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‘यह त्योहार अभी भी उल्लास नहीं देता लेकिन एक उम्मीद अवश्य है- वह सुबह कभी तो आएगी’
दीपावली लंबे समय तक मुझे उदास करती थी। अमावस की यह रात घिरने से पहले से मुझे वे विंब और मुखड़े याद आने लगते, जो घोर दरिद्रता की चलती-फिरती मुनादी हुआ करते थे।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
शशि शेखर, एडिटर-इन-चीफ, हिन्दुस्तान।।
दीपावली लंबे समय तक मुझे उदास करती थी। अमावस की यह रात घिरने से पहले से मुझे वे विंब और मुखड़े याद आने लगते, जो घोर दरिद्रता की चलती-फिरती मुनादी हुआ करते थे। वह 1970 और 1980 के दशक से गुजरता भारत था। उन दिनों दीपावली की रात बिजली आने की कोई गारंटी नहीं होती और अक्सर पूजन के वक़्त घुप्प अंधकार छा जाता। ऐसे में मां जब पूजा का दीया रौशन करती तो वह भाव-भक्ति के मुकाबले अंधेरे से जूझने का जरिया ज्यादा नजर आता।
अमाँ की उस बिजली रहित निशा में हमारी मुँडेरों पर तो मोमबत्तियाँ लगी होतीं और दरवाजों के दोनों ओर कड़वे तेल के दीपक रखे होते पर एक बड़ी आबादी रोशनी के एक कतरे तक से वंचित रह जाती। उस दौर में पटाखे आज की तरह सुलभ और शक्तिशाली नहीं थे। कुछ फुलझड़ियाँ, कुछ बम और फुसफुसे राकेट भी सिर्फ चंद नसीबवालों को हासिल थे। गरीब के लिए एक दीया तक मुहाल था। उनके कच्चे घरों के जर्जर दरवाज़े हवा चलने पर थरथरा रहे होते और उनकी धुकधुकी बढ़ती जाती। कहीं कोई बच्चा अपनी फुलझड़ी फूस के हमारे छप्पर पर न फेंक दे! कहीं कोई शरारती एक चिंगारी न उछाल दे। वे देर रात तक अभाव और आशंका के भँवर में गोते लगाते रहते। भय और निर्धनता में पुराना बहनापा है।
उधर,लक्ष्मी पूजन के बाद लजीज पूरियां, कचौड़ियाँ, खीर, रायते और सब्जियों की कटोरियाँ हमारा इंतजार कर रही होतीं। उत्सवी दिनों में माँ खास तरह की चुर्री बनातीं। जो लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक़ नहीं रखते वे सोच रहे होंगे पूड़ी-कचौड़ी तक तो ठीक था, यह भला चुर्री क्या बला है? बताता हूँ। मूली- अदरक को खास तरह से घिसकर उसमें बारीकी से कटा हुआ टमाटर और धनिया मिलाकर रख देते। परोसने से ठीक पहले उसमें हल्का सा नींबू निचोड़कर परोस देते। वह सलाद होते हुए भी उससे अलग होता और उस दिन के विशेष भोजन को अति विशिष्ट बना देता।
लेकिन जीवन सिर्फ स्वाद और संयोग की उपज भर नहीं है। पिता कौर तोड़ने से पहले हमें हाथ जोड़, आँखें मूँद ईश्वर का धन्यवाद अदा करने को कहते। वे यहीं नहीं रुकते, साथ में जोड़ देते अपने आसपास के झब्बी, रामू या कृपालु के बारें में सोचो। उनके यहां तो दो जून का साधारण भोजन किसी त्योहार से कम नहीं, हमारी तरह देसी घी का भोजन तो उनके लिए बस सपना है। हम भाग्यशाली हैं और इसके लिए हमें ईश्वर का कृतज्ञ होना चाहिए। उनके इतना कहते ही मेरी भूख आधी रह जाती और तमाम अभावग्रस्त चेहरे मुझे घेर लेते। देर रात तक घेरा बना कर वे मेरे चारों और नाचते, नींद से उठा देते।
दीवाली बरसों- बरस उनकी याद से बेमजा होती रही। इधर कुछ सालों में निर्धनता यकीनन कम हुई है। कुछ दिन पहले एक सर्वे की रिपोर्ट पढ़ रहा था कि झोपड़-पट्टियों में रेफ़्रीजरेटर, टीवी, दोपहिया और ब्रॉडबैंड की खपत साल दर साल बहुत तेज़ी से बढ़ रही है पर लक्ष्मी कभी सबपर समान कृपा नहीं करतीं। लोगों की जेबें कुछ भारी भले हुई हों लेकिन आय और व्यय का फर्क बढ़ता जा रहा है। उमगती इच्छाएँ, ललचाते बाज़ार और यह विषमता शुभ संकेत नहीं देती। यही वजह कि यह त्योहार अभी भी उल्लास नहीं देता लेकिन एक उम्मीद अवश्य है-वह सुबह कभी तो आएगी।
(फेसबुक पोस्ट से साभार)
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