होम / विचार मंच / ‘हम एक और बदलाव की दहलीज पर हैं, ISEC स्वागतयोग्य कदम है’
‘हम एक और बदलाव की दहलीज पर हैं, ISEC स्वागतयोग्य कदम है’
BARC के चेयरमैन शशि सिन्हा का यह कहना है कि हम ‘मार्केट रिसर्च सोसाइटी ऑफ इंडिया’ द्वारा प्रस्तावित 'इंडियन सोशियो इकोनॉमिक क्लासिफिकेशन' (ISEC) का मूल्यांकन कर रहे हैं, सोचने पर विवश करता है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 1 year ago
चिंतामणि राव, स्ट्रैटेजिक मार्केटिंग और मीडिया कंसल्टेंट।।
शशि सिन्हा का यह बयान कि ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) हाल ही में प्रस्तावित 'इंडियन सोशियो इकोनॉमिक क्लासिफिकेशन' (ISEC) का मूल्यांकन कर रहा है, सोचने पर विवश करता है।
अंग्रेजी वेबसाइट 'एक्सचेंज4मीडिया' (e4m) के साथ एक बातचीत में ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) के चेयरमैन शशि सिन्हा का कहना था, ‘हम ‘मार्केट रिसर्च सोसाइटी ऑफ इंडिया’ (MRSI) द्वारा प्रस्तावित नवीनतम सामाजिक-आर्थिक वर्गीकरण प्रणाली 'इंडियन सोशियो इकोनॉमिक क्लासिफिकेशन' (ISEC) का मूल्यांकन कर रहे हैं। जल्द ही, हम अपने स्टेकहोल्डर्स-ब्रॉडकास्टर्स और ऐडवर्टाइजर्स से परामर्श करना शुरू करेंगे। उनके फीडबैक के बाद ही बार्क इस दिशा में अगला कदम उठा सकता है।’
जो कुछ भी शशि सिन्हा ने कहा है, उसमें कुछ भी गलत नहीं है। सवाल इंडस्ट्री के काम करने के तरीके के बारे में है, स्पष्टत: बार्क इसमें शामिल नहीं है। ‘इंडियन सोसायटी ऑफ एडवर्टाइजर्स’ (ISA) ने इसका समर्थन किया है, लेकिन जब तक इसे बार्क में सबसे बड़े स्टेकहोल्डर इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है, ISEC एक गैर-स्टार्टर है। (ध्यान दें कि शशि सिन्हा ने एजेंसियों, बार्क में तीसरे स्टेकहोल्डर का उल्लेख नहीं किया है।)
सबसे पहले यह कहा जाना चाहिए कि ‘ISEC’ एक स्वागतयोग्य कदम है, और इसमें कुछ भी जल्दबाजी नहीं हुई है, न केवल इस कारण से कि यह क्या है बल्कि इस कारण से भी कि यह किसके स्थान पर है।
ISEC केवल बिजनेस और एजुकेशन के मापदंडों पर विचार करता है, जैसा कि पूर्ववर्ती SEC (सामाजिक-आर्थिक वर्गीकरण) ने किया था। इसमें अंतर सिर्फ यह है कि इसमें पेशे (occupation) का पैरामीटर मुख्य कमाने वाले का पेशा है, पहले की तरह दो एजुकेशन पैरामीटर हैं- सबसे शिक्षित वयस्क पुरुष का शिक्षा स्तर और सबसे महत्वपूर्ण-घर में सबसे अधिक शिक्षित वयस्क महिला का शिक्षा स्तर। मेरे विचार में इनमें आखिरी वाला काफी शानदार और व्यावहारिक सोच वाला है।
ISEC को NCCS (न्यू कंज्यूमर क्लासिफिकेशन सिस्टम) की जगह लाया जा रहा है, जिसके बारे में मैंने कहा था वह लंबे समय से है और पुराना है और अनुमानत: इसकी सीमित उपयोगिता है।
वर्ष 2011 में अपनाया गया NCCS दो मापदंडों पर आधारित है, जिनमें से एक कमाई करने वाले प्रमुख (अब मुख्य अर्जक) की एजुकेशन है। दूसरा पेशा नहीं है, बल्कि 11 की लिस्ट में से घर में वस्तुओं की संख्या है।
यह दिखाने के लिए तमाम तरह के विश्लेषण थे कि NCCS क्यों और कैसे SEC से बेहतर था, जिसे उसने प्रतिस्थापित किया था, लेकिन मेरे विचार से यह बहुत ही अलग तरह का था। मार्केटर्स किसी भी परिवार की उपभोग करने की प्रवृत्ति में रुचि रखते हैं। यदि ऐसे सिस्टम का उद्देश्य परिवारों को उनकी उपभोग की प्रवृत्ति के अनुसार वर्गीकृत करना है, तो हमें उनके संभावित व्यवहार के संकेतकों को देखना चाहिए। घर में वस्तुओं का स्वामित्व एक संकेतक के रूप स्पष्ट व्यवहार है। यह बस यह बताता है कि जिन लोगों ने अतीत में अधिक ड्यूरेबल प्रॉडक्ट्स खरीदे हैं, उनके पास भविष्य के लिए बेहतर संभावनाएं हैं।
इस बारे में मेरा तर्क है कि यदि जिस परिवार के पास आज एक ड्यूरेबल वस्तु है, वह अगले वर्ष दो और खरीद ले तो उसका वर्गीकरण बदल जाएगा। इसका नतीजा यह होगा कि जैसे-जैसे समय के साथ परिवारों के पास अधिक टिकाऊ वस्तुएं होंगी, हर किसी का वर्गीकरण बढ़ेगा। बिल्कुल वैसा ही हुआ। साल-दर-साल NCCS ए, बी और सी परिवारों का अनुपात बढ़ रहा है और डी और ई परिवारों का अनुपात कम हो रहा है।
ISEC अधिक स्थिर है, जैसा कि पुराना SEC था। एक घर के लिए ये मापदंड समय के साथ धीरे-धीरे बदलते हैं और यदि वे बदलते हैं तो या तो यह जीवन में आए बदलावों का परिणाम है या इसका परिणाम जीवन में बदलाव है। यदि घर में मुख्य रूप से कमाने वाला अपने पेशे में तरक्की करता है या घर में वयस्कों की शिक्षा की स्थिति में परिवर्तन होता है तो निश्चित रूप से समय के साथ उनकी उपभोग की आदतों में बदलाव आएगा और उसके अनुसार वर्गीकरण भी बदलना चाहिए।
आज शायद बहुत ही कम लोगों को याद होगा और हो सकता है कि वे जानते भी हों कि एक ऐसा समय ऐसा था, जब घरों को केवल आय (Income) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता था और पैरामीटर के रूप में इसमें काफी कमियां थीं। इनकम से सामाजिक-आर्थिक मापदंडों की ओर बढ़ना मौलिक बदलाव था और यह बिना किसी रुकावट के आया, क्योंकि स्टेकहोल्डर्स शुरू से ही इस बारे में बातचीत कर रहे थे।
यह 1987 की बात है, जब उपभोग की आदतों के बारे में जानने के उद्देश्य से एक समूह अनौपचारिक तौर पर एकत्र हुआ था, जिसमें ओबीएम (ओगिल्वी) से रोडा मेहता और मैं; हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल) से रजनी चड्ढा; कैडबरी (मोंडेलेज) से प्रकाश निझारा और आईएमआरबी (कांतार आईएमआरबी) से थॉमस पुलियेल शामिल थे।
नेशनल रीडरशिप सर्वे यानी NRS (इंडियन रीडरशिप सर्वे का पूर्ववर्ती) के एक नए एडिशन के लिए फील्डवर्क की तैयारी पहले से ही चल रही थी, जो उस समय एकमात्र सिंडिकेटेड मीडिया रिसर्च था। स्पष्ट रूप से, वर्गीकरण की नई पद्धति निरर्थक हो जाती यदि एनआरएस ने इसका उपयोग नहीं किया होता। उस समय पहला कदम एनआरएस काउंसिल को चुनना था। त्वरित परामर्श के बाद वे बदलाव की आवश्यकता पर सहमत हुए और चीजों को रोक दिया।
इस समूह के कहने पर MRSI ने कैडबरी द्वारा वित्त पोषित रिसर्च किया, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि कौन से पैरामीटर किसी घर की उपभोग करने की प्रवृत्ति के बारे में सही से बता सकते हैं और वर्गीकृत किए जा सकते हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह मुख्य वेतन अर्जक (CWE) यानी परिवार में कमाने वाले मुख्य व्यक्ति की शिक्षा और पेशे का एक संयोजन (combination) था। यह भी सहज रूप से सभी की समझ में आया।
इसके परिणाम स्वरूप वर्गीकरण विधि SEC (सामाजिक-आर्थिक वर्गीकरण) को 1988 में नेशनल रीडरशिप सर्वे से शुरू करके अपनाया गया। अब हम एक और बदलाव की दहलीज पर हैं, जिसकी आवश्यकता 35 साल पहले थी, लेकिन आगे का रास्ता अनिश्चित है।
'इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन' (IBDF) ने नई कार्यप्रणाली और उसके प्रभाव को समझने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया है। इस टास्क फोर्स में जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC), न्यूज, स्पोर्ट्स व अन्य जॉनर का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों के शामिल हैं।
कहा जा रहा है कि न्यूज और स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टर्स इसका स्वागत कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इससे उन्हें लाभ होगा। दूसरी ओर, जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स वाले ब्रॉडकास्टर्स इसका विरोध कर सकते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उन्हें नुकसान हो सकता है-विशेष रूप से महिला शिक्षा को एक पैरामीटर के रूप में शामिल करने से।
यह देखकर अच्छा लगा कि ‘इंडियन सोसायटी ऑफ एडवर्टाइजर्स’, जो BARC से संबंधित मामलों पर लंबे समय से चुप था, ने सार्वजनिक रूप से ISEC का समर्थन किया है। यह अलग बात है कि वह BARC में अपना दबदबा बना पाएगी या नहीं। अभी पिक्चर बाकी है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
टैग्स ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल शशि सिन्हा चिंतामणि राव मार्केट रिसर्च सोसाइटी ऑफ इंडिया सामाजिक-आर्थिक वर्गीकरण प्रणाली इंडियन सोशियो इकोनॉमिक क्लासिफिकेशन