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ट्रम्प की निगाह अब कोलंबिया, क्यूबा, ग्रीनलैंड और मैक्सिको पर: रजत शर्मा

असल में ट्रंप की धमकी के पीछे दो वजहें हैं। एक, अमेरिका की नज़र ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन पर हैं, दूसरा, ट्रंप को लगता है कि उत्तरी ध्रुव पर रूस और चीन का दबदबा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago

रजत शर्मा, इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ।

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को जब न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित फेडरल कोर्ट में हथकड़ियों में पेश किया गया, तो यह दृश्य केवल एक अदालती कार्रवाई नहीं था, बल्कि वैश्विक राजनीति में अमेरिका की ताकत और उसके इरादों का खुला प्रदर्शन बन गया। अदालत में पेशी के दौरान मादुरो ने साफ शब्दों में कहा कि वे अब भी वेनेजुएला के वैध राष्ट्रपति हैं और उन्हें उनके घर से जबरन उठा कर अमेरिका लाया गया है। वहीं, उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस ने भी खुद को बेगुनाह बताते हुए कहा कि वे वेनेजुएला की फर्स्ट लेडी हैं और उनके साथ अन्याय हुआ है। फ्लोरेस के माथे और कनपटी पर बंधी पट्टियां इस पूरे घटनाक्रम की हिंसक प्रकृति की ओर इशारा कर रही थीं।

कोर्ट ने दोनों को भरोसा दिलाया कि उन्हें बाद में अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलेगा। इस मामले में अगली सुनवाई 17 मार्च को तय की गई है। मादुरो और फ्लोरेस के वकीलों ने ज़मानत की अर्जी देने और वेनेजुएला के दूतावास से संपर्क कराने की मांग भी रखी है। इस गिरफ्तारी और पेशी के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में रूस, ईरान, फ्रांस, डेनमार्क और कोलंबिया जैसे देशों ने इस कार्रवाई की कड़ी आलोचना की। इन देशों का कहना था कि किसी संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को इस तरह अगवा करना अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन है। दूसरी ओर, अमेरिका ने अपना बचाव करते हुए दावा किया कि मादुरो ड्रग तस्करी, आतंकवाद और अमेरिका के खिलाफ साजिशों में लिप्त रहे हैं, इसलिए यह कार्रवाई जरूरी थी।

असल सवाल यह है कि क्या यह कानूनी कार्रवाई थी या फिर अमेरिकी ताकत की खुली नुमाइश? मादुरो को जिस तरह आम अपराधी की तरह कैमरों के सामने पेश किया गया, सुरक्षा कर्मियों द्वारा घसीटते हुए कोर्ट में ले जाया गया, उससे यही संदेश देने की कोशिश की गई कि अमेरिका के सामने कोई भी राष्ट्राध्यक्ष अछूता नहीं है। वेनेजुएला के भीतर इस घटना के बाद हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। मादुरो समर्थक सड़कों पर उतर आए हैं और उनकी रिहाई की मांग कर रहे हैं, जबकि विपक्षी खेमा इस घटनाक्रम को उत्सव की तरह मना रहा है। आम नागरिकों में डर और अनिश्चितता का माहौल है। लोगों को आशंका है कि देश में आवश्यक वस्तुओं की भारी किल्लत हो सकती है, इसलिए हजारों लोग रातभर दुकानों के बाहर लाइन लगाकर राशन और जरूरी सामान जमा कर रहे हैं।

इस बीच, उपराष्ट्रपति डेल्सी रॉडरिगेज़ ने वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली है। शपथ ग्रहण के बाद उन्होंने अमेरिका के साथ सहयोग की इच्छा जताई, लेकिन इसके बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें भी खुली धमकी दे डाली। ट्रंप ने साफ कहा कि वेनेजुएला समेत पूरे उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका को अमेरिकी वर्चस्व स्वीकार करना होगा, वरना अंजाम मादुरो से भी बदतर होगा। ट्रंप यहीं नहीं रुके। वेनेजुएला के बाद उनकी नजर पड़ोसी देश कोलंबिया पर है। उन्होंने कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्ताव पेट्रो पर ड्रग तस्करी के गंभीर आरोप लगाए और सैन्य कार्रवाई की धमकी तक दे डाली। ट्रंप की यह रणनीति लगभग 200 साल पुरानी “मोनरो डॉक्ट्रिन” की याद दिलाती है, जिसके तहत अमेरिका ने पूरे पश्चिमी गोलार्ध को अपना प्रभाव क्षेत्र घोषित किया था।

इसी नीति के तहत ट्रंप क्यूबा, मेक्सिको और पनामा को भी निशाने पर ले रहे हैं। पनामा नहर को लेकर अमेरिका की पुरानी महत्वाकांक्षा एक बार फिर सामने आ गई है। क्यूबा को लेकर ट्रंप का दावा है कि वेनेजुएला की सप्लाई लाइन बंद होते ही वहां की सरकार अपने आप गिर जाएगी। मेक्सिको में अमेरिकी कार्रवाई के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। खुद मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबॉम सड़कों पर उतर चुकी हैं। इसके बावजूद ट्रंप ने मेक्सिको पर भी ड्रग माफिया के नियंत्रण का आरोप लगाते हुए सैन्य हस्तक्षेप की धमकी दी है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप अब अमेरिका के पुराने सहयोगी देशों को भी नहीं बख्श रहे। ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी देकर उन्होंने डेनमार्क जैसे NATO सहयोगी को भी सकते में डाल दिया है। डेनमार्क ने इस धमकी का सख्त विरोध किया है और कहा है कि यह किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है। इन सभी घटनाओं के पीछे असली कारण क्या है? अमेरिकी मीडिया और विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की असली दिलचस्पी वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों में है। अमेरिका नहीं चाहता कि वेनेजुएला डॉलर के अलावा किसी और मुद्रा, खासकर चीनी युआन में तेल बेचे। इतिहास गवाह है कि इराक और लीबिया ने जब पेट्रोडॉलर सिस्टम को चुनौती दी, तो उनके शासकों का क्या हश्र हुआ।

आज हथकड़ियों में पेश किए गए मादुरो को देखकर यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है—क्या वेनेजुएला की जनता किसी विदेशी ताकत को अपने देश की सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण करने देगी? क्या वहां के लोग यह स्वीकार करेंगे कि उनके तेल और संपदा का इस्तेमाल उनके भविष्य के बजाय अमेरिका की ताकत बढ़ाने के लिए हो? यह सिर्फ वेनेजुएला की कहानी नहीं है, यह उस वैश्विक व्यवस्था पर सवाल है, जहां ताकतवर देश अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और लोकतंत्र की सीमाओं को अपनी सुविधा के अनुसार तय करते हैं।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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