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राहुल गांधी को 'चोर' के प्रिय नारे से कितना नफा नुकसान: आलोक मेहता

राजनीति के अपराधीकरण का असली कारण यह है कि पहले पार्टियां और उनके नेता चुनावी सफलता के लिए कुछ दादा किस्म के दबंग अपराधियों का सहयोग लेते थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 months ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

राहुल गांधी ने बिहार में 'वोट चोर' के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चुनाव आयोग के खिलाफ एक घिनौना अभियान चलाया है, जो गरीब अशिक्षित लोगों की भीड़ इकट्ठा कर नक्सल-माओवादियों की तरह चुनाव और लोकतंत्र के प्रति विद्रोह पैदा करने की कोशिश जैसा है। इसे कहने को 'अधिकार यात्रा' कहा गया है, लेकिन जिस राज्य में खुलेआम बंदूकों के बल पर वोट और बूथ लूटने का पुराना इतिहास रहा हो, वहां वोटिंग मशीन, वोटर लिस्ट, सरकार, चुनाव आयोग, सीबीआई, पुलिस आदि पर भरोसा न करना कहां तक उचित है?

वैसे उन्हें मालूम नहीं है कि इसी 'चोर' जैसे नारों से उनके कितने मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री खुद फंसे रहे हैं, और लोगों को उनकी यादें अधिक खतरनाक साबित हो सकती हैं। चुनाव आयोग ने राहुल गांधी से कहा कि यदि मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों के सबूत हैं तो उन्हें 7 दिनों में हलफनामा जमा करें, अन्यथा माफी मांगें। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राहुल गांधी पर “डेटा मैनिपुलेशन” का आरोप लगाया और स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट और वोट डालने की प्रक्रिया अलग-अलग कानूनों के तहत संचालित होती है।

इस बीच एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई है, जिसमें आरोप लगाया गया कि कांग्रेस और राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता को कमजोर करने के लिए यह अभियान चलाया है। वोटर इज किंग, इलेक्टेड मेन इज सर्वेंट ऑफ पब्लिक (मतदाता राजा है, चुने गए व्यक्ति सेवक हैं), लेकिन सारे चुनाव सुधारों और अदालती निर्णयों के बावजूद राजनीति में अपराधीकरण से मुक्ति नहीं मिल पाई है।

राजनीति के अपराधीकरण का असली कारण यह है कि पहले पार्टियां और उनके नेता चुनावी सफलता के लिए कुछ दादा किस्म के दबंग अपराधियों का सहयोग लेते थे, धीरे-धीरे दबंग लोगों को स्वयं सत्ता में आने का मोह हो गया और अधिकांश पार्टियों को यह मजबूरी महसूस होने लगी। पराकाष्ठा यहाँ तक हो गई कि कांग्रेस के सत्ता काल में बिहार के एक बहुत विवादस्पद दबंग नेता को राज्य सभा के नामजद सदस्य की तरह भेज दिया गया।

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार संसद में पाँच साल की सजा वाले मामलों में तीस दिन से अधिक जेल में रहने वाले पीएम, सीएम, मंत्री को तत्काल पद से हटने का प्रावधान का कानून लाई तो कांग्रेस और उनके साथी विरोधी दलों ने संसद में अशोभनीय हंगामा कर दिया। संयुक्त संसदीय समिति इस कानून को और ध्यान से विचार करके पास करने के बाद संसद में लाएगी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सितम्बर 2018 को एक फैसले में निर्देश दिया था कि दागी उम्मीदवार अपने आपराधिक रिकॉर्ड को प्रमुखता से सार्वजनिक करें, ताकि जनता को जानकारी रहे।

राजनीतिक दल जिन दागियों को जिताऊ उम्मीदवार बताकर चुनाव मैदान में उतार देते हैं, उनके बचाव में वे न्यायशास्त्र के इस सिद्धांत की आड़ लेते हैं कि आरोपित जब तक न्यायालय से दोषी न करार दिया जाए, तब तक वह निर्दोष ही माना जाए। यह दलील उन मामलों में भी दी जाती है जिनमें उम्मीदवार के संगीन अपराध में लिप्त होने का आरोप होता है।

अनेक गंभीर मामलों में सबूतों के साथ चार्जशीट होने पर तो नेता और पार्टियों को कोई शर्म महसूस होनी चाहिए। चुनाव आयोग ने तो बहुत पहले यही सिफारिश कांग्रेस राज के दौरान की थी कि चार्जशीट होने के बाद उम्मीदवार नहीं बन पाने का कानून बना दिया जाए, लेकिन ऐसी अनेक सिफारिशें सरकारों और संसदीय समितियों के समक्ष लटकी हुई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सांसदों-मंत्रियों आदि पर विचाराधीन मामलों के लिए अलग से अदालतों के प्रावधान और फैसले का आग्रह भी किया, लेकिन अदालतों के पास पर्याप्त जज ही नहीं हैं।

जहाँ तक सरकारी खजाने से चोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की बात है, बिहार में राहुल गांधी जिन लालू यादव परिवार के कंधों का सहारा ले रहे हैं, वे 'चारा चोर' के आरोपों वाले पशुपालन घोटाले में जेल की लंबी सजा भुगत चुके हैं और अब भी दामन बेदाग नहीं है। फिर कांग्रेस के इंदिरा राज से मनमोहन सिंह राज के दौरान अरबों रुपयों के भ्रष्टाचार के घोटालों की सूची लंबी होती गई है। हिमाचल के एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री रामलाल को 'लकड़ी चोर' के गंभीर आरोपों में हटाना पड़ा यानी जंगलों के पेड़ काटकर करोड़ों की लकड़ी के अवैध धंधे का मामला था।

बचाव के लिए उसे राज्यपाल तक बनाया गया, जिसने आंध्र की चुनी हुई रमा राव की सरकार को ही बर्खास्त कर दिया जिसे राष्ट्रपति के हस्तक्षेप से पुनः मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। कर्नाटक का तेलगी स्टाम्प पेपर घोटाला (2003), कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला (2010), 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला (2008–11), कोयला घोटाला (2012) की यादें ताजा हैं। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जिस तरह के शराब घोटाले में फंसे, ऐसे आरोपों के मामले मध्य प्रदेश में कांग्रेस के अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह तक पर रहे और अदालत पहुँचे थे।

इन सबसे गंभीर कांग्रेस सरकार बचाने के लिए हुआ सांसद रिश्वत कांड में सहयोगी दलों के नेताओं की सजा का रिकॉर्ड भी है। इसलिए राहुल गांधी और कर्नाटक में तेलगी और वीरप्पन कांडों के समय सत्ता में रहे पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को असली राजनीतिक नफा-नुकसान समझ लेना चाहिए।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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