराष्ट्र और प. बंगाल में विपक्ष की कड़ी चुनौती से जूझ रही भाजपा को इसके लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। साथ ही इन तीनों राज्यों में भाजपा की जो नई सरकारें बनी हैं, अगले तीन महीनों के दौरान उनके कामकाज की कसौटी भी लोकसभा चुनावों में परखी जाएगी।
अगर भाजपा शासित इन तीनों राज्यों के नए नवेले मुख्यमंत्री चुनावों के दौरान किए गए वादों और इरादों के मुताबिक काम करते दिखेंगे, तो निश्चित रूप से उसका फायदा लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिलेगा, लेकिन अगर इनका कामकाज अपेक्षा के अनुरूप नहीं दिखा और सुशासन के दावे खोखले निकले तो इसका नुकसान भी भाजपा को हो सकता है।
इसके अलावा छत्तीसगढ़ में आदिवासी, मध्यप्रदेश में पिछड़ा (यादव) और राजस्थान में सवर्ण (ब्राह्मण) मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने जिन सामाजिक वर्गों को साधा है, वह तो उसके साथ एकजुट हो सकते हैं, लेकिन जो सामाजिक वर्ग छूट गए हैं क्या उनमें इसकी कोई प्रतिक्रिया हो सकती है, अगर ऐसा होता है तो उनको साधने की भी एक चुनौती भाजपा के सामने लोकसभा चुनावों में रहेगी।
और विपक्ष खासकर कांग्रेस क्या भाजपा के जनाधार में उठने वाले इस सामाजिक अंतर्विरोध का कोई राजनीतिक फायदा उठा सकेगी। कांग्रेस की लचर रणनीति और इन प्रदेशों में नेतृत्व को लेकर उसका असमंजस देखते हुए इसकी उम्मीद कम ही लगती है, लेकिन अगर वह इसमें कामयाब हो गई, तो लोकसभा चुनाव बेहद दिलचस्प हो सकते हैं। कुल मिलाकर किसी एक चुनाव के नतीजों से आगे के नतीजे निकालना भी फिलहाल जल्दबाजी है।
साभार - अमर उजाला डिजिटल।
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