जनता की आस्था ही नहीं उनके स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ी बातों पर प्राथमिकता के साथ अभियान की आवश्यकता है। आंध्र में जून में सत्ता परिवर्तन हुआ था।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर के लड्डूओं में मिलावट पर देश दुनिया में हंगामा हो गया है। आंध्र के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने स्वयं बाकायदा लेबोरटरी की प्रामाणिक रिपोर्ट के साथ यह भंडाफोड़ किया। उन्होंने बताया कि पिछली वाईएसआरसीपी के नेतृत्व वाली जगनमोहन रेड्डी सरकार के दौरान तिरुपति के श्रीवेंकटेश्वर मंदिर में पवित्र प्रसाद लड्डू बनाने में घटिया सामग्री और जानवरों की चर्बी, मछली के तेल आदि का उपयोग किया गया। स्वाभाविक है कि इस गंभीर मामले पर राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
वही इस पूरे विवाद के बीच एक बार फिर से देशभर के मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किए जाने की मांग उठने लगी है। प्रसाद में मिलावट पर राजनीति से हटकर एक और गंभीर मुद्दा देश भर में दूध, घी, तेल, मसाले, सब्जी, फल सहित अनेक खाद्य वस्तुओं में मिलावट के मामलों पर कठोर सजा न होने , सरकारी खाद्य संरक्षण संस्थानों और नियम कानूनों की कमियों, मामलों के मामले लटके रहने का है। जनता की आस्था ही नहीं उनके स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ी बातों पर प्राथमिकता के साथ अभियान की आवश्यकता है।
आंध्र में जून में सत्ता परिवर्तन हुआ था। जिसके बाद चंद्रबाबू नायडू की पार्टी सत्ता में वापस आई है। मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद चंद्रबाबू नायडू ने मंदिर के लड्डुओं में मिलावट की आशंका जाहिर की थी। जिसके बाद मंदिर प्रशासन ने सप्लाई किए गए घी के सैंपल लेकर जांच के लिए गुजरात स्थित डेयरी विकास बोर्ड की लैब 'सेंटर ऑफ एनालिसिस एंड लर्निंग इन लाइव स्टॉक एंड फूड' ( भेजे थे। जिसके बाद लैब की रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे हुए। एनडीडीबी लैब की रिपोर्ट से पता चला कि शुद्ध घी में शुद्ध दूध में वसा की मात्रा 95.68 से लेकर 104.32 तक होना चाहिए था। लेकिन सैंपल्स में मिल्क फैट की वेल्यू 20 ही पाई गई थी। जिससे इस मिलावटी घी के बारे में खुलासा हुआ।
जिसके बाद बड़ा विवाद उठ खड़ा हुआ। लैब की रिपोर्ट के मुताबिक इन सैंपल में सोयाबीन, सूरजमुखी, जैतून का तेल, गेंहू, मक्का, कॉटन सीड, मछली का तेल, नारियल, पाम ऑयल, बीफ टैलो, लार्ड जैसे तत्व पाए गए हैं। इस घी को चेन्नई की एक कंपनी की कंपनी ने सप्लाई किया था। आरोप यह भी आया कि उस कंपनी के प्रबंधन में पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के रिश्तेदार भी शामिल हैं। आंध्र के पूर्व सीएम जगन मोहने ने कहा कि घी की सप्लाई के लिए हर 6 महीने में टीटीडी टेंडर जारी करता है। रूटीन के तहत ही जो लोग चुने जाते हैं, उन्हें टेंडर दिया जाता है। ये मानदंड कोई आज तय नहीं हुए है। वे 10 साल से इसी तरह चले आ रहे हैं।
इस पूरे मामले पर मंदिर समिति तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की ओर से भी बयान जारी किया गया है। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम मंदिर के एक्जीक्यूटिव ऑफिसर श्यामला राव ने भी स्वीकार किया है कि हमारे मंदिर की पवित्रता भंग हुई है। पिछली सरकार ने मिलावट की जांच के लिए कोई कदम नहीं उठाए थे।जब मैंने टीटीडी की कार्यकारी अधिकारी का पदभार संभाला था, तो मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने खरीदे गए घी और लड्डू की गुणवत्ता पर चिंता व्यक्त की थी। राव ने कहा कि, वह चाहते थे कि मैं यह सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाऊं। हमने इस पर मामले पर काम करना शुरू किया है।
तब हमने पाया कि हमारे पास घी में मिलावट की जांच करने के लिए कोई आंतरिक प्रयोगशाला नहीं है। बाहरी प्रयोगशालाओं में भी घी की गुणवत्ता की जांच करने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा भगवान को चढ़ने प्रयोग किए जा रहे शुद्ध घी कीमत 320 रुपये रखी गई थी। जो संदेह पैदा कर रही थीं। शुद्ध घी की कीमत कम से कम 500 रुपये प्रति किलो होने चाहिए थी। तिरुपति बालाजी के प्रसाद में मिलने वाले लड्डू पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। इन्हें जीआई का टैग भी मिला है। मंदिर प्रशासन हर रोज शुद्ध देसी घी के 3.50 लाख लड्डू तैयार करता है।
इन लड्डुओं को बनाने में शुद्ध बेसन की बूंदी, चीनी, काजू और शुद्ध घी का इस्तेमाल किया जाता है। यहीं लड्डू तिरुपति मंदिर का मुख्य प्रसाद होते है। मंदिर के प्रसाद को बनाने के लिए मंदिर हर साल करीब 5 लाख किलो और हर महीने 42000 किलो घी तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की ओर से खरीदता है। इस घी की खरीद के लिए मंदिर प्रशासन टेंडर जारी करता है। नए मुख्यमंत्री ने कहा है कि इस भ्रष्टाचार में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। इस मामले में सरकार की ओर से कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरु हो गई है।
कंपनी को सरकार की ओर से प्रतिबंधित कर दिया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू से इस मामले में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि है उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू से बात की है और तिरुपति लड्डू मुद्दे पर रिपोर्ट मांगी है। उन्होंने कहा कि केंद्र इस मामले में खाद्य सुरक्षा नियमों के तहत कार्रवाई करेगा। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) इसकी जांच करेगा, रिपोर्ट देगा और फिर हम कार्रवाई करेंगे।
सवाल यह है कि यह प्राधिकरण कितना सक्षम है। उसके प्रशासन, व्यवस्था , अधिकार आदि पर केंद्र सरकारों ने कितना ध्यान दिया। गड़बड़ियों और भ्र्ष्टाचार की शिकायतों पर कितनी कार्रवाई हुई? वहीँ मिलावट पर राज्य सरकारों और स्थानीय नगर निगम पालिका मिलावट रोकने के लिए क्या पर्याप्त कार्रवाई कर रही हैं?लचर प्रशासनिक कार्यप्रणाली के कारण मिलावटखोरों पर पूरी तरह से शिकंजा नहीं कस पाता है। मिलावट के लगभग सभी मामलों में जुर्माना लगता है, सजा नहीं हो पाती है।
पिछले पांच साल में सजा का कोई बड़ा फैसला नहीं हुआ है। हालांकि, भारतीय दंड संहिता में मिलावटखोरों पर कड़ी सजा का प्रावधान है, लेकिन मिलावट से संबंधित 90 फीसदी मामले प्रशासनिक कोर्ट में स्थानांतरित हो जाते हैं, जिस कारण वह न्यायालय की कार्रवाई से बच जाते हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकने के लिए सख्त सजा की सिफारिश की है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा 2006 के खाद्य सुरक्षा एवं मानक कानून में प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार खाद्य उत्पादों में मिलावट करने वालों को आजीवन कारावास और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के क्रियान्वयन और प्रवर्तन का दायित्व राज्य सरकारों का है। राज्य खाद्य सुरक्षा अधिकारियों द्वारा खाद्य पदार्थों के नमूने लिए जाते हैं और विश्लेषण के लिए द्वारा मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में भेजे जाते हैं। जिन मामलों में नमूनों में मिलावट पाई जाती है, वहां अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जाती है।
मजेदार बात यह है कि यह प्राधिकरण केवल भारत की खाद्य बल्कि विश्व भर से आने वाली खाद्य वस्तुओं, सौंदर्य प्रसाधन की मान्यता स्वीकृति देने का अधिकार रखता है। विदेशी वस्तुओं के आयात की अनुमति में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है जबकि भारत कोडेक्स ( खाद्य पदार्थों के संरक्षण की संहिता का विश्व संगठन का सदस्य है। भारत के विशेषज्ञों को विदेशों में ज्ञान देने बुलाया जाता है। लेकिन भारत में अपनी ही सरकार उनकी लिखित सिफारिशों को समुचित महत्व देकर लागू नहीं कर पा रही है।
दूसरा मुद्दा देश के मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का है। देशभर में मंदिरों पर से सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने की मांग को लेकर पिछले एक दशक से आंदोलन हो रहे हैं। लोगों की मांग है कि सरकार इन मंदिरों को अपने नियंत्रण से मुक्त करे। इससे मंदिर बोर्ड में हो रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। कई लोग मानते हैं, ‘हिंदू मंदिरों की स्वतंत्रता’ आंदोलन न तो 2014 के बाद शुरू हुआ कोई नया संघर्ष है और न ही यह सांप्रदायिक एजेंडे का हिस्सा है। सुधार के बाद के भारत में जहां राज्य अपनी अधिकांश संपत्तियों, कंपनियों और अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को उदार बना रहा है, मंदिर अभी भी उसके नियंत्रण में हैं।
मंदिरों को मुक्त करने के आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि हिंदू मंदिरों पर नियंत्रण धार्मिक क्षेत्र में ‘लाइसेंस परमिट राज’ का दर्श उदाहरण है। सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग कर रहे लोगों का कहना है कि भारतीय लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष राज्य 1947 से अस्तित्व में है जबकि अधिकांश हिंदू मंदिर सदियों पुराने हैं। यह तथ्य कि वे अभी भी फल-फूल रहे हैं, इस बात का प्रमाण है कि दशकों तक स्थानीय भक्तों द्वारा उनका प्रबंधन कैसे किया गया था।
दूसरी तरफ सरकार की तरफ से नए-नए कानून के जरिये मंदिरों पर नियंत्रण का दायरा बढ़ाया जाता रहा है। मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है। शीर्ष अदालत की तरफ से भी मंदिरों पर सरकार के नियंत्रण को अनुचित ठहराय जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट में जज रहे रिटार्यड जस्टिस एसए बोबडे ने 2019 में पुरी के जगन्नाथ मंदिर से संदर्भ में कहा था कि मैं नहीं समझ पाता कि क्यों सरकारी अफसरों को मंदिर का संचालन करना चाहिए? एक अनुमान के अनुसार देशभर के करीब 4 लाख मंदिरों पर सरकार का नियंत्रण है। इससे पहले साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में तमिलनाडु के नटराज मंदिर को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने को लेकर फैसला भी सुनाया था। उत्तराखंड में यह चुनावी मुद्दा बन गया था।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
Pidilite Industries ने FY2025-26 की अपनी एनुअल रिपोर्ट को दिवंगत पीयूष पांडेय को श्रद्धांजलि में बदलकर इसे खास बना दिया है।
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Samachar4media Bureau
गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक ।।
हर साल की एनुअल रिपोर्ट तैयार करना चेयरमैन के ऑफिस के लिए हमेशा एक महत्वपूर्ण काम रहा है। बड़ी कंपनियों के लिए यह सिर्फ एक कानूनी या जरूरी दस्तावेज नहीं होता। यह कंपनी के पूरे साल के प्रदर्शन, उसकी सोच, मूल्यों, पहचान और सफर को सामने रखने का एक मौका भी होता है। इसकी डिजाइन, फोटोग्राफी, प्रोडक्शन और प्रेजेंटेशन पर काफी सोच-विचार किया जाता है। पहले कंपनियां इन रिपोर्ट्स को अच्छे और महंगे कागज पर प्रिंट करवाती थीं और शेयरहोल्डर्स, इन्वेस्टर्स और दूसरे स्टेकहोल्डर्स को सावधानी से डाक के जरिए भेजती थीं।
टेक्नोलॉजी ने इस परंपरा को बदल दिया है। आज एनुअल रिपोर्ट्स तेजी से डिजिटल रूप में उपलब्ध हो रही हैं। इन्हें कॉरपोरेट वेबसाइट्स पर अपलोड किया जाता है और इलेक्ट्रॉनिक तरीके से शेयर किया जाता है। इसकी सुविधा से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन एक खूबसूरती से तैयार एनुअल रिपोर्ट को हाथ में पाने और उसे देखने का जो भौतिक और भावनात्मक अनुभव था, वह कहीं न कहीं कम जरूर हुआ है।
यही वजह है कि Pidilite Industries ने अपनी FY2025-26 एनुअल रिपोर्ट में जो किया है, वह खास तौर पर दिलचस्प है। कंपनी ने एक सामान्य कॉरपोरेट प्रक्रिया को भारतीय विज्ञापन जगत के सबसे चर्चित क्रिएटिव दिमागों में से एक, दिवंगत पीयूष पांडेय को श्रद्धांजलि में बदल दिया है।
जो लोग भारतीय विज्ञापन जगत को करीब से देखते और समझते रहे हैं, उनके लिए Pidilite और पीयूष पांडेय का रिश्ता एक बेहद खास कहानी है। पीयूष पांडेय का Fevicol के साथ रिश्ता 1980 के दशक के मध्य में शुरू हुआ था। उस समय Fevicol किसी विज्ञापन प्रोफेशनल के लिए कोई बहुत बड़ा क्रिएटिव ब्रैंड नहीं माना जाता था। Fevicol एक चिपकाने वाला प्रॉडक्ट था। इसमें Cadbury या Asian Paints जैसे ब्रैंड्स वाली ग्लैमर या भावनात्मक अपील नहीं थी। लेकिन पीयूष पांडेय और उनकी टीम ने वह देखा, जो शायद दूसरे लोग नहीं देख पाए। उन्होंने समझा कि रोजमर्रा के इस्तेमाल वाला कोई प्रॉडक्ट भी हास्य, समझदारी और पूरी तरह भारतीय अंदाज के साथ पेश किए जाने पर एक सांस्कृतिक ब्रैंड बन सकता है।
समय के साथ Fevicol सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं रह गया। उसके विज्ञापन लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गए। इसके मशहूर किरदार, परिस्थितियां, हास्य और याद रह जाने वाली लाइनों ने ब्रैंड को तुरंत पहचान दिलाई। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह रही कि पीयूष पांडेय की क्रिएटिव सोच Pidilite के पोर्टफोलियो के कई दूसरे ब्रैंड्स तक भी पहुंची, जिनमें Fevikwik, M-Seal और Dr Fixit शामिल हैं।
नई एनुअल रिपोर्ट इसी असाधारण क्रिएटिव सफर को फिर से सामने लाती है। इसमें How to Fish the Fevikwik Way, Dum Laga Ke Haisha, The Egg that Hatched a Legend, The Journey that Fevicol Bus Took, The Will that Changed the Game for M-Seal और The Fevikwik Kabadiwalli Fix जैसे कैंपेन के पीछे की कहानियों को शामिल किया गया है।
इस पूरी कोशिश को खास बनाने वाली बात यह है कि रिपोर्ट में सिर्फ विज्ञापनों को दोबारा पेश नहीं किया गया है। इसमें उन सोच, क्रिएटिविटी, सांस्कृतिक समझ और मानवीय जुड़ाव को सामने लाने की कोशिश की गई है, जिसकी वजह से ये कैंपेन लोगों को लंबे समय तक याद रहे। इस तरह Pidilite ने एनुअल रिपोर्ट को एक कॉरपोरेट पब्लिकेशन से आगे बढ़ाकर भारतीय विज्ञापन इतिहास के एक दस्तावेज जैसा बना दिया है।
रिपोर्ट का आखिरी अध्याय, जिसका नाम बिल्कुल सही तरीके से End of an Era रखा गया है, पीयूष पांडेय को भारतीय विज्ञापन में उनके योगदान के लिए सम्मानित करते हुए इस पूरी श्रद्धांजलि को एक साथ जोड़ता है। Pidilite, उसके बोर्ड, Ogilvy, Prasoon पीयूष पांडेय और इस लंबे जुड़ाव का हिस्सा रहे दूसरे लोगों के योगदान ने इस रिपोर्ट को सिर्फ एक कॉरपोरेट पब्लिकेशन नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक सामूहिक श्रद्धांजलि में बदल दिया है।
इसमें दूसरी कंपनियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीख है।
एनुअल रिपोर्ट्स को अक्सर ऐसे दस्तावेज के तौर पर देखा जाता है, जिनका मुख्य उद्देश्य शेयरहोल्डर्स और एनालिस्ट्स को जानकारी देना होता है। लेकिन किसी कंपनी की एनुअल रिपोर्ट उसकी कॉरपोरेट पहचान और व्यक्तित्व को सामने रखने का एक माध्यम भी बन सकती है। यह ऐसी कहानियां बता सकती है, जिन्हें सिर्फ आंकड़ों के जरिए नहीं बताया जा सकता। आज जब लोग हर दिन बड़ी मात्रा में कंटेंट देख रहे हैं, ऐसे में कुछ ऐसा तैयार करना जिसे लोग संभालकर रखना, देखना और दूसरों के साथ शेयर करना चाहें, अपने आप में कम्युनिकेशन का एक प्रभावी तरीका बन सकता है।
Pidilite ने यह भी दिखाया है कि कॉरपोरेट विरासत को आज के समय के हिसाब से कैसे पेश किया जा सकता है। सिर्फ कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन की बात करने के बजाय, रिपोर्ट कंपनी की सांस्कृतिक और क्रिएटिव विरासत के एक महत्वपूर्ण हिस्से का जश्न मनाती है। यह पाठकों को याद दिलाती है कि सफल ब्रैंड्स के पीछे सिर्फ आंकड़े नहीं होते, बल्कि लोग, आइडिया, जोखिम, असफलताएं और दशकों तक चलने वाले क्रिएटिव प्रयोग भी होते हैं।
इस विचार को आगे बढ़ाने की भी काफी संभावना है। आखिर यह श्रद्धांजलि सिर्फ एनुअल रिपोर्ट तक ही सीमित क्यों रहे? Pidilite संभावित तौर पर इस क्रिएटिव विरासत को एक खूबसूरती से डिजाइन किए गए कैलेंडर में बदल सकती है, जिसमें Fevicol और Fevikwik के सफर के कुछ सबसे यादगार कैंपेन शामिल हों। ऐसा कैलेंडर विज्ञापन एजेंसियों, ऑफिस, रिटेल आउटलेट्स और यहां तक कि विज्ञापन के शौकीन लोगों के घरों तक भी पहुंच सकता है।
इसके अलावा प्रदर्शनियां, डिजिटल आर्काइव, शॉर्ट फिल्में, सोशल मीडिया स्टोरीटेलिंग और यहां तक कि Pidilite के ब्रैंड्स के क्रिएटिव सफर को दिखाने वाली एक घूमने वाली प्रदर्शनी भी तैयार की जा सकती है। हर कैंपेन के पीछे एक कहानी है और हर कहानी लोगों से जुड़ने का एक नया मौका पैदा कर सकती है।
शायद यही इस एनुअल रिपोर्ट की सबसे बड़ी खासियत है। इसने ऐसे दस्तावेज को, जिसे आम तौर पर बैलेंस शीट, परफॉर्मेंस के आंकड़ों और शेयरहोल्डर्स के साथ कम्युनिकेशन से जोड़ा जाता है, एक भावनात्मक पहलू दे दिया है।
इस तरह Pidilite ने सिर्फ पीयूष पांडेय को सम्मान नहीं दिया है। उसने एक आइडिया की ताकत को भी सम्मान दिया है और कॉरपोरेट जगत को यह याद दिलाया है कि कई बार सबसे प्रभावी एनुअल रिपोर्ट वही होती है, जिसे लोग आंकड़े पढ़ लेने के काफी समय बाद भी याद रखते हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
जेन ज़ी की बदलती पसंद, डिजिटल आदतें और सांस्कृतिक जुड़ाव ब्रांडों, मीडिया और मार्केटिंग की रणनीतियों को नए तरीके से सोचने पर मजबूर कर रहे हैं।
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Samachar4media Bureau
गणपति विश्वनाथन, स्वतंत्र कम्युनिकेशन कंसल्टेंट।
भारत में नई पीढ़ी के रूप में जेन ज़ी (Gen Z) तेजी से उभर रही है और उसका असर ब्रांड, मीडिया और मार्केटिंग की रणनीतियों पर साफ दिखाई देने लगा है। हालिया सीजेपी (CJP) प्रदर्शन ने सोशल मीडिया पर युवाओं की सक्रियता और उनकी अलग तरह की अभिव्यक्ति को सामने रखा। इससे यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि यह नई ऑडियंस कौन है और आने वाले समय में बाजार को किस तरह प्रभावित करेगी।
भारत में जेन ज़ी को सामान्य तौर पर 1990 के दशक के अंत से 2010 के शुरुआती वर्षों के बीच जन्मी पीढ़ी माना जाता है। इसमें लगभग 13 से 28 वर्ष की उम्र के युवा शामिल हैं। इनके लिए शिक्षा और करियर महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सीखने के तरीके बदल चुके हैं। स्कूल और कॉलेज के अलावा यूट्यूब, पॉडकास्ट, ऑनलाइन कोर्स और सोशल मीडिया क्रिएटर भी इनके ज्ञान के स्रोत बन गए हैं। यह पीढ़ी अच्छी कमाई के साथ स्वतंत्रता, लचीलापन, अनुभव और अपनी पसंद से जीवन जीने को भी महत्व देती है। उद्यमिता, फ्रीलांसिंग और क्रिएटर इकॉनमी जैसे विकल्प भी इन्हें आकर्षित कर रहे हैं। इनके रोल मॉडल भी बदल रहे हैं। फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के साथ-साथ कारोबारी, गेमर, संगीतकार और ऑनलाइन कंटेंट क्रिएटर भी इनके लिए प्रभावशाली बन चुके हैं।
स्मार्टफोन इनके जीवन का केंद्र है, लेकिन इनके डिजिटल संसार में ईयरबड्स, स्मार्टवॉच, लैपटॉप, टैबलेट और गेमिंग डिवाइस भी शामिल हैं। खरीदारी से पहले ये ऑनलाइन रिसर्च, रिव्यू, कीमतों की तुलना और क्रिएटर की राय देखते हैं। इसलिए इन्हें केवल उपभोक्ता मानना पर्याप्त नहीं है। ये सवाल करते हैं, तुलना करते हैं, टिप्पणी करते हैं और अपने अनुभव साझा करते हैं। यही वजह है कि पारंपरिक आय, उम्र, शिक्षा और स्थान आधारित टारगेट ऑडियंस की परिभाषा बदल रही है। अब डिजिटल व्यवहार और तकनीक के इस्तेमाल को भी समझना जरूरी हो गया है।
भारत की जेन ज़ी को केवल पश्चिमी नजरिए से समझना भी सही नहीं होगा। भाषा, खान-पान, संगीत, फैशन, त्योहार और स्थानीय संस्कृति इनके लिए महत्वपूर्ण हैं। एक युवा वैश्विक कंटेंट देखने के साथ अपनी भाषा और परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा रह सकता है। ब्रांडों के लिए चुनौती यह है कि वे युवाओं की भाषा की नकल करने के बजाय उनके मूल व्यवहार और मूल्यों को समझें। इन्फ्लुएंसर, शॉर्ट वीडियो, गेमिंग, मीम, समुदाय और यूजर-जेनरेटेड कंटेंट इसके महत्वपूर्ण माध्यम बन रहे हैं। लेकिन जेन ज़ी बनावटीपन को जल्दी पहचान लेती है और ब्रांड से बातचीत में भागीदारी चाहती है।
एआई (AI) भी इस बदलाव को और तेज कर सकता है। इससे ब्रांड बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं के व्यवहार और रुचियों का विश्लेषण कर सकते हैं, लेकिन आंकड़े यह बता सकते हैं कि लोग क्या कर रहे हैं, हमेशा यह नहीं बता सकते कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। इसलिए मानवीय समझ जरूरी रहेगी। जेन ज़ी सिर्फ एक नई टारगेट ऑडियंस नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि भविष्य की ऑडियंस उम्र या आय से ज्यादा डिजिटल व्यवहार, संस्कृति, रुचियों, आकांक्षाओं और तकनीक से जुड़ाव के आधार पर पहचानी जाएगी। यही बदलाव ब्रांडों के लिए सबसे बड़ा अवसर और चुनौती है।
(गणपति विश्वनाथन 'मास्टरिंग द मैसेज' पुस्तक के लेखक हैं और यह उनके निजी विचार हैं।)
अब सवाल है कि क्या यह कमाई छोड़ी जा सकती है? रिजर्व बैंक हर साल नोट छापने पर करीब 5 हजार करोड़ रुपये खर्च करता है तो डिजिटल पेमेंट के लिए सब्सिडी देने में क्या हर्ज है?
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मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
यूपीआई (UPI) यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface) से पेमेंट करते हैं तो अभी कोई चार्ज नहीं लगता है। लेकिन आप क्रेडिट या डेबिट कार्ड से पेमेंट करते हैं तो दुकानदार को चार्ज सर्विस प्रोवाइडर (Visa, MasterCard) को देना पड़ता है। अगर यही पेमेंट आप RuPay कार्ड से करते हैं तो कोई चार्ज नहीं लगता है। कानून में प्रस्तावित बदलाव के बाद UPI और RuPay कार्ड पर भी चार्ज लग सकता है, लेकिन वो आपको नहीं, दुकानदार को चुकाना पड़ेगा।
हफ्ते भर से सोशल मीडिया पर बहस चल रही है कि UPI फ्री नहीं रहेगा। सरकार रोजाना सफाई दे रही है। दरअसल, लोकसभा ने कानून पारित कर दिया है कि UPI और RuPay पेमेंट पर अब MDR यानी Merchant Discount Rate लग सकता है। यह चार्ज दुकानदार या कोई भी कंपनी सर्विस प्रोवाइडर को देती है। 2020 से पहले RuPay और UPI पर भी MDR लगता था। यह चार्ज लेनदेन में शामिल बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और NPCI के बीच बंटता था। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (National Payments Corporation of India) यानी NPCI ही UPI का संचालन करता है।
सरकार ने स्वदेशी पेमेंट सिस्टम को बढ़ावा देने के लिए इस पर MDR जीरो कर दिया था। अमेरिकी कंपनी Visa और MasterCard को यह छूट नहीं मिली। MDR हटाने का बहुत बड़ा फायदा हुआ। UPI से आज हर रोज करीब 75 करोड़ पेमेंट हो रहे हैं, जबकि 5 साल पहले यह आंकड़ा करीब 10 करोड़ था। UPI से अब हर रोज करीब 1 लाख करोड़ रुपये का पेमेंट हो रहा है, जबकि 5 साल पहले यह आंकड़ा करीब 20 हजार करोड़ रुपये था।
UPI को चलाने का खर्च पेमेंट कंपनियां और बैंक उठा रही हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुमान के मुताबिक, यह खर्च करीब 20 हजार करोड़ रुपये है। सरकार हर साल करीब 2 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी देती है। UPI को चलाने के लिए सर्वर और टेक्नोलॉजी का खर्च होता है। जैसे-जैसे UPI का इस्तेमाल बढ़ रहा है, यह खर्च भी बढ़ता जा रहा है। सिस्टम अपग्रेड करने की जरूरत है। पिछले साल भर में कई बार UPI ठप होने की खबरें भी आई थीं।
रॉयटर्स के मुताबिक, MDR ₹2,000 से ज्यादा के लेनदेन पर ही विचार किया जा रहा है। यह चार्ज भी उन दुकानदारों या कंपनियों पर लगेगा, जिनका टर्नओवर डेढ़ करोड़ रुपये से ज्यादा है। सरकार का कहना है कि UPI पर MDR क्रेडिट और डेबिट कार्ड से कम होगा। यह रेट 0.3 से 0.5% होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसका मतलब हुआ कि ₹5,000 का सामान खरीदा तो ₹15 से ₹25 दुकानदार चुकाएगा। लोग एक-दूसरे से लेनदेन करेंगे तो उन्हें कोई चार्ज नहीं लगेगा, चाहे अमाउंट कितना भी हो।
अभी ₹2,000 से ज्यादा के UPI पेमेंट हर दिन 100 में से 4 ही होते हैं, लेकिन इसकी वैल्यू 100 रुपये में से ₹67 होती है। जेफरीज (Jefferies) का अनुमान है कि MDR लगने से हर साल 5 से 10 हजार करोड़ रुपये की कमाई होगी। अब सवाल है कि क्या यह कमाई छोड़ी जा सकती है? रिजर्व बैंक हर साल नोट छापने पर करीब 5 हजार करोड़ रुपये खर्च करता है तो डिजिटल पेमेंट के लिए सब्सिडी देने में क्या हर्ज है? कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि रिजर्व बैंक सरकार को 2 लाख 86 हजार करोड़ रुपये डिविडेंड देता है, उसका एक हिस्सा सब्सिडी में दिया जाना चाहिए।
इसके साथ ही अमेरिका के दबाव की बात आ रही है। जयराम रमेश ने यह आरोप भी लगाया है कि RuPay के कारण अमेरिका की कंपनियों MasterCard और Visa को नुकसान हुआ है। इसी वजह से UPI और RuPay पर वापस MDR लाया जा रहा है। अमेरिका शिकायत कर चुका है कि उसकी कंपनियों को Level Playing Field नहीं मिल रही है। हालांकि, सरकार इस आरोप से इनकार करती है कि यह फैसला अमेरिका के दबाव में लिया जा रहा है।
वित्त मंत्री ने कहा कि रमेश दुष्प्रचार कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच इतना तय है कि फिलहाल आपके लिए UPI फ्री रहेगा। दुकानदार को जरूर पेमेंट करना पड़ सकता है। वैसे भी यह कानून राज्यसभा में पास होना है। फिर राष्ट्रपति को मंजूरी देनी है। इसके बाद रिजर्व बैंक और अन्य संस्थाओं को तय करना होगा कि कितना चार्ज लगेगा और कैसे लगेगा?
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
केंद्र और अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारें आने के बाद कॉलेजों, विश्वविद्यालयों अथवा उनके प्रशासनिक संस्थानों में हुई नियुक्तियों में भी कई लोग रखे गए हैं।
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Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस सप्ताह मुंबई में जेन जी और जेन-अल्फा कहे जाने वाले समूह से संवाद किया। उन्होंने कहा- हमें उनकी बात सुननी चाहिए। उनसे बातचीत में कमी थी, इसीलिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन हुआ। नीट पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के बाद इसे युवाओं के साथ संघ की ओर से सबसे अहम संवाद माना जा रहा है। उनका कहना है कि 'अगर सरकार ने पहले ही बात कर ली होती, तो आंदोलन की जरूरत नहीं होती। आंदोलन भी बातचीत का एक तरीका है। आंदोलन हमारे या आपके खिलाफ नहीं, बल्कि सिस्टम में सुधार के लिए होना चाहिए।'
इस तरह की पहल अच्छी है, क्योंकि केंद्र की भाजपा सरकार को संघ के साथ संबंधों को लेकर अधिक चर्चा होती है। यूं संघ दावा यही करता है कि वह सरकार के कामकाज में कोई हस्तक्षेप नहीं करता। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनके सहयोगी अमित शाह, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी सहित अधिकांश नेता संघ के ही शिक्षित-प्रशिक्षित हैं। सत्ता में आने के बाद दशकों से शिक्षा, संस्कृति जैसे क्षेत्रों में वामपंथी कम्युनिस्ट विचारों और उनके लोगों को बदलकर सरकार ने विभिन्न संस्थानों में समान विचार के लोगों की नियुक्तियां की हैं। इसलिए हाल के वर्षों में शिक्षा के क्षेत्रों में हुई गड़बड़ियों के आरोप कुछ लोगों पर लगते रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने पिछले लगभग 100 वर्षों में शिक्षा, समाजसेवा, महिला, युवा, जनजातीय, मजदूर, किसान, छात्र, धार्मिक एवं सेवा कार्यों के लिए अनेक स्वतंत्र संगठनों का निर्माण या प्रेरणा दी है। इन संगठनों का अपना अलग पंजीकरण, कार्यप्रणाली और नेतृत्व होता है, हालांकि इन्हें व्यापक रूप से "संघ परिवार" का हिस्सा माना जाता है। संघ की गतिविधियों को पत्रकार के रूप में 1971 से देखता रहा हूं और पूर्व संघ प्रमुखों के इंटरव्यू भी किए हैं। इसलिए सवाल उठता है कि छात्र आंदोलन और सरकार के बीच हुए तनाव और टकराव के दौरान संघ के इतने बड़े नेटवर्क, विद्यार्थी संगठन, शिक्षक समुदाय आदि ने कोई हस्तक्षेप क्यों नहीं किया? सरकार से भी संवादहीनता की बात कम से कम मेरे गले-दिमाग में नहीं उतर सकती। संघ से शिक्षा क्षेत्र में जुड़े संगठनों के दावों पर ही ध्यान दीजिए।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने 2025–26 में अपनी सदस्य संख्या 76,98,448 (लगभग 77 लाख) बताई है। यह संगठन का अब तक का सबसे बड़ा सदस्यता आंकड़ा बताया गया। स्वयं को भारत का सबसे बड़ा छात्र संगठन बताती है। यह विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र हित, शिक्षा सुधार, शोध, छात्रवृत्ति, परीक्षा, रोजगार तथा राष्ट्रीय विषयों पर अभियान चलाती है। समर्थक इसे सक्रिय छात्र संगठन मानते हैं, जबकि आलोचक इसके राजनीतिक और वैचारिक प्रभाव पर प्रश्न उठाते हैं।
इसी तरह संघ से जुड़े संगठन विद्या भारती द्वारा जारी नवीन आंकड़ों के अनुसार उनके 12,791 स्कूल में करीब 1 लाख 50 हजार शिक्षक और लगभग 32 लाख 50 हजार छात्र हैं। विद्यार्थी परिषद और विद्या भारती का नेटवर्क आकार की दृष्टि से भारत के सबसे बड़े छात्र एवं निजी शैक्षिक नेटवर्कों में से एक है। इनके शिक्षा में योगदान का मूल्यांकन अलग-अलग दृष्टिकोणों से किया जाता है—समर्थक इसे विद्यालय विस्तार, अनुशासन और संस्कार आधारित शिक्षा का महत्वपूर्ण मॉडल मानते हैं। यह बात स्वीकार की जानी चाहिए कि अनेक राज्यों में बोर्ड परीक्षाओं में इन स्कूलों के बच्चों के अच्छे परिणाम आए। संघ की ऐसी संस्थाओं से जनजातीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा का विस्तार हुआ। कोविड काल में डिजिटल शिक्षा अभियान में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। संघ से जुड़े एक और संगठन वनवासी कल्याण आश्रम ने पिछले 75 वर्षों के दौरान हजारों छात्रावास, विद्यालय एवं स्वास्थ्य परियोजनाएं चलाईं, जिसका लाभ आदिवासी इलाकों में हुआ। खासकर नक्सल प्रभावित अथवा पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय विदेशी मिशनरियों के प्रभाव को रोकने में इनकी सकारात्मक भूमिका रही।
II. संघ से जुड़े 12,654 अनौपचारिक शिक्षा केंद्रों में 11,143 शिक्षक तथा 2,45,403 छात्र हैं। मतलब औपचारिक और अनौपचारिक संस्थानों को मिलाकर लगभग 1.6 लाख शिक्षक इस नेटवर्क से जुड़े बताए जाते हैं। संघ से जुड़े बाल संस्कार केंद्र एवं एकल विद्यालय अभियान (ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों में एक शिक्षक मॉडल) से भी लाखों परिवारों को जोड़ा गया है। इन संगठनों का कहना है कि उनका उद्देश्य राष्ट्र निर्माण, सेवा, सांस्कृतिक संरक्षण और चरित्र निर्माण है तथा वे अपने कार्यों को सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से देखते हैं। संघ परिवार से जुड़े प्रत्यक्ष एवं प्रेरित संगठनों की संख्या 100 से अधिक मानी जाती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार में आने पर पूरी तैयारी के बाद 2020 में क्रांतिकारी बदलाव वाली नई शिक्षा नीति की घोषणा की। उसमें संघ की मूल विचारधारा का समावेश है। 2047 के "विकसित भारत" के लिए शिक्षा का एजेंडा केवल स्कूल-कॉलेजों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसमें ज्ञान, कौशल, रोजगार, शोध, तकनीक, भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा, नैतिक/संवैधानिक मूल्य और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को एक साथ जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। नीति आयोग के शिक्षा नीति @2047 दस्तावेज में शिक्षा को सीधे विकसित भारत की मानव क्षमता, उत्पादकता और सामाजिक गतिशीलता से जोड़ा गया है। दस्तावेज लगभग 25 करोड़ स्कूली और 4 करोड़ उच्च शिक्षा विद्यार्थियों के विशाल तंत्र का उल्लेख करता है और स्थानीय भाषाओं, व्यक्तिगत सीखने तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को महत्वपूर्ण मानता है।
संघ और उससे जुड़े शिक्षा-विचार में यह मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है कि भारतीय बच्चे अपनी भाषा और संस्कृति से कटकर शिक्षा न लें। नई शिक्षा नीति में भी मातृभाषा/स्थानीय भाषा में प्रारंभिक शिक्षा को महत्व दिया गया है। यहीं संघ और सामान्य सरकारी शिक्षा नीति के बीच सबसे स्पष्ट वैचारिक संबंध दिखाई देता है। संघ से जुड़े शिक्षा विमर्श में शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि, आधुनिक विज्ञान, चरित्र निर्माण तथा राष्ट्रबोध माना जाता है। इसी दिशा में भारतीय शिक्षा बोर्ड का उदाहरण महत्वपूर्ण है। उसके आधिकारिक दस्तावेजों में भारतीय संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा को जोड़ने की बात कही गई है। बहरहाल, 2047 की शिक्षा के लिए सबसे बेहतर मॉडल वह होगा जिसमें भारतीय परंपरा का अध्ययन भी हो और आधुनिक वैज्ञानिक सोच भी मजबूत हो।
केंद्र और अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारें आने के बाद कॉलेजों, विश्वविद्यालयों अथवा उनके प्रशासनिक संस्थानों में हुई नियुक्तियों में भी कई लोग रखे गए हैं। सभी संस्थानों के दावों को ठीक माना जाए तो युवा पीढ़ी में लगभग दो करोड़ लोग हैं। उनके परिवारों की सदस्य संख्या दस करोड़ तक हो सकती है। तब भी क्या शिक्षा क्षेत्रों की समस्याओं और गड़बड़ियों का पता नहीं चल सका? सांसदों, विधायकों, पार्षदों ने क्या भूमिका निभाई? इस दृष्टि से संघ और भाजपा को युवा असंतोष के समाधान में सहयोग के मुद्दे पर गंभीरता से अपने संगठनों और सत्ता से लाभान्वित हो रहे लोगों के कामकाज और रवैये की समीक्षा करना चाहिए। प्रतिपक्ष के राजनीतिक संगठनों की तरह केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को दोषी बता कथित स्वयंसेवकों द्वारा खुद अधिक लाभ पाने की कोशिशों और दबाव बनाने से भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। दस वर्षों में उन्हें मोदी सरकार से बहुत लाभ हुआ है। उनकी सुविधाओं में बढ़ोतरी हुई और समाज में अधिक महत्व मिलने लगा है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई के कार्यक्रम में माना है कि 'शिक्षा सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। सबको अपने-अपने स्तर पर सहयोग करना होगा। हमने देखा है कि कई गांवों के स्थानीय लोगों ने बच्चों की शिक्षा के लिए मिलजुलकर अच्छे प्रयास किए हैं।'
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है।
by
Samachar4media Bureau
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
भारतीय समाज में किसी नए प्रयोग को लेकर इतनी स्वीकार्यता कभी नहीं थी, जितनी कम समय में सोशल मीडिया ने अर्जित की है। जब इसे सोशल मीडिया कहा गया तो कई विद्वानों ने पूछा “अरे भाई क्या बाकी मीडिया अनसोशल है? अगर वे भी सामाजिक हैं,तो यह सामाजिक मीडिया कैसे?” किंतु समय ने साबित किया कि यह वास्तव में सोशल मीडिया है। अब उससे आगे डीफफेक ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है।
जनरेटिव एआई और डीपफेक टूल्स की मदद से अब किसी भी व्यक्ति का फर्जी वीडियो या ऑडियो बनाना बेहद आसान और सस्ता हो गया है। कुछ ही सेकंड के ऑडियो या वीडियो सैंपल से तैयार यह तकनीक आम आदमी से लेकर दिग्गजों तक की पहचान के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।
सृजनात्मकता का विस्फोट-
पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है। दृश्य, विचार, कमेंट् और निजी सृजनात्मकता के अनुभव जब यहां तैरने शुरू हुए तो लोकतंत्र के पहरूओं और सरकारों का भी इसका अहसास हुआ। आज वे सब भी अपनी सामाजिकता के विस्तार के लिए सोशल मीडिया पर आ चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं भी कहा कि “सोशल मीडिया नहीं होता तो हिंदुस्तान की क्रियेटिविटी का पता ही नहीं चलता।”
सोशल मीडिया अपने स्वभाव में ही बेहद लोकतांत्रिक है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग और रंग की सीमाएं तोड़कर इसने न सिर्फ पारंपरिक मीडिया को चुनौती दी है वरन् यह सही मायने में आम आदमी का माध्यम बन गया है। इसने संवाद को निंरतर, समय से पार और लगातार बना दिया है। इसने न सिर्फ आपकी निजता को स्थापित किया है वरन एकांत को भी भर दिया है।
निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही-
सूचनाएं आज मुक्त हैं और वे इंटरनेट के पंखों पर उड़ रही हैं। सूचना 21 वीं सदी की सबसे बड़ी ताकत बनी तो सोशल मीडिया, सभी उपलब्ध मीडिया माध्यमों में सबसे लोकप्रिय माध्यम बन गया। सूचनाएं अब ताकतवर देशों, बड़ी कंपनियों और धनपतियों द्वारा चलाए जा रहे प्रचार माध्यमों की मोहताज नहीं रहीं। वे कभी भी वायरल हो सकती हैं और कहीं से भी वैश्विक हो सकती हैं। स्नोडेन और जूलियन असांजे को याद कीजिए। सूचनाओं ने अपना अलग गणतंत्र रच लिया है। निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही है। वार्तालाप अब वैश्विक हो रहे हैं।
इस आभासी दुनिया में आपका होना ही आपको पहचान दिला रहा है। “ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय” कहने वाले देश में अब एक वाक्य का विचार क्रांति बन रहा है। यही विचार की ताकत है कि वह किताबों और विद्वानों के इंतजार में नहीं है।
सोशल साइट्स का समाजशास्त्र अलग है। यहां ट्वीट फैशन भी है और सामाजिक काम भी। फेसबुक और ट्विटर नए गणराज्य हैं। निजी जिंदगी से लेकर जनांदोलन और चुनावों तक अपनी गंभीर मौजूदगी को दर्ज करवा रहा ये माध्यम, सबको आवाज और सबकी वाणी देने के संकल्प से लबरेज है। कंप्यूटर से आगे अब स्मार्ट होते मोबाइल इसे गति दे रहे हैं। यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी-
अपने तमाम नकारात्मक प्रभावों के बावजूद इसके उपयोग के प्रति बढ़ती ललक बताती है कि सोशल मीडिया का यह असर अभी और बढ़ने वाला है। यह मान लेने में हिचक नहीं करनी चाहिए कि यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी। झूठ, बेईमानी, अपराध और बेवफाई के किस्से हैं तो दूसरी तरफ निभ रही दोस्तियों की लंबी कहानियां हैं। हो चुकी और चल रही शादियों की लंबी श्रृंखला है। कभी किसी भी माध्यम के प्रति इतना स्वागत भाव नहीं था।
फिल्में आई तो अच्छे घरों के लोग न इसमें काम करते थे, ना ही वे फिल्में देखने जाते थे। मां-पिता से छिपकर युवा सिनेमा देखने जाते थे। टीवी आया तो उसे भी इडियट बाक्स कहा गया। टीवी को लगातार देखते हुए भी हिंदुस्तान उसके प्रति आलोचना के भाव से भरा रहा और आज भी है। किंतु सोशल मीडिया के प्रति आरंभ से ही स्वागत भाव है। इसके प्रति समाज में अस्वीकृति नहीं दिखती क्योंकि यह कहीं न कहीं संबंधों का विस्तार कर रहा है। संवाद की गुंजाइश बना रहा है। रहिए कनेक्ट के नारे को साकार कर रहा है। इसके सही और सार्थक इस्तेमाल से छवियां गढ़ी जा रही हैं, चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं।
इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा किसी भी माध्यम का गलत इस्तेमाल हमें संकट में ही डालता है। यह समय इंफारमेशन वारफेयर का भी है और साइको वारफेयर का भी। इस दौर में सूचनाएं मुक्त हैं और प्रभावित कर रही हैं। यहां संपादक अनुपस्थित है और रिर्पोटर भी प्रामाणिक नहीं हैं। इसलिए सूचनाओं की वास्तविकता भी जांची जानी चाहिए। कई बार जो संकट खड़े हो रहे हैं, वह वास्तविकता से दूर होते हैं। सोशल मीडिया की पहुंच और प्रभाव को देखते हुए यहां दी जा रही सूचनाओं के सावधान इस्तेमाल की जरूरत भी महसूस की जाती है।
इसे अफवाहें, तनाव और वैमनस्य फैलाने का माध्यम बनाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। चुनावों या संवेदनशील राजनीतिक मौकों पर राजनेताओं के फर्जी भाषणों या बयानों वाले डीपफेक वीडियो का प्रसार मतदाताओं को भ्रमित कर सकता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्पक्षता और जनमत को गलत दिशा में मोड़ने का एक खतरनाक हथियार बनता जा रहा है।
वॉयस क्लोनिंग (आवाज की नकल) और वीडियो डीपफेक का उपयोग करके अब कॉरपोरेट घरानों, बैंकों और आम नागरिकों को चूना लगाने के मामले तेजी से बढ़े हैं। ठग फेक आइडेंटिटी के जरिए बड़ी आर्थिक धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे हैं। हालांकि डीपफेक और भ्रामक कृत्रिम सामग्री (SGI) पर लगाम कसने के लिए अब कानूनों को सख्त किया गया है। इसके तहत एआई-जनित फोटो, वीडियो या ऑडियो पर स्पष्ट 'डिजिटल स्टैम्प' या लेबल लगाना अनिवार्य किया गया है ताकि उपयोगकर्ता पहली नजर में पहचान सकें।
शक्ति का हो सार्थक इस्तेमाल-
सोशल मीडिया में समरस और मानवीय समाज की रचना की शक्ति छिपी है। किंतु उसकी यह संभावना उसके इस्तेमाल करने वालों में छिपी हुयी है। इसका सही इस्तेमाल ही हमें इसके वास्तविक लाभ दिला सकता है। सामाजिक सवालों पर जागरूकता और जनचेतना के जागरण में भी यह माध्यम सहायक सिद्ध हो सकता है। आम चुनावों में राजनीतिक दलों ने इस माध्यम की ताकत को इस्तेमाल किया और समझा है। आज युवा शक्ति के इस माध्यम में बड़ी उपस्थित के चलते इसे सामाजिक बदलाव और परिवर्तन का वाहक भी माना जा रहा है।
सकात्मकता से भरे-पूरे युवा और सामाजिक सोच से लैस लोग इस माध्यम से उपजी शक्ति को भारत के निर्माण में लगा सकते हैं। ऐसे समय में जब सोशल मीडिया की शक्ति का प्रगटीकरण साफ है, हमें इसके सावधान, सतर्क और समाज के लिए उपयोगी प्रयोगों की तरफ बढ़ने की जरूरत है। यदि ऐसा संभव हो सका तो सोशल मीडिया की शक्ति हमारे लोकतंत्र के लिए वरदान साबित हो सकती है।
डीपफेक का सबसे बुरा शिकार अक्सर महिलाएं और प्रसिद्ध हस्तियां हो रही हैं, जिनकी तस्वीरें या वीडियो का गलत इस्तेमाल करके उनकी मानहानि या ऑनलाइन उत्पीड़न किया जाता है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा पर सीधा हमला है।
एंगेजमेंट की भूख से बढ़ता खतरा-
सोशल मीडिया के एल्गोरिदम 'एंगेजमेंट' (व्यूज और लाइक्स) के भूखे होते हैं। झूठी और सनसनीखेज खबरें सच की तुलना में तेजी से फैलती हैं, जिससे सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का कारोबार फल-फूल रहा है। यह केवल सरकारों या टेक कंपनियों की लड़ाई नहीं है। मुख्यधारा के मीडिया और जागरूक नागरिकों को आगे आकर फेक नैरेटिव्स का खंडन करना होगा और तकनीक के सकारात्मक इस्तेमाल को बढ़ावा देते हुए एक सुरक्षित डिजिटल स्पेस का निर्माण करना होगा।
पारंपरिक कहावत "आंखों देखी पर विश्वास करो" अब डिजिटल युग में दम तोड़ रही है। जब वीडियो और तस्वीरों पर से लोगों का भरोसा उठ जाता है, तो समाज में हर प्रामाणिक और सच्ची घटना पर भी शक का माहौल पैदा होने लगता है। सोशल मीडिया ने अपनी लोकप्रियता के साथ भरोसे का संकट भी खड़ा किया है, इसमें दो राय नहीं है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
'मीडिया संवाद' कार्यक्रम में 'एआई के दौर का न्यूज़रूम: रफ्तार, भरोसा और पत्रकारिता का भविष्य' विषय पर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की गई।
by
Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के 40 अंडर 40 सम्मान समारोह के तहत 28 जुलाई को आयोजित 'मीडिया संवाद' कार्यक्रम में 'एआई के दौर का न्यूज़रूम: रफ्तार, भरोसा और पत्रकारिता का भविष्य' विषय पर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा का संचालन समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा ने किया। पैनल में जी डिजिटल (आईडीपीएल) के ग्रुप एडिटर अनुज खरे, जया कौशिक रिपोर्ट्स की संस्थापक जया कौशिक और दैनिक जागरण के दिल्ली प्रमुख स्वदेश कुमार शामिल हुए।
चर्चा की शुरुआत करते हुए पंकज शर्मा ने कहा कि आज एआई तेजी से न्यूज़रूम का हिस्सा बनता जा रहा है। स्क्रिप्ट लिखने से लेकर वीडियो एडिटिंग तक कई काम अब एआई की मदद से हो रहे हैं। लेकिन इसके साथ पत्रकारिता की विश्वसनीयता, रफ्तार और भविष्य जैसे कई बड़े सवाल भी खड़े हो रहे हैं। इसी विषय पर उन्होंने सभी वक्ताओं से उनके अनुभव और राय साझा करने को कहा।
सबसे पहले बोलते हुए अनुज खरे ने कहा कि पिछले एक साल में एआई ने न्यूज़रूम की कार्यप्रणाली पूरी तरह बदल दी है। पहले जिन कामों में घंटों लगते थे, वे अब कुछ मिनटों में पूरे हो जाते हैं। बड़ी रिपोर्टों का सार निकालना, लीगल दस्तावेज़ समझना और डेटा जुटाना बेहद आसान हो गया है। लेकिन इसके साथ सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। उन्होंने कहा कि एआई कई बार गलत जानकारी या 'हैलुसिनेशन' भी देता है और अगर पत्रकार के पास विषय की मूल समझ नहीं होगी तो वह गलत जानकारी को ही सही मानकर प्रकाशित कर सकता है। यही कारण है कि आज स्पीड बढ़ी है, लेकिन भरोसा कम हुआ है। उन्होंने कहा कि पहले खबर कई स्तरों पर जांच के बाद प्रकाशित होती थी, जबकि अब कुछ मिनटों में खबर प्रकाशित हो जाती है और बाद में उसे हटाना पड़ता है, जिससे मीडिया की साख प्रभावित होती है।
जया कौशिक ने कहा कि एआई ने टीवी न्यूज़रूम में भी गहरी पैठ बना ली है। अब कई जगह रनडाउन, स्क्रिप्ट और एंकर लिंक तक एल्गोरिद्म के आधार पर तैयार होने लगे हैं। उनके मुताबिक एआई का सबसे बड़ा नकारात्मक पक्ष यह है कि वह पत्रकार की कल्पनाशीलता और सोचने की क्षमता को धीरे-धीरे कम कर सकता है। पहले पत्रकार कई स्रोतों से जानकारी जुटाकर अपनी समझ विकसित करता था, जबकि अब लोग सीधे एआई के जवाबों पर निर्भर हो रहे हैं। हालांकि उन्होंने माना कि एआई बैकग्राउंड डेटा, रिसर्च और तकनीकी कार्यों में काफी मददगार साबित हो रहा है।
जया कौशिक ने जोर देकर कहा कि एआई कभी भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने दिल्ली बाढ़ की अपनी रिपोर्टिंग का उदाहरण देते हुए बताया कि एआई पानी का स्तर तो बता सकता है, लेकिन बाढ़ से प्रभावित लोगों का दर्द, श्मशान घाटों की स्थिति और लोगों की भावनाओं को महसूस नहीं कर सकता। उनके मुताबिक पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवेदनशीलता और जमीन पर जाकर सच देखने की क्षमता है।
दैनिक जागरण के दिल्ली प्रमुख स्वदेश कुमार ने कहा कि प्रिंट मीडिया में एआई फिलहाल एक सहायक की भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि डेटा जुटाने और जानकारी खोजने में जरूर समय बचता है, लेकिन खबर की प्राथमिकता तय करना, उसका नजरिया बनाना और उसे किस स्थान पर प्रकाशित करना है, यह काम आज भी इंसान ही कर सकता है। उन्होंने भरोसा जताया कि अखबार अपनी विश्वसनीयता के कारण आगे भी मजबूती से बने रहेंगे।
ब्रेकिंग न्यूज़ में एआई की भूमिका पर जया कौशिक ने कहा कि जल्दबाजी सबसे बड़ा खतरा है। उन्होंने हाल के एक एआई एडिटेड वीडियो का उदाहरण देते हुए कहा कि पत्रकार की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है। किसी भी वीडियो या दावे को प्रसारित करने से पहले मंत्रालय की वेबसाइट, आधिकारिक सोशल मीडिया और अपने विश्वसनीय स्रोतों से उसका सत्यापन करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि विश्वसनीय मीडिया संस्थान आज भी स्पीड से ज्यादा सत्यापन को प्राथमिकता देते हैं।
अनुज खरे ने कहा कि एआई हेडलाइन लिख सकता है, वीडियो बना सकता है और ट्रेंडिंग विषय बता सकता है, लेकिन वह कभी न्यूज़ जजमेंट विकसित नहीं कर सकता। कौन सी खबर सबसे महत्वपूर्ण है, किस एंगल से पेश करनी है और किसे प्रमुखता देनी है, इसका फैसला हमेशा संपादक ही करेगा। उन्होंने कहा कि एआई केवल सुझाव दे सकता है, अंतिम निर्णय इंसान का ही रहेगा क्योंकि उसके पीछे अनुभव, समझ और भावनात्मक दृष्टि होती है।
इस दौरान जया कौशिक ने यह भी चिंता जताई कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अनुभवी संपादकों की भूमिका धीरे-धीरे कम होती जा रही है। कई संस्थान युवा पत्रकारों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि वरिष्ठ संपादकों के अनुभव का पूरा लाभ नहीं उठाया जा रहा। उनके अनुसार पत्रकारिता में अनुभव और संपादकीय समझ की अहमियत हमेशा बनी रहनी चाहिए।
स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए जया कौशिक ने कहा कि वह एआई का उपयोग करती हैं, लेकिन उसे केवल सहायक के रूप में रखती हैं। उनके अनुसार एआई ड्राइविंग सीट पर नहीं, बल्कि बैक सीट पर होना चाहिए। अंतिम फैसला पत्रकार का होना चाहिए, क्योंकि पत्रकार की विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है।
पत्रकार की पहचान पर स्वदेश कुमार ने कहा कि भविष्य में वही पत्रकार सफल होगा जो मौलिक और एक्सक्लूसिव रिपोर्टिंग करेगा। एआई इंटरनेट पर मौजूद सामग्री ही जुटा सकता है, लेकिन किसी घटना का वास्तविक परिप्रेक्ष्य, भीड़ का आकलन, माहौल और जमीन की सच्चाई केवल रिपोर्टर ही सामने ला सकता है।
इस बात का समर्थन करते हुए अनुज खरे ने कहा कि आज डिजिटल दुनिया में अधिकांश सामग्री एक जैसी है। ऐसे में गूगल भी अब केवल मौलिक, ग्राउंड रिपोर्टिंग और इंटरव्यू आधारित कंटेंट को प्राथमिकता दे रहा है। उन्होंने बताया कि हाल के गूगल कोर अपडेट के बाद बड़ी संख्या में वेबसाइटों की पहुंच कम हो गई क्योंकि उनके पास अलग और मौलिक सामग्री नहीं थी। आने वाले समय में वही मीडिया संस्थान टिक पाएंगे जो ओरिजिनल कंटेंट पर निवेश करेंगे।
जब पंकज शर्मा ने पूछा कि अगर न्यूज़रूम में एआई का इस्तेमाल बंद हो जाए तो सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा, तो अनुज खरे ने कहा कि जिन लोगों ने पूरी तरह एआई पर निर्भरता बना ली है, उन्हें सबसे अधिक दिक्कत होगी। वहीं जया कौशिक ने कहा कि इससे कई लोगों की नौकरियां बच सकती हैं, खासकर ग्राफिक डिजाइन जैसे क्षेत्रों में। उन्होंने यह भी कहा कि स्पीड थोड़ी कम होगी, लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता बढ़ेगी और रिपोर्टर आधारित पत्रकारिता को फिर से महत्व मिलेगा।
स्वदेश कुमार ने कहा कि उनके संस्थान में एआई के उपयोग को बढ़ावा दिया गया है, लेकिन प्रिंट टीम ने उसकी कई कमियां सामने आने के कारण अभी तक उसे पूरी तरह नहीं अपनाया है। उनके अनुसार एआई हटने से केवल डेटा जुटाने में थोड़ा अधिक समय लगेगा, बाकी पत्रकारिता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
एक अन्य सवाल के जवाब में स्वदेश कुमार ने बताया कि अब कई मीडिया संस्थान अपने-अपने एआई टूल विकसित कर रहे हैं, जिससे सभी संस्थानों का काम पूरी तरह एक जैसा नहीं होगा। वहीं अनुज खरे ने कहा कि एआई का अंधाधुंध उपयोग कई बार कंटेंट को हास्यास्पद बना देता है। इसलिए यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि कौन-सा कंटेंट एआई से तैयार किया गया है। उनके अनुसार पारदर्शिता और निष्पक्षता पत्रकारिता की बुनियादी शर्त है।
डीपफेक और फेक न्यूज़ की चुनौती पर अनुज खरे ने कहा कि आज कई तकनीकी टूल उपलब्ध हैं जो फर्जी फोटो, वीडियो और ऑडियो की पहचान कर सकते हैं। कई मीडिया संस्थान अपने फैक्ट-चेकिंग सिस्टम भी विकसित कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती जल्दबाजी है। कई बार सत्यापन पूरा होने से पहले ही कंटेंट प्रकाशित हो जाता है। उन्होंने कहा कि यदि विश्वसनीयता बचानी है तो मीडिया संस्थानों को स्पीड से ज्यादा सत्यापन को महत्व देना होगा।
युवा पत्रकारों में सबसे महत्वपूर्ण गुण पर स्वदेश कुमार ने कहा कि अब केवल अच्छा लिखना पर्याप्त नहीं है। पत्रकार को 360 डिग्री स्किल्स के साथ काम करना होगा। उसे प्रिंट, डिजिटल और वीडियो- तीनों माध्यमों में दक्ष होना चाहिए। उन्होंने बताया कि हाल ही में एक इंटर्न ने जंतर-मंतर से इतनी प्रभावी रिपोर्टिंग की कि वह अनुभवी पत्रकारों से भी बेहतर लगी।
चर्चा के अंत में जया कौशिक ने कहा कि आने वाले 10 वर्षों में एआई चाहे जितना विकसित हो जाए, लेकिन पत्रकार की संवेदनशीलता और उसकी विश्वसनीयता को मशीन कभी नहीं बदल सकती। समापन करते हुए पंकज शर्मा ने कहा कि आज लगभग हर न्यूज़रूम एआई का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन कुछ ऐसे क्षेत्र हमेशा रहेंगे जहां इंसानी दखल अनिवार्य रहेगा। उन्होंने सभी वक्ताओं का कार्यक्रम में शामिल होकर अपने विचार साझा करने के लिए आभार व्यक्त किया।
सरकार ने समय-समय पर संसद में जो जानकारी दी है उसके अनुसार पहले राउंड में करीब 8 हज़ार युवाओं को इंटर्नशिप मिली, दूसरे राउंड में करीब 7 हज़ार, युवाओं को इंटर्नशिप के लिए घर के पास ही मौक़े चाहिए थे।
by
Samachar4media Bureau
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
5 साल में 1 करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप देने का वादा किया गया था, लेकिन दो साल में केवल 26 हज़ार युवाओं को ही इसका लाभ मिल सका है। यह घोषणा वित्त मंत्री ने जुलाई 2024 के बजट में की थी, जब 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला था और युवा असंतोष को एक बड़ा मुद्दा माना जा रहा था। प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना के तहत 500 बड़ी कंपनियों में 12 महीने की इंटर्नशिप और हर महीने ₹5,000 का स्टाइपेंड देने का प्रावधान किया गया था, ताकि युवाओं को करियर की शुरुआत में ही काम का अनुभव मिल सके।
सरकार के संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार पहले चरण में करीब 8 हज़ार, दूसरे चरण में करीब 7 हज़ार और तीसरे चरण में लगभग 11 हज़ार युवाओं को इंटर्नशिप मिली। युवाओं की मांग थी कि उन्हें अपने घर के आसपास ही इंटर्नशिप के अवसर मिलें, जिसे योजना की सबसे बड़ी चुनौती माना गया। इसके बाद सरकार ने योजना का दायरा छोटी कंपनियों तक बढ़ाया और स्टाइपेंड बढ़ाकर ₹9,000 कर दिया। इसके बावजूद दो साल में केवल 26 हज़ार युवाओं तक ही योजना पहुंच सकी, जबकि लक्ष्य 30 लाख का था।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगले तीन साल में सरकार 99 लाख से अधिक युवाओं को इंटर्नशिप कैसे उपलब्ध कराएगी। जब यह योजना शुरू हुई थी, तभी इस लक्ष्य की व्यवहारिकता पर सवाल उठे थे। देश की 500 बड़ी कंपनियों में पहले करीब 70 लाख कर्मचारी थे, जो अब बढ़कर लगभग 84 लाख हो गए हैं। ऐसे में हर साल 15 से 20 लाख इंटर्न रखने की क्षमता इन कंपनियों में है या नहीं, यह बड़ा प्रश्न बना हुआ है। यह स्थिति दिखाती है कि सरकारी योजनाएं कागज़ों पर तो बन जाती हैं, लेकिन उन्हें ज़मीन पर लागू करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। बेरोज़गारी का मुद्दा आज भी जस का तस बना हुआ है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
इससे स्पष्ट होता है कि पुलिस का जोखिम केवल गोली या पत्थर तक सीमित नहीं है, बल्कि महामारी, संक्रमण, लंबी ड्यूटी और मानसिक तनाव भी उनकी सेवा का हिस्सा हैं।
by
Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
दिल्ली में छात्र आंदोलन के अंतिम चरण में उग्र भीड़ और पुलिस के टकराव ने एक गंभीर विवाद पैदा कर दिया। छात्रों और उनके समर्थकों के अलावा असामाजिक तत्वों तथा अपराधियों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर राहुल गांधी और उनके गठबंधन के नेताओं ने बर्बर लाठीचार्ज, गोलीबारी और हजारों लोगों के घायल होने जैसे अनर्गल आरोप संसद से लेकर सड़क तक लगाए। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के बाद अब देश के गृह मंत्री अमित शाह को भी पुलिस की कथित ज्यादती का दोषी ठहराकर उनका इस्तीफा मांगा जा रहा है।
असली निशाना तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। प्रतिपक्ष यह क्यों भूल जाता है कि यदि अगली बार पुलिस हिंसक भीड़ को संसद या विधानसभा में घुसने से रोकने के बजाय लाठी, आंसू गैस और बंदूक नीचे रख दे, तो क्या स्थिति होगी? यदि पुलिस किसी राज्य में अपनी सुरक्षा और सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतर जाए, तो नेताओं और जनता का क्या होगा?
राहुल गांधी को उनके पालतू सलाहकार या अमेरिकी अंकल शायद न जानते हों, लेकिन पुराने कांग्रेसी 1973 में कांग्रेस शासन के दौरान प्रादेशिक सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) के आंदोलन की जानकारी अवश्य रखते होंगे। तब कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सेना बुलाने की गुहार लगानी पड़ी थी। सेना की कार्रवाई में करीब 35 पुलिसकर्मी मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। अंततः मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और राष्ट्रपति शासन लगाकर स्थिति पर नियंत्रण किया गया।
दिल्ली का रामलीला मैदान और जंतर-मंतर लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध और असहमति की आवाज उठाने के प्रमुख स्थल रहे हैं। अन्ना आंदोलन से लेकर किसानों, पहलवानों, छात्रों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के आंदोलनों तक यहां प्रदर्शन होते रहे हैं।
इसलिए इन्हें लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। लेकिन हाल ही में अमेरिका से उतरी कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा छात्रों की परीक्षाओं में गड़बड़ियां रोकने की मांग को लेकर 20 जुलाई 2026 को आयोजित "संसद चलो" प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर और नई दिल्ली क्षेत्र में पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच गंभीर टकराव हुआ। दिल्ली पुलिस के अनुसार इस हिंसा में 118 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे। बाद की रिपोर्टों में घायल पुलिसकर्मियों की संख्या 129 तक बताई गई। लगभग 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और करीब 60 प्रदर्शनकारियों के घायल होने की भी रिपोर्ट सामने आई।
इसके बाद 31 जुलाई को घायल दिल्ली पुलिसकर्मियों के परिवारों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को जानबूझकर निशाना बनाया गया। परिवारों के अनुसार अग्रिम पंक्ति में तैनात जवानों को भीड़ ने घेरा, उन पर पत्थर फेंके और शारीरिक हमला किया। कुछ पुलिसकर्मियों की गंभीर चोटों का भी उल्लेख किया गया।
दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज और अन्य कार्रवाई के आरोप लगाए। राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के सक्रिय होने के बाद विदेशों में बैठे मानवाधिकार संगठनों ने भी भारतीय लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा करते हुए इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया। इन संस्थाओं ने 20 जुलाई की कार्रवाई में अत्यधिक बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के उल्लंघन की आशंका जताई। इसलिए लोकतंत्र में मूल प्रश्न यह नहीं है कि पुलिस सही थी या प्रदर्शनकारी। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि राजधानी के सबसे संवेदनशील प्रदर्शन क्षेत्र में भी पुलिसकर्मी सीधे भीड़ के हमले का शिकार हो जाते हैं, तो कानून-व्यवस्था कैसे कायम रहेगी।
यदि पुलिसकर्मियों को हजारों लोगों की भीड़ नियंत्रित करनी है, तो उनके पास पर्याप्त अधिकार, संसाधन, आवश्यकता पड़ने पर रैपिड फोर्स का सहयोग तथा सरकार ही नहीं, प्रतिपक्ष और समाज का भी विश्वास एवं समर्थन होना चाहिए। उन्हें यह भरोसा भी होना चाहिए कि ड्यूटी के दौरान गंभीर चोट लगने या मृत्यु होने पर उनके परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता, बीमा और चिकित्सा सुविधा मिलेगी।
इसे संयोग ही कहा जाएगा कि हाल की घटना पर देशभर में बहस के बीच 2020 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान आम आदमी पार्टी के पार्षद की अगुवाई में दिल्ली पुलिस की सहायता कर रहे केंद्रीय खुफिया ब्यूरो (आईबी) के युवा अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या मामले में अदालत का फैसला आया। अदालत ने बताया कि नेता ताहिर हुसैन और चार अन्य आरोपियों ने अत्यंत क्रूरता के साथ अंकित शर्मा की हत्या कर उनका शव नाले में फेंक दिया।
घटना के समय अंकित शर्मा निहत्थे थे। सामान्यतः खुफिया विभाग के अधिकारी बिना हथियार के भीड़ और संवेदनशील क्षेत्रों में स्थिति का आकलन करने तथा अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखने का कार्य करते हैं। अदालत ने उनके शरीर पर 51 चोटों और सात घातक घावों का उल्लेख करते हुए इसे अत्यंत क्रूर हत्या बताया और दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
अभियोजन पक्ष ने मृत्युदंड की मांग की थी। यह फैसला केवल 2020 के दिल्ली दंगों का मामला नहीं है, बल्कि यह भी प्रश्न उठाता है कि जब भीड़ कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिसकर्मियों, सुरक्षा कर्मियों और खुफिया अधिकारियों को ही निशाना बनाने लगे, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेगी।
वर्तमान में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को 1973 के आंदोलन को भी याद करना चाहिए, जो छात्रों की समस्याओं, पुलिस के सम्मान, कार्य परिस्थितियों, आवास, अवकाश, संगठन बनाने के अधिकार और वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार से जुड़ी शिकायतों से जुड़ा था। उस समय मैं दिल्ली में हिन्दुस्थान समाचार समाचार एजेंसी का संवाददाता था और संसद तथा राजनीति को कवर करता था।
संसद में इस मुद्दे की गूंज स्वयं देखी और सुनी है। आज बढ़ती आबादी, बढ़ती अपेक्षाओं और देश-विदेश की भारत विरोधी ताकतों के इरादों के साथ-साथ डिजिटल और इंटरनेट माध्यमों से सही-गलत सूचनाओं तथा अफवाहों के तेजी से फैलने की स्थिति को भी समझना होगा।
मार्च 1973 में अधीनस्थ पुलिसकर्मियों के बीच संगठनात्मक गतिविधियां तेज हुईं। अप्रैल में अनुशासन संबंधी विरोध के संकेत मिले और मई आते-आते असंतोष खुली चुनौती में बदल गया। लखनऊ विश्वविद्यालय इस विस्फोट का केंद्र बना। विश्वविद्यालय में परीक्षाओं के दौरान पीएसी की तैनाती को लेकर छात्रों में भी असंतोष था। मई 1973 में पीएसी के कुछ असंतुष्ट जवानों और छात्रों के आंदोलन का संपर्क हुआ।
देखते-देखते "पीएसी-छात्र एकता" के नारे लगने लगे। स्थिति तब गंभीर हो गई, जब पीएसी के कुछ जवान छात्रों के साथ विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए और विश्वविद्यालय परिसर में हिंसा तथा आगजनी होने लगी। विश्वविद्यालय की कई इमारतों, परीक्षा शाखा, रजिस्ट्रार कार्यालय और अन्य परिसरों को नुकसान पहुंचा। हालात इतने बिगड़ गए कि भारतीय सेना को विश्वविद्यालय परिसर में बुलाना पड़ा। सेना ने परिसर को घेरकर छात्रावासों को नियंत्रित किया और प्रवेश पर निगरानी शुरू की।
पुलिस का असंतोष और विद्रोह अंततः दबा दिया गया। कई जवानों पर मुकदमे चले, अनेक मारे गए, सैकड़ों गिरफ्तार और बर्खास्त किए गए। लेकिन सरकार पर इतना राजनीतिक दबाव पड़ा कि मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को पद छोड़ना पड़ा और उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। 1973 की यह घटना केवल पुलिस इतिहास नहीं थी, बल्कि पुलिस असंतोष, छात्र आंदोलन, प्रशासनिक विफलता, हथियारबंद विद्रोह, सेना के हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन का संयुक्त उदाहरण थी।
पिछले लगभग 20 वर्षों में पुलिस और सुरक्षा बलों को प्रदर्शन, दंगों, सांप्रदायिक हिंसा और भीड़ की हिंसा के दौरान कई बार निशाना बनाया गया है। 16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के बाद दिल्ली में हुए विशाल प्रदर्शन के दौरान कांस्टेबल सुभाष तोमर गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। दिसंबर 2018 में बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी गई।
इसी महीने गाजीपुर में प्रधानमंत्री की सभा से लौट रहे पुलिसकर्मियों पर भीड़ ने पथराव किया, जिसमें कांस्टेबल सुरेश वत्स की मृत्यु हो गई। इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिस को पर्याप्त सुरक्षात्मक उपकरण और संस्थागत संरक्षण प्राप्त है।
नवंबर 2019 में तीस हजारी अदालत परिसर में पुलिस और वकीलों के बीच हिंसक टकराव के बाद लगभग 2,000 पुलिसकर्मी और उनके परिवारजन पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के लिए पहुंचे। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि पुलिसकर्मी स्वयं अपनी सुरक्षा और संस्थागत संरक्षण की मांग लेकर सड़क पर उतरे थे। यह सामान्य ट्रेड यूनियन आंदोलन नहीं, बल्कि पुलिस बल के भीतर बढ़ती असुरक्षा की अभिव्यक्ति थी।
2020 में कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन लागू कराने की जिम्मेदारी पुलिस पर थी। इस दौरान कई राज्यों में पुलिसकर्मियों पर हमले हुए। महाराष्ट्र में दायर एक जनहित याचिका में दावा किया गया कि लॉकडाउन लागू कराने के दौरान 97 पुलिसकर्मियों पर हमले हुए। इससे स्पष्ट होता है कि पुलिस का जोखिम केवल गोली या पत्थर तक सीमित नहीं है, बल्कि महामारी, संक्रमण, लंबी ड्यूटी और मानसिक तनाव भी उनकी सेवा का हिस्सा हैं।
26 जनवरी 2021 के किसान ट्रैक्टर मार्च के दौरान दिल्ली में 394 पुलिसकर्मी घायल हुए। कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव हुआ तथा लाल किले में बैरिकेड तोड़कर प्रदर्शनकारियों के प्रवेश की घटनाएं सामने आईं। किसान आंदोलन के दौरान सिंघु बॉर्डर पर भी पुलिसकर्मियों पर हमले हुए। इन घटनाओं ने पुलिस के सामने यह कठिन चुनौती रखी कि एक ओर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार की रक्षा की जाए और दूसरी ओर हिंसा, पथराव तथा पुलिस पर हमलों की स्थिति में कानून-व्यवस्था भी बनाए रखी जाए।
इसलिए संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था और भारतीय समाज को लोकतांत्रिक अधिकारों के नाम पर होने वाले अनियंत्रित आंदोलनों और उपद्रवों को समय रहते नियंत्रित करने के उपायों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
AI टूल्स के बढ़ते उपयोग ने Amazon, सोशल मीडिया और ईमेल तक AI-जनित कंटेंट की बाढ़ ला दी है। विशेषज्ञों के अनुसार AI सहायक हो सकता है, लेकिन मौलिक सोच और लेखन की जगह नहीं ले सकता।
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Samachar4media Bureau
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
New York Times की टेक्नोलॉजी रिपोर्टर कश्मीर हिल की बायोग्राफ़ी साल भर से Amazon पर बिक रही थी। उन्हें इसका पता भी नहीं था। 90 पेज की यह किताब उनके बारे में इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर लिखी गई थी। जब किसी परिचित ने उन्हें इस बारे में बताया तो खोजबीन शुरू हुई। यह किताब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) से लिखी गई थी। उन्होंने लेखक से संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अब यह किताब ही ग़ायब हो गई है।
यह AI Slop का एक उदाहरण है। हिंदी में इसे AI-जनित कूड़ा-कचरा कह सकते हैं। ChatGPT 2022 में आने के बाद से कुछ भी लिखना आसान हो गया है। न सोचने की ज़रूरत है, न ही रिसर्च की। भाषा आना भी ज़रूरी नहीं है। सिर्फ़ एक Prompt दे दीजिए, AI सब कुछ कर सकता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि Amazon पर हर महीने करीब 3 लाख E-books प्रकाशित हो रही हैं। ChatGPT आने से पहले यह आँकड़ा एक लाख के आसपास था।
AI Slop सिर्फ़ किताबों में नहीं दिख रहा है, बल्कि सोशल मीडिया पर आपकी टाइमलाइन पर भी। सोशल मीडिया पर पोस्ट AI लिख रहा है। आपको आने वाले ज़्यादातर ईमेल भी AI ही लिख रहा है। WhatsApp पर AI से बने ग्राफिक्स की बाढ़ आ गई है। AI से लिखा हुआ कंटेंट पकड़ने वाली कंपनी Pangram Lab ने 10 लाख पोस्ट जाँचीं। LinkedIn पर 10 में से 4 लंबे पोस्ट AI ने लिखे थे, जबकि X पर एक-चौथाई। आपकी टाइमलाइन पर AI से लिखे पोस्ट आसानी से पकड़ में आ जाएंगे। भाषा एक जैसी, शैली एक जैसी, शब्दों की लफ़्फ़ाज़ी। ऐसे पोस्ट पढ़ने का मन भी नहीं करता।
मैं AI के इस्तेमाल और उसे सीखने का लगातार समर्थन करता रहा हूँ। सिर्फ़ इतना याद रखिए कि AI से लिखते समय अपना दिमाग़ गिरवी मत रखिए। आइडिया आपका होना चाहिए, भाषा और शैली आपकी होनी चाहिए। AI आपका Assistant हो सकता है। वह आपके लिए रिसर्च कर सकता है। आपकी कॉपी चेक कर सकता है। सारा काम ही उसे सौंप देंगे, तो फिर आप क्या करेंगे? कोई बड़ी बात नहीं होगी कि आने वाले दिनों में आपके लिखे शब्दों की क़ीमत मशीन से ज़्यादा हो जाए।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
अयोध्या राम मंदिर में दान-चढ़ावे की कथित चोरी के बाद मंदिर प्रबंधन पर बहस तेज हो गई है। इतिहास बताता है कि देश के कई बड़े मंदिरों में दान, संपत्ति को लेकर लंबे समय से विवाद होते रहे हैं।
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Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान-चढ़ावे की चोरी पर भारी राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है। निश्चित रूप से इस तरह का गंभीर अपराध पहले नहीं हुआ, क्योंकि इस बार सरकार के सहयोग और विश्व हिन्दू परिषद तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग मंदिर की पूरी व्यवस्था चला रहे थे। कुछ आरोपी कर्मचारियों पर कानूनी कार्रवाई शुरू हुई है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के नेता भ्रष्टाचार तथा अपराध की तरह व्यवस्थापकों को भी दंडित करने की आवाज उठा रहे हैं। संसद और सर्वोच्च न्यायालय में यह बहस का मुद्दा बना रहेगा।
अयोध्या के बाद बद्रीनाथ और वैष्णो देवी मंदिरों में भी चोरी के आरोप सार्वजनिक हुए हैं। असल में मंदिरों, मठों, आश्रमों अथवा मस्जिद, दरगाह, गुरुद्वारे और गिरिजाघरों जैसे विभिन्न धार्मिक स्थलों पर पहले भी कई बार विवाद सामने आते रहे हैं और अनेक मुकदमे आज तक अदालतों में चल रहे हैं। जहाँ वार्षिक आय करोड़ों रुपये होती है, वहाँ विवाद अक्सर इन मुद्दों पर होते हैं। चढ़ावे का नियंत्रण, दुकानों का आवंटन, पार्किंग और अन्य सेवा अनुबंध, मंदिर भूमि से आय, ट्रस्ट के निर्णय तथा दान की पारदर्शिता। खासकर दान-चढ़ावे के धन, सोने-चाँदी की संपत्ति और अधिकार को लेकर पहले से कार्यरत लोग ही एक-दूसरे पर आरोप लगाते या भंडाफोड़ करते हैं। अयोध्या मंदिर में भी पुराने कर्मचारी अथवा संगठन के लोगों ने बड़ी चोरी के राज खोलने शुरू किए हैं।
देश के प्रमुख मंदिरों के विवादों का रिकॉर्ड दिलचस्प है। ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में सेवायत (पुजारी परिवारों) और मंदिर प्रशासन के बीच अधिकारों को लेकर लंबे समय से विवाद रहे हैं। रथयात्रा, पूजा-पद्धति, चढ़ावे और सेवा-अधिकार पर कई मामले उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे। वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के सरकारी प्रबंधन, पुजारियों की भूमिका और पूजा के अधिकार को लेकर समय-समय पर विवाद हुए।
कॉरिडोर परियोजना के दौरान भी कई याचिकाएँ दायर हुईं। वृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में गोस्वामी परिवारों के अधिकार, दर्शन व्यवस्था और मंदिर प्रशासन को लेकर अनेक मुकदमे चले। सर्वोच्च न्यायालय तक कई प्रशासनिक मुद्दे पहुँचे। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती कराने के अधिकार, पुजारियों की नियुक्ति और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर विवाद हुए हैं। मंदिरों में विवाद इन मुद्दों पर होते हैं—वंशानुगत पुजारी बनने का अधिकार, कौन पूजा कराएगा और किस समय, चढ़ावे और दक्षिणा का बँटवारा, मंदिर की दुकानों, ठेकों और अन्य आय का प्रबंधन, सरकारी ट्रस्ट बनाम पारंपरिक पुजारी परिवार तथा सेवायतों की नियुक्ति और हटाना।
आम तौर पर पूजा का अधिकार ठेके पर नहीं दिया जाता। लेकिन कई मंदिरों में प्रसाद की दुकानें, पार्किंग, जूता-घर, कैंटीन, सफाई, सुरक्षा तथा अन्य व्यावसायिक सेवाओं का संचालन टेंडर या ठेके के माध्यम से होता है। मजेदार स्थिति यह है कि इन ठेकों को लेकर भी विवाद और मुकदमे होते हैं। इसी तरह साधुओं के कुछ आश्रमों के अधिकार को लेकर खूनी संघर्ष और मुकदमे तक हुए हैं।
पिछले वर्षों के दौरान देश के अनेक मंदिरों और मठों में महंतों की हत्या, उत्तराधिकार को लेकर गोलीबारी, साधुओं के गुटों में संघर्ष, मंदिर संपत्ति पर कब्ज़े के आरोप तथा दान और भूमि विवादों से जुड़ी आपराधिक घटनाएँ होती रही हैं। इनमें सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड के बड़े मठों, नाथ संप्रदाय के प्रमुख मठों, रामानुज, वैष्णव और अखाड़ों से जुड़े मठों तथा मंदिरों अथवा दक्षिण भारत के पद्मनाभस्वामी मंदिर, सबरीमला मंदिर और तिरुमाला मंदिर से जुड़े रहे हैं। अधिकांश घटनाएँ स्थानीय स्तर की रही हैं, जबकि कुछ मामलों में सीबीआई या एसआईटी जाँच भी हुई।
यदि प्राचीन इतिहास को देखें तो भारतीय उपमहाद्वीप में ईश्वर की उपासना मंदिरों से बहुत पहले से होती थी। सिंधु-सरस्वती सभ्यता (लगभग 2600 से 1900 ईसा पूर्व) में संगठित मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं, हालांकि पूजा और धार्मिक प्रतीकों के साक्ष्य अवश्य मिले हैं। वैदिक काल (1500–600 ईसा पूर्व) में पूजा का मुख्य केंद्र यज्ञ था। उस समय स्थायी मंदिरों की परंपरा नहीं थी। देवताओं की आराधना यज्ञ वेदियों पर होती थी। लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच मूर्ति-पूजा और देवालयों का विकास प्रारंभ हुआ।
गुप्त काल (चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी) को भारत में पत्थर के स्थायी हिन्दू मंदिरों का स्वर्णकाल माना जाता है। इसी समय देवगढ़, भितरगाँव, उदयगिरि आदि के मंदिर बने। इसके बाद दक्षिण भारत में पल्लव, चोल, चालुक्य, राष्ट्रकूट और होयसाल शासकों ने विशाल मंदिरों का निर्माण कराया। मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं थे। वे समाज के बहुआयामी केंद्र थे। मुख्य रूप से ईश्वर की उपासना, शिक्षा (गुरुकुल एवं वेद पाठ), कला, संगीत और नृत्य का संरक्षण, सामाजिक सभाएँ, दान एवं अन्नक्षेत्र, यात्रियों के विश्राम स्थल तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र माने जाते थे।
कई बड़े मंदिरों के पास गाँव, कृषि भूमि, गौशालाएँ और शिल्पकारों का संरक्षण भी होता था। दक्षिण भारत के अनेक मंदिर अपने समय के सबसे बड़े आर्थिक संस्थानों में गिने जाते थे। राजा मंदिर बनवाता था, भूमि दान देता था और सुरक्षा देता था। दूसरी ओर, धार्मिक अनुष्ठान पुरोहितों या मठों के अधीन होते थे। इससे दो प्रकार के अधिकार विकसित हुए—धार्मिक अधिकार: पूजा कौन कराएगा, परंपरा क्या होगी, महंत या पुजारी कौन होगा; तथा प्रशासनिक एवं आर्थिक अधिकार: दान, भूमि, आय और प्रबंधन किसके नियंत्रण में होगा। जब मंदिरों की संपत्ति बढ़ी, तब इन अधिकारों को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे।
प्राचीन भारत में भी विवाद होते थे। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों से पता चलता है कि विभिन्न मठों और संप्रदायों के बीच पूजा-अधिकार को लेकर मतभेद होते थे। राजाओं को कभी-कभी मंदिर प्रशासन में हस्तक्षेप करना पड़ता था। मंदिरों की दान-भूमि और आय के प्रबंधन पर शाही आदेश जारी किए जाते थे। कई शिलालेखों में मंदिर अधिकारियों को हटाने या नए प्रबंधक नियुक्त करने का उल्लेख मिलता है।
हालाँकि आधुनिक अर्थों में अदालतें नहीं थीं, इसलिए अधिकांश विवाद राजा, स्थानीय सभा (सभा/महासभा), ग्राम परिषद या धार्मिक परिषद द्वारा सुलझाए जाते थे। मध्यकाल में बड़े मठों और मंदिरों के पास विशाल संपत्ति हो गई। इससे महंत पद के उत्तराधिकार पर विवाद बढ़े। अलग-अलग धार्मिक संप्रदायों में नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा हुई। कुछ स्थानों पर हिंसक संघर्ष भी हुए।
स्थानीय शासकों और धार्मिक संस्थाओं के बीच शक्ति-संतुलन का प्रश्न उत्पन्न हुआ। ब्रिटिश शासन के दौरान सरकार ने देखा कि अनेक मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के पास बड़ी संपत्ति है। 19वीं शताब्दी में विभिन्न प्रांतों में धार्मिक बंदोबस्त और ट्रस्ट संबंधी कानून बनाए गए। धीरे-धीरे सरकार ने प्रत्यक्ष नियंत्रण कम किया और धार्मिक न्यासों तथा ट्रस्टों की व्यवस्था विकसित हुई।
स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राज्यों ने मंदिर प्रबंधन के लिए कानून बनाए। इसके बाद विवादों का स्वरूप बदल गया-पारंपरिक पुजारी बनाम सरकारी ट्रस्ट, वंशानुगत अधिकार बनाम आधुनिक प्रशासन, मंदिर की आय और संपत्ति का प्रबंधन तथा श्रद्धालुओं के अधिकार बनाम धार्मिक परंपरा। इसी प्रकार गुरुद्वारों में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और स्थानीय प्रबंधन, मस्जिदों में वक्फ बोर्ड और मुतवल्ली, चर्चों में डायोसीज़ और ट्रस्ट तथा कई मठों में महंत के उत्तराधिकार को लेकर भी विवाद हुए।
इतिहासकारों का सामान्य मत है कि मंदिर मूलतः आध्यात्मिक और सामाजिक संस्थाएँ थे, लेकिन जैसे-जैसे उनके पास भूमि, दान, आर्थिक संसाधन और सामाजिक प्रभाव बढ़ा, वैसे-वैसे प्रबंधन, उत्तराधिकार और स्वामित्व के विवाद भी बढ़े। यह प्रवृत्ति केवल हिन्दू मंदिरों तक सीमित नहीं रही; भारत और विश्व के लगभग सभी बड़े धार्मिक संस्थानों में किसी-न-किसी रूप में ऐसे विवाद देखने को मिलते हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )